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न्यायाधीश और अधिवक्ताओं के पूर्वाग्रह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं।

Justice K Hemaकेरल उच्च न्यायालय की निवर्तमान न्यायाधीश के. हेमा ने उन की सेवा निवृत्ति पर आयोजित समारोह में अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों को संबोधित करते हुए। अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर किया जिसे सब जानते हैं लेकिन जिस पर खुल कर बात नहीं करते। उन्हों ने कहा कि न्यायाधीश और अधिवक्ता पूर्वाग्रह युक्त होते हैं और उन का यह पूर्वाग्रह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करता है। पूर्वाग्रह सभी इंसानों में मौजूद रहता है। न्यायाधीश और अधिवक्ता भी इन्सान हैं। कोई इंसान नहीं जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। उन्हों ने कहा कि एक मामले को तीन अलग अलग जजों को निर्णय करने के लिए दिया जाए तो वे तीनों अलग अलग निर्णय देंगे।

न्यायिक प्रणाली में उपस्थित इन पूर्वाग्रहों में कानून की व्याख्या करने वाले पूर्व निर्णयों का अनुसरण करने का पूर्वाग्रह भी शामिल है। अधिवक्ता और न्यायाधीश इस मकड़जाल में बुरी तरह से उलझे हुए हैं। एक बार जब कानून के किसी उपबंध या प्रावधान की पहली या दूसरी बार व्याख्या कर दी जाती है और उस में कोई गलती हो जाती है तो न्यायिक प्रणाली उस गलती का अनुसरण करती है और उस से बड़ी से भी बड़ी गलतियाँ दोहराती चली जाती है।

न निहित पूर्वाग्रहों के कारण अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों से रही गलतियों के कारण न्याय प्रभावित हो रहा है यहँ तक कि एक न्याय करने में सक्षम और ईमानदार जज भी गलतियाँ करने को अभिशप्त होता है।

न्याय को इन पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की सख्त की जरूरत है। न्यायमूर्ति हेमा ने कहा कि हमें अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों की मदद से उन तरीकों की खोज करने की सख्त जरूरत है जिन से इन पूर्वाग्रहों की पहचान की जा सके और न्याय प्रणाली को उन से मुक्त किया जा सके। यह कोई आसान काम नहीं है। लेकिन यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो न्यायाधीश और अधिवक्ता न्याय प्रणाली के संरक्षक होने के कारण इस के लिए दोषी होंगे।

न्यायाधीश के दुराचरण की शिकायत उच्च न्यायालय के विजिलेंस रजिस्ट्रार को करें

समस्या-

जमशेद्पुर, झारखण्ड से राकेश मिश्रा ने पूछा है-

मुझ पर एक झूठा केस किया गया, जिस में मुझे न्यायाधीश द्वारा पक्षपात करते हुए जेल भेज दिया गया। क्या मैं इस के लिए जज की शिकायत कर सकता हूँ तो कहाँ कर सकता हूँ? मैं निर्दोष होते हुए भी जेल गया। कृपया मेरी मदद करें।

समाधान-

हो सकता है कि आप के विरुद्ध मिथ्या मुकदमा किया गया हो और आप को उस में सजा हो गई हो। न्यायाधीश को कुछ पता नहीं होता है कि कौन सा मुकदमा सच्चा है और कौन सा मुकदमा झूठा है। न्यायाधीश सदैव ही उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए सबूतों के आधार पर निर्णय करता है। यदि न्यायाधीश के समक्ष मिथ्या सबूत प्रस्तुत किए गए हों और उन के झूठ को आप सुनवाई के दौरान साबित नहीं कर सके हों तो भी आप को झठे मुकदमे में सजा हो सकती है। सुनवाई के दौरान हर अभियुक्त को इस बात का अवसर प्राप्त होता है कि वह गवाहों और सबूतों को मिथ्या साबित करे। हो सकता है मुकदमे की सुनवाई के दौरान आप से और आप के वकील से गलती हुई हो और वे झूठ को पकड़ नहीं सके हों और आप को मिथ्या मुकदमे में सजा हो गई हो। लेकिन इस में न्यायाधीश की कोई गलती नहीं है।

ह भी हो सकता है कि न्यायाधीश से सबूतों के विश्लेषण में कोई गलती हुई हो तो आप सजा को निलंबित करवा कर न्यायालय के निर्णय की अपील करते। अपील में निर्णय आप के पक्ष में हो जाता।

प को इन सब बातों पर विचार करना चाहिए। यदि फिर भी आप को लगता है कि गलती न्यायाधीश की है और उस ने दुर्भावना से प्रेरित हो कर आप के विरुद्ध निर्णय किया है तो आप उच्च न्यायालय के विजिलेंस रजिस्ट्रार को न्यायाधीश के संबंध में शिकायत भेज सकते हैं। अपनी शिकायत के तथ्यों के समर्थन में आप को एक शपथ पत्र भी देना होगा। आप की शिकायत की जाँच हो जाएगी। यदि आपकी शिकायत सही पाई गई तो न्यायाधीश के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही हो सकती है।

क्यों नहीं मिलते न्यायाधीश पदों के लिए योग्य व्यक्ति ?

‘भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण-2022’ विषय पर अखिल भारतीय न्यायाधीश एसोसिएशन के दो दिवसीय अखिल भारतीय न्यायाधीश सम्मेलन के शुभारंभ के अवसर पर बोलते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने स्वीकार किया किया कि राजस्थान में उच्च न्यायालय में नियु्क्ति हेतु योग्य व्यक्ति नहीं मिल रहे हैं। इसी अवसर पर राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने प्रदेश में अदालतों की संख्या को कम बताते हुए और अदालतें खोलने की जरूरत पर बल दिया है।

न्यायाधीश अल्तमश कबीर

च्च न्यायालयों में न्यायाधीश वकीलों से सीधी भर्ती द्वारा और उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन के माध्यम से नियुक्त किए जाते हैं। वकीलों में से तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए योग्य व्यक्ति प्राप्त हो जाते हैं लेकिन उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से योग्य व्यक्तियों का मिलना कठिन हो रहा है तो इस के कारणों का अनुसंधान किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति अपने बीस-पच्चीस वर्ष न्यायिक सेवा में व्यतीत करता है उसे तो अधिक योग्य होना चाहिए। आखिर उस के पास मुकदमों की सुनवाई का अधिक अनुभव होता है। फिर क्या कारण है कि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने योग्य योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता है?

स्तुतः इस का प्रश्न का उत्तर राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा के वक्तव्य में छिपा है। उन का कहना है कि राजस्थान में पर्याप्त संख्या में न्यायालय नहीं है। उन्हों ने अपने वक्तव्य में एक तथ्य और नहीं बताया कि राजस्थान में जितने न्यायालय हैं उन में से बीस प्रतिशत न्यायालय न्यायाधीशों के अभाव में रिक्त पड़े हैं। एक और तो निम्नतम स्तर पर न्यायाधीशों की भर्ती की प्रक्रिया को नौकरशाही के हवाले कर दिया गया है कि वह आवश्यकता के अनुसार न्यायाधीशों की भर्ती नहीं कर पाती। जब तक वह रिक्त पदों को भरने लायक न्यायाधीशों को तैयार करती है तब तक उतने ही पद और रिक्त हो जाते हैं। न्यायायाधीशों की भर्ती की योजना इस तरह की होनी चाहिए कि योग्य व्यक्तियों के चयन और प्रशिक्षण के उपरान्त उन की नियुक्ति में लगने वाले समय में कितने पद और रिक्त हो जाएंगे इस का पहले से आकलन किया जाना चाहिए। इस आकलन के अनुरूप ही व्यक्तियों का चयन किया जाना चाहिए। जिस से कम से कम राज्य का कोई भी न्यायालय न्यायाधीश के अभाव में रिक्त न रहे। एक बार राज्य में यह स्थिति ले आई जाए तो राज्य में मुकदमों के निपटारे की गति को तीव्र किया  जा सकता है।

नेक न्यायालयों में न्यायाधीश का पद रिक्त हो जाने का असर यह होता है कि शेष न्यायालयों पर उन न्यायालयों के मुकदमों की सुनवाई का भार आ पड़ता है। इस तरह एक न्यायाधीश को एक से अधिक न्यायालयों का कार्य देखना होता है। पहले ही राजस्थान के अनेक न्यायालयों की स्थिति ऐसी है कि उन में चार से पाँच हजार मुकदमे लंबित हैं। पक्षकारों और वकीलों का न्यायालयों पर जल्दी जल्दी पेशियाँ देने का दबाव रहता है। जिस के कारण न्यायालयों की दैनिक कार्यसूची में तीन चार गुना मुकदमें लगते हैं। न्यायाधीशों का बहुत सारा समय केवल पेशियाँ बदलने के काम में जाया होता है। वे वास्तविक न्यायिक कार्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। उन पर कोटे के अनुसार मुकदमों के निपटारे का दबाव भी होता है। इस तरह अधीनस्थ न्यायालयों का प्रत्येक न्यायाधीश अत्यन्त दबाव में काम करता है। जिस से निर्णयों की गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। यह वैसी ही स्थिति है जैसी हम निर्माण के कार्य में लगे मजदूरों की देखते हैं। वहाँ ठेकेदार का मुंशी लगातार मजदूरों की छाती पर खड़ा रहता है और जल्दी जल्दी काम निपटाने के लिेए लगातार दबाव बनाए रखता है। इधर न्यायाधीशों के कार्य का आकलन उन के द्वारा निपटाए गए मुकदमों की संख्या के आधार पर होने लगा है। गुणवत्ता के आधार पर नहीं।  न्यायाधीश अपने द्वारा निर्णीत मुकदमों की संख्या बढ़ाते हैं लेकिन गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं देते। संख्या मुख्य हो गई है और गुणवत्ता गौण। ऐसे में किसी भी प्रकार यह आशा नहीं की जा सकती कि अधीनस्थ न्यायालयों में काम कर रहे न्यायाधीशों में से उच्च न्यायालय में नियुक्ति के योग्य व्यक्ति मिल सकेंगे। जिला और अपर जिला न्यायाधीश के पदों पर नियुक्त अनेक न्यायाधीश ऐसे हैं जो उन पदों के भी योग्य नहीं हैं।

ज जब न्यायपालिका के तुरंत विस्तार की आवश्यकता है। भारत में विकसित देशों की तुलना में आबादी के लिए केवल दस प्रतिशत न्यायाधीश नियुक्त हैं। हमें इस अनुपात को तुरंत सुधारना होगा। इस स्थिति को देश कब तक ढोता रहेगा कि कानून तो हैं लेकिन उन की पालना कराने के लिए न्यायालय नहीं हैं। मुकदमों का अंतिम निपटारा या तो होता ही नहीं है और होता है तो उस में 20-30-50 वर्ष तक लग रहे हैं। इस से हमारी न्याय व्यवस्था तेजी के साथ जन विश्वास खोती जा रही है। यही स्थिति बनी रही तो यह एक दिन जन विद्रोह का एक बड़ा कारण भी बन सकती है। इस स्थिति से न्यायपालिका में काम कर रहे न्यायाधीश चिंतित हैं। वकील चिंतित हैं। लेकिन यदि सब से कम चिंतित हैं तो हमारी राज्य सरकारें हैं। उन के माथे पर इस विषय पर कोई चिंता की लकीर तक दिखाई नहीं देती। सरकारों के प्रधान अगले चुनाव में वोट की व्यवस्था बनाने की ही चिंता करते दिखाई देते हैं। यह सब से बुरी स्थिति है। निकट भविष्य में इस स्थिति से निजात मिलती दिखाई नहीं देती और देश के न्यायिक परिदृश्य में निकट भविष्य में सुधार की कोई संभावना भी नजर नहीं आती।

कम न्यायालयों के कारण निर्णयों की गति और गुणवत्ता पर बुरे प्रभाव

प ने विगत आलेख न्याय प्राप्ति एक दुःस्वप्न … में पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री वी.एन. खरे की कलम से जाना था कि भारत में न्याय प्राप्ति की स्थिति क्या है।  जहाँ विकसित देशों में प्रति दस लाख की आबादी पर 140 से 150 न्यायाधीश अपने देश की जनता को न्याय प्रदान करने का काम करते हैं वहाँ हमारी व्यवस्था इसी दस लाख की आबादी के लिए केवल 13.5 न्यायाधीश उपलब्ध करवा पा रही है। इस का असर न्याय प्रदान करने की गति और गुणवत्ता पर सीधे तौर पर पड़ रहा है। जहाँ एक मुकदमे को निपटाने में पाँच-दस वर्ष से लेकर 20-30 वर्ष पहली ही अदालत में लग रहे हों वहाँ जनता के मन में न्याय प्राप्ति की आशा निरन्तर धूमिल होती जा रही है। हमारी सरकार न्याय पालिका में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने के स्थान पर वैकल्पिक उपायों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है लेकिन आशातीत परिणाम बहुत दूर की कौड़ी हो गए हैं। उधर सर्वोच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयो पर तेज गति से मुकदमों को निपटाने के लिए दबाव पैदा कर रहे हैं इस का असर निर्णयों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

धर राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने अधीनस्थ न्यायालयों को मुकदमों का निपटारा तेज गति से करने के लिए कुछ निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों में कुछ निर्देश इस प्रकार के हैं कि दस वर्ष से अधिक समय लंबित कोई मुकदमा जिस तिथि को प्रतिवादी साक्ष्य के लिए निश्चित हो जाए उस तिथि से छह माह की अवधि में उस मुकदमे में निर्णय कर दिया जाना चाहिए। इस से प्रतिवादी पर तो इस बात का दबाव आ गया है कि वह जल्दी से जल्दी अपनी साक्ष्य पूरी करे। इस से यह भी हो रहा है कि उचित और पर्याप्त साक्ष्य वह प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है। यदि वह किसी तरह चार माह में साक्ष्य पूरी भी कर लेता है तो उसे मुकदमे की पत्रावली से आवश्यक दस्तावेजों और गवाहियों की प्रतिलिपियाँ प्राप्त करने में एक माह और निकल जाता है। अब न्यायालय पर एक माह में निर्णय कर देने का दबाव होता है।किसी तरह यदि उस मुकदमे में दोनो पक्षों की बहस हो जाती है तो न्यायालय पर उस मुकदमे का निर्णय जल्दी में करने का दबाव बन जाता है।

पिछले दिनों एक मुकदमे में ऐसा ही हुआ। महत्वपूर्ण मुकदमा था। जब निर्णय आया तो मेरे मुवक्किल के विरुद्ध आया। हमने निर्णय की प्रतिलिपि प्राप्त की जिस में एक सप्ताह निकल गया। निर्णय को पढ़ने के लिए मुवक्किल को दे दिया गया। उस ने एक सप्ताह में उसे मुझे लौटाया और उस की अपील करने को कहा। मैं उन दिनों अस्वस्थता और कुछ व्यस्तता के कारण अपील की तैयारी न कर सका। एक सप्ताह उस में गुजर गया। कल रात जब मैं उस निर्णय की अपील तैयार करने बैठा तो निर्णय को पढ़ कर मैं ने अपना माथा ठोक लिया। तत्थ्य के जितने विवादित बिन्दु उस मामले में दोनों पक्षों द्वारा उठाये गये थ, और जिन पर साक्ष्य भी उपलब्ध थी और जिन पर बहस की गई थी उन सब पर निर्णय ही नहीं किया गया था। कुछ विधि के बिन्दु थे जिन पर दोनों पक्षों द्वारा बहस की गई थी और उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें प्रस्तुत की गई थीं उन में से भी कुछ पर निर्णय नहीं किया गया था। कुछ का निर्णय किया गया था तो विवादित बिन्दुओं को ही गलत समझ  लिया गया था। जब अपील बन कर तैयार हुई तो अधिकांश आपत्तियों में यह लिखना पड़ा कि इस बिन्दु पर न्यायालय ने कोई निर्णय ही नहीं किया।

स तरह इस अपील का भविष्य भी मुझे स्पष्ट दिखाई देने लगा। अपील में अपील न्यायालय को सिर्फ इतना करना था कि जिन बिन्दुओं पर निर्णय नहीं किया गया उन पर निर्णय करने के लिए मुकदमें को वापस अधीनस्थ न्यायालय को प्रेषित कर दिया जाए। इस तरह संख्या की दृष्टि से अधीनस्थ न्यायालय ने एक मुकदमे का निर्णय तो कर दिया था लेकिन वास्तव में मुकदमे का कोई निर्णय ही नहीं हुआ। अब एक दो वर्ष अपील न्यायालय में लगेंगे और फिर पुन अधीनस्थ न्यायालय मे भी एक-दो वर्ष लगेंगे। उस समय अधीनस्थ न्यायालय के पास यह मुकदमा नया होगा और जल्दी निर्णय करने का कोई दबाव भी नहीं होगा। शायद तब अधीनस्थ न्यायालय सही निर्णय कर पाए। इस तरह के अनुचित दबाव से एक तो निर्णयों की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है और दूसरी और एक विवाद के निपटारे में कम सेकम तीन चार वर्ष की वृद्धि और हो गयी है। यदि निर्णयों की गुणवत्ता बनाए रखनी है तो न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि करना ही एक मात्र उपाय है। जाने कब हमारी व्यवस्था इस काबिल हो सकेगी कि देश को पर्याप्त मात्रा में न्यायाधीश और न्यायालय उपलब्ध करवा सके।

जनसंख्या-न्यायाधीश अनुपात


कानून और न्याय मंत्री जनाब सलमान खुर्शीद साहब ने राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में फरमाया है कि विधि आयोग ने 31 जुलाई 1987 को दी गई अपनी 120वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि दस लाख की आबादी पर न्यायाधीशों की संख्या 10.5 से बढ़ा कर 50 की जानी चाहिए। उच्चन्यायालयों में जजों की संख्या के लिए प्रत्येक तीन वर्ष में पुनरावलोकन किया जाता है और मुकदमों के दर्ज होने और निपटारा किए जाने की संख्या के आधार पर समीक्षा की जाती है। खुर्शीद साहब ने यह भी फरमाया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने All India Judges’ Association & Ors Vs. Union of India & Ors ऑल इंडिया ‘न्यायाधीश एसोसिएशन व अन्य बनाम. भारत संघ व अन्य के प्रकरण में 21.03.2002 को पारित निर्णय में केन्द्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि वे प्रति दस लाख आबादी पर न्यायाधीशों के 10.5 से 13 तक के तत्कालीन अनुपात को शीघ्रता से 50 तक बढ़ाएँ। इस के बाद केन्द्र ने सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना की कि इस निर्देश को कम से कम केंद्र सरकार की जिम्मेदारी को कार्यभार और मुकदमों की संख्या के आधार पर निर्धारित किया जाए। सलमान खुर्शीद साहब ने राज्य सभा को यह सूचना नहीं दी कि केंद्र सरकार की प्रार्थना पर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या आदेश दिया। उन्हों ने यह भी नहीं बताया कि केन्द्र और राज्यों ने विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट की सिफारिशों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की पालना में क्या प्रगति की है।

न्यायपालिका राज्य का अनिवार्य अंग है। लेकिन राज्य की व्यवस्था सरकारें, संसद और विधानसभाएँ देखती हैं। वही निर्धारित करते हैं कि न्यायपालिका को कितना दाना-पानी दिया जाए। जब बजट आता है तो न्यायपालिका के लिए निर्धारित किए गए दाना-पानी की मात्रा की सूचना किसी कोने में छुपी रहती है। सब का ध्यान लगाए गए टैक्सों पर होता है। यहाँ तक कि मीडिया और समाचार पत्र में इस की चर्चा तक नहीं होती। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री इस विषय पर कभी नहीं बोलते। यह विषय हमेशा ही उपेक्षित रह जाता है। यही उपेक्षा कालान्तर में व्यवस्था को बहुत भारी पड़ती है। इस का एक उदाहरण हमने अभी हाल ही में देखा कि जब अन्ना का अनशन तिहाड़ से निकल कर रामलीला मैदान तक पहुँचा और जनता उस और दौड़ने लगी तो प्रधानमंत्री का सब से पहला बयान था कि केवल लोकपाल से कुछ नहीं होगा। हमें न्यायिक व्यवस्था में सुधार करने होंगे।

न का वह बयान बिलकुल सही था। लोकपाल आ गया, वह अन्वेषण कर के अभियोजन दाखिल करने लगा तो भी फैसले तो अदालतो ने ही करने हैं। जब तक अदालतें फैसला न कर देंगी तब तक कोई भ्रष्टाचारियों का क्या बिगाड़ लेगा? वे अदालतों के फैसलों की तारीख तक जेलों को थोड़े ही आबाद करेंगे। महिने दो महिनों में उन की जमानत लेनी ही पड़ेगी, आखिर सामान्य नियम जेल नहीं बेल (जमानत) है। वे बाहर आएंगे और अपने खिलाफ गवाहों के बयान बदलने की जुगाड़ में जुट जाएंगे। प्रधानमंत्री न्यायिक सुधार के बारे में फिर चुप हो गए। अन्ना के भय से शायद गलती से सच मुहँ से निकल गया था।

खिर कब….? आखिर कब तक विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट बस्ते में पड़ी धूल खाती रहेगी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश कब तक पालना की प्रतीक्षा करेगा? 1987 से 2011 तक 24 वर्ष गुजर

क्या वकीलों की पोशाकें न्याय प्रणाली और समाज के बीच अवरोध हैं?

न्यायाधीशों और वकीलों ने काले कोट वाली पोशाक  इंग्लेंड में पहली बार 1685 ईस्वी में किंग जॉर्ज द्वितीय की मृत्यु पर शोक संकेत के लिए अपनाई थी। तब यह विश्वास किया जाता था कि काला गाउन और विग जजों और न्यायाधीशों को गुमनामी की पहचान देती है। कुछ भी  हो काला कोट वकीलों और न्यायाधीशों की पोशाक में ऐसा सम्मिलित हुआ कि  ब्रिटिश साम्राज्य के साथ यह सारी दुनिया में पहुँच गया। न्याय करने का दायित्व और अधिकार सामंती समाज में राजा का होता था। लेकिन राज्य के विस्तार के साथ यह संभव नहीं रह गया था कि राजा ही सब स्तरों पर न्याय करेगा। इस के लिए राजा को बहुत से न्यायाधिकारी नियुक्त करने होते थे। हालांकि अंतिम अपील राजा को  ही की जा सकती थी। इस तरह एक न्यायाधिकारी राजा के प्रतिनिधि के रूप में ही न्याय करता था। जिस तरह राजा अपने दरबार में विशिष्ठ पोशाक में होता था और दरबार में उपस्थित होने वाले दरबारी भी केवल विशिष्ठ पोशाक में ही दरबार में उपस्थित हो सकते थे। इस तरह राजा और दरबारियों की पोशाक राज्य की शक्ति का प्रतीक थी। राजा के प्रतिनिधि के रूप में न्यायाधीश की पोशाक भी इसी तरह से शक्ति का प्रतीक थी। वकालत के पेशे का आरंभ वकील न्यायार्थियों के पैरोकार नहीं हुआ करते थे, बल्कि वे न्यायाधीश को न्याय करने में सक्षम बनाने के लिए उस के सलाहकार हुआ करते थे। कालांतर में कुछ लोगों को न्यायार्थियों का पक्ष न्यायाधीश के समक्ष रखने की अनुमति  मिलने लगी। केवल वे ही व्यक्ति जो न्यायाधीश या राज्य की ओर से अधिकृत थे किसी पक्षकार की पैरवी कर सकते थे। आरंभ में न्यायाधीशों के सलाहकारों को ही इस तरह का अधिकार प्राप्त हुआ। इस तरह काला कोट वकीलों की भी पोशाक बन गई। 
लेकिन वे सामंती राज्यों के अथवा साम्राज्य के न्यायालय थे।  वहाँ न्यायाधीशों और वकीलों की पोशाकें शक्ति का प्रतीक थीं। ये पोशाकें  आम जनता को राज्य की शक्ति का लगातार अहसास कराती थीं। लेकिन अब  तो यह जनतंत्र का युग है। उन की पोशाकों को शक्ति का प्रतीक होना आवश्यक नहीं है उसे तो जनता के बीच न्याय का प्रतीक होना चाहिए। लेकिन फिर भी सामंती और साम्राज्यवादी शक्ति का प्रतीक ये पोशाकें न्यायालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। निश्चित रूप से आज इस पोशाक को कोई भी इस रूप में न तो व्याख्यायित करना चाहता है और न ही करना चाहेगा। लेकिन उस के लिए कुछ नए तर्क सामने आने लगे हैं। अब यह कहा जाता है कि ये पोशाकें आप शक्ति का प्रतीक नहीं बल्कि वकीलों के बीच अनुशासन पैदा करती हैं और उन्हें न्याय के लिए लड़ने को प्रेरित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि यह पोशाक उन्हें अन्य प्रोफेशन वाले लोगों से अलग पहचान देती है। यह भी कहा जाता है कि काला रंग न्याय का प्रतीक है जब कि सफेद रंग के बैंड्स शुद्धता और निर्लिप्तता का अहसास कराते हैं। 
न सब तर्कों के होते हुए भी भारत के वकील काले कोट में असुविधा महसूस करते हैं। वस्तुतः भारत के गर्म वातावरण में काला कोट पहन कर वकील स्वयं अपने शरीर के साथ क्रूरता का व्यवहार करते हुए उस का शोषण करते हैं। बहुत से वकीलों से पूछने पर पता लगा कि वे यह महसूस करते हैं कि काला कोट उन के लिए पहचान बन गया है। भीड़ भरे न्यायालय परिसरों में उन की पहचान केवल काले कोट से ही हो प

न्यायाधीश और वकील काला कोट क्यों पहनते हैं?

भारत में कहीं भी आप किसी अदालत में जाएंगे। आप को काले कोटों की बहुतायत दिखाई देगी। चाहे भीषण गर्मी क्यों न पड़ रही हो। चेहरे से पसीने की बूंदें झर-झर झर रही हों। कोट के नीचे कमीज बनियान तर हो चुके हों लेकिन वकील कोट में ही दिखाई देंगे। यही नहीं, अंदर कमीज का भी गले का बटन बंद होगा और ऊपर से बैंड्स या टाई और बंदी दिखाई देगी। कहीं ऐसा न हो कि गले के रास्ते कहीं से हवा घुस जाए। आप यदि सर्वोच्च न्यायालय या किसी हाईकोर्ट में पहुँच जाएंगे तो वहाँ कोट के ऊपर एक गाउन और डाला हुआ मिलेगा।  वकील नहीं सारे न्यायाधीश भी यही वर्दी पहने नजर आएंगे। आप के मन में यह प्रश्न भी उठेगा कि क्या वकीलों और न्यायाधीशों को गर्मी नहीं लगती?  मुझ से तो कई लोग पूछ भी लेते हैं कि क्या आप को गर्मी नहीं लगती? मैं सहज रूप से उन्हें कह भी देता हूँ कि नहीं लगती। सिर्फ सुबह जब पहनते हैं तब लगती है, फिर कुछ देर में अंदर की बनियान, कमीज सब पसीने से भीग जाते हैं, तब जरा भी हवा अंदर प्रवेश करती है तो सब ठण्डे भी हो जाते हैं। 

लेकिन मेरा यह उत्तर सहज मिथ्या से अधिक कुछ नहीं। मुझे गर्मी लगती है, कई बार तो लगातार पसीने के कारण त्वचा पर खुजली होने लगती है। जब एक से दूसरी अदालत जाने के लिए धूप में हो कर गुजरना होता है तो काला रंग उष्मा का अच्छा ग्राहक होने के कारण कोट से तेजी से गर्मी अंदर प्रवेश करती है और पसीना गर्म हो उठता है। तब ऐसा लगता है जैसे खोलते हुए पानी में घुस गए हों। तब तुरंत ही पंखे के नीचे शरण लेनी होती है। पाँच मिनट हवा लगने के बाद ही कुछ राहत मिलती है।  एक दो बरसात हो जाएँ तो हालत और बुरी होती है। तब बाहर भी ऊमस होती है और पसीना सूखना बंद हो जाता है। लगता है जैसे दिन भर खौलते पानी में बैठे रहे। उसी में दिन भर काम भी करना होता है। बरसात होते ही बिजली आने-जाने लगती है और पंखे का सहारा भी छिन जाता है। कभी कभी तो यह सोचने लगता हूँ कि मैं ने क्या सोच कर वकालत के प्रोफेशन का चुनाव  किया था।

र्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में यह परेशानी कम है। वहाँ सभी न्यायालय वातानुकूलित हैं। न्यायाधीशों को वहाँ कोट पहनने में कोई परेशानी नहीं होती। जितनी देर वकील अंदर न्यायालय कक्ष में रहते हैं उन्हें भी परेशानी नहीं होती। परेशानी होती है तो जिला न्यायालय और उस से नीचे के न्यायालयों के वकीलों को। अब आप को समझ आ रहा होगा कि भारत में दीवानी न्यायालय गर्मी के मौसम में क्यों  बंद कर दिए जाते हैं और क्यों राजस्थान जैसे सब से गर्म प्रदेश में ढाई माह के लिए न्यायालयों का समय सुबह सात से साढ़े बारह का क्यों कर दिया जाता है? लेकिन वकीलों को इस से भी राहत नहीं मिलती उन के काम केवल दीवानी अदालतों में ही नहीं होते उन्हें फौजदारी, राजस्व और दूसरी अदालतों में भी जाना होता है। इन में से राजस्थान में राजस्व न्यायालय और अनेक न्यायाधिकरण 10 से 5 बजे तक काम करते हैं। परिणामतः वकीलों को लगभग दिन भर अदालतों में रहना होता है।

प सोच रहे

लाभकारी शत्रुतापूर्ण व्यवहार

“एक कुशल न्यायिक व्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि बार (वकीलों की जमात) भी मजबूत और कुशल हो। एक ऐसी बार जो कि दिखने में न केवल स्वावलंबी और निर्भय हो और पूरे आदर के साथ मामले के विवादित बिंदुओं को मजबूती से अदालत के सामने पेश करे। चापलूसों की तरह न्यायाधीशों की हाँ में हाँ मिलाने वाली बार एक गलती करने वाले जज की गलतियों में ही वृद्धि करती है। जजों को मस्का लगाना उन्हें न्याय के उचित और सही मार्ग से सदैव विचलित कर देता है। अपनी सोच के विपरीत तथ्यों को मजबूती से रखे जाने पर एक जज मामले पर गंभीरता से विचार करने को बाध्य हो जाता है और एक सही निर्णय पर पहुँचता है। एक कमजोर बार न्याय प्रशासन की सब से बड़ी शत्रु है। एक हावी होने वाले जज के लिए एक कमजोर वकील न तो उस के पेशे के लिए ही ‘रत्न’ है और न ही न्याय प्रणाली के लिए। वास्तव में एक कमजोर और हाँ में हाँ मिलाने वाला वकील एक जज के विकास में सब से बड़ी बाधा है। 
त्रु की तरह व्यवहार करने वाला मजबूत वकील अच्छे कैरियर के महत्वाकांक्षी जज के लिए सब से अधिक लाभकारी है। वकीलों के मजबूत और नए तर्कों का सामना करते हुए ही एक अच्छे जज का निर्माण होता है। एक पुराने ढर्रे पर चलने वाली बार एक बुरी न्यायपालिका के लिए जिम्मेदार होती है। जज और वकील दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। न्याय व्यवस्था की ये दोनों भुजाएं एक साथ बराबरी के साथ विकास करनी चाहिए। दोनों एक दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए एक दूसरे से सीखते हुए आगे बढ़ते हैं तो एक स्वतंत्र और मजबूत न्याय प्रणाली विकसित होती है। अच्छे जज अच्छी आलोचना को सहृदयता के साथ स्वीकार करते हैं और अच्छे वकील हमेशा जजों को गलती करने से रोकते हैं।”

गलत कार्य करने पर न्यायाधीशों को हटाया जा सकता है

पिछले आलेख न्यायालयों की श्रेणियाँ और उन में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ पर राजीव के प्रश्न के पूर्वार्ध का उत्तर दे दिया गया था, उन के प्रश्न का उत्तरार्ध था कि क्या गलत कार्य करने पर जज को हटाया जा सकता है?
स का उत्तर है कि हटाया जा सकता है। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को छोड़ दें तो भारत में किसी भी न्यायालय के न्यायाधीश को उस के पद से हटाए जाने की प्रक्रिया अधिक दुरूह नहीं है। किसी भी अन्य न्यायालय के न्यायाधीश के पदों के लिए सेवा नियम बने हुए हैं। जिन के अंतर्गत कोई भी गलत कार्य (दुराचरण) करने पर उन के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है। अनुशासनिक कार्यवाही के लिए प्रक्रिया का निर्धारण किया हुआ है। सभी अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालय करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी न्यायाधीश की शिकायत उसे नियुक्त करने वाले उच्च न्यायालय को करता है तथा अपनी शिकायत के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य भी उपलब्ध कराता है और संबंधित उच्च न्यायालय उस शिकायत पर प्रारंभिक जाँच करने के उपरांत यह पाता है कि न्यायाधीश के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार हैं, तो उस न्यायाधीश को आरोप पत्र दिया जा सकता है।
रोप पत्र देने के उपरान्त आरोपों पर जाँच की जाएगी जिस में आरोपी न्यायाधीश को अपने बचाव का  पूरा अवसर प्रदान किया जाएगा। जाँच के दौरान यह साबित हो जाने पर कि न्यायाधीश ने दुराचरण किया है उसे उस के पद से हटाए जाने के दंड से दंडित किए जाने का आदेश पारित किया जाएगा। यदि यह प्रतीत होता है कि उस न्यायाधीश ने कोई अपराध किया है तो उस के विरुद्ध सामान्य नागरिक की तरह अपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा कर उसे दंडित किया जा सकता है।
च्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अंतर्गत होती है। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के अन्तर्गत प्रक्रिया के माध्यम से ही हटाया जा सकता है। इस के अंतर्गत यह आवश्यक है कि लोकसभा के 100 अथवा राज्य सभा के 50 सांसद एक साथ शिकायत अपने सदन के अध्यक्ष को प्रस्तुत करें। अध्य़क्ष उस शिकायत पर तीन सदस्यों की एक समिति का गठन करता है। इस समिति में शिकायत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध होने पर सुप्रीमकोर्ट के ही दो न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के विरुद्ध होने पर एक सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश और एक संबंधित उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और एक न्यायविद होता है। 
ह समिति शिकायत की जाँच करती है और अपनी सिफारिश अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत करती है। यदि यह सिफारिश करती है कि जज को हटाने की कार्यवाही की जानी चाहिए तो इम्पीचमेंट के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाया जाता है जिस पर दोनों सदनों में बहस होती है, आरोपित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है। यह बहस एक ही सत्र में पूरी होने पर तथा न्यायाधीश को हटाने के समर्थन में प्रस्ताव दोनों सदनों में उन के बहुमत तथा उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत मतों से पारित होने पर आरोपित न्यायाधीश को हटाने के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है जो न्यायाधीश को हटाने के लिए आदेश पारित करता है।  यह समस्त प्रक्रिया अत्यनत दुरूह  है और लगभग असंभव जैसी है। इस कारण से यह विचार किया जा रहा है कि इस प्रक्रिया को आसान बनाया जाए। लेकिन यह संविधान में संशोधन से ही संभव है।

न्यायालयों की श्रेणियाँ और उन में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ

 राजीव तीसरा खंबा के नियमित पाठकों में से एक हैं।  अक्सर मुझ से प्रश्न पूछते रहते हैं। उन के ये प्रश्न किसी कानूनी समस्या से संबंधित न हो कर न्याय के लिए स्थापित व्यवस्था से संबंधित होते हैं। पिछले दिनों उन्हों ने जो प्रश्न पूछे हैं वे ऐसे ही हैं। प्रश्न बहुत साधारण प्रतीत होते हैं, किन्तु उन के उत्तर देना विस्तार में जाए बिना  संभव नहीं है। उन के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उन के साथ-साथ आप को भी इस विस्तार में लिए चलता हूँ …..
में सब से पहले यह जानना चाहिए कि भारत में  किस किस तरह के न्यायालय हैं। सर्वोच्च न्यायालय और प्रदेशों में स्थापित उच्च न्यायालय के अतिरिक्त भारत में स्थापित न्यायालयों की दो प्रमुख श्रेणियाँ हैं। दीवानी न्यायालय और अपराधिक न्यायालय। जिला स्तर पर सब से बड़ा दीवानी न्यायालय जिला न्यायाधीश का न्यायालय होता है। अन्य न्यायालय इस के अधीनस्थ होते हैं। जिला न्यायालय की सहायता के लिए अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के न्यायालय होते हैं, जो जिला न्यायालय द्वारा स्थानान्तरित दीवानी मामलों की सुनवाई करते हैं। इस से निचले स्तर पर सिविल न्यायाधीशों के न्यायालय होते हैं जिन्हें वरिष्ठ और कनिष्ठ खंड की श्रेणियों में विभाजित किया गया है। सिविल न्यायाधीश कनिष्ठ खंड दीवानी मामलों के प्रारंभिक न्यायालय हैं, इन्हें 25000 रुपए तक के मूल्य के दीवानी मामलों को सुनने का अधिकार है। 25000 से 50000 रुपए तक मूल्य के मामलों को सुनने का अधिकार सिविल न्यायाधीश वरिष्ठ खंड के न्यायालयों को है। इन न्यायालयों के निर्णयों की अपील जिला न्यायाधीश के न्यायालय को की जा सकती है। जब कि 50000 रुपए से अधिक मूल्य के दीवानी मामलों की सुनवाई का अधिकार जिला न्यायाधीशों के न्यायालय को है। 
पराधिक न्यायालयों के मामले में प्रत्येक राज्य को एक सत्र विभाग माना गया है। आबादी के हिसाब से एक राज्य में अनेक सत्र विभाग हो सकते हैं। प्रत्येक सत्र विभाग में एक जिला या एकाधिक जिले हो सकते हैं। सामान्यतः प्रत्येक जिले में एक सत्र न्यायाधीश का न्यायालय होता है, इस की सहायता के लिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों के न्यायालय स्थापित किए गए हैं। सत्र न्यायालय के अधीन न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय होते हैं। प्रत्येक जिले में एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय तथा उस की सहायता के लिए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय होते हैं। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से निचले स्तर पर न्यायिक मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय होते हैं। इसी तरह महानगर क्षेत्रों में मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा महानगर मजिस्ट्रेटों के न्यायालय स्थापित किए जाते हैं।
स के अतिरिक्त कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रत्येक जिले में जिला मजिस्ट्रेट का कार्यालय तथा उस की सहायता के लिए अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेटों के कार्यालय होते हैं। इस से निचले स्तर पर कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के कार्यालय होते हैं। किसी भी राज्य में स्थापित सभी दीवानी और अपराधिक न्यायालयों का निरीक्षणीय क्षेत्राधिकार उस राज्य के उच्च न्यायालय को होता है। 
जिला मजिस्ट्रेट और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। वे अक्सर राज्य के प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। जिला कलेक्टर जिला मजिस्ट्रेट होता है और अतिरिक्त कलेक्टर अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट। उपखंड अधिकारी, सहायक कलेक्टर, तहसीलदार आदि सभी प्रशासनिक अधिकारियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अधिकार प्रदत्त किए जाते हैं. ये सभी संघीय या राज्य प्रशासनिक सेवा और अधीनस्थ राज्य सेवा के अधिकारी होते हैं। इन की नियुक्ति के लिए चयन संविधान के अंतर्गत गठित संघीय तथा राज्य सेवा आयोगों द्वारा किया जाता है उन की सिफारिश पर राज्य सरकारें इन की नियुक्ति करती है।

प्रत्येक राज्य में राज्य न्यायिक सेवा तथा राज्य उच्च न्यायिक सेवा के कैडरों की स्थापना की गई है। राज्य न्यायिक सेवा के लिए चयन राज्य के उच्च न्यायालय के निर्देश पर राज्य सेवा आयोग द्वारा किया जाता है किन्तु इन्हें नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा प्रदान की जाती है। प्रत्येक उच्च न्यायालय के अधीन गठित उच्च न्यायिक सेवा कैडर के अधिकारियों का चयन व नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है। इस के लिए चयन न्यायिक सेवा के अधिकारियों को पदोन्नति के माध्यम से और कम से कम सात वर्ष का अनुभव रखने वाले विधि व्यवसाइयों में से सीधी भर्ती के माध्यम से किया जाता है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश व अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के पदों पर उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। सिविल न्यायाधीश कनिष्ठ खंड तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट के पदों पर राज्य न्यायिक सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है। इसी कैडर में से वरिष्ठता व वरीयता के आधार पर पदोन्नति के माध्यम से सिविल न्यायाधीश वरिष्ठ खंड एवं मुख्य व अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति की जाती है।     
अब राजीव के प्रश्न का आरंभिक भाग –
क न्यायाधीश बनने की प्रक्रिया क्या होती है? क्या कोई भी वकील विधि स्नातक हो तो क्या वह न्यायाधीश बन सकता है?

राजीव भाई,
दि हम एडवोकेट एक्ट बनने के पहले की स्थिति को भूल जाएँ तो आज-कल केवल व्यवसायिक विधि स्नातक  ही एक विधि व्यवसायी (वकील) हो सकता है। विधि स्नातक होना जज होने के लिए एक अर्हता मात्र है। राज्य न्यायिक सेवा में चयन के लिए उसे लिखित परीक्षा देनी होगी उस में वरीयता प्राप्त होने पर उस का साक्षात्कार लिया जाएगा। दोनों में सफलता प्राप्त होने पर उस का चयन होगा। इस के बाद उसे सफलता पूर्वक प्रशिक्षण पूरा करना होगा तदुपरान्त उस की नियुक्ति परिवीक्षा पर की जाएगी। परिवीक्षाकाल में उस का कार्य संतोषजनक होने पर ही उसे सेवा में स्थाई किया जाएगा। 
सी तरह उच्च न्यायिक सेवा के लिए राज्य न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों को वरिष्ठता और वरीयता के आधार पर पदोन्नति के माध्यम से पहले परीवीक्षा पर नियुक्ति दी जाती है।  उच्च न्यायिक सेवा के आधे पद सीधे कम से कम  सात वर्ष का अनुभव रखने वाले विधि व्यवसाइयों में से किया जाता है। पहले उ