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निर्णय में देरी का प्रमुख कारण कम न्यायालय और कम न्यायाधीश हैं।

समस्या-

आर. के.  ने नदबई, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा तलाक के केस को लगभग चार साल हो चुके हैं और अभी तक फैसला नहीं हुआ है। मैं यही जानना चाहता हूं कि क्या मैं आरटीआई के माध्यम से केस से सम्बनधित प्रश्न न्यायालय से पूछ सकता हूँ?

समाधान-

प स्वयं उस प्रकरण में पक्षकार हैं इस कारण आप को तलाक के केस में देरी का कारण पता होना चाहिए। किसी भी मुकदमे में जो समय लगता है उस का विवरण प्रत्येक पेशी पर लिखी जाने वाली आदेशिका में होता है। आप को आदेशिका की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने का अधिकार है आप स्वयं अदालत में आवेदन दे कर पता कर सकते हैं कि आप के मामले में क्यों देरी हो रही है। उस का कारण आप स्वयं भी हो सकते हैं और अन्य कोई कारण भी हो सकता है। यदि आप स्वयं कारण हैं तो उन कारणों को दूर करने का प्रयत्न करें।

यदि अन्य कोई कारण है तो न्यायालय से निवेदन करें कि वह उन कारणों का उपाय कर के उन्हें दूर करने की कोशिश करे। फिर भी किसी कारण से देरी हो रही हो तो आप संबंधित उच्च न्यायालय को अपना परिवाद भेज सकते हैं। उच्च न्यायालय उसे हल करने का प्रयत्न करेगा। यदि न्यायालय के पास क्षमता से अधिक मुकदमें हों तो अधिक न्यायालय खोलने का कार्य राज्य सरकार का है। उस के लिए राज्य सरकार से मांग की जा सकती है। राजस्थान सरकार अधिक मुकदमे होने के कारण दो नए पारिवारिक न्यायालय कोटा में खोले हैं। जिस से अब इस तरह के मुकदमों के निस्तारण में इस जिले में तेजी आई है।

मजदूरों के लिए श्रम विभाग और न्यायालयों में कोई न्याय नहीं।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने चौपासनी स्कूल तिलवारियॉ बैरा राजस्थान से पूछा है-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में पिछले 7 साल से काम करता था यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमें इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम हे और 10000 से कम वालो को अभी तक नही दिया  आज़ कल आज़ कल कर रहे हैं, जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारीख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब अगले महिने कि 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहां पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेन्टीनेंस की परवाह नहीं करते। इन सभी समस्याऔ के कारण मैं ने अपना त्याग पत्र 01/06/2016 को नोटिस देकर 30/06/2016 तक मेरा कम्पलीट हिसाब करने को लिखित में दिया जिस में वैतन,दिपावली बोनस,गे्चुटी ,व अन्य परिलाभ शामिल हैं जिस की फोटो कापी मय हस्ताक्षर मेरे पास है, मगर आज़ 18/07/2016 तक भी मुझे 1 पेसा भी नहीं मिला।  कानूनन मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं वेतन, दीपावली बोनस, ग्रेच्युटी के साथ बकाया ओवर टाईम पिछले 7 साल का (सिंगल जो बाकी है), 3 साल वेतन लेट का ब्याज क्या कानूनन ले सकता हूँ?    कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या कोई नियम नहीं है। मैं जोधपुर श्रम आयुक्त के कार्यालय भी गया। उन्होंने कारवाही करने कि बजाय कम्पनी को ही फोन कर के बता दिया कि मैं मुकदमा दर्ज़ करवाने आया हूँ और मुझे वहाँ से भगा दिया, कृपया समाधान बताएँ।

समाधान-

राजस्थान ही नहीं देश भर में श्रमिकों के मामलों में न्याय की स्थिति अत्यन्त खराब है। इस का कारण श्रम संगठनों का ह्रास है। अधिकांश श्रम संगठन श्रमिकों के संगठन नहीं है बल्कि उन्हें या तो कुछ राजनैतिक दल चलाते हैं जिन्हें राजनीति के लिए श्रमिकों के वोटों की जरूरत होती है, या फिर कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से मिल कर इसे एक व्यवासय के रूप में चलाते हैं। मजदूर वर्ग की जरूरत के कारण बने श्रमसंगठनों का लगभग अभाव है। जोधपुर की भी यही स्थिति है। आप किसी श्रम संगठन से संबद्ध प्रतीत नहीं होते जिस के कारण आप ने यहाँ यह समस्या पोस्ट की है।

आप ने उद्योग की जो स्थिति बताई है उस से लगता है कि अब यह उद्योग इस के मालिकों के लिए अधिक मुनाफे का सौदा नहीं रहा। इस कारण वे इस उद्योग की हालत जानबूझ कर खराब कर रहे हैं। उद्योग को बिना राज्य सरकार की इजाजत के बिना बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे धीरे मजदूरों का बकाया बढ़ाया जा रहा है इसी तरह बाजार के लेनदारों का भी बकाया बढ़ा रखा होगा और बैंकों से ऋण भी ले रखा होगा। कुछ दिन बाद यह उद्योग अपनी कंपनी को बीमार बता कर बीआईएफआर में आवेदन करेगी और मजदूरों को उकसा कर हड़ताल वगैरा करने पर मजबूर करेगी या अपने ही एजेंटों के माध्यम से कारखाने में कोई हिंसा करवा कर कारखाने में तालाबंदी करवा देगी। उस के बाद यह कारखाना कभी नहीं खुलेगा। मजदूर बरसों तक अपनी बकाया राशि के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहेंगे। ऐसा देश के सैंकड़ों कारखानों में हो चुका है।

मालिकों की यह योजना किसी मुकाम तक पहुंचती उस के पहले ही आप ने हालात को भांप कर स्तीफा दे दिया है। अब मालिक समझ नहीं रहा है कि आप का हिसाब दे या न दे। उस के सलाहकारों ने यह सलाह दी होगी कि हिसाब मत दो, जब मुकदमा करे और लड़ लड़ कर पक जाए तब मजदूर को आधा अधूरा हिसाब दे देना।

श्रम न्यायालयों, व  श्रम विभाग की स्थिति यह है कि श्रम न्यायालय जितने होने चाहिए उस के आधे भी राज्य में  नहीं हैं। अधिकांश न्यायालयों में उन की क्षमता से दस दस गुना मुकदमे लंबित हैं। मकदमों का निर्णय 20-30 वर्षों तक नहीं हो पा रहा है। वेतन भुगतान, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, कामगार क्षतिपूर्ति आदि के न्यायालयों में श्रम विभाग राजस्थान के अधिकारी पीठासीन होते हैं। आधे से अधिक न्यायालयों में अधिकारी नहीं हैं। एक एक अधिकारी चार चार न्यायालयों को संभालता है  जिस का नतीजा यह है कि वहाँ भी न्याय नहीं हो रहा है।

इतना सब हो जाने के बावजूद राजस्थान का मजदूर वर्ग सोया पड़ा है। मजदूरों के नाम पर जितने भी संगठन राजस्थान में काम कर रहे हैं वे सिर्फ अपने स्वार्थों के लिए काम कर रहे हैं उन में से कोई भी वास्तविक मजदूर संगठन या ट्रेडयूनियन नहीं है। ऐसा लगता है कि श्रमिकों के लिए इस राज्य में न्याय है ही नहीं।

इन विपरीत परिस्थितियों में आप को चाहिए कि आप अपने नगर में ही किसी ऐसे वकील से मिलें जो श्रम संबंधी मामलों की वकालत करता हो। सीधे उस से बात करें कि आप त्याग पत्र दे चुके हैं और आप को अपना हिसाब अपने नियोजक से लेना है। यह हिसाब लेने के लिए उन के माध्यम से कार्यवाही करें। इस के लिए आप को दो तीन मुकदमे करने पड़ सकते हैं। ग्रेच्युटी के लिए एक फार्म में आवेदन प्रेषित कर दें ग्रेच्यूटी न देने पर उस का आवेदन प्रस्तुत करें। एक आवेदन बकाया वेतन व अन्य लाभ जो वेतन की परिभाषा में आते हों उन के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में कार्यवाही करें। अन्य सभी परिलाभों के लिए भी आप की स्थिति देख कर तथा तमाम तथ्यों की जानकारी कर के आप के वकील निर्धारित करेंगे कि क्या कार्यवाही करनी चाहिए?

श्रमिकों, कर्मचारियों को भारत के कानून और न्याय व्यवस्था से किसी तरह के न्याय और राहत की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-
दिलीप सेठिया ने खंडवा, मध्यप्रदेश से  समस्या भेजी है कि-

मैं एक निजी कंस्ट्रेक्सन कंपनी में 4 साल से मार्केटिंग एवं फील्ड का पूरा काम देख रहा हूँ। मेरे 2 बच्चे भी हैं जो स्कूल में अध्यनरत हैं और किराये के मकान में रहते हैं। मुझे कंपनी ने 1 जनवरी 2011 को ऑफर लैटर दे कर काम पर रखा है। मुझे जिस मासिक वेतन 13625/= पर आरंभ में रखा था, वर्तमान मई 2015 में भी वही वेतन बैंक द्वारा दे रहे हैं। 1 जनवरी 2012 को मुझे वेतन बढ़ाने का बोल कर, आज तक मुझे बढ़ी हुई वेतन नहीं दी है। अब मांगता हूँ तो जवाब मिलता है, काम छोड़ दो। मेरे दोनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। मैँ अब क्या करूँ?

समाधान-

निजि कम्पनी में आप की नौकरी आप को दिए गए ऑफर लैटर की शर्तों पर निर्भर करती है। आप ने उस ऑफर लैटर को स्वीकार किया और वह एक संविदा में परिवर्तित हो गया। उस में यदि वेतन निश्चित है और वेतन बढ़ाने की कोई शर्त नहीं है तो आप को कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि आप अपने वेतन को बढ़ाने की मांग करें। वैसे भी मार्केंटिंग के लोगों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत वर्कमेन साबित करना बहुत कठिन काम है। यदि किसी तरह की कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो अदालतों की हालत यह है कि उन का निर्णय आप के जीवनकाल में हो जाए तो समझिए आप को सरकार ने खैरात दे दी। यूँ भी नियोजन क्षेत्र से संबंधित कानून अब कर्मचारियों के पक्ष में नहीं है। इस कारण कोई भी कानूनी उपाय आप के पास इस के लिए उपलब्ध नहीं है। यदि आप बच्चों का भविष्य खराब होने की दुहाई दे कर कुछ राहत की मांग करेंगे तो आप की विवशता देख कर नियोजक आप का वेतन बढ़ाना तो दूर काम की कमी बता कर आप का वेतन कम करने का प्रयत्न करते दिखाई देंगे।

निजि क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपना स्किल बढ़ाएँ, अपना अनुभव बढ़ाएँ और अपने काम की मांग पैदा करें। और एक कंपनी की नौकरी को अपना जीवन बनाने से बचें। आप के नियोजक हर काम अपने मुनाफे के लिए करते हैं। जिस दिन उन्हें आप की जरूरत नहीं होगी या आप से कम वेतन में आप का काम करने वाला व्यक्ति मिल जाएगा वे आप को काम से बाहर कर देंगे। इस कारण आप को निरन्तर काम की तलाश भी जारी रखनी पड़ेगी। जैसे ही आप को वर्तमान से बेहतर काम मिले आप तुरन्त छोड़ कर दूसरा नियोजन पकड़ लें।

च्छी तरह समझ लें कि भारत में श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं है। उन्हें उचित वेतन देने के लिए कोई कानून नहीं है। उन के नियोजन की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। यदि कोई कानून की किताब खोल कर बताए कि यह कानून है तो उस कानून के आधार पर किसी तरह की राहत पाना आसान नहीं है। एक श्रम न्यायालय में तीन कर्मचारियों की सेवा समाप्ति के विवाद 1983 से चल रहे हैं जिन्हें हम खुद देख रहे हैं। लेकिन आज तक श्रम न्यायालय उन का निर्णय नहीं कर सका। श्रम न्यायालय 32 वर्ष में जब तीन कर्मचारियों को उन के विवाद का निर्णय नहीं दे सकता तो फिर इस देश के न्यायालयों से श्रमिक कर्मचारी वर्ग न्याय की आशा नहीं कर सकता। अब तो श्रमिक वर्ग के लिए इस देश में न्याय तभी संभव होगा जब वे एक जुट हो कर देश की सत्ता को अपने और मित्र वर्गों के हाथों में ले लेंगे। वर्तमान में तो पूंजीपतियों और भूस्वामियों का बोल बाला है। इस व्यवस्था से कुछ भी आशा करना मजदूरों, किसानों, रिटेलरों आदि मेहनतकश वर्गों के लिए मूर्खता सिद्ध हो रहा है।

शुभकामनाएँ! न्याय प्राप्ति के लिए संघर्ष के संकल्प पूरे हों।

पाठकों, मित्रों, सहयोगियों और शुभचिंतकों!

2013_0फिर से एक नया वर्ष आरंभ हो गया है।  यह नया वर्ष पूरी दुनिया के सामने, भारतवर्ष के सामने नई चुनौतियाँ ले कर खड़ा है।   दुनिया एक ऐसे दौर में पहुँच चुकी है जहाँ मनुष्य सभ्यता एक नया रूप तलाश कर रही है। मनुष्य ने जांगल और बर्बर अवस्थाओं में भोजन  संग्रह करने और पशुओं का शिकार करते हुए पशुपालन सीखा जिस से उसे एक ऐसी दौलत हाथ लगी जिसे वह सहेज कर रख सकता था। उसे जीवन को बनाए रखने के लिए अब लगातार दर-दर भटकने की आवश्यकता नहीं रह गई थी। उसे सांस ले कर फुरसत से सोचने का वक्त मिल गया था।  आपसी संघर्ष में अपने अस्तित्व के लिए जिन दूसरे मानव समूहों को वह समूल नष्ट कर देने या अपनी पहुँच से दूर भगा देने का प्रयत्न करता था, अब उन्हें अपनाना आरंभ कर सकता था।  यहीं से दास प्रथा का आरंभ हुआ, समाज वर्गों में विभाजित हुआ और मनुष्य समाज की सभ्यता का युग प्रारंभ हो गया। आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन के साधनों पर चंद लोगों के कब्जे से आरंभ हुआ सभ्यता का यह दौर आज वहाँ पहुँच गया है जहाँ मनुष्य समाज की सभी पिछली व्यवस्थाएँ पुरानी पड़ गई हैं। दास युग को बीते सदियाँ गुजर गईं। दुनिया में सामंत अब भी हैं पर वे अंतिम साँसें गिन रहे हैं। विज्ञान के आविष्कारों ने समाज को एक औद्योगिक समाज में बदल दिया है। आज यह औद्योगिक समाज विकास के पूंजीवादी दौर में है जिस में पूंजी ही विकास की मूल कुंजी हो गई है जिस पर दुनिया के चंद लोगों का प्रभुत्व है। वर्तमान दौर की इस व्यवस्था के समर्थक दावा करते हैं कि इस से बेहतर अवस्था संभव नहीं है। पर क्या यह सही है?

स व्यवस्था के सिरमौर राष्ट्र  और उन राष्ट्रों में भी सिरमौर देश अमरीका आज भी संकटों से जूझ रहा है। उस की अर्थ व्यवस्था की टांग एक संकट से निकलती है और दूसरे में फँस जाती है।  इन संकटों का कोई हल वे प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी और दुनिया की अधिकांश आबादी इस व्यवस्था में छटपटा रही है। उसे प्रतीत होता है कि उस के साथ न्याय नहीं हो रहा है। अन्यायों की झड़ी लगी है। यही कारण है कि अमरीका से ले कर यूरोप, मध्य ऐशिया और भारत तक के लोगों को किसी न किसी बहाने मौजूदा व्यवस्थाओं के विरुद्ध सड़कों पर आना पड़ रहा है।  गए वर्ष के जाते जाते हमारे देश के लोगों को न्याय की इस मांग के लिए सड़कों पर आना पड़ा।  वे प्रशासन द्वारा खड़ी की गई तमाम बाधाओं को तोड़ते हुए देश की सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक रायसिना हिल्स के विजय चौक तक पहुँच गए। उन्हें हटाने के लिए सत्ता को उन पर वाटर कैनन, आँसू गैस और लाठियों का प्रयोग करना पड़ा। रायसिना हिल्स तक पहुँचने वाले इन लोगों के हाथों में जो तख्तियाँ थीं उन पर लिखा था हम न्याय चाहते हैं, WE WANT JUSTICE !

न्याय की इस तलाश ने ही मनुष्य के बीच दास-स्वामी संबंधों को किसान-भूस्वामी और पूंजीपति-उजरती मजदूर संबंधों में बदला था। लेकिन मनुष्य की न्याय की यह तलाश अब भी जारी है। जब तक मनुष्य सभी तरह के शासक-शासित संबंधों से मुक्त नहीं हो जाता उस की न्याय की यह तलाश बनी रहेगी। न्याय की तलाश पूरी हो जाने पर, समाज में न्याय की पूर्णता प्राप्त कर लेने पर भी उस का दायित्व यह तो रहेगा ही कि न्याय की यह व्यवस्था किसी और वजह से टूट न जाए। खैर!

मनुष्य की यह तलाश कब पूरी होती है?  यह तो आने वाला समय बताएगा।  लेकिन हम जितना न्याय समाज में स्थापित कर चुके हैं उसे बनाए रखना और उस के विकास के लिए नए संकल्प करने और उन्हें पूरा करने का कार्यभार हमारे सिरों पर खड़ा है।  हम उस से मुहँ छिपा कर भाग नहीं सकते। भारतीय समाज जो आज संविधान से संचालित हो रहा है। उस में न्याय के जो नियम और कानून हैं मौजूदा समय में समाज को संचालित करने के लिए अपर्याप्त नहीं है। उन्हें लगातार विकसित करते रहना आवश्यक है। लेकिन सब से अधिक जरूरी है कि हम उन नियमों कानूनों के पालन को सुनिश्चित करें। जो भी विवाद हैं उन का शीघ्रता से निपटारा हो। यह नहीं कि विवादों को बरसों बरस लटका कर हम गाड़ी को लुढ़काते रहें।  भारतीय जनता के सामने और शासन व्यवस्था के सामने यही सब से बड़ी चुनौती है। हमारे शासक इस चुनौती से बचते रहे हैं। हमें चाहिए कि हम उन्हें न बचने दें। आज हमारा सब से पहला संकल्प यही होना चाहिए कि वर्तमान कानून और नियमों को भारतीय समाज में लागू किया जाए। इस के लिए हमारी सरकारों को जिम्मेदारी उठाने की जरूरत है। और वे जिम्मेदारी उठाने से पीछे हटती हैं तो उन्हें बाध्य करना पड़ेगा। यदि वे अक्षम सिद्ध होती हैं तो उन्हें हटा कर नई बनानी पड़ेंगी।

न्याय की स्थापना के लिए अपना योगदान करने के लिए ही कोई पाँच वर्ष पूर्व एक ब्लाग के रूप में तीसरा खंबा अस्तित्व में आया था। पिछले वर्ष से इसे एक वेबसाइट का रूप प्रदान किया गया है।  यहाँ न्याय की स्थापना के लिए विमर्श हो यह जरूरी है। इस बीच न्याय की तात्कालिक आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिए और लोगों की रोज मर्रा की समस्याओं के हल प्रस्तुत करने हेतु हम ने लोगो की कानून संबंधी समस्याओ के हल प्रस्तुत करना आरंभ किया है। लेकिन वे इतनी बड़ी संख्या में हमारे पास आती हैं कि सब का उत्तर देना संभव नहीं हो पा रहा है। लोग यदि अपनी समस्याओं के लिए प्रश्न पूछने के स्थान पर इस वेबसाइट पर अपनी समस्याओं के हल पहले से प्रस्तुत की जा चुकी समस्याओं में तलाश करें तो बहुत लोगों को अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर और समस्याओं के हल मिल सकते हैं। उन्हें नए सिरे से प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं होगी। इस से तीसरा खंबा को न्याय व्यवस्था पर विमर्श के लिए समय और स्थान भी उपलब्ध हो सकेगा। नए वर्ष में तीसरा खंबा की कोशिश होगी कि अधिक से अधिक लोगों की समस्याओं के हल प्रस्तुत किए जाएँ साथ ही न्याय- व्यवस्था पर विमर्श भी जारी रह सके।

तीसरा खंबा के सभी पाठकों, मित्रों, सहयोगियों और शुभ चिंतकों को नववर्ष की शुभकामनाएँ कि वे न्याय की स्थापना के लिए कोई संकल्प कर सकें और अपने सभी संकल्पों को पूरा कर सकें।

वाद कभी भी स्वीकार किया जा सकता है, आप को न्याय के लिए लड़ना चाहिए

समस्या-

जयपुर, राजस्थान से मनोज ने पूछा है-

मेरी समस्या है कि मेरा एक मकान है जिसे विक्रय करने हेतु मैं ने 2-4-2011 को एक व्यक्ति साथ एग्रीमेंट किया था (जो कि दिल्ली की रहने वाला है) इस एग्रीमेंट की शर्तों में एक शर्त मेरी तरफ़ से थी कि क्रेता पेशगी रकम के अलावा जो राशी बचेगी उसका आधा चार माह के अंदर अदा कर देगा एंव बाकी राशि आठ माह के अंदर अदा करके रजिस्ट्री अपने नाम करवा लेगा। लेकिन 4 माह बीत जाने पर भी क्रेता ने कोई रकम अदा नहीं की। तब मैं ने दिनांक 3-8-2011 को एक हस्तलिखित रिमाईंडर रजिस्टर्ड डाक से भेजा कि वह शर्त के अनुसार रकम का भुगतान 7 दिन के अंदर कर दे अन्यथा आगे की कर्यवाही का वह स्वयं जिम्मेदार होगा।  इसका उस ने कोई जवाब नहीं दिया।  1-9-2011 को मैं ने अपने वकील द्वारा एग्रीमेंट निरस्त करने का नोटिस उसे रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया जिसका भी क्रेता ने कोई उत्तर नहीं दीया।  दो माह बाद 14-11-2011 को क्रेता के वकील का नोटिस मेरे पास आया जिसमें उल्टा मुझ पर ही यह आरोप लगाया गया कि क्रेता 1-7-2011 को चैक लेकर आया था मगर मैं ने नगद लाने को कहा।  फ़िर क्रेता 15-7-2011 को नगद राशि लेकर आया था।  वो भी मैं ने लेने से मना कर दिया (1-7-11 को आने के लिये प्रयोग की गई कार का नं. भी उन्हों ने लिखा है)।  इस नोटिस का जवाब मेरे वकील ने दे दिया कि उनके द्वारा कही गई बातें गलत हैं ऒर एग्रीमेंट निरस्त हो चुका है।  1-12-2011 को क्रेता का फ़ोन मेरे मोबाइल पर आया जो उसने किसी P.C.O. से किया था।  उसने मुझ से रजिस्ट्रार ऑफ़िस आने को कहा।  मैं वहां गया तो वो मुझे नहीं मिला तो मैं ने अपनि उपस्थिति दर्ज करवाने हेतु रसीद कटवा ली।  इसके करीब 9 माह की शान्ति के बाद मेरे पास कोर्ट से नोटिस आया जिस में उसने आदेश 9 -नियम 1 के तहत दीवानी वाद दर्ज किया है।  इसमें 4 राहतें न्यायालय से चाही गई हैं कि 1- वादीगण से शेष राशि प्राप्त करके जायदाद का कब्जा संभला दिया जाए. 2- स्थाई निषेधाग्या जारी की जाए कि प्रतिवादी जायदाद किसी अन्य को अन्तरित नहीं करे।  3- वाद व्यय वादी को प्रतिवादी से दिलाने की कृपा करें। 4- अन्य अनुतोष जो भी न्यायालय उचित समझे प्रतिवादी से दिलाने की कृपा करें।  मेरे मिलने वालों की सलाह है कि एक बार अदालत गए तो सालों बीत जाएंगे इसीलिये जैसा वह कहें कर लो मगर मेरा ये मानना है कि सही होने के बावजूद मैं हार क्यों मानूँ ओर दंड क्यों भुगतूँ?
अब कृपया आप मुझे परामर्श दें कि मुझे क्या करना चाहिये।

समाधान-

प पूरी तरह से सही हैं. आप के उक्त मामले में जो भी सावधानियाँ आप के द्वारा बरती गई हैं। उस के बाद आप का इस मुकदमे में सफल होना निश्चित है। यदि न्यायालय मुकदमे के दौरान इस बात पर किसी तरह की अस्थाई निषेधाज्ञा के माध्यम से उक्त संपत्ति को विक्रय करने या आगे स्थानान्तरित करने पर रोक नहीं लगाता है तो आप को कोई हानि नहीं है। आप ने यह नहीं बताया है कि वादी ने अस्थाई निषेधाक्षा के लिए भी कोई आवेदन प्रस्तुत किया है अथवा नहीं? लेकिन दी हुई परिस्थितियों में हम यह मान कर चलते हैं कि अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया होगा।

जो तथ्य आप ने यहाँ बताए हैं उन के आधार पर वादी को कोई अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त नहीं होनी चाहिए। फिर भी यदि कोई अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश होता है तो आप उस की अपील अपील-न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को यह मुकदमा लड़ना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए।

दि लोगों की सलाह ही माननी हो तो कम से कम विचारण न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन निर्णीत होने और उस की अपील के निर्णय तक तो आप को प्रतीक्षा करनी चाहिए। जो राहत वादी ने न्यायालय से चाही है उसे तो आप कभी भी स्वीकार कर सकते हैं। यदि कोई अस्थाई निषेधाज्ञा जारी नहीं होती है तो आप संपत्ति को किसी भी समय अपनी इच्छानुसार विक्रय या हस्तांतरित कर सकते हैं।

कम न्यायालयों के कारण निर्णयों की गति और गुणवत्ता पर बुरे प्रभाव

प ने विगत आलेख न्याय प्राप्ति एक दुःस्वप्न … में पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री वी.एन. खरे की कलम से जाना था कि भारत में न्याय प्राप्ति की स्थिति क्या है।  जहाँ विकसित देशों में प्रति दस लाख की आबादी पर 140 से 150 न्यायाधीश अपने देश की जनता को न्याय प्रदान करने का काम करते हैं वहाँ हमारी व्यवस्था इसी दस लाख की आबादी के लिए केवल 13.5 न्यायाधीश उपलब्ध करवा पा रही है। इस का असर न्याय प्रदान करने की गति और गुणवत्ता पर सीधे तौर पर पड़ रहा है। जहाँ एक मुकदमे को निपटाने में पाँच-दस वर्ष से लेकर 20-30 वर्ष पहली ही अदालत में लग रहे हों वहाँ जनता के मन में न्याय प्राप्ति की आशा निरन्तर धूमिल होती जा रही है। हमारी सरकार न्याय पालिका में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने के स्थान पर वैकल्पिक उपायों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है लेकिन आशातीत परिणाम बहुत दूर की कौड़ी हो गए हैं। उधर सर्वोच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयो पर तेज गति से मुकदमों को निपटाने के लिए दबाव पैदा कर रहे हैं इस का असर निर्णयों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

धर राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने अधीनस्थ न्यायालयों को मुकदमों का निपटारा तेज गति से करने के लिए कुछ निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों में कुछ निर्देश इस प्रकार के हैं कि दस वर्ष से अधिक समय लंबित कोई मुकदमा जिस तिथि को प्रतिवादी साक्ष्य के लिए निश्चित हो जाए उस तिथि से छह माह की अवधि में उस मुकदमे में निर्णय कर दिया जाना चाहिए। इस से प्रतिवादी पर तो इस बात का दबाव आ गया है कि वह जल्दी से जल्दी अपनी साक्ष्य पूरी करे। इस से यह भी हो रहा है कि उचित और पर्याप्त साक्ष्य वह प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है। यदि वह किसी तरह चार माह में साक्ष्य पूरी भी कर लेता है तो उसे मुकदमे की पत्रावली से आवश्यक दस्तावेजों और गवाहियों की प्रतिलिपियाँ प्राप्त करने में एक माह और निकल जाता है। अब न्यायालय पर एक माह में निर्णय कर देने का दबाव होता है।किसी तरह यदि उस मुकदमे में दोनो पक्षों की बहस हो जाती है तो न्यायालय पर उस मुकदमे का निर्णय जल्दी में करने का दबाव बन जाता है।

पिछले दिनों एक मुकदमे में ऐसा ही हुआ। महत्वपूर्ण मुकदमा था। जब निर्णय आया तो मेरे मुवक्किल के विरुद्ध आया। हमने निर्णय की प्रतिलिपि प्राप्त की जिस में एक सप्ताह निकल गया। निर्णय को पढ़ने के लिए मुवक्किल को दे दिया गया। उस ने एक सप्ताह में उसे मुझे लौटाया और उस की अपील करने को कहा। मैं उन दिनों अस्वस्थता और कुछ व्यस्तता के कारण अपील की तैयारी न कर सका। एक सप्ताह उस में गुजर गया। कल रात जब मैं उस निर्णय की अपील तैयार करने बैठा तो निर्णय को पढ़ कर मैं ने अपना माथा ठोक लिया। तत्थ्य के जितने विवादित बिन्दु उस मामले में दोनों पक्षों द्वारा उठाये गये थ, और जिन पर साक्ष्य भी उपलब्ध थी और जिन पर बहस की गई थी उन सब पर निर्णय ही नहीं किया गया था। कुछ विधि के बिन्दु थे जिन पर दोनों पक्षों द्वारा बहस की गई थी और उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें प्रस्तुत की गई थीं उन में से भी कुछ पर निर्णय नहीं किया गया था। कुछ का निर्णय किया गया था तो विवादित बिन्दुओं को ही गलत समझ  लिया गया था। जब अपील बन कर तैयार हुई तो अधिकांश आपत्तियों में यह लिखना पड़ा कि इस बिन्दु पर न्यायालय ने कोई निर्णय ही नहीं किया।

स तरह इस अपील का भविष्य भी मुझे स्पष्ट दिखाई देने लगा। अपील में अपील न्यायालय को सिर्फ इतना करना था कि जिन बिन्दुओं पर निर्णय नहीं किया गया उन पर निर्णय करने के लिए मुकदमें को वापस अधीनस्थ न्यायालय को प्रेषित कर दिया जाए। इस तरह संख्या की दृष्टि से अधीनस्थ न्यायालय ने एक मुकदमे का निर्णय तो कर दिया था लेकिन वास्तव में मुकदमे का कोई निर्णय ही नहीं हुआ। अब एक दो वर्ष अपील न्यायालय में लगेंगे और फिर पुन अधीनस्थ न्यायालय मे भी एक-दो वर्ष लगेंगे। उस समय अधीनस्थ न्यायालय के पास यह मुकदमा नया होगा और जल्दी निर्णय करने का कोई दबाव भी नहीं होगा। शायद तब अधीनस्थ न्यायालय सही निर्णय कर पाए। इस तरह के अनुचित दबाव से एक तो निर्णयों की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है और दूसरी और एक विवाद के निपटारे में कम सेकम तीन चार वर्ष की वृद्धि और हो गयी है। यदि निर्णयों की गुणवत्ता बनाए रखनी है तो न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि करना ही एक मात्र उपाय है। जाने कब हमारी व्यवस्था इस काबिल हो सकेगी कि देश को पर्याप्त मात्रा में न्यायाधीश और न्यायालय उपलब्ध करवा सके।

हमारी सरकारें अभी भी भारत को अपना देश नहीं समझतीं

कुछ दिन पूर्व एक समचार चैनल पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता का साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा रहा था। समस्या थी जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की। इन कैदियों को जेलों में रखने के लिए हर वर्ष केंद्र और राज्य सरकारों को बहुत धन खर्च करना पड़ता है। सूचनाओं के अनुसार भारत की जेलों में रह रहे कैदियों में से 70 प्रतिशत अपने मुकदमों के फैसले के इंतजार में हैं। अधिवक्ता महोदय का कहना था कि ऐसे कैदियों के लिए यह एक राहत का विषय है कि जिन कैदियों ने अपील की हुई है और निचली अदालत से जो सजा उन्हें दी गई है उस की आधी सजा काटने पर उन्हें रिहा किया जा रहा है। इस तरह की रिहायगी को मानवता की दृष्टि से जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन उन का क्या जिन्हें सजा नहीं हुई है और केवल विचारण  में दो से दस वर्ष तक लग रहे हैं? कभी-कभी तो उन्हें जितनी सजा मिलनी होती है उतनी ही वे पहले ही जेलों में काट चुके होते हैं। जो जमानत पर रिहा हो जाते हैं उन्हें अपने मामलों के निर्णयों के लिए बरसों अदालतों में चक्कर काटने पड़ते हैं, आने जाने में ही इतना खर्च करना पड़ता है कि विचारण उन के लिए अदालत द्वारा दी जाने वाली सजा से कम नहीं।

लिए यह कहा जा सकता है कि विचारण में समय तो लगता ही है। आखिर आरोप तय किए जाएंगे, गवाह के बयान होंगे फिर ही निर्णय दिया जा सकता है।  लेकिन अपील में तो यह सब कुछ नहीं होता। वहाँ तो निचली अदालत से पत्रावली जाती है और दोनों पक्ष अपनी अपनी बहस करते हैं और फिर अदालत को फैसला देना होता है। यह काम तो सप्ताह भर में निपटाया जा सकता है। लेकिन उस में भी कई कई वर्ष लग जाते हैं, सजा पाया हुआ व्यक्ति जिस ने अपील की होती है वह जेल  में अपने निर्णय की प्रतीक्षा करता रहता है।
दीवानी मामलों की हालत और बुरी है। एक मकान मालिक है उस ने अपनी दो दुकानें किराए पर दे रखी हैं, उसे दुकानों की जरूरत है लेकिन किराएदार दुकानें खाली नहीं कर रहे हैं। उलटे न्यूसेंस पैदा करते हैं। उन्होंने मकान मालिक का जीना हराम कर रखा है। अब मकान मालिक के पास अदालत जाने के सिवा क्या चारा है? लेकिन वह अदालत जाने से भय खाता है, इसलिए कि वहाँ दस या बीस या तीस बरसों में फैसला होगा। वह अदालत के बाहर तरकीब तलाशने लगता है। वहाँ दो ही तरीके हैं। एक तो किराएदार को मुहँ मांगा धन दे कर अपनी दुकान खाली कराए। दूसरा ये कि पुलिस को रिश्वत दे कर या गुंडों को पैसा दे कर अपनी दुकान खाली करा ले। दोनों ही मामलों में अपराध को बढ़ावा मिल रहा है वह भी सिर्फ इसलिए कि न्याय जल्दी नहीं मिल रहा है। इस तरह हमारी न्यायव्यवस्था की कमी खुद अपराधों को बढ़ावा दे रही है। खुद मुझे अपने मकान को खाली कराने में 19 वर्ष लगे थे।

 म यह सोच सकते हैं कि कैसे विचाराधीन कैदियों को जेल से बाहर निकाला जाए। किन्हें जमानत पर छोड़ा जाए और किन्हें अंदर रखा जाए? मुकदमों के निपटारे के लिए समझौतों को प्रोत्साहन दिया जाए, लोक अदालतें लगाई जाएँ। हम सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन ऐसी न्याय व्यवस्था देने की बात पर विचार नहीं कर सकते कि कैसे अदालतों में विचारण एक वर्ष में पूरा होने और अपील की एक माह में सुनवाई की स्थिति लाई जाए। यह स्थिति लाई जा सकती है लेकिन उस के लिए अदालतों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी,

कोई इस आग को लगने से रोक पाएगा?

कोई व्यक्ति जब किसी कंपनी में ऐसा नियोजन प्राप्त कर लेता है, जिस में सेवा की अवधि उल्लखित नहीं होती तो सामान्यतः  उस का नियोजन सुरक्षित है, वह नियोजन की चिंता से मुक्त हो कर काम में जुट जाता है। लेकिन बहुत कर्मचारियों के साथ यह होता है कि अचानक किसी दिन उस का बॉस कहता है कि तुम त्यागपत्र दे दो। इस तरह कर्मचारी अचानक साँसत में आ जाता है। वह जानता है कि यदि उस ने त्यागपत्र नहीं दिया तो किसी भी तरीके से उसे नियोजन से अलग कर दिया जाएगा। उस की बकाया राशियाँ ग्रेच्युटी, भविष्य निधि आदि को प्राप्त करने में उसे रुला लेगी। उसे अनुभव प्रमाण पत्र भी प्राप्त नहीं होगा। यह भी हो सकता है कि उस की सेवाएँ समाप्त करते समय ऐसा आदेश पारित कर दिया जाए कि उस के भविष्य के कैरियर पर प्रश्नचिन्ह लग जाए। ऐसे में वह सोचता है कि त्याग-पत्र देने में ही उस की भलाई है। कम से कम उसे बकाया राशियाँ एक-मुश्त मिल जाएंगी। अनुभव प्रमाण पत्र मिलेगा जिस के माध्यम से वह नया नियोजन प्राप्त कर सकेगा। किसी भी कर्मचारी को त्याग-पत्र देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह गैरकानूनी है। 
से में यदि त्याग-पत्र मांगा जाए, और कर्मचारी न दे तो क्या करे? कर्मचारी के पास यह विकल्प है मौजूद है कि वह अपने बॉस को कहे कि वह नया नियोजन तलाश कर रहा है। जैसे ही कोई ऑफर मिलता है, वह त्याग पत्र दे देगा। हो सकता है उस का बॉस या कंपनी इस बात के लिए तैयार हो जाए। लेकिन इस के लिए वह दो-तीन माह से अधिक का समय नहीं देगी। इस बीच दूसरा नियोजन न मिले तो बॉस/कंपनी और कर्मचारी के मध्य संबंध खराब होने लगेंगे। स्थिति खरबूजा और चाकू जैसी बन जाती है। कर्मचारी त्यागपत्र दे तो तुरंत नियोजन से हाथ धो बैठेगा और बेरोजगारों की कतार में जा खड़ा होगा। नहीं देता है तो कंपनी न केवल उस का नियोजन समाप्त कर देगी, अपितु ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर देगी कि उसे नियोजन मिलने में कठिनाइयाँ आने लगें। 
से में यदि कोई कर्मचारी त्याग पत्र नहीं देता है और कंपनी उसे नौकरी से निकाल देती है, तो कर्मचारी की सेवा समाप्ति गैर-कानूनी होगी। कर्मचारी उसे कानून के समक्ष चुनौती दे सकता है। यदि वह औद्योगिक विवाद अधिनियम में वर्णित श्रमिक (workman) है तो उसे इसी अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही करनी चाहिए। यदि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्ति अवैध है तो वह न्यायालय से यह अधिनिर्णय प्राप्त  कर सकता है कि उसे पुनः नौकरी पर लिया जाए, बीच की अवधि का पूरा या आंशिक वेतन व अन्य लाभ भी अदा किए जाएँ। लेकिन भारत के सभी नियोजक जानते हैं कि देश में पर्याप्त अदालतें नहीं हैं। यदि कर्मचारी ने अदालत का रुख किया तो सामान्य रूप से ही मुकदमे में निर्णय में पाँच-दस वर्ष और कहीं कहीं बीस या उस से भी अधिक समय लग जाएगा। नियोजक अपने धन-बल का उपयोग कर इस पाँच-दस वर्ष की अवधि को दुगना भी कर सकते हैं। इस बीच कर्मचारी थक जाएगा। वह कहीं तो नियोजन प्राप्त कर ही लेगा। धीरे-धीरे मुकदमे से उस का मोह टूट जाएगा और  तब अपनी शर्तों पर मुकदमा समाप्त करने के लिए उसे तैयार किया जा सकता है। कुल मिला कर नियोजक को कुछ भी हानि नहीं होगी।  
स तरह भारत में त्वरित न्याय उपलब्ध न होने के कारण सभी नियोजक अपने कर्मचारियों के साथ मनमानी करने लगे हैं। कर्मचारियों के लिए न्याय की उपलब्धि असंभव की सीमा छू चुकी है

प्रणव दा! सिंह साहब! और सोनिया जी! न्याय के लिए कुछ नहीं, मतलब अन्याय जारी रहेंगे ?

तीसरा खंबा में 26 जनवरी, 2009 की पोस्ट थी, न्याय रोटी से पहले की जरूरत है, ….
जीवन के लिए जितना हवा और पानी आवश्यक है उतना ही न्यायपूर्ण जीवन और समाज भी।  यदि परिवार में खाने को पूरा न हो तो भी परिवार आधे पेट भी प्रेम से जीवन बिता सकता है।  बस लोगों को विश्वास होना चाहिए कि जितनी रोटियाँ हैं, उन का बंटवारा न्यायपूर्ण हो रहा है।   यदि यह विश्वास टूट गया तो परिवार बिखऱ जाएगा।   परिवार के बिखरने का अंजाम सब जानते हैं।  गट्ठर को कोई नहीं तोड़ सकता लेकिन एक एक लकड़ी को हर कोई तोड़ सकता है।  इस लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था परिवार के एकजुट रहने की पहली शर्त है। इसीलिए न्याय रोटी से पहले की जरूरत है।  कम रोटी से काम चलाया जा सकता है, लेकिन न्याय के बिना नहीं।   लेकिन हमारी न्याय प्रणाली अपंग है।   वह हमारी जरूरत का चौथाई भी पूरा नहीं करती।  एक न्यायार्थी को उस के जीवन में न्याय मिलना असंभव होता जा रहा है।  यदि इस स्थिति से युद्ध स्तर पर नहीं निपटा गया तो।  समझ लीजिए कि परिवार खतरे में है।  गणतंत्र खतरे में है।
र्तमान में देश में लगभग16000 अदालतें हैं उन में भी 2000 से अधिक अदालतों में  जज नहीं हैं।  स्वयं संसद  में सरकार  द्वारा निर्धारित  क्षमता  के अनुसार प्रत्येक दस लाख जनसंख्या पर पचास अधीनस्थ न्यायालय  होने चाहिए। भारत की  वर्तमान आबादी लगभग एक  अरब बीस करोड़ के लगभग है, इस आबादी की न्याय की जरूरतों को पूरा करने को अदालतों की  संख्या 60 हजार होनी चाहिए। यही हमारी वास्तविक आवश्यकता है।  अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना का  काम राज्य सरकारों का है। लेकिन किसी  भी राज्य सरकार में इस बात पर चिंता और हलचल तक नहीं दिखाई पड़ती  है कि उन के यहाँ न्याय और न्यायालयों की क्या स्थिति है और  वे घोषित लक्ष्य की  प्राप्ति  के लिए क्या कदम  उठाने जा रहे हैं।
भारत का 2011-12 का संघीय बजट संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है। देश और समाज में न्याय की स्थापना के लिए सरकार और संसद कितनी चिंतित है इस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हों ने इस के लिए क्या प्रावधान अपने बजट में किए हैं। विभिन्न संघीय मंत्रालयों और विभागों का कुल खर्च  इस वर्ष 1216575.73 करोड़ रुपए था। जो आगामी वर्ष के लिए 1257728.83 करोड़ रुपयों का रखा गया है। इस तरह इन मंत्रालयों और विभागों के कुल खर्च में चालीस हजार करोड़ की वृद्धि की गई है। लेकिन वस्तुओं के महंगा हो जाने से  यह वृद्धि न केवल बराबर हो जाती है अपितु बजट में बढ़ाई गई इस राशि में पहले जितनी वस्तुएँ और सेवाएँ नहीं खरीदी जा सकेंगी। 
न्याय के लिए इस वर्ष के लिए 944 करोड़ का प्रावधान किया गया था, अब अगले वर्ष के लिए 1432 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस तरह करीब 488 करोड़ रुपयों की वृद्धि की गई है। इस वर्ष योजना खर्च में रुपए 280 करोड़ रुपए रखे गए थे जिन्हें अगले वर्ष के लिए बढ़ा कर 1000 करोड़ कर दिया गया है। इस में से अधिकांश धनराशि कंप्यूटराइजेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण न्यायालय स्थापित करने के लिए राज्यों की सहायता के लिए रखी गई है। लेकिन गै

कानून की नजरों में सब समान क्यों नहीं हैं?

 अश्विनी कुमार ने पूछा है – – –
हा जाता है  कि कानून की नजर में हम सब समान हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता। एक बार हम बाइक से जा रहे थे, हम तीन सवारी थे, हमारा चालान कर दिया गया। उस के बाद एक और बाइक को रोका जिस पर तीन सवारी थीं, लेकिन उस का चालान नहीं कर के उसे छोड़ दिया गया। ऐसा क्यों होता है? कई बार ऐसे मामले भी देखने में आते हैं कि एक ही जुर्म साबित होने पर सजा किसी को कम तो किसी को अधिक होती है।  
 उत्तर – – – 
अश्विनी जी,
प ने बहुत दिलचस्प और उपयोगी प्रश्न पूछा है। कानून की नजर में सब को समान समझा जाना चाहिए। हम इस बात को यूँ भी कह सकते हैं कि कानून सब के लिए समान होना चाहिए, वह हो भी सकता है। लेकिन यह तभी संभव है, जब कि देश में कानून का शासन हो। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो समझिए देश में कानून का शासन नहीं है। यह कहा जाता है कि भारत में कानून का शासन है, भारत के संविधान में ऐसा ही विहित भी है। लेकिन व्यवहार में यह सही नहीं ठहरता है। तब हमें यह मानना चाहिए कि भारत में भी पूरी तरह कानून का शासन नहीं है। अपितु ऐसी ताकत का शासन है जो कानून को अपने मन मुताबिक बरतती है। हम सांसदों को चुन कर भेजते हैं उन से संसद बनती है। वहाँ जिसे बहुमत का समर्थन प्राप्त है उस की सरकार बन जाती है। प्राथमिक रूप से उस सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून के अनुसार शासन चलाए। लेकिन वह जहाँ चाहती है वहाँ कानून का उपयोग करती है। जहाँ नहीं चाहती है वहाँ आँख मूंद लेती है। उसी तरह की उस की पुलिस है, उस का प्रशासन है। वह जहाँ चाहती है वहाँ कानून का उपयोग करती है, जहाँ चाहती है वहाँ आँख मूंद लेती है।  
रकार की इस बात पर नजर रखने के लिए संविधान ने न्यायपालिका को सरकार से स्वतंत्र बनाया है। लेकिन न्याय पालिका की नब्ज सरकार के हाथ में है। न्यायपालिका को चलाने के लिए वित्तीय व्यवस्था करना सरकार का काम है। सरकार क्यों चाहेगी कि उस पर नकेल रखने वाली न्यायपालिका मजबूत हो? वह न्यायपालिका के लिए पर्याप्त राशन-पानी की व्यवस्था ही नहीं करती। नतीजे में न्यायपालिका का विकास अवरुद्ध हो जाता है। अब अविकसित न्यायपालिका सरकार का कुछ बिगाड़े भी तो कितना बिगाड़ लेगी? भारत में संसद द्वारा पारित संकल्प के अनुसार 10 लाख की आबादी पर पचास अधीनस्थ न्यायालय होने चाहिए। इस तरह भारत में लगभग 60000 अधीनस्थ न्यायालय होने चाहिए लेकिन हैं लगभग 15 हजार। उन में भी लगभग तीन हजार न्यायाधीशों की नियुक्ति में विलम्ब के कारण काम नहीं कर पाती हैं। लगभग 12  हजार अदालतें 60000 अदालतों का काम जिस तरह कर सकती हैं वैसे ही कर रही हैं। एक विद्युत ट्रांसफोर्मर चार हजार मकानों को बिजली सप्लाई कर सकता है लेकिन उसे बीस हजार मकानों को बिजली सप्लाई करनी पड़े तो ऐसे ही करेगा कि हर स्थान पर केवल चार-चार घंटे बिजली मिलती रहे। इस व्यवस्था में कुछ लोग जुगाड़ कर के इस से अधिक बिजली भी हासिल कर सकते हैं और कर लेते हैं। वही हालत न्याय की भी हो गई है। न्याय सीमित है। उस में भी कुछ लोग इस बात का जुगाड़ कर लेते हैं कि उन्हें तो न्य