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मजदूर समस्याएँ अब पूरी तरह राजनैतिक हो चुकी हैं, मजदूर वर्ग खुद को राजनैतिक ताकत के रूप में उभार कर ही उन्हें हल कर सकता है।

rp_industrial-dispute.jpgसमस्या-

लोकेश ने बाल्को नगर, कोरबा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं यूनियन का सचिव हूँ। 1 जुलाई को हमारे लेबर को बिना नोटिस के निकाल दिया गया है। फिर सभी विरोध में हड़ताल कर रहे हैं। आज 10 दिन हो गये लेकिन हल न निकला। मामले को देखते ठेकेदार 10 महिलाओं और 20 पुरुषों को दूसरी जगह कम देने को तैयार हो गया। लेकिन फिर भी लेबर ने वहाँ जाने से इनकार कर दिया है। अब मामला सहायक श्रम आयुक्त के पास है। 7-जुलाई को पहली बैठक हुई। पर प्रबंधन का कोई प्रतिनिधि वार्ता में नहीं आया तो सहायक श्रम आयुक्त ने 9-7-15 का टाइम दिया। तब भी प्रंबंधन से कोई नहीं आया। फिर से हल्ला करने आयुक्त ने 10-7-15 का टाइम दिया.हम क्या करे.ठेकेदार चटनी करने क प्रयास मे ह. जुलाई का समया दिया है। ठेकेदार छंटनी करने के प्रयास में है।

समाधान

ह पूरे देश के मजदूरों की समस्या है। सारे उद्योग अधिक से अधिक ठेकेदार के माध्यम से श्रमिकों को नियोजित करते हैं और जम कर उन से श्रम करवाते हैं। यदि वे यह जबरिया श्रम नहीं करते हैं तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है। नौकरी से निकालने में श्रम कानूनों की भी अनदेखी की जाती है। क्यों कि वे ठेकेदार का ठेका समाप्त कर देते हैं। ठेकेदार का ठेका समाप्त होते ही वह उदयोग बंद होने की श्रेणी में आ जाता है जिस के लिए पहले से कोई नोटिस और मुआवजा आदि देने की कोई बाध्यता नहीं है। चाहे तो श्रमिक लड़ कर ले ले। श्रमिक इस मसले पर हड़ताल करते हैं तो उन्हें अनुपस्थित दिखा कर उन का नियोजन समाप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इस कारण ऐसे वक्त में हड़ताल से कोई लाभ नहीं होता। उलटा नुकसान हो जाता है।

श्रमिकों की यह लड़ाई अब नियोजकों और श्रम विभाग के स्तर की नहीं रही है। अब यह वर्गीय लड़ाई हो कर राजनैतिक हो गयी है। अब जब पूर्ण रूप से निजिकरण हो रहा है तो श्रम कानून कड़े होने चाहिए उस के स्थान पर सरकारें उन्हें कमजोर कर रही हैं। सरकार कहती है कि कानून के समक्ष सब बराबर हैं, अरबपति पूंजीपति और न्यूनतम मजदूरी पाने वाला श्रमिक उन के लिए एक समान हैं। सीधा अर्थ यह है कि कानून सिर्फ पूंजीपतियों के लिए है। सरकार श्रमिकों के लिए अदालतें इतनी सी खोलती हैं कि मुकदमे का निर्णय होने में ही 10-20 बरस लग जाएँ। तब न्याय हो भी जाए तो श्रमिक के लिए कोई न्याय नहीं है।

ब जरूरत है कि कानून ऐसे हों कि कोई नाजायज रूप से किसी मजदूर को नौकरी से न निकाल सके। निकाले तो पर्याप्त मुआवजा पहले दे। यदि कोई विवाद हो तो एक साल में अदालत से फैसला हो। इस के लिए मजदूर वर्ग को राजनैतिक लड़ाई लड़नी होगी। जब तक मजदूर पक्षीय सरकारें देश में नहीं होंगी मजदूर को ऐसे ही शोषण और अन्याय का शिकार होते रहना होगा। फिलहाल तो यही रास्ता है कि श्रमिक यदि नए स्थान पर नौकरी करना चाहें तो इस नौकरी को जारी रख सकते हैं अन्यथा वे कोई दूसरा काम तलाशें और इस अवैधानिक छंटनी के विरुद्ध मुकदमा लड़ते रहें। फैसला जब होगा तब होगा। अवैध छंटनी के मामले में समझौता अधिकारी के यहाँ शिकायत प्रस्तुत करने के 45 दिन हो जाने के बाद समझौता अधिकारी से अवैध छंटनी की शिकायत प्रस्तुत करने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर श्रम न्यायालय में सीधे धारा 2 ए (2) औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा पेश किया जा सकता है।

लक्षणों से लगता है कि मालिक उद्योग को बन्द करने की तैयारी कर रहे हैं।

rp_industry-300x157.jpgसमस्या-

टीकमसिंह ने चौपासनी स्कूल, जोधपुर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में काम करता हूँ। यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमे इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम है। जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारिख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहा पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेनटीनेंस की परवाह नहीं करते। कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या सैलेरी समय पर मिलने का कोई नियम नहीं है।

समाधान-

प की समस्या भारत के लाखों मजदूरों की समस्या है। सब चीज के नियम बने हुए हैं। वेतन 7 तारीख तक मिल जाना चाहिए। यदि नहीं मिलता है तो यह कानून का उल्लंघन है इसे देखने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की है। ओवर टाइम भी दुगना ही मिलना चाहिए और माह के वेतन के साथ मिलना चाहिए। ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधाएँ बन्द नहीं की जानी चाहिए थी। यह कानून के अनुसार गलत है। साफ सफाई व सुरक्षा आदि का ध्यान रखने के लिए फैक्ट्रीज एण्ड बॉयलर इंस्पेक्टर को कार्यवाही करनी चाहिए। बोनस भी पहले देते थे तो यह परंपरा बन चुकी थी इसे भी बंद नहीं किया जा सकता था।

लेकिन इन सब समस्याओं के लिए कोई अच्छी यूनियन ही लड़ सकती है। इस के लिए आप की फैक्ट्री के मजदूरों की यूनियन कार्यवाही कर सकती है। यदि यूनियन नहीं है तो मजदूरों की यूनियन बनानी चाहिए और इन सब सुविधाओं के लिए लड़ना चाहिए।

कानून से मिलने वाली सुविधाओं के लिए पहले श्रम विभाग काम करता था। लेकिन आज कल उस ने इन सब चीजों पर ध्यान देना और उद्योगपतियों के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल करना बंद कर दिया है। अब कोई उन के यहाँ शिकायत करता है तो वे कहते हैं आप मुकदमा कर दें। राजस्थान में मुकदमों के निर्णय की गति इतनी कमजोर है कि बरसों लग जाते हैं। अनेक श्रम संबंधी अदालतों में अधिकारी ही नहीं हैं। एक एक अधिकारी दो तीन अदालतें सम्भाल रहा है। सरकार इन अधिकारियों की संख्या बढ़ाना नहीं चाहती। राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने ही मजदूरों को सुविधाएँ कम होने पर कार्यवाही करना बंद कर दिया था। अब मौजूदा सरकार तो इस से बहुत आगे है। उन्हों ने तो उद्योग बंदी करण के लिए सरकार की अनुमति लेने के कानून को और अधिक लचीला बना दिया है।

प के उद्योग के लक्षणों को देख कर लगता है कि उद्योग में मुनाफा घटा है जिस के कारण अब आप के उद्योग के मालिक इस उद्योग को चलाना नहीं चाहते। वे कोई न कोई बहाना बना कर कुछ सालों में इस उद्योग को बंद कर अपनी पूंजी इस उद्योग से निकाल कर कहीं और लगाना चाहते हैं। उन्हों ने उद्योग से पूंजी को निकालना आरंभ कर दिया है। इसी क्रम में उन्हों ने मजदूरों की सुविधाएँ कम कर दी हैं। वे चाहते हैं कि श्रमिक परेशान हो कर आमने सामने की लड़ाई लड़ें, हड़ताल वगैरह करें तो उन्हें उद्योग में तालाबंदी करने, श्रमिकों को कुचलने और बाद में उद्योग को बन्द करने के लिए अच्छा बहाना मिल जाए। श्रमिकों को इन लक्षणों को समझना चाहिए। जिन्हें इस समय किसी और उद्योग में अच्छी नौकरी मिल सकती हो उन्हें उस के लिए प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए और जैसे ही मिले इस नौकरी को छोड़ कर नई नौकरी पर चले जाना चाहिए। जिस तरह की हालत है उस तरह की हालत में यदि फैक्ट्री बंद की गयी और श्रमिकों की छंटनी की गई तो श्रमिकों को उन के मुआवजे, ग्रेच्यूटी व अन्य लाभों के लिए भी कई वर्ष तक लटकाए रखा जा सकता है।

फिलहाल आप को यही सलाह दी जा सकती है कि जोधपुर बड़ा औद्योगिक केन्द्र है और वहाँ बड़े मजदूर संगठन भी हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी बड़े मजदूर संगठन से सलाह कर अपने यहाँ मजदूरों की यूनियन बनाएँ और यूनियन के माध्यम से इन छीन ली गई सुविधाओं के लिए कार्यवाही करें।

निराश न हों, कोशिश में कमी न रखें, बुरे दिन अक्सर अच्छे समय का आरंभ होते हैं।

समस्या-

मैंने 1998 में हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड रेणुसागर पावर डिविजन रेणुसागर सोनभद्र में केजुअल वर्कर राइटिंग पेंटर के रूप में कार्य करना शुरू किया।  तीन चार साल तक ईमानदारी से कार्य करने के पश्चात मैंने एक इंजिनियर की मदद से उसी कार्य को कॉंट्रेक्ट पर लेकर करना शुरू कर दिया।  रजिस्ट्रेशन ना होने के कारण सब कोन्ट्रेक्टर के रूप में कार्य करता रहा।  मैं खुद वर्कर भी था और सब कोन्ट्रेक्टर भी था।  उस जमाने में 2000-4000 का वर्क ऑर्डर बनता था और वो 4000 का कार्य पूरा करने में 10000 खर्च हो जाता था।  लेकिन मैं लगा रहा कि आज नहीं तो कल बचेगा।  धीरे धीरे क्वांटिटी बढ़ती रही और बचत भी कुछ होने लगी।   8 साल तक सब कोन्ट्रेक्टर के रूप में कार्य करने के पश्चात मैंने 2010 में रजिस्ट्रेशन कराया और अपनी फर्म (मेसर्स एम. पिंटू एंटरप्राइज़ेज) के नाम से कार्य करने लगा।  अब क्वांटिटी भी बढ़ गयी।  मुझे लगा कि अब मेरी 10 साल की मेहनत रंग लाएगी।   पहले जो फॉरमेन थे वे जानते थे कि मैं ने इस काम में कितनी मेहनत की है और वे को-ऑपरेट भी करते थे।  उनका ट्रांसफर हो जाने के बाद दूसरे फॉरमेन को मेरे कार्य का चार्ज दे दिया गया।  अब जब मुझे लगा कि मैं अब इस कार्य से जीविकोपार्जन कर सकता हूँ तो उस फॉरमेन (अनिल पांडे) ने कांट्रेक्ट सेल के अधिकारियों को मेरे खिलाफ भड़काया और दूसरे ठेकेदार से घूस लेकर उस ठेकेदार के नाम से वर्क ऑर्डर बनवा दिया। मेरा काम बंद कर दिया गया।  अब आप ही बताइये कि मैं 12 सालों से इस कंपनी में लगा रहा।  क्या इसका यही ईनाम है।  चूँकि मेरी जीविका का यही एकमात्र साधन था और अब मेरे पास आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता नहीं है। अब आप ही कोई क़ानूनी सलाह दीजिए।

अब्दुल बारी, अनपारा, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश

 

समाधान-

प एक ईमानदार फोरमेन की मदद से एक साधारण वर्कर से पहले पेटी कॉन्ट्रेक्टर और फिर पंजीकृत कॉन्ट्रेक्टर बन गए।  यह आप का विकास है।  पहले आप सिर्फ मजदूर थे, फिर मजदूर से एक व्यवसायी का काम करने लगे।  यह दूसरी बात है कि वास्तव में आप पहले मजदूरी कर के जीवनयापन करते थे और अब एक व्यवसायी के रूप में भी स्वयं ही मजदूरी कर रहे हैं। जब व्यक्ति मजदूरी करता है तो काम की पूरी मजदूरी उसे ही मिलती है।  लेकिन एक व्यवसायी स्वयं मजदूरी नहीं करता।  वह एक दर पर काम लेता है और उस काम को उस दर से काफी कम मजदूरी पर दूसरे मजदूरों से कराता है। वास्तव में एक ठेकेदार जितनी कम मजदूरी वर्कर को देता है उतना ही लाभ कमाता है। आप स्वयं ही काम करते रहे और पूरी मजदूरी लेते रहे आप को चाहिए था कि आप भी काम ले कर कम मजदूरी पर दूसरे मजदूर लगाते और अपना लाभ कमाते। तब आप में भी प्रवृत्ति विकसित होती कि ठेके पर अधिक से अधिक काम लिया जाए और अधिक से अधिक लाभ कमाया जाए।  तब आप उस एक कारखाने के साथ साथ अन्य उद्योगों में भी ठेके लेने लगते और तब एक स्थान पर ठेका समाप्त हो जाने पर आप को फर्क तो पड़ता लेकिन इतना नहीं पड़ता कि आप आत्महत्या करने की सोचने लगते। आप की काम तलाशने की आदत पड़ती तो आप एक ठेका समाप्त होने पर दूसरा ठेका जल्दी ही पा लेते और फिर आप को कोई हानि नहीं होती। व्यवसायी कभी भी हानि से घबराता नहीं है वह अन्यत्र व्यवसाय तलाश लेता है। लेकिन आप केवल मजदूरी करते रहे।  व्यवसाय की ओर आप ने कदम ही नहीं बढ़ाया।

प ने एक ठेकेदार के रूप में काम किया है। ठेका हमेशा निर्धारित अवधि के लिए होता है और वह अवधि समाप्त हो जाने पर ठेका समाप्त हो जाता है। कोई भी कंपनी किसी ठेकेदार से बंधी नहीं है। इस कारण आप के पास आप की समस्या का कोई कानूनी उपाय नहीं है।  लेकिन वास्तव में ऐसा नुकसान और दुर्दिन अक्सर ही आने वाले अच्छे समय का आरंभ होते हैं।  इन्हें आप को अच्छे दिनों के आरंभ के रूप में ही देखना चाहिए और निराशा व आत्महत्या जैसे घृणित सोच को त्याग देना चाहिए। यह जीवन एक ही बार मिलता है, बार बार नहीं।  आप के मजहब के मुताबिक भी आत्महत्या एक जघन्य कृत्य है। इस विचार को बिलकुल त्याग दें।  प्रकृति ने आप को जीवन को नए सिरे से सँवारने का अवसर प्रदान किया है उस अवसर के बारे में सोचना चाहिए।

ब मौजूदा काम तो समाप्त हो गया है।  आप को सोचना चाहिए कि यह आप के अच्छे के लिए हुआ है।  इस तरह आप एक कंपनी से छुटकारा पा चुके हैं।  आप एक अच्छे कामगार हैं, आप को इतने वर्षों से काम करने के कारण हर तरह के काम का बड़ा अनुभव हो चुका है। आप यदि काम तलाशेंगे तो आप को जल्दी ही काम मिल जाएगा। आप को अन्यत्र काम तलाशना चाहिए।  यदि आप को ठेके पर काम न मिले तो इसी काम को करने वाले किसी बड़े ठेकेदार के यहाँ चाहे कम दर पर ही सही काम ले लेना चाहिए। इस से आप को कुछ तो आमदनी होगी।  इस के साथ आप को अवसर की तलाश में रहना चाहिए कि आप को ठेके पर कहीँ और काम मिल जाए।  आप को यह विचार भी त्याग देना चाहिए कि आप उसी स्थान पर उसी नगर में काम तलाशें और आप को मिल जाए।  यदि काम किसी और नगर में या औद्योगिक क्षेत्र में मिले तो भी आप को तलाश कर पकड़ लेना चाहिए।  आजकल आप के काम की बहुत मांग है। यदि आप कोशिश करेंगे तो आप को जल्दी ही अच्छा काम मिल जाएगा और आप पहले अधिक और कई गुना कमाने लगेंगे।  आप गंभीरता से विचार करेंगे तो मेरी सलाह को सही पाएंगे।  आप कोशिश करेंगे तो आप जीवन पहले से अधिक बेहतर हो जाएगा। आप को अवसर मिला है उसे हाथ से न जाने दें।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती : सर्वोच्च न्यायालय

ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन अधिनियम 1970 के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इस कानून का निर्माण उद्योगों में ठेकेदार श्रमिकों को नियोजित करने की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए हुआ है। यह सही है कि इस का उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। लेकिन उस के लिए प्रक्रिया इतनी दुष्कर बना दी गई है और निर्णय करने का अधिकार केन्द्र/राज्य सरकारों को प्रदान किया गया है कि इस प्रथा का उन्मूलन किया जाना असंभव जैसा हो चुका है। सब से पहले तो कोई इस के लिए तथ्य एकत्र करे, फिर राज्य सरकार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। फिर राज्य सरकार इस प्रश्न पर आवेदनकर्ता और उद्योग के स्वामियों/प्रबंधकों की सुनवाई करे। आवेदक का उद्योग के श्रमिकों का उचित प्रतिनिधि होना भी आवश्यक है। कानून बना कर ठेकेदार श्रमिक प्रथा का उन्मूलन करने की शक्तियाँ सरकार को प्रदान कर देने के कारण न्यायालय भी इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते क्यों कि उन्हें इस का क्षेत्राधिकार ही नहीं है।
स कानून का उपयोग नियोजकों द्वारा श्रमिकों के विरुद्ध किया जा रहा है। नियोजक अपनी प्रत्येक स्थाई और नियमित प्रकृति की आवश्यकताओं के लिए श्रमिकों को नियोजित करते हैं, उन का चयन स्वयं करते हैं, उन्हें वेतन भी नियोजक का कार्यालय ही देता है और उन के कार्यों पर नियंत्रण भी नियोजक का ही होता है। लेकिन कागजों में उन्हें ठेकेदार का कर्मचारी बताया जाता है। ऐसे श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक प्राप्त नहीं होती, यदि वे कानूनी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं तो नियोजक तुरंत कहते हैं कि श्रमिक उन के कर्मचारी न हो कर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। विवाद बढ़ता दिखाई देता है तो ठेकेदार का ठेका समाप्त कर दिया जाता है और उस के साथ ही इन श्रमिकों का नियोजन समाप्त हो जाता है।
क सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति बनाम विनोद कुमार शर्मा के मामले में निर्णय पारित करते हुए कहा है कि न्यायालय कानून के इस तरह के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती। इस मामले में नियोजक द्वारा ठेकेदार के कर्मचारी घोषित किए गए श्रमिकों को मूल उद्योग के कर्मचारी घोषित करते हुए उन्हें मूल उद्योग में मिलने वाली सुविधाएँ दिलाने के श्रम न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया गया है।

सब को दिखाई देता है, सिर्फ सरकार अन्धी है

च्चतम न्यायालय का कहना है कि यदि कोई अधिकार औद्योगिक विवाद अधिनियम तथा आनुषंगिक विधि से उत्पन्न हुआ है तो उस से संबंधित विवादों के हल के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम में प्रदत्त उपाय ही किए जाने चाहिए। इस का यह अर्थ हुआ कि औद्योगिक विवादों के लिए सिर्फ और सिर्फ औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत ही मामला ले जाया जा सकता है, उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार और सिविल न्यायालय के सामान्य दीवानी क्षेत्राधिकार के अंतर्गत इन मामलों को नहीं उठाया जा सकता। 
द्योगिक विवाद अधिनियम में उपाय यह है कि कोई भी औद्योगिक विवाद उत्पन्न होने पर उचित सरकार के श्रम विभाग में शिकायत प्रस्तुत की जाए। श्रम विभाग उस पर विपक्षी की टिप्पणी आमंत्रित करेगा। तत्पश्चात यदि श्रम विभाग को प्रतीत होता है कि मामला वास्तव में एक औद्योगिक विवाद है तो उस पर समझौता वार्ता आरंभ की जाएगी। यदि समझौता वार्ता में पक्षकारों में कोई समझौता संपन्न नहीं होता है तो फिर रिपोर्ट उचित सरकार को प्रेषित कर दी जाती है। उचित सरकार उस रिपोर्ट के आधार पर मामले पर विचार कर के श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण को संप्रेषित कर देता है। 
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में अस्तित्व में आया था। तब औद्योगिक विवादों की संख्या कम थी और राज्य सरकार की मशीनरी सही रीति से काम करती थी। तीन से छह माह की अवधि में कोई भी ओद्योगिक विवाद न्यायालय में पहुँच जाता था। न्यायालय भी ऐसे मामलों में एक-दो वर्ष में निर्णय प्रदान कर देता था। धीरे-धीरे औद्योगिक विवाद बढ़ते गए। श्रम विभागों के पास भी दूसरे कामों का आधिक्य हो चला। ऐसे में औद्योगिक विवादों को हल करने की मशीनरी अपर्याप्त होती चली गई। अब यह स्थिति है कि एक औद्योगिक विवाद को शिकायत प्रस्तुत करने के उपरांत न्यायालय तक पहुँचने में एक वर्ष से ले कर तीन-चार वर्ष का समय तो व्यतीत हो ही जाता है।
धर औद्योगिक न्यायाधिकरणों और श्रम न्यायालयों की स्थिति यह है कि जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विवाद अधिक हैं वहाँ के न्यायालयों में तीन-चार हजार विवाद हमेशा लंबित रहते हैं। अनेक विवाद ऐसे हैं जो पच्चीस तीस वर्ष की अवधि से उन में लंबित हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम में प्रावधान है कि धारा 33 सी (2) के मामले तथा सेवा समाप्ति से संबंधित मामलों में तीन माह में अधिनिर्णय पारित कर दिया जाना चाहिए। लेकिन कार्याधिक्य के कारण यह संभव नहीं है। धरातल की वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों में दो तारीखों के बीच का फासला ही तीन से छह माह तक का होता है। इस तरह कानून की पालना के लिए सरकार पर्याप्त मशीनरी उपलब्ध नहीं करा रही है।
दूसरी ओर स्थिति यह भी है कि अनेक औद्योगिक न्यायाधिकरण व श्रम न्यायालय केवल क्षेत्रीय आधार पर स्थापित किए गए हैं। लेकिन वहाँ तीन सौ से पाँच सौ तक ही मुकदमे लंबित हैं। एक न्यायालय में पदस्थापित न्यायाधीश का कथन था कि यदि वे अपनी पूरी क्षमता से काम करने लगें तो एक वर्ष में अदालत में मुकदमों की संख्या दस भी न रह जाएगी। अदालत की स्थापना का औचित्य समाप्त हो जाएगा। राजस्थान में इन दोनों तरह की अदालतों की संख्या लगभग बराबर सी है। श्रम विभाग के ही एक उच्च स्तरीय अधिकारी ने बातचीत को दौरान इस स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति को सुधारा जा सकता है इस तरह तीन सौ से पाँच सौ मुकदमे वाली दो अदालतों में से एक को दूसरी का काम भी करने को दिया जाए। अदालत 15-15
दिन दोनों स्थानों पर बैठ कर कार्य करे तो भी उसी गति से कार्य हो सकता है जिस से हो रहा है। इस तरह एक न्यायालय बिलकुल खाली हो लेगा। उसे उस स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है जहाँ के न्यायालय के पास तीन से चार हजार मुकदमे लंबित हैं। एक के स्थान पर दो अदालतें हो जाने पर मुकदमों के निपटारे की गति कम से कम आधी की जा सकती है। 
ह उपाय श्रम विभाग के उच्चाधिकारियों के ज्ञान में है। राज्य के सभी श्रम न्यायालयों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों के ज्ञान में भी है। लेकिन केवल राज्य सरकार ही इस से अनभिज्ञ है। राज्य सरकार को भिज्ञ बनाने के लिए श्रम संगठन लगातार ज्ञापन आदि भी प्रेषित कर रहे हैं। लेकिन लगता है ऐसे मामलों में सरकारें जानबूझ कर ही अनभिज्ञ बनी रहना चाहती हैं। यदि वे एक सुव्यवस्था स्थापित कर देंगी तो फिर जिन क्षेत्रों में अधिक विवाद हैं उन क्षेत्रों के उद्योगपतियों का हित साधन कैसे हो सकेगा? वे अपने कर्मचारियों को बरसों विवाद लंबित रहने का भय दिखा कर उन के साथ मनमानी कैसे कर सकेंगे?

लालच के शिकारों को बचाने के लिए कानून मे बदलाव निहायत जरूरी

ब जा कर यह स्थिति बनने लगी है कि निर्माण कंपनियाँ कानून के प्रति जो असावधानियाँ बरतती है उस के खिलाफ कार्यवाही होने लगी है। हालाँ कि इस स्थिति के निर्माण में मीडिया की भूमिका प्रमुख है, क्यों कि दुर्घटना होने के तुरंत बाद जिस तरह से मीडिया संवाददाता खोज बीन कर कानूनी कमियों को खोज निकालते हैं और पुलिस व अन्य एजेन्सियों के लिए कानूनी कार्यवाही करना आवश्यक हो जाता है अन्यथा ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं के कृष्ण धनबंधन उजागर होने लगते हैं। लेकिन कानूनी कार्यवाही की जो तलवार लटकी है उस से निपटने के लिए अब अफसरों ने हड़ताल का सहारा लिया है कि उन के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही न की जाए। 

कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के झालावाड़ जिले के नीमोदा के पास निर्माणाधीन 1200 मेगावाट के सुपर थर्मल पावर स्टेशन पर 6.7 टन की एल्बो उठाते समय रोप टूट जाने से हुए हादसे में तीन श्रमिकों की दब कर मृत्यु हो गई। बात राष्ट्रीय स्तर तक मीड़िया में गई तो पुलिस ने आनन फानन में सदोष मानव वध मानते हुए निर्माण उप कंपनियों के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत ने फिलहाल उन की जमानत लेने से इन्कार कर दिया। थर्मल के निर्माण में जुटे ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के अफसरों ने इस कदम के विरुद्ध हड़ताल कर दी है और थर्मल इकाई का निर्माण कार्य रुक गया है।

यह एक नई परिस्थिति है, और लगता है हमारे प्रशासन के पास इस नई परिस्थिति से निपटने के लिए केवल यही एक रास्ता बचा है कि कानून को अपना काम करने से रोक दिया जाए। वैसे भी जमीन के नीचे धन की जो नहरें बहती हैं उन के कारण कानून अपना काम कभी कभी ही कर पाता है। इस नई परिस्थिति का कारण यह है कि कानून ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के प्रबंधकों को इन लापरवाहियों के लिए दोषी मानता है। जब कि ये प्रबंधक वास्तव में साधारण वेतन पर रखे गए कर्मचारी होते हैं। उन की स्थिति मजदूरों की अपेक्षा कुछ ही बेहतर होती है और रोजगार बनाए रखने के लिए अपने नियोजक की हर अच्छी बुरे काम को अंजाम देते रहते हैं। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इस तरह की दुर्घटना होने पर मुख्य निर्माण कंपनी के निदेशकों/मालिकों और उप निर्माण कंपनी के मालिकों और ठेकेदारों को ही इस तरह की दुर्घटना के लिए जिम्मेदार मानने के लिए कानन बनना चाहिए। क्यों कि असल में सुरक्षा की आवश्यकता को दरकिनार करने का काम धन बचाने के लिए उन्हीं के निर्देशन पर संपन्न होता है औऱ बचे हुए धन के स्वामी भी वे ही बनते हैं। इस तरह यदि किसी दुर्घटना के लिए कोई अपराधिक लापरवाही का मामला बनता है तो सजा का भागी भी वस्तुतः उन्हीं लोगों को बनना चाहिए जो कि उस व्यवसाय से अधिक से अधिक धन कमाते हैं। उन्हीं की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि जिस कार्य से वे धन कमा रहे हैं उस से मनुष्य के प्रति कोई अपराध घटित न हो।

लेकिन अब तक जो कानून हैं उन में  हमेशा कुछ विशिष्ठ पदों पर नियुक्त अधिकारियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। ये अधिकारी बड़ी कंपनियों में तो बड़े वेतन पाते हैं लेकिन मंझोले कारोबारों और उद्योगों में ये अधिकारी बहुत मामूली वेतनों पर काम कर रहे होते हैं। यही वजह है कि जब ठेकेदार कंपनियों के अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया तो वे ही हड़ताल पर उतर आए। उन का हड़ताल पर जाना बहुत वाजिब लगता है। क्यों कि वे सारे काम तो अपने मालिकों के निर्देशो

संसद सर्वोच्च नहीं है?

द्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 देश में उत्पन्न औद्योगिक विवादों का हल प्रस्तुत करता है। किसी भी कर्मकार की सेवाएँ समाप्त हो जाने पर उत्पन्न औद्योगिक विवाद इसी कानून के अंतर्गत हल किया जाता है। इसी कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई लाभ यदि नियोजक की ओर बकाया हो तो उस की संगणना श्रम न्यायालय द्वारा की जा सकती है। कोई भी औद्योगिक विवाद सीधे श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। उसे केवल उचित सरकार (राज्य या केंद्र सरकार) ही इन न्यायालयों को संप्रेषित करती है।
स कानून के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि कुछ खास किस्म के औद्योगिक विवादों का निपटारा श्रम न्यायालय अथवा औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित अवधि में कर दिया जाना चाहिए। इन प्रावधानों का मूल अंग्रेजी पाठ निम्न प्रकार है-

Sec.10 [(2A)   An order referring an industrial dispute to a Labour Court, Tribunal or National Tribunal under this section shall specify the period within which such Labour Court, Tribunal or National Tribunal shall submit its award on such dispute to the appropriate Government:
Provided that where such industrial dispute is connected with an individual workman, no such period shall exceed three months:

Sec. 33 C (2)  Where any workman is entitled to receive from the employer any money or any benefit which is capable of being computed in terms of money and if any question arises as to the amount of money due or as to the amount at which such benefit should be computed, then the question may subject to any rules that may be made under this Act, be decided by such Labour Court as may be specified in this behalf by the appropriate Government 1[within a period not exceeding three months.] 

धारा 10 [2-ए में स्पष्ट किया है कि यदि सरकार कोई भी औद्योगिक विवाद श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय न्यायाधिकरण को संप्रेषित करती है तो संप्रेषण आदेश में अंकित करेगी कि इस विवाद का निपटारा कितने समय में किया जाना है, यदि विवाद किसी एक श्रमिक के संबंध में हुआ तो यह अवधि तीन माह से अधिक की नहीं होगी।
सी तरह धारा 33 सी (2) में स्पष्ट किया गया है कि मामले का निपटारा तीन माह से में किया जाएगा।

ये कानून भारतीय संसद द्वारा बनाए गए हैं, अर्थात भारतीय संसद ने सरकारों को निर्देशित किया है कि इस तरह के विवादों का निपटारा तय सीमावधि में होना चाहिए। अब यह भी आवश्यक है कि अदालतों की संख्या इतनी पर्याप्त हों कि विवादों का निपटारा इस तयशुदा सीमावधि में किया जा सके। लेकिन सरकारों ने इतनी संख्या में अदालतों का गठन ही नहीं किया कि ऐसा किया जा सके। हो यह रहा है कि इस तरह के विवादों के निपटारे में 20-20 वर्ष लग जा रहे हैं। जहाँ विवाद के निपटारे की अवधि तीन माह तय की गई है वहाँ एक सुनवाई के बाद दूसरी सुनवाई की तिथि ही छह माह बाद की दी जा रही है।
अब इसे आप क्या कह सकते हैं?
1. कि संसद सर्वोच्च नहीं है, सरकारें सर्वोच्च हैं, वे कुछ भी कर सकती है, संसद के किसी भी निर्देश को बट्टा खाते में डाल सकती है।
2. कि संसद केवल दिखावे के लिए और जनता को धोखा देने के लिए कानून बनाती है।
3. कि इस देश में श्रमजीवियों का कोई मूल्य नहीं। उन के अधिकारों के लिए जो कानून बनते हैं उन पर कोई अमल नहीं किया जाता। अंबानी बंधुओं के विवाद सु्प्रीम कोर्ट दिनों और महिनों में तय कर देता है। 

न्याय के प्रति राज्य सरकार की चिंता

कोटा नगर जहाँ मैं वकालत का व्यवसाय कर रहा हूँ राजस्थान के प्रमुख औद्योगिक नगरों में से एक है। यहाँ औद्योगिक विवादों का होना स्वाभाविक था। इन की संख्या को देखते हुए राजस्थान सरकार ने यहाँ 1978 में श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण की स्थापना की जिसे कोटा संभाग के सभी जिलों के मामले सुनने का अधिकार दिया गया। मेरी रुचि इन मामलों में थी इस कारण मैं सितंबर 1979 में अपने गृहनगर बाराँ को छोड़ कर कोटा चला आया और मुख्य रुप से इस अदालत में वकालत का आरंभ किया। हालांकि मैं ने राजस्व मामलों को छोड़ कर सभी प्रकार के मामलों की वकालत की और अब तक करता आ रहा हूँ। लेकिन मेरे पास लगभग आधे मामले हमेशा श्रम और औद्योगिक मामले रहे।
वास्तव में यह अदालत एक आदर्श अदालत थी, और अनेक अर्थों में अब भी है। प्रारंभ में इस अदालत में तीन दिन श्रम मामले सुने जाते थे। दो दिन मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरण का काम होता था और एक दिन भ्रष्टाचार निरोधक अदालत का काम होता था। लेकिन श्रम मामले बढ़ते चले गए। मोटरयान दुर्घटना मामले पहले जिला जज को स्थानांतरित किए गए और भ्रष्टाचार निरोधक न्यायालय पृथक स्थापित हो गया। यह अदालत सप्ताह के छहों दिन औद्योगिक विवादों की सुनवाई करने लगी। उस समय इस अदालत में पन्द्रह दिन से अधिक की पेशी किसी मुकदमे में नहीं होती थी। अब छह-सात माह की तारीख पड़ती है। इस न्यायालय की इस दुर्दशा के लिए पूरी तरह राज्य सरकार जिम्मेदार है।
स न्यायालय के मुकदमे कुछ जटिल प्रकार के होते हैं। इस कारण से औसतन एक मुकदमे के निपटारे में दो दिन लग सकते हैं। वर्ष में यह न्यायालय लगभग 220 दिन काम करता है। ऐसी अवस्था में यदि यह अपनी सामान्य गति से काम करे तो वर्ष में 110 मुकदमों का निपटारा कर सकता है। वर्तमान में इस न्यायालय में लगभग चार हजार मुकदमे लंबित हैं। मेरे निवेदन पर अदालत ने वर्ष 2003 से ले कर 2009 तक के मुकदमों के निपटारे के आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार वर्ष ……

  • 2003 के आरंभ में 2988 मामले लंबित थे, इस वर्ष 531 नए मामले प्राप्त हुए, 320 का निर्णय किया गया और 3199 में शेष रहे। 
  • 2004 के आरंभ में 3199 मामले लंबित थे, इस वर्ष 305 नए मामले प्राप्त हुए, 84 का निर्णय किया गया और 3420 मामले शेष रहे।      
  • 2005 के आरंभ में 3420 मामले लंबित थे, इस वर्ष 310 नए मामले प्राप्त हुए, 168 का निर्णय किया गया और 3562 मामले शेष रहे।      
  • 2006 के आरंभ में 3562 मामले लंबित थे, इस वर्ष 180 नए मामले प्राप्त हुए, 267 का निर्णय किया गया और 3475 मामले शेष रहे।  
  • 2007 के आरंभ में 3475 मामले लंबित थे, इस वर्ष 424 नए मामले प्राप्त हुए, 215 का निर्णय किया गया और 3684 मामले शेष रहे।
  • 2008 के आरंभ में 3684 मामले लंबित थे, इस वर्ष 288 नए मामले प्राप्त हुए, 138 का निर्णय किया गया और 3834 मामले शेष रहे।
  • 2009 के आरंभ में 3834 मामले लंबित थे, इस वर्ष 283 नए मामले प्राप्त हुए,218  का निर्णय किया गया और 3899 मामले शेष रहे।
प स्वयं ही देख सकते हैं कि यह अदालत औसतन वर्ष में 200 मामलों में निर्णय पारित कर सकती है और वर्तमान में लगभग चार हजार मामले लंबित हैं। ऐसी स्थिति में यदि इस अदालत में एक भी मामला नया नहीं दिया जाए तो भी इस अदालत को लंबित मामलों के निपटारे में बीस वर्ष लग सकते हैं। ये सब आँकड़े प्रत्येक वर्ष राज्य सरकार को उपलब्ध कराए जाते हैं और प्रत्येक तिमाही पर उन्हें अपड़ेट किया जाता है। लेकिन लगता है कि ये सब आँकड़े राज्य सरकार के गोदाम में जा कर दफ्न हो जाते हैं। न तो न्यायालय में काम की गति को बढ़ाने के लिए कोई उपा
य किए जाते हैं और न ही एक और इसी तरह का न्यायालय स्थापित किए जाने के लिए कोई सिलसिला आरंभ किया जाता है। आरंभ में इस न्यायालय में जितने कर्मचारी थे उन में से दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी एक रीडर और एक लिपिक कम कर दिए गए हैं। इसी वर्ष एक और लिपिक सेवा निवृत्त होने वाला है। लगता है कि उस का स्थान भी रिक्त ही रहेगा। 
स न्यायालय में दो टाइप मशीनें 32 वर्ष पुरानी हैं जो जर्जर हो चुकी हैं और कभी भी  जवाब दे सकती हैं। कंप्यूटर स्थापित करने के लिए पिछले दस वर्षों से राज्य सरकार को लिखा जा रहा है लेकिन राज्य सरकार उस के लिए बजट ही नहीं दे रही है। आप इस न्यायालय की दशा को देख कर अनुमान लगा सकते हैं कि राज्य सरकारें सब से कमजोर तबके को न्याय प्रदान करने के लिए कितनी चिंता करती है।

ठेकेदार श्रमिकों के लिए न्याय की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं

बालकिशन पूछते हैं–

मैं एक कंपनी में 6 साल से कार्यकर रहा हूँ, मेरा केवल ठेकदार बदला जाता है और कार्मिकों को नहीं बदला जाता है।  जब संविदा समाप्‍त होता है तब हम ठेकेदार से बोलते है तो वह कहता है कि आप मेरे कार्मिक नहीं हैं मैने तो कंपनी के संविदा एवं कंपनी के कहने पर रखा क्‍या हम कंपनी पर कोई केस कर सकते हैं?
 
 उत्तर–
 
भारत में 1970 में ठेकेदार श्रमिक (नियमितिकरण और उन्मूलन) अधिनियम 1970 पारित किया गया था। जिस का उद्देश्य उद्योंगों में ठेकेदार श्रमिकों का नियमितिकरण करना और आवश्यक होने पर उस का उन्मूलन करना था। लेकिन यह अधिनियम अपने उद्देश्यों के सर्वथा विपरीत सिद्ध हुआ। इस में प्रावधान है कि कोई भी उद्योग प्रतिबंधित श्रेणी के अतिरिक्त अन्य सभी स्थानों पर ठेकेदार श्रमिक नियोजित कर सकेगा। प्रतिबंध लगाने का काम केन्द्र और राज्यों की सरकारों के जिम्मे छोड़ दिया गया। केंद्र ने कुछ नियोजनों में ठेकेदार श्रमिकों के नियोजन को प्रतिबंधित किया। लेकिन राज्यों ने इस में कोई रुचि नहीं दिखाई। आज स्थिति यह है कि कोई भी उद्योग कितने ही ठेकेदार श्रमिक नियोजित कर सकता है। हालत यह है कि पूरे के पूरे कारखाने ठेकेदार श्रमिकों से चलाए जा रहे हैं। न कोई देखने वाला है न कोई पूछने वाला है।
किसी भी उद्योग के किन्हीं नियोजनों में ठेकेदार श्रमिकों के नियोजन के उन्मूलन के लिए कार्यवाही तभी संभव है जब कि उस उद्योग के श्रमिक किसी यूनियन में संगठित हों और वह यूनियन राज्य सरकार के समक्ष इस तरह की मांग करे। राज्य सरकार उस मांग पर विचार कर के ठेका श्रमिकों के नियोजन को प्रतिबंधित कर सकती है। यह प्रक्रिया ऐसी है कि मजदूरों की मांग पर कभी भी किसी उद्योग में ऐसा प्रतिबंध लगाया ही नहीं जा सकता। 
प के मामले में स्थिति यह है कि आप यदि अपने नियोजन के मामले में ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन के लिए किसी यूनियन के माध्यम से उपयुक्त सरकार को आवेदन करें तो भी दो-तीन वर्ष इस कार्यवाही में लग जाएंगे और फिर भी आवश्यक नहीं है कि राज्य सरकार ठेका श्रमिक नियोजन का उन्मूलन कर ही दे। यदि ऐसा हो भी जाए तो वर्तमान में ठेकेदार के माध्यम से काम कर रहे श्रमिकों को ही कंपनी के नियोजन में लिया जाएगा यह बाध्यकारी नहीं है। कंपनी अपने हिसाब से नए श्रमिकों का नियोजन कर लेगी और आप को नौकरी से निकालने की जरूरत भी नहीं। ठेकेदार के साथ ही आप का उन्मूलन भी हो जाएगा।
दि आप के पास ऐसे सबूत और गवाहियाँ हों जिन से आप लोग यह साबित कर सकते हों कि वास्तव में आप का नियोजन कंपनी द्वारा किया गया है और ठेकेदार की उपस्थिति केवल आड़ लेने के लिए की गई है तो आप इस मामले में अपनी ट्रेडयूनियन के माध्यम से औद्योगिक विवाद उठा सकते हैं। लेकिन देश भर में औद्योगिक न्यायाधिकरणों और श्रम न्यायालयों की हालत यह है कि इस विवाद को निपटने में इतना समय लग जाएगा कि आप के लिए यह विवाद उठाना निरर्थक हो जाएगा। 

ज ठेकेदार श्रमिकों के लिए देश में न्याय का कोई वास्तविक अवसर उपलब्ध नहीं है। ठेकेदार श्रमिकों  को न्याय केवल ठेकेदार श्रमिक (नियमितिकरण और उन्मूलन) अधिनियम 1970 को हटा कर उस के स्थान पर एक नया कानून बनने पर ही प्राप्त हो सकता है जिस में प्रावधान हो कि कोई भी उद्योग केवल उन्हीं नियोजनों में ठेकेदार श्रमिक नियोजित कर सकता है जिन के लिए उस ने सरकार से ऐसी अनुमति प्राप्त कर ली हो। लेकिन इस तरह का कानून बनाए जाने की मांग न तो किसी श्रम संगठन ने अभी तक उठाई है और न ही किसी राजनैतिक दल का इस ओर ध्यान है। उन राजनैतिक दलों का भी नहीं जो घोषित रूप से स्वयं को श्रमिक वर्ग का दल कहते हैं।

ठेकेदार श्रमिक कभी मूल नियोजक का स्थाई या नियमित कर्मचारी नहीं हो सकता।

श्री बाबूलाल काँकरेलिया का प्रश्न है….
मैं दिनांक 20.12.2005 से केन्द्रीय सरकार के कार्यालय में मैं एक ऐजेंसी के माध्यम से डाटा कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर काम कर रहा हूँ। ऐजेंसी के बिल के साथ कार्यालय नोट शीट पर भेजा गया है और ऐजेंसी के लेटरहेड पर मेरी उपस्थिति को सहायक निदेशक तक प्रत्येक माह सत्यापित कर हस्ताक्षर कर दिया गया है। यह क्रम दिनांक 20.08.2007 तक चला है। क्या मैं सरकारी कर्मचारी बन सकता हूँ? मेरा उचित मार्गदर्शन करें।
उत्तर 

बाबू लाल जी !
आप ने अपनी जो वर्तमान स्थिति बताई है, वह ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मचारी की है। आप सरकारी संस्थान के नहीं, अपितु उस ठेकेदार ऐजेंसी के कर्मचारी हैं, जिस ने आप को सरकारी संस्थान को उपलब्ध कराया है, और जो आप को वेतन देती है। सरकारी संस्थान के अधिकारियों द्वारा इसी कारण से आप की उपस्थिति प्रमाणित कर के आप की नियोक्ता ऐजेंसी को भेजी जाती है और वहाँ से आप की उपस्थिति के आधार पर आप को वेतन प्राप्त होता है।
पहले यह काम केवल बड़े निजि संस्थान किया करते थे। किसी भी संस्थान द्वारा नया कर्मचारी रखने पर वह अन्य कर्मचारियों के बराबर वेतन की मांग करने लगता है, कर्मचारी संगठन भी उस के साथ खड़े होते हैं, और यह कानून की भी मांग है कि किसी भी संस्थान में एक जैसा काम करने वाले कर्मचारियों को भिन्न वेतन नहीं दिया जा सकता। हाँ, वरिष्ठता के आधार पर कुछ कम-अधिक हो सकता है।  लेकिन निजि संस्थान नए कर्मचारी न्यूनतम वेतन पर श्रमिकों से काम लेना चाहते हैं।  इस के लिए उन्होंने ऐजेन्सियों जिन्हें ठेकेदार (contractor) भी कहा जाता है, के माध्यम से कर्मचारियों से काम लेना आरंभ कर दिया। अब वही काम जो मूल नियोजक के कर्मचारी करते थे, ठेकेदार के कर्मचारी करने लगे। धीरे-धीरे यह भी होने लगा कि बहुत से संस्थानों में प्रबंधन के अतिरिक्त सारा काम ठेकेदार कर्मचारियों के माध्यम से लिया जाने लगा।  इस का नियोजकों को लाभ यह था कि जब भी ठेकेदार के कर्मचारी वेतन बढ़ाने या नियमित करने की मांग करें। ठेकेदार का ठेका ही निरस्त कर दिया जाए। उसी ठेकेदार को नए नाम से या किसी अन्य ठेकेदार को नया  ठेका दे दिया जाए।  इस से सारे कर्मचारी एक साथ नौकरी से निकाले जा सकते थे। 
इस प्रथा ने मानव श्रम के असीम शोषण का मार्ग प्रशस्त कर दिया।  ठेकेदार मजदूरों और उन की यूनियनों ने अदालतों के समक्ष  उन्हें मूल उद्यम का कर्मचारी माने जाने और उन के समान वेतन व अन्य लाभ देने की राहत मांगी तो अदालतों ने इस आधार पर कि वास्तव में ये कर्मचारी मूल संस्थान के ही हैं और ठेका एक छद्म व्यवस्था है कर्मचारियों  के पक्ष में निर्णय देने आरंभ किए। इस प्रथा को समाप्त किए जाने के लिए श्रम संगठनों ने  भी आंदोलन करने आरंभ किए और सरकार पर दबाव बनाया तो संसद  द्वारा ठेका श्रमिक (नियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम-1970 The Contract Labour (Regulation & Abolition) Act, 1970  पारित किया गया।  इस अधिनियम में यह व्यवस्था है कि उपयुक्त
सरकार किसी भी संस्थान में कुछ कार्यों के लिए ठेका श्रमिक नियोजित करने पर प्रतिबंध लगा सकती है और कुछ को ठेका श्रमिकों के लिए खुला छोड़ सकती है। कानून बनने के बाद सरकारों ने अनेक कार्यों में ठेका श्रमिकों का नियोजन प्रतिबंधित भी किया।
लेकिन सरकार के पास कुंजी होने का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे ठेका श्रमिक उन्मूलन का काम नगण्य हो गया है। उक्त कानून ठेका श्रमिक उन्मूलन के स्थान पर ठेका श्रमिक पद्धति को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।  1975 से 1985 तक के दशक में जिन पहले सरकारे अपने यहाँ आकस्मिक कामों पर दैनिक वेतन भोगी  कर्मचारी  नियोजित करती थी। लेकिन विकास कार्यों की गति के चलते वे दो वर्ष या उस से भी अधिक समय तक लगातार काम करते रहते थे। बाद में उन्हें नोकरी से बर्खास्त किया जाता तो वे औद्योगिक विवाद अधिनियम का सहारा लेकर अदालती निर्णय से वापस नौकरी पर आ जाते थे और उन्हें नियमित करना पड़ता था।  इस का इलाज सरकारों ने निजि मालिकों से सीखा। अब सरकारें भी ठेका श्रमिक रखने लगीं। यह सरकारी मशीनरी के भी हित में था। अब कर्मचारी सप्लाई करने के ठेके देने के लिए सरकारी अफसर अच्छी खासी रिश्वत ले सकते थे। यह सरकारों के भी हित में था कि इस तरह वे अनेक योजनाओँ का खर्च कम रख सकती थीं। आज स्थिति यह है कि जितनी भी नई सरकारी योजनाएँ हैं उन में ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मचारियों से ही काम चलाया जा रहा है।  सिद्धांततः इन नियोजनों में ठेकेदार कर्मचारियों को नियोजन देना गलत है, लेकिन यह भी सरकार को ही तय करना है कि इन नियोजनों में ठेकेदार श्रमिकों का नियोजन वर्जित किया जाए अथवा नहीं, तो वह क्यों यह काम करे?
तीसरा खंबा के पिछले आलेख सरकारी नौकरी में नियमानुसार नियुक्त व्यक्ति ही नियमित हो सकता है, आकस्मिक या संविदा कर्मचारी नहीं में बताया था कि सरकारी नौकरी में नियुक्ति के लिए हमेशा कानून  और नियम बने होते हैं और उन नियम कानूनों के अनुसार ही कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी में प्रवेश पा सकता है, अन्यथा नहीं। इस तरह यह लगभग नामुमकिन ही है कि कोई आकस्मिक या संविदा कर्मचारी किसी सरकारी उद्यम में काम पा ले और फिर तमाम कायदे-कानूनों को ताक पर रख कर वहाँ स्थाई और नियमित नौकरी प्राप्त कर ले।  आकस्मिक और संविदा कर्मचारी का नियोजक तो सरकार या उस का कोई विभाग अथवा संस्थान होता है। ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मचारी का तो सरकार से कोई संबंध ही नहीं है। ऐसी अवस्था में यह बिलकुल नामुमकिन है कि किसी ठेकेदार कर्मचारी को सरकारी संस्थान में नियमित नौकरी प्राप्त हो जाए।  अच्छे कर्मचारी अपने यहाँ बनाए रखने के लिए सरकारी अफसर यह हवा बनाते रहते हैं कि इस तरह दो-चार साल काम कर लेने पर उन्हें सरकारी नौकरी में नियमित कर दिया जाएगा। इस लालच के भरोसे वे कर्मचारियों से सरकारी कामों के अलावा निजि सेवाएँ भी खूब प्राप्त करते हैं।
बाबूलाल  जी !  यदि आप योग्य हैं और प्रतियोगिता में टिके रह सकते हैं तो आप को लगातार स्थाई नौकरी के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए और अवसर मिलते ही वर्तमान नियोजन त्याग कर उसे पकड़ लेना चाहिए।
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