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लीज की संपत्ति का पुत्र के नाम हस्तान्तरण कैसे हो?

समस्या-

अमित भारद्वाज ने गणेश चौक, बारघाट रोड, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी दादी की एक दुकान इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय  रोगी कल्याण समिति के काम्प्लेक्स के अंतर्गत है । दुकान 2000 सन में रोगी कल्याण समिति से क्रय की गई थी। किरायेदारी पर रोगी कल्याण समिति 500 रुपये किराया हर माह किरायेदारी के रूप में सभी दुकानदार से लेती है। दादी अब यह चाहती है की दुकान पापा जी के नाम से हस्तान्तरित हो जाये । समिति केअध्यक्ष कलेक्टर महोदय होते हैं और सचिव जिला अस्पताल के सर्जन होते है। दादी ने रोगी कल्याण समिति को आवेदन भी दे दिया है, जन सुनवाई में कलेक्टर ने यह बताया था कि यदि दादी दुकान पापा के नाम करना चाहती है और अन्य पुत्रों को कोई आपत्ति नहीं है तो वह कोर्ट जाने में स्वतंत्र है। लेकिन आवेदन देने के बाद समिति के बाबू काम नहीं कर रहे हैं बोलते है कि कोर्ट जाओ। इस पर हम ने उन से कहा कि दादी अभी जीवित है और जीवित अवस्था में दुकान जिसे चाहे उसे दे सकती है। दादी और पिताजी को क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के द्वारा प्रेषित तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि दुकान का स्वामित्व रोगी कल्याण समिति का है और दुकान आप की दादी के नाम लीज पर है। लीज पर दी गयी संपत्ति को हस्तान्तरित करने के लिए मूल स्वामी की अनुमति की आवश्यकता है। दादी के नाम जो लीज डीड है उस की शर्तों पर निर्भर करता है कि दादी दुकान कैसे अपने किसी पुत्र या अन्य व्यक्ति के नाम हस्तान्तरित कर सकती है। सब से पहला काम तो यह किया जा सकता है कि दादी एक वसीयत कर के दुकान को आप के पिता के नाम वसीयत कर दे और इस वसीयत को उप पंजीयक के कार्यालय में वसीयत करा दिया जाए। इस से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि दादी के देहान्त के तुरंत बाद यह दुकान आप के पिता जी के स्वामित्व में स्वतः ही आ जाएगी। तब आप के पिताजी वसीयत की प्रमाणित प्रति रोगी कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत कर लीज का नामान्तरण उनके नाम करने का आवेदन कर सकते हैं।

विकल्प में आप यह भी कर सकते हैं कि आप उप पंजीयक कार्यालय में लीज डीड को दिखा कर यह पूछ सकते हैंं कि क्या दादी इस लीज को विक्रय या दानपत्र के माध्यम से आप के पिता जी को हस्तान्तरित कर सकती है। यदि उन्हें कोई आपत्ति न हो तो दान पत्र लिख कर उसे पंजीकृत करवा कर दादी उस दुकान को आप के पिताजी के नाम कर सकती है। पंजीकृत दानपत्र के आधार पर लीज आपके पिताजी के नाम नामांतरित करने के लिए रोगी कल्याण समिति को आवेदन किया जा सकता है। वसीयत और दान पत्र दोनों के आधार पर लीज का नामान्तरण न किए जाने पर न्यायालय के समक्ष व्यादेश जारी करने के लिए समिति के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया  जा सकता है।

कच्ची बस्ती में बने सरकारी पट्टे वाले मकान को खरीदने के पहले क्या सावधानी जरूरी है?

समस्या-

गोपाल शर्मा ने जयपुर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-


मैंने एक मकान देखा है जिसको में लेना चाहता हूँ, वह मकान कच्ची बस्ती में है, जिसका पट्टा सरकारी बना हुआ है।  तो क्या मैं उसे खरीद सकता हूँ? क्या वो पट्टा मेरे नाम हो जायेगा? कृपया मुझे सही सलाह बताएँ।

 

समाधान-

गोपाल शर्मा जी, कच्ची बस्तियों में जो मकान स्थित हैं उन के भूखंडों की लीज सरकार नगर निगम अथवा विकास न्यास/ प्राधिकरण के माध्यम से 99 वर्षीय पट्टों के आधार पर जारी करती है। इस तरह जारी किए गए पट्टों में अक्सर यह शर्त होती है कि पट्टाकर्ता इस लीज को हस्तान्तरित नहीं कर सकता। कभी कभी यह शर्त भी होती है कि 10 या 12 वर्ष तक लीज को हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता। ऐसी शर्त होने पर अहस्तांतरणीय अवधि में विक्रय पत्र का पंजीकरण कराया जाना संभव नहीं होता है।

कोई भी मकान जिस का भूखंड लीज/ पट्टे पर हस्तान्तरित किया गया है उस का विक्रय करने के पूर्व नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण से भूखंड के हस्तान्तरण की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। इस कारण आप को मकान के वर्तमान मालिक और विक्रेता से कहें कि वह नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण से भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर ले। आम तौर पर किसी भी मकान को खरीदने का एग्रीमेंट/ इकरारनामा कुछ अग्रिम राशि (साई) दे कर किया जा सकता है। उस में एक निश्चित समय जो तीन माह के आसपास का होता है विक्रेता को इस बात के लिए दिया जाता है कि वह भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर सके। यह शर्त भी होनी चाहिए कि यदि तीन माह या जो भी अवधि निर्धारित हो उस में विक्रेता भूखंड के विक्रय की अनुमति प्राप्त नहीं कर सका तो जो धनराशि उस ने अग्रिम या साई बतौर प्राप्त की है उस की डेढ़ी या दुगनी राशि वह क्रेता को लौटाएगा। यदि विक्रेता विक्रय की अनुमति प्राप्त करने में असफल रहता है तो आप इकरारनामे के अनुसार अग्रिम की डेढ़ी या दुगनी राशि विक्रेता से प्राप्त कर सकते हैं।

कभी कभी ऐसा भी होता है कि सरकार (नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण) पट्टा जारी करते हैं जिसे उपपंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराना होता है लेकिन  जो पट्टा प्राप्त करता है वह उस की उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकरण (रजिस्ट्री) नहीं करवाता है। इस से वह पट्टा बेकार हो जाता है। यदि आप ने जो पट्टा देखा है वह पंजीकृत है तो ठीक है अन्यथा विक्रेता (मकान के वर्तमान स्वामी) को कहें कि वह पट्टे का पंजीकरण (रजिस्ट्री) कराए और भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर ले। ये दोनों बातें होने पर ही आप उस मकान को खरीदने का इकरारनामा (एग्रीमेंट) करें अन्यथा नहीं।

लीज और लीज डीड क्या हैं?

lawसमस्या-

प्रकाश ने पहरिया, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

लीज और लीज़ डीड क्या है? यह कहाँ लिखवाया जाता है? इसका लाभ क्या है? यह कितना वैध होता है?

समाधान

लीज (Lease) को हिन्दी में पट्टा भी कहा जाता है। लीज को संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम 1882 की धारा 105 में परिभाषित किया गया है। इस के अनुसार किसी भी अचल संपत्ति की लीज संपत्ति का उपभोग करने के अधिकार को किसी निश्चित समय अथवा सदैव के लिए किसी प्रतिफल के भुगतान या वायदे पर हस्तान्तरित करना है, यह लिखित और अलिखित दोनो प्रकार की हो सकती है। प्रतिफल धनराशि, साझेदारी, फसल, सेवा या अन्य मूल्यवान वस्तु के रूप में हो सकता है जिन्हें पट्टेदार स्वीकार करे और सावधिक, या विशिष्ट अवसरों पर संपत्ति के स्वामी को अदा करे। संपत्ति को पट्टे पर देने वाले को पट्टाकर्ता (लेसर) और लीज पर लेने वाले को पट्टेदार (लेसी) कहा जाता है तथा प्रतिफल को प्रीमियम या साधारण भाषा में किराया कहा जाता है।

लीज वार्षिक भी हो सकती है और मासिक भी। यदि लीज अलिखित है तो स्थानीय परंपरा से देखा जाएगा कि वह वार्षिक है अथवा मासिक। जैसे कृषि भूमि और उत्पादन के लिए दी गयी लीज आम तौर पर वार्षिक होती है। यदि लीज वार्षिक हुई तो छह माह के नोटिस पर जो कि लीज का वर्ष समाप्त होने पर समाप्त हा हो समाप्त की जा सकती है। शेष सभी प्रकार की लीज मासिक मानी जाती हैं और पट्टेदार या पट्टाकर्ता के 15 दिन के नोटिस जिस की अवधि माह के अंत में समाप्त हो समाप्त की जा सकती है।

वार्षिक या एक वर्ष से अधिक समय तक चलने वाली लीज का जिस का वार्षिक प्रीमियम तय किया गया हो उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत होना आवश्यक है। अपंजीकृत लीज को कोई कानूनी कार्यवाही होने पर साक्ष्य में पढ़ा नहीं जा सकता। अन्य सभी प्रकार की लीज लिखित, पंजीकृत या मौखिक हो सकती हैं। लीज का विलेख पट्टाकर्ता और पट्टेदार दोनों के द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।

किसी जमीन या मकान की किराएदारी भी तरह की लीज ही होती है जो राज्यों द्वारा बनाए गए किराएदारी कानून से शासित होती हैं। उन में और लीज में यही अन्तर है कि किराएदारी को केवल राज्य के किराएदारी कानून के अनुसार ही समाप्त किया जा सकता है। जब कि लीज को उस का कोई भी पक्षकार धारा 106 संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम के अन्तर्गत नोटिस दे कर समाप्त कर सकता है। लीज इस के अतिरिक्त इस अधिनियम की धारा 111 में वर्णित कारणों से भी समाप्त हो सकती है। ये कारण निम्न प्रकार हैं-

  1. लीज एग्रीमेंट में वर्णित समय समाप्त हो जाने पर;
  2. यदि लीज समाप्ति के लिए किसी घटना का उल्लेख हो तो वह घटना घटने पर;
  3. यदि पट्टाकर्ता का हित पट्टा की गयी संपत्ति में समाप्त होने या संपत्ति को हस्तान्तरित करने का अधिकार समाप्त हो जाए, तो ऐसा होने पर;
  4. यदि पट्टाकर्ता और पट्टेदार के हित किसी भी समय में एक ही व्यक्ति में निहित हो जाएँ;
  5. पट्टेदार द्वारा लिखित में पट्टे के अधिकार पट्टाकर्ता को सौंप दिए जाएँ या लिखित आपसी सहमति से पट्टा समाप्त हो जाए;
  6. परिस्थिति से यह निष्कर्ष निकल रहा हो कि पट्टा पट्टेदार द्वारा पट्टाकर्ता को सौंप दिया गया है;
  7. पट्टे की जब्ती से, जैसे पट्टेदार द्वारा पट्टे की किसी जरूरी शर्त के उल्लंघन से, या पट्टाकर्ता ने घोषणा कर दी हो कि उस का स्वत्व किसी तीसरे व्यक्ति को दे दिया गया है, या पट्टेदार दिवालिया हो गया हो और पट्टे की शर्त हो कि पट्टेदार द्वारा दिवालिया होने पर पट्टाकर्ता पट्टा संपत्ति का आधिपत्य ग्रहण कर लेगा। इस चरण में वर्णित मामलों में पट्टाकर्ता द्वारा कब्जा ग्रहण करने के पूर्व पट्टेदार को लीज समाप्ति का नोटिस देना अनिवार्य है।

ब आप ठीक से समझ गए होंगे कि पट्टा या लीज क्या है। लीज डीड इसी पट्टेदारी का पट्टा विलेख है। पट्टा विलेख किसी वकील से या डीड रायटर से लिखाया जा सकता है। यदि लीज एक वर्ष या उस से अधिक की हो तो उस का पंजीकृत होना आवश्यक है। पट्टा विलेख का लाभ यह है कि दोनों पक्षों के बीच पट्टे की क्या शर्तें तय हुई हैं यह स्पष्ट रहे।

स्थाई निषेधाज्ञा की डिक्री दीवानी वाद के निर्णय से पारित की जा सकती है।

rp_property1.jpgसमस्या-

विश्वनाथ ने 546 एमजी रोड इंदौर, मध्यप्रदेश से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

राजस्थान के राजसमंद जिले के गाँव में मेरे अपने दादा के द्वारा खरीदशुदा मकान है जो 2003 में उन्होंने अपनी पुत्रवधु को विक्रय पत्र निष्पादित कर दे दिया था। वर्तमान में उस घर में मेरे अंकल अपने परिवार सहित रहते हैं और वर्ष 2010 में प्रशासन गाँवों के संग अभियान में उन्होंने उक़्त मकान का फ़र्ज़ी पट्टा अपने पुत्र के नाम से बनवा लिया। उनके द्वारा गाँव में स्थित अन्य संपत्ति का भी फर्जी पट्टा अपने नाम व् पत्नी के नाम बनवा लिया था जो जानकारी में आने पर वर्ष 2013 में निरस्त करवाये गए, किन्तु मकान के पट्टे की जानकारी ना होने से वो ग्राम पंचायत द्वारा निगरानी पेश नही करने से ख़ारिज नहीं हो पाए। क्यों कि पंचायत वाले भी इस मिली भगत में शामिल थे। उक़्त मकान का वर्ष 2006 में अंकल के द्वारा किरायेदारी लेख भी स्टाम्प पे लिखा गया है। अतः आप मार्गदर्शन करें मेरे द्वारा उक़्त मकान का पट्टा ख़ारिज करवाने हेतु न्यायालय में निगरानी पेश की गई है। 4 माह पूर्व जिस में सामने वाली पार्टी ने अब तक कोई जवाब पेश नही किया है। मैं वह मकान भी खाली करवाना चाहता हूँ आप बताइये किन धाराओं में केस दायर करूं, किरायेदारी में या फिर मालिकाना हक़ में? यह बताना जरुरी है कि उक़्त मकान मेरे दादा ने अपने चारों पुत्रो के नाम पर ख़रीदा था, उस वक़्त उनके सभी बेटे किशोरवय थे। तत्पश्चात् उन्होंने 2003 में मकान अपनी बड़ी पुत्रवधु को विक्रय किया। 2 मेरी माता जी के नाम गाँव में ही एक प्लाट है जिस पर अंकल ने स्वयम के नाम से पट्टा बनवा लिया व ग्राम पंचायत से मिल कर पंजीयन करा लिया। जिसे वर्ष 2013 में कलेक्टर न्यायालय ने निरस्त कर दिया। फिर भी कुछ समय के बाद उन्होंने उस प्लाट पर बने 3 कमरे चारों दीवार, चढ़ाव, पानी की होद सब तोड़ ताड़ कर नवीन निर्माण चालू कर लिया। जिस पर मेरे द्वारा दीवानी केस दायर किया गया तथा उस पर अस्थाई स्टे लिया गया। अब आप मार्गदर्शन करें। सभी दस्तावेज मेरे पक्ष में है, फिर भी वकील स्थाई स्टे का आवेदन नहीं दे रहा है। जिस कोर्ट में केस चल रहा है उन जज साहब का तबादला होने से कोई नए जज अब तक नहीं आये हैं। क्या करूँ इस स्थिति में चलते केस के दौरान ही मालूम पड़ा की अंकल ने उक़्त निरस्त पटटे पर प्राइवेट पैसा देने वालों से सूद पर रुपया भी ले लिया है। आप बताइये इन्हें भी केस में शामिल किया जावे कि नहीं। केस अभी तक बयान पर नहीं पंहुचा है, 1.5 वर्ष हो चले हैं।

समाधान

मुझे लगता है कि आप के वकील ठीक काम कर रहे हैं। आप उन से समय समय पर सलाह, मशविरा और संपर्क बनाए रखें। राजस्थान में जजों की कमी के कारण हमेशा कुछ अदालतें खाली पड़ी रहती हैं और उन का काम लगभग बंद सा पड़ा रहता है। लेकिन अब उच्च न्यायालय ने ऐसी व्यवस्था की है कि जिस अदालत में जज नहीं होता उस में कार्यवाही करने का अधिकार लिंक कोर्ट को दे दिया है। लिंक कोर्ट को वे सब अधिकार होते हैं जो कि उस अदालत को जिस में मुकदमा लंबित है। बस लिंक कोर्ट को उन मुकदमों से अधिक अपनी अदालत के मुकदमों की चिन्ता रहती है। यदि आप के वकील अदालत को कहेंगे तो उस में हर पेशी पर कोई न कोई कार्यवाही होती रह सकती है।

प ने जो दीवानी वाद प्रस्तुत किया है उस में राहत क्या मांगी गयी है? आपने यह नहीं बताया। स्थाई निषेधाज्ञा की डिक्री दीवानी वाद में निर्णय के द्वारा ही पारित हो सकती है। उस दीवानी वाद में ही स्थाई निषेधाज्ञा की राहत मांगी गयी होगी। यदि नहीं मांगी गयी है तो अब संशोधन के माध्यम से उसी वाद में जोड़ी जा सकती है। स्थाई निषेधाज्ञा के लिए अलग से वाद करने की जरूरत नहीं है, वह इसी वाद में निर्णय के साथ पारित की जा सकती है।

जिन लोगों ने निरस्त पट्टे पर चाचा को पैसा दिया है वे अपनी चिन्ता खुद करेंगे। आप को उन्हें किसी कार्यवाही में पक्षकार बनाने की जरूरत नहीं है। क्यों कि यदि वह संपत्ति या पट्टा चाचा ने बंधक भी रखा होगा तो वह बंधक भी बेकार हो चुका है क्यों कि पट्टा ही निरस्त हो चुका है।

पट्टे के आधार पर दीवानी न्यायालय में घोषणा और निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत करें।

कानूनी सलाहसमस्या-

हितेश ने कैलाशपुरी, राजसमन्द, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

ग्राम पंचायत कैलाशपुरी द्वारा 1995 में सरपंच साहब ने मेरी माताजी के नाम का निशुल्क पट्टा दिया उसका रेकॉर्ड है या नहीं हमें पता नहीं है। हम ने निर्माण कराने के लिए पत्थर डलवाए थे और 1-2 ट्रेक्टर पत्थर पहले से पड़े थे जो 15-20 साल पहले से पड़े थे। हमारे पड़ौस में कब्ज़ा करने के लिए पत्थर किसी ने डलवाए तो किसी की शिकायत पर ग्राम पंचायत ने एक आम सूचना चस्पा की कि ये पत्थर और अन्य सामग्री 3 दिन में उठा ली जाए तो हम ने पत्थर पंचायत नहीं ले जाए इसलिए मालिकाना हक की सूचना ग्राम पंचायत को 3 दिन मे दे दी जो पोस्ट द्वारा भेजी गई ओर उन्हें मिल गई। सूचना सरपंच और सचिव दोनों को भेजी गई थी। तब पंचायत 6 दिन बाद मेरे पत्थर नहीं ले गई। पंचायत द्वारा न तो हमारी सूचना पर हम से पट्टा मांगा गया और न ही पत्थर लेजा ने के बारे में सूचित किया गया। पंचायत की कार्यवाही के दौरान पट्टा बताया तो उसे जाली कह कर पत्थर ले गए। तो आप से अनुरोध है कि मुझे बताएँ कि हम अपने पत्थर और ज़मीन दोनों प्राप्त करने के लिए क्या उन लोगों पर क्रिमिनल ओर सिविल कार्यवाही दोनों एक साथ की जा सकती है। पट्टा निशुल्क वाला है यह 1995 में ग्राम पंचायत ने मेरी माताजी के नाम का दिया था जो निरस्त नहीं किया गया और न ही उस ज़मीन पर 15-20 साल से किसी ने आपत्ति की है। ना ही इस पंचायत द्वारा निरस्त किया गया है। सरपंच ओर अन्य सभी प्रभावशाली लोग हैं तो आप बताएँ कि हम इस मुसीबत से कैसे निपटें?

समाधान-

प की माँ के पास पट्टा है जो इस बात का सबूत है कि आप की माताजी को उस भूखंड पर पट्टे के अन्तर्गत स्वामित्व प्राप्त है। इस के बाद भी पंचायत ने पत्थर उठाए हैं तो आप को पंचायत के समक्ष पत्थर लौटाए जाने के लिए आवेदन देना चाहिए। यदि यह आवेदन निरस्त हो जाता है तो आप जिला कलेक्टर के समक्ष उस की अपील प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि ग्राम पंचायत ने बिना कोई कागजी कार्यवाही किए पत्थर उठाए हैं तो आप अपराधिक मुकदमा कर सकते हैं। लेकिन यदि पंचायत की यह कार्यवाही रिकार्डेड है तो आप को दीवानी और प्रशासनिक उपाय ही करने होंगे।

प को तुरन्त दीवानी न्यायालय में पट्टे के आधार पर घोषणा का वाद दाखिल करना चाहिए तथा इस बात के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने की प्रार्थना करनी चाहिए कि आप वैध रूप से प्लाट पर काबिज हैं, पट्टे से स्वामित्व प्राप्त है, आप के कब्जे और स्वामित्व में ग्राम पंचायत दखल न दे, नियमानुसार भूखंड पर निर्माण करने की अनुमति प्रदान करते हुए आप को निर्माण करने दे।

प को इसी वाद के साथ अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए कि ग्राम पंचायत आप के पत्थर लौटाए और आप के कब्जे में दखल नहीं करे तथा नियमानुसार भूखंड पर निर्माण करने की अनुमति प्रदान करते हुए आप को निर्माण करने दे।

क्रेता सावधान

housing colonyसमस्या-

भूपेन्द्र सिंह ने रुद्रपुर, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

हाँ मैं रहता हूँ वहाँ एक रियल एस्टेट डेवलपर कंपनी एक कॉप्लेक्स बना कर सेल कर रही है। मैं ने जब वहाँ जा कर उस प्रोजेक्ट के बारे में पता किया तो पता चला कि जिस ज़मीन पर वो बिल्डिंग बना कर सेल की जा रही है वो ज़मीन उनकी मालिकी की नहीं है बल्कि 99 वर्ष की लीज़ पर मिली है। मैं जानना चाहता हूँ कि क्या बिल्डर ऐसा कर सकता है कि जिस ज़मीन का वो मालिक नहीं है उस ज़मीन पर फ्लेट बना कर लोगों को विक्रय कर दे? क्योंकि जो लोग फ्लेट ख़रीदेंगे ऐसा समझ रहे हैं कि उन्हें उस फ्लेट की मालिकी मिल रही है। क्या कोई कानूनी कार्यवाही की जा सकती है बिल्डर के खिलाफ?

समाधान-

कृषि भूमि के संबंध में सिद्धान्त यह है कि सारी जमीन सरकार की है और कृषक उस का केवल किराएदार कृषक है जो लगान के रूप में किराया देता है। जब किसी नगर या गाँव का विस्तार होता है तो इसी कृषि भूमि पर होता है। ऐसी कृषि भूमि की किस्म को बदला जाता है वह कृषि भूमि से नगरीय/आबादी भूमि में परिवर्तित हो जाती है और नगर विकास न्यास, नगर पालिका या ग्राम पंचायत को सौंप दी जाती है। उस भूमि का की स्वामी सरकार होती है ये संस्थाएँ केवल उसे रेगुलेट करती हैं। अब ऐसी भूमि को सरकार कभी भी विक्रय नहीं करती। अपितु उसे 99 वर्ष की लीज पर ही स्थानान्तरित करती है। 99 वर्ष के लिए ही लीज पर ही विक्रय की जाती है। बाद में उस पर यदि कोई ऐसा भवन बन जाता है जिस की आयु 99 वर्ष के बाद भी बनी रहती है तो सरकार उस लीज को आगे नवीकरण कर सकती है।

कोई भी ऐसी भूमि पर जो लीज पर प्राप्त की गई है प्रोजेक्ट बना सकता है और नगरीय निकाय से अनुमति प्राप्त कर के फ्लेट बना कर विक्रय कर सकता है। जब फ्लेट विक्रय होता है तो उस भूमि पर बने फ्लेटों के स्वामियों के पास उस इमारत की पूरी जमीन के उतने अंश का स्वामित्व होता है जितने अंश पर उन का फ्लेट बना होता है।

वैसे भी आजकल जो इमारतें बन रही हैं वे कंक्रीट के उपयोग से बनती हैं जिन की उम्र् 99 वर्ष से कम की होती है। कोई भी बहुमंजिली इमारत 90 वर्ष से अधिक उम्र की नहीं होती। इस अवधि के बहुत पहले ही विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप उस बिल्डिंग को गिराया जा कर उस के स्थान पर नया निर्माण होने लगता है। वैसी स्थिति में उस बिल्डिंग के फ्लेट स्वामियों को उन के फ्लेट की कीमत से बहुत अधिक मुआवजा प्राप्त हो जाता है। आज कल यह सब सब की जानकारी में हो रहा है। प्रोजेक्ट निर्माता बिल्डर किसी तरह की कोई बेईमानी नहीं कर रहा है उस के दस्तावेजों में यह स्पष्ट है कि भूमि लीज की है। आप ने जानकारी करने का प्रयत्न किया तो आप को पता लग गया कि जमीन लीज की है, फ्री होल्ड की नहीं है। फिर ‘क्रेता सावधान’ का सिद्धान्त तो है ही। क्रेता जब भी कोई संपत्ति क्रय करे तब सब कुछ जाँच परख कर करे। ऐसे बिल्डर के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही इस आधार पर किया जाना संभव नहीं है।

अपने कब्जे की भूमि पर डीडीए से पट्टा प्राप्त करने की कार्यवाही करें।

property-partition1समस्या-

मनोज शर्मा ने खुरेजी खास, दिल्ली से पूछा है-

मारी एक खसरे की ज़मीन दिल्ली में थी। उस को 1971 में सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया था और उस का मुआवजा भी मेरे परिवार ने मेरे दादा के टाइम में ही ले लिया था। लेकिन 1400 गज आज भी हमारे पास है। जिस में हम ने एक मंदिर बनवा रक्खा है और मेरे पिताजी जिनका देहांत हो गया। वे उस पर काबिज थे, आज मैं और मेरे दो भाई इस ज़मीन पर काबिज हैं। हम लोग इस ज़मीन पर 42 साल से काबिज हैं। डीडीए ने भी इस ज़मीन पर कोई कब्जा कार्यवाही नहीं की है। मैं आप से पूछना कहता हुँ कि क्या आज हम लोग इस ज़मीन के असली मालिक हैं या डीडीए इस ज़मीन का मालिक है।

समाधान-

मीन के मालिकाना हक का सब से प्राथमिक सबूत यह है कि उस पर किस का कब्जा है। यदि आप का 30 वर्ष से अधिक से कब्जा है तो वह जमीन आप के मालिकाना हक की है। लेकिन जमीन पहले कृषि भूमि थी। अधिग्रहण करने के बाद उस जमीन को आबादी भूमि में परिवर्तित किया गया और डीडीए ने उसे काम में ले लिया। अधिग्रहण के समय कुछ जमीन जमीन के मालिक को उपयोग के लिए छोड़ दी जाती है लेकिन उस के लिए डीडीए आबादी भूमि पर मालिकाना हक का प्रमाण पत्र या पट्टा जारी करता है।

प को चाहिए कि आप डीडीए जा कर अधिग्रहण के समय छोड़ी गई जमीन तथा 30 वर्ष से अधिक से आप का उक्त भूमि पर कब्जा होने के आधार पर मालिकाना हक का पट्टा प्राप्त करने की कोशिश करें। इस सम्बंध में आप को डीडीए के मामले में काम करने वाले स्थानीय वकील से सलाह ले कर आगे बढ़ना चाहिए।

लीज खत्म कर के वाहन को अपनी सुपूर्दगी में ले लें।

lawसमस्या-
हरीश कुमार ने भोपाल, म.प्र. से पूछा है-

मैं ने दिनांक 07.01.2013 को एक फोर व्हीलर नया वाहन खरीदा था जिस का लोन व रजिस्ट्रेशन मेरे नाम से है। खरीदने के तुरंत बाद एक व्यक्ति को कच्ची लिखा पढी के आधार पर दिनांक 07.010.2013 से 05.06.2013 तक अनुबंध कर लीज पर दे दिया था। हम ने 05.06.2013 को पुनः 100 रूपये के स्टाम्प पर 4 जून 2016 तक का लीज अनुबंध कर लिया था। लेकिन लीज पर देने के कुछ समय के बाद ही उस व्यक्ति ने इस वाहन का उपयोग किसी गंभीर अपराध में कर लिया। जिसकी वजह से वाहन पुलिस हिरासत में है और उक्त व्यक्ति जेल में 302,201 आईपीसी के विचाराधीन मामले में बंद है। हमारे अनुबंध के वक्त अनुबंधकर्ता द्वारा इस घटना के अलावा अन्य घटना में वाहन का उपयोग किया होगा तो मुझे तो किसी प्रकार की समस्या का सामना तो नही करना पड़ेगा। हमारे द्वारा वाहन सुपुर्दगी पर लेने के बाद हम उक्त वाहन को आरोपी या अन्य व्यक्ति के नाम पर परिवर्तन करा सकते हैं या नहीं।

समाधान-

वाहन आप न्यायालय से अपनी सुपूर्दगी में ले लिया है तो ठीक है अन्यथा आप उसे सुपूर्दगी में ले लें क्यों कि वाहन के स्वामी आप हैं। आप तुरंत उस व्यक्ति के नाम जेल के पते पर नोटिस दे कर उस का अनुबंध इस आधार पर समाप्त कर दें कि उस पर वाहन को गंभीर अपराध में उपयोग करने का आरोप है।

ब आप के पास दोनों अवधि के अनुबंध हैं तो उस काल में यदि उक्त व्यक्ति ने कोई अपराध किया होगा और उस में वाहन का उपयोग किया होगा तो वही जिम्मेदार होगा। आप उक्त अनुबंधों के आधार पर कह सकते हैं कि इस अवधि में वाहन उस के कब्जे में रहा है। आप के द्वारा कब्जे में ली गई तारीख सुपूर्दगी नामे और न्यायालय के आदेश से प्रमाणित हो जाएगी। आप इन दोनों दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियाँ न्यायालय से प्राप्त कर के अपने पास रखें।

दि लीज अवधि का कोई किराया आदि या कोई नुकसान हुआ हो तो उस की मांग भी आप लीज समाप्त किए जाने के नोटिस में कर सकते हैं और उस की प्राप्ति के लिए दीवानी वाद न्यायालय में उस व्यक्ति के विरुद्ध संस्थित कर सकते हैं।

लीज अवधि समाप्त होने के पहले नई संविदा कर लीज की अवधि बढ़वाएँ।

housing colonyसमस्या-

श्रीकान्त वाजे ने इन्दौर मध्य प्रदेश से पूछा है-

हमारे मकान के भूखंड की लीज 99 वर्ष की है जो 8 वर्ष बाद समाप्त हो जाएगी।  उस के बाद क्या होगा?  बाद में भी यह हमारा बना रहे इस के लिए क्या करना चाहिए?

समाधान-

लीज का अर्थ है, किराएदारी। आप जब किसी भी अवधि के लिए किसी संपत्ति को चाहे वह भूखंड हो, फ्लेट हो या फिर कोई अन्य चल अचल संपत्ति, लीज पर दिया और लिया जाता है तो लीज की अवधि तक यह संपत्ति किराए पर दी और ली गई होती है। लीज पर किसी संपत्ति के प्राप्त हो जाने पर लीज पर लेने वाले का अधिकार केवल लीज की अवधि तक ही सीमित रहता है।

लेकिन अचल संपत्तियों के लिए लीज के सम्बन्ध में संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम स्पष्ट उपबंध करता है अचल संपत्ति के लिए लीज किसी एक अवधि के लिए साम्पत्तिक अधिकारों का हस्तान्तरण है। लीज मासिक और वार्षिक हो सकती है। वार्षिक लीज का आरंभ केवल एक पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से ही हो सकता है। जब लीज की अवधि समाप्त हो जाती है तो संपत्ति को लीज पर लेने वाले व्यक्ति का उस संपत्ति पर अधिकार समाप्त हो जाता है। लीज अवधि की समाप्ति के उपरान्त संपत्ति का स्वामी कभी भी लीज पर लेने वाले व्यक्ति को लीज की संपत्ति से बेदखल कर सकता है।

वार्षिक लीज के मामले में संपत्ति को लीज पर लेने वाले व्यक्ति को छह माह पूर्व नोटिस दे कर संपत्ति पर से आधिपत्य त्यागने को कहा जा सकता है। इस नोटिस की अवधि समाप्त होने तक लीज पर लेने वाला व्यक्ति यदि संपत्ति पर अपना आधिपत्य नहीं छोड़ता और संपत्ति के स्वामी को नहीं लौटाता है तो संपत्ति का स्वामी उसे उस अचल संपत्ति से बेदखल करने के लिए न्यायालय में बेदखली और संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकता है।

देश में अधिकांश संपत्ति राज्य सरकारों द्वारा 99 वर्ष की लीज पर दी गई। है इस अवधि के समाप्त हो जाने के उपरान्त राज्य सरकार या उस की उपयुक्त एजेंसी लीज पर दिए गए व्यक्ति से संपत्ति से बेदखल करने की कार्यवाही कर के बेदखल कर सकती है।

लीज पर ली गई संपत्ति को पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए सब से उत्तम उपाय यह है कि आप राज्य सरकार की संबंधित एजेंसी को संपत्ति की लीज समाप्त होने के चार-पाँच वर्ष पहले ही आवेदन कर दें कि आप की लीज की अवधि समाप्त होने जा रही है उसे पुनः लीज पर दिया जाए। इस तरह कोई भी व्यक्ति लीज पर ली गई संपत्ति की अवधि नई लीज संविदा के माध्यम से अपनी लीज की अवधि को बढ़ा सकता है।

प को भी एक दो वर्ष के बाद ही या अभी से ही संपत्ति के स्वामी को आवेदन कर देना चाहिए कि आप की लीज की अवधि समाप्त होने की तिथि से अगले दिन से लीज की अवधि बढ़ाई जाए। यदि आप लीज ली हुई संपत्ति पर अपना आधिपत्य बनाए रखना चाहते हैं तो लीज की अवधि समाप्त होने के पहले आप को नई लीज संविदा करवा कर अपनी लीज अवधि बढ़वा लें।

अभियान चला है, पट्टा बनवा लीजिए

समस्या-

कोटा, राजस्थान से अंजलि शर्मा ने पूछा है –

क प्लाट पर हम 1980 से निवास कर रहे हैं।  वह हमारा नहीं है, किसी और का है।  हमारा कब्जा उक्त प्लाट पर वर्षों का हो चुका है। हम इस का पट्टा बनवाना चाहें तो किस तरह आवेदन कर सकते हैं? पट्टा बनवाने के लिए हमें क्या दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे?

समाधान-

अंजली जी, किसी भूमि पर किसी का लंबा कब्जा होने मात्र से उस का पट्टा बनवाने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। यह तो सरकार की मर्जी पर है कि वे ऐसे लंबी अवधि के कब्जेदारों को उस भूमि का स्वामी होने का अधिकार देती है या नहीं? लेकिन समय समय पर सरकार ऐसी भूमि को सरकारी मान कर उस पर पट्टे जारी करती है। इस समय भी कोटा नगर में अभियान चला हुआ है। यदि आप का उक्त प्लाट कोटा नगर निगम की सीमा में है तो आप का पट्टा बन सकता है।

प तुरंत नगर निगम जा कर पट्टा बनाने के आवेदन पत्र का फार्म ले आइए। उसी से पता लग जाएगा कि पट्टा बनाने के लिए किन दस्तावेजों की आवश्यकता है? आप उस फार्म की सारी पूर्तियाँ भर कर दे दीजिए। यदि आप पट्टे की शर्तों को पूर्ति कर देती हैं तो आप के मकान के प्लाट का पट्टा बन जाएगा।  यह काम तुरंत कीजिए ऐसे अभियान निर्धारित समय के लिए होते हैं। अभियान समाप्त हो जाएगा तो अगले की प्रतीक्षा करनी होगी।

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