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लक्षणों से लगता है कि मालिक उद्योग को बन्द करने की तैयारी कर रहे हैं।

rp_industry-300x157.jpgसमस्या-

टीकमसिंह ने चौपासनी स्कूल, जोधपुर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में काम करता हूँ। यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमे इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम है। जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारिख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहा पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेनटीनेंस की परवाह नहीं करते। कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या सैलेरी समय पर मिलने का कोई नियम नहीं है।

समाधान-

प की समस्या भारत के लाखों मजदूरों की समस्या है। सब चीज के नियम बने हुए हैं। वेतन 7 तारीख तक मिल जाना चाहिए। यदि नहीं मिलता है तो यह कानून का उल्लंघन है इसे देखने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की है। ओवर टाइम भी दुगना ही मिलना चाहिए और माह के वेतन के साथ मिलना चाहिए। ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधाएँ बन्द नहीं की जानी चाहिए थी। यह कानून के अनुसार गलत है। साफ सफाई व सुरक्षा आदि का ध्यान रखने के लिए फैक्ट्रीज एण्ड बॉयलर इंस्पेक्टर को कार्यवाही करनी चाहिए। बोनस भी पहले देते थे तो यह परंपरा बन चुकी थी इसे भी बंद नहीं किया जा सकता था।

लेकिन इन सब समस्याओं के लिए कोई अच्छी यूनियन ही लड़ सकती है। इस के लिए आप की फैक्ट्री के मजदूरों की यूनियन कार्यवाही कर सकती है। यदि यूनियन नहीं है तो मजदूरों की यूनियन बनानी चाहिए और इन सब सुविधाओं के लिए लड़ना चाहिए।

कानून से मिलने वाली सुविधाओं के लिए पहले श्रम विभाग काम करता था। लेकिन आज कल उस ने इन सब चीजों पर ध्यान देना और उद्योगपतियों के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल करना बंद कर दिया है। अब कोई उन के यहाँ शिकायत करता है तो वे कहते हैं आप मुकदमा कर दें। राजस्थान में मुकदमों के निर्णय की गति इतनी कमजोर है कि बरसों लग जाते हैं। अनेक श्रम संबंधी अदालतों में अधिकारी ही नहीं हैं। एक एक अधिकारी दो तीन अदालतें सम्भाल रहा है। सरकार इन अधिकारियों की संख्या बढ़ाना नहीं चाहती। राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने ही मजदूरों को सुविधाएँ कम होने पर कार्यवाही करना बंद कर दिया था। अब मौजूदा सरकार तो इस से बहुत आगे है। उन्हों ने तो उद्योग बंदी करण के लिए सरकार की अनुमति लेने के कानून को और अधिक लचीला बना दिया है।

प के उद्योग के लक्षणों को देख कर लगता है कि उद्योग में मुनाफा घटा है जिस के कारण अब आप के उद्योग के मालिक इस उद्योग को चलाना नहीं चाहते। वे कोई न कोई बहाना बना कर कुछ सालों में इस उद्योग को बंद कर अपनी पूंजी इस उद्योग से निकाल कर कहीं और लगाना चाहते हैं। उन्हों ने उद्योग से पूंजी को निकालना आरंभ कर दिया है। इसी क्रम में उन्हों ने मजदूरों की सुविधाएँ कम कर दी हैं। वे चाहते हैं कि श्रमिक परेशान हो कर आमने सामने की लड़ाई लड़ें, हड़ताल वगैरह करें तो उन्हें उद्योग में तालाबंदी करने, श्रमिकों को कुचलने और बाद में उद्योग को बन्द करने के लिए अच्छा बहाना मिल जाए। श्रमिकों को इन लक्षणों को समझना चाहिए। जिन्हें इस समय किसी और उद्योग में अच्छी नौकरी मिल सकती हो उन्हें उस के लिए प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए और जैसे ही मिले इस नौकरी को छोड़ कर नई नौकरी पर चले जाना चाहिए। जिस तरह की हालत है उस तरह की हालत में यदि फैक्ट्री बंद की गयी और श्रमिकों की छंटनी की गई तो श्रमिकों को उन के मुआवजे, ग्रेच्यूटी व अन्य लाभों के लिए भी कई वर्ष तक लटकाए रखा जा सकता है।

फिलहाल आप को यही सलाह दी जा सकती है कि जोधपुर बड़ा औद्योगिक केन्द्र है और वहाँ बड़े मजदूर संगठन भी हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी बड़े मजदूर संगठन से सलाह कर अपने यहाँ मजदूरों की यूनियन बनाएँ और यूनियन के माध्यम से इन छीन ली गई सुविधाओं के लिए कार्यवाही करें।

विवाह पंजीकरण विवाह की एक तात्विक व पर्याप्त साक्ष्य है।

समस्या-

उदयपुर, राजस्थान से ललित जैन से पूछा है –

मैं हिन्दू हूँ और मैं एक हिन्दू लड़की से प्यार करता हूँ, हम दोनों वयस्क हैं पर मेरे घर वाले हमारी शादी से सहमत नहीं थे तो हम ने पिछले साल मई 2012 में एक मंदिर में जा कर हिन्दू विवाह विधि के अनुरूप विवाह कर लिया तथा उसे नगरपरिषद उदयपुर में विवाह पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा लिया। विवाह का प्रमाण पत्र हमें प्राप्त हो चुका है। हम ने इस विवाह को सार्वजनिक नहीं किया। क्यों कि तब हम दोनों विद्यार्थी थे। अब हम दोनों ही नौकरियाँ कर रहे हैं। अब हम विवाह को सार्वजनिक कर देना चाहते हैं। इस के लिए सब से सुरक्षित तरीका क्या है जिस से कोई कानूनी रूप से हमें परेशान न कर सके और यह विवाह अवैध घोषित नहीं कर सके? हम पिछले एक वर्ष में साथ नहीं रहे तो क्या इस कारण से इस विवाह को अवैध घोषित किया जा सकता है? क्या हमारा विवाह प्रमाण पत्र जो नगर परिषद से मिला है वह वैध है? यदि कोई पुलिस वाला हमें परेशान करने की कोशिश करे तो हमें क्या करना चाहिए। हमें विवाह की घोषणा कैसे करनी चाहिए जिसे हमें इधर उधर भागने की जरूरत न पड़े और हम बिना किसी परेशानी के पति-पत्नी के रूप में साथ रह सकें?

समाधान-

marriageप का विवाह वैध है। आप के पास विवाह का सब से मजबूत प्रमाण विवाह का प्रमाण पत्र है। यह विवाह की तात्विक और पर्याप्त साक्ष्य है। जब तक प्रमाण पत्र फर्जी प्रमाणित न हो आप के विवाह को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। इस विवाह के कारण आप दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रह सकते हैं। आप दोनों नौकरी करते हैं इस के कारण आप दोनों आत्मनिर्भर भी हैं और बिना किसी अन्य की सहायता के एक अच्छा पारिवारिक जीवन बिता सकते हैं। इस में किसी तरह की कोई कानूनी बाधा नहीं है।

प ने उल्लेख किया है कि आप के परिवार वाले इस विवाह से सहमत नहीं हैं। वैसी स्थिति में यदि उन के विरोध का सामना आप दोनों को करना पड़ सकता है। लेकिन चूंकि आप की सहमति है इस कारण से वे कानूनी रूप से या अन्य प्रकार से कुछ भी नहीं कर सकते। उन से तो आप को कोई भय नहीं होना चाहिए।

पकी पत्नी वयस्क है, और खुद नौकरी करती है। वैसी स्थिति में उस के संबंधियों की ओर से भी कानूनी रूप से कुछ किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है। हाँ इतना हो सकता है कि आप की पत्नी के माता-पिता यह कहें कि आप ने उन की पुत्री को बहला फुसला कर यह सब किया। लेकिन जब विवाह हुआ है और उस का पंजीकरण हुआ है तो उन की इस बात को भी विवाह के पंजीकरण के कारण सही नहीं माना जा सकता।

प को अकारण भय हो रहा है। भय का कोई कारण आप की समस्या में दिखाई नहीं दे रहा है। आप दोनों ने विवाह किया है तो साथ रहने की भी हिम्मत करें। पहले अपने रहने का स्थान तय करें, उसे गृहस्थी के लायक बनाएँ और साथ रहने लगें। आप दोनों साथ हैं तो आप का कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। आप दोनों के साथ रहने में किसी तरह की कोई कानूनी समस्या, बाधा या परेशानी नहीं है।

अपने वकील से संतुष्ट नहीं हैं तो तुरंत किसी वरिष्ठ और अनुभवी वकील से मार्गदर्शन प्राप्त करें


 प्रश्न
 मेरा नाम अनिल है,  पति-पत्नी में तलाक के मुकदमे को चलते दो साल हो गएहैं, पति तलाक चाहता है और पत्नी नहीं चाहती और वे दोनों दो साल से अलग रह रहे हैं। क्या उन का तलाक हो सकता है?
उत्तर–
अनिल जी,
प का प्रश्न स्पष्ट नहीं है। आप के प्रश्न से यह तो पता लगता है कि तलाक का मुकदमा अवश्य ही पति ने किया है,  क्यों कि पत्नी तो तलाक चाहती ही नहीं है। इस प्रश्न से यह पता नहीं लगता कि पति को तलाक क्यों चाहिए? और उस ने तलाक के लिए जो अर्जी दी है उस का आधार क्या है? केवल इस तथ्य के आधार पर कि मुकदमा चलते दो वर्ष हो गए हैं यह कैसे निश्चित किया जा सकता है कि तलाक हो सकता है अथवा नहीं। आप के प्रश्न से यह भी स्पष्ट नहीं है कि पति-पत्नी के अलग रहने का आधार क्या है। क्या पति ने पत्नी का त्याग किया है अथवा पत्नी ने पति का त्याग किया है। यदि पत्नी स्वयं ही पति को छोड़ कर चली गई है तो उस के पास उस के अलग रहने का उचित कारण होना चाहिए। यदि उस के पास पति को छोड़ कर चले जाने का उचित कारण नहीं है तो फिर उस का इस तरह पतिगृह छोड़ कर चले जाना निश्चित रूप से अनुचित है और दो वर्ष तक पति का पत्नी द्वारा बिना किसी कारण त्याग कर देना तलाक के लिए उचित आधार है। 
ति ने जो तलाक की अर्जी दो वर्ष पहले दी हुई है निश्चित ही उस में पत्नी द्वारा पति का स्वैच्छा से लंबे समय तक त्याग करना एक आधार नहीं रहा होगा। तो पति को एक आवेदन प्रस्तुत कर अपनी तलाक की अर्जी में संशोधन करवा कर इस आधार को जोड़ना होगा तभी इस आधार पर तलाक की डिक्री अदालत द्वारा पारित की जा सकती है।
लेकिन पति को एक बात का ध्यान रखना होगा कि उस के द्वारा तलाक की अर्जी न्यायालय में प्रस्तुत करना भी पति से अलग रहने का एक उचित कारण हो सकता है, यदि इस बीच पत्नी ने न्यायालय में यह नहीं कहा हो कि वह पति के साथ रहने को तैयार है। यदि उस ने अदालत में यह कहा है कि वह पति के साथ रहने तो तैयार है तो यह आधार निष्फल सिद्ध होगा। पति ने न्यायालय में मुकदमा किया हुआ है तो  उस ने वकील की सहायता भी प्राप्त की होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि पति उस के वकील से संतुष्ट नहीं है।यदी ऐसा है तो उसे तुरंत किसी अन्य वरिष्ठ और अनुभवी वकील से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।  

न्यूनतम मजदूरी बढने से ठेकेदार को घाटा नहीं, लेकिन मजदूरी मजदूरों को मिलती नहीं

भारत संघ बनाम सारस्वत ट्रेडिंग कम्पनी के मुकदमे में सु्प्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि यदि किसी निर्माण कार्य को करने के लिए कोई ठेकेदार नियुक्त किया जाता है और ठेके की अवधि में सरकार न्यूनतम वेतन में वृद्धि कर देती है तो ठेकेदार से उस के लाभों को कम करने के लिए नहीं कहा जा सकता है, चाहे ठेकेदार ने अपने कंट्रेक्ट में उस काम को निश्चित दरों पर करने का वादा क्यों न किया हो। न्यूनतम वेतन में वृद्धि से जितना भार ठेकेदार पर बढ़ता है उस का भुगतान मूल नियोजक द्वारा ठेकेदार को करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूल्यों में वृद्धि के इस युग में मूल्य में वृद्धि सामान्य बात है।

इस तरह अब न्यूनतम वेतन के बढ़ने पर ठेकेदार को किसी प्रकार की हानि होने की संभावना उस के ठेके में नहीं है। लेकिन फिर भी जब तक कंट्रेक्ट पुनरीक्षण नहीं हो जाता है तब तक काम चलता रहता है और ठेकेदार पुरानी दरों से ही मजदूरों और कर्मचारियों को वेतन देता रहता है। कंट्रेक्ट का पुनरीक्षण आम तौर पर ठेके का काम पूरा हो जाने के उपरांत बहुत समय बाद होता है। जिस का नतीजा यह होता है कि जो राशि मजदूरो और कर्मचारियों को वेतन के रूप में मिलनी चाहिए थी वह भी ठेकेदार ही प्राप्त कर लेता है।  इस तरह मजदूरों और कर्मचारियों को उन के हक की राशि नहीं मिल पाती है।


इस का मुख्य कारण है कि ठेके के कामों में जहाँ मजदूर और कर्मचारी अस्थाई रूप से काम करते हैं। मजदूरी देनगी अधिनियम और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अंतर्गत मजदूरों और कर्मचारियों को समय पर कानून के अनुसार मजदूरी भुगतान कराने के लिए श्रम विभाग की मशीनरी पर्याप्त नहीं है।  अनेक मामलों में तो स्थिति यह है कि मजदूरों को पुरानी दर से भी मजदूरी पूरी नहीं दी जाती है और वे उसे प्राप्त करने के लिए भटकते रहते हैं।  कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि वे उस का खर्च उठा कर भी अपनी बकाया  मजदूरी प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं।  न्यायालय में कार्यवाही हो सके इस से पहले ही मंजदूर नए स्थान पर पलायन कर जाते हैं।  न्यायालय निर्णय दे भी देता है तो उस की वसूली असंभव हो जाती है क्यों कि ठेकेदार वह क्षेत्र छोड़ कर अन्यत्र चला जाता है।

सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता किराएदार से परिसर खाली कराने का उचित आधार

हरियाणा से हरीश कुमार पूछते हैं…..
मैं ने एक दुकान एक डेंटिस्ट को सोलह वर्ष पूर्व किराए पर दे रखी है।  यह डेंटिस्ट फर्जी है। मुझे अपने भतीजे को वहाँ नया धंधा कराने के लिए चाहिए।  कृपया मुझे उचित सलाह दीजिए। 

उत्तर……

हरीश जी!

जिस किसी को भी आप ने दुकान दी है। वह जीवन में कभी भी दुकान का मालिक नहीं हो सकता। वह हमेशा ही किराएदार रहता है। प्रत्येक राज्य में किराएदार से परिसर चाहे वह आवासीय हो या व्यावसायिक कुछ विशेष आधारों पर खाली कराए जा सकते हैं।  आप के प्रश्न से स्पष्ट है कि आप के पास दो मजबूत आधार उपलब्ध हैं जिन के कारण आप अपने डेंटिस्ट किराएदार से दुकान खाली करा सकते हैं। पहला आधार तो यह है कि आप को उस व्यावसायिक परिसर की आप के भतीजे के धंधे के लिए सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता है।  दूसरा आधार यह है कि आप का किराएदार आप से किराए पर लिए गए परिसर में अवैधानिक गतिविधियाँ चला रहा है। 

आप को इस के लिए जहाँ परिसर स्थित है, वहाँ का क्षेत्राधिकार रखने वाली दीवानी अदालत या किराया अधिकरण जो भी हो वहाँ एक वाद या अर्जी दाखिल करनी होगी।  इस काम को कोई दीवानी का सिद्ध-हस्त वकील कर सकता है। इस के लिए उसी अदालत में पैरवी करने वाले किसी समझदार और वरिष्ठ वकील से मिल कर अपनी समस्या बताएँ। वह आप की समस्या का हल आप को बता देगा। यदि आप को लगे कि वह उचित  उपाय बता रहा है तो उसे अपना मुकदमा लड़ने के लिए वकील कर लें। हाँ वकील चुनने का काम पूरी सावधानी से करें। उस के बारे में यह जानकारी कर लें कि वह आप का काम कराने के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं।

आप दीवानी कार्यवाही के अतिरिक्त एक काम और कर सकते हैं।  यदि आप का किराएदार डेंटिस्ट फर्जी है तो आप उस की शिकायत पुलिस से कर सकते हैं।  इस से पुलिस उस के विरुद्ध कार्यवाही करेगी और उस का धंधा बन्द हो जाएगा।  इस से आप को उस से अपना परिसर खाली कराने में मदद मिलेगी। यह कोई गलत काम नहीं है क्यों कि कोई भी व्यक्ति जो अवैधानिक काम कर रहा है उस की सूचना पुलिस को देना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।

संपत्ति का स्वामित्व राजकीय रिकार्ड में कैसे दर्ज कराएँ?

 राबिया अछनेरा, आगरा से प्रवीण गोयल पूछते हैं________________

हमारे गाँव में हमारे पूर्वजों द्वारा हमारे स्वामित्व की भूमि पर बनाया गया एक मंदिर है।  जिस की व्यवस्था हमारा परिवार ही देखता आ रहा है।  लेकिन सरकारी रिकार्ड में कहीं भी वह हमारी संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं है।  यह मंदिर किसी अन्य का स्वामित्व भी रिकार्ड में दर्ज नहीं है। हम रिकार्ड में अपना स्वामित्व कैसे दर्ज करवा सकते हैं?

उत्तर____________________

प्रवीण जी,
मंदिर और जिस भूमि पर वह स्थित है वह एक संपत्ति है।  संपत्ति के स्वामित्व का प्रारंभिक महत्वपूर्ण साक्ष्य उस पर लम्बे समय से कब्जा है।  आप के पूर्वजों ने इस मंदिर का उन की स्वयं की भूमि पर निर्माण किया है और तब से ले कर आप का परिवार उस मंदिर की व्यवस्था देखता है।  इस तरह से मंदिर पर आप का कब्जा लम्बे समय स्थापित है।  इस कारण से उस संपत्ति पर आप का कानूनी स्वामित्व भी है। अब केवल इस बात का प्रश्न रह गया है कि राजकीय रिकार्ड में कैसे यह दर्ज हो कि वह संपत्ति आप के स्वामित्व की है?

आप दीवानी अदालत में इस आशय का घोषणा हेतु एक वाद प्रस्तुत कर सकते हैं कि यह मंदिर और इस की भूमि आप के स्वामित्व की है।  एक बार आप दीवानी अदालत के समक्ष अपनी मौखिक साक्ष्य और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कर यह साबित करें कि उस संपत्ति पर आप का लम्बे समय से कब्जा है, आप ही उक्त मंदिर की देखभाल करते आए हैं।  तो दीवानी न्यायालय इस बात की घोषणा की डिक्री पारित कर देगी कि यह संपत्ति आप के परिवार के स्वामित्व की है।  इस घोषणात्मक डिक्री के आधार पर आप राजकीय रिकार्ड में उक्त संपत्ति पर अपने स्वामित्व का अंकन करवा सकते हैं।

दहेज मृत्यु के मामले में अभियुक्त बरी होने पर जब्त जेवर पिता को मिलेंगे या पति को ?

गोविंद कुमार शर्मा पूछ रहे हैं….

दहेज हत्या के आरोप से सास, ससुर सहित सभी अभियुक्त दोष मुक्त हो गए हैं।  दहेज का सामान किसे प्राप्त होगा? मृतका के पिता को या पति को? कृपया नजीरों सहित विस्तार से  समझाएँ। धन्यवाद।

उत्तर…                                                                                                      
गोविंद कुमार जी,
आप का प्रश्न बहुत ही दिलचस्प है।  किसी भी अपराधिक प्रकरण में जब्त की गई संपत्ति का व्ययन करने का अधिकार उसी न्यायालय का है जिस न्यायालय ने मुकदमे का विचारण किया है।  ऐसा कोई निश्चित कानून नहीं है कि किस परिस्थिति में किसे जब्त की गई संपत्ति दी जाए।  लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 452 में जब्त शुदा संपत्ति उस के वास्तविक अधिकारी को देने का अधिकार न्यायालय को प्रदान किया गया है।  मुकदमे का निर्णय होने के उपरांत जो भी व्यक्ति उस संपत्ति के अपनी होने का दावा करता है उसे शीघ्र और मुकदमें में निर्णय होने के छह माह व्यतीत होने के पहले अदालत को आवेदन कर देना चाहिए। न्यायालय स्वयं निश्चित करेगा कि वह संपत्ति किसे प्रदान की जाए।

आप के द्वारा सुझाए गए मामले में जेवरात किसी अभियुक्त से जब्त किए गए हैं तो वह यह दावा कर सकता है कि वह जेवरात मृतका के नहीं अपितु उस के स्वयं के थे और गलत रूप से उस से जब्त कर लिए गए थे।  लेकिन उसे न्यायालय के समक्ष यह साबित करना होगा कि वह जेवरात उसी के हैं।  लेकिन यदि मुकदमें में हुई गवाही में यह स्पष्ट हो गया हो कि जब्त किए गए जेवरात मृतका की संपत्ति जिस में उस का स्त्री-धन भी सम्मिलित है का भाग थे।  तो न्यायालय मृतका के स्वाभाविक उत्तराधिकारी को वह संपत्ति कब्जे में दे देगा।  अब मृतका की संपत्ति का उत्तराधिकारी मृतका पर लागू उत्तराधिकार की विधि से तय होगा।  हिन्दू विधि के अनुसार किसी भी मृत महिला के उत्तराधिकारी सब से पहले उस की संताने हैं, उन के उपरांत उस के पति के उत्तराधिकारी हैं, उन के उपरांत माता-पिता हैं और उन के उपरांत पिता के उत्तराधिकारी हैं और उस के उपरांत माता के उत्तराधिकारी हैं।  ऐसी परिस्थिति में न्यायालय के समक्ष जो भी दावेदार होगा या होंगे तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय निर्णय करेगा।

इस मामले में कोई सीधी नजीर दे पाना संभव नहीं हो रहा है।  लेकिन कुछ मामलों में जहाँ अभियुक्तों को दोष मुक्त कर दिया गया वहाँ परिवादी द्वारा जब्त संपत्ति उस के कब्जे में देने का आवेदन किया गया था। आवेदनों को विचारण न्यायालय और अपील न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया गया।  उच्च न्यायालय ने यह कहा कि किसी भी अभियुक्त ने संपत्ति को अपना होना नहीं कहा है इस लिए संपत्ति को परिवादी को देना उचित होगा।

विक्रय-पत्र या अन्य विलेख में त्रुटि हो जाने पर सुधार-विलेख (Correction Deed) पंजीकृत कराएँ

साधना ने पूछा है…

मैं ने एक जमीन खरीदी है।  मेरी रजिस्ट्री गलती से 9 बिस्वा की हो गई जब कि मेरे पास 10 बिस्वा जमीन है और मेरे पुराने पेपर्स में भी 11 बिस्वा जमीन है।  अब मेरे पास पड़ौसी ने कोर्ट केस किया है कि मैं ने सरकारी जमीन और रास्ता कब्जा किया है।  उस ने हम पर झूठा दीवानी मुकदमा भी किया है।  कृपया मुझे सलाह दीजिए कि क्या क्या करना पड़ेगा।   धन्यवाद!

उत्तर                                                                                                       
साधना जी,
आप के प्रश्न से यह पता नहीं लग रहा है कि आप की जमीन किस किस्म की है?  वह कृषि भूमि है अथवा आबादी या नगरीय भूमि है?  जिस तरह से आप ने उस के क्षेत्रफल का उल्लेख किया है वह कृषि भूमि दिखाई देती है।  लेकिन प्रश्न से यह प्रतीत हो रहा है जैसे वह आबादी या नगरीय भूमि है।

आप ने यह भी नहीं बताया कि पड़ौसी ने सरकारी जमीन और रास्ते के संबंध में कोर्ट केस किस अदालत में किया है और दीवानी मुकदमा क्या है।  कुल मिला कर आप का प्रश्न बहुत ही कम जानकारियों के साथ है।   जिस के कारण बहुत सटीक सलाह दे पाना संभव नहीं हो पा रहा है।

आप ने उल्लेख किया कि आप के पुराने दस्तावेजों  में 11 बिस्वा भूमि का उल्लेख है तो आप ने इस भूमि को खरीदने के लिए जो विक्रय पत्र लिखवा कर रजिस्ट्री करवाया है, वह 11 बिस्वा भूमि का ही करवाना चाहिये था।  यदि मौके पर केवल 10 बिस्वा भूमि ही हो तब भी 11 बिस्वा भूमि का ही उल्लेख इस विक्रयपत्र में होना चाहिए था।  जिस से कभी नाप होने पर पता लगने पर कि शेष 1 बिस्वा भूमि कहाँ है? उस के संबंध में दावा कर उसे वापस हासिल किया जा सके।

आप ने जिस से उक्त भूमि खरीदी है, उस ने पूरी 11 बिस्वा भूमि आप को विक्रय की है, या उस का आशय ऐसा ही था।  तो इस का अर्थ यह है कि विक्रय पत्र में गलती से 11 बिस्वा के स्थान पर 9 बिस्वा लिखने में आ गया है। यदि किसी विक्रय पत्र में या किसी भी अन्य विलेख में कोई त्रुटि हो जाती है और उस का पंजीयन  हो जाता है तो उस विलेख में हुई गलतियों को ठीक करने के लिए सुधार-विलेख (Correction Deed) लिख कर उस का पंजीयन कराने का तरीका विद्यमान है। आप विक्रेता से बात कीजिए, और कहिए कि गलती से विक्रय पत्र में 11 बीघा के स्थान पर 9 बीघा लिखने में आ गया है इसे ठीक करवाइए।  विक्रेता से बात हो जाने पर जिस वकील/ड्राफ्ट्समैन से आप ने पहले विक्रयपत्र लिखवा कर पंजीकृत करवाया था उस से मिलिए वह एक सुधार-पत्र (Correction Deed) तैयार कर देगा और विक्रेता से हस्ताक्षर करवा कर उसी उप पंजीयक के कार्यालय में इस सुधार-पत्र (Correction Deed) को रजिस्टर्ड करवा देगा।   इस से आप के पास पूरी 11 बिस्वा जमीन के स्वामित्व का विलेख हो जाएगा जिन के आधार पर आप अपने मुकदमे लड़ सकते हैं।

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पहले माँ के हाजिर न होने से खारिज दुर्घटना दावा क्या अब 18 वर्ष बाद चल सकता है?

प्रीति शुक्ला पूछती हैं…..

लगभग 18 साल पहले मेरे पिताजी का रोड एक्सीडेंट में देहान्त हो गया।  तब मैं लगभग 3 वर्ष की थी।   माँ मुझे ले कर नानी (माँ के मायके) के यहाँ आ कर रहने लगी।  जिस वैन से मेरे पिता जी का एक्सीडेण्ट हुआ था उस वैन को पुलिस द्वारा पकड़ा भी गया  था और क्लेम के लिए सम्बन्धित कोर्ट में मुकदमा भी चलाया गया था। परन्तु मेरी माँ अकेले होने के कारण ज्यादा दौड़ भाग नहीं कर सकी और मुकदमा दो-तीन साल के बाद रुक गया।   क्या ये मुकदमा पुनः चल सकता है?  यदि हाँ, तो मुझे और मेरी माँ को क्या करना होगा?  मुझे उचित सलाह देने की कृपा करें, मैं आप की बहुत आभारी रहूँगी।  कृपा कर के जवाब जल्दी से जल्दी देना। आप की अति महान कृपा होगी। 
( यह मेल मैं अपनी सहेली की सहायता से भेज रही हूँ)

उत्तर

प्रीति बहन!
यह पत्र आप का है या आप की मित्र का यह पता नहीं लग पा रहा है।  लेकिन यह उत्तर आप की ही समस्या मान कर दिया जा रहा है।

आप का मुकदमा नए सिरे से किया जा सकता है।  लेकिन यह देखना होगा कि जिस वैन से टक्कर हुई थी उस का जिस दिन दुर्घटना हुई थी उस दिन बीमा था या नहीं।  यदि बीमा हुआ तो मुआवजा मिलना आसान होगा, अन्यथा कुछ कठिन अवश्य हो जाएगा।

पहले कानून में यह बाधा थी कि मोटर एक्सीडेण्ट का मुकदमा दुर्घटना के बाद एक निश्चित अवधि तक ही पेश किया जा सकता था।  लेकिन अब बाधा नहीं है।  मुकदमा कभी भी पेश किया जा सकता है।  पहले किया हुआ मुकदमा आप की माता जी के उपस्थित न होने से खारिज हो गया होगा।  तो भी आप नए सिरे से यह मुकदमा दायर करवा सकती हैं।  आप यह मुकदमा उस क्षेत्र के मोटर दुर्घटना अधिकरण  में पेश कर सकती हैं जहाँ आप खुद रहती हैं।  इस के लिए आप को अदालत में पेशियों पर उपस्थित भी नहीं होना पड़ेगा।

आप को करना यह होगा कि जिस पुलिस थाने ने दुर्घटना कारित करने वाली वैन को पकड़ा था वहाँ से पता करना होगा कि वैन के ड्राइवर के विरुद्ध आरोप पत्र किस अदालत में पेश किया गया था।  वहाँ ड्राइवर के विरुद्ध मुकदमा चला होगा।  उस मुकदमें में पेश आरोप पत्र और उस के साथ संलग्न दस्तावेजों की नकलें लेनी पड़ेंगी।  उन के आधार पर क्लेम मुकदमा हो जाएगा। 

आप को अपने क्षेत्र की मोटर दुर्घटना के दावे सुनने वाले अधिकरण ( न्यायालय) में दावे लड़ने वाले किसी वकील से संपर्क करना चाहिए।  उस से मुकदमा दायर करने की फीस तय कर लेनी चाहिए।  आम तौर पर इस तरह के मुकदमे लड़ने वाले वकील फीस तभी लेते हैं जब दावे में निर्णय हो जाने पर दावेदार को पैसा मिल जाता है।  यह फीस स्थान भेद से 10 से 15 प्रतिशत होती है।  प्रारंभ में वकील को केवल दावा करने का खर्च ही देना पड़ता है।  जो लगभग एक-दो हजार रुपया होता है।  यह खर्च मुकदमे के लिए आवश्यक द्स्तावेज एकत्र करने और दावा पेश करने में होता है। 

आप वकील से संपर्क करें और जल्दी ही दावा पेश कराएँ।  फिर भी आप को किसी प्रकार की परेशानी हो तो आप तीसरा खंबा से सलाह कर सकती हैं। 

कोई दफ्तर के मामले में लड़की को परेशान करे तो क्या करें?

भारत बंजारा पूछते हैं 

जब कोई व्यक्ति किसी लड़की को ऑफिशियल मैटर में परेशान करता है तो क्या करना चाहिए? 

उत्तर 

बंजारा जी,
सब से पहले तो आप को धन्यवाद दूं कि आप ने आज तक का सब से छोटा सवाल तीसरा खंबा की कानूनी सलाह सेवा पर पूछा है।

आप के सवाल से कुछ भी पता नहीं लग रहा है। परेशान करने से आप का क्या तात्पर्य है? लड़की क्या किसी ऑफिस में काम करती है? या फिर उसे किसी ऑफिस में काम पड़ा है और वहाँ उसे परेशान किया जा रहा है? परेशान करने वाला व्यक्ति उस का अधिकारी है या फिर कोई ऑफिस का कोई कर्मचारी उसे परेशान कर रहा है? या ऑफिस के बाहर का व्यक्ति उसे परेशान कर रहा है?

अब आप कहेंगे कि एक प्रश्न का उत्तर देने के बजाए मैं ने खुद आप से बहुत से सवाल कर दिए हैं।

बात यह है कि जब तक मामले के सारे जरूरी तथ्य सामने नहीं हो कोई भी कानूनी सलाह नहीं दी जा सकती है। इसलिए कृपया पहले आप अपनी समस्या के तथ्यों को ठीक से सामने रखें जिस से उन का कोई कानूनी हल या उपाय आप के सामने रखा जाए। आशा है आप अपनी समस्या को विस्तार से तथ्यों सहित सामने रखेंगे।

मैं यह बात आप को ई-मेल से भी पूछ सकता था। लेकिन तीसरा खंबा को अनेक प्रश्न इसी तरह बिना किसी तथ्यों के प्राप्त हो रहे हैं जिन का उत्तर दे पाना संभव नहीं होता। उन से तथ्य मांगे जाते हैं। तथ्य मिलने पर सब को उन की आवश्यकता के अनुरूप सलाह दे दी जाती है। यहाँ इस प्रश्न को और सलाह देने में उपस्थित हमारी समस्या को इसी लिए रखा गया है जिस से अन्य प्रश्न कर्ता भी संपूर्ण तथ्यों सहित प्रश्न को रखें। जितने अधिक तथ्य सामने होंगे सलाह भी उतनी ही सही, सटीक और उपयोगी हो सकेगी।

आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

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