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पाठक अपनी समस्याएँ प्रेषित करते समय अपना ई-पता सही सही अंकित करें …

प्रिय  पाठकों¡

            हमें प्रतिदिन 15 से 20 समस्याएँ पाठकों से समाधान हेतु कानूनी सलाह फार्म पर प्राप्त होती हैं। हम उन में से एक चुनिन्दा समस्या को समाधान हेतु प्रतिदिन प्रकाशित करते हैं। हमारा प्रयत्न होता है कि हम शेष सभी पाठकों को ई-मेल द्वारा समाधान सुझाएँ। लेकिन अनेक समस्याओं के साथ ई-मेल ठीक से लिखा नहीं होता है, या गलत लिखा होता है। जिस के कारण उन्हें सुझाए गए समाधान उन तक नहीं पहुँचते और भेजा गया मेल अनडिलीवर्ड वापस आ जाता है। इस के कारण जरूरी है कि पाठक अपनी समस्या भेजते समय ई-पता बिलकुल सही अंकित करें। हमें अपना नाम, जिले व राज्य का नाम भी सही सही सही बताएँ और समस्या जिस राज्य और जिले से संबंधित है उसे भी बताएँ। समस्या का विवरण ठीक से लिखें। घटनाओं की तिथियाँ सही सही लिखें। जिस से हम समस्या का समाधान ठीक से सुझा सकें। यदि कोई यह चाहे कि उस की समस्या यहाँ प्रकाशित न की जाए तो उस का उल्लेख भी कर दें।

आज ऐसी ही कुछ समस्याओँ का हम संक्षिप्त समाधान यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। भविष्य में ऐसी समस्याओं का समाधान हम नहीं दे सकेंगे। किसी व्यक्ति की समस्या का समाधान यदि दो सप्ताह में न मिले और प्रकाशित भी न हो तो वह अपनी समस्या में विवरण की कमी पर ध्यान दे कर दुबारा प्रेषित करे।

समस्या-1

राम ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी द्वितीय श्रेणी अध्यापक थे, उन की सेवा काल में मृत्यु हो गयी। अनुकंपा नियम के अन्तर्गत मैं पिताजी के स्थान पर नौकरी के लिए आवेदन करता लेकिन मेरी पत्नी सरकारी सेवा में है तो क्या अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र हूँ? पिताजी की सेवा पुस्तिका मैं माताजी, मैं और मेरी बहिन आश्रित हैं, उन में मेरा नाम नहीं है। आप बताएँ मैं क्या करूँ?

समाधान-

आप अनुकंपा नौकरी हेतु आवेदन करने के पात्र हैं और आप को नौकरी मिल सकती है। यदि परिवार में कोई अन्य व्यक्ति इस योग्य नहीं है तो आप को यह आवेदन अवश्य करना चाहिए।

समस्या-2

हनुमान ने पचार, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

समाधान-

मुझे पैरामिलीटरी फोर्स से 124 दिन अवकाश से लेट होने के कारण डिसमिस कर दिया गया है, क्या अब मैं दूसरी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकता हूँ।

आप किसी अन्य राजकीय सेवा के लिए आवेदन कर सकते हैं। आप को पैरा मिलीटरी फोर्स के कठोर सेवा नियमों की पालना न कर पाने के कारण सेवा से पृथक किया गया है। जो हो सकता है डिसमिसल नहीं हो कर स्वैच्छा से सेवा त्याग हो। यदि आप को आरोप पत्र जारी कर दंडित नहीं किया गया है तो नौकरी में पूर्व सेवा के कारण कोई परेशानी नहीं होगी। बस इतना करें कि पूर्व नौकरी और वहाँ से सेवा से हटाने का कारण जानबूझ कर न छिपाएँ।

समस्या-3

रितेश ने बैकुंठपुर, छतीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा इस केस में बहुत परेशान है।  टेंसन के कारण खाना पीना नही खाते हैं। कृपया मेरे पापा की समस्या का समाधान करें । मेरे पापा लोग तीन भाई है । मेरे पापा उनमें सबसे छोटे है। हमारे दादा जी के पास कुल 28 एकड़ जमीन है। जिसमे खेती की जाती है। दादा जी के देहांत के बाद बड़े चाचा पूरी ज़मीन की देख-रेख करते थे। अब पापा ने जमीन मांगी तो बोलते हैं नहीं दूंगा। पॉवर ऑफ एटार्नी से पूरी जमीन अपने नाम पर करवा लिए हैं वो। केस चल रहा है, पूरी जमीन में स्टे लगवा सकते हैं कि नहीं ये जानना था। हमारे वकील बोलते हैं कि मैं ये कर रहा,वो कर रहा, लेकिन कुछ करते नही हैं। कृपया समाधान बताएँ बहुत परेशान है हम सब।

समाधान-

आप के पिताजी ने न्यायालय में मुकदमा किया हुआ है। इस मुकदमे में न्यायालय रिसीवर की नियुक्ति कर सकता है। यदि आपका वकील ठीक से ध्यान नहीं दे रहा है तो किसी अन्य स्थानीय वकील से सलाह करें और वह कहे कि वह यह काम करवा देगा तो अपने वर्तमान वकील के साथ उसे भी अपना वकील नियुक्त करें और रिसीवर नियुक्ति के लिए आवेदन दे कर उसे निर्णीत कराएँ। यदि न्यायालय रिसीवर नियुक्त न करे तो उस आदेश के विरुद्ध रिवीजन या अपील जो भी हो सकती हो वह ऊपरी अदालत को कराएँ।

बिना पर्याप्त विवरण के किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

rp_husband-wife.jpgसमस्या-

अतुल ओडेरा ने पोरबन्दर, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

મેરા નામ અતુલ હે ઔર મે ગુજરાત સે હુ. મેરી શાદિ કો ૩ સાલ હુએ હૈ ઔર એક બેટા હે ૧ સાલ કા. મેરી પત્નિ કો અબ મેરે સાથ નહિ રેહના હે ઉસે સિર્ફ અલગ રેહકર પૈસો સે મતલબ હે. મે અપને બેટે કે લીયે અપની પત્નિ સે અલગ નહિ હોના ચાહતા પર ઉસે સિર્ફ પૈસે ચાહિયે સાથ નહિ રેહના ચાહ્તી ઔર ઉસને ભરણ પોશણ કા કેસ કર દિયા હે. ક્રુપિયા કુછ ઉપાય બતયે મે ક્યા કરુ.

मेरा नाम अतुल है और मैं गुजरात से हूँ। मेरी शादी को 3 साल हुए हैं और मेरा एक बेटा है, एक साल का। मेरी पत्नी को अब मेरे साथ नहीं रहना है उसे सिर्फ अलग रह कर पैसों से मतलब है। मैं अपने बेटे के लिए अपनी पत्नी से अलग नहीं होना चाहता पर उसे सिर्फ पैसे चाहिए, साथ नहीं रहना चाहती। उस ने भरण पोषण का केस कर दिया है। कृपया कुछ उपाय बताएँ, में क्या करूँ।

समाधान-

ह आप का आकलन है कि आप की पत्नी को सिर्फ पैसे चाहिए और वह आप के साथ नहीं रहना चाहती है। आखिर कोई तो कारण होगा जिस के कारण वह आप के साथ नहीं रहना चाहती है। नहीं रहने का कोई तो कारण बताती होगी। जब तक आप अपनी पत्नी का आप के साथ नहीं रहने का वास्तविक कारण न जान लें और उस का निदान करने का प्रयत्न न करें ऐसी समस्या तो आप के सामने आएगी ही। आप को अपनी पत्नी से तसल्ली से बात करनी चाहिए। यदि आपस में बात करने का अवसर न मिलता हो तो किसी मध्यस्थ के माध्यम से बात करें अन्यथा किसी काउंसलर की मदद लें।

प ने अपनी समस्या के आवश्यक विवरण भी नहीं बताए कि पत्नी ने भरण पोषण का मुकदमा कहां किया है? कितना भरण पोषण मांगा है? वह अभी आप के साथ रह रही है अथवा अलग रह रही है। यदि अलग रह रही है तो आप के नगर में है अथवा अपने मायके में या कहीं और? यदि अलग रह रही है तो अलग रहने का कारण अपने आवेदन में क्या बताया है? और आप का बच्चा आप के साथ है या पत्नी के साथ है। इस सारे विवरण के बिना तो कोई अवतार भी शायद ही आप की समस्या का कोई ठीक-ठाक हल भी नहीं बता पाएगा।

त्नी और आप के बीच कोई न कोई समस्या तो है जरूर, पर शायद उसे आप नहीं बताना चाहते। यदि कोई मरीज अपना मर्ज छुपाएगा तो कोई भी डाक्टर उस का इलाज नहीं कर सकता। यदि उस ने कोई कारण नहीं बताया है तो आप सीधे कह सकते हैं कि वह स्वयं आप के साथ बिना किसी कारण नहीं रहना चाहती ऐसी स्थिति में वह भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

प्रतिदिन आप की ही तरह बिना किसी विवरण के लोग हमें समस्याएँ भेजते हैं। हम उन समस्याओं का हल नहीं कर सकते, क्यों कि वास्तव में पूरी समस्या हमारे पास पहुँचती ही नहीं है तो हम हल कैसे सुझाएँ? फिलहाल आप के विरुद्ध जो मुकदमा भरण पोषण के लिए हुआ है उस में किसी स्थानीय वकील से राय करें और मुकदमा ठीक से लड़ें। इस के अतिरिक्त कोई अन्य सुझाव हम आप को या अन्य उन लोगों को नहीं दे सकते जो आप की तरह बिना विवरण की समस्या हमें प्रेषित करते हैं।

अनुकंपा नियुक्ति के लिए मना कर देने पर उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करें

समस्या-

मेरी माताजी केंटोनमेंट बोर्ड में सरकारी नौकरी करती थीं। उन का देहान्त दिनांक 20.12.2008 को हो गया है दिनांक 03.02.2009 को मैं ने अनुकम्पा के आधार पर नौकरी में नियुक्ति हेतु प्रार्थना पत्र दिया था। लेकिन केंटोनमेंट बोर्ड के सीईओ ने दिनांक 01.12.2011 को एक पत्र द्वारा सूचित किया है कि शासन ने ग्रुप डी में अनुकंपा नियुक्ति बंद कर दी है। मुझे क्या करना चाहिए?

-राजू पटेल, कानपुर, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प को केंटोनमेंट बोर्ड के लिए अनुकंपा नियुक्ति के नियमों का पता लगा कर उन का अध्ययन करना चाहिए और अपने पास के किसी ऐसे वकील से सलाह करनी चाहिए जो सेवा संबंधी मामंलों में पैरवी करते हों।

रकार एक तरफा तरीके से अपने कर्मचारियों के अन्य वर्गों के लिए अनुकंपा नियुक्तियाँ जारी रखते हुए किसी एक वर्ग के लिए अनुकंपा नियुक्तियों को बन्द नहीं कर सकती। यदि सरकार ने इस तरह का कोई आदेश दिया भी है तो उसे उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।

प को दिनांक 01.12.20011 के सीईओ के पत्र के आधार पर इस मामले में अनुकम्पा नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए।

पुलिस की मदद से किराए पर दिया कमरा खाली नहीं करवाया जा सकता

समस्या-

मने एक कमरा किराये पर दिया हुआ है ( ५-६ साल से ) ! शुरू के तीन चार वर्ष तो वो किराया समय पर देता रहा किन्तु अब न तो वो किराया ही समय पर देता है और न ही जगह खाली कर रहा है ! अब तो पिछले पांच महीनों से उसने किराया नहीं दिया है ! किरायेनामे में साफ़ लिखा है कि किराया न देने कि सूरत में उसे जगह खाली करनी होगी ! मुझे आपसे इस विषय पर राय चाहिए थी कि क्या हम किरायेनामे के आधार पर पुलिस कि मदद से जगह खाली करवा सकते हैं या फिर हमें अदालत में उस पर केस करना होगा ??? और यदि हम उस पर केस कर भी देते हैं तो क्या किराया न देने के आधार पर जगह खाली हो सकती है और वो भी कितनी देर में ??? कृपया उचित मार्गदर्शन करें !!!

-विवेक सिंह, लुधियाना, पंजाब

समाधान-

प ने कमरा किराए पर दिया है। आप दोनों के मध्य मकान मालिक व किराएदार का संबंध है। आप अपने किराएदार से मकान या तो उस की सहमति से खाली करवा सकते हैं या न्यायालय से डिक्री प्राप्त कर उस का निष्पादन करवा कर ही मकान खाली करवा सकते हैं। पुलिस आप की मदद सिर्फ तभी कर सकती है जब आप न्यायालय से कमरा खाली करवा लेने की डिक्री प्राप्त कर लें और वह अपील न करने के कारण या अपील न्यायालय से किराएदार की अपील खारिज हो जाने पर अंतिम हो जाए और आप निष्पादन कार्यवाही में न्यायालय से पुलिस मदद प्राप्त करने का आदेश प्राप्त कर लें। इस के पहले आप किराएदार से कमरा खाली नहीं करवा सकते

प के किराएदार ने पाँच माह से किराया नहीं दिया है। आप को चाहिए कि छह माह का किराया बकाया होने पर आप किराएदार को कानूनी नोटिस दे दें कि उस ने छह माह से किराया न दे कर किराया अदायगी में छह माह तक लगातार चूक की है और वह पन्द्रह दिनों में कमरा खाली कर के आप को सौंप दे अन्यथा आप कमरा खाली कराने के लिए न्यायालय में मुकदमा दायर करेंगे। अच्छा हो कि यह नोटिस आप किसी ऐसे वकील से दिलवाएँ जो किराएदारी के मुकदमों को लड़ने का अनुभव रखता हो। इस नोटिस के बाद उस के देने पर भी किराया न लें। मनिआर्डर से भेजने पर मनिआर्डर को भी वापस लौटा दें। यदि आप ने किराया प्राप्त कर लिया तो यह माना जाएगा कि आप ने उस के द्वारा किराया अदायगी में की गई चूक को माफ कर दिया है। जब आप द्वारा दिए गए कानूनी नोटिस की अवधि समाप्त होने पर मुकदमा अवश्य दाखिल कर दें।

प ने पूछा है कि मुकदमे के माध्यम से कितने दिन में कमरा खाली हो जाएगा? आप का यह प्रश्न बिलकुल बेमानी है। एक तो किसी भी मुकदमे की अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि जिस अदालत में आप का मुकदमा दर्ज होगा उस अदालत की स्थिति क्या है? उस में कितने मुकदमे लंबित हैं? आदि आदि। यूँ आम तौर पर भारत में अदालतों की संख्या बहुत कम है। यदि आप तीसरा खंबा का पिछला आलेख पढ़ेंगे तो आप को पता लगेगा कि भारत में दस लाख की आबादी पर केवल 13.5 जज हैं। जब कि विकसित देशों में दस लाख की आबादी पर जजों की संख्या 140 से 150 तक की है। इस कारण भारत में न्याय प्राप्त करने में देरी लगना स्वाभाविक है। देरी तो आप को लगेगी। आप इस काम के लिए जो वकील करेंगे वह आप को बता देगा कि जिस अदालत में मुकदमा लगेगा उस में निर्णय अक्सर कितने समय में हो जाते हैं। वह उस के बाद अपील में लगने वाला संभावित समय भी बता देगा। लेकिन आप को पास मुकदमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कमरा सिर्फ और सिर्फ मुकदमा दाखिल कर के प्राप्त की गई डिक्री के आधार पर ही खाली कराया जा सकता है। इस लिए जरूरी यह है कि यह सोचनें में समय व्यर्थ न किया जाए कि मुकदमा करने पर कितने दिन में कमरा खाली होगा। क्यों कि जितने दिन आप यह सोचने में बिताएंगे उतना समय और बढ़ जाएगा। आप को छह माह का किराया बकाया होते ही मुकदमा करने की प्रक्रिया आरंभ कर देनी चाहिए। हो सकता है नोटिस पर ही अथवा मुकदमा दाखिल होने पर ही किरायेदार कमरा खाली कर दे।

संयुक्त स्वामित्व के भूखंड का विभाजन हो कर ही उन का पृथक सीमांकन हो सकता है

समस्या-

गाँव में हमारा एक भूखंड 0.61 हैक्टर का है जिस में मैं 1/2 हिस्से का तथा 1/2 हिस्से का हिस्सेदार दूसरा व्यक्ति है। मेरी सीमा में लगभग 12 मीटर मेरे हिस्से की जमीन में कब्जा कर लिया है। मैं ने चार माह पूर्व सीमा ज्ञान करवाया था परंतु पटवारी ने मेरे हिस्से की जमीन कहाँ तक है उस का सीमा ज्ञान करवाने से इन्कार कर दिया जब कि मैं तहसील से आदेश पत्र ले कर आया था। कृपया सुझाएँ कि  मेरी समस्या का समाधान कैसे हो सकता है?

-विनोद कुमाँवत, ग्राम-गुढ़ा गौर जी, राजस्थान

समाधान-

प ने अपनी समस्या को अत्यन्त संक्षेप में रखा है। आप के द्वारा दिए गए विवरण से पता लगता है कि जिस भूखंड की आप बात कर रहे हैं वह कृषि भूमि का टुकड़ा है। इस भूखंड का एक ही सम्मिलित खाता है। इस भूमि के दो हिस्सेदार हैं जो उस भूमि के संयुक्त रूप से स्वामी हैं। हो सकता है उस भूखंड पर आप दोनों संयुक्त स्वामियों ने स्वैच्छा से अपने अपने हिस्से निर्धारित कर लिए हों और उस पर अलग अलग खेती कर रहे हों या करवा रहे हों। लेकिन राजस्व विभाग की दृष्टि में यह भूखंड एक ही है और उस के दो टुकड़ों की पैमायश राजस्व अभिलेख में अंकित नहीं है। एक पटवारी केवल राजस्व अभिलेख में अंकित भूमि सीमाओं का नाप और सीमांकन कर सकता है। आप के व्यक्तिगत अभिलेख का उस की दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है।

दि आप अपना अलग हि्स्सा चाहते हैं तो आप को अपने भागीदार के साथ आपस में बँटवारा विलेख निष्पादित कर उसे राजस्व रिकार्ड में अंकित करवाना पड़ेगा। सामान्य भाषा में इसे खाता फटवाना कहते हैं। यदि आप का भागीदार और आप बँटवारे के बारे में आपस में सहमत न हों तो आप स्वयं भूमि का विभाजन करने तथा अलग अलग हिस्सों का अंकन कर के उस पर स्वतंत्र कब्जा दिलवाने का दावा सक्षम क्षेत्राधिकार के राजस्व न्यायालय में कर सकते हैं। न्यायालय द्वारा विभाजन कर दिए जाने पर अलग अलग सीमांकन हो जाएगा और आप का कब्जा अपने स्वतंत्र हिस्से पर मिल जाएगा। तब आप अपने हिस्से की भूमि का पृथक से सीमांकन करवा कर वहाँ सीमाचिन्ह बनवा सकते हैं।

औद्योगिक विवाद को स्थानान्तरित करवाने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत की जा सकती है

सभी पाठकों और मित्रों का विधि और न्याय प्रणाली पर प्रथम हिन्दी जालस्थल तीसरा खंबा पर स्वागत है

सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ !

नया वर्ष सभी के लिए नयी खुशियाँ लाए !!

समस्या-

मैं एक समाचार पत्र में सीनियर एकजीक्यूटिव के पद पर सेवारत हूँ। मेरा कार्य विज्ञापन विभाग में आने वाले विज्ञापन आदेशों को प्राप्त करना आदि है। मुख्यतः मेरा काम लिपिकीय है। मुझे मेरी ट्रेड यूनियन गतिविधियों के कारण मेरे नियोजक ने मेरठ से पटना स्थानान्तरित कर दिया है। इस का विवाद मेरी यूनियन ने श्रम विभाग उत्तर प्रदेश के मेरठ कार्यालय में उठाया था। समझौता कार्यवाही असफल हो जाने पर रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रेषित की गई थी। इस पर राज्य सरकार ने मेरे स्थानान्तरण का विवाद श्रम न्यायालय लखनऊ को न्याय निर्णयन के लिए संप्रेषित कर दिया। जब कि मेरठ में भी उत्तर प्रदेश सरकार का श्रम न्यायालय मौजूद है। मेरी यूनियन राज्य सरकार को उक्त विवाद को श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करने के लिए आवेदन कर दिया है, तथा तीन बार उस का स्मरण पत्र लिख चुकी है। लेकिन राज्य सरकार कोई निर्णय नहीं कर रही है। मुझे अपना विवाद श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करवाने के लिए क्या करना चाहिए?

-दिनेश कुमार, मेरठ उत्तर प्रदेश

सलाह-

राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह राज्य में उत्पन्न ऐसे औद्योगिक विवाद को जिस पर उसे क्षेत्राधिकार प्राप्त है। राज्य के किसी भी श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण को न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित कर सकती है। लेकिन राज्य सरकार का यह अधिकार न्यायोचित होना चाहिए। आप विवाद के पूर्व मेरठ में नियोजित थे तथा मेरठ में आप के नियोजक का कार्यालय है। विवाद को मेरठ के श्रम विभाग के मेरठ कार्यालय में ही उठाया गया था और समझौता कार्यवाही भी वहीं संपन्न हुई थी। मेरठ में राज्य सरकार का श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण होने के कारण राज्य सरकार के लिए न्यायोचित यही होता कि वह आप के औद्योगिक विवाद को मेरठ के श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण को ही न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित करती। इस संदर्भ में राज्य सरकार के इस निर्णय को न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह आप की यूनियन के आवेदन पर उक्त विवाद को लखनऊ के न्यायालय से श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ को स्थानान्तरित कर दे।

मेरी राय में आप को राज्य के सचिव श्रम विभाग को व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी बात कहनी चाहिए और उन्हें इस बात से संतुष्ट करना चाहिए कि आप का विवाद मेरठ स्थानान्तरित कर दिया जाए। व्यक्तिगत रूप से मिलने से यह काम हो जाएगा। यदि इस पर भी राज्य सरकार आप के विवाद को मेरठ स्थानान्तरित नहीं करती है तो आप न्याय प्राप्ति के लिए एक पंजीकृत नोटिस सचिव श्रम विभाग राज्य सरकार उत्तर प्रदेश को भिजवाएँ जिस में आप के स्थानान्तरण आवेदन पर निर्धारित समय (15 दिन) में निर्णय करने की बात कहें और यह अंकित करें कि इस अवधि में आप के आवेदन पर मामले को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ स्थानान्तरित नहीं किया गया तो आप उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करेंगे।

दि आप के इस नोटिस की अवधि के समाप्त होने तक भी आप का विवाद स्थानान्तरित नहीं किया जाता है तो आप को उच्च न्यायालय लखनऊ बैंच में अथवा उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए। उच्च न्यायालय आप के विवाद को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण में स्थानान्तरित करने का आदेश राज्य सरकार को दे सकता है।

अपराध का प्रायश्चित करें या दण्ड भुगतें

समस्या 

 मैं एक फोटोकॉपी की दुकान पर चार वर्ष से काम करता हूँ। दुकान की एक फोटोकॉपी मशीन एक निजी टेलीकॉम कंपनी में लगी हुई है जहाँ पर मैं काम करने जाता हूँ। पिछले दो सालों से मैं रोज दुकान से फोटोकॉपी का पेपर और मशीन का टोनर ले कर आता था और मैं ने धीरे-धीरे पेपर और टोनर चुराना आरंभ कर दिया। मैं चुराया हुआ पेपर और टोनर घर ले जा कर रख देता था। करीब 30,000/- रुपए का माल इकट्ठा हो गया था मैं ने उसे बेच दिया।  इस काम में मेरी दो दोस्तों ने मदद की। अब दोनों दोस्त मुझ से आधा हिस्सा मांग रहे हैं। मना करने पर वे मेरे घर और दुकान पर बताने की धमकी देते हैं। आप बताएँ मुझे क्या करना चाहिए?

-नीतेश नन्दवाल, इन्दौर

 सलाह-

 प अच्छी तरह जान रहे हैं कि आप ने चोरी की है। चोरी एक अपराध है जिस के लिए आप को कानून द्वारा दंडित किया जा सकता है। आप बाजार में नौकरी करते हैं और आप ने सम्मान अर्जित किया है। चोरी की वारदात खुलते ही आप का सम्मान मिट्टी में मिलना तय है। फिर आप को कोई नौकरी भी न देगा। जिन लोगों ने आप को चोरी में सहयोग किया है वे भी आप के समान ही दंड के भागीदार हैं। निश्चित रुप से उन्हों ने आप के काम में सहायता की है तो उस के लाभ में वे हिस्सा भी मांगेंगे। यदि आप उन्हें हिस्सा दे देंगे तब भी वे आप के राज को जान गए हैं और आप को भविष्य में भी ब्लेकमेल करते रहेंगे। इस तरह आप उन्हें हि्स्सा दे कर भी बच नहीं सकेंगे। धीरे-धीरे आप स्थाई रूप से अपराध जगत का हिस्सा बन जाएंगे और फिर हो सकता है आप की आधा जीवन जेल जाने और आने में ही बीत जाए। निश्चित ही आप बहुत बड़ी मुसीबत में हैं। इस मुसीबत से निकलने का सिर्फ और सिर्फ एक मार्ग है। आप प्रायश्चित करने को खुद को तैयार करें। इस के लिए आप को बहुत साहस की आवश्यकता होगी। लेकिन एक बार आप ने प्रायश्चित किया तो आप खरा सोना बन सकते हैं।

 

 आप का नियोजक/दुकान मालिक आप पर भरोसा करता है। आप अपना पूरा साहस एकत्र कर उसे सारी बात बता दें कि किस तरह आप ने उस के यहाँ चोरी की और मुसीबत में आ गए हैं। आप उसे विश्वास दिलाएँ कि आप आगे से चोरी नहीं करेंगे और नियोजक के साथ कोई धोखा नहीं करेंगे। आप ने जिस माल की चोरी की है उस से प्राप्त रुपया आप ने खर्च कर दिया है और आप एक साथ नहीं लौटा सकते। लेकिन आप उसे वापस लौटाने का इरादा रखते हैं। उसे चुकाने का एक ही तरीका है कि वह आप की नौकरी को बरकरार रखे और आप के वेतन में से एक चौथाई या एक तिहाई प्रतिमाह कटौती कर अपने नुकसान की पूर्ति कर ले। मेरा अनुमान है कि आप यदि पूरी सचाई और ईमानदारी के साथ अपना गुनाह अपने मालिक के सामने स्वीकार कर लेंगे तो वह आप पर विश्वास करेगा और आप को नौकरी से नहीं निकालेगा। हो सकता है कि वह आप पर कुछ समय तक विश्वास न करे। लेकिन समय के साथ आप यह प्रमाणित कर सकते हैं कि आप पूरी ईमानदारी के साथ उस के यहाँ काम कर रहे हैं। तब हो सकता है वह भविष्य में पहले अधिक विश्वास आप पर करने लगे। यदि आप अपने मालिक के सामने सारी बात कहने की हिम्मत न जुटा सकें तो आप अपने मालिक के विश्वास के किसी व्यक्ति से संपर्क कर सकते हैं जिस की बात आप का मालिक ठुकराता न हो। आप उस व्यक्ति को सारी बात बताएँऔर वह व्यक्ति आप के और आप के मालिक के बीच मध्यस्थता करे। लेकिन आप स्वयं ही अपने मालिक को यह सब बताएँ तो अधिक अच्छा है। इस से आप के और आप के मालिक के बीच विश्वास कम होने के स्थान पर और बढ़ेगा।

 

ह हो सकता है कि वह आप पर आगे विश्वास न करे, आप को नौकरी से निकाल दे। लेकिन आप को इस के लिए तैयार रहना होगा। क्यों कि इस परीक्षा से गुजर कर ही आप इस मुसीबत से छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं और भविष्य को अंधकारमय होने से बचा सकते हैं। आप के द्वारा स्वयं अपने अपराध की स्वीकारोक्ति ही आप के उज्जवल भविष्य की नींव बन सकती है।

 

 

विवाह नहीं, तो तलाक कैसा

मैं एक हिन्दू परिवार से हूँ और लगभग साढ़े आठ साल पहले मुझे एक मुस्लिम लड़की से प्रेम हो गया। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनी की मुझे उस के साथ रहना आरंभ करना पड़ा। हमारी कभी कोई शादी नहीं हुई। न आर्यसमाज में, न कोर्ट में और न ही कोई निकाह हुआ। लेकिन साथ रहने के कारण उस का नाम मेरे राशनकार्ड, वोटर लिस्ट, बच्चे के स्कूल में मेरी पत्नी के रूप में लिखा है। मैंने कभी इस का विरोध नहीं किया क्यों कि सभी तरीके से हम पति पत्नी की तरह ही रहते थे।

स का बर्ताव मेरे प्रति बहुत ही बुरा और निन्दनीय हो चला है। वह अपने साथ हुई सभी खराब बातों के लिए मुझे जिम्मेदार बताती है। लगभग हर रोज हमारे बीच झगड़ा होता है। वह पुलिस थाने तक चली जाती है। उस का व्यवहार बहुत हिंसक है। उस की मेरे परिवार से ही नही पास पड़ौस वालों से भी नहीं बनती। दो बार उस का झगड़ा आस-पास वालों से हो चुका है। जिस के कारण मुजे थाने में जा कर समझौता करना पड़ा। उस ने एक बार मेरे खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की जो आपसी समझौते से समाप्त हुई।

मैं उस के इस बर्ताव से परेशान हो कर पिछले चार माह से ब्वाय्ज होस्टल में रह रहा हूँ। मैं उस से तलाक लेना चाहता हूँ लेकिन वह मुझे 498-ए की धमकी देती है और उस की पहुँच राजनैतिक दलों तक भी है जिस के कारण मुझे अपने भविष्य के प्रति डर लगा रहता है।

मैं अपनी एक मित्र से विवाह करना चाहता हूँ लेकिन वकील साहब ने कहा है कि बिना तलाक के आप विवाह नहीं कर सकते। मैं ने हिम्मत कर के उन के व्यवहार को और घऱेलू हिंसा, मानसिक व शारीरिक संताप को आधार बना कर तलाक के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया लेकिन मुझे सही निर्देश नहीं मिल पा रहा है। मेरी एक साढ़े आठ वर्ष की बेटी भी है जिस का भविष्य मुझे उस के साथ अंधकारमय लगता है। कृपया सलाह दें मुझे क्या करना चाहिए?

-अनुतोष मजूमदार, भिलाई छत्तीसगढ़

सलाह-

प ने सब से बड़ी गलती तो यह की है कि आप ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी है। यदि इस अर्जी का नोटिस जारी न हुआ हो तो उसे तुरंत वापस ले लें, अर्थात उसे एज विद्ड्रॉन निरस्त करवा लें। तलाक की अर्जी में सब से पहले यह लिखना पड़ता है कि दोनों पक्षकारों पर कौन सी व्यक्तिगत विधि लागू होती है तथा विवाह कब और किस विधि से संपन्न हुआ है। आप ने भी तलाक की अर्जी में यह सब लिखा होगा। आप उसे किसी भी प्रकार से साबित नहीं कर सकते। आप हिन्दू हैं और आप की साथी मुस्लिम इस कारण हिन्दू या मुस्लिम विधि से कोई भी विवाह आप दोनों के बीच तब तक संपन्न नहीं हो सकता है जब तक कि आप दोनों में से कोई एक अपना धर्म परिवर्तन न कर ले। यदि आप हिन्दू धर्म त्याग कर मुस्लिम हो जाते तो आप के बीच मुस्लिम विधि से निकाह संपन्न हो सकता था। यदि आप की साथी हिन्दू हो जाती तो हिन्दू विधि से विवाह हो सकता था। आप के बीच विवाह की एक ही रीति से हो सकता था वह विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह अधिकारी के समक्षन पंजीकरण करवा कर वह हुआ नहीं है। इस कारण से आप दोनों के बीच कोई विवाह संपन्न नहीं हुआ है। जब विवाह ही संपन्न नहीं हुआ है तो फिर तलाक या विवाह विच्छेद के लिए कोई मुकदमा चल ही नहीं सकता। केवल आप के द्वारा प्रस्तुत याचिका के उत्तर में आप की साथी आप के इस अभिवचन को स्वीकार कर ले कि विवाह आप के द्वारा बताई गई विधि से संपन्न हुआ है तो न्यायालय यह मान लेगा कि विवाह हुआ है। न्यायालय के मान लेने से आप की मुसीबतें कई गुना बढ़ जाएंगी।

चूंकि आप का विवाह संपन्न नहीं हुआ है इस कारण से आप अपनी नई मित्र से विवाह कर सकते हैं उस में कोई बाधा नहीं है। आप ऐसा तुरंत कर सकते हैं। आप इस के लिए आर्य समाज की पद्धति या परंपरागत हिन्दू विवाह की विधि अपना सकते है या फिर विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह कर सकते हैं।

प का आप के साथी के साथ विवाह संपन्न नहीं हुआ है इस कारण से आप की साथी आप के विरुद्ध धारा 498-ए भा.दं.संहिता का मुकदमा नहीं कर सकती।  यदि वह करती है तो उसे इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि आप के बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं रहा है। लेकिन आप की साथी घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत राहत प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकती है और राहत भी प्राप्त कर सकती है। लेकिन वह भी उस के लिए इतना आसान नहीं होगा।

स सब के बाद आप के लिए केवल एक समस्या रह जाएगी कि आप की बेटी उस की माता के साथ रह रही है। आप को उस की कस्टडी प्राप्त करने में बहुत बाधाएँ आएंगी। आम तौर पर पुत्री की कस्टडी पिता को नहीं मिलती है। 18 वर्ष की उम्र की होने पर वह इच्छानुसार किसी के भी पास रह सकती है। लेकिन उस के पूर्व माता की कस्टडी से पिता को पुत्री तभी मिल सकती है जब कि पिता अदालत के समक्ष ठोस सबूतों के आधार पर यह साबित कर दे कि उस का भविष्य माता के पास असुरक्षित है और पिता के पास वह सुरक्षित रह सकती है और उस का लालन पालन पिता अच्छे से कर सकता है। यह साबित करना आप के लिए लोहे के चने चबाना सिद्ध हो सकता है।

पुलिस अभिरक्षा और न्यायिक अभिरक्षा में अंतर

लखीमपुर खीरी से मनोज यादव  ने पूछा है-

पुलिस अभिरक्षा (Police Custody) और न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody)  में क्या अंतर है?

उत्तर-

ब भी पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है तो गिरफ्तार किए जाने के समय से जब तक उसे किसी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर दिया जाता। गिरफ्तार व्यक्ति पुलिस अभिरक्षा में ही होता है क्यों कि किसी भी न्यायालय को तब तक इस गिरफ्तारी की जानकारी नहीं होती। भारत में पुलिस केलिए यह आवश्यक है कि जब भी वह किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करे तो सक्षम क्षेत्राधिकार के मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष गिरफ्तारी से 24 घंटों की अवधि में प्रस्तुत करे। यदि सक्षम क्षेत्राधिकार के मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना संभव न हो तो गिरफ्तार व्यक्ति को किसी अन्य  मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है।

दि पुलिस ने यह गिरफ्तारी किसी अन्वेषण के चलते की होती है तो पूछताछ और वस्तुओं की बरामदगी के लिए उसे उस व्यक्ति को अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखने की आवश्यकता होती है। ऐसी अवस्था में पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के समय गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तार करने का कारण बताती है और यह निवेदन करती है कि उसे कुछ दिन (निश्चित अवधि) के लिए पुलिस अभिरक्षा में रखने की अनुमति दे। मजिस्ट्रेट किसी भी स्थिति में 15 दिन से अधिक की अवधि के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में रखे जाने की अनुमति प्रदान नहीं कर सकती है।  आम तौर पर अन्वेषण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए यह अवधि केवल एक-दो दिनों की होती है। बाद में और आवश्यकता होने पर पुलिस अपनी अभिरक्षा को बढ़ाने के लिए पुनः निवेदन कर सकती है।

क बार जब मजिस्ट्रेट पुलिस अभिरक्षा को आगे बढ़ाने से इन्कार कर देता है तो तुरंत ही न्यायिक अभिरक्षा आरंभ हो जाती है। मजिस्ट्रेट यह निर्धारित कर देता है कि अभियुक्त को अगले कुछ दिनों के लिए न्यायिक अभिरक्षा में भेजा जाए। न्यायिक अभिरक्षा में अभियुक्त को जेल भेज दिया जाता है। न्यायिक अभिरक्षा की यह अवधि भी अन्वेषण के दौरान एक बार में 15 दिनों से अधिक की नहीं होती। लेकिन यह न्यायिक अभिरक्षा तब तक जारी रहती है जब तक कि अभियुक्त को जमानत पर अथवा अन्यथा रिहा नहीं कर दिया जाता है। जब अभियुक्त न्यायिक अभिरक्षा में हो तो अन्वेषण अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह 10 वर्ष या उस से अधिक दंड से दंडित किए जा सकने वाले मामलों में अन्वेषण 90 दिनों में तथा अन्य मामलो में 60 दिनों में पूरा करे। यदि इस अवधि में अन्वेषण पूर्ण नहीं होता है तो अभियुक्त के जमानत देने के लिए तैयार होने पर मजिस्ट्रेट उसे जमानत पर रिहा कर देता है। इस के पूर्व अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा समाप्त हो जाने और उस के न्यायिक अभिरक्षा में आ जाने पर अभियुक्त स्वयं भी जमानत की अर्जी प्रस्तुत कर सकता है और किसी भी न्यायालय से जमानत पर छोड़े जाने का आदेश होने पर जमानत दे कर रिहा हो सकता है। जमानत पर रिहा होते ही न्यायिक अभिरक्षा समाप्त होजाती है।

पत्नी को मायके से लाने के लिए बंदीप्रत्यक्षीकण सही नहीं

उत्तर प्रदेश से पंकज ने पूछा है –

प्रेम विवाह करने के बाद यदि माता-पिता लड़की को उस के पति के पास न भेजें तो उस स्थिति में लड़का उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट प्रस्तुत करना चाहता है। बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका कैसे काम करती है? पेशी के दौरान क्या क्या बयान लिए जाते हैं? यदि लड़के ने रिट प्रस्तुत की है तो क्या पेशी के दौरान केवल लड़की से बयान लिए जाते हैं, लड़के से कुछ नहीं पूछा जाता है? क्या न्यायाधीश विवाह बचाने के लिए लड़का लड़की को  नहीं समझाते? या केवल लड़की के बयान ले कर लड़की जहाँ जाना चाहती है उस तरफ भेज देते हैं? अगर लड़की माता-पिता के दबाव में गलत आरोप लगाती है तो क्या न्यायाधीश उन आरोपों को केवल लड़की के कहने पर मान लेते हैं? क्या लड़के की सुनवाई नहीं होती? अगर लड़के के पास 1. रजिस्ट्रार का विवाह प्रमाण पत्र 2. उच्च न्यायालय का प्रोटेक्शन आदेश 3. चित्र 4. फोन की रिकार्डिंग आदि हों तो लड़का किस तरह के आरोप में फँस सकता है?

उत्तर-

ब से पहले आप को जानना चाहिए कि कानूनी रूप से प्रेम विवाह नाम की कोई विवाह श्रेणी नहीं होती है। विवाह या तो परंपरागत रूप से किसी व्यक्तिगत विधि के अनुरूप होते हैं। जैसे हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी विवाह आदि।  इन के अतिरिक्त विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह संपन्न हो सकता है। आप के नाम से पता लगता है कि आप पर हिन्दू विधि लागू होगी। इस कारण से आप हिन्दू विधि के अंतर्गत अथवा विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह कर सकते हैं। हिन्दू विधि के अंतर्गत विवाह परंपरागत रूप से दोनों पक्षों के परिवारों की सहमति से उन की उपस्थिति में संपन्न हो सकता है और आर्य समाज पद्धति से संपन्न विवाह को भी हिन्दू विधि से संपन्न विवाह ही समझा जाता है लेकिन इस में दोनों परिवारों के सदस्यों का होना आवश्यक नहीं है। आज कल कई राज्यों में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। इस कारण किसी भी पद्धति से संपन्न विवाह का पंजीयन कराया जाना भी आवश्यक हो गया है। आप ने रजिस्ट्रार के विवाह प्रमाण पत्र का उल्लेख किया है जिस से लगता है कि आप ने आर्य समाज पद्धति से हिन्दू विवाह किया है अथवा विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह संपन्न किया है।

प के दिए गए विवरण से पता लगता है कि आप के विवाह की जानकारी वधु पक्ष को नहीं है। यदि जानकारी हो भी गई है तो वधु पक्ष उस विवाह के विरुद्ध है और आप की पत्नी को आप के पास भेजना नहीं चाहता। आप अपनी पत्नी को अपने पास लाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं। लेकिन इस याचिका को लेकर आप के मन में अनेक प्रकार के संदेह भी उपज रहे हैं। इस के लिए आवश्यक है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका क्या है यह आप समझ लें।

दि किसी व्यक्ति को उस की इच्छा के विरुद्ध किसी के द्वारा निरुद्ध किया गया है तो यह एक प्रकार से उस व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है और उस व्यक्ति का कोई संबंधी या मित्र बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। ऐसी याचिका पर उच्च न्यायालय जिस क्षेत्र में उस व्यक्ति को निरुद्ध किया गया हो उस क्षेत्र के पुलिस अधिकारी को निर्देश दिया जाता है कि वह इस तथ्य की जानकारी करे कि जिस व्यक्ति के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत की गई है वह निरुद्ध है और यदि वह निरुद्ध है तो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे। इस पर पुलिस अधिकारी निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करता है अथवा साक्ष्य सहित यह रिपोर्ट प्रस्तुत करता है कि जिस व्यक्ति के लिए याचिका प्रस्तुत की गई है वह निरुद्ध नहीं है और स्वेच्छा से कथित स्थान पर निवास कर रहा है।

प के मामले में दोनों ही परिणाम सामने आ सकते हैं। पुलिस आप की पत्नी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है अथवा इस तथ्य की रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है कि वह स्वेच्छा से अपने माता-पिता के साथ निवास कर रही है। यदि आप की पत्नी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाती है तो उस न्यायालय उस से सिर्फ इतना पूछ सकता है कि वह अपने माता-पिता के साथ स्वेच्छा से निवास कर रही है या उसे उस की इच्छा के विपरीत रोका गया है। यदि पत्नी यह कहती है कि वह अपनी इच्छा से अपने माता-पिता के साथ निवास कर रही है और आगे भी करना चाहती है तो न्यायालय उसे उस की इच्छानुसार निवास करने की स्वतंत्रता प्रदान कर देगा। यदि पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत करती है तो न्यायालय रिपोर्ट की सत्यता की जाँच करेगा और यदि यह पाएगा कि आप की पत्नी स्वेच्छा से अपने माता-पिता के साथ निवास कर रही है तो वह आप की याचिका को निरस्त कर देगा।

दि आप रजिस्ट्रार का विवाह प्रमाण पत्र, उच्च न्यायालय का प्रोटेक्शन आदेश, चित्र तथा फोन की रिकार्डिंग  न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो इस से यह तो साबित हो जाएगा कि वह आप की पत्नी है, आप का विवाह वैध है। लेकिन फिर भी पत्नी के यह चाहने पर कि वह माता-पिता के साथ रहना चाहती है उसे स्वतंत्र कर दिया जाएगा। कोई भी न्यायालय आप की पत्नी को आप के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। केवल पत्नी के यह चाहने पर कि वह पति के साथ रहना चाहती है। उसे उस के पति के साथ भेजा जा सकता है।

प का विवाह यदि वैध है तो यह भी सच है कि आप की पत्नी दूसरा विवाह नहीं कर सकती। आप की पत्नी के माता-पिता भी उस का दूसरा विवाह नहीं करवा सकते हैं। यदि वे ऐसा कोई प्रयत्न करते हैं तो उन्हें न्यायालय के आदेश से ऐसा करने से आप रुकवा सकते हैं। आप के पास पत्नी को अपने पास लाने का सब से सही उपाय यह है कि आप हि्न्दू विवाह अधिनियम की धारा-9 के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। वहाँ से आप की पत्नी को सूचना भेजी जाएगी। पत्नी का जवाब आने पर न्यायालय आप दोनों के बीच सुलह कराने का प्रयत्न करेगा। यदि वहाँ आप दोनों के मध्य सुलह हो जाती है तो ठीक है अन्यथा आप उसी आवेदन को विवाह आवेदन में परिवर्तित कर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं इस तरह से दोनों के मध्य विवाह विच्छेद हो जाएगा और दोनों विवाह से स्वतंत्र हो कर स्वेच्छा से अपने आगे का जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

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