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न्याय प्रणाली में सुधार आवश्यक है जिस से पक्षकार या वकील उसे लंबा न कर सकें

बिजनेस स्टेंडर्ड के 18 सितंबर 2011 के अंक में एम. जे. एंटनी के एक लेख का हिन्दी अनुवाद वकीलों की चालबाजी से लंबी खिंच जाती है मुकदमे बाजी शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस आलेख में उन्हों ने उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सभी न्यायाधीश अतीत में अधिवक्ता की भूमिका अदा कर चुके होते हैं, इसी तरह सभी अधिवक्ताओं के भविष्य में न्यायाधीश बनने की संभावना रहती है। इस तरह वे समूची न्याय प्रणाली को अंदरूनी तौर पर जानते हैं। ऐसे में अगर न्यायाधीश उन कुछ युक्तियों का खुलासा करते हैं जिनको अपना कर विधि पेशे के लोग न्याय प्रक्रिया में देरी करते हैं तो लोगों को उनकी बातों को गौर से सुनना चाहिए। 
ल्लखित मामलों में से एक मामला तो दिल्ली उच्च न्यायालय में वर्ष 1977 में शुरू हुआ था।
यह मामला इतने न्यायालयों में घूमता रहा कि सर्वोच्च न्यायालय को इन का आकलन करने में छह पन्ने लग गए। रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी के इस मामले में अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘यह इस बात का शानदार नमूना है कि कैसे हमारे न्यायालयों में मामले चलते हैं और किस तरह बेईमान वादी इनके जरिए अनंतकाल तक अपने विरोधियों तथा उनके बच्चों को परेशान करने के लिए न्याय प्रणाली का दुरुपयोग कर सकते हैं।’
ह मामला एक व्यक्ति को भूखंड आवंटन से आरंभ हुआ था, बाद में तीन छोटे भाई भी उसके साथ रहने लगे। छोटे भाइयों ने संपत्ति के बँटवारे की मांग की। बँटवारे का मामला तो बहुत पहले ही निपट गया था लेकिन न्यायाधीशों के मुताबिक मामले की लागत कौन वहन करेगा जैसेतुच्छ तथा महत्त्वहीन प्रश्न शेष रह गए। आखिर ये मामले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच ही गए। इस मामले में एक पक्ष द्वारा पेश किए गए बहुत सारे आवेदनों को देखकर (जिनमें से कुछ गलत तथ्यों पर आधारित थे) न्यायालय ने पहले कहा था, ‘याचिकाकर्ताओं का एक मात्र उद्देश्य मुकदमे में देरी करना है, जबकि यह मामला पहले ही 18 वर्षों से लंबित है। यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसी तुच्छ मुकदमेबाजी न्याय प्रक्रिया को शिथिल बनाती है और इसकी वजह से सही वादियों को आसानी से और तेज गति से न्याय मिलने में देरी होती है।’
र्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आगे कहा, ‘और अधिक समय गँवाए बिना प्रभावी उपचारात्मक उपाय नहीं अपनाए गए तो समूची न्यायपालिका की विश्वसनीयता दाँव पर लग जाएगी।’ मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता की किताब “जस्टिस, कोट्र्स ऐंड डिलेज” का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयों का 90 फीसदी समय और संसाधन अनचाहे मामलों की सुनवाई में निकल जाते हैं। यह हमारी मौजूदा प्रणाली की कमियों के चलते होता है जिसमें गलती करने वाले को सजा के बजाय प्रोत्साहन मिलता है। यदि न्यायालय इस मामले में चौकस रहें तो मुकदमेबाजी का गलत फायदा उठाने वालों की संख्या को काबू किया जा सकता है। 
पुस्तक के मुताबिक हर लीज अथवा लाइसेंस अपनी नियत तिथि की समाप्ति पर किसी न किसी मामले की वजह बन जाते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों से भरे हुए हैं क्योंकि इनमें गलत करने वालों को स्वाभाविक तौर पर लाभ हासिल हो

लोक अदालतें : मुक्ति यज्ञ

राजस्थान की अदालतों के लिए यह सप्ताह लोकअदालतों का है। सभी अदालतों ने अपने यहाँ लंबित मुकदमों में से छाँट छाँट कर एक सूची बनाई है और पक्षकारों को नोटिस भेजें हैं कि यदि वे समझौते से अपने मामलों के हल के उत्सुक हों तो अदालत में निर्धारित तिथि पर आएँ और मुकदमे को निपटाने का प्रयत्न करें। इस दौरान मुकदमों की सामान्य सुनवाई बाधित हो रही है। अदालतें चाहती हैं कि उन के यहाँ लंबित मुकदमों में से कुछ कम हो जाएँ। यह उच्च न्यायालय का निर्देश है। अदालतों को काम तो दो व्यक्तियों के बीच तथ्यों और कानूनी समझ के फेर और जिद के कारण उत्पन्न विवादों का निपटारा करना है। उन का काम यह है कि पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत अभिवचनों, साक्ष्य और विधि के आधार पर वे मामले का निपटारा अल्पतम समय में करे। किसी भी आबादी में विवादों की संख्या  हमेशा जनसंख्या की समानुपाती होती है। जनसंख्या के हिसाब से भारत में न्यायालयों की संख्या अत्यन्त कम है।  दस लाख की आबादी पर जहाँ अमरीका में 111 और ब्रिटेन में 55 न्यायालय हैं वहाँ भारत में यह संख्या 12-13 ही है। अमरीका के मुकाबले हमारे यहाँ केवल 14-15 प्रतिशत न्यायालय हैं। हम इस से यह नतीजा निकाल सकते हैं कि अमरीका की फेडरल और राज्य सरकारें अपनी जनता को न्याय उपलब्ध कराने को जितनी चिन्तित रहती है और प्रणाली उपलब्ध कराती है, भारत सरकार उस के मुकाबले केवल 14-15 प्रतिशत चिंता करती है और उतनी ही प्रणाली उपलब्ध कराती है।  
मारी न्याय प्रणाली का आकार देश की आबादी को न्याय प्रदान करने में पूरी तरह असमर्थ है, इस बात को हमारी जनता भी अब अच्छी तरह जानने लगी है। जब किसी के साथ अन्याय होता है तो वह न्यायालय जाने में झिझकती है। वह जानती है कि न्यायालय से उसे न्याय नहीं मिलेगा। उस की फरियाद तो ले ली जाएगी। लेकिन फिर तारीख पर तारीख के कारण उसे इतने चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिस की पीड़ा के सामने न्याय न मिलने की पीड़ा छोटी हो जाती है, धीरे-धीरे वह और छोटी होती जाती है। अंत में वह न्यायालय से पीछा छुड़ाने की सोचने लगता है। इस तरह के बहुत लोग हैं जो न्याय प्राप्त करने के इस झंझट से मुक्त होना चाहते हैं। उधर मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालय भी चाहते हैं कि उन के यहाँ मुकदमे कम हो जाएँ तो वे बचे हुए मुकदमों की तरफ ध्यान दे सकें और कम से कम उन में तो न्याय कर सकें। हमारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों  के लिए वस्तुतः ये लोक अदालतें एक तरह का मुक्ति यज्ञ है। इस यज्ञ से पक्षकार न्याय के झंझट से मुक्ति प्राप्त कर के हर तरह का अन्याय सहने की सीख प्राप्त करते हैं। कभी जरूरत हो तो बाहुबलियों को उन का शुल्क अदा कर मनचाहा न्याय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। अब ये तो सब जानते हैं कि बाहुबलियों को शुल्क अदा करने की शक्ति किन के पास है और उन की संख्या कितनी है। अदालतें भी इस यज्ञ से बहुत सारे मुकदमों से मुक्त हो जाती है। इसी कवायद में वह वास्तविक अपराध करने वाले लोगों को न्याय के झंझट से मुक्त कर देती है। वे अपनी छाती चौड़ी कर के फिर से समाज में इतराने के लिए पहुँच जाते हैं।

प्रणव दा! सिंह साहब! और सोनिया जी! न्याय के लिए कुछ नहीं, मतलब अन्याय जारी रहेंगे ?

तीसरा खंबा में 26 जनवरी, 2009 की पोस्ट थी, न्याय रोटी से पहले की जरूरत है, ….
जीवन के लिए जितना हवा और पानी आवश्यक है उतना ही न्यायपूर्ण जीवन और समाज भी।  यदि परिवार में खाने को पूरा न हो तो भी परिवार आधे पेट भी प्रेम से जीवन बिता सकता है।  बस लोगों को विश्वास होना चाहिए कि जितनी रोटियाँ हैं, उन का बंटवारा न्यायपूर्ण हो रहा है।   यदि यह विश्वास टूट गया तो परिवार बिखऱ जाएगा।   परिवार के बिखरने का अंजाम सब जानते हैं।  गट्ठर को कोई नहीं तोड़ सकता लेकिन एक एक लकड़ी को हर कोई तोड़ सकता है।  इस लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था परिवार के एकजुट रहने की पहली शर्त है। इसीलिए न्याय रोटी से पहले की जरूरत है।  कम रोटी से काम चलाया जा सकता है, लेकिन न्याय के बिना नहीं।   लेकिन हमारी न्याय प्रणाली अपंग है।   वह हमारी जरूरत का चौथाई भी पूरा नहीं करती।  एक न्यायार्थी को उस के जीवन में न्याय मिलना असंभव होता जा रहा है।  यदि इस स्थिति से युद्ध स्तर पर नहीं निपटा गया तो।  समझ लीजिए कि परिवार खतरे में है।  गणतंत्र खतरे में है।
र्तमान में देश में लगभग16000 अदालतें हैं उन में भी 2000 से अधिक अदालतों में  जज नहीं हैं।  स्वयं संसद  में सरकार  द्वारा निर्धारित  क्षमता  के अनुसार प्रत्येक दस लाख जनसंख्या पर पचास अधीनस्थ न्यायालय  होने चाहिए। भारत की  वर्तमान आबादी लगभग एक  अरब बीस करोड़ के लगभग है, इस आबादी की न्याय की जरूरतों को पूरा करने को अदालतों की  संख्या 60 हजार होनी चाहिए। यही हमारी वास्तविक आवश्यकता है।  अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना का  काम राज्य सरकारों का है। लेकिन किसी  भी राज्य सरकार में इस बात पर चिंता और हलचल तक नहीं दिखाई पड़ती  है कि उन के यहाँ न्याय और न्यायालयों की क्या स्थिति है और  वे घोषित लक्ष्य की  प्राप्ति  के लिए क्या कदम  उठाने जा रहे हैं।
भारत का 2011-12 का संघीय बजट संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है। देश और समाज में न्याय की स्थापना के लिए सरकार और संसद कितनी चिंतित है इस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हों ने इस के लिए क्या प्रावधान अपने बजट में किए हैं। विभिन्न संघीय मंत्रालयों और विभागों का कुल खर्च  इस वर्ष 1216575.73 करोड़ रुपए था। जो आगामी वर्ष के लिए 1257728.83 करोड़ रुपयों का रखा गया है। इस तरह इन मंत्रालयों और विभागों के कुल खर्च में चालीस हजार करोड़ की वृद्धि की गई है। लेकिन वस्तुओं के महंगा हो जाने से  यह वृद्धि न केवल बराबर हो जाती है अपितु बजट में बढ़ाई गई इस राशि में पहले जितनी वस्तुएँ और सेवाएँ नहीं खरीदी जा सकेंगी। 
न्याय के लिए इस वर्ष के लिए 944 करोड़ का प्रावधान किया गया था, अब अगले वर्ष के लिए 1432 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस तरह करीब 488 करोड़ रुपयों की वृद्धि की गई है। इस वर्ष योजना खर्च में रुपए 280 करोड़ रुपए रखे गए थे जिन्हें अगले वर्ष के लिए बढ़ा कर 1000 करोड़ कर दिया गया है। इस में से अधिकांश धनराशि कंप्यूटराइजेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण न्यायालय स्थापित करने के लिए राज्यों की सहायता के लिए रखी गई है। लेकिन गै

अगले दस वर्षों में एक लाख जज नियुक्त करने होंगे

रकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में 4,30,000 लोग जेलों में बंद हैं, जिन में से तीन लाख बंदी केवल इसलिए बंद हैं कि उन के मुकदमे का निर्णय होना है। 2007 में यह संख्या केवल 2,50,727 थी। केवल तीन वर्षों में विचाराधीन बंदियों की संख्या में 50,000 का इजाफा हो गया। इन विचाराधीन बंदियों में से एक तिहाई से अधिक 88,312 अनपढ़ हैं, इन में माध्य़मिक स्तर से कम शिक्षित बंदियों की संख्या जोड़ दी जाए तो यह संख्या विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या का 80% (1,96,954) हो जाएगी।  2007 में विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या 2,50,727 थी जिस में से 1891  पाँच वर्ष से भी अधिक समय से बंद थे।
गस्त 2010 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि सभी विचारण न्यायाधीशों ने मुकदमों के निस्तारण की गति में उच्चस्तर बनाये रखा है। ऐसे में हमारे अपराधिक न्याय तंत्र के लिए यह एक भयावह स्थिति है। इन में ऐसे बंदी भी सम्मिलित हैं कि जिन पर चल रहे मुकदमे में जितनी सजा दी जा सकती है, उस से कहीं अधिक वे फैसले के इन्तजार में जेल में रह चुके हैं।  52 हजार से अधिक बंदी ऐसे हैं जिन पर हत्या करने का आरोप है। हो सकता है कि पाँच वर्ष से अधिक समय से बंद 1891 विचाराधीन बंदी हत्या के ही अपराध में बंद हों. लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इन में से कितने ऐसे हैं जिन पर हत्या का आरोप संदेह के परे साबित किया जा सकेगा। 
वास्तविकता यह है कि जब भारत का संविधान निर्मित हो रहा था, और अनुच्छेद 21 पर चर्चा हुई तो अपराधिक मुकदमों की प्रक्रिया, निष्पक्ष विचारण, जीवन के मूल अधिकार तथा अन्य बिंदुओं पर विचार किया गया। लेकिन तेज गति से विचारण का बिंदु चर्चा में सम्मिलित ही नहीं था। यह बात पहली बार तब सामने आई जब 1979 में हुसैन आरा खातून के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि तेजगति से विचारण अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अभियुक्त का मूल अधिकार है। इस के उपरांत इस बात को न्यायालयों ने अनेक बार दोहराया है, लेकिन अभी तक विचाराधीन बंदियों के लिए यह अधिकार एक सपना ही बना हुआ है। 1970 के बाद  विचारधीन बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन उन में सजा काटने वाले कम हैं और अदालत में अपने दिन की प्रतीक्षा करने वाले अधिक। 
खिर इस स्थिति का हल क्या है? विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने मामूली आरोपों के बंदियों को 2010  के अंत तक रिहा किए जाने की एक योजना घोषित की थी,  जिस से  विचाराधीन तीन लाख बंदियों में से दो तिहाई को रिहा किया जा सके और जेलों की भीड़ को कम किया जा सके। लेकिन इस योजना पर कितना अमल हुआ है? इस की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस के अलावा विभिन्न कमेटियों और सरकारी दस्तावेजों के आधार पर जो हल सुझाए गए हैं वे इस प्रकार हैं-
1. अपराधिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाए जिस से मुकदमों का शीघ्र निस्तारण किया जा सके।
2. अदालतों की तकनीकी और आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाया जा सके जिस से मुकदमा निस्तारण की गति बढ़ सके।
3. पुलिस व्यवस्था में सुधार लाया जाए जिस से

अमरीका की तुलना में भारत में न्याय की संभावना मात्र 10 प्रतिशत

विगत आलेख क्या हम न्यायपूर्ण समाज की स्थापना से पलायन का मार्ग नहीं तलाश रहे हैं ? पर तीन महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएँ आईँ।संगीता पुरी जी ने कहा कि ‘सजा गल्‍ती की निरंतरता को रोकने के लिए दी जाती है .. न्‍याय के क्षेत्र में होनेवाली देरी और खर्च के कारण तो उतने दिनों तनाव में रहने से तो अच्‍छा है .. एक दो बार हुए किसी की गल्‍ती को कुछ लोगों के हस्‍तक्षेप से सुलह करवाकर माफी वगैरह मांग मंगवाकर समस्‍या को हल कर लिया जाए !!’ काजल कुमार ने कहा ‘जब न्यायव्यवस्था बढ़ते मुक़दमों को नहीं निपटा पा रही है तो हमें वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचना होगा. मसलन ओम्बडसमैन व राजीनामा जैसी संस्थाओं को मज़बूत करना होगा ताकि ये न्यायालयों के स्थानापन्न का रूप ले सकें.’ उन्हों ने यह भी कहा कि ‘आज हालत ये है कि निचले न्यायालयों को एक मिनट के लिए छोड़ भी दिया जाए तो उच्च-न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय के सम्मुख अधिकांश मामले ऐसे आते हैं जिनमें कानून की व्याख्या को कोई सवाल नहीं होता किन्तु उन्हें यही जामा पहना कर पेश किया जाता है. जबकि, इन न्यायालयों को इस तरह के मुक़दमों को सरसरी नज़र में खारिज कर देना चाहिये.’ इस के अलावा ताऊ रामपुरिया जी की राय थी कि ‘असल में कानून में जो झौल है उसे खत्म करने की जरुरत है, ये मेरा अपना निजी सोच है जिससे न्यायिक प्रक्रिया उलझे नही और त्वरित न्याय मिल सके.’
संगीता जी ने जो राय रखी वह एक आम व्यक्ति की सोच है जो अपर्याप्त और न्याय प्राप्त करने के कष्टप्रद न्यायप्रणाली के प्रभाव से उत्पन्न हुई है। न्याय के क्षेत्र में केवल अपराध ही नहीं आते हैं। आज जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस में न्याय प्राप्ति की आवश्यकता नहीं हो। वस्तुत स्थिति यह है कि देश के तमाम सक्षम लोग कानून का उल्लंघन करते हैं और सोचते हैं जो वे करेंगे वही न्यायपूर्ण है। लेकिन साधारण लोगों के पास इस अन्याय से उबरने का एक मात्र उपाय न्यायिक संस्थाओँ के पास जाना है। यदि वहाँ भी न्याय न मिले और समझौते की राह दिखाई जाए जहाँ फिर उसी अन्याय का सामना करना पड़े तो इस वैकल्पिक न्याय व्यवस्था से क्या लाभ है। सही और उचित न्याय तो वही है जो न्यायालय में सबूतों, सचाई और कानून के आधार पर प्राप्त हो। इस तरह वैकल्पिक व्यवस्थाएँ वास्तविक न्याय से पलायन करने की एक तदर्थ व्यवस्था है। अमरीका में दस लाख की आबादी के लिए 110 जज नियुक्त हैं जब कि हम भारत में केवल 11 से काम चला रहे हैं। इस तरह अमरीका की तुलना में भारत में न्याय की संभावना मात्र 10 प्रतिशत है। क्या भारत जैसा देश दस प्रतिशत न्याय से काम चला सकता है? और यह कहा जा सकता है कि हम न्याय कर रहे हैं। वैकल्पिक प्रणालियों का लाभ भी तभी मिल सकता है जब मूल न्यायिक व्यवस्था पर्याप्त हो। तब समझौते से निकाले गए हल अधिक न्यायपूर्ण हो सकेंगे। क्यों कि तब उन के पीछे सोच यह नहीं होगी कि वह न्याय की लंबी, उबाऊ, थकेलू और मारक व्यवस्था से पिंड छुड़ाने के लिए समझौता कर लेना बेहतर है।
ताऊ जी की सोच हमेशा यथार्थ होती है। उन्हों ने कानून के झोल की बात कही है। जब रस्सी पूरी तनी हुई नहीं बंधी होती है तो उस में झोल आ जाना स्वाभाविक है। आज भारतीय अदालतों के पास अमरीका की अदालतों स

क्या हम न्यायपूर्ण समाज की स्थापना से पलायन का मार्ग नहीं तलाश रहे हैं ?

म भारत में जरूरत की केवल 20 प्रतिशत अदालतों से देश में न्यायालयों की कमी ने अनेक समस्याएँ खड़ी की हैं और लगातार हो रही हैं। अदालतों की इस कमी ने सब से बड़ी समस्या खड़ी की है कि मुकदमों के निर्णय में असीमित देरी होती है जिस के कारण न्याय का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जा रहा है। कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं जिन का निर्णय जल्दी हो जाता है, कुछ ऐसे जिन का निर्णय होने की कोई समय सीमा ही नहीं है। न्यायार्थी के जीवन में यदि निर्णय हो भी जाए तो वह खुद को खुशकिस्मत समझता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.के. गांगुली ने न्यायपालिका को कम धन आंवटन पर सवाल उठाया है कि नौवीं योजना में सरकार ने न्यायिक प्रणाली के लिए सिर्फ 385 करोड़ रुपये आवंटित किए जो खर्च योजना का सिर्फ 0.071 फीसदी था। दसवीं योजना में स्थिति में आंशिक रूप से सुधार आया जब सरकार ने 700 करोड़ या खर्च योजना का 0.078 फीसदी खर्च किया। इस सवाल से स्पष्ट है कि हमारी सरकार का ध्यान न्यायव्यवस्था को आवश्यकता के अनुसार विकसित करने पर नहीं है, अपितु इसे वह अनावश्यक बोझ समझती है। वह देश और समाज में न्याय स्थापित करने के स्थान पर अन्य इतर उपायों से काम चलाना चाहती है।
ये इतर उपाय एक ओर तो लोक अदालतों में समझाइश से समझौते के माध्यम से मुकदमों का निपटारा करने के रूप में सामने आ रहे हैं, दूसरी ओर अर्ध न्यायिक संस्थानों की स्थापना कर उन्हें सीधे सरकार के अधीन कर देने के रूप में। लेकिन दोनों ही मार्ग वास्तविक न्याय से पलायन को प्रदर्शित करते हैं। हम फिलहाल लोक अदालतों और समझौतों की बात करें। लोक अदालतों में जज अपने निर्धारित स्थान से नीचे उतर कर एक हॉल में बैठता है। वहाँ पक्षकार भी समान स्तर पर बात करता है। लेकिन हमेशा कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर न्याय मांगने वाले पक्ष को समझाया जाता है कि मुकदमा लड़ने  में कोई लाभ नहीं है, बहुतेरा पैसा और समय जाया होगा, आपसी वैमनस्यता बढ़ेगी। इस लिए अपने अधिकारों को छोड़ कर वह समझौता क्यों न कर ले। पूरी नहीं तो चौथाई रोटी तो मिल ही रही है। लोक अदालत में ऐसा माहौल पैदा किया जाता है कि न्यायार्थी को लगने लगता है कि उस ने न्याय के लिए अदालत आ कर गलती कर दी। वैसी अवस्था में या तो वह अपने अधिकारों को छो़ड़ कर समझौता कर लेता है या फिर अपनी लड़ाई को छोड़ बैठता है।
लेकिन क्या एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए समझौतों और लोक अदालतों की यह प्रक्रिया उचित है? मेरी राय में नहीं। इस से हम एक न्यापूर्ण समाज की ओर नहीं जा रहे हैं, अपितु अन्याय करने वालों को एक सुविधा प्रदान कर रहे हैं। वैसी ही जैसे किसी को एक झापड़ कस दिया जाए और फिर माफी मांग ली जाए। फिर भी नाराजगी दूर न होने पर कहा जाए कि बेचारे ने माफी तो मांग ली अब क्या एक झापड़ के लिए उस की जान लोगे क्या।

न्यायिक सुधार – ऊँट के मुहँ में जीरे के समान भी नहीं



बार एंड बैंच, एक भारतीय अंग्रेजी  वेबसाइट है जो भारत में विधि और न्यायिक पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने में जुटी है। इसी ने कल अपनी वेबसाइट पर भारतीय न्यायिक प्रणाली के गंभीर संकट को प्रकट करते आँकड़े जारी किए हैं। आप भी अवलोकन कीजिए कि हमारे यहाँ न्याय प्रणाली की स्थिति क्या है? ……

भारतीय न्यायालयों में लंबित मुकदमों की स्थिति का त्रिवर्षीय आकलन …
स सारणी से स्प्ष्ट है कि लंबित मुकदमों की संख्या प्रतिवर्ष 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। लंबित मुकदमों की संख्या जजों की कमी की संख्या की समानुपाती है।  इस से स्पष्ट है कि न्यायालयों की संख्या बढ़ाया जाना आवश्यक है। जरा हम यह भी देखें कि हमारे यहाँ के न्यायालयों में न्यायाधीशों के कितने पद रिक्त पड़े हैं? ……
न्यायाधीशों के स्वीकृत और रिक्त पद
च्चतम न्यायालय में रिक्त प

500 वाँ आलेख, 50000 चटके और बेटी का जन्मदिन

28 अक्टूबर 2007 को जब तीसरा खंबा का पहला आलेख लिखा गया था तब सोचा भी न था कि ये तकरीबन ढाई वर्ष का समय यूँ ही निकल जाएगा। बस एक लक्ष्य था सामने कि मुझे देश को न्याय व्यवस्था की जरूरत और न्याय प्रणाली की जरूरतों के बारे में लिखना है। लोगों को बताना है कि  हम जिस न्याय प्रणाली पर गर्व करते हैं। उस की शासन को कोई परवाह नहीं है। वास्तव में वह इसे मजबूरी समझता है। इस बिंदु से आरंभ करने के उपरांत तीसरा खंबा बहुत सोपानों से गुजरा। इस में कानूनों की सरल व्याख्या करने का प्रयत्न किया गया। जरूरी और सामयिक प्रश्नों पर विधिक स्थितियों को रखने के प्रयास भी किए गए। फिर पाठकों ने कानूनी जिज्ञासाएँ रखना आरंभ किया तो इस के माध्यम से कानूनी सलाह देने का काम भी आरंभ किया गया। जिस का उद्देश्य किसी पाठक की वास्तविक समस्या के आलोक में विधिक स्थिति को ब्लाग पर रखना जिस से पाठकों की कानूनी जानकारी बढ़ सके। 
पाठकों ने तीसरा खंबा के माध्यम से जो कुछ भी किया गया उस की सराहना की और उस के कंधे से अपना कंधा मिलाया। उसी का नतीजा है कि तीसरा खंबा एक अकेले व्यक्ति का प्रयास होते हुए भी लगातार चलता रहा और उस ने अपना यह 500सौ वाँ आलेख पूरा किया। 
 

बीच में यह योजना भी बनी कि तीसरा खंबा को एक वेबसाइट का रूप दे दिया जाए। लेकिन मेरी स्वयं की व्यस्तता के कारण यह अभी तक संभव नहीं हो सका है। मैं ने कोशिश भी की लेकिन निश्चित रूप से एक अकेला व्यक्ति कोई गतिशील वेबसाइट नहीं चला सकता जब तक कि उस के साथ नियमित रूप से काम करने वाले लोग न हों। तीसरा खंबा को एक वेबसाइट का रूप देना मेरा सपना है जो शायद कभी पूरा हो सके। 

तीसरा खंबा आज जिस स्थिति में है वह पाठकों और साथी चिट्ठाकारों के सहयोग और सद्भावना के बिना नहीं पहुँच सकता था।  सभी के सहयोग और मुझ पर व्यक्त किए विश्वास ने ही उसे इस स्थान तक पहुँचाया है। मैं इस अवसर पर उन सभी साथियों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ जिन्हों ने इस काम को लगातार करते रहने की प्रेरणा और शक्ति मुझे प्रदान की और ढेर सारा प्यार, स्नेह और आदर प्रदान किया। तीसरा खंबा के पाठकों में आधे से अधिक हिन्दी चिट्ठाजगत से बाहर के सामान्य लोग हैं जो इस चिट्ठे पर विश्वास करते हैं और लगातार अपनी कानूनी समस्याओं को भेजते हैं। उन्हीं का स्नेह है कि 500वें आलेख के साथ ही इस पर लगने वाले चटकों की संख्या भी पचास हजार से ऊपर पहुँच गई है। मुझे आशा है कि पाठकों का यह विश्वास, स्नेह, प्यार, आदर और आशीर्वाद मुझे भविष्य में मिलता ही नहीं रहेगा अपितु इस में वृद्धि भी होगी। मुझे इस काम को जारी रखने की शक्ति मिलती रहेगी।
ज का दिन मेरे लिए केवल इस लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है कि आज तीसरा खंबा ने 500वाँ आलेख और 50,000 चटके पूरे किए हैं। मेरे लिए 24 मार्च का यह दिन इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि यह मेरी पुत्री पूर्वा का जन्मदिन भी है। हम चाहते थे कि इस दिन वह हमारे साथ हो। लेकिन मेरी और उस की अपने अपने काम  में व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं हो सका। तीसरा खंबा अपने इस 500वें आलेख 50000 हजार से अधिक चटकों से पूर्वा को जन्मदिन की मुबारक बाद भी देना चाहता है। 
 
 
पू्र्वा को जन्मदिन पर बहुत तीसरा खंबा की  शुभकामनाएँ।

मुकदमों के निपटारे की अवधि कम करने की कवायद

केन्द्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली जिस ऊर्जावान रीति से बयान जारी कर रहे हैं उसी रीति से परिणाम भी ले कर आएँ तो देश में प्रतिष्ठा खोती जा रही न्याय प्रणाली को अपनी पुरानी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित कर पाने में मदद मिलेगी। कल उन्हों ने जो बयान दिया है उस के अनुसार सरकार ने यह लक्ष्य निर्धारित किया है कि वे 2012 तक देश में मुकदमों के निपटारे में लगने वाले औसतन समय 15 वर्ष को तीन वर्ष तक ले कर आएंगे। यह देश के लिए एक शुभ सूचना है। यदि वे इस काम को कर पाए तो निश्चित ही यह मौजूदा केंद्रीय सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

ह बयान देना बहुत नहीं तो कम कठिन भी नहीं था। जिस तरह के अभी हालात हैं उन में यह संभव नहीं दिखाई देता क्यों की आवश्यक अधीनस्थ अदालतों की संख्या इस समय केवल 20 प्रतिशत है और उन की संख्या में 500 प्रतिशत इजाफा किए बिना न्याय प्रशासन को दुरुस्त किया जाना संभव नहीं है। लेकिन अभी तो उन की संख्या 200 प्रतिशत करने के बारे में भी कोई इरादा दिखाई नहीं देता। फिर यह काम राज्य सरकारों पर है कि वे अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं या नहीं। अभी तो हालात यह  हैं कि न्यायाधीशों के जो पद रिक्त हैं विलम्बित चयन प्रक्रिया के दोष के कारण उन्हें ही भरा जाना संभव नहीं हो पा रहा है। राज्यों के सेवा आयोगों को चयन के लिए समय ही नहीं है। ऐसी अवस्था में क्या न्यायाधीशों के चयन के लिए एक पृथक राष्ट्रीय आयोग होना चाहिए। उस दिशा में उन की क्या योजना है इस का खुलासा किया जाना भी जरूरी है। सब से बड़ी बात तो यह है कि राज्य सरकारों को इस काम के लिए प्रेरित किया जाए। उन के व्यवहार से ऐसा लगता है कि वे न्यायालयों की स्थापना को सब से गैर जरूरी काम समझती है। इस का उदाहरण है कि अभी राजस्थान में कुछ विशेष अदालतें स्थापित की गई हैं जो धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के मुकदमे सुनेंगी। कोटा में भी एक ऐसी अदालत स्थापित हुई है। मौजूदा लंबित मामले अन्य अदालतों से इसे स्थानांतरित किए जा रहे हैं। कल नई अदालत का रीडर बता रहा था कि अदालत में अभी से  6000 से अधिक मुकदमे दर्ज हो चुके हैं और संभावना है कि सारे मुकदमे स्थानांतरित हो कर प्राप्त हो जाने के बाद इन की संख्या 7000 से ऊपर जाएगी। एक अदालत जो 500 मुकदमों के लिए बनी होती है और किसी तरह 1000 मुकदमे संभाल लेती है वह कैसे 7000 मुकदमे संभाल पाएगी? हम जानते हैं कि इन में से आधे लोग जिन्हों ने मुकदमे दर्ज कराए हैं वे बिना किसी राहत के बीच रास्ते अदालत से लौट जाने वाले हैं। यह स्थिति निरंतर जनता में मौजूदा व्यवस्था के प्रति असंतोष में वृद्धि कर रही है। जिस की गाज सरकार पर ही गिरनी है और समाज में होने वाले अपराधों में वृद्धि होती है।

मोईली साहब ने सब से महत्वपूर्ण विचार देश में राष्ट्रीय वाद नीति के निर्माण का प्रकट किया है। सरकार देश में सब से बड़ी न्यायार्थी है जिस के द्वारा दायर किए गए मुकदमों की संख्या भी सब से अधिक है और जिस के विरुद्ध दायर किए गए मुकदमों की संख्या भी अधिक है। सरकार की यह नीति कैसी होगी यह तो उस के बन जाने पर ही पता लगेगा। पर इतना तो कहा जा सकता है कि यदि यह नीति बनी और सरकार अपने मुकदमों में कमी ला सकी तो यह न्याय प्रणाली के लिए उत्तम होगा

एक सही न्याय व्यवस्था के लिए भी इंकलाब से ही गुजरना पड़ेगा

रा ये खबर देखिए…..

20 साल बाद मिलावट प्रकरण में सजा

दयपुर की एक अदालत ने बीस साल बाद हल्दी व मिर्च पाउडर में मिलावट करने के मामले में गुजरात की दो कम्पनियों एवं उनके मैनेजिंग डायरेक्टर तथा स्थानीय डिस्ट्रीब्यूटर के दो पार्टनर को दोषी मानते हुए कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई है।  इस मामले में 3 मार्च व 30 मार्च 1989 को एक खुदरा दुकानदार के यहाँ से इंडिया सेल्स कॉर्पोरेशन की एगमार्क इंडिया ब्रांड की लाल मिर्च के दस किलो के पैक से लाल मिर्च और एगमार्क इंडिया स्पाइसिस नडियाद की हल्दी के दस किलो के पैक से नमूने लिए थे।  दोनों जांच के बाद अपमिश्रित पाये गये और दुकान मालिक के पास खाद्य पदार्थ बेचने का लाइसेंस भी नहीं था। अब 20 साल बाद अदालत ने स्थानीय डीलर की दुकान व उक्त कम्पनियों को दोषी मानते हुए खाद्य अपमिश्रण अधिनियम 1954 की धारा 7/16 में दोषी करार पाते हुए दोनों मैनेजिंग डायरेक्टर व स्थानीय डीलर को तीन-तीन साल के कारावास व तीस-तीस हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके अलावा अहमदाबाद व नडियाद की कम्पनी तथा स्थानीय डीलर की दुकान पर भी तीस-तीस हजार रुपये का जुर्माना किया गया।
 खाद्य अपमिश्रण जो नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है और उन के जीवन को प्रभावित करता है। उस मामले में हमारी अदालत 20 वर्ष बाद एक निर्णय देती है। यह प्रारंभिक अदालत का निर्णय है और जिन्हें सजा हुई है वे नामी कंपनियाँ हैं जिन्हों ने इस तरह के मिलावटी माल को बेच कर करोड़ों रुपए अब तक कमाए होंगे।  वे अब इस निर्णय के विरुद्ध अब सेशन न्यायालय में अपील करेंगे, फिर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। इसी में उन का जीवन पूरा हो लेगा और न्याय के हाथ से उन की गर्दनें निकल चुकी होंगी। जो लोग यह कर सकते हैं उन्हें कुछ भी अपराध करने में भय क्यों लगेगा? आप सोच सकते हैं कि जब अपराधी में न्याय का कोई असर ही नहीं होगा तो वह अपराध करने से क्यों चूकेगा। 

मारी अपराध न्याय-प्रणाली बिलकुल बेअसर हो चुकी है। सरकारों की इस में तेजी से सुधार लाने की कोई मंशा भी दिखाई नहीं देती है। वे योजनाएँ बनाते हैं और उन्हें लागू करने की तरफ आगे बढ़ते हैं तब तक बढ़ती हुई आबादी और बढ़ते हुए मुकदमों की संख्या उन की योजना को लील लेती है। लगता है मौजूदा व्यवस्था के पास इस समस्या से निपटने का न तो कोई मार्ग है और न ही इच्छा है। जनता को एक सही न्याय व्यवस्था के लिए भी इंकलाब से ही गुजरना पड़ेगा