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बन्दी रखने वाला ससुराल छोड़ कर ही आगे बढा़ जा सकता है।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

मोनिका ने हिसार, हरियाणा से पूछा है-

मेरी शादी को पाँच महिने हुए हैं। कुछ दिन बाद से ही मरे ससुराल वाले और पति मुझे परेशान कर रहे हैं। शादी से पहले मुझे बताया था कि मेरा पति ड्रिंक नहीं करता है औऱ शादी के बाद मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हूँ। लेकिन ये मुझे पढ़ाई नहीं करने देते हैं, न ही नौकरी करने देते हैं। घर से भी नहीं निकलने देते, मुझे कैद कर रखा है। मेरा पति रोज ड्रिंक कर के घर आता है और मुझ से लड़ाई करता है। मुझे मायके भेजने की धमकी देते हैं। मैं पढ़ना चाहती हूँ, आगे बढ़ना चाहती हूँ कुछ बोलती हूँ तो सब मेरे साथ बोलना बन्द कर देते हैं 20-20 दिन मुझ से कोई नहीं बोलता। मायके गयी तो एक माह तक मुझे लेने कोई नहीं आया। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के कथनों से एक बात पक्की लग रही है कि आप के ससुराल वालों को आप जैसी बहू नहीं बल्कि घर में बन्द रह कर घर का काम करने वाली बहू चाहिए थी। आम तौर पर विवाह के पहले लोग वायदे कर देते हैं यह सोच कर कि विवाह के बाद सब ठीक हो जाएगा। हमें नहीं लगता कि आप अपनी ससुराल में रह कर पढ़ाई आगे बढ़ा सकती हैं। आप का पति भी ड्रिंक करना नहीं छोड़ेगा। घर के बाहर निकलना भी आप का स्वतंत्रता पूर्वक नहीं हो सकता।

यदि आप इन परिस्थितियों से तंग हैं तो आप अपनी ससुराल छोड़ सकती हैं इस का आप को अधिकार है। क्यों कि आप के साथ ससुराल में वाजिब व्यवहार नहीं हो रहा है जो कि आप के साथ क्रूरता है। यदि आप के मायके वाले सपोर्ट करने में सक्षम हों तो आप मायके जा कर वहाँ नौकरी तलाश कर के नौकरी कर सकती हैं और अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हैं। इस के साथ ही आप अपने पति से प्रतिमाह भऱण पोषण राशि प्राप्त कर सकती हैं जिस के लिए आप को धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता अथवा घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन करने होंगे। आप चाहें तो ससुराल वालों की क्रूरता के लिए उन के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है जिस पर धारा 498ए का मामला दर्ज हो सकता है।

आप यदि वास्तव में अपनी परिस्थितियों को बदलना चाहती हैं तो आप को ससुराल छोड़ना ही पड़ेगा। एक बार ससुराल छोड़ दें फिर किसी अच्छे स्थानीय वकील से मिल कर सलाह करते हुए आगे का रास्ता तय कर सकती हैं।

कमाते नहीं, फिर भी शादी की है तो बीवी-बच्चे का भरण पोषण तो देना होगा।

mother_son1समस्या-

रमेश कुमार ने गुडामालानी, बाडमेर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी वर्ष 2011 मे हुई थी कुछ समय तक तो हमारे वैवाहिक सम्‍बध ठीक रहे।  लेकि‍न वर्ष 2014 के बाद मेरी पत्‍नी मेरे साथ बुरा व्‍यवहार करने लगी। घर में लडाई-झगडा करने लग गई और मुझे परेशान करने लगी, अब मेरे साथ नही रह रही है व मेरी 1 साल की बच्‍ची को लेकर पीहर में रह रही है। जबकि‍ मैं मेरे साथ रखना चाहता हूँ। वह कह  रही है कि‍ मैं धारा 125 के तहत भरण पोषण की मांग करूंगी जबकि‍ मैं पढाई करता हूँ। मेरे पढ़ाई का खर्चा भी मेरे पि‍ताजी देते हैं। मेरे पास कोई जाँब नहीं है। धारा 125 के तहत न्‍यायलय कि‍तना भरण पोषण दिला सकता है अगर मैं भरण पोषण नहीं दे पाता हूँ तो मुझे कि‍तनी सजा मि‍ल सकती है।

समाधान-

भाई, आप की समस्या भारी है। आप अभी कमाते नहीं हैं, फिर भी आप ने शादी कर ली है, यहाँ तक कि बच्चा भी है। शादी भी आप ने अपनी मर्जी से तो नहीं की होगी। घर वालों ने दबाव डाला होगा तभी शादी की होगी। अब आप घर वालों से कहिए कि जो भी परिणाम ह वह आप भुगतिए। यदि अदालत भरण पोषण का आदेश देती है तो उस की पालना भी आप के परिवार वाले करेंगे। वर्ना जब भी आप एक माह का भरण पोषण न देंगे आप को एक माह के लिए जेल भेज दिया जाएगा और महिने के पहले बाहर तब आएंगे जब बकाया राशि आप अदा कर देंगे। फिर अगले माह भरण पोषण बकाया हो जाएगा और फिर जेल जाने की तैयारी हो जाएगी। आप के घर वालों को आप के साथ इतनी ज्यादती नहीं करनी चाहिए थी। विवाह तो तभी करना चाहिए था जब आप खुद कमाने लगते और पत्नी व बच्चों के भरण पोषण में सक्षम हो जाते।

आप सोचिए, तीन साल तक आप की पत्नी ने अच्छा व्यवहार किया और अब तीन साल बाद बुरा व्यवहार कर रही है, इस का कारण क्या है? भारतीय परिवारों में लड़कों की किशोर पन में ही शादी कर दी जाती है। उस के बाद भी लड़का यदि कमाने नहीं लगता है तो सारे ताने उस की पत्नी को सहन करने होते हैं। यही कारण है कि आप की पत्नी ने पहले तो उन तानों को सहा होगा, फिर प्रतिरोध किया होगा और फिर वह मायके चली गयी।

बच्चा आप का है तो उस का भरण पोषण तो आप को देना होगा और पत्नी का भी। यह दोनों मिला कर 4 हजार से 10 हजार प्रतिमाह तक हो सकता है। आप घर वालों को बता दें कि आप जब तक पढ़ाई पूरी कर कमाने नहीं लगते यह सब तो परिवार को करना पड़ेगा। यही एक मात्र उपाय है। कमाने लगेंगे तो पत्नी भी आप के साथ आ कर रहने लगेगी।

माता-पिता व वृद्धों के भरण पोषण का कानून

hinduwidowसमस्या-

शीला देवी ने जबलपुर म.प्र. से पूछा है-

मेरी बेटी और दामाद मेरे मकान में कब्जा कर के बैठ गये हैं। ना तो किराया देते हैं ना मकान खाली करते हैं। जब कि मकान मेरे नाम पे है। मेरे पति का देहान्त 1986 में हो गया था। किराए से ही गुजारा चलता था। वो भी ये लोगों ने बन्द कर दिया। मेरा बेटा हैदराबाद में रहता है।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप के बेटी दामाद ने किस तरह आप के मकान में कब्जा किया है? क्या वे किराएदार के बतौर मकान में रहे थे? क्या उन का किरायानामा लिखा गया था। क्या उन्हों ने कभी किराया दिया और आप ने रसीद दी, क्या किसी रसीद पर आप की बेटी या दामाद के हस्ताक्षर हैं? इन तथ्यों के बिना सही उपाय बताया जाना संभव नहीं है। यदि आप दस्तावेजी रूप से यह साबित करने में सक्षम हों कि वे किराएदार की हैसियत से वहाँ निवास कर रहे थे तो आप न्यायालय में उन के विरुद्ध बकाया किराया और बेदखली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो आप माता पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण अधिनियम 2007 तथा उस के अंतर्गत बने मध्यप्रदेश के नियम 2009 के अन्तर्गत अपनी बेटी-दामाद तथा पुत्र के विरुद्ध भरण पोषण के लिए आवेदन इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप जिला न्यायालय परिसर में स्थापित विधिक सहायता केन्द्र में स्थापित कानूनी समस्या क्लिनिक से भी सहायता प्राप्त कर सकती हैं।

स्वंय एवं बच्चे के लिए भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन करें।

mother_son1समस्या-

साहिला असलम ने हरदोई, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा पति शराब पीकर मुझको मारता पीटता था‚ मैंने उसके विरूद्ध धारा 498ए‚ 323‚ 504‚ 506 भादवि व 3⁄4 डीपी एक्ट में एफआईआर दर्ज करायी‚ मामले को सुलह एवं मध्यस्थता केन्द्र भेजा गया जहॉं मैंने अपने भविष्य के कारण सुलह कर ली परन्तु मेरे पति द्वारा अपनी हरकतों में कोई बदलाव नहीं किया गया और मुझे शराब के लिए पैसे मांगते हुए मारने पीटने लगा‚ इस कारण मैं अपने घर चली अायी लेकिन इसके बाद भी उसने अपने कुछ साथियों के साथ मेरे घर में घुसकर मुझे व मेरी माँ को मारा पीटा जिससे मेरे माँ के हाथ की हडडी अपनी जगह से हट गयी‚ मेरे द्वारा इस सम्बन्ध में धारा 452‚ 323‚ 504‚ 506‚ 498ए भादवि व 3⁄4 डीपीएक्ट में मुकदमा पंजीकृत कराया है‚ जिसकी विवेचना प्रचलित है‚ लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रह है। मैं अपने पति से छुटकारा चाहती हूँ लेकिन वह तलाक भी नहीं दे रहा है‚ मेरा एक तीन वर्ष का पुत्र भी है। कृपया मुझे सरल प्रक्रिया बताये कि मुझे उससे कैसे छुटकारा मिल सकता है एवं कितना समय लगेगाॽ

 

समाधान-

प ने पुलिस के समक्ष जो शिकायत की है उस पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है या नहीं पहले यह तलाश करें। यदि पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की है तो आप एक पत्र पंजीकृत डाक से एस.पी. को प्रेषित करें जिस के साथ अपनी मूल शिकायत की प्रति भी भेजें। इस से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो कर कार्यवाही आरंभ हो जाएगी। यदि तब भी न हो तो किसी स्थानीय वकील की मदद से आप सीधे न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली तो उन के लिए कार्यवाही करना जरूरी है। या तो वे आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे या फिर यह रिपोर्ट की कोई मामला नहीं बनता है। यदि वे मामला न बनने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे तो न्यायालय आप को सूचित करेगा तब आप अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकती हैं अपना व अपने गवाहों के बयान करवा सकती हैं जिस पर न्यायालय प्रसंज्ञान ले सकता है।

जिस तरह का आप के पति का व्यवहार है उस से आप को अलग रहने का हक मिल गया है। आप अपने पुत्र के साथ अलग रह सकती हैं। आप स्वयं अपने लिए और अपने पुत्र के लिए धारा 125 दण्ड प्रकिया संहिता में तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण के खर्चे के लिए स्वयं वकील की मदद से न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। फिलहाल आप इतना करें।। इतना सब होने के बाद आप का पति आप को तलाक देने पर विचार कर सकता है। आगे की स्थिति पर बाद में विचार किया जा सकता है।

आत्महत्या की बात करना बन्द कर मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें।

rp_two-vives2.jpgसमस्या-

अतुल कुमार ने कोटद्वार, पौढ़ी गढ़वाल, उत्तराखंड़ से पूछा है-

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13ख के अन्तर्गत मेरा डायवोर्स 11 दिसम्बर 2014 को हो गया था अप्रेल 2015 में मैं ने दूसरा विवाह कर लिया। 04 मई 2015 को मेरी एक बेटी भी हो चुकी है। अब मेरी पूर्व पत्नी ने धारा 125 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत भरण पोषण केलिए मुकदमा किया है जिस में 15000 रुपए प्रतिमाह भरण पोषण की मांग की है। जब कि मेरा वेतन 22400 रु. प्रतिमाह ही है। इस में से भी 16000 रु. प्रतिमाह हाउसिंग लोन की किस्त कट जाती है। ऐसे में मैं क्या कर सकता हूँ। मेरे पास आत्महत्या करे के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

समाधान-

मैं ने अपने जीवन में अनेक ऐसे लोग देखे हैं जिन्हों ने मुझे कहा कि यदि उन की समस्या हल नहीं हुई तो उन के पास आत्महत्या के सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं है। मैं ने उन की मदद करने की कोशिश भी की। कुछ की समस्या का हल निकला और कुछ की का नहीं। पर उन में से किसी ने आत्महत्या नहीं की है। आप भी नहीं करेंगे। दरअसल उन में से हर कोई आत्महत्या करने की बात सिर्फ सहानुभूति बटोरने और मुफ्त में मदद प्राप्त करने के लिए करता था। मुझे आप भी उन्हीं में से एक लगते हैं। आप आत्महत्या नहीं करेंगे, और कर भी लें तो आप ने इस प्रश्न में जो आत्महत्या करने की बात लिखी है उस से किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वस्तुतः अब मैं आत्महत्या करने की बात करने वालों से घृणा करने लगा हूँ। खैर¡

आप की एक बात समझ नहीं आई की आप की जो बेटी मई 2015 में हुई है उस की माँ कौन है? आप को आत्महत्या ही करनी थी तो इस बेटी को संसार में आने ही क्यों दिया? केवल पूर्व पत्नी के भरण पोषण मांग लेने मात्र से आप आत्महत्या की सोचने लगे?

पूर्व पत्नी ने जो भरण पोषण मांगा है न्यायालय उसे वही देने का आदेश नहीं देगी। आप इस आवेदन का प्रतिरक्षा अच्छे वकील की मदद से करेंगे तो या तो भरण पोषण देना ही नहीं पड़ेगा और देना पड़ा तो वह ऐसा होगा जो आप दे सकें। आप आत्महत्या की बात करना बंद करें और मुकदमा लड़ें। यहाँ आत्महत्या की बात करने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी भी आप को मांग लेनी चाहिए।

मुकदमे की पैरवी में कोताही न बरतें।

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नरेन्द्र ने डुले, महाराष्ट्र से पूछा है-

मैं आपनी पत्नी को दो साल बाद काउंसिलिंग करके  घर ले आया मेरी दो लडकियाँ हैं,  मैं ने उनका इंग्लिश स्कूल में एडमिशन करवा दिया है।  बड़ी लड़की ३ में है और छोटी लड़की एलकेजी में है।  २ माह  पेपर को बाकी थे, हम दोनों का वाद हुआ तो घर से चली गई और केस कर के मुझे अदालत में केस में मुझसे पालन पोषण के लिए १३००० हजार रुपये मांग रही है। मैं निम्न सरकारी कर्मचारी हूँ। मेरा वेतन  १३, ५००  रुपया है उसमें काट का मेरे पास ५००० हजार रुपये आते हैं।  कृपया मुझे बताएँ कि मैं क्या करूँ?

समाधान-

प की पत्नी ने आप के विरुद्ध पालन पोषण का खर्चा प्राप्त करने के लिए आवेदन किया है। इस तरह के आवेदन धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम तथा हिन्दू विधि के अन्तर्गत प्रस्तुत किए जा सकते हैं। तीनों के न्यायालय भिन्न भिन्न हो सकते हैं और तीनों आवेदन एक साथ भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं और तीनों पर विचारण भी हो सकता है। आप ने अपनी समस्या में यह नहीं बताया कि आप के विरुद्ध यह आवेदन किस प्रकार है और किस तरह के न्यायालय के समक्ष है। तीनों ही न्यायालयो से अलग अलग परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि आप किसी स्थानीय वकील की मदद लें और उन्हें बताएँ कि आप की आय और आर्थिक साधन क्या हैं? पत्नी के पास बच्चियों के साथ अलग रहने का कोई  उचित कारण भी है अथवा नहीं है। आप आप के विरुद्ध प्रस्तुत आवेदन का जवाब वकील से तैयार कराइए और अपना प्रतिपक्ष मजबूती से प्रस्तुत कीजिए। यदि आप की आय 13500 रुपए ही है और आप इसे न्यायालय में साबित कर देते हैं कि इस के सिवा आप की कोई अन्य आय नहीं है, तो इस आय के आधार पर ही भरण पोषण निर्धारित किया जा सकता है जो इस बात पर निर्भर करेगा कि आप की कुल आय पर कितने लोग आश्रित हैं और उन के बीच कैसे उचित वितरण किया जा सकता है। आप अपने वकील को सारी बात समझाएँ उन्हें मजबूत सबूत दें। अपनी ओर से मुकदमे की पैरवी कराने में कोताही नहीं बरतेंगे तो आप को अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे।

बिना आवेदन किए तो तलाक नहीं होगा, डरने से तो समस्या बनी ही रहेगी।

rp_divorce.jpgसमस्या-

नन्द किशोर ने बरेली उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा विवाह 2008 में हुई थी। जून 2009 में मेरा एक्सीडेण्ट हुआ और सितम्बर 2009 में पत्नी मुझे छोड़ कर चली गयी। उस ने मुझ पर  498ए, 125 का केस कर दिया 498ए में सब की जमानत हो चुकी है ओर मुझ लगभग 3 दिन जेल में रहना पड़ा। 125 का केस डिसमिस हो चुका है। उस के चार माह बाद पत्नी ने  125 वा 125 (6) का केस फाइल कर दिया जिसमे 125(6) में अंतरिम मैंटीनेंस 1000 प्रति माह देना पड़ रहा है ओर मैं बेरोज़गार हूँ। शादी के टायर पंचर सुधारने का काम करता था उसी दौरान मेरा एक्सीडेंट हुआ था जिस में मेरा दायाँ पैर फ्रेक्चर हुआ था और रॉड डालनी पड़ी थी। अब भारी काम नहीं कर सकता और पिताजी पर पूरी तरह से निर्भर हूँ। इसी मार्च में पत्नी ने घरेलू हिंसा। फेमिली जज ने कुछ नहीं सुना और भरणपोषण की राशि तय कर दी।  अब पता चला है कि पत्नी किसी दूसरे पुरुष के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही है और  हर माह 4000-5000 कमा रही है। वह सरकार से अखिलेश पेंशन योजना में भी 500 रुपया प्रतिमाह ले रही है इस का सबूत मेरे पास है लेकिन नौकरी ओर दूसरे के साथ रहने का सबूत नहीं है। मैं ने प्रयत्न किया ता पर शायद पत्नी को पता चल गया और उस ने 498ए की बहस के दिन अपने पिता और ब्वाय फ्रेंड के साथ मुझे घेर लिया  और  जान से मरने की धमकी दी और दस लाख रुपए की मांग की। ओर इसकी सूचना मैंने ई मैल व रजि. डाक से एसएसपी, डीआईजी को दी। दो सप्ताह बाद एसएसपी के यहाँ से फोन आया और मुझे बुलाया पर विवेचना अधिकार का ट्रांसफर हो गया। फिर कोई फोन नहीं आया। वकील ने थाने जाने से मना कर दिया। कह रहा था कि तुम से रुपए ले लेंगे और चुपचाप बैठ जाएंगे। क्या मैं तलाक ले सकता हूँ। मेरा वकील कहता है कि तुम तलाक के लिए आवेदन दोगे तो वह धारा 24 का आवेदन कर देगी और तुम्हें मुकदमे का खर्च उठाना पड़ेगा।

समाधान-

प साधारण टायर पंचर का काम करते थे, एक्सीडेंट के बाद वह भी बंद हो गया। भारी काम न कर पाने के कारण भविष्य की संभावनाएँ समाप्त हो गयीं। पत्नी ने अपना भविष्य देखा और आप को छोड़ कर चली गयी। आप को उसी समय धारा 9 हिन्दू अधिनियम का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए था। वह आप के साथ आ कर अब नहीं रहेगी। विवाह को समाप्त कराने के लिए आप को तलाक तो लेना होगा। इस के लिए जितनी जल्दी हो आप मुकदमा कर दें बेहतर है। धारा 24 के आवेदन की परवाह न करें। वह तो हर केस में लगता ही है। उस से डर कर मुकदमा न करेंगे तो फँसे ही रह जाएंगे।आप की समस्या का हल कभी न निकलेगा।

आप को प्रयत्न करना चाहिए और हर हालत में अपनी पत्नी के लिव-इन रिलेशन और कमाई करने के सबूत इकट्ठे करने चाहिए. यदि दोनों बातें सही हैं तो सबूत अवश्य मिलेंगे। इन सबूतों से ही आप को राहत मिलेगी। आप क्रूरता, स्वेच्छा से आप का घर छोड़ कर चले जाने और वापस नहीं आने और जार कर्म के आधार पर तलाक का मुकदमा कर सकते हैं और तलाक मिल सकता है। इन सबूतों के आधार पर ही उसे मेंटीनेंस मिलना भी रुक सकता है। आप को घेर कर धमकी देने के मामले आप को स्वयं पुलिस को सहयोग करना पड़ेगा। आप पुलिस को रुपया न दें लेकिन लगातार दबाव बनाएँ तो पुलिस कार्यवाही करेगी। यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो उस मामले में सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है।

निस्सहाय माँ और बहिन का भरण पोषण करना पुरुष का दायित्व।

समस्या-marriage concilation

रवि शर्मा ने मेरठ, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी शादी 05-12-2012 को हुई थी, लेकिन पत्नी शादी के बाद कुछ समय तक तो सही रही, बाद में मुझ पर दवाब बनाने लगी कि मैं अपनी माँ और बहन से अलग रहूँ। मेरी बहन मानसिक रूप  से विकलांग है।  मेरे पिताजी का देहान्त 2011 में हो चुका है। अब मेरी बहन और मेरी मां का मेरे अलावा कोई भी नहीं है। ऐसे में मैं अपनी माँ और बहन को कैसे छोड़ सकता हूँ।  मैने ये बात उसको कई बार समझाई लेकिन वो मेरी बात मानने को तैयार नही है। उसके माता पिता से बात की तो वो भी अपनी लड़की का पक्ष लेते हैं।  जब मैं ने उनसे ज़्यादा कहा तो उन्होने मेरे साथ लड़ाई की और कहा कि या तो जैसा हस कहते हैं वैसा करो नहीं तो आज के बाद हमारी लड़की को लेने मत आना। नही तो हम तुम्हें दहेज के केस में फँसा देंगे। फिर मैं उसको लेने के लिए नही गया।   कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझ पर दहेज का झूठा केस कर दिया जिस में उन्होने मेरे सहित मेरे परिवार के अन्य लोगों जैसे मामा, मामी, ताऊ  और मामा के लड़के का नाम लिखवाया है। हम सब पर उन्होने धारा 376 ,377,504,506,307,498ए, 3/4 डीपी एक्ट धारा की 323  धाराएं लगाई हैं जिस में हम सब लोगों की जमानत हो चुकी है। इसके अलावा उन्होंने मुझ पर घरेलू हिंसा  व धारा 125 दंड प्र. संहिता का केस भी किया हुया है। जेल से बाहर आने के बाद मैंने अपनी पत्नी पर  तलाक़ का केस कर दिया है जो कि अभी कोर्ट में चल रहा हैं जिस के चलते हुए अभी 1 वर्ष चार माह हो चुके हैं  धारा 125 मे मेंटीनेन्स भी बंध चुका है और मैं उसको हर महीने मेंटीनेन्स दे रहा हूँ। अब मेरा आप से एक सवाल हैं कि क्या मुझे क्रूरता  के आधार पर तलाक़ मिल सकता हैं और तलाक़ के केस को तेज़ी से चलाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? क्यूंकी मेरी उमर अब 30 वर्ष हैं यदि 1 या 2 साल में मुझे तलाक़ नहीं मिला तो मेरी उम्र शादी के लायक नहीं रह जाएगी। लेकिंन वो लड़की मुझे तलाक़ नहीं दे रही है। मैं ने कई बार म्यूचुअल डाइवोर्स  के लिए भी कोशिश कर के देख लिया है। लेकिन वो म्यूचुअल डाइवोर्स के लिए तैयार नही है। अब मैने फ़ैसला कर लिया हैं कि अब मैं उसको किसी भी कीमत पर नही रखूँगा। क्या मैं उस पर पर्जुरी का केस कर सकता हूँ?

समाधान-

प की कहानी एक आम कहानी है। निश्चित रूप से आप अपनी बहन और माँ को नहीं छोड़ सकते। आप की जो भी परिस्थितियाँ हैं उन में ऐसा करना अमानवीयता भी होगी और एक अपराध भी होगा। आप की माँ और बहन दोनों आप पर निर्भर हैं। यदि आप उन्हें छोड़ देते हैं तो वे महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में आप के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती हैं। इस के अलावा वे धारा 125 अपराध प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत भी भरण पोषण मांगने की हकदार हैं। वे इतना ही नहीं करतीं बल्कि आप की पत्नी के आप का घर छोड़ देने के बाद आप की देखभाल करने का जिम्मा भी उठा रही होंगी।

लेकिन जब आप की पत्नी और उस के परिजन आप के विरुद्ध वे सभी कानूनी कार्यवाहियाँ कर चुके हैं जो वे कर सकते थे। अब उन के तरकश में कोई तीर शेष नहीं है। आप को और आप के परिजनों को परेशान करने के जितनी शक्ति और अवसर थे उन सब का वे प्रयोग कर चुके हैं। आगे आप का कुछ नहीं बिगड़ना है। सभी अपराधिक मुकदमे मिथ्या हैं इस कारण उन सब में आप और आप के परिजन दोष मुक्त हो जाएंगे। आप को सिर्फ इतना करना है कि मुकदमों को ध्यान से लड़ना है, वकील अच्छा हो तो और भी अच्छा है। आप सफल होंगे। इन परिस्थितियों में आप को तलाक भी मिल जाएगा। आप यह सोचना बन्द कर दें कि एक दो साल बाद आप को जीवन साथी का अकाल हो जाएगा। अब वह जमाना नहीं रहा जब कि इस उम्र में जीवन साथी न मिले। यदि आप जाति की परवाह न करें तो अच्छी जीवनसाथी आप को मिल जाएगी।

हमारे यहाँ मुकदमों में समय लगता है। लेकिन यदि आप को अच्छा जीवन साथी मिले तो आप बिना विवाह के भी उस के साथ लिव-इन रिलेशन बना कर रह सकते हैं। यह कोई अपराध नहीं है। इस में तलाक होना जरूरी नहीं है।

मेरा एक सुझाव है कि आप अपनी माँ और बहिन को सुझाव दें कि वे आप के विरुद्ध घरेलू हिंसा अधिनियम में आप के विरुद्ध आवास और भरण पोषण की मांग करते हुए मुकदमा कर दें। आप उस का विरोध करें या न करें तब भी उन दोनों को आवास और भरण पोषण प्रदान करने का आदेश अदालत आप के विरुद्ध दे देगी। तब उन दोनों के लिए यह सब उपलब्ध कराना आप का दायित्व हो जाएगा जिसे आप अपने मुकदमों में भी प्रदर्शित कर सकते हैं। इस से आप को आप की पत्नी द्वारा किए गए मुकदमों में बचाव करने में मदद मिलेगी।

भरण पोषण राशि न्यायालय को निर्धारित करने दें।

court-logoसमस्या-

सिद्धान्त ने इन्दौर मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है-

मेरी शादी सन 2001 में हिंदू रीति रिवाज़ से हुई थी। 2011 तक मैं, मेरी पूर्व पत्नी और हमारी दो बच्चियां, हम चारों साथ रहते थे। फिर हमारा आपसी सहमति से तलाक हो गया। किसी और पुरुष के साथ रंगे हाथों पकड़े जाने से वह उस वक़्त आत्मग्लानि में थी और इसलिए अपने लिए बिना कुछ मांगे आपसी सहमती से तलाक़ के लिये राज़ी हो गयी। हालांकि दो बच्चियों के लिए उसके वकील ने मुझसे 15000/- हर महीने (तब मेरी सैलरी 30 हज़ार थी) की लिखित मांग की जिस पर मैंने अपने वकील की सलाह के विपरीत हस्ताक्षर कर दिए। तभी से मैंने उसे 15 हज़ार देने शुरू कर दिए।  अब जब भी मेरा प्रमोशन होता है या मैं कम्पनी बदलता हूँ तो मेरी सेलेरी बढ़ जाती है। उसे इस बात का पता चल जाता है और वो पैसे बढ़ाने का दबाव डालती है। सन 2014 में उसने मुझे फोन करके कहा कि यदि वो कोर्ट चली जाएगी तो जैसे पहले 30 हज़ार में से 15 हज़ार तुमने दे दिए थे तो उसी अनुपात को देखते हुए उसे 50 हज़ार (मेरी सन 2014 की सेलेरी) में से 25 हज़ार भी मिल जायेंगे। मैंने उसकी बात को क़ानून सम्मत मानते हुए और टाइम बचाने के चक्कर में बिना कोर्ट जाये (बिना किसी लिखा पढ़ी के) पैसा बढ़ा दिया। मैं पैसे हमेशा चेक से देता हूँ।  अब मैं फिर कम्पनी बदल रहा हूँ, इस बार मेरी सेलेरी 66 हज़ार होने वाली है। उसे पता चलेगा, वो फिर से 33 हज़ार की जिद करेगी। मेरे ये प्रश्न हैं आपके लिए:  (1) मुझे कब तक पैसे बढ़ाते रहने पड़ेंगे?  (2) वो कहती है की कोर्ट के बाहर ही मान जाओ क्योंकि कोर्ट तो मेरा पैसा बड़ा ही देगा क्योंकि ये क़ानून में लिखा है कि पिता की सेलेरी बढ़ने पर उसी अनुपात में बच्चों की भरण पोषण राशि को भी बढाया जाना चाहिए। क्या मुझे कोर्ट में जाकर ये कहने से राहत मिल सकती है कि मैं कब तक पैसे बढ़ाता रहूँ? क्योंकि मेरे पैसे तो जब तक मैं जॉब करता रहूँगा बढ़ते ही रहेंगे। क्या इसकी कोई सीमा नहीं?   (3) उसने उस समय अपने लिए पैसा नहीं माँगा था केवल बच्चियों के लिए ही माँगा था, अब वो कहती है कि मैं अपने लिए भी मांगूंगी। जबकि हमारे डिक्री में लिखा है कि हम दोनों कभी एक दूसरे से कुछ नहीं मांगेंगे।  अन्य बिंदु:  (a) वो अब एक बड़े स्तर का ब्यूटी पार्लर चलाती है और अच्छा खासा कमाती है। लेकिन उसने अपने वकील के कहने पर वो पार्लर अपनी माँ या मौसी के नाम खोल रखा है और उसमे खुद को एम्प्लोयी दिखाकर अपनी तनख्वाह मात्र 5000 दिखाई है। जबकि मैं एक मल्टी नेशनल कम्पनी में काम करता हूँ और कोर्ट में पूछे जाने पर अपनी आय छुपा  नहीं सकता हूँ।  (b) डिक्री में उसकी चरित्र हीनता का कोई उल्लेख नहीं है बस यही लिखा है कि हम स्वेच्छा से अलग होना चाहते हैं। हमें डिक्री विधिवत 6 महीने बाद मिली थी।  (c) मेरी बच्चियों की उम्र 8 और 10 साल है।  (d) मैंने अभी तक न तो शादी की है और न ही करने का विचार है।  (d) मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं लाखों रुपये देकर भरण पोषण से हमेशा के लिए पीछा छुड़ा लूं।  (e) मेरी उम्र 40 वर्ष है, स्वभाव से एक संवेदनशील व्यक्ति होने की वजह से डिप्रेशन का शिकार हो गया हूँ और इलाज़ करवा रहा हूं। वैसे जॉब में मेरा परफोर्मेंस काफी अच्छा रहता है।

समाधान-

प ने अपने वकील की सलाह न मान कर गलती की। आप को चाहिए था कि बच्चों के लिए भरण पोषण राशि न्यायालय को निर्धारित करने देते।  पहले ही आप ने बच्चों के लिए भरण पोषण राशि अधिक स्वीकार की हुई है। आप की पत्नी स्वयं रोजगार में है इस कारण वह आप से भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारिणी नहीं है। वह केवल आप की भावनाओं तथा न्यायालय में विवाद खड़ा होने से बचने की आप की कोशिश का अनुचित लाभ उठा रही है।

आप को तुरन्त यह करना चाहिए कि भरण पोषण की राशि देना बन्द कर देना चाहिए। यदि आप की पूर्व पत्नी आप से इस के लिए संपर्क करती है तो उसे स्पष्ट कहें कि वह खुद कमाती है उसे बच्चों का पालन पोषण खुद करना चाहिए। फिर भी वह बच्चों के लिए तथा स्वयं के लिए भरण पोषण राशि चाहती है तो शौक से न्यायालय में आवेदन कर दे। जो राशि न्यायालय निर्धारित कर देगा आप दे देंगे। यदि वह न्यायालय जाती है तो आप सारे तथ्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं। न्यायालय भरण पोषण की उचित राशि निर्धारित कर देगा जो कि निश्चित ही उस से कम होगी जो आप अभी दे रहे हैं। प्रतिक्रिया में आप भी बच्चों की कस्टडी के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस से आप को अच्छे परिणाम मिलेंगे।

आप को इस के लिए डिप्रेशन का शिकार होने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिस तरह आप का परफोरमेंस जॉब में अच्छा रहता है, आप सक्षम हैं कि आप का परफोरमेंस सभी जगह वैसा ही रहे।

अपने मुकदमे में स्वयं पैरवी करने का पक्षकार का अधिकार नैसर्गिक है।

समस्या-

बबिता वाधवानी ने मानसरोवर, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा प्रेम विवाह 1994 में आर्य समाज मन्दिर में हुआ। पति के सकाराक व्‍यवहार न होने के कारण व समय के साथ अपमान करने की हदें पार करने के कारण मैंने सितम्‍बर 2005 में आपसी सहमति से तलाक ले लिया। तलाक के दिन घर आकर क्‍योंकि हम एक ही घर के दो कमरों में अलग अलग रहते थे, मैंने कारण पूछा था कि इस नकारात्‍मक व्‍यवहार के पीछे क्‍या कारण था तो मुझे जवाब मिला कि दोस्‍तो में शर्त लगी थी कि कौन इस लडकी से प्‍यार का नाटक कर शादी कर सकता है, तो मैंने शर्त जीतने के लिए प्‍यार का नाटक किया था और तुमसे शादी की थी। मेरी बेटी का जन्‍म 1997 में हुआ। मैंने कोर्ट में बच्‍ची की जिम्‍मेदारी मांगी लेकिन मैंने उसकी पढाई का खर्चा पिता को उठाने के लिए लिखा। मैंने अपने लिए कोई खर्चा नहीं मांगा क्‍योंकि उसके साथ रहते हुए ही मैंने अपनी कमाई से ही अपने लिए दो रोटी जुटाई तो तलाक के बाद उससे आशा रखना बेकार था। उसने बेटी की जिम्‍मेदारी मांगी नहीं तो बेटी की कस्‍टडी मुझे मिल गयी। कोर्ट ने निर्णय में लिखा ही नहीं कि बेटी की पढाई का खर्चा पिता उठायेगा। घर पर हमारी आपसी स‍हमति थी कि इस घर में मैं व मेरी बच्‍ची रहेगी, उसे जाना होगा। तलाक के कुछ महीने बाद ही मुझे बैंक का नोटिस मिला कि आपके मकान पर लोन लिया गया है उसकी किस्‍त चुकाये। मैंने जानकारी जुटायी तो मुझे पता चला कि मकान किसी अन्‍य स्‍त्री के नाम किया जा चुका है व मोटी रकम लोन के रूप में ली जा चुकायी है। उस रकम से विदेश यात्रा की जा चुकी थी व रकम खर्च की जा चुकी थी। ये रकम चुकाना मेरे लिए सम्‍भव नहीं था । मैंने रूवा महिला एजीओ से सम्‍पर्क भी किया था तो मुझे जवाब मिला दूसरी महिला के नाम मकान हो चुका है तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। वो बिक गया और बैंक लोन की रकम चुकाने के बाद मेरे पास थोडी सी रकम बची। मैं दस साल तक किराये के मकान में रही व अतिरिक्‍त हानि किराये के रूप में उठायी। बेटी की फीस स्‍कूल में अनियमित रूप से जमा हुयी यानि अकसर फीस का चैक अनादरण हो जाता। मुझे हर बार कोर्ट में शिकायत कर दूंगी कह कर फीस लेनी पडी। आज मेरी बेटी कालेज में आ गयी है। पिछले चार महीने से वो कुछ भी खर्चा बेटी को नहीं भेज रहा क्‍योंकि वो दिल्‍ली में रहकर अपनी पढाई कर रही है तो पिता का फर्ज है कि वो उसको खर्चा भेजे। पारिवारिक पेन्‍शन मुझे प्राप्‍त होती है लेकिन मुझ पर आर्थिक दबाव आ रहा है। मैं चाहती हूँ कि कानूनी रूप से इस व्‍यक्ति से कर्तव्‍यपालन कराया जाये कि बेटी की पढाई का खर्चा नियमित उठाये। लेकिन इस मामले का एक पक्ष ये भी है कि जैसे मैंने अपने लिए कभी खर्चा नहीं मांगा, मेरी बेटी भी शायद ही ये बयान दे कि मुझे पिता से खर्चा चाहिए। क्‍या ऐसे में केस किया जा सकता है। क्‍या मैं खुद इस हेतु पारिवारिक कोर्ट में आवेदन दे सकती हूँ। मैं वकील का खर्चा नहीं उठा सकती, राज्‍य विधिक सेवा बहुत समय लगाती है वकील देने में व राज्‍य विधिक सेवा से प्राप्‍त वकील केस में रूचि नहीं लेते ये मैं प्रत्‍यक्ष देख रही हूँ। कुछ मामलों में, सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते। क्‍या मैं अपना केस खुद देख सकती हूँ व इसके लिए कौन सी धाराओं में आवेदन करना होगा । क्‍या कोई आवेदन का तरीका निश्‍चित है या सादे कागज में लिख कर दिया जा सकता है। इन सब प्रकियाओं में कितना समय लगता है। आवेदन का प्रारूप किसी बेबसाइट पर प्राप्‍त किया जा सकता है क्‍या। कानून किसी पुरूष को इतनी छूट कैसे दे सकता है कि वो औरत की गोद में बच्‍चा दे व उसका भरण पोषण भी न करे।

समाधान-

प की बेटी का जन्म 1997 में हुआ है उस हिसाब से वह 18 वर्ष की अर्थात बालिग हो चुकी है। इस कारण केवल वही अपने लिए अपने पिता से खर्चा मांग सकती है। न्यायालय में आवेदन उसे ही करना होगा। यदि आप की समस्या यह है कि आप की बेटी स्वयं भी अपने पिता से भरण पोषण का खर्च नहीं मांगना चाहती तो फिर आप इस मामले में कुछ नहीं कर सकतीं। लेकिन यदि वह स्वयं चाहे कि उस का पिता उस के भरण पोषण का खर्च दे तो फिर वह धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में स्वयं के भरण पोषण के लिए खर्चा अपने पिता से प्राप्त करने का आवेदन का आवेदन कर सकती है। यह आवेदन यदि उस का पिता जयपुर में निवास करता है तो जयपुर के परिवार न्यायालय में किया जा सकता है। परिवार न्यायालय में वकील किए जाने पर वैसे भी वर्जित है वहाँ वकील केवल न्यायालय की अनुमति से ही किसी पक्षकार की पैरवी कर सकते हैं। आप की पुत्री की समस्या यह है कि वह दिल्ली में अपना अध्ययन कर रही है।

स आवेदन के प्रस्तुत करने के उपरान्त मुकदमे की प्रत्येक सुनवाई पर प्रार्थी का न्यायालय में उपस्थित होना आवश्यक है। किन्तु यदि न्यायालय चाहे तो ऐसा आवेदन देने वाले को व्यक्तिगत उपस्थिति से मुक्त कर सकता है और आप के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे सकता है वैसी स्थिति में आप उस की पैरवी कर सकती हैं। लेकिन कम से कम कुछ पेशियों पर आप की बेटी को उस का खुद का बयान दर्ज कराने और जिरह कराने के लिए तो न्यायालय में उपस्थित होना ही पड़ेगा। अब यह आप को सोचना होगा कि आप अपनी बेटी को यह आवेदन करने के लिए तैयार कर सकती हैं या नहीं।

दि आप किसी वकील की मदद नहीं लेना चाहती हैं तो आप को सारी प्रक्रिया स्वयं जाननी होगी। आवेदन के प्रारूप तो पुस्तकों में मिल जाते हैं। कोई भी हिन्दी में प्रकाशित अभिवचनों की पुस्तक में सभी प्रकार के आवेदनों के प्रारूप मिल जाएंगे। यह पुस्तक आप खरीद सकती हैं। इसी पुस्तक में आप को यह जानकारी भी मिल जाएगी कि अभिवचनों में क्या क्या होना आवश्यक है।

किसी भी मुकदमे में पक्षकार अपनी पैरवी स्वयं कर सकता है यह उस का नैसर्गिकअधिकार है। वकील तो वह स्वयं अपनी मर्जी से ही करता है। कानून ने वकील करने का अधिकार पक्षकार को दिया है। लेकिन वह इस का उपयोग न करना चाहे तो वह स्वतंत्र है। अदालतें वकील लाने की बात बार बार इस कारण करती हैं कि हमारे यहाँ न्याय की प्रक्रिया कुछ अधिक तकनीकी हो गयी है जिस के लिए अनेक जानकारियाँ होनी आवश्यक हैं। वे जानकारियाँ पक्षकार को न होने के कारण न्यायालय का समय बहुत जाया होता है। देश में अदालतें जरूरत की 20 प्रतिशत भी नहीं हैं। कार्याधिक्य होने से वकील करने पर न्यायालय जोर देता है क्यों कि इस से उसे सुविधा होती है। लेकिन कोई भी न्यायालय किसी पक्षकार का मुकदमा केवल इस लिए खारिज नहीं कर सकता कि उस ने वकील नहीं किया है।

ह सही है कि हर एक व्यक्ति के बस का नहीं है कि वह वकील की फीस चुका सके। विधिक सेवा प्राधिकरण में भी वकील देने में समय लगता है और वहाँ से नियत वकील को फीस इतनी कम मिलती है कि वह पैरवी में कम रुचि लेता है। इसी कारण यह योजना एक असफल योजना बन कर रह गयी है।

क व्यक्ति जो स्वयं अपने मुकदमों की अथवा किसी अन्य व्यक्ति की पैरवी करना चाहता है उसे लगभग वह सब सीखना होता है जो एक वकील अपने प्रोफेशन के लिए सीखता है। यदि आप स्वयं यह काम करना चाहती हैं तो आप को स्वयं यह दक्षता हासिल करनी होगी। बहुत लोग इस देश में हुए हैं जो कि वकील या एडवोकेट न होते हुए भी न्यायालय में पैरवी करते रहे हैं। वर्तमान में भी अनेक लोग ऐसा कर रहे हैं। श्रम न्यायालय में यूनियनों के लीडर और उपभोक्ता न्यायालयों में अनेक व्यक्ति इस तरह पैरवी कर रहे हैं। पर उस के लिए आप को बहुत श्रम करना पड़ेगा। आप चाहें तो स्वयं भी एलएलबी कर सकती हैं और एक एडवोकेट के रूप में बार कौंसिल में अपना पंजीकरण करवा सकती हैं। आप एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं तो आप को तो बार बार न्यायालय में जाना ही होगा। आप को स्वयं कानून की पढ़ाई करने और एक एडवोकेट होने का प्रयत्न करना चाहिए। आप के लिए यह बेहतर होगा। इस तरह आप स्वयं बहुत लोगों की मदद कर पाएंगी।

क बात और अंत मे आप से कहना चाहूंगा कि हमारी समाज व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं है। इस की न्याय व्यवस्था भी जितना न्याय लोगों को चाहिए उस का सौवाँ अंश भी नहीं कर पाती। इस समाज व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, यह सब आप अपने अनुभव से अब तक जान गयी होंगी। लेकिन उस के लिए देश के लाखों-करोडों जनगण को जुटना होगा। बहुत लोग इस दिशा में काम कर रहे हैं। आप का भी थोड़ा ही सही उस तरफ योगदान है। आप कोशिश करें कि उस काम में कुछ अधिक योगदान कर सकें।

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