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लिव इन रिलेशन न्यायपालिका की कम समय में वैवाहिक विवादों का निपटारा करने की अक्षमता से उपजा है।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

पत्नी के झगड़ा करने के कारणों को जानने और उन्हें हल करने की कोशिश करें …

divorceसमस्या-

मुकेश कुमार पटेल ने महाराजगंज, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को ५ साल हो गए है, पर मेरी पत्नी मेरे साथ नहीं रहती है। मैं एक किसान हूँ और साथ मेरा व्यापार भी है। जब साथ रहती है तो आये दिन घर में झगड़ा होता रहता है। जिसका जिम्मेदार वो मेरे माता पिता को कहती है। झगड़ा होने के 1 से 2 दिन बाद ही अपने पिता को बुलाकर मायके चली जाती है और बार बार बुलाने पर भी वापस नहीं आती है। यह सब देख कर मेरे पिता जी की तबियत खराब हो गई है, दो बार तो हॉस्पिटल में भर्ती हो चुके हैं। पूरा परिवार मानसिक रूप से बहुत ही परेशान है। मेरी पत्नी के पिता वकील हैं जिस से वो बार बार धमकाती रहती है कि केस कर दूँगी। मेरे दो बच्चे हैं, एक ४ साल के बेटी और एक 1.5 साल का बेटा। सभी बच्चों के वापस आने की आस में ही रहते हैं। परन्तु इसका कोई भी प्रभाव मेरी पत्नी या उसके माता पिता पर नहीं पड़ता है। इन सभी परिस्थितियों से परेशान हो कर मै तलाक लेना चाहता हूँ और बच्चों को अपने पास रखना चाहता हूँ कृपया आप समाधान बताएँ।

समाधान-

प का पत्नी के साथ झगड़ा होता है, फिर पत्नी बच्चों के साथ मायके चली जाती है। वह झगड़े का कारण आप के माता-पिता को बताती है। कोई न कोई समस्या तो है जिसे आप समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समझते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं। यदि पत्नी बेमानी झगड़ा कर रही है तो पिता भले ही वकील हो बेटी का पक्ष बिना किसी आधार के क्यों लेगा? आप झगड़े का कारण तलाश करिए। हमारे पारिवारिक वातावरण में बहुत सी चीजें खास तौर पर बहुओं के साथ व्यवहार संबंधी चीजें परंपरागत रूप से ऐसी बनी हैं कि हमें उस में कोई कमी नहीं नजर आती। लेकिन आज की महिला उन्हीं चीजों को बर्दाश्त नहीं कर पाती। इस से विवाद पैदा होते हैं। इन विवादो का एक ही हल है कि या तो बहू अपने को ससुराल के वातावरण में ढाल ले, या फिर प्रतिरोध करे। आप की पत्नी कुछ चीजों का प्रतिरोध कर रही है। उस प्रतिरोध को समझिए और हल करने की कोशिश कीजिए। कुछ अपने माता पिता को भी समझाइए। आप ने लिखा है कि पूरा परिवार बच्चों के आने का इन्तजार करता रहता है। लेकिन क्या कोई भी बच्चों की माँ के आने का भी इन्तजार करता है? आप के इस कथन से ऐसा भी लगता है कि आप की पत्नी को आप के परिवार में प्रेम, स्नेह मिला ही नहीं। वह केवल एक औजार की तरह आ कर परिवार में फिट हो गयी।

में अभी तक आप के तलाक लेने का कोई आधार नजर नहीं आता। आप मुकदमा करेंगे तो पत्नी के पिता तो वकील हैं ही। वे प्रतिवाद भी अच्छा करेंगे और आप के विरुद्ध कई मुकदमे करेंगे। बरसों तक मामला सुलझेगा नहीं। बच्चों की कस्टड़ी भी फिलहाल कुछ वर्ष आप को नहीं मिलेगी। यदि बच्चे कुछ वर्ष और आप से अलग रह गए तो फिर वे भी आप के साथ रहना नहीं चाहेंगे।

प के 1.5 और 4 वर्ष के दो बच्चे हैं, ये दोनों बच्चे बिना माँ के नहीं आ गए। आप को फिलहाल तलाक के बारे में सोचने के स्थान पर इस रिश्ते को ठीक करने और आगे बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए। आप की पत्नी जिन बातों पर झगड़ा करती है उन के बारे में विचार करें कि वह कितनी गलत या सही झगड़ा करती है। पत्नी के पिता से मिलिए। संभव हो तो काउंसलर्स की मदद लीजिए पर इस झगड़े को आपसी बातचीत के तरीके से हल कीजिए। चाहे उस का अंतिम बिन्दु साथ रहना हो या फिर विवाह विच्छेद। सहमति से मामला निपटेगा तो दोनों पक्षों को नुकसान कम से कम होगा।

पति की मृत्यु हो जाने के उपरान्त विवाह को कैसे पंजीकृत कराएँ?

ChildMarriageसमस्या-

अनिल मीणा बून्दी, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति का स्वर्गवास जनवरी 2014 में हो गया। पति कि मृत्यु तक मैं ने अपना विवाह प्रमाण पत्र नहीं बनवाया था। अब मैं कहीं भी आवेदन करती हूँ तो सभी मुझसे विवाह प्रमाण पत्र मांगते हैं। श्रीमान क्या अब में विवाह प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हूँ। अगर करूँ तो पति कि जगह किस के हस्ताक्षर करवाऊँ। मेरा विवाह 17 मई 2005 को हुआ था।

समाधान-

विवाह का प्रमाण पत्र तभी मिलता है जब कि विवाह का पंजीयन हुआ हो। विवाह के एक पक्षकार का देहान्त हो जाने के उपरान्त आप के विवाह का पंजीकरण होना नियमानुसार संभव नहीं है। यही कारण है कि आप को विवाह का प्रमाण पत्र विवाह पंजीयक से नहीं मिल सकता।

हाँ भी आप आवेदन प्रस्तुत करती हैं तो आप की स्टेटस जानने के लिए विभाग अपने नियमों के अनुसार आप का विवाह प्रमाण पत्र व आप के पति का मृत्यु प्रमाण पत्र चाहते हैं जिस से आप को पति की विधवा होने का सबूत उन्हें मिल सके। आप की इस समस्या का हल केवल सिविल न्यायालय की डिक्री से हो सकता है।

प विवाह के पंजीकरण के लिए आवेदन दें। उस में पति के हस्ताक्षर का स्थान खाली छोड़ दें और अंकित करें कि पति का देहान्त हो गया है तथा साथ में पति का मृत्यु प्रमाण पत्र लगा दें। आप का यह आवेदन निरस्त कर दिया जाएगा। वैसी स्थिति में आप विवाह पंजीयक को प्रतिवादी बनाते हुए सिविल न्यायालय में घोषणा व स्थाई व्यादेश (Permanent Injunction) का वाद प्रस्तुत कर दें जिस में आप यह अभिवचन अंकित करें कि आप का विवाह आप के पति के साथ निश्चित तिथि को हुआ था। आप का यह विवाह पंजीकृत नहीं कराया गया और आप के पति का देहान्त हो गया। अब आप से बार बार हर स्थान पर विवाह प्रमाण पत्र मांगा जाता है लेकिन विवाह पंजीयक ने विवाह का पंजीयन करने से इन्कार कर दिया है। ऐसी स्थिति में घोषणा की जाए कि आप का विवाह आप के पति के साथ हुआ था। पति का देहान्त हो गया और आप आप के पति की विधवा हैं। विवाह पंजीयक को यह व्यादेश प्रदान किया जाए कि वे आप के विवाह का पंजीकरण कर आप को विवाह का प्रमाण पत्र जारी करें।

स मामले में न्यायालय घोषणा की डिक्री तो पारित करेगा ही। इस के साथ ही विवाह पंजीयक को आप का विवाह पंजीकृत करने और विवाह प्रमाण पत्र जारी करने का व्यादेश भी दे सकता है। यदि इस तरह का व्यादेश न भी दे तो न्यायालय की डिक्री से आप का काम चल जाएगा। आप विवाह प्रमाण पत्र के स्थान पर न्यायालय की डिक्री प्रस्तुत कर सकेंगी।

मियाँ बीवी राजी, फिर भी शादी कैसे करें?

handshakeसमस्या-

नीतिश ने बैतूल, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मैं धनगर पाल समाज से हूँ साहु समाज की लड़की से कोर्ट मेरिज करना चाहता हूँ। ना लड़की के माँ बाप तैयार हैं और ना ही मेरे। लड़की हर बात में राजी है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

हुत मासूम सवाल है आप का। हमारे यहाँ कहावत है, मियाँ बीवी राजी तो क्या करेगा काजी। हमारा देश एक जनतांत्रिक देश है। वयस्क स्त्री-पुरुषों को अपनी इच्छा से आपसी सहमति से विवाह करने का अधिकार है। जब स्त्री और पुरूष आपस में सहमत हो कर विवाह करना चाहें तो किसी को उन्हें रोकने का अधिकार नहीं है। फिर आप को चिन्ता क्यों हो रही है? यदि चिन्ता हो रही है तो आप की चिन्ता क्या है? आप को अपनी चिन्ताओं को इस प्रश्न में खोल कर रखना चाहिए था। आप अपनी चिन्ताएँ छुपा कर क्या सलाह चाहते हैं? बीमारी या वे लक्षण जिन से रोगी को सामान्य जीवन जीने में परेशानी हो रही है खोल कर बताए बिना कोई डाक्टर रोगी का इलाज कैसे कर सकता है?

 म समझते हैं कि वयस्क स्त्री पुरुषों का आपसी सहमति और रजामंदी से विवाह करने का अधिकार केवल किताबी है। जो माता पिता और संबंधी आप से प्रेम करते हैं आप को उन्हीं का भय सता रहा है कि वे आप को विवाह न करने देंगे। फर्जी रिपोर्टें पुलिस को करवाएंगे, फिर पुलिस आप के पीछे पड़ जाएगी। आप को किसी अपराध में हवालात में बन्द कर देगी। लड़की को पकड़ कर उस के मां बाप के सुपूर्द कर देगी। फिर लड़की को माँ बाप की अभिरक्षा में माँ, बाप, भाई और रिश्तेदार टार्चर करेंगे कि उन्हों ने जो रिपोर्ट पुलिस को दी है उस का समर्थन कर बयान दे कि लड़का मुझे बहला फुसला कर ले गया और मेरे साथ बलात्कार किया। वगैरा वगैरा। यही चिन्ताएँ आप के दिमाग में होंगी।

न चिन्ताओं का कोई इलाज नहीं है। आप दोनों को विवाह करना है तो पहली शर्त ये है कि आप दोनों या दोनों में से कम से कम एक अपने पैरों पर खड़ा हो और उस की आमदनी इतनी हो कि परिवार को चला सके। यदि दोनों आत्मनिर्भर हों तो सब से बेहतर है। क्यों कि इन सब से लड़ने के लिए धन भी चाहिए, हिम्मत भी। फिर एक अलग निवास की व्यवस्था करें। उस के बाद आप दोनों मिल कर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की नजदीकी बैंच में रिट आवेदन दीजिए कि आप दोनों विवाह करना चाहते हैं और आप दोनों के मां बाप और परिजन आप के इस विवाह को पसंद नहीं करते और विवाह में रोड़ा अटकाएंगे और पुलिस उन की मदद करेगी। इस कारण जिला कलेक्टर कम विवाह पंजीयक को निर्देश दिया जाए कि आप के विवाह को पंजीकृत करे और पुलिस को निर्देश दिया जाए कि विवाह होने और उस के बाद सब कुछ सामान्य होने तक आप दोनों को सुरक्षा प्रदान करे। ऐसा आदेश प्राप्त कर लेने के उपरान्त आप जिला कलेक्टर कम जिला विवाह पंजीयक के कार्यालय में विवाह के पंजीयन के लिए आवेदन कीजिए जहाँ आवेदन के 30 दिन के बाद आप अपना विवाह संपन्न करवा कर उस का पंजीयन प्रमाण पत्र प्राप्त करें और साथ रहना आरंभ कर सकते हैं। यदि आप में समाज के लोगों से यह लड़ाई लड़ने की हिम्मत और आत्मनिर्भरता नहीं है तो यह विवाह करने का इरादा छोड़ दीजिए।

पहले पता लगाएँ कि आप कि पत्नी आप के साथ क्यों नहीं रहना चाहती, बाद में उपाय तलाशें।

Say-Noसमस्या-

दिब्यविजय चंदेल ने भाटापारा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरा विवाह 19 जून 2012 को हिन्दू रीती रिवाज सेहुआ था।परन्तु विवाहके एक सप्ताह के बाद से ही मेरी पत्नी मुझे छोड़करअपनी मम्मी पापा के यहाँ रहती है, और मेरे पास आने से इनकार करती है। मुझे उनके घर वालों से कई तरह की धमकियां भी मिलती रहती हैं। जिस के कारण मेरेमम्मी पापा और मैं दहशत में रहता हूँ। आज 2 वर्ष से अधिक समय हो चुका है इनदो वर्षो में मैं लगातार कई बार अपनी पत्नी को वापस लेने के लिए कुछ लोगों कीमदद लेकर अपनी पत्नी के घर जा चुका हूँ। परन्तु मेरे पत्नी के पिता तथा भाईने भेजने से इनकार कर दिया तथा मुझे झूठे मामले में फ़ँसाने की धमकियां दी गईँ। जिस से मुझे वापस लौटना पड़ा। अब जब मैं फोन पर संपर्क करके कहता हूँ किअगर नहीं रहना चाहती तो तलाक ले लो। पर तलाक लेने से भी इनकार करती है। कृपया मेरी मार्ग दर्शन करें कि मैं क्या करूँ?

समाधान-

प की समस्या का समाधान यह है कि आप को हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन आप को इस बात का भय है कि आप की पत्नी आप पर झूठे आरोप लगा कर आप को धारा 498-ए व 406 आईपीसी के मुकदमे में फँसा सकती है जिस में आप की तथा आप की माता जी की गिरफ्तारी हो सकती है। साथ में आप के माता पिता को भी लपेट सकती है। इस के साथ ही वह धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता, धारा 24 हिन्दू विवाह अधिनियम में तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में आप से खर्चे की मांग भी कर सकती है। आप का यह भय अकारण नहीं है क्योंकि ऐसा सामान्य रूप से हो रहा है।

प ने अपनी समस्या तो बताई लेकिन इस बात का कारण नहीं बताया कि आप की पत्नी ऐसा क्यों कर रही है और उस के माता पिता उस का साथ क्यों दे रहे हैं? क्यों कि आप की पत्नी और उस के माता पिता के इस व्यवहार के पीछे कोई न कोई तो कारण रहा होगा।

हो सकता है उसे आप का साथ, आप के परिवार का माहौल समझ नहीं आया हो और वह आप के साथ आप के घर के माहौल में न रहना चाहती हो। हो सकता है आप की अपेक्षाएँ आज के जमाने मे पत्नी को होने वाली अपेक्षाओं से अधिक हों। हो सकता है पत्नी के अपने निजी कारण हों।

क आम कारण यह है कि हमारे यहाँ विवाह के पहले लड़के लड़की मिलते तक नहीं है। एक बार देख लेना या एक दो बार कैजुअली बात कर लेना विवाह के पहले समझ बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होता। लड़के और लड़की को पहले ही एक दूसरे को समझने का अवसर मिलना चाहिए। विशेष रूप से लड़की को उस परिवार के सभी सदस्यों और माहौल के बारे में जानने का अवसर मिलना चाहिए जिस में उसे जा कर रहना है। लड़के को भी लड़की की मनोवृत्ति और अपने परिवार में उस की एडजस्टेबिलिटी के बारे में सोचना चाहिए। पर ऐसा नहीं होता। जिस का नतीजा वही होता है जो आप भुगत रहे हैं या आप की पत्नी को देखना पड़ रहा है।

प को उन कारणों का पता लगाना चाहिए जिन के कारण आप की पत्नी एक सप्ताह आप के साथ रह कर अब आप के साथ नहीं रहना चाहती और न ही विवाह विच्छेद करने को सहमत है। इन कारणों का पता लगाए बिना कोई भी कानूनी उपाय करना आप के लिए गलत हो सकता है जिस के परिणाम बुरे भी हो सकते हैं। यदि आप किसी तरह आप की पत्नी के आप के साथ न रहने के वास्तविक कारण का पता लगा लें तो हमें बताएँ हो सकता है हम कोई उचित आप के लिए खोज कर बता सकें। आप के इतना कह देने से कि एक सप्ताह के बाद आप की पत्नी आप के साथ रहने को तैयार नहीं है हम आप की मदद करने में स्वयं को अक्षम पाते हैं।

वैध विवाह का पंजीयन आवश्यक है, उस के पंजीयन से इन्कार नहीें किया जा सकता।

Hindu Marriage1समस्या-
जितेन्द्र ने कोटा, राजस्थान से पूछा है-

मैं ने पिछले माह मन्दिर में विवाह किया है। इस में मरे परिवार के सभी सदस्य सम्मिलित थे किन्तु मेरी पत्नी का कोई परिजन सम्मिलित नहीं था। हम दोनों वयस्क हैं और आपसी सहमति से विवाह किया है। क्या हमारे विवाह का पंजीयन नगर पालिका/ नगर निगम के जन्म मृत्यु पंजीयक के यहाँ हो सकता है?

समाधान-

प्र त्येक वैध विवाह का पंजीयन आवश्यक है और उस का पंजीयन किए जाने से इन्कार नहीं किया जा सकता। यदि आप का विवाह वैध है तो आप के विवाह का पंजीयन हो सकता है। इस के लिए विवाह के साक्षियों के शपथ पत्र व जिस पंडित ने आप का विवाह संपन्न कराया है उस का प्रमाण पत्र, आप दोनों के फोटो, विवाह के फोटो तथा कुछ अन्य दस्तावेजों की आवश्यकता हो सकती है। जिस के बारे में आप को नगर निगम के विवाह पंजीयन कार्यालय में जानकारी प्राप्त हो सकती है। आप नगर निगम से यह जानकारी प्राप्त करें और सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करें।

विवाह और संतान की वैधता

adoptionसमस्या-
विजय कुमार ने उदयपुर राजस्थान से पूछा है-

2008 में विवाह के समय हिन्दू वर की आयु 20 वर्ष एवं वधु की आयु 21 वर्ष थी। विवाह के समय वर की जन्‍म तिथि जुलाई 1989 व वधु की 1988 थी।  जुलाई 2009 में शादी के एक साल बाद एक संतान जिसका जन्‍म पंजीयन भी करवाया हुआ है।  जून 2010 में वर के 21 वर्ष पूर्ण होने के दो चार दिन बाद की तिथि पर शादी का पंजीयन करवाया गया। यदि संतान की वास्‍तविक जन्‍म तिथि ही कहीं उल्‍लेख करें तो, वास्‍तविक शादी एवं शादी प्ंजीयन के बीच संतान पैदा होना, शादी की पुष्टि के रूप में एवं 21 वर्ष से कम उम्र में शादी के कारण या शादी से पूर्व संतान उत्‍पन्‍न करना। किसी प्रकार की जनप्रतिनिधित्‍व या राजकीय सेवा में अयोग्‍यता का आधार तो नहीं होगा? या फिर लिव इन रिलेशनशिप के तर्क से यह बात तो पैदा नहीं होगी कि जिस वधु से संतान हैं उसी के नाम का शादी पंजियन है। क्‍या यह शादी अमान्‍य है। क्‍या यह शादी कानूनी रूप से उचित है। कानूनी रूप से क्‍या सही होगा?

समाधान-

स विवाह में एक ही त्रुटि है कि विवाह के समय वर की आयु विवाह योग्य आयु से कम थी। विवाह का पंजीयन तब कराया गया जब वर की आयु विवाह योग्य हो गयी। अब पंजीयन के हिसाब से विवाह विवाह योग्य उम्र में हुआ है। विवाह पहले भी वैध था और अब भी वैध है। विवाह योग्य उम्र न होने से विवाह अवैध नहीं होता केवल वह कानून का उल्लंघन है तथा अपराध है। किन्तु अब उस विवाह को हुए इतना समय हो चुका है कि उस अपराध के लिए अब न तो कोई अभियोजन चलाया जा सकता है और न ही दंडित किया जा सकता है।

स मामले में अन्तर्विरोध बस इतना है कि संतान का जन्म पंजीकृत विवाह की तिथि के पहले हो गया है। यदि यह मान लिया जाए कि विवाह पूर्व संतान उत्पन्न हो गई है तो भी कभी कोई सन्तान अवैध नहीं होती वह सदैव वैध ही होती है।

स विवाह से न माता-पिता को और न ही संतान को किसी प्रकार की कोई समस्या होगी। केवल यह प्रश्न कभी भी और कहीं भी पूछा जा सकता है कि विवाह के पूर्व संतान कैसे उत्पन्न हो गई? उस के उत्तर में स्पष्ट बता दें कि वास्तविक विवाह तो जल्दी ही हो गया था। लेकिन रजिस्ट्रेशन बाद में कराया गया। इस से परेशानी कुछ भी नहीं होगी।

विवाह, दत्तक आदि से जाति परिवर्तन आरक्षण हेतु मान्य नहीं . . .

lawसमस्या-
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल से जॉन लेप्का ने पूछा है –

मैं एक अनुसूचित जाति से हूँ। मेरा विवाह 16 फरवरी 2007 को मन्दिरा प्रधान से हुआ है जो कि अन्य पिछड़ी जाति से है। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी श्रीमती मन्दिरा प्रधान की जाति क्या होगी? वह अनुसूचित जाति की मानी जाएगी या फिर अन्य पिछड़ी जाति की मानी जाएगी। क्या उसे अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त हो सकता है?

समाधान-

भारत में जाति का महत्व वैवाहिक और पारिवारिक मामलों में काफी समय से रहा है। अब अन्तर्जातीय विवाहों के बाद उन कारणों से जाति का कोई महत्व नहीं रह गया है। लेकिन भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों को शैक्षणिक संस्थानों व नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया गया है। इस कारण से इस तरह के विवाद हुए भी हैं और न्यायालयों तक पहुँचे भी हैं। जाति प्रमाण पत्र का भी इसी कारण से महत्व है।

स तरह के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का नवीनतम मत यह है कि एक व्यक्ति को आरक्षण का लाभ इस कारण से मिलता है कि वह किसी जाति में उत्पन्न हुआ है और उस ने उस जाति की असुविधाओं को झेला है या उसे विरासत में प्राप्त हुई हैं। लेकिन कोई यदि ऐच्छिक रीति से विवाह, या दत्तक ग्रहण के माध्यम से अपनी जाति बदलता है और फिर उसे इस कारण से आरक्षण का लाभ दिया जाता है तो इस से फर्जी जाति परिवर्तन के मामले बहुत बढ़ जाएंगे और लोग इस तरह जाति बदल कर आरक्षण का लाभ उठाने लगेंगे। वैसे भी जब एक व्यक्ति वयस्क होने तक एक जाति के लाभ प्राप्त कर लेता है और फिर सोच समझ कर विजातीय से विवाह करता है तो यह उस का  ऐच्छिक कृत्य है। इस कारण से उस का लाभ उसे प्राप्त नहीं होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय द्वारा 4 जनवरी 1996 को श्रीमती वलसम्मा पॉल बनाम कोचिन विश्वविद्यालय व अन्य के प्रकरण में दिए गए निर्णय में इस संबंध में विस्तृत रूप से विचार किया गया है।

प दोनों का वयस्क होने के उपरान्त विवाह हुआ है जो दोनों की इच्छा से संपन्न हुआ है। इस कारण से इस ऐच्छिक कृत्य से आप दोनों की ही जाति का परिवर्तन होना मान्य नहीं हो सकता। आप की पत्नी की जाति पूर्व की तरह अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) बनी रहेगी। उन का अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र नहीं बन सकेगा। यदि किसी तरह बनवा भी लिया जाता है और उस के आधार पर कोई लाभ प्राप्त किया जाता है तो उसे कोई भी चुनौती दे सकता है तथा वैसी स्थिति में वह जाति प्रमाण पत्र सही नहीं माना जाएगा और उस के आधार पर प्राप्त लाभ भी आप की पत्नी से छिन जाएगा।

विदुर द्वारा विधवा पुत्रवधु से विवाह शून्य है …

hindu-marriage-actसमस्या-

दिल्ली से विनोद कुमार ने पूछा है-

क विदुर ने अपनी विधवा पुत्रवधु से विवाह किया है। क्या यह कानून के अनुसार वैध है।  क्या उस के मरने के बाद उस की यह पत्नी फैमिली पेंशन पाने की अधिकारी है?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि यह विदुर और उस की विधवा पुत्र वधु किसी व्यक्तिगत विधि से शासित होते हैं। यदि वे हिन्दू विधि से शासित होते हैं तो यह विवाह वैध नहीं है।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 (iv) के अनुसार वर-वधु प्रतिबंधित रिश्तेदार नहीं हो सकते। अधिनियम की धारा 3 (g) में प्रतिबंधित रिश्तेदारों को परिभाषित किया गया है। इस उपधारा के दूसरे भाग में किसी स्वशाखीय संतान या स्वशाखीय पूर्वज की पत्नी या पति से प्रतिबंधित रिश्ते के रूप में परिभाषित किया गया है। इस तरह किसी व्यक्ति की अपनी ही पुत्रवधु प्रतिबंधित रिश्तेदार है और उस के साथ हुआ विवाह वैध नहीं है। इस तरह के विवाहों को अधिनियम की धारा 11 के अनुसार शून्य माना गया है जो कि विवाह के किसी भी पक्षकार के आवेदन पर निरस्त किया जा सकता है।

र्वोच्च न्यायालय ने यमुनाबाई अनन्तराव आधव बनाम अनन्तराव शिवराम आधव (एआईआर 1988 सुप्रीम कोर्ट 644) में यह निर्णीत किया है कि किसी भी मामले में यदि किसी विवाह की वैधता का प्रश्न उठता है तो न्यायालय धारा पाँच के  भाग (i), (vi) व (v) में वर्णित विवाहों को शून्य घोषित कर सकता है।

स विदुर की मृत्यु के उपरान्त उस की परिवार पेंशन को यदि विभाग देने से मना कर दे और मामला न्यायालय में ले जाया जाए और न्यायालय में यह प्रश्न उठे कि वह वैध पत्नी नहीं थी इस कारण उसे परिवार पेंशन का अधिकार नहीं है तो न्यायालय यह निर्णय दे सकता है कि वह उन का विवाह शून्य होने के कारण वह वैध पत्नी नहीं है और उसे पेंशन पाने का अधिकार नहीं है।

विवाह विच्छेद का निर्णय करना जल्दबाजी होगी …

searchwarrantसमस्या-

सुल्तानपुर, उत्तर से घनश्याम पाण्डेय ने पूछा है-

मेरा विवाह सन मई 2011 में हुआ,  जैसा कि हमारे यहाँ प्रचलन है लड़की गौने बाद ही अपने ससुराल जाती है, इसीलिए दिसंबर 2011 में लड़की हमारे घर आई। आने के 10 दिन ही बाद वह कहने लगी कि उसके पिता शादी के बाद भी कहीं दूसरी जगह शादी करने वाले थे।  इस बात को लेकर हमारे और उनके परिवार के सम्बन्ध बिगड़ गए। लड़की जब दूसरी बार जब हमारे घर आई,  तब वह कहने लगी कि उसे तलाक चाहिए। उसकी मर्ज़ी से शादी नहीं हुई, जबरदस्ती शादी हुई है। इस बात को मेरे माता-पिता बार टाल देते, बचपना मानते। लेकिन बार-बार मेरी पत्नी कहने लगी कि मैं इस घर में नहीं रहूंगी। मेरी माँ उसे पसंद नहीं है। अगर वह नहीं रहेंगी, तभी वह रहेगी। कभी वह कहती है कि मुझसे नफरत करती है। इन सब बातों से मेरे घर में क्लेश मचा हुआ है। उसके पिता कहते है कि मुझे फैसला चाहिए। अपनी लड़की से कहते है कि अपना ससुराल छोड़ दो। हमारे पूरे परिवार का एक मात्र मकसद रह गया कि वह लड़की हमारे घर रहे। लेकिन वह मात्र २ दिन भी नहीं रहना चाहती, झगडा करने लगती है कि वह अपने घर जायेगी। उनके परिवार से किसी तरह का भी सहयोग नहीं मिलता। बल्कि बार -बार शादी तोड़ देने की बात कही जाती है। इस तरह घर में अशांति मची रहती है। इससे मेरी मानसिक हालत बिगड़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में क्या तलाक लेना उचित रहेगा या और कोई उम्मीद बची हुई है?

समाधान-

शादी में लड़की की राय नहीं लेने के यही नतीजे होते हैं। विवाह के पहले कम से कम लड़की को उन लोगों से परिचित जरूर होना चाहिए जिन के साथ उसे रहना है। उसे विवाह से पहले पता होना चाहिए कि उस से क्या क्या अपेक्षाएँ उस के नए परिवार में की जाएंगी। लेकिन यह सब नहीं होता है। नतीजा ये है कि आपकी जैसी घटनाएँ बड़ी संख्या में घट रही हैं। मुझे लगता है कि आज के माहौल के हिसाब से आप की व परिवार की अपेक्षाएँ भी कुछ अधिक हैं। आप की पत्नी के परिवार वाले जिस तरह से बात कर रहे हैं वह तो फिर भी ठीक है कि वे फैसला करना चाहते हैं। अन्यथा आज कल तो तुरन्त मुकदमेबाजी आरंभ हो जाती है।

मुझे लगता है कि इस मामले में आप की गलती है कि आप ने पत्नी के इस कथन पर कि उस के पिता उस का विवाह दूसरे लड़के से करना चाहते थे उस के मायके वालों से बात की और बात बढ़ गई। आप की पत्नी अभी अधिक समझदार नहीं है और विवाहित जीवन के अर्थ भी नहीं समझती है। इस का कारण बच्चों में शिक्षा और यौन शिक्षा की कमी भी है। अभी आप को साथ रहने की संभावनाएँ तलाशनी चाहिए। आप को जानना चाहिए कि उसे परिवार के किस किस सदस्य से क्या क्या अपेक्षाएँ हैं। फिर उस हिसाब से उसे परिवार के योग्य बनाने का प्रयत्न किया जा सकता है। यदि संभव हो तो अच्छे काउन्सलर्स की सहायता भी ली जानी चाहिए। आप यदि इस मामले को इस तरह से हल करने का प्रयत्न करें कि आप की पत्नी और उस के मायके वाले कम शिक्षित हैं तो उन्हें सारी ऊँच नीच समझा कर ही मामले को हल किया जा सकता है। विवाह विच्छेद का निर्णय करना अभी जल्दबाजी होगी।

फिर भी यदि आप की पत्नी और उस के माता-पिता यदि फैसला ही करना चाहें तो आपस में बैठ कर यही बात करें कि विवाह विच्छेद की शर्तें क्या होंगी? यदि शर्तें आपस में बैठ कर तय हो जाएँ। तो पति-पत्नी और दोनों परिवारों के बीच एक इकरारनामा निष्पादित कर के नोटेरी से तस्दीक करवा लिया जाए और उस के आधार पर सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर दिया जाए। 6-7 माह में विवाह विच्छेद हो सकता है। इसे पति-पत्नी और दोनों के परिवार वाले एक दूसरे से स्वतंत्र हो कर नया जीवन आरंभ कर सकते हैं। अन्यथा फिजूल की मुकदमेबाजी में समय और पैसा बहुत नष्ट होगा और मानसिक तनाव व शारीरिक परेशानियाँ भी होंगी।

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