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विवाद होने पर भी पति पत्नी का उत्तराधिाकारी है, यदि उसे वसीयत से उत्तराधिकार प्राप्त करने से वंचित न कर दिया गया हो।

समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

नॉमिनी केवल ट्रस्टी है, उसे राशि सभी उत्तराधिकारियों को उन के अधिकार के अनुसार देनी चाहिए।

समस्या-

राजेश ने इसराना, पानीपत, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

म चार भाई बहन हैं हमारे पिता जी एक सरकारी अधिकारी थे उनकी मृत्यु के बाद, nomination होने के कारण सारे पैसे मेरी माँ के नाम हो गए हैं। बहन की शादी हो चुकी है मेरी माँ हम दोनों छोटे भाइयों के पास रहती है। बड़ा भाई 10 साल से अलग है, वो सरकारी नौकरी पर है और अलग राशन कार्ड है, और अलग मकान है। हम दोनों छोटे भाई बेरोजगार हैं पिता की खरीदी हुई गाड़ी भी वही चलाता है जो कि मेरी माँ के नाम है और अब पिता की मृत्यु के एक महीने बाद वो हमसे अपना हिस्सा मांगने लगा है, जबकि वो हमसे 10 साल से अलग है तो क्या पिता के retirement वाले और pension वाले पेसों में उसका हिस्सा है? बताइये हमें क्या करना चाहिये?.

समाधान-

प के भाई ने आप के पिता की संपत्ति में क्या क्या अधिक ले लिया है यह एक अलग विषय है। पिता की संपत्ति में आप की माँ, आप तीनों भाई और आप  की बहन सब का बराबर का हिस्सा है। आप को बराबरी से बांटने की बात करना चाहिए था। यदि आपके भाई इस से अधिक ले लिए हैं तो गलत है, यदि शादी होने के बाद बहिन को कम दिया गया है या कुछ नहीं दिया गया है तो वह भी गलत है।

किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ होता है कि नामिनेशन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के नोमिनी को उस की राशि दे दी जाए। लेकिन इस राशि को प्राप्त करने वाला केवल एक ट्रस्टी होता है उसे वह राशि मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में समानता से बाँटनी होती है।

पेंशन पर को आप की माता जी के सिवा किसी का अधिकार नहीं है क्यों कि आप भाई बहनों में कोई भी नाबालिग नहीं है। रहा सवाल रिटायर होने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी व भविष्य निधि और अन्य राशियों की तो यह सभी उत्तराधिकारियों तीनों भाइयों, माँ और बहिन में बराबर बाँटी जानी चाहिए।

नामिनी ट्रस्टी होता है मृतक की संपत्ति का वसीयती या उत्तराधिकारी नहीं।

समस्या-

प्रशान्त वर्मा ने नवाकपुरा, लंका, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी हमसे पिछले 21 वर्षों से अलग रह रही है। मेरी माँ की मृत्यु के पश्चात मुझे अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी मिली। अब मेरी पत्नी चाहती है कि मेरी सेवा पुस्तिका और अन्य अभिलेखों में नामिनी के तौर पर उसका नाम दर्ज हो।  जबकि मैं ने अपने प्रधान लिपिक से इस बारे मे बात की तो उन्होंने कहा कि यह कर्मचारी के ऊपर निर्भर करता है कि वह किसे नामिनी बनाए। क्या यह मुझ पर निर्भर है मैं किसे नामिनी बनाऊँ या यह पत्नी का अधिकार है?  जबकि मेरी पत्नी हमसे मुक़दमा भी लड़ती है 125 दं.प्र.सं. 498 भा.दं.सं के मुकदमे किए हैं मैं माननीय उच्च न्यायालय के आदेश से अपनी पत्नी को हर माह 1500/ प्रति माह देता हूँ। उसने ये भी कहा है कि उसे विभाग द्वारा पैसा दिलवाया जाए। कृपया उचित मार्गदर्शन करे।

समाधान-

धिकांश लोगों को यह नहीं पता कि सरकारी विभाग में, पीएफ के लिए या बीमा के लिए नॉमिनी क्यों बनाए जाते हैं। आप को और आप की पत्नी को भी संभवतः यह पता नहीं है। इस कारण सब से पहले यह जानना आवश्यक है कि नॉमिनी का अर्थ क्या है।

नौकरी करते हुए किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो उस का वेतन व अन्य लाभ नियोजक के यहाँ अथवा सरकारी विभाग की ओर बकाया रह जाते हैं। इस राशि को प्राप्त करने का अधिकार उस कर्मचारी के कानूनी उत्तराधिकारियों का है। लेकिन उत्तराधिकारियों की स्थिति हमेशा बदलती रहती है। हो सकता है मृत्यु के कुछ दिन पूर्व ही कर्मचारी को संतान हुई हो लेकिन उस का नाम विभाग में दर्ज न हो। मृत्यु के बाद अक्सर उत्तराधिकारियों के बीच इस बात की होड़ भी लगती है कि मृतक की संपत्ति में से अधिक से अधिक उसे मिल जाए। इस कारण विभाग या कर्मचारी या बीमा विभाग या भविष्य निधि विभाग किसे उस राशि का भुगतान करे यह तय करना कठिन हो जाता है। इस के लिए नॉमिनी की व्यवस्था की जाती है। नॉमिनी की नियुक्ति एक ट्रस्टी के रूप में होती है। जिस का अर्थ यह है कि विभाग किसी कर्मचारी या बीमा कर्ता की मृत्यु के उपरान्त कर्मचारी की बकाया राशियाँ नॉमिनी को भुगतान कर दे। नॉमिनी का यह कर्तव्य है कि वह उस राशि को प्राप्त कर उसे मृतक के उत्तराधिकारियों के मध्य उन के कानूनी अधिकारों के अनुसार वितरित कर दे। इस तरह नॉमनी हो जाने मात्र से कोई व्यक्ति किसी की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो जाता, अपितु उस का दायित्व बढ़ जाता है। लेकिन समझ के फेर में लोग समझते हैं कि किसी का नॉमिनी नियुक्त हो जाने से वह मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति का अधिकारी हो जाएगा। जब नॉमिनी को संपत्ति मिल जाती है तो वह उसे मृतक के उत्तराधिकारियों में नहीं बाँटता और उत्तराधिकारी अपने अधिकार के लिए नॉमनी से लड़ते रह जाते हैं और मुकदमेबाजी बहुत बढ़ती है।

यदि किसी व्यक्ति को अपनी मृत्यु के उपरान्त अपनी संप्तति किसी व्यक्ति विशेष को देनी हो तो वह उस के नाम वसीयत लिखता है। नोमिनी वसीयती या उत्तराधिकारी नहीं होता। इस कारण नॉमिनी उसी व्यक्ति को नियुक्त करें जो मृत्यु के पश्चात आप की संपत्ति को पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ आप के उत्तराधिकारियों में कानून के अनुसार वितरित कर दे। यह पूरी तरह आप की इच्छा पर निर्भर करता है कि आप किसे अपने नोमिनी नियुक्त करते हैं।

नॉमिनी मृतक की संपत्ति का ट्रस्टी होता है, उत्तराधिकारी नहीं।

समस्या-

पंकज पच्चीगर ने सूरत, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरे मामाजी जो अविवाहित थे, उनकी डेथ हो चुकी है, उनकी संपति के 6 हिस्सेदार हैं ,उन में से 1 हिस्सेदार को ज्यादा हिस्सा चाहिये। ये बहाना करके हिस्सा बांटने को मना कर रहा है क्यों कि कुल संपत्ति के १५% जो शेयर्स और बैंक डिपोजिट है उस में नोमिनी के तौर पर उसका नाम है। अब उस के मना करने के बाद हम कैसे अपना हिस्सा पाएँ?

समाधान-

मृतक की 15% संपत्ति में एक उत्तराधिकारी के नोमिनी होने के कारण संपत्ति में ज्यादा हिस्सा चाहना पूरी तरह अनुचित है। नोमिनी वस्तुतः मृतक की संपत्ति का ट्रस्टी मात्र होता है। वह संपत्ति को बैंक आदि से प्राप्त तो कर सकता है लेकिन संपत्ति पर स्वामित्व सभी उत्तराधिकारियों का बना रहता है। यह नॉमिनी का दायित्व है कि वह संपत्ति को प्राप्त कर उस के उत्तराधिकारियों को कानून के अनुसार प्रदान करे। पर बेईमानी आ जाने के कारण हो सकता है कि वह व्यक्ति चुपचाप इस जुगाड़ में लगा हो कि जितनी जल्दी हो उतना वह इस 15% संपत्ति पर कब्जा कर ले।

आप को चाहिए कि आप उक्त संपत्ति जिस में वह नौमिनी है उस का उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर दें उस के साथ ही मृतक की संपत्ति के विभाजन का वाद भी जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें और इस वाद में संपत्ति को खुर्द-बुर्द न करने की निषेधाज्ञा सभी उत्तराधिकारियों के विरुद्ध प्राप्त करें। इसी वाद में बंटवारा होने तक संपत्ति को किसी रिसीवर के आधिपत्य में रखे जाने व संपत्ति के लाभों को सुरक्षित रखे जाने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

नोमिनी पर आपत्ति होने पर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आवश्यक है।

Hindu succession actसमस्या-

राज शर्मा ने गुना, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे पिताजी की अचानक मृत्‍यु आज से करीब 18 महीनेपहले हो चुकी है। पिताजी नगरपालिका में लेखापाल के पद पर कार्यरतथे। मां का स्‍वगर्वास भी करीब 13-14 वर्ष पहले हो चुका है। उनकेहम दो पुत्र हैं। हमारी मां का स्‍वर्गवास होने के बाद हमारे पिताजी कीदूसरी शादी हो गई उनसे उन की दो पुत्रियां हैं। पितजी की मृत्‍यु के बादमेंने नगरपालिका में अनुकम्‍पा निुयुक्ति एवं उनके सभी क्‍लेमों के लिएआवेदन दिया है। लेकिन उन पर हमारी दूसरी माँ ने आपत्ति प्रकट कर दी और वहचाहती है कि पिताजी के स्‍थान पर अनुकंपा नियुक्ति एवं उनके सभी क्‍लेमोंका भुगतान उन को किया जावे और इसके अलावा पिताजी के नाम पर एक भूखंड भी है।उस भूखंड के लिए हमारी सौतेली मां ने नामांतरण के लिए आवेदन दिया है जिसपर हम दोनों भाईयों ने आपत्ति दर्ज की है। हमारी आपत्तियों बाद मुख्‍यनगरपालिका अधिकारी ने हमारी सौतेली मां को और हमें उत्‍तराधिकार प्रमाण पत्र लानेको कहा है, वे उसी के अनुसार हमारे दावों का भुगतान करेंगे। लेकिनहमारे पिताजी ने अपनी मृत्‍यु के पहले ही उनके सर्विस रिकार्ड में जोनोमीनेशन करे हैं वह हम दोनों भाईयों के नाम पर है हमारी दूसरी मां काउसमें कहीं भी कोई नाम नहीं है। इस से यह साबित हेाता है कि हम दोनों भाई हीउनके असली वारिस हैं फिर हमसे वैध उत्‍तराधिकार प्रमाण पत्र क्‍यों मांगा जा रहा है?हमारी आपत्तियां दर्ज होने के बावजूद भी नगरपालिका मुख्‍य अधिकारी ने हमारेपितजी के सभी क्‍लेमों का पैसा जिन पर हम दोनों भाइयों का नोमीनेशन है केबाद भी हमारी सौतेलीमां के खाते में जमा करा दिया है और अनुकमपा नियुक्तिभी उन्‍हीं को देने की बात करते हैं। जब कि हमारी सौतली मां का पूर्व पतिअभी जीवित है और हमारी सौतेली मां और उनके पूर्व पति के बीच अभी तक वैधानिकरूप से तलाक नहीं हुआ है। सवाल यह है कि हम दोनों भाइयों के नाम नोमीनेशनहोने के बावजूद भी हम से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र क्‍यों मांगा जा रहा और हमारीसौतेली मां को बिना तलाक के हमारे पिताजी की पत्‍नी मानकर हमारे सारे हकउनको क्‍यों दिये जा रहै है? आज तक हम दोनों भाई बेरोजगार हैऔर हमारे पास आय का कोई स्‍त्रोत नहीं है। इस भीषण मंहगाई में हमें काफीआर्थिक परेशानियों से गुजरना पड रहा है इस संबंध में में आपसे उचितमार्गदर्शन चाहता हूं कि ऐसी स्थिति में हमें क्‍या कार्यवाही करनी चाहिए औरकैसे करनी चाहिए?

समाधान-

प के पिता जी ने आप की माता जी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह ऐसी स्त्री से किया है जो पहले से विवाहित थी और उस का पहले पति से विवाह विच्छेद नहीं हुआ था तथा जिस का पहला पति अभी तक जीवित है। इस तरह उस स्त्री का दूसरा विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार वैध नहीं है। वह स्त्री आप के पिता की वैध पत्नी नहीं है, इस कारण से वह आप के पिता जी की उत्तराधिकारी भी नहीं है। यदि आप किसी भी दीवानी न्यायालय के समक्ष यह साबित कर देते हैं कि उस स्त्री का पहले विवाह हुआ था और उस का पहला पति जीवित है और उस से उस का विवाह विच्छेद नहीं हुआ है तो फिर वे किसी भी प्रकार से आप के पिता की उत्तराधिकारी नहीं होंगी और उन के उत्तराधिकारी होने के सारे दावे समाप्त हो जाएंगे।

 स स्त्री के आप के पिता की वैध पत्नी साबित नहीं होने के कारण उस से उत्पन्न दो पुत्रियों का दावा भी संदिग्ध हो जाएगा कि वे आप के पिता की पुत्रियाँ हैं। यदि वे यह साबित कर दें कि आप के पिता ही उन के जैव पिता थे तो फिर वे भी आप के पिता की उत्तराधिकारी होंगी।

 विभाग में बकाया वेतन, ग्रेच्यूटी और प्रोवीडेण्ट फण्ड के लिए नोमीनेशन होता है। इस नोमिनेशन का सामान्य अर्थ यह है कि कर्मचारी के देहान्त के बाद उस खाते का भुगतान उस के नोमिनी को कर दिया जाए। लेकिन नोमिनी उत्तराधिकारी नहीं होता। वह केवल ट्रस्टी होता है। उस का दायित्व होता है कि उसे इस तरह प्राप्त राशियाँ वह सभी उत्तराधिकारियों में उन के हिस्सों के हिसाब से वितरित कर दे। यदि नोमिनी के होते हुए कोई उत्तराधिकारी नियोजक के समक्ष आपत्ति कर दे तो आम तौर पर नियोजक उन राशियों का भुगतान करना रोक देते हैं। कई बार आपत्तिकर्ता न्यायालय में दावा प्रस्तुत कर स्थगन भी प्राप्त कर लेता है। वैसी स्थिति में विभाग के पास एक मात्र मार्ग यह रह जाता है कि वह सभी दावेदारों से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहे और ऐसा प्रमाण पत्र प्रस्तुत होने पर उस के हिसाब से कार्यवाही करे। इस कारण नगरपालिका द्वारा आप को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए सही कहा है। आप को जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन कर देना चाहिए।

 हाँ तक अनुकंपा नियुक्ति का प्रश्न है आप दोनों भाइयों में से किसी एक ने उस के लिए आवेदन कर ही दिया होगा। लेकिन आप की दूसरी माँ की आपत्ति के कारण वे यह निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि ऐसे में क्या किया जाए। इस मामले में आप को एक घोषणा का वाद दीवानी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए कि आप दोनों भाई ही आप के पिता के परिवार के सदस्य हैं और उन के आश्रित हैं तथा अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उसी वाद में आप को यह साबित करना होगा कि आप की दूसरी मां का आप के पिता के साथ कोई विवाह नहीं हुआ था और यदि किसी तरह का कोई अनुष्ठान हुआ भी था तो भी उस स्त्री का पहला पति जीवित होने तथा उस से उस का विवाह विच्छेद न होने के कारण यह विवाह अवैध था। यदि आप यहाँ यह सब साबित कर देते हैं तो न्यायालय इस बात की घोषणा कर देगा।

 स तरह आप को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन तुरन्त करना चाहिए तथा घोषणा का वाद भी प्रस्तुत करना चाहिए।

नॉमिनी केवल ट्रस्टी होता है, मृतक की संपत्ति का स्वामी नहीं…

muslim inheritanceसमस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से वीर बहादुर ने पूछा है-

मेरे पिताजी की घर के बाहरी हिस्से में दो दुकाने थी। एक मुझे और एक मेरे बड़े भाई को दी थी। पिताजी को आशंका थी कि हम दोनों अपनी दुकाने किराये पर किसी अन्य व्यक्ति को न दे दें, इस हेतु उन्होने सन् 1986 में हम दोनो भाइयों से अलग अलग 10 रुपये के स्टाम्प पर किरायानामा लिखा लिया जिसमें पिता जी द्वारा लिखाया गया कि हमें पैसे की आवश्यकता है अतः मै 100@- किराये पर दुकान और दो कमरे इनको रहने हेतु दे रहा हूँ, ये अन्य किसी सिकमी किरायेदार को नही रखेंगे, उस एग्रीमेन्ट में कोई समय सीमा भी नही लिखी गयी। जिस व्यक्ति से स्टाम्प पर एग्रीमेन्ट लिखवाया था उसी को गवाह भी बना दिया इस प्रकार एक ही गवाह है एग्रीमेन्ट भी अनरजिस्टर्ड है। उपरोक्त एग्रीमेन्ट के अतिरिक्त दुबारा एग्रीमेन्ट नही कराया गया। 7 नवम्बर 2012 को पिताजी का देहान्त हो गया पिताजी सरकारी कर्मचारी थे ट्रेजरी द्वारा जारी पेन्शन फार्म में उनके द्वारा भरा गया कि (मेरी मृत्यु होने की दशा में पेन्शन सम्बन्धी अवशेष भुगतान ज्योति बहादुर अर्थात छोटे भाई को किया जाय) इस आधार पर छोटे भाई द्वारा पिता जी के बैंक सेविंग एकाउण्ट में पिताजी के जीवनकाल में आये पेंशन धनराशि को भी अपना बता कर नही दिया जा रहा है जबकि बैंक में पिताजी द्वारा किसी को नामित नही किया गया है। साथ ही हम दोनो भाइयों को छोटे भाई द्वारा घर में भी हिस्सा नहीं दिया जा रहा है, कहा जा रहा है कि हम दोनो किरायेदार हैं और वह मालिक है हम 3 भाई एवं 3 बहन हैं पिता द्वारा किसी को वसीयत नही की गयी है। कृपया बतायें क्या हम दोनो भाइयों को बैंक में जमा धनराशि एवं घर में हिस्सा मिल पायेगा?

समाधान-

प दोनों भाइयों के पास जो दुकानें हैं वे आप के कब्जे में हैं उन पर कब्जा बनाए रखें। आप के पिता जी की समस्त चल अचल संपत्ति में आप छहों भाई बहिनों का हिस्सा है। आप के छोटे भाई के कहने से कि वह मालिक है और आप किराएदार हैं कुछ नहीं होता। जो भी पेन्शन आदि राशि आप के पिताजी के बैंक खाते में पहले आ चुकी है वह भी आप सब की है और यदि बाद में कोई राशि मिलने वाली है तो वह भी आप सब की है। किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ सिर्फ इतना होता है कि नोमिनी उस धन को प्राप्त कर सकता है। लेकिन नोमिनी उस धन का ट्रस्टी मात्र होता है और उस का दायित्व होता है कि वह उस धन को मृतक के उत्तराधिकारियों में उन के हिस्सों के मुताबिक बाँट दे।

प को चाहिए कि आप उक्त संपत्ति के बँटवारे के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करें साथ में एक अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन भी प्रस्तुत करें कि जो चल-अचल संपत्ति आपके पिता की है उसे खुर्द बुर्द न किया जाए। इस से संपत्ति अपने मूल स्वरूप में बनी रहेगी और दावा डिक्री होने पर प्रत्येक हिस्सेदार को उस का हिस्सा प्राप्त हो जाएगा।

नामिति केवल ट्रस्टी है, उस का कर्तव्य है कि वह प्राप्त राशियों को मृतक के उत्तराधिकारियों को कानून के अनुसार प्रदान करे

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

ब्यावरा, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश से रवि सोनी ने पूछा है-

मेरी उम्र २९ वर्ष हे सर मेरे परिवार में कुल 8 सदस्य हैं। मेरे पिता मेरी माता मेरी दो बहिनें जिनका विवाह हो गया है और मेरा छोटा भाई। मेरे चाचा और मेरी चाची के कोई संतान नहीं हुई।  मेरे चाचा श्री श्याम कुमार सोनी का देहांत 19.07.2012 को हो गया। मेरी चाची श्रीमती सुधा सोनी का देहांत उनके पूर्व दिनांक 9.12.2011 को हो गया था। मेरे चाचा का स्वर्गवास हुआ तब वे सिंचाई विभाग में स्थल सहायक के पद पर शासकीय नोकरी में थे। मेरे चाचा ने उनकी सेवा पुस्तिका में उन की मृत्यु के उपरांत मिलने वाले स्वत्वों में मेरी चाची को नामित किया हुआ था और मेरी चाची के बाद उन्होंने अपने दोस्त की बेटी को नामित किया था।  यह  नामितिकरण लगभग 30 वर्ष पुराना है जबकि मेरा भी जन्म नहीं हुआ था।  मेरे जन्म के बाद मेरे चाचा चाची ने मुझे गोद ले लिया परन्तु उसका कोई पंजीयन नहीं कराया। उन्होंने मेरा पुत्र की तरह पालन पोषण किया और मैं ने भी उनकी सेवा पुत्र की तरह की। परन्तु चाची की मृत्यु के बाद चाचा अपनी सेवा पुस्तिका में नामितिकरण में परिवर्तन नहीं करा पाए और हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गयी। चाचा की मृत्यु के बाद जब मैं ने उनके शासकीय क्लेम के लिए सम्बन्धित विभाग में आवेदन दिया तो उन्होंने किसी और का नाम यानि बातुल बानो नामीनेशन में दर्ज होना बतलाया जो कि उनके मित्र अब्बास की बेटी है। उतराधिकार प्रमाण पत्र कोर्ट से लाने को कहा है। मेरे और परिवार के सामने समस्या यह है कि अब मुझे उक्त क्लेम राशि कैसे मिले? क्योंकि अब्बास जो की नामिती के पिता हैं क्लेम की राशि मुझे देने में आधी राशि मांग रहे  हैं। तब जाकर सहमति देने को तैयार हैं नहीं तो पूरी राशि पर अपना दावा कर रहे हैं।  बातुल को ना तो मेरे चाचा ने कोई वैधानिक गोद लिया है न ही हमारा कोई रक्त सम्बन्ध है फिर भी वह इस राशि पर क्लेम कर रहे हैं। मुझे बताएँ कि मैं किस तरह से उक्त क्लेम को प्राप्त कर सकता हूँ और जो बरसों पुराना नामीनेशन है उसे कैसे अवैधानिक घोषित करवा सकता हूँ क्योंकि इस प्रकार के नामितिकरण के बारे में मेरे चाचा ने कभी हमें नहीं बताया।  सिर्फ इतना बताया कि मुझे नामितिकरण में रवि यानि की मेरा नाम दर्ज कराना है। इस बीच ही उनकी मृत्यु हो गयी। मैं ने कोर्ट में धारा 372 भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 में आवेदन प्रस्तुत किया है और बातुल बनो को इसमें पार्टी बनाया है और सम्बंधित कार्यालय को भी पार्टी बनाया है। उन को नोटिस भी तामील हो चुके हैं पर बातुल बानो कोर्ट में उपस्थित नहीं हो रही है। क्या इसका लाभ मुझे मिल सकता है? क्या मेरे प्रकरण का मेरे पक्ष में फैसला हो सकता है? मुझे यह राशि प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए? क्योंकि हमें संदेह है कि यहाँ जो नामितीकरम है वह फर्जी है। किसी ने षडयंत्र के तहत बनाया है। क्या अब इस क्लेम राशी पर कोई अधिकार नहीं बनता जब कि मेरे चाचा की परिवार सूचि में मेरा और मेरे परिवार का नाम सम्मिलित है और उनका अन्तिम संस्कार व समस्त मोक्ष कर्म मेरे द्वारा किया गया है। समाज की पगडी रस्म में भी मुझे उतराधिकारी मानकर मुझे पगड़ी बांधी गयी है। हम सब मेरे चाचा श्री श्याम कुमार सोनी के आश्रित थे। क्या उनके स्वत्वों पर हमारा हक नहीं बनता है? यह भी बताएँ कि क्या मैं अनुकम्पा नियुक्ति के लिए दावा कर सकता हूँ।  कृपया मार्ग दर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

प के चाचा का कोई प्रथम श्रेणी का उत्तराधिकारी नहीं है। उन्हों ने कोई वसीयत की हो ऐसा उल्लेख आप ने नहीं किया है। इस कारण से उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 की अनुसूची के अनुसार प्रथम श्रेणी में तथा दूसरी श्रेणी की उपश्रेणी प्रथम में आप के चाचा का कोई उत्तराधिकारी जीवित नहीं है। अनुसूची की दूसरी श्रेणी की तीसरी उपश्रेणी में चाचा के भाई अर्थात् आप के पिता जीवित हैं। आपने नहीं बताया कि आप की कोई बुआ भी मौजूद है। यदि आप की कोई एक या अधिक बुआएँ मौजूद हैं तो आप के पिता और बुआएँ आप के चाचा की समस्त संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। सभी अधिकार समान है।

प बातुल बानो के नाम के नामितिकरण से बिलकुल भी परेशान नहीं हों। नामितिकरण का केवल इतना अर्थ होता है कि विभाग उस नामिती को उन की बकाया राशियों का भुगतान कर सकता है लेकिन नामिति उन्हें केवल एक ट्रस्टी के बतौर ही स्वीकार कर सकता है उस समस्त राशि को नामिति द्वारा मृतक के उत्तराधिकारियों को उन के अधिकार के बतौर देने का कर्तव्य होता है। नामिति का मृतक की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता यदि वह उत्तराधिकारी नहीं है। आप ने बातुल बानो को जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र हेतु आवेदन में पक्षकार बनाया है उस की कोई आवश्यकता नहीं थी। आप चाहें तो अब भी उस कार्यवाही में से उस का नाम हटाए जाने का आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। आप उस प्रकरण में अपनी गवाहियाँ करवा कर उस का निर्णय कराएँ। लेकिन आप खुद चाचा के उत्तराधिकारी नहीं होने से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आपके पिता के नाम से बनेगा। यदि आप की बुआएँ हैं और वे न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आप के पिता के नाम करने में सहमति प्रकट करने का बयान नहीं देती हैं तो उन का हिस्सा उन के नाम होगा।

हाँ, यदि आप न्यायालय के समक्ष गवाहियों के माध्यम से यह साबित कर दें कि रीति रिवाज और कानून के अनुसार आप के चाचा ने आप को गोद लिया था और उस का कोई समारोह किया था तो न्यायालय आप को उन का एक मात्र उत्तराधिकारी मान कर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आप के नाम जारी कर देगा।

दि आप यह साबित करने में सक्षम हैं कि आप गोद पुत्र हैं तो आप को तुरन्त ही विभाग में गोद पुत्र और आश्रित की हैसियत से अनुकम्पा नियुक्ति हेतु आवेदन करना चाहिए। यदि आप को विभाग ने गोद पुत्र मान लिया और सात वर्षों में विभाग में आप के लायक कोई रिक्त पद हुआ तो आप को अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त हो सकती है। यदि आप को अक्षम मान कर विभाग आप को अनुकम्पा नियुक्ति देने से इन्कार कर दे तो आप स्वयं को गोदपुत्र घोषित करने और विभाग द्वारा अनुकम्पा नियुक्ति दिए जाने के लिए योग्य घोषित करने के लिए और नियुक्ति देने के लिए व्यादेश जारी करने के लिए दीवानी न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

दि आप को आशंका हो कि विभाग न्यायालय में उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र जारी करने के पहले ही आप के चाचा के लाभों और बकायों की राशियों का भुगतान बातुल बानो को कर सकता है तो आप को सिविल न्यायालय में एक स्थाई व्यादेश हेतु वाद प्रस्तुत करना चाहिए कि आप ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया हुआ है उस के निर्णय तक विभाग के विरुद्ध इस आशय का अस्थाई व्यादेश पारित किया जाए कि विभाग बातुल बानो को किसी लाभ व बकाया की राशि का भुगतान न करे।

चल-अचल संपत्ति के बँटवारे के लिए एक ही दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा।

समस्या-

लखनऊ उत्तर प्रदेश से वंश बहादुर ने पूछा है –

मेरे पिताजी सरकारी कर्मचारी थे। उनका 80 वर्ष की उम्र में नवम्बर 2002  में देहान्त हो गया।  पिताजी ने कोई भी वसीयत नहीं छोड़ी थी। हम 3 भाई 3 बहन हैं और सभी विवाहित हैं। मैं घर के 1/4 हिस्से में निचले भाग में रहता हूँ और मेरा मझला भाई मेरे वाले भाग के ऊपर के भाग में रहता है।  छोटा भाई पिताजी के साथ रहता था।  उनके देहान्त के बाद घर के 3/4 भाग में कब्जा कर के रहने लगा, बँटवारे के लिए राजी नही था है। इस कारण से मैं ने जनवरी 2013 में घर के बँटवारे हेतु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया। जिसकी अलग अलग माह में तारीखें पड़ चुकी हैं। किन्तु कोर्ट ने अभी तक समन नहीं भेजा है।  9 अप्रैल 2013 को मैं ने समन का शुल्क भी कोर्ट में जमा कर दिया फिर भी कोर्ट से समन नहीं भेजा जा रहा है। अब मुझे प्रतिवादी को समन जारी कराने के लिए क्या करना चाहिए? कितने  समन जारी होने के बाद उसे हाजिर होना पड़ेगा? मेरे पिताजी द्वारा पोस्टआफिस तथा बैंक में मेरे छोटे भाई को नामित किया है उस ने समस्त पैसा आहरित कर लिया है। क्या मुझे और मेरे मझले भाई को इसमें हिस्सा मिल सकता है? पिताजी का घरेलू सामान एवं जेवर आदि छोटे भाई के कब्जे में हैं उन में अपना हिस्सा लेने के लिए हमें क्या करना होगा?

समाधान-

Partition of propertyमुख्य रूप से आप का मामला पिता जी की संपत्ति के बँटवारे का है। पिताजी का मकान, उन के द्वारा बैंक व पोस्ट ऑफिस में छोड़ा गया धन, जेवर और घरेलू सामान सभी आप के पिता जी की चल-अचल संपत्ति का हिस्सा हैं। इन का बँटवारा या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर बँटवारे का दीवानी वाद प्रस्तुत कर न्यायालय के निर्णय से।

प के पिता जी का जो धन पोस्टऑफिस और बैंक में था उस के लिए उन्हों ने अपना नामिती भले ही आप के छोटे भाई को बना दिया हो। लेकिन वह नामितिकरण केवल उस धन को बैंक से प्राप्त करने के लिए ही था। नामिति की जिम्मेदारी एक ट्रस्टी की तरह होती है। वह जो धन प्राप्त कर लिया गया है उस का ट्रस्टी होता है उसे उस धन को उस के हकदार जो कि आप के पिता जी के उत्तराधिकारी हैं में कानुन के अनुसार बाँट देना चाहिए। इसी तरह पिताजी के घरेलू सामान और जेवर आदि का बँटवारा भी उत्तराधिकार के कानून के अनुसार होना चाहिए।

स बँटवारे के लिए भी वही तरीका है जो आपने मकान के बँटवारे के लिए अपनाया है। अर्थात आप ने जो दीवानी वाद प्रस्तुत किया है उसी में मकान के साथ ही बैंक व पोस्टऑफिस से प्राप्त धन, घरेलू सामान और जेवर आदि का भी विवरण अंकित करते हुए उन सब का बँटवारा करने की प्रार्थना की जानी चाहिए थी। मेरे विचार में यदि आप का वकील समझदार हुआ तो उस ने ऐसा अवश्य किया होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया है तो आप को चाहिए कि आप अपने दीवानी वादपत्र में संशोधन करवा कर इस सारी चल संपत्ति को भी उसी में सम्मिलित करवाएँ। आप 3 भाई और 3 बहनें हैं इस प्रकार कुल 6 हिस्से होंगे जिन में एक हिस्से अर्थात पिता जी की कुल संपत्ति का 1/6 हिस्सा आप प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

क बार वाद पंजीकृत हो जाने और वादी द्वारा समन का खर्च दाखिल कर देने के उपरान्त न्यायालय समन स्वयं ही जारी करती है। आप ने खर्च अदा कर दिया है तो समन जारी हो चुका होगा। यदि समन जारी नहीं हुआ है तो आप अगली पेशी पर न्यायालय के न्यायाधीश से निवेदन कर सकते हैं कि समन जारी किया जाए। न्यायाधीश तुरंत समन जारी करने की हिदायत अपने कार्यालय को कर देंगे जिस से समन जारी हो जाएगा। जब तक सभी प्रतिवादियों पर समन की तामील नहीं हो जाती है समन जारी होते रहेंगे। एक बार सभी प्रतिवादियों को समन मिल जाने पर फिर समन जारी करने की जरूरत नहीं है। यदि प्रतिवादी उपस्थित नहीं होंगे तो उन के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही की जा कर मुकदमे की सुनवाई की जाएगी।

मृत कर्मचारी की भविष्य निधि राशि में सभी उत्तराधिकारियों का हिस्सा है।

समस्या-

राजनगर, जिला अनूपपुर, मध्य प्रदेश से संतोष सिंह ने पूछा है-

मेरे पिताजी कोल इंडिया में काम करते थे, उनका देहांत हो गया है।   हम तीन भाई हैं।  मेरे बड़े भाई को पिताजी ने अपने संपत्ति से बेदखल कर के अपनी सर्विस शीट में उन का नाम कटवा दिया था।  लेकिन उनके देहांत के बाद वे माँ से उनको मिलने वाले प्रोविडेंट फंड में से हिस्सा माँग रहे हैं और नहीं देने पर मुकदमा करने की धमकी देते हैं।  जबकि उसकी उम्र 40 वर्ष है और पिछले 12 वर्ष से घर से अलग रहकर अपना काम करते हैं।  क्या कानूनी रूप से पिताजी के प्रोविडेंट फंड से अगर मां नहीं देना चाहे तो भी क्या उसका हिस्सा बनता है? इस पर वह किस तरह से क़ानूनी करवाई कर सकता है?

समाधान-

किसी भी कर्मचारी के जीवित रहने पर सेवा समाप्ति के उपरान्त प्रोविडेंट फंड (भविष्य निधि) की राशि को प्राप्त करने का अधिकार स्वयं कर्मचारी का है। इस तरह भविष्य निधि एक प्रकार से कर्मचारी की स्वअर्जित संपत्ति है।  किसी कर्मचारी का देहान्त हो जाने की स्थिति में भविष्य निधि को प्राप्त करने वाले को कर्मचारी द्वारा नामित (नोमीनेशन) करने का प्रचलन है। इस तरह किसी कर्मचारी का देहान्त हो जाने के उपरान्त भविष्य निधि योजना से भविष्य निधि की राशि का भुगतान नामिति (नॉमिनी) को कर दिया जाता है।  लेकिन इस का अर्थ यह नहीं है कि वह राशि नामिति की संपत्ति हो जाती है।  नामिति उस संपत्ति का ट्रस्टी मात्र होता है। यह उस का कर्तव्य है कि वह उस संपत्ति को मृतक के उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के अनुसार वितरित कर दे। आप के मामले में आप की माँ, आप और आप के भाई और यदि आप की कोई बहिन हो तो वह इस राशि में समान रूप से हिस्सेदार हैं। यदि आप तीन भाई और माँ ही है तो प्रोविडेंट फंड की राशि पर आप के भाई का एक चौथाई हिस्सा है। यदि वे उस हिस्से पर अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहते हैं तो आप की माता जी को उन्हें यह राशि देनी होगी।  इस संबंध में आप सर्वोच्च न्यायायलय द्वारा 20.08.2009 को शिप्रा सेन गुप्ता बनाम मृदुल सेन गुप्ता का यह प्रकरण यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं जिस में कहा गया है कि भविष्य निधि का नामिति केवल उस राशि का ट्रस्टी है उस राशि पर सभी उत्तराधिाकारियों का अधिकार है।

किसी को भी अपनी संपत्ति से बेदखल करने का कोई अर्थ नहीं है। हाँ, कोई भी व्यक्ति अपनी स्वअर्जित सम्पत्ति को तथा संयुक्त संपत्ति या सहदायिक संपत्ति में अपने हिस्से को वसीयत कर सकता है। यदि आप के पिता अपनी वसीयत करते और उस में यह अंकित कर देते कि उन की भविष्य निधि की राशि वे अपनी पत्नी को वसीयत करते हैं अन्य किसी भी उत्तराधिकारी का उस पर कोई अधिकार नहीं होगा तो उस राशि को अकेले आप की माता जी को प्राप्त करने का अधिकार होता। पर वसीयत न होने की दशा में उस में सभी उत्तराधिकारियों का हिस्सा है।

दि भविष्य-निधि की राशि आप की माता जी प्राप्त कर चुकी हैं तो आप के भाई के पास एक मात्र तरीका यही है कि वे अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए आप की माताजी के विरुदध दीवानी न्यायालय में वाद प्रस्तुत करें। लेकिन यदि अभी कोल इंडिया वालों ने या भविष्य निधि योजना ने इस का भुगतान आप की माता जी को नहीं किया है तो वे भविष्य निधि योजना के समक्ष आपत्ति प्रस्तुत कर सकते हैं। योजना भविष्य निधि प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र लाने को कह सकती है या नामिति होने पर उन को भुगतान भी कर सकती है।  आप के भाई न्यायालय में दावा प्रस्तुत कर के कोल इंडिया या भविष्य निधि योजना द्वारा आप की माता जी को उक्त राशि का भुगतान करने से रोकने हेतु निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकते हैं।

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