Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

बकाया अर्जित अवकाशों व बोनस की राशि प्राप्त करने के लिए क्या करें?

समस्या-

हरिद्वार, उत्तराखण्ड से दीपक त्यागी ने पूछा हैः

मैं ने एक प्राइवेट कंपनी में छह साल नौकरी की है। मैं ने वहाँ से त्यागपत्र दे दिया है। नियोजक ने मेरी ग्रेच्युटी की राशि का भुगतान कर दिया है लेकिन वहाँ मेरे अर्जित अवकाश 53.5 दिनों का तथा बोनस नहीं दिया है। जब कि पहले जिन लोगों ने नौकरी छोड़ी उन्हें अर्जित अवकाश का पैसा दिया गया है। मैं ने अर्जित अवकाश का धन और बोनस की मांग की लेकिन उन्हों ने साफ मना कर दिया है। मुझे क्या करना चाहिए जिस से मुझे मेरा पैसा मिल सके?

समाधान-

PWactप के नियोजक को आप का अर्जित अवकाश का पैसा देना चाहिए। यदि उन्हों ने मना कर दिया है और नौकरी से त्याग पत्र दिए आप को एक वर्ष से अधिक समय नहीं हुआ है तो त्याग पत्र मंजूर होने की तिथि से एक वर्ष की अवधि में आप अवकाश की राशि के लिए वेतन भुगतान अधिनियम की धारा 15/3 के अंतर्गत अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

बोनस का अधिकार उद्योग का वित्तीय वर्ष पूर्ण होने के बाद आठ माह की अवधि व्यतीत हो जाने पर मिलता है। लेकिन वेतन भुगतान अधिनियम में आप बोनस का आवेदन तभी प्रस्तुत कर सकते हैं जब उस बारे में कोई समझौता औद्योगिक विवाद अधिनियम में हुआ हो या फिर किसी न्यायालय का अवार्ड या आदेश हो। यदि इन में से कुछ भी उपलब्ध नहीं है तो आप का बोनस का अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है। यदि अन्य कर्मचारियों को उसी अवधि का बोनस दिया गया है और आप को बोनस नहीं दिया गया है तो आप अपने राज्य के श्रम आयुक्त को इस तरह का आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप यह निवेदन करें कि आप के संस्थान में संबंधित वित्तीय वर्ष के लिए जिस दर से बोनस दिया गया उस दर से बोनस की राशि आप के नियोजक से वसूल कर आप को दिलाई जाए।

किराएदार किराया भी न दे, मकान खाली भी न करे और नल-बिजली के खर्चेों का भुगतान भी न करे तो क्या करें?

समस्या-

पानीपत, हरियाणा से दीपक पूछते हैं-

दि कोई किराएदार मकान खाली न करे और किराया भी न दे तो मकान मालिक को न्यायालय में जाना पड़ता है जिस से वह मकान खाली करवा सके और बकाया किराया वसूल कर सके। लेकिन जब तक न्यायालय का निर्णय नहीं आ जाता है तब तक क्या मकान मालिक को किराएदार का बिजली का खर्च भी भुगतना पड़ेगा? कृपया इस मामले में स्थिति स्पष्ट करें।

समाधान-

कानूनी सलाहबिजली और पानी की सुविधा का उपयोग एक मानवीय अधिकार है, वह किराएदार के लिए किराएदारी से जुड़ी एक सुविधा है और किराएदार का अधिकार भी है।  इन सुविधाओं को किराएदार सीधे बिजली व पानी की सप्लाई करने वाली संस्थाओं/ विभागों/ कंपनियों से प्राप्त कर सकता है। यदि मकान मालिक उस के इन अधिकारों में हस्तक्षेप करे तो किराएदार न्यायालय में अलग से प्रार्थना पत्र/ वाद प्रस्तुत कर इस तरह का आदेश प्राप्त कर सकता है कि किराएदार इन संस्थाओं/ विभागों/ कंपनियों से कनेक्शन  प्राप्त करे और मकान मालिक उस में कोई हस्तक्षेप न करे।

नेक मामलों में यह भी होता है कि पूरे मकान में एक ही बिजली पानी के कनेक्शन लगाए होते हैं और मकान मालिक और किराएदार या बहुत से किराएदार इन सुविधाओँ के खर्च को आपस में बाँट लेते हैं। जिस के लिए मकान मालिक और किराएदार के बीच कोई शर्त भी तय हो सकती है कि किराएदार बिलों का कुछ प्रतिशत हर माह मकान मालिक को देगा या कोई नियत तयशुदा राशि वह मकान मालिक को अदा करेगा। ऐसी स्थिति में किराएदार बिजली और पानी मकान मालिक के माध्यम से उन्हीं संस्थाओं/ विभागों/ कंपनियों से प्राप्त करता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि बिजली पानी का खर्च किराए की राशि में शामिल कर लिया जाता है। तब ऐसा माना जाएगा कि जो किराया किराएदार प्रतिमाह मकान मालिक को अदा करता है उस में बिजली पानी का पैसा भी सम्मिलित है।

न परिस्थितियों में पहली स्थिति में जब कि किराएदार संस्थाओं/ विभागों/ कंपनियों से सीधे अपने नाम बिजली पानी कनेक्शन ले कर इन सुविधाओँ का उपभोग करता है और सीधे उन्हें भुगतान करता है तब कोई झगड़ा मकान मालिक और किराएदार के बीच नहीं होगा। यदि किराएदार इन संस्थाओं/ विभागों/ कंपनियों को बिल का भुगतान नहीं करेगा तो वे उस का कनेक्शन काट देंगी और बकाया राशि का भुगतान प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध कार्यवाही करेंगी। हाँ, यदि दोनों कनेक्शन पहले से मकान मालिक के नाम चल रहे होंगे तो ऐसी स्थिति में जो बकाया के बिल होंगे ये संस्थाएँ/ विभाग/ कंपनियाँ मकान मालिक से वसूल करेंगी। वैसी स्थिति में मकान मालिक के पास यही चारा है कि वह इन संस्थाओं/ विभागों/ कंपनियों को आवेदन कर के कनेक्शन को बंद करवा ले या कटवा ले और बकाया बिलों का भुगतान कर के उस राशि की वसूली के लिए किराएदार के विरुद्ध कार्यवाही करे।

दूसरी स्थिति तब उत्पन्न होती है जब बिल खुद मकान मालिक जमा करवाता है और किसी शर्त के अंतर्गत उस धन को या किराएदार वाले हिस्से को उस से किराए की राशि से अलग धनराशि के रूप में अथवा किराए की राशि में शामिल धनराशि के रूप में प्राप्त करता है।  इस दूसरी स्थिति में मकान मालिक किराएदार को पानी बिजली की राशि की बकाया का भुगतान करने और न देने की स्थिति में उस की दोनों सुविधाए समाप्त करने का नोटिस दे कर पर्याप्त समय के बाद इन सुविधाओं को बंद कर सकता है, किराएदार के नल बिजली के कनेक्शन काट सकता है।

किराएदारी के संबंध में जो कानून हैं वे भारत में अलग अलग राज्यों में भिन्न भिन्न हैं। प्राय: उन सभी में यह उपबंध है कि मकान मालिक किराएदार द्वारा नल बिजली की राशि का भुगतान अदा न करने पर किराया नियंत्रक के यहाँ आवेदन कर के नल बिजली के कनेक्शन काटने की अनुमति प्राप्त कर के नल बिजली के संबंध विच्छेद कर सकता है। लेकिन यदि वह इन की राशि बकाया होने की स्थिति में बिना किराया नियंत्रक की अनुमति के भी इन संबंधों का विच्छेद कर देता है तो किसी भी कानून में उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। किराएदार को भी यह अधिकार है कि यदि नल बिजली की कोई राशि बकाया नहीं है और नियमित रूप से इन राशियों को चुकाने को तैयार है तो वह न्यायालय से निर्देश प्राप्त कर सकता है कि मकान मालिक उस की इन सुविधाओं को चालू रखे और मकान मालिक द्वारा पुनः चालू न करने पर पृथक से लगवा ले।

प को चाहिए कि किराएदार से मकान खाली कराने व बकाया किराया वसूल करने का मुकदमे में आप ने जिस वकील की सेवाएँ प्राप्त की हैं उस से यह सलाह लें कि आप को किराएदार का कनेक्शन किराया नियंत्रक (अदालत) से अनुमति प्राप्त कर के काटना चाहिए या फिर बिना ऐसी कोई अनुमति प्राप्त किए काट देना चाहिए, और उस की सलाह के अनुसार कार्यवाही करनी चाहिए।

अधिकतम कितनी राशि का भुगतान नकद किया जा सकता है?

समस्या-

मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है-

धिकतम कितनी राशि का भुगतान नकद किया जा सकता है? यदि कंपनी 20,000 रुपए से अधिक का वेतन नकद भुगतान कर रही हो तो क्या यह आयकर अधिनियम के अन्तर्गत अपराध है?

समाधान –

यकर अधिनियम की धारा 40 ए (3) के द्वारा यह उपबंधित किया गया है कि कोई भी आयकर देने वाला व्यक्ति रेखांकित चैक, डिमांड ड्राफ्ट या अन्य किसी बैंकिंग रीति के अतिरिक्त किसी एक पक्षकार को 20000 रुपए से अधिक की धनराशि का भुगतान करता है या प्राप्त करता है तो उस भुगतान को उसे व्यक्तिगत खर्च या व्यक्तिगत आय माना जाएगा। इस से स्पष्ट है कि 20 हजार रुपए से अधिक के नकद भुगतान या प्राप्ति को कोई अपराध घोषित नहीं किया गया है।  अपितु उसे व्यक्तिगत खर्च या व्यक्तिगत आय मात्र माना गया है।

क्त उपबंध में भी आयकर नियम 6 डीडी में अनेक भुगतानों और प्राप्तियों को छूट प्रदान की गई है। जिन में किसी कर्मचारी को आयकर अधिनियम की धारा 192 के अंतर्गत आयकर की कटौती के उपरान्त किया गया वेतन का नकद भुगतान भी सम्मिलित है। किस किस तरह के भुगतानों और प्राप्तियों को नियम 6 डीडी में छूट प्रदान की गई है उन की जानकारी आप यहाँ क्लिक कर के प्राप्त कर सकते हैं

चैक केवल वर्तमान दायित्व के भुगतान के लिए ही दें, किसी और उद्देश्य के लिए नहीं

समस्या-

मैं ने एक मकान बनवाया। ठेकेदार की सलाह से मैं ने ठेकेदार के जानकार दुकानदार से निर्माण सामग्री का क्रय किया।  मेरे ठेकेदार ने कहा कि मैं गारन्टी के रूप में अपना एक चैक दुकानदार को दे दूँ, जिस से निर्माण सामग्री सही समय पर मिलती रहे।  मैं दुकानदार को समय समय पर भुगतान करता रहा।  असल समस्या तब आरंभ हुई जब ठेकेदार ने मेरा काम पूरा किए बिना ही छोड़ दिया।  उस ने पूरी राशि की मांग की।  मैं ने उस से कहा कि वह काम पूरा कर दे और कान्ट्रेक्ट के मुताबिक पूरा रुपया ले ले।  मैं दुकानदार के पास अपना चैक वापस लेने गया तो उस ने वह चैक तो ठेकेदार को दे दिया है क्यों कि तुम ने उस का पूरा भुगतान नहीं किया है।  मैं ने दोनों से मेरा चैक वापस देने का आग्रह किया किन्तु उन्हों ने मेरा चैक नहीं लौटाया।  मैं ने तब बैंक से चैक का भुगतान रोकने के लिए कहा। बैंक ने भुगतान रोक दिया लेकिन चैक वापसी में यह रिमार्क लगा दिया कि बैंक में पर्याप्त निधि नहीं है।  तब दुकानदार ने धारा 138 का मुकदमा लगा दिया।  इस मुकदमे में मुझे 29,950/- रुपए भुगतान करने का आदेश हुआ तथा चार माह के कारावास की सजा हो गई।  दुकानदार ने उस के पास का विक्रय का पूरा असल रिकार्ड नष्ट कर दिया और फर्जी रिकार्ड प्रस्तुत किया है जिस पर मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं।  लेकिन मजिस्ट्रेट ने इस रिकार्ड को सही मान कर उस के पक्ष में निर्णय दे दिया है।  क्या मैं सत्र न्यायालय में उक्त दंडादेश की अपील कर सकता हूँ?  क्या इस अपील में मुझे लाभ मिलेगा?

-कर्मवीर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा

समाधान-   

चैक अनादरण के मुकदमों में अभियुक्त के बचने के अवसर न के बराबर होते हैं।  क्यों कि इस मामले में केवल चैक का अनादरित होना, अनादरण के तीस दिनों में चैक की राशि के भुगतान का नोटिस चैक जारीकर्ता को दिया जाना, और नोटिस के पन्द्रह दिनों में उस के द्वारा चैक धारक को भुगतान न करना ही अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त होता है।  यह अवश्य है कि चैक किसी दायित्व के लिए दिया हुआ होना चाहिए।  लेकिन कानून ऐसा है कि यदि चैक दिया गया है तो यह माना जाता है कि चैक किसी दायित्व के लिए ही दिया गया होगा।  यदि चैक किसी दायित्व के अधीन न दिया गया हो तो इस तथ्य को साबित करने का दायित्व अभियुक्त पर डाला गया है।  अभियुक्त द्वारा यह साबित करना अत्यन्त कठिन या असंभव होता है कि उस ने चैक किसी दायित्व के भुगतान के लिए नहीं दिया था।

प के पास इस बात की कोई लिखत नहीं है कि आप ने चैक सीक्योरिटी के बतौर ही दिया था।  यदि लिखत होती तो आप साबित कर सकते थे कि चैक भुगतान के लिए नहीं अपितु सीक्योरिटी के बतौर दिया था।  जब भी चैक किसी वर्तमान दायित्व के भुगतान के लिए न दिया जा कर किसी और उद्देश्य से दिया जाए तो उस की लिखत अवश्य लेनी चाहिए।  लेकिन अक्सर लोग यही गलती करते हैं कि कोई लिखत नहीं लेते।  जब से चैक अनादरण को अपराधिक बनाया गया है तब से तो सभी बैक खाताधारियों को सावधान रहना आवश्यक हो गया है कि वे बिना किसी दायित्व के किसी को चैक नहीं दें।  बिना तिथि अंकित किए और बिना राशि भरे तो कदापि न दें।  इस के अतिरिक्त जब भी कोई दुकानदार माल भेजता है तो उस के साथ चालान भेजता है जिस पर हस्ताक्षर करवा कर वापस लेता है।  आप को भी चाहिए था कि आप ने जो रुपया उसे भुगतान किया उस की रसीद समय समय पर लेते।  लेकिन शायद आपने ऐसा भी नहीं किया।

स के अलावा जब दुकानदार ने आप को चैक वापस लौटाने से मना किया और कहा कि चैक तो ठेकेदार ले गया है।  उस का यह कहना ही अमानत में खयानत था।  साथ ही इस बात का अंदेशा उत्पन्न हो गया था कि आप के विरुद्ध चैक को ले कर मुकदमा किया जाएगा।  आप को तब भी सावधान हो जाना चाहिए था और उन के इस षड़यंत्र के विरुद्ध कार्यवाही आरंभ कर देनी चाहिए थी।  आप को पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट करनी चाहिए थी।  पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर आप को न्यायालय में तुरंत परिवाद दाखिल करना चाहिए था।  जब आप को चैक अनादरण का नोटिस प्राप्त हुआ तब आप को उस का उत्तर देना चाहिए था और साथ ही न्यायालय को तुरन्त परिवाद भी दाखिल करना चाहिए था।

वास्तविकता यह है कि आप ने चैक को ले कर लापरवाही बरती और उस की सजा आप को भुगतनी पड़ रही है।  आप ने जो तथ्य बताए हैं उस से नहीं लगता कि आप को सत्र न्यायालय से कोई राहत मिल पाएगी।  वैसे भी जब तक विचारण न्यायालय का निर्णय और वहाँ प्रस्तुत साक्ष्य का सूक्ष्म अध्ययन न कर लिया जाए कोई भी विधिज्ञ यह नहीं बता सकता कि  आप को अपील में लाभ मिलेगा या नहीं।  लेकिन फिर भी आप के पास अपील करने का एक अवसर उपलब्ध है।  यदि आप के वकील ने विचारण न्यायालय में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत की है तो हो सकता है सत्र न्यायालय में आप को लाभ मिल जाए।  आप को अपील का यह अवसर कदापि नहीं छोड़ना चाहिए और अपील कर के इस मुकदमे के माध्यम से आप के साथ जो अन्याय हुआ है उसे न्याय में परिवर्तित करने का प्रयत्न करना चाहिए।  अपील करने के पूर्व आप को चाहिए कि आप अपराधिक मामलों के किसी अच्छे वकील से सलाह लें और सत्र न्यायालय में उसी से पैरवी कराएँ।  सभी बैंक खाताधारियों को एक बात गाँठ बांध लेनी चाहिए कि वे जब किसी को चैक दें तो केवल तत्कालीन दायित्व के भुगतान के लिए ही दें और यह सुनिश्चित कर लें कि चैक अनादरित नहीं होगा।  अन्यथा ये अवश्य जान लें कि चैक अनादरण के बाद सजा से बचना लगभग असंभव होगा।

फर्जी मुकदमों का मुकाबला करें? और दोषी को दंडित कराएँ?

समस्या-

तीन वर्ष पहले एक प्लाट खरीदने के लिये मैं ने अपने ससुर के कहने में आकर उनके एक परिचित विक्रेता को ढाई लाख रूपये अग्रिम दिये।  6 महीने तक प्लाट ना मिलने पर पता चला कि हमारे साथ धोखा हुआ है। परिचितों  द्वारा दबाव बनाने पर जनवरी 2011 में विक्रेता ने हमें ढाई लाख रूपये के पचास पचास हजार रूपये के पांच चैक जून 2011 के दिये जो कि मेरे ससुर जी के नाम के थे,  साथ में नोटेरी भी करा ली जिसमें मै गवाह हूं।  जून 2011 में चैक का समय आने पर भी जब पैसा नही ​मिला तो मेरे ससुर ने चैक बैंक में डाले जो बाउंस हो गये। ससुर जी बताते हैं कि उन्हों ने अपने परिचित पर चैक बाउंस के पांच मुकदमे कर दिये हैं जो विचाराधीन हैं पर, उन्होने हमें मुकदमे लडने या दिखाने और बताने से भी इंकार कर दिया।  चैक और ओरिजनल नेाटेरी ससुर जी के पास थी। अब हमें ये अंदेशा हो गया कि उनके मन में बेईमानी आ गयी है और हमारी स्थिति आसमान से गिरा खजूर में अटका वाली हो गयी है। इस के बाद में हमारे बीच में झगडा हुआ जिसमें हमने कोर्ट की शरण ली और ससुर जी के विरूद्ध कोर्ट के माध्यम से रिपोर्ट दर्ज करा दी, जिससे बचने के लिए उन्हों ने हमसे फैसला किया कि हमारे ढाई लाख रूपये के मुकाबले वो हमें एक लाख रूपया देंगे और उसके बाद हमारा उस रूपये से कोई वास्ता नही रहेगा। इसकी बाकायदा नोटेरी हुई कचहरी में दो गवाहों के सामने और उन्होने हमें एक लाख रूपये दे दिये । हमने आपसी सहमति बनाते हुए उक्त मुकदमें मे आगे कोई कार्यवाही नही की और उसमें एफ आर लग गयी। जिसकी कापी मिलते ही मेरे ससुर साहब ने हम पर दो तीन फर्जी मुकदमे मारपीट और मेरी साली के अपहरण के प्रयास का दर्ज करा दिए और उनकी मंशा अब उन दिये गये एक लाख रूपये को वापस लेने की है जिसके कारण वे मुझे परेशान करने के लिये फर्जी मुकदमें दर्ज करा रहे हैं। क्या मैं उस समझौते से मुकरते हुए अपने बाकी डेढ लाख रूपये के लिये केस कर सकता हूं? नो​टरी की क्या अहमियत है? 100 रुपए के स्टांप पर जबकि उसी दिन दो नेाटरी हुई एक साथ, एक जगह जिसमें उनके पूरे परिवार के दस्तखत हैं।

सी मसले से जुडा एक और सवाल है कि मेरे ससुर ने मेरे खिलाफ अखबारो में उल्टी सीधी खबरें छपवाई जैसे कि मेरे कोई लडका ना होने के कारण मैं उनकी छोटी लडकी से शादी करना चाहता हूँ।  मैं ने नौकरी पाने के लिए अपने पिता का कत्ल किया शक है, मैने अपने भाई की जायदाद बेचकर उनके बच्चो को कुछ नहीं दिया, आदि अर्नगल बातें । ये सब मेरे विभाग में लिखित में दी गयी हैं और मुझे उनकी कापी मिली है और वे सब बिना सबूत के मिथ्या हैं और उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि उन्होने ऐसा क्यों कहा। मैं ने उन पर मानहानि का दावा करने के लिये नोटिस भेजा जो उन्होने लिया पर जबाब नही दिया।  मेरे पास पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होने ये सब जान बूझकर मेरी समाज में इज्जत खराब करने के लिये किया है। मैं यदि मानहानि का मुकदमा करूँ तो उस में क्या हो सकता है? दूसरा मानहानि के दावो में दीवानी और फोजदारी का क्या प्रोसेस है?

सी से जुडा एक और सवाल ………..मेरी शादी 2004 में हुई और मेरी एक छोटी साली की 2007 में। मेरे ससुर ने अपने विभाग में शादी के लिये अनुदान पाने के लिये 2008 में आवेदन किया।  जिसमें दोनेा के शादी के फर्जी कार्ड और सभासदो की मोहर लगे कागज दिये।  अनुदान का आवेदन निरस्त हो गया पर क्या जो फर्जी कूटरचना करके उन्होने धोखाधडी का प्रयास​ किया क्या इसके लिये उन पर कोई कार्य वाही हो सकती है?

स सारे प्रकरण में मेरी धर्मपत्नी मेरे साथ है और अपने पिता से वही लड़ रही है। मैं ने विश्वास के कारण जो ग​लतियां की हैं उन्हें पढकर लोग संभल जायें और मुझे भी कानूनी प्र​क्रिया में कुछ सहारा मिले।  जिस से मेरे ससुर जो फर्जी मुकदमें कर रहे हैं उन में मै अपनी सच्चाई के साथ खडा रह कर मुकाबला कर सकूं और उन्हें उनके किये की सजा दिलवा सकूं। मेरे पास जो नेाटरी है उसमें उन्होने स्वीकार किया है कि किस तरीके से उन्होने मध्यस्थता करते हुए चैक अपने नाम कटवा लिये और अब उनके बदले मुझे एक लाख दे रहे हैं।

-राम प्रकाश, जगाधरी, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प ने जिस व्यक्ति को भूखंड खरीदने के लिेए ढाई लाख रुपए दिए उस से भूखंड खरीदने का या रुपए एडवांस प्राप्त करने का कोई एग्रीमेंट जरूर लिखा होगा और वह आप के पास होना चाहिए। यदि ऐसा एग्रीमेंट या उस की रसीद और यदि ढाई लाख रुपए चैक से दिए हैं तो उस का आप के बैंक खाते में इंद्राज अवश्य होगा। उक्त राशि में से एक लाख रुपया आप को वापस मिल चुका है लेकिन अभी डेढ़ लाख रुपया बकाया है। आप उस व्यक्ति तथा आप के ससुर के विरुद्ध एक मुकदमा उक्त डेढ़ लाख रुपए की वसूली के लिए दीवानी वाद दायर कर सकते हैं। इस तरह आप के ससुर ने और उस व्यक्ति ने मिल कर आप से धोखाधड़ी कर के जो रुपए ऐंठें हैं उस के लिए भी आप उक्त दोनों के विरुद्ध न्यायालय में धारा 420 भा.दं.संहिता के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

नोटेरी के यहाँ जो भी दस्तावेज निष्पादित किया जाता है उस का सत्यापन मात्र होता है। नोटेरी का महत्व सिर्फ इतना ही होता है कि पक्षकारों के मध्य जो भी अनुबंध लिखा गया है वह दोनों के बीच एक सच्चा अनुबंध है। एक नोटेरी के समक्ष एक ही दिन एक ही समय कई दस्तावेज सत्यापित किए जा सकते हैं। उन सब दस्तावेजों में जो कुछ अंकित है उसी से पता लगाया जा सकता है कि मामला क्या है? और यदि अनुबंध के अनुसार किसी पक्षकार ने बर्ताव नहीं किया है तो क्या कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। यदि ऐसी कानूनी कार्यवाही संस्थित होती है तो न्यायालय में नोटेरी के समक्ष सत्यापित दस्तावेजों को नोटेरी और दस्तावेज के गवाहों के माध्यम से उन्हें प्रमाणित किया जा सकता है।

प के ससुर जी ने अखबार में जो खबरें छपवाई हैं वे अपमान जनक हैं। उन के आधार पर मानहानि के संबंध में फौजदारी और दीवानी दोनों कार्यवाहियाँ संस्थित की जा सकती हैं। मानहानि के दीवानी वाद में आप हर्जाने के रूप में धन मांग सकते हैं जिसे न्यायालय आप को दिला सकता है।मानहानि का दीवानी दावा कर ने के लिए आप को न्यायालय में हर्जाने का दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं, वहीं फौजदारी प्रकरण चलाने के लिए आप न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप के बयान लेने के उपरांत आप के ससुर को समन भेज कर न्यायालय में बुलाया जाएगा और उन्हें जमानत करवानी पड़ेगी। उस के बाद विचारण आरंभ होगा जिस में आप के ससुर को कारावास और जुर्माने के दंड से दंडित किया जा सकता है।

प के ससुर द्वारा उन के विभाग से अनुदान या ऋण प्राप्त करने के लिेए आवेदन के साथ जो फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, उस के लिए आवेदन निरस्त हो जाने के बाद भी विभाग उन के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकता है तथा उन के विरुद्ध फर्जी दस्तावेज बनाने के लिए पुलिस में भी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। अनुशासनिक कार्यवाही और फौजदारी प्रकरण दोनों में आप के ससुर को दंड मिल सकता है।

प के पास जो भी दस्तावेज और साक्षी हैं उन के आधार पर आप ससुर द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमें में अपना बचाव कर सकते हैं और उन के विरुद्ध कार्यवाही कर के उन्हें दंडित भी करवा सकते हैं और अपना रुपया भी वसूल कर सकते हैं।

कांट्रेक्ट का बकाया पैसा प्राप्त करने के लिए समय रहते कानूनी कार्यवाही कीजिए

समस्या-

मैं नवम्बर 2005 से राजस्थान विद्युत् वितरण लि. में हायरिंग ऑफ़ कंप्यूटर की स्वीकृति के अंतर्गत कंप्यूटर ओपेरटर का कार्य करता रहा। हर छह माह बाद स्वीकृति बढ़ा दी जाती थी।  परन्तु सन 2010 के अप्रेल से जून तक व अक्टूबर 2011  से मार्च 2012  तक सरकार ने हायरिंग ऑफ़ कंप्यूटर पर रोक लगा दी। जिससे निगम के संबंधित कार्यालय को जॉब आर्डर पर कार्य कराना पड़ रहा है जिसकी स्वीकृति के लिए फाइल उच्चाधिकारियों को स्वीकृति के भेजी गई। तब तक मैं कार्य करचुका था। संबंधित कार्यालय द्वारा मुझे नोटिस देकर कंप्यूटर हटाने को भी नहीं कहा गया।  जॉब आर्डर के तहत बाजार रेट से प्रति पेज  10 रूपये के हिसाब से सन 2010 के अप्रेल से जून तक  57.070/- रूपये व अक्टूबर 2011 से मार्च 2012 तक 58,500/- रूपये बनते हैं। ये भुगतान अभी तक नहीं हुआ है और फाइल एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय चक्कर काटती रहती है और कोई न कोई आपत्ति लगा दी जाती है।  हमने अप्रेल में कलेक्टर को सुगम के माध्यम से शिकायत की।  जिससे अधिकारी और भी नाराज हो गए और मुझे काम से हटा दिया गया।  कई ओपेरटरों को अभी लगा रखा है।  जिसने शिकायत नहीं की है। श्रीमानजी मेरी समस्या का समाधान करें।

-नरपत गहलोत, तिवँरी, राजस्थान

समाधान-

प ने विद्युत वितरण कंपनी  में कोई भी नौकरी नहीं की है। आप के और विद्युत वितरण कंपनी के बीच किसी तरह की कोई सेवा संविदा नहीं है। पहले आप को हायरिंग ऑफ कम्प्यूटर के कांट्रेक्ट के अंतर्गत काम दिया गया था। अर्थात आप अपना कंप्यूटर व ऑपरेटर कंपनी को देंगे और बदले में कंपनी आप को धन देगी। जितने समय का आप का कांट्रेक्ट था आप ने काम किया। आप का कांट्रेक्ट समाप्त होते ही तथा नया कांट्रेक्ट न मिलने पर आप को अपना कंप्यूटर और ऑपरेटर तुरंत हटा लेना चाहिए था। हो सकता है कि कंपनी के अधिकारियों ने यह कहा हो कि वे दो-चार दिन में आप को नया वर्क ऑर्डर दे देंगे। आप भलमनसाहत के अंतर्गत कुछ दिन अपना कंप्यूटर वहाँ रख सकते थे लेकिन आप को बिना वर्क ऑर्डर प्राप्त किए कोई काम  नहीं करना चाहिए था।

स के बाद आप को 10 रुपए प्रति पृष्ठ के हिसाब से जॉब ऑर्डर दे दिया गया हो। यह ऑर्डर लिखित था या मौखिक यह आप के प्रश्न से पता नहीं लग रहा है। यदि यह जॉब आर्डर लिखित था तो इस के अंतर्गत किए गए काम का पैसा लेने के आप अधिकारी हैं। फाइल उन के यहाँ एक टेबल से दूसरी टेबल पर सरक रही है या फिर उस में आपत्तियाँ आ रही हैं यह उन का सिरदर्द है, आप का नहीं।

मस्या यह है कि हमारें यहाँ मजदूरी की कमी है और मजदूर अधिक हैं। सरकार, सरकारी विभाग और कंपनियाँ इस स्थिति का लाभ उठाती हैं। आज कल कामगारों का शोषण करने में वे किसी भी निजि कंपनी से कम नहीं है। अपितु वे यह चारा डाल कर कि आगे पीछे आप को विभाग में नौकरी दे दी जाएगी आप से सस्ती दर पर या फिर बिलकुल मुफ्त में काम कराते रहते हैं। जो ऑपरेटर अभी भी काम कर रहे हैं। उन के बिलों के भुगतान की भी वही स्थिति है जो आप के बिल की है। यदि आप स्थाई होने के लालच में रहे तो आप का शोषण चलता रहेगा। आप एक कंप्यूटर के स्वयं मालिक हैं। खुले बाजार में जाइए और वहाँ दक्षता के साथ काम कीजिए। यदि आप अन्य लोगों से अधिक दक्षता के साथ काम करेंगे तो आप के पास कभी काम की कोई कमी नहीं रहेगी। अन्यथा ये सरकारी विभाग और कंपनियाँ इसी तरह आप का शोषण करती रहेंगी। जो लोग अभी तक विभाग का काम कर रहे हैं उनकी भी स्थिति आप के जैसी है। हो सकता है उन्हें कुछ समय बाद उन के काम का पैसा मिल जाए। यह भी हो सकता है कि उन में से बहुत से लोग पैसा न मिलने के कारण स्वयं काम बंद कर दें। हो सकता है उन्हें कंपनी से कुछ अतिरिक्त लाभ भी मिल जाए पर किसी बात की कोई गारंटी नहीं है।

प का 1,15,570/- रुपया बिजली कंपनी की ओर बकाया है। आप उस के लिए कंपनी को एक माह या 15 दिनों का नोटिस दे दीजिए।  नोटिस की अवधि समाप्त होने पर भी आप का भुगतान न हो तो आप तुरंत जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में उक्त रुपया भुगतान कराने के लिए आवेदन कर दीजिए। वहाँ अस्थाई लोक अदालत आप को पैसा दिला देगी, या फिर आप को बता देगी कि वह यह पैसा नहीं दिला सकती और आप को दीवानी वाद करना चाहिए। तो फिर आप बिजली कंपनी के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर दें। कहीं ऐसा न हो कि आप कोई कार्यवाही न करें और कानूनी कार्यवाही का समय भी निकल जाए। यदि ऐसा होगा तो फिर आप पूरी तरह बिजली कंपनी के रहमोकरम पर होंगे।

धनराशि के भुगतान को केवल मौखिक साक्ष्य से प्रमाणित नहीं किया जा सकता

समस्या-

मैं ने एक व्यक्ति को दिनांक 23-1-2011 को रुपए 66000/- उधार दिए। मेरे पास रुपए उधार देने की रसीद है। दिनांक 20-3-2012 को मैंने उस व्यक्ति को नोटिस दिया। उस ने रुपया देने से मना कर दिया ओर कहा कि वह वापस रुपया देने के झूठे गवाह पेश कर देगा। उस ने यह भी कहा कि तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।  उस व्यक्ति के पास उधार लिया रुपया वापस लौटाने का कोई लिखित प्रमाण नहीं है।  मैं क्या करूँ?

-भंवरसिंह, उदयपुर राजस्थान

समाधान-

प ने जो रुपया उधार दिया है उस का आप के पास रसीद के रूप में दस्तावेजी प्रमाण है। आप उधार दिया गया रुपया लौटाने के लिए उसे नोटिस दे चुके हैं। आप रुपया उधार देने के लिखित प्रमाण के आधार पर उस व्यक्ति से रुपया वसूल करने के लिए जिला न्यायालय के समक्ष दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

स व्यक्ति ने रुपया लौटाने से मना कर दिया है। और उस के पास उधार लिया गया रुपया आप को लौटा देने के लिए कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है। कोई भी व्यक्ति केवल मौखिक बयानों के आधार पर उधार लिया गया रुपया लौटाना सिद्ध नहीं कर सकता। आप के मामले में भी केवल मौखिक साक्ष्य के आधार पर रुपया वापस लौटाने के तथ्य को प्रमाणित नहीं किया जा सकता। आप निश्चिंत हो कर दीवानी वाद प्रस्तुत करें। आप का वकील अच्छा होना चाहिए। वह वाद को डिक्री करवा देगा। आप डिक्री का निष्पादन करवा कर अपना रुपया वापस प्राप्त कर सकते हैं।

हर भुगतान की रसीद लेने और देने की आदत डालें

 
 रोमी अग्रवाल ने पूछा है –
मैं ने साल भर पहले सहारा के एक परिचित अभिकर्ता से अपना बचत खाता खुलवाया था। जो कि प्रतिदिन आ कर पचास रुपए ले जाता था। खाता एक वर्ष के लिए था।   उस ने 2-4 रसीदें दीं लेकिन फिर रसीदें देना बंद कर दिया। परिचित होने के कारण हम ने कभी उस से रसीद नहीं मांगी। अचानक उस की नौकरी लग गई और वह बाहर चला गया। हम ने सहारा में पता किया तो जानकारी मिली कि हमारा पैसा वहाँ जमा हुआ ही नहीं। उस का भाई हमें बार-बार घुमा रहा है, 4-6 महिने हो गए। अब इस में मैं क्या कर सकता हूँ? क्या सहारा कंपनी कुछ कर सकती है?
 उत्तर –
रोमी जी,
प बहुत लापरवाह व्यक्ति हैं। लेकिन इस में आप का कसूर नहीं है, हम सभी भारतीय वास्तव में लापरवाह व्यक्ति हैं।  आप ने अपने प्रश्न में भी लिखा है कि उस का भाई हमें बार-बार घुमा रहा है, 4-6 महिने हो गए। अब या तो चार, या फिर छह माह हुए होंगे, आप एक काल बता सकते थे। लेकिन आप ने अनुमान से यह काल लिखा है। खैर। किसी भी व्यक्ति को किसी भी अन्य व्यक्ति को किसी भी प्रकार का भुगतान देते समय रसीद अवश्य प्राप्त करनी चाहिए। चाहिए वह राशि आप अपने किसी नजदीकी रिश्तेदार को ही क्यों न दे रहे हों। आप यह ऐसे कर सकते हैं कि आप एक डायरी या स्कूली कॉपी ले लें। जब भी किसी को कोई राशि भुगतान करें या तो उस से रसीद लें और वह न दे तो इस डायरी या स्कूली कॉपी पर भुगतान का बाउचर बनाएँ और प्राप्त कर्ता के हस्ताक्षर करवा लें। इस काम के लिए बाजार में बाउचर बुक भी मिल जाती हैं। हम लोग सोचते हैं कि राशि की रसीद मांगने से सामने वाले व्यक्ति से रिश्ते खराब हो जाएंगे, वह यह महसूस करेगा कि उस का विश्वास नहीं किया जा रहा है। लेकिन रिश्ते तो अब भी खराब हो ही गए हैं। इस कारण यदि रिश्ते लेन-देन के आरंभ में ही खराब हो लें तो अच्छा है। कम से कम उतने खराब तो न होंगे जितने अब हुए हैं। यदि कोई व्यक्ति इस तरह रसीद लेने की आदत डाल ले और लेन-देन के वक्त कहे कि यह तो मेरा उसूल है मैं तो अपने बेटे या पत्नी से भी रसीद ले कर रखता हूँ, इस से मुझे हिसाब रखने में आसानी होती है, तो कोई भी व्यक्ति आप का बुरा भी न मानेगा और हो सकता है आप का अनुसरण करने लगे।
वास्तव में कानूनी स्थिति यह है कि जब तक आप के पास रसीद नहीं है तो अदालत या कोई भी अन्य कानूनी मंच भुगतान की बात को साबित नहीं मानता और इस तरह कोई कार्यवाही कर पाना संभव नहीं है। उस अभिकर्ता ने आप को 2-4 रसीदें दी ही हैं। जब उस ने रसीद देना बंद किया तभी उस से रसीद मांगी जा सकती थी और उसे बिना रसीद के धन देना बंद किया जा सकता था। इस तरह इस मामले में आप की लापरवाही का दंड ही आप भुगत रहे हैं। 
दि जैसा आप के साथ उस अभिकर्ता ने किया है वैसा ही कु

गलती से किसी व्यक्ति को दे दी गई राशि प्राप्त करने का अधिकार वास्तविक स्वामी को है

 रंजन सिंह पूछते हैं –
मेरे पिता जी ने कई साल पहले एलआईसी का प्लान लिया था। जिस में सभी दस्तावेज जमा कराने के बाद एलआईसी द्वारा पिता जी को पिछले पाँच वर्ष से पेंशन भेजी जा रही है। उन्हें दो चैक मिलते थे जिन की राशि अलग-अलग होती थी। दोनों चैक में जो पॉलिसी नं. लिखा हुआ है उन में दो अंक का अंतर है। अब एलआईसी द्वारा एक पत्र भेजा गया है कि आप को जो दो चैक से जो राशि भेजी जा रही है उन में एक चैक की राशि अधिक भेजी जा रही है, अतः आप वह राशि वापस कर दें। जब तक आप वह राशि वापस नहीं करते हैं तब तक आप को पेंशन  की राशि नहीं भेजी जाएगी।  इस में हमारी कोई गलती नहीं है हम पहले समझ रहे थे कि पेंशन के रूप में भेजी जाने वाली राशि हमारी ही है,क्यों कि वह पिताजी के नाम से थी।
मैं जानना चाहता हूँ कि क्या वह राशि हमें  वापस करनी पड़ेगी?
 उत्तर – 
रंजन जी, 
प के पिता जी को उन्हें एलआईसी द्वारा गलती से अधिक भुगतान कर दी गई राशि लौटानी होगी। वस्तुतः आप के और एलआईसी के बीच जो संविदा (कट्रेक्ट) है। आप के पिता जी उस के अनुरूप ही राशि प्राप्त करने के अधिकारी हैं। यदि कोई राशि गलती से आप के पिता जी को प्राप्त हो जाती है तो वह उन के पास अमानत है, चाहे उन को यह गलतफहमी रही हो कि यह राशि उन की ही है। निश्चित रूप से आप के पिता जी को यह जानकारी तो रही ही होगी कि उन्हें पेंशन की राशि कितनी मिलनी है? जब अधिक राशि उन्हें मिली तो उन्हें आश्चर्य अवश्य हुआ होगा और तब हो सकता है उन्हों ने पूछताछ भी की हो। प्रत्येक व्यक्ति को गलती से किसी को दी गई संपत्ति वापस प्राप्त करने का अधिकार है। यदि वह व्यक्ति संपत्ति लौटाने से इन्कार करता है तो उस संपत्ति को प्राप्त करने का अधिकार संपत्ति के वास्तविक स्वामी को है। लौटाने से इन्कार करने पर वास्तविक स्वामी न्यायालय में वाद भी प्रस्तुत कर सकता है। यदि मुझे किसी से कोई रुपया लेना है और मुझे उसे किस्तों में कोई अन्य रुपया देना भी है। यदि वह व्यक्ति मुझे मेरा रुपया देने से इन्कार करे तो मैं उसे दिए जाने वाला रुपया तब तक देने से मना कर सकता हूँ, जब तक कि मेरा अपना रुपया वसूल न हो जाए। इस सिद्धांत के अनुसार एलआईसी आप के पिताजी को दिया गया अधिक रुपया वसूल होने तक आप के पिता जी की पेंशन रोक सकती है। 
Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada