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अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के परिणाम नागरिकों को ही भुगतने पड़ेंगे।

rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

पुलिस को मिथ्या शिकायत करने वाले के विरुद्ध क्या कार्यवाही करें?

rp_police-station8.jpgसमस्या-

पवन ने प्रतापगढ़ राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारे भवन निर्माण कार्य चल रहा था ! जिस में पडोसी ने आपति लगाई, वह हम से उस की दीवार बनवाना चाहता था! लेकिन हमने ऐसा नहीं किया तो उस ने हमारे पूरे परिवार के 7 सदस्यों पर नारी लज्जा भंग का झूठा केस लगा दिया है! हम ने हमारी और से 4 गवाह पेश किये कि यह केस झूठा है! अभी तक पुलिस द्वारा हमें किसी प्रकार से परेशान नहीं किया गया है! अब आगे क्या हो सकता है?! केस को लगे मात्र 10 दिन हुए हैं! हम उस के ऊपर कैसी क़ानूनी कार्यवाही कर सकते हैं! हमें समाधान दीजिये!

समाधान –

क्त प्रकरण में पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज की है या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। पुलिस कुछ मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर लेती है, लेकिन कुछ मामलों में उसे प्राप्त हुई रिपोर्ट की जाँच पहले ही कर लेती है जिस में वह यह जानना चहती है कि वास्तव में कथित अपराध हुआ भी है या नहीं। यदि पुलिस को लगता है कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ है तो वह जाँच कर के वहीं शिकायत को समाप्त कर देती है। इस का कारण यह है कि लोग किसी भी व्यक्ति को परेशान करने की नीयत से भी मिथ्या शिकायतें पुलिस के पास करते हैं।

प को चाहिए कि थाने से संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय से यह पता करें कि क्या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है। यदि रिपोर्ट दर्ज हुई होगी तो वह 24 घंटों की अवधि में मजिस्ट्रेट के न्यायालय में पहुँच चुकी होगी। आप स्वयं जाँच करने वाले पुलिस अधिकारी से पूछ कर भी पता कर सकते हैं। यदि कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है तो आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत एसपी कार्यालय को आवेदन प्रस्तुत कर के इस शिकायत तथा उस पर की गयी जाँच से संबंधित दस्तावेज की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर लें और उन्हें किसी स्थानीय वकील को दिखाएँ। उन की प्रतियाँ देख कर ही वकील यह बता सकेगा कि कोई कार्यवाही आप के पड़ोसी के विरुद्ध की जा सकती है अथवा नहीं।

दि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी हो तो पुलिस या तो आप के विरुद्ध कोई आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी तो वह आप को बता देगी। वैसी स्थिति में आप को आप के विरुद्ध मुकदमे को लड़ कर समाप्त कराना होगा। यदि वह आरोप पत्र के स्थान पर अन्तिम प्रतिवेदन प्रस्तत करती है तो फिर अन्तिम प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रतियाँ न्यायायलय से प्राप्त कर लें और उन्हें किसी स्थानीय वकील को दिखा कर कार्यवाही करें।

पुलिस को बयान डाक से भेजा जा सकता है।

domestic-violenceसमस्या-

संजना वर्मा ने इन्दौर,मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने मेरे पति के खिलाफ घरेलू हिंसा से महिलाओ के संरक्षण अधिनियम की धारा 12 और 23 के अंतर्गत भरण पोषण का केस जिला कोर्ट इंदौर में लगाया था। जिस में सब से पहले मेरे ओर मेरे बच्चे के लिए 3500 रु. प्रतिमाह देने का आदेश हुआ था उस के बाद सेशन कोर्ट में अपील करने पर बढ़ कर 8000 रु. हो गया। मुझे ओर मेरे बच्चे को मेरे पति और मेरे ससुराल वालों ने खूब मार पीट कर घर से बाहर निकाल दिया और उस के बाद इंदौर थाने में हमारी गुमशुदगी की रिपोर्ट की उस के बाद मुझे और मेरे घर वालों को मुझे दोबारा ले जाने पर मजबूर कर के झूठे बयान करवाए थे। जब से मेंटीनेंस का आदेश हुआ है तब से मेरा पति मुझे किसी ना किसी तरह से परेशान कर रहा है। मैं इंदौर में किराए के मकान में रह कर बैंक, पोस्ट आफिस का काम और प्राइवेट जॉब कर रही हूँ। क्यों कि मैं अपने बच्चे और खुद को किसी पर बोझ बनने नहीं देना चाहती हूँ। अभी मेरे पति ने कुछ दिन पहले भोपाल डीजीपी ऑफिस में झूठी शिकायत की कि मैं किसी लड़के से शादी कर के रह रही हूँ। और मेरे मकान मालिक ने रेंट एग्रिमेंट की कॉपी ओर सूचना पास के थाने में नहीं दी है। मैं घर पर देह व्यापार कर रही हूँ पुलिस आई ओर उन्हों ने ये सारी शिकायतों के बारे में बताया ओर मेरे और मकान मालिक के बयान हुए। जिस की कॉपी सूचना के अधिकार में निकाली है। अभी इटारसी थाने में पति के माता पिता रहते हैं जहाँ वह मुझे शादी करके लेकर गया था। वहाँ पर भी मेरे खिलाफ झूठी शिकायत की है। वहाँ के सब इंसपेक्टर ने मुझे कॉल कर के बयान के लिए इटारसी थाने में बुलाया है। अब आप ही मुझे सुझाव दीजिए कि क्या मैं अपने बयान लिख कर उस थाने के पते पर स्पीड पोस्ट कर सकती हूँ? या मुझे ही जाना पड़ेगा मुझे डर है कि मेरे साथ कुछ बुरा करने के लिए प्लानिंग तो करके नहीं रखी है। मेरे साथ कोई भी अनहोनी हो सकती है। वह मुझ पर एसिड फेंकने की ओर मेरा एक्सीडेंट करवाने की या मेरा अपहरण करवा कर मेरा रेप करवा कर मुझे कोठे पर बिठवाने की लगातार धमकियाँ दे रहा है। इस संबंध में मैं क्या कर सकती हूँ? मैं बहुत परेशान हूँ। कोर्ट में क्या कार्रवाई कर सकती हूँ? क्या मेरे पति ओर मेरे ससुराल वालों के इन कामों से घरेलू हिंसा साबित हो जाती है? प्लीज मुझे थाने ओर कोर्ट दोनों में की जाने वाली कार्रवाई के लिए सुझाव दें। मुझे 28 जनवरी 2015 के पहले बयान के लिए इटारसी थाने पर बुलाया है।

समाधान-

प ने घरेलू हिंसा के अतिरिक्त और क्या कार्यवाही की है यह नहीं बताया है। जो परिस्थितियाँ आप ने बताई हैं उन में आप दोनों के बीच भविष्य में कोई सामंजस्य बन पाना और साथ रह पाना असंभव है। इन परिस्थितियों में विवाह विच्छेद के लिए रुकना ठीक नहीं है। इतने तनाव के साथ जीने से अच्छा है आप लोग अलग हो जाएँ। आप के पास विवाह विच्छेद के लिए क्रूरता का अच्छा आधार है। आप को विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर इस का आरंभ कर देना चाहिए। बाद में क्या परिस्थितियाँ बनती हैं। तब देखा जाएगा। हो सकता है किन्हीं परिस्थितियों में आप को एक मुश्त भरण पोषण दे कर आप का पति आप से विवाह विच्छेद चाहे। तब वैसा सोचा जा सकता है। विवाह विच्छेद का अर्थ यह कतई नहीं है कि आप का व बच्चे का भरण पोषण बन्द हो जाएगा।

हाँ तक इटारसी थाने से प्राप्त सूचना का संबंध है। आप इटारसी पुलिस थाना को अपना बयान लिखित में स्पीड पोस्ट या रजिस्टर्ड डाक से भेज सकती हैं और उन से आग्रह कर सकती हैं कि इटारसी आना आप की सुरक्षा के लिए उचित नहीं है। यदि पुलिस को आप का बयान लेना है तो अन्वेषण अधिकारी स्वयं आप के पास आ कर बयान ले कर जा सकता है। आप स्थानीय थाने में भी रिपोर्ट करा सकती हैं कि आप की सुरक्षा खतरे में हैं और आप को पति द्वारा धमकियाँ दी गई हैं कि एसिड फैंक दिया जाएगा या अपहरण कर बलात्कार किया जाएगा। फिलहाल आप इटारसी थाने को लिखित बयान भेजें और प्रतीक्षा करें कि अन्वेषण अधिकारी की प्रतिक्रिया क्या है? यदि इटारसी थाने में दर्ज हुई प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति किसी तरह मंगवा सकती हैं तो उस के विरुद्ध धारा 482 में इन्दौर उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर उसे निरस्त कराया जा सकता है।

संज्ञेय अपराध होने पर कार्यवाही करना पुलिस का कर्तव्य है, एफआईआर दर्ज न करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें

समस्या-

श्री गंगानगर, राजस्थान से अमरीक ने पूछा है-

मैं ने समाचार पत्र में विज्ञापन पढ़ कर एक टॉवर कंपनी से संपर्क किया।  उन्हों ने 3,550/- रुपए में रजिस्ट्रेशन करवाने को कहा और बताया कि कंपनी मुझे 60000 रुपए किराया देगी और 30-30 लाख दो किश्तों में एडवांस देगी।  मैं ने रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर दिया।  इसके बाद उन्हों ने बोला कि आपको 30 लाख का एडवांस इनकम टेक्स 1% जमा करवाना होगा। मैं ने मना कर दिया तो उन्हों ने कहा कि एक बार 10000/- रुपए जमा करवा दो।  हम आपका 10 लाख का चैक लगवा देंगे। मेरे द्वारा 10,000/- जमा करवाने के बाद वो बोले कि पूरे 30,000/- जमा करवाने होंगे। मैं ने मना कर दिया तथा अपने पैसे वापस माँगे तो कंपनी कोई जवाब नहीं दे रही है।  उनकी डिटेल ली तो पता चला कि वो सब फ़र्ज़ी है। पुलिस की सहायता लेने गया तो वो बोले कि उन्हें पकड़ा नही जा सकेगा क्यों कि उनका पता आपको पता नहीं है।  मेरे पास उनका मोबाइल नम्बर और पंजाब नेशनल बैंक का अकाउंट नंबर है मगर पता नहीं है।  उन पर क्या कार्यवाही हो सकती है? मेरे 13,550/- रुपये उनके पास हैं। पुलिस ने तो यहाँ तक बोल दिया कि जो भी खर्च होगा वह आपका लगेगा।  मैं इतना खर्च वहन करने में समर्थ नहीं हूँ।  कृपया बताए कि मैं क्या करूँ कि धोखाधड़ी करने वाले पकड़े जाएँ?

समाधान-

ब तक आप को उस कंपनी के पूरे नाम-पतों और विश्वसनीयता के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी तो आप को उस के साथ व्यवहार नहीं करना चाहिए था। जितनी भी अच्छी कंपनियाँ या कारोबारी होते हैं उन की शर्तें स्पष्ट होती हैं और वे बदलते नहीं हैं। जब उन्हों ने आप से पहले स्पष्ट किए बिना ही 30,000/- रुपए जमा करवाने को कहा और आप के मना करने पर 10 हजार ही जमा करने को कहा तभी आप को समझ जाना चाहिए था कि कंपनी फर्जी है। कोई भी कंपनी पाँच माह का किराया अग्रिम नहीं देती है और किराया प्रतिमाह अदा करती है। इस के अलावा इन्कम टैक्स एडवांस जमा नहीं होता है अपितु आप को अदा करने वाले किराए में काट कर अदा करने वाला जमा करवाता है और शेष राशि का भुगतान करता है।  बिना भुगतान प्राप्त किए आप की इन्कम टैक्स की जिम्मेदारी नहीं बनती है। आप ने इन सब बातों पर विचार नहीं किया। यदि करते तो इस ठगी के शिकार नहीं होते।  हर व्यक्ति को इस तरह का कोई भी अतिलाभकारी दिखाई देने वाले किसी प्रस्ताव को स्वीकार करने के पहले दस बार गंभीरता से सोचना चाहिए।

निश्चित रूप से जब कंपनी का पता नहीं है तो उस के विरुद्ध कार्यवाही करना दुष्कर काम है। हालाँकि बैंक खाते और मोबाइल नंबर से उन का पता किया जा सकता है। लेकिन ये दोनों भी इस तरह के हो सकते हैं कि उन से पता नहीं लगे।  फर्जी पते से मोबाइल चिप लेना भारत में वैसे ही बहुत आसान है।  बैंक खाते भी एक बार ठगी के बाद बंद कर दिए जाते हैं और बैंक में दिए गए पते पर पहुँचने पर पता लगता है कि वहाँ इस तरह का कोई व्यक्ति कभी नहीं रहा था।

किसी भी प्रकार के संज्ञेय अपराध होना पुख्ता होजाने पर उस पर कार्यवाही करना पुलिस का कर्तव्य है और पुलिस को वेतन व खर्चे सरकार देती है। ऐसी अवस्था में इस ठगी के मामले में कार्यवाही करने से पुलिस मना नहीं कर सकती और न ही यह कह सकती है कि उस में होने वाला खर्च आप को उठाना होगा। वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस को सफलता मिलना कठिन होता है इस कारण वे दर्ज मामलों में सफलता का प्रतिशत घटाने के भय से शिकायतकर्ता को हतोत्साहित करते हैं। फिर मामला 13,550/- रुपए की छोटी राशि का है और अनुसंधान का खर्च उस से कहीं अधिक।  इस कारण से शिकायतकर्ता भी अधिक परेशानी में पड़ने के स्थान पर घर बैठना अधिक पसंद करता है।

फिर भी आप शिकायत करना और उस पर कार्यवाही होना देखना चाहते हैं तो तुरंत इलाके के पुलिस सुपरिंटेंडेंट को पूरी बात लिख कर रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेज दीजिए। इस शिकायत में यह भी बताइए कि पुलिस थाना ने आप की शिकायत यह कह कर लिखने से मना कर दिया कि इस में जो भी खर्च होगा आप को भुगतना होगा। आप की शिकायत पर इस स्तर पर भी कोई कार्यवाही नहीं हो तो आप न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कीजिए और उसे धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस को अन्वेषण के लिए प्रेषित करवाइए। तब पुलिस को इस मामले में कार्यवाही करना ही होगा।

पुलिस ज्यादती के विरुद्ध उच्चाधिकारियों को शिकायत करें और न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें

समस्या-

ठाणे, महाराष्ट्र से गुड्डू यादव ने पूछा है –

मुझे एक वरिष्ठ पुलिस उपनिरीक्षक द्वारा फँसाया और मारा व पीटा गया है।  रात 9 बजे की घटना है,  मेरे घर के नजदीक पुलिस स्टेशन है, वहाँ पर रात्रि को रामलीला हो रही थी।  मैं अपने दोस्त के साथ घर आ रहा था, रास्ते में पुलिस स्टेशन आया तब वहाँ पर रामलीला चल रही थी और बहुत भीड़ थी।  उसी समय मेरे दोस्त ने जोर से चिल्लाकर कह दिया कि “जागते रहो” इतने में वहाँ ड्यूटी पर उपस्थित वरिष्ठ पुलिस उप निरीक्षक ने सुन लिया।  उस समय उन्होंने कुछ भी नहीं किया।  जब हम लोग वहाँ से कुछ दूर चले गए तो पुलिस साहेब ने कुछ कांस्टेबल को भेजकर मुझे और मेरे दोस्त को बुलाया और पुलिस स्टेशन में अन्दर ले जाकर मारने लगे।  वे कह रहे थे कि पुलिस वालों का मजाक उड़ाते हो और कहते हो “जागते रहो”।  हम ने कहा कि हम लोगों ने आपको देखकर नहीं कहा था, तो उन्हें और गुस्सा आ गया।   फिर तो वे डंडे और लात (पैर) से मारने लगे।  कुछ समय के बाद वे हमें पुलिस हेड ऑफिस में ले गये,  ले जाते समय पुलिस गाड़ी में 3 स्टार पुलिस अधिकारी  भैया और यू पी वाला कहकर हमें गाली देने लगा।  कह रहा था कि तुम्हारे नाम पर ऐसी शिकायत (एफ.आइ.आर.) दर्ज करेंगे कि कहीं तुम भैया लोगों को नौकरी भी नहीं मिलेगी।  तुम लोग चरित्र सर्टिफिकेट के लिए यहाँ आओगे तब देख लेंगे, कैसे मिलता है?  यह सब कहकर और माँ-बहन की अश्लील गालियाँ देकर महिला पुलिस के सामने मजाक उडाते रहे और हमें डराते रहे।  इसके बाद जब हमें पुलिस स्टेशन ले गए तो रात के 1:30 बजे तक हमारे खिलाफ कोई शिकायत नहीं लिखी और हमें लॉकअप में बंद करके रखा।  जब हमारे परिवार वाले वहाँ पहुँचे तो उनके साथ बड़े कठोर बर्ताव किया।  कह रहे थे कि सालों को कहीं नौकरी भी नहीं मिलेगी।  अंतत: रात को 2:00 बजे मुझे और मेरे दोस्त को 1250-1250 रुपये का दंड वसूल कर के छोड़ दिए और उसकी रसीद भी दी।  परन्तु मेरा कहना यह है कि हमने उस वरिष्ठ अधिकारी को देखकर ऐसा कुछ नहीं कहा।  हमने माफी भी मांगी, पर अधिकारी सुनने को तैयार नहीं थे।  उन्होंने हमारे खिलाफ धारा 112/117 के अंतर्गत शिकायत दर्ज करके छोड़ दिया है और कोर्ट में जाने के लिए कहा है।

1) मैं आप से ये जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसे वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ अपनी शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज कराऊँ?  उसका प्रारूप क्या होगा? जैसा कि वरिष्ठ अधिकारी को “जागते रहो” बात से चिढ़ आ गयी थी, जिसका मतलब है कि वो अपने ड्यूटी पर सो रहे थे और हमने उनके सोने पर मजाक उड़ाया है।  अतः मुझे ये बताइए कि क्या “जागते रहो” एक गाली है?  या पुलिस वालों के लिए अपमान जनक (सूचक) शब्द है?  यदि ऐसा नहीं है तो कल भविष्य में इन्कलाब जिंदाबाद¡  वन्दे मातरम¡ और भारत माता की जय¡ जैसे स्लोगन कहने पर भी पुलिस स्टेशन जाना पड़ेगा?

2)मुझे कोर्ट में हाजिर होना है अतः मुझे ये बताइए कि क्या मैं इस शब्द को लेकर अपना गुनाह कबूल करूँ या मैं उस अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करुँ?

3) उस अधिकारी ने मुझे पुलिस स्टेशन में लातों से मारा है मुझे अपमानित किया।  क्या मैं इसके साथ अपनी मानहानि का दावा बिना किसी वकील के कर सकता हूँ?

4) क्या मुझे अपने बचाव के लिए सरकारी वकील मिल सकता है?

5) क्या लात से मारना हमारे मानव अधिकार की अवहेलना नहीं है? यदि है तो क्या इसकी शिकायत मानवाधिकार आयोग को की जा सकती है?

6) क्या वरिष्ठ अधिकारी माँ-बहन की कठोर गाली देकर अपमानित करे तो उसे सहन कर लेना चाहिये?

7)पुलिस द्वारा झूठे मामले में फँसाने की धमकी देने के बारे में कैसे और कहाँ शिकायत दर्ज करानी चाहिये?

8) क्या मैं बचाव के लिए पुलिस स्टेशन में लगे सीसीटीवी  कैमरे की फुटेज सूचना के अधिकार के अंतर्गत ले सकता हूँ?

समाधान-

प के साथ जो व्यवहार पुलिस ने किया है वह केवल निन्दनीय तो है ही। इस मामले में लिप्त पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही भी होनी चाहिए।  किसी भी पुलिस अधिकारी को किसी नागरिक के साथ इस तरह का व्यवहार करना उचित ही नहीं अपराधिक भी है। लेकिन आप ने जो विवरण दिया है उस में कुछ बातें समझ नहीं आई हैं। आप पर धारा 112/117 बोम्बे पुलिस अधिनियम का आरोप लगाया गया है। इस मे मात्र जुर्माने का प्रावधान है जो आप से वसूल लिया गया है। इस के बाद भी आप को पुलिस ने अदालत में किस बात के लिए उपस्थित होने को कहा है? यह स्पष्ट नहीं हुआ है। हाँ आप से जुर्माना वसूल किया है उसे आप गलत मानते हैं तो आप उस के विरुद्ध न्यायालय में जा सकते हैं। आप के प्रश्नों के उत्तर निम्न प्रकार हैं-

1. आप पुलिस अधिकारी के विरुद्ध इलाके के पुलिस सुपरिण्टेंडेंट को या आई.जी. पुलिस को शिकायत कर सकते हैं। इसे आप रजिस्टर्ड डाक से भेज दें। घटना की जाँच होगी।

2. आप को अदालत में गुनाह कबूल करने की आवश्यकता नहीं है।  जब आप ने कुछ नहीं किया है तो आप को उस का प्रतिवाद करना चाहिए। न्यायालय जो भी आदेश दे यदि उसे गलत समझें तो आगे अपील करें।

3. यह मानहानि का नहीं अपमानित करने और मारपीट करने का मामला है। इस मामले में आप को न्यायालय में व्यक्तिगत परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

4.यदि आप की आमदनी कम है तो आप अपने जिला न्यायालय में स्थित विधिक सहायता केंद्र में निशुल्क वकील उपलब्ध कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

5. आप मानवाधिकार आयोग को शिकायत कर सकते हैं।

6. बिलकुल सहन नहीं करना चाहिए, प्रतिरोध करना चाहिए। किन्तु पुलिस पूरी व्यवस्था का एक अंग है। उस का प्रतिरोध अकेले नहीं किया जाना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे एक बड़े गिरोह से एक साहसी व्यक्ति अकेला टकरा जाए। आप को व्यवस्था से सदैव ही समूह बद्ध हो कर मुकाबला करना चाहिए। आप को इस मामले में अपने क्षेत्र के सिविल राइट्स के लिए काम करने वाले जन संगठनों के साथ जुड़ना चाहिेए और उन के माध्यम से प्रतिवाद करना चाहिए।

7. इस प्रश्न का उत्तर पहले प्रश्न के साथ दिया जा चुका है।

8. पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी कैमरे में कुछ नहीं मिलेगा। कैमरा उस समय बंद रहा होगा। पुलिस वाले मूर्ख नहीं हैं जो आप के साथ सीसीटीवी कैमरे के सामने मारपीट और अभद्र व्यवहार करेंगे। सीसीटीवी कैमरे में कुछ दर्ज हुआ भी होगा तो उसे हटा दिया गया होगा। फिर भी इस के लिए आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचना अधिकारी, कार्यालय एसपी, पुलिस को आवेदन कर सकते हैं।

केवल सूचना देने वाले के विरुद्ध ही धारा 182 भा.दं.सं. का मामला दर्ज किया जा सकता है

समस्या-

मेरे गांव के एक व्यक्ति ने एक होमगार्ड महिला के खिलाफ जिसके यहां वो पूर्व में काम किया करता था,   हरिजन उत्पीड़न अधिनियम के तहत मारपीट की रिपोर्ट लिखायी थी। पुलिस ने इस मामले में अंतिम रिपोर्ट लगा दी है तथा अपनी रिपोर्ट में मेरे कुछ विरोधियों के इशारे पर उक्त होमगार्ड महिला के कहने पर मेरे खिलाफ 182 की रिपोर्ट भेज दी है।  जबकि उक्त व्यक्ति तथा उस मामले से मेरा कोई लेना देना नहीं है।  हां, उपरोक्त महिला से हमारा विवाद है जो कि न्यायालय में प्रक्रियाधीन है।  क्या पुलिस मेरे खिलाफ कोई कार्यवाही कर सकती है? तथा क्या मैं इस मामले में पुलिस के विरुद्ध न्यायालय में कार्यवाही सकता हूँ?

-भूरिया, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

समाधान-

भारतीय दंड संहिता की धारा 182 निम्न प्रकार है-

182. इस आशय से मिथ्या इत्तला देना कि लोक सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति कारित करने लिए करे- जो कोई भी लोक सेवक को कोई ऐसी इत्तला, जिस के मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है, इस आशय से देगा कि वह उस लोक सेवक को प्रेरित करे या यह संभाव्य जानते हुए कि वह उस को तदद्वारा प्रेरित करेगा कि वह लोक सेवक –

(क) कोई ऐसी बात करे या करने का लोप करे जिसे वह लोक सेवक, यदि उसे उस सम्बन्ध में, जिस के बारे में ऐसी इत्तला दी गई है, तथ्यो की सही स्थित का पता होता तो न करता या करने का लोप न करता, अथवा…

(ख) ऐसे लोक सेवक की विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग करते जिस उपयोग से किसी व्यक्ति को क्षति या क्षोभ हो,

वह दोनो में से किसी भाँति के कारावास से, जिस की अवधि छह मास तक की हो सकेगी. या जुर्माने से जो एक हजारा रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

धारा 182 भा.दं.संहिता के उक्त पाठ से स्पष्ट है कि इस धारा का उपयोग केवल उस व्यक्ति के विरुद्ध किया जा सकता है जिस ने पुलिस को साशय कोई इत्तला दी हो। आप द्वारा वर्णित मामले में किसी अन्य व्यक्ति ने पुलिस को इत्तला दे कर रिपोर्ट दर्ज करवाई है।  इस मामले में आप की भूमिका केवल इतनी हो सकती है कि पुलिस ने अन्वेषण किया हो और आप का बयान धारा 161 भा.दंड.संहिता के अंतर्गत लिया हो. यदि पुलिस ने ऐसा किया है तो भी पुलिस आप के विरुद्ध धारा 182 में किसी अपराध की कार्यवाही करने हेतु न्यायालय से आवेदन नहीं कर सकती। इस कारण से आप को निश्चिंत रहना चाहिए।

स मामले में जब तक पुलिस आप के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करे आप पुलिस के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं कर सकते। लेकिन यदि पुलिस आप के विरुद्ध कोई कार्यवाही करती है तो आप न्यायालय में कार्यवाही कर सकते हैं।  इस के अतिरिक्त वह व्यक्ति जिस ने होमगार्ड महिला के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करवाई है वह पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट को चुनौती दे सकती है और न्यायालय में अपने साक्षियों के बयान करवा कर मामले में न्यायालय से प्रसंज्ञान लेने का आग्रह कर सकती है।

पुलिस को मिथ्या शिकायत करना अपराध है

समस्या-

मेरे विरुद्ध किसी ने पुलिस में झूठी शिकायत की है।  इस शिकायत को मै झूठी साबित कर सकता हूँ।  मैं इसे झूठी साबित करूंगा।  इस के बाद में झूठी शिकायत करने वाले के विरुद्ध क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?

– वेद, फतेहाबाद, हरियाणा

समाधान-

दि कोई किसी व्यक्ति के विरुद्ध मिथ्या शिकायत पुलिस को करता है, तो यह कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 182 के अंतर्गत अपराध है और इस में छह माह तक का कारावास तथा अर्थदंड दिए जाने का उपबंध किया गया है।   किसी व्यक्ति के विरुद्ध मिथ्या शिकायत करना उस की अपहानि करना भी है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा  500 के अंतर्गत अपराध है जिसके लिए दो वर्ष तक का कारावास तथा अर्थदंड उपबंधित है।

दि आप के पास आप के विरुद्ध की गई शिकायत की प्रमाणित प्रतिलिपि उपलब्ध है और आप को विश्वास है कि आप के विरुद्ध की गई शिकायत को मिथ्या साबित कर देंगे तो आप उस के मिथ्या साबित किए जाने की प्रतीक्षा किए बिना भी  उस पुलिस थाने पर क्षेत्राधिकार रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं और शिकायतकर्ता के विरुद्ध अभियोजन चला सकते हैं। लेकिन इस तरह के मामलों में जब तक पुलिस इस तरह के मामलों में कार्यवाही करने से इन्कार न कर दे, यदि शिकायत पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली गई हो तो उस में अन्वेषण के उपरान्त आरोप न बनने की रिपोर्ट न्यायालय को प्रस्तुत न कर दे या आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत हो जाने पर न्यायालय द्वारा आप को दोषमुक्त करार न दे दिया जाए तब तक इस तरह की कार्यवाही करना उचित नहीं है।

पुलिसवालों के अपराध के विरुद्ध सीधे न्यायालय में शिकायत और सबूत पेश कर मुकदमा दर्ज कराएँ

 नासिक से मनीष अग्रवाल ने पूछा है –

तीन वर्ष पहले इंटरनेट पर जबलपुर के एक पुलिस वाले आशुतोष अवस्थी से दोस्ती हुई. कुछ समय बाद उस ने कहा कि उस की बहन प्रियंका अवस्थी बंगलोर में पढ़ाई करने जाएगी, हम गरीब आदमी हैं आप उस की पढ़ाई के लिए मदद कर दीजिए। मैं दो साल तक उस के खाते में धन डालता रहा। उस के बाद मुझे पता लगा कि इंटरनेट पर दोनों बहन भाई मिल कर लोगों को फँसा रहे हैं। मैं ने नासिक में साइबर क्राइम में रिपोर्ट करा दी। इस बीच आशुतोष बंगलौर गया और वहाँ केजीबी नगर पुलिस स्टेशन में मेरे विरुद्ध झूठी रिपोर्ट लिखवा कर वहाँ के तीन पुलिस वालों सब इंसपेक्टर मोनेश्वर, अभयंकर और रेड्डी को ले कर 26.05.2011 को नासिक आया। मुझे जबरन पुलिस वाले उठा कर बंगलौर ले गए और जबरदस्ती हवालात में बंद कर दिया गया दूसरे दिन आशुतोष अवस्थी वहाँ पहुँचा और मेरे साथ मारपीट कर, डरा-धमका कर लिखवा लिया कि मैं ने प्रियंका अवस्थी के खाते में जो धन डाला था वह मुझे मिल गए हैं मैं इन लोगों को फोन कर के कभी तंग नहीं करूंगा और नासिक में दी हुई सारी शिकायतें वापस ले रहा हूँ। वहाँ अन्वेषण के लिए मेरा लेपटॉप और पचास हजार रुपए जो मैं ले कर गया था वे भी रख लिए। ऐसा क्यों किया गया मुझे पता नहीं। बाद में मुझे छोड़ दिया गया। वापस आ कर मैं ने नासिक में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाही तो मुझे भगा दिया गया। पहले से जो रिपोर्ट दर्ज की हुई थी उस पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई। मैं ने बंगलौर मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के गृहमंत्री और देश के बड़े नेताओं को भी मेल किए पर किसी ने जवाब नहीं दिया। मेरे घर वाले बहुत डरे हुए हैं। क्या कानून की मदद ले कर मैं कुछ कर सकता हूँ? पुलिस वाले ही चोर बन जाएंगे तो जनता किस के पास जाएगी? 
 
 
 उत्तर-
 
मनीष जी,
 
प ने मात्र इंटरनेट की पहचान के आधार पर मदद करने का निश्चय कर और मदद कर के गंभीर भूल की है। मदद करने के पहले वास्तविकता की जाँच नहीं की। दुनिया में, बहुत लोग हैं जिन्हें मदद की आवश्यकता होती है और आप जैसे भी बहुत लोग हैं जो मदद करना चाहते हैं। लेकिन मदद हमेशा सुपात्र की ही करनी चाहिए। कुपात्र को की गई मदद जी का जंजाल बन सकती है, यह आप के उदाहरण से स्पष्ट है। पुलिस का जो चरित्र है उसे सब जानते हैं और भारत में न्याय की स्थिति से भी लोग अनजान नहीं हैं। ऐसे में इन सब से जितना बच कर रहा जाए उतना ठीक है। आप को किसी की मदद करनी ही थी तो आप नासिक में ही ऐसे लोग तलाश सकते थे जिन्हें मदद की आवश्यकता है, या फिर किसी ईमानदार संगठन को यह मदद दे सकते थे। खैर!
प के बताए गए तथ्य पूरी तरह सही हैं तो वाकई आप के साथ बहुत बुरा हुआ है। अब आप चाहते हैं कि कानून आप की मदद करे, तो आप के पास सीधे न्यायालय के पास जाने का मार्ग खुला है। आप को अपने घर से उठाया गया था। आप नासिक में आप के क्षेत्र के पुलिस थाने का क्षेत्राधिकार जिस मजिस्ट्रेट की अदालत को है वहाँ अपनी शिकायत प्रस्तुत करें। आप के साथ जो भी घटनाएँ हुई हैं मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपने स्वयं के बयान कराएँ और जो भी साक्षी उपलब्ध हों उन के बयान कराएँ। आप के द्वारा

पुलिस को अन्वेषण के लिए आदेश देने की पुलिस की शक्तियाँ

 रमेशकुमार जैन ने जानना चाहा है –
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज न करने के सन्दर्भ में धारा 156 (3) की परिभाषा क्या हैं, इसमें प्रक्रिया (पहले ब्यान, फिर पुलिस रिपोर्ट आदि ) कैसे चलती हैं और क्या इसके लिए कानून में समयसीमा निर्धारित है या उपरोक्त आवेदन पर ही फैसला लेने में पीड़ित व्यक्ति टूट चुका होता है। इसी सन्दर्भ में कुछ पुलिस अधिकारियों द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज न करने के बारे में क्या कुछ धारा और भी हैं? हैं तो कौन-कौन सी हैं।
 उत्तर –
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 पुलिस अधिकारियों द्वारा संज्ञेय मामलों में अन्वेषण करने के अधिकार से संबंधघित है। सभी अपराधों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है, संज्ञेय अपराध और असंज्ञेय अपराध। इन के बारे में जानने के लिए आप तीसरा खंबा की पोस्ट संज्ञेय और असंज्ञेय अपराधों व मामलों की पुलिस को सूचना पढ़ें। इस संबंध में आगे की जानकारी के लिए आप को इस से अगली पोस्ट प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के उपरांत पुलिस के कर्तव्य भी पढ़नी चाहिए। इन दोनों को पढ़ने से आप को बहुत स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। 
धारा 156 की उपधारा (1) में पुलिस अधिकारी बिना किसी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी भी संज्ञेय मामले में अन्वेषण आरंभ कर सकता है, जब कि असंज्ञेय मामलों में नहीं। उपधारा (2) में यह कहा गया है कि यदि पुलिस अधिकारी किसी मामले को संज्ञेय मानते हुए अन्वेषण आरंभ करता है तो उस अन्वेषण को इस आधार पर कहीं भी चुनौती नहीं दी जा सकती कि मामला ऐसा था जिस में पुलिस अधिकारी इस धारा के अंतर्गत सशक्त न था। इस तरह यदि पुलिस अधिकारी किसी असंज्ञेय मामले को भी संज्ञेय मान कर अन्वेषण आरंभ करता है और इस दौरान अपनी बदनीयती से किसी व्यक्ति को परेशान करता है तो भी उस के इस काम को चुनौती देना संभव नहीं है। सारे पुलिस अधिकारी इस उपधारा (2) का भरपूर दुरुपयोग करते हुए लाभ उठाते हैं। इस में संशोधन वांछित है। उपधारा (3) में कहा गया है कि कोई भी सशक्त मजिस्ट्रेट किसी पुलिस अधिकारी को अन्वेषण करने का आदेश दे सकता है।
धारा 156 (3) में किसी मामले का अन्वेषण करने का आदेश मजिस्ट्रेट स्वतः प्रेरणा पर भी दे सकता है और किसी की शिकायत पर भी।  धारा 190 में यह उपबंधित किया गया है कि मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति के परिवाद पर या स्वयं की जानकारी के आधार पर किसी अपराध का प्रसंज्ञान ले सकता है। किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष किसी अपराध की सूचना परिवाद के माध्यम से प्रस्तुत करने पर मजिस्ट्रेट धारा 200 के अंतर्गत परिवादी और उस के साक्षियों के बयान ले सकता है। लेकिन यदि परिवाद लिखित में प्रस्तुत किया गया हो तो ऐसा बयान लेना मजिस्ट्रेट के लिए आवश्यक नहीं है। धारा 202 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट परिवाद पर यह जानने के लिए कि उस पर कार्यवाही करने के लिए कोई आधार है या नहीं खुद जाँच कर सकता है अथवा किसी पुलिस अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को जिसे वह उचित समझे अन्वेषण करने का आदेश दे सकता है। 
म तौर पर यदि कोई मजिस्ट्रेट किसी मामले को अन्वेषण के लिए पुलिस अधिकारी को प्रेषित करता है तो पुलिस उस मामले में अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर अन्वेषण करती है। लेकिन यदि पुलिस अधिकारी आरंभिक अन्वेषण के बाद पाए कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के स्थान पर मजिस्ट्रेट को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।

अखबारों द्वारा अश्लील और धोखे वाले विज्ञापन प्रकाशित करना अपराध है


 अरुण कुमार झा ने पूछा है –
 
1. आए दिनों कई प्रकार के विज्ञापन दैनिक अखबारों में छपते हैं जैसे सेक्स शक्ति बढ़ाने का नुस्खा, इन विज्ञापनों में बहुत ही भद्दे और शर्मसार करने वाले चित्र रहते हैं। क्या ऐसे विज्ञापनों के चित्रों को बंद किया जा सकता है?
2. दोस्ती करने के संबंध में जो विज्ञापन दैनिक अखबारों में छपते हैं  वे तो बिलकुल ही ठग लोगों द्वारा भोले भाले युवकों युवतियों को समाज से गुमराह करने वाला होता है। क्या उस विज्ञापन की सत्यता को जाँचने की जिम्मेवारी संबंधित अखबारों की नहीं होनी चाहिए?
3. इसी प्रकार युवकों को बिना कोई जमानत के भारी रकम कर्ज के रूप में देने का लालच दिया जाता है क्या ऐसे विज्ञापन पर कानूनी रोक नहीं लग सकती? 
 उत्तर – 
अरुण जी,
हमारे साथी वकील श्री अख्तर ख़ान अकेला को इस तरह की समस्याओं का विशेष अनुभव है, आप के प्रश्नों का उत्तर अकेला जी ने इस तरह दिया है –
1. आप के पहले प्रश्न का उत्तर है कि हमारे देश में प्रेस पुस्तक पंजीकरण अधिनियम बना हे जिसके तहत किसी भी अख़बार या मैगज़ीन प्रकाशन के पहले एक घोषणा पत्र प्रस्तुत करना पढ़ता है।  देश के कानूनों की परिधि में ही अखबार प्रकाशित किया जा सकता है।  देश में चमत्कारिक औषधि और चमत्कारिक उपाय  (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 बना है।  इस कानून में ऐसी किसी भी दवा का विज्ञापन प्रकाशन गैर कानूनी है और जो कम्पनी इस तरह के विज्ञापन छपवाती है उसे तो 6 माह तक  सजा हो सकती है।  इस तरह के विज्ञापन प्रकाशित करने वाले अख़बार के स्वामी को दो वर्ष तक की सजा हो सकती है। मामला संज्ञेय है जिस में शिकायत पर या फिर खुद पुलिस मुकदमा दर्ज कर सकती है।  लेकिन इस गेर कानूनी धंधे में अब अख़बार भी लिप्त हें और पुलिस खामोश है, दवा के संबंध में औषधि कानून अलग से बना है जिसमें किसी भी दवा का विज्ञापन अवैध और गैर कानूनी है। ऐसे विज्ञापन प्रकाशन पर दवा निर्माता का लाइसेंस निलम्बित करने और सजा का भी प्रावधान है। वैसे भी किसी भी दवा को चिकित्सक की सलाह के बगैर बेचना ,बिकवाना और खरीदना अपराध है।
2. आप का दूसरा प्रश्न दोस्ती करने के संबंध में में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों के संबंध में है कि क्या इस ठगी वाले विज्ञापन की सत्यता को जाँचने की जिम्मेदारी संबंधित अखबारों की नहीं होनी चाहिए?
इस मामले में उत्तर यह है कि कोई भी प्रकाशन जो अश्लीलता या किसी अपराध को बढावा देता है उसमें अख़बार मालिक,सम्पादक,प्रकाशक और विज्ञापन दाता सब अपराधी होते हैं।  मान लीजिये अश्लीलता या जिस्म फरोशी का न्योता दोस्ती के नाम पर है तो इस अपराध में भारतीय दंड संहिता की धारा १२० बी के अंतर्गत विज्ञापन प्रकाशित करने वाला अखबार भी समान रूप से अपराधी है, क्योंकि इस अपराध की बुनियाद अख़बार का विज्ञापन है और अख़बार में प्रेस पुस्तक पंजीकरण नियमों के तहत ऐसे प्रकाशन प्रतिबंधित हैं।
3. कोई भी व्यक्ति अगर अनाम व्यक्ति के विज्ञापन से इस तरह से ठगा जाता है तो अख़बार भी धारा 420, 467 व 120 भा.दं.संहिता के अंतर्गत अपराधी है और उस के संपादक, प्रकाशक व मुद्रक सभी दोषी हैं व सभी को उस के लिए दंड दिया जा सकता है। प्रेस कोंसिल ऐसे अखबारों को अनेक बार फटकर लगा चुकी है,  लेकिन उस के बावजूद कानून तोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है। 
रुण जी, यदि आप इन बातों से व्यथित हैं तो आप को इन बातों की शिकायत पुलिस को करनी होगी और कार्यवाही करने के लिए उन्हें बाध्य करना पड़ेगा। यदि पुलिस ऐसा न करे तो आप सीधे अदालत में शिकायत प्रस्तुत कर के अदालत से पुलिस को कार्यवाही करने लिए आदेश जारी करवा सकते हैं। 
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