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अभियुक्त को फरार घोषित कराएँ।

समस्या-

दशरथ वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

न्यायालय में चैक बाउंस का धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम का परिवाद प्रस्तुत किया था जिस पर प्रसंज्ञान लिए जाने पर अभियुक्त के विरुद्ध समन जारी हुए हैं। लेकिन अभियुक्त उस के दिए पते से मकान खाली कर अन्यत्र चला गया है इस लिए उसे समन की तामील नहीं हो रही है। क्या किया जाए?

समाधान-

किसी भी अपराधिक प्रकरण में अभियोजक (मुकदमा चलाने वाले) की यह जिम्मेदारी है कि वह अभियुक्त का पता ठिकाना मालूम करे और उसे किसी भी तरह न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराए। अपराधिक मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति (यदि अभियुक्त की स्वयं की प्रार्थना पर अदालत द्वारा उपस्थिति से कोई मुक्ति प्रदान न कर दी गयी हो) में कोई कार्यवाही हो सकना संभव नहीं है।

इस के लिए अभियोजक न्यायालय से पुलिस के नाम समन, गिरफ्तारी या जमानती वारंट जारी करवा सकता है। जिन मामलों में स्वयं सरकार अभियोजक होती है उन में भी यही प्रक्रिया है। इस मामले में अभियोजक भी आप ही हैं तो अभियुक्त का पता तो आप को ज्ञात करना होगा और न्यायालय को दे कर उस पते के लिए समन या वारंट जारी कराना होगा। अदालत यह कर सकती है कि जारी समन या वारंट को आप को वह दस्ती देने का आदेश दे दे जिस से आप खुद उसे ले जा कर पुलिस को साथ ले कर निशादेही से तामील करवा सकें।

यदि फिर भी अभियुक्त नहीं मिलता है और जानबूझ कर छुपा रहता है तो आप न्यायालय को धारा 82 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत फरार घोषित करने की उद्घोषणा के लिए आवेदन कर सकते हैं। जिस के अंतर्गत अभियुक्त की संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है। अभियुक्त का ऐसी स्थिति में मिलना आप की कोशिश पर ही निर्भर करता है। पुलिस और अदालत आप की मदद कर सकते हैं लेकिन अभियुक्त को तो आप को तलाश करना ही होगा अन्यथा आप का यह मुकदमा करना बेकार हो जाएगा।

आपराधिक न्याय प्रशासन की कमजोर कड़ी – लोक अभियोजन

  • मनिराम शर्मा, एडवोकेट

न्यायालय के साथ साथ, पुलिस और लोक अभियोजक आपराधिक न्याय प्रशासन के आधार स्तंभ हैं। पुलिस किसी मामले में तथ्यान्वेषण व साक्ष्य एकत्र करने का कार्य करती है और लोक अभियोजक उसे प्रस्तुत कर अभियुक्त को दण्डित करवाने हेतु पैरवी करते हैं। सामान्य अपराधों का परीक्षण मजिस्ट्रेट न्यायालयों द्वारा होता है और गंभीर (जिन्हें जघन्य अपराध कहा जाता है) अपराधों का परीक्षण सामान्यतया सत्र न्यायलयों द्वारा किया जाता है। वैसे अपराधों के इस वर्गीकरण में राज्यवार थोडा बहुत अंतर भी पाया जाता है किन्तु समग्र रूप में भारत  में लगभग स्थिति एक जैसी ही है।

निचले स्तर के मजिस्ट्रेट न्यायालयों में तो पैरवी हेतु अभियोजन सञ्चालन के लिए पूर्णकालिक स्थायी सहायक लोक अभियोजक नियुक्त होते हैं किन्तु ऊपरी न्यायालयों – सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में अभियोजन के सञ्चालन के लिए मात्र अंशकालिक और अस्थायी लोक अभियोजक नियुक्त किये जाते हैं। इन लोक अभियोजकों को नाम मात्र का पारिश्रमिक देकर उन्हें अपनी आजीविका के लिए अन्य साधनों से गुजारा करने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है। वर्तमान में लोक अभियोजकों को लगभग सात हजार रुपये मासिक पारिश्रमिक दिया जा रहा है जबकि सहायक लोक अभियोजकों को  पूर्ण वेतन लगभग तीस हजार रुपये दिया जा रहा है। यह भी एक विरोधाभासी तथ्य है कि सामान्य अपराधों के लिए निचले न्यायालयों में स्थायी सहायक लोक अभियोजक नियुक्त हैं जबकि ऊपरी न्यायलयों में संगीन अपराधों के परीक्षण और अपील की पैरवी को अल्पवेतनभोगी अस्थायी लोक अभियोजकों के भरोसे छोड़ दिया गया है। यह स्थिति आपराधिक न्याय प्रशासन का उपहास करती है और अपराधों की रोकथाम व अपराधियों को दण्डित करने के प्रति सरकारों  की संजीदगी का एक नमूना पेश करती है ।

 लेखक : मनीराम शर्मा, एडवोकेट

बी.कॉम., सी.ए.आई.आई.बी, एलएल.बी., 22 वर्ष से अधिक स्टेट बैंक समूह में अधिकारी संवर्ग में सेवा करने के पश्चात स्वेच्छिक सेवा निवृति प्राप्त, वर्तमान में एडवोकेट एवं समाज सेवा में विशेषतः न्यायिक सुधारों हेतु प्रयासरत।

लोक अभियोजकों की नियुक्तियां सत्तासीन राजनैतिक दल द्वारा अपनी लाभ हानि का समीकरण देखकर की जाती हैं और लोक अभियोजक भी अपने नियोक्ता के प्रसाद ( प्रसन्नता) का पूरा ध्यान रखते हैं अन्यथा उन्हें किसी भी समय सरकारी कोप-भाजन का शिकार होने पर पद गंवाना पड़ सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि संगीन जुर्मों के अपराधियों को यदि सरकारी संरक्षण प्राप्त हो तो उस प्रकरण में लोक अभियोजक के माध्यम से पैरवी में ढील देकर दण्डित होने से बचा जा सकता है। भारत में राजनीति के अपराधीकरण के लिए यह भी एक प्रमुख कारक है। सरकार जिसे दण्डित नहीं करवाना चाहे उसके विरुद्ध पैरवी में ढील के निर्देश दे सकती है।

न्यायप्रशासन की स्वतंत्रता के लिए प्रायः देश के न्यायविद और उनके समर्थक तर्क देते हैं कि न्याय प्रशासन की पवित्रता के लिए न्यायपालिका की स्वतन्त्रता एवं न्यायाधीशों का निर्भय, एवं उनकी नौकरी में स्थायित्व  होना आवश्यक है। यक्ष प्रश्न यह है कि जब न्याय प्रशासन के अहम स्तंभ लोक अभियोजक की सेवा की अनिश्चितता जनित न्यायप्रशासन पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव को देश वहन कर सकता है तो  न्यायाधीशों की सेवा की अनिश्चितता से देश वास्तव में किस प्रकार कुप्रभावित होगा। अर्थात न्यायाधीशों की सेवा को भी स्थायी रखने की कोई आवश्यकता नहीं है।

लोक अभियोजक इतने अल्प पारिश्रमिक के कारण पैरवी में न तो कोई रूचि लेते हैं और न ही न्यायालयों द्वारा सामान्यतया अभियुक्तों को दण्डित किया जाता है। राजस्थान के एक जिले के आंकड़ों के अनुसार वर्ष में दोषसिद्धि का मामले दर्ज होने से मात्र 1.5% का अनुपात है। यह तथ्य भी उक्त स्थिति की पुष्टि करता है। लोक अभियोजक भी अपनी आजीविका के लिए अनैतिक साधनों पर आश्रित रहते हैं। यह तो सपष्ट है ही कि भारतीय न्यायालयों से दण्डित होने की बहुत कम संभावनाएं हैं  किन्तु अभियोजन पूर्व की यातनाओं से मुक्ति पाना एक बड़ा कार्य है जिसके लिए न्यायालयों की स्थापना अपना आंशिक औचित्य साबित करती है। भारत के राष्ट्रीय पुलिस आयोग का कहना भी है कि देश में 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक होती है जिन पर जेलों का 43.2% खर्चा होता है। माननीय सुप्रीम कोर्ट भी जोगिन्दर कुमार के मामले में कह चुका है कि जघन्य अपराध के अतिरिक्त गिरफ्तारी को टाला जाना चाहिए और मजिस्ट्रेटों पर यह दायित्व डाला गया है कि वे इन निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित करें। किन्तु मजिस्ट्रेटों के निष्क्रिय सहयोग से स्वार्थवश पुलिस अनावश्यक  गिरफ्तारियां करती रहती है और वकील न तो इनका विरोध करते और न ही मजिस्ट्रेट से इन अनुचित गिरफ्तारियों में दंड प्रक्रिया संहिता की  धारा 59 के अंतर्गत बिना जमानत रिहाई की मांग करते हैं। उलटे इन अनावश्यक गिरफ्तारियों में भी जमानत से इन्कार कर गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेटों और न्यायाधीशों द्वारा जेल भेज दिया जाता है।

न्यायालयों द्वारा दोषियों के दण्डित होने की संभावनाएं अत्यंत क्षीण हो जाने से लोक अभियोजकों की भूमिका अग्रिम एवं पश्चातवर्ती जमानत तक ही प्रमुखत: सीमित हो जाती है। प्रचलित परम्परानुसार एक गिरफ्तार व्यक्ति की जमानत (चाहे उसकी गिरफ्तारी अनावश्यक या अवैध ही क्यों न हो) के लिए भी लोक अभोयोजक के निष्क्रिय सहयोग की आवश्यकता है अर्थात जमानत आसानी से हो जाये इसके लिए आवश्यक है कि लोक अभियोजक की ओर से जमानत का विरोध नहीं हो। वकील समुदाय में आम चर्चा  होती रहती है कि वकील को बोलने के लिए जनता से फीस मिलती है जबकि सरकारी वकील को चुप रहने के लिए जनता फीस (नजराना) देती है। ऐसा नहीं है कि यह तथ्य सरकार की जानकारी में नहीं है। क्योंकि सरकार को भी स्पष्ट ज्ञान है कि जिस प्रकार राशन डीलर, स्टाम्प विक्रेता आदि सरकार से मिलने वाले नाममात्र के कमीशन पर जीवन यापन नहीं कर सकते और वे अपने जीवन यापन के लिए अन्य अवैध कार्य भी करते हैं ठीक उसी प्रकार लोक अभियोजकों और सरकारी वकीलों के भी अनैतिक कार्यों में लिप्त रहने की भरपूर संभावनाए मौजूद रहती हैं।

परिवादी को मुकदमे से पारिवारिक व आर्थिक परेशानी हो रही है, मामला कैसे समाप्त हो?

समस्या-

विगत दो वर्ष पूर्व एक लड़की को पास के गॉंव वाले लड़के के द्वारा मोबाईल पर अश्लील बातें की जा रही थी,  जिसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पुलिस थाने में लिखवाई गई थी।  पिछले दो सालों से केस अदालत में लंबित है।  इसका कोई फैसला नहीं हो पा रहा है।  अदालत में हो रही देरी से इस केस में लड़की को पारिवारिक व आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है इसलिये वह चांहती है कि इस पर समझौता हो जाये,  इसके लिये क्या करना होगा?

-आनन्द, बैतूल, मध्यप्रदेश

समाधान-

प के प्रश्न से पता नहीं लगता है कि मामला किस धारा के अंतर्गत न्यायालय में चल रहा है।  धारा की जानकारी के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन है कि इस मामले में क्या  लड़की ने या उस के अभिभावक ने पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराई। यदि इस मामले में पुलिस कार्यवाही नहीं करती तो उसे बदनामी उठानी पड़ती।  पुलिस ने कार्यवाही कर दी है तो आप यह कह रहे हैं कि लड़की को पारिवारिक आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है जो संभव प्रतीत नहीं होता है।  लड़की का तो अब उस मामले से सिर्फ इतना लेना देना है कि एक बार उसे अदालत में जा कर बयान देना है वह भी तब जब अदालत स्वयं समन भेज कर लड़की को बुलाए।  इस से लड़की को किस प्रकार पारिवारिक व आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है यह बात समझ नहीं आ रही है।  ऐसा तो तभी हो सकता है जब स्वयं अभियुक्त पक्ष उसे परेशान कर रहा हो।  यदि ऐसा है तो यह न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालना है जो कि स्वयं में एक अपराध है।  इस परिस्थिति में तो लड़की या उस के अभिभावकों को मामला वापस लेने के स्थान पर परेशान करने के लिए फिर से पुलिस को या उस न्यायालय को जिस में यह मामला चल रहा है शिकायत करनी चाहिेए। जिस से न्याय में बाधा उत्पन्न करने वालों को इस कार्य के लिए भी दंडित किया जा सके।

प के प्रश्न से यह भी पता नहीं लगता है कि मामला किस धारा के अंतर्गत न्यायालय में चल रहा है।  यह संदेह भी उत्पन्न हो रहा है कि यह प्रश्न अभियुक्त पक्ष की ओर से पूछा जा रहा हो।  धारा की जानकारी के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन है कि इस मामले में क्या हो सकता है।  इस तरह के मामलों में धारा 354 आईपीसी का अपराध बनता है। यह लड़की द्वारा शमनीय है।  यदि लड़की न्यायालय में आवेदन दे कि वह अपराध का शमन चाहती है तो मुकदमा समाप्त हो सकता है,लेकिन न्यायालय इस बात की जाँच भी कर सकती है कि लड़की कहीं दबाव में तो यह आवेदन नहीं दे रही है।

दीवानी व फौजदारी मुकदमे में अंतर क्या है?

बबिता वाधवानी जी ने तीसरा खंबा पर एक टिप्पणी में कहा-

-दीवानी व फौजदारी मुकदमे में अंतर क्या है?  आज तक मालूम नहीं चला मुझे। 

दीवानी मामले-

दीवानी मामला वह है जिस में संपत्ति सम्बन्धी या पद सम्बन्धी अधिकार विवादित हो, चाहे ऐसा विवादित अधिकार धार्मिक कृत्यों या कर्मों सम्बन्धी प्रश्नों पर अवलम्बित क्यों न हो।  यहाँ बात भी तात्विक नहीं है कि वह पद किसी विशिष्ठ स्थान से जुड़ा है या नहीं।  जब ऐसे मामलों में कोई वाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो वह दीवानी वाद या मुकदमा कहलाता है।

दीवानी अदालतों में काम बहुत रहता है और कुछ दीवानी मामले एक ही प्रकार की विशिष्ठ प्रकृति के होते हैं।  जैसे कृषि भूमि से सम्बन्धित मामले, मोटर यान या रेल दुर्घटना से संबंधित मामले, या श्रमिकों व उन के नियोजकों के मध्य विवाद, सरकारी कर्मचारियों की सेवा से संबंधित मामले आदि।  इस तरह के मामलों की संख्या अधिक होती है। इस कारण से इन के संबंध में संसद ने विशेष कानून बना कर इन्हें दीवानी न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से बाहर करते हुए इन के लिए अलग से अधिकरण बना दिए हैं।  वैसे प्रकृति में ये सभी मामले दीवानी मामले हैं।

अपराधिक या फौजदारी मामले

भारत में भारतीय दंड संहिता तथा अन्य बहुत से कानूनों के द्वारा कुछ कृत्यों और कुछ अकृत्यों को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।  इन अपराधिक कृत्यों और अकृत्यों के लिए दंड निश्चित किया गया है।  ये सभी  मामले जिन में किसी व्यक्ति को कोई अपराध करने के लिए दंड दिए जाने हेतु विचारण किया जाए वे सभी मामले अपराधिक या फौजदारी मामले कहे जाते हैं।  उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच द्वारा प्रदान किए गए निर्णय की पालना नहीं करता है तो उस के इस अकृत्य को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत  दंडनीय करार दिया गया है।  यदि कोई व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करता है तो यह मामला एक फौजदारी या अपराधिक या दांडिक मामला कहलाएगा और इस का विचारण फौजदारी मामलों की तरह होगा।

न्यायाधीशों और लोक सेवकों का किसी अपराध के लिए अभियोजन

 सहदेव शर्मा पूछते हैं – – –

कृपया बकायेगेँ की जज (कार्य पालक या न्याय पालिका) यदि कुछ तथ्योँ को दर्शा कर और कुछ को छिपाकर (स्वतन्त्रता या लालच से) मन-मर्जी का आदेश पारित करे तो क्या यह दण्डनीय नहीं है? अगर है, तब सजा कौन और कितनी दे सकता है ?

 उत्तर – – –
सहदेव जी,
प ने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न किया है। आप ने जिन शब्दों में अपने प्रश्न को प्रकट किया है ठीक -ठीक वैसा कोई अपराध किसी भी कानून में वर्णित नहीं है। लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 217, 218 219 में निम्न दंडों का प्रावधान है —
भारतीय दंड संहिता
धारा – 217, लोक सेवक द्वारा किसी व्यक्ति को दंड से या किसी संपत्ति को समपहरण से बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा 
जो कोई लोक सेवक होते हुए विधि के ऐसे किसी निदेश की, जो उस संबंध में हो उस से ऐसे लोग सेवक के नाते किस ढंग का आचरण करना चाहिए, जानते हुए अवज्ञा कर के किसी व्यक्ति को वैध दंड से बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा यह जानते हुए अथवा किसी संपत्ति को ऐसे समपहरण या किसी भार से, जिस के कि लिए वह संपत्ति विधि के द्वारा दायित्व के अधीन है बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा यह जानेत हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिस की अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा। 
218. किसी व्यक्ति को दंड से या किसी संपत्ति को समपहरण से बचाने के आशय से लोक सेवक द्वारा अशुद्ध अभिलेख या लेख की रचना 
जो कोई लोक सेवक होते हुए औऱ ऐसे लोक सेवक के नाते कोई अभिलेख या अन्य लेख तैयार करने का भार रखते हुए, उस अभिलेख या लेख की इस प्रकार से रचना कर, जिसे वह जानता है कि अशुद्ध है लोक को या किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा कारित करेगा यह जानते हुए अथवा किसकी संपत्ति को ऐसे समपहरण या अन्य किसी भार से, जिस के दायित्व के अधीन वह संपत्ति विधि के अनुसार है, बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा यह जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिस की अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा। 
219. न्यायिक कार्यवाही में विधि के प्रतिकूल रिपोर्ट आदि का लोक सेवक द्वारा भ्रष्टतापूर्वक किया जाना 
जो कोई लोक सेवक होते हुए न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में कोई रिपोर्ट, आदेश, अधिमत या विनिश्चय जिस का विधि के प्रतिकूल होना वह जानता हो, भ्रष्टतापूर्वक या विद्वेष पूर्वक देगा, या सुनाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिस की अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
 भी जज लोक सेवक हैं और उक्त धाराएँ उन पर प्रभावी हैं। यदि उक्त धाराओं के अंतर्गत किसी जज ने कोई कृत्य किया है तो वह दंडनीय अपराध है। उन पर दंड प्रक्रिया संहिता के उपबंधों के अंतर्गत कार्यवाही की जा सकती है। 
कोई भी व्यक्ति किसी भी अपराध की सूचना संबंधित पुलिस स्टेशन को दे सकता है। यदि पुलिस पाती है कि इस मामले में अपराध का होना प्रथम दृष्टया पाया जाता है तो वह अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण आरंभ कर सकती है। अन्वेषण पर अपराध के किए जाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध होने पर लोक सेवक के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करने हेतु कार्यवाही कर सकती है। लेकिन,किसी भी जज के विरुद्ध अभियोजन दंड  प्रक्रिया संहिता की धारा 197 की प्रक्रिया के अंतर्गत ही किया जा सकता है। धारा 197 दं.प्र.संहिता एक पृथक विषय है। उस पर तीसरा खंबा में पृथक से आलेख लिखा जाएगा। 
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