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बलात्कारी और ब्लेकमेलर के विरुद्ध रिपोर्ट कराएँ और उसे सजा दिलाएँ।

समस्या-Havel handcuff

शीलू ने उन्नाव, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा एक लड़के से कई दिनों से अफेयर चल रहा था। पहले उसने मेरे साथ जबरदस्ती की थी। लेकिन बाद में उसने कहा कि वह उससे शादी कर लेगा। लेकिन 2 से 3 साल बीत जाने पर अब वह मना कर रहा है। वह कह रहा है कि जो करना है कर लो वह शादी नहीं करेगा। उसके घर वालो को सब पता है। मुझे शुरू से बहुत डरा धमका रहा है इसलियें मैंने अपने घर में सबको नहीं बताया है। मेरी अपेक्षा वह पैसे वाला भी है। अब वह मुझको डराकर अपने दास्तों से सम्बन्ध बनाने के लिये कह रहा है। घर पर मैंने अपने भाई से बताया है तो वह कह रहा है कि चुपचाप रहो और मैं लड़का देखकर कहीं और शादी कर दूंगा।  नहीं तो सब जगह अपनी ही बदनामी होगी। उसके पास पैसा है उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह अच्छा वकील कर के छूट जायेगा।  लेकिन मैं अब उसी लड़के से शादी करना चाहती हूँ क्या करूँ। अगर कुछ हल नहीं निकला तो मैं आत्महत्या कर लूंगी।  मेरी मदद करें।

समाधान-

म उन लोगों की बात का कोई उत्तर नहीं देते जो अपने प्रश्न में यह कहते हैं कि हल न निकला तो आत्महत्या कर लूंगा/ लूंगी। इस प्रश्न का उत्तर इस कारण दे रहा हूँ कि इस तरह का प्रश्न पहली बार हमारे पास आया है।

आप के कहने से पता लगता है कि उस लड़के ने कभी आप से प्रेम नहीं किया। उस ने पहले आप के साथ जबर्दस्ती की। फिर समाज में प्रचलित इस धारणा का कि जिस लड़की के साथ किसी ने बलात्कार कर दिया वह विवाह और परिवार में रहने लायक नहीं होती, दुरूपयोग करते हुए आप को धमकाया साथ में आप को विवाह का लालच दिया। आप भी यही समझती हैं कि बलात्कार की इस श्रंखला को छुपाना ही श्रेयस्कर है आप ने भी अपने शोषण को स्वीकार कर लिया। अब उस लड़के ने पीठ दिखा दी है। वह समझता है कि आप में अब इतना नैतिक साहस शेष नहीं है कि आप पुलिस में बलात्कार की इस श्रंखला की शिकायत कर सकें। इस कारण वह अकड़ गया है।

यह सब कथानक यह बताता है कि वह लड़का आप से कभी प्रेम नहीं करता था। ऐसा व्यक्ति कभी किसी से प्रेम नहीं कर सकता। क्यों कि जो व्यक्ति किसी लड़की का बलात्कार कर सकता है और उसे धमका कर और लालच दिखा कर बलात्कार को जारी रखता है वह कभी किसी से प्रेम करने लायक हो ही नहीं सकता। वह आप का ही नहीं अपितु समस्त स्त्री समुदाय का अपराधी है, इस समाज का अपराधी है उस की शिकायत होनी चाहिए और उसे दंडित होना चाहिए।

आप के भाई का सुझाव भी जैसा हमारा समाज है वैसा ही है। अक्सर ऐसी घटनाओं की शिकार लड़कियों में से 99 प्रतिशत लड़कियाँ यही करती हैं कि वे चुपचाप विवाह कर अपनी ससुराल चली जाती हैं और सारा जीवन इस भय में गुजार देती हैं कि उन के पति को या ससुराल वालों को या अन्य किसी को उन के जीवन का यह अंधेरा पता न लगे।

यदि आप उस लड़के के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट कराती हैं तो उस का पैसा भी उसे नहीं बचा पाएगा। उस के विरुद्ध बलात्कार और ब्लेकमेल करने के अपराध में मुकदमा भी चलेगा और उसे सजा भी मिलेगी। अभी आप उस लड़के के चंगुल में हैं, जब वह चंगुल में फंसेगा तो दस बार आप के सामने विवाह के लिए नाक रगड़ेगा। हमारा सुझाव है कि आप को उस लड़के के विरुद्ध पुलिस रिपोर्ट करना चाहिए और उसे दंडित कराना चाहिए। यदि आप पूरी मुस्तैदी से यह काम करती हैं तो आप समाज का भला करेंगी, उन तमाम स्त्रियों के हक में काम करेंगी जो इस तरह शिकार बनती हैं। जब वह खुद को बचाने के लिए  पुनः विवाह का प्रस्ताव रखे तो उसे मना कर दीजिएगा, यही उस की सजा होगी। हमें विश्वास है कि आप को कोई न कोई सच्चा जीवन साथी भी मिल जाएगा जो आप के अतीत को जानते हुए भी आप के साथ पूरा जीवन बिताने को तैयार होगा।

कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं।

Rape victimसमस्या

पटना, बिहार से प्रदीप कुमार ने पूछा है-

मेरी शादी जुलाई 2010 में हुई थी, पत्नी से मेरा रिश्ता बहुत अच्छा है।  शादी के 1 साल बाद मुझे मेरी दूर की साली (वो बहुत गरीब है) ने मुझे बताया कि मेरा सगा साला और उसका दूर का मौसेरा भाई उसका मोबाइल नम्बर अपने दोस्तो को दे कर उसे परेशान करता है।  इस मामले में जब मैं ने अपने साले से इस बारे में बात की तो वह शर्मिन्दा होने के जगह बोला कि वो मेरी दुश्मन है,  मैं उसे बरबाद कर दूँगा।  मैं ने अपने ससुर से भी बात की।  पर कोई हल नहीं निकला।  मैं ने अपनी साली से बहुत पूछा तो बोली कि मैं ने भैया से पापा की नौकरी लगवा देने की बात की थी, तब से परेशान कर रहे हैं।  मुझे उसके परिवार पर दया आ गयी।  मैं ने उसके पिता की नौकरी लगवा दी तथा उसे आगे पढ़ने की सलाह दी।  मेरी सलाह मान कर वो होस्टल में रह कर पढ़ने लगी।  जब यह बात मेरे ससुराल वालों को पता चली तो हमारे सम्बन्ध खराब होने लगे।  तब मेरे साले के दोस्त ने मुझे बताया कि मेरे साले और उस लड़की के बीच हमारी शादी के दिन से अवैध सम्बन्ध था। मेरे बीच में आने के कारण मेरा साला अपने घर वालों के कान भरता है।  जब मैं ने अपनी साली से पुछा तो उस ने सारी बातें सच बता दी उसने बताया कि मेरी शादी के दिन उसका बलात्कार हुआ और लोक लाज के कारण वह ये बात किसी को नही बता सकी।  उस के बाद मेरा साला माफ़ी मांगने के बहाने उस के पास फिर आया और शादी कर लेने की बात कर साल भर तक सम्बन्ध बनाता रहा, जब उस का मन भर गया तो अपने दोस्तो के साथ भी वही सब करने का दबाब देने लगा। अपने दोस्तों को उसका मोबाइल नम्बर दे देता था।  ये सब बात जब मैं ने अपने साले से पूछा तो वह भड़क गया।  तब मैं ने अपनी पत्नी को सारी बातें बताई।  मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि मेरे साले के अवैध सम्बन्ध मेरी पत्नी,  एक और रिस्ते की बहन, एक पड़ौस की लड़की से भी रह चुका था।

ब मैं ने तय किया कि मैं उसे सजा दिला कर रहूँगा।  उस समय मेरी पत्नी ने भी मेरा साथ देने का वादा किया। मैं ने ये बात उन दोनों के परिवार को साथ बिठा कर उन के सामने रखी।  पर कोई बात नहीं बनी।  मेरे ससुर लड़की के माँ बाप को जान से मार देने की धमकी देने लगे तथा लड़की के सगे मामा जो कि एक दलित के नाम पर गलत तरीके से नौकरी कर रहे है को नौकरी से निकलवा देने की धमकी दे कर मेरी पीड़ित साली की पढ़ाई बन्द करवा कर उसे घर में कैद करवा दिया। उसकी शादी की बात चलने लगी।  वो मुझसे एक दो बार मदद के लिये बोली भी।  पर मैं उस समय उसकी मदद करने मे असमर्थ था।  लड़की के माँ बाप भी उसके धमकी के कारण मेरे ससुर की बात मान रहे थे।  उस समय मेरी पत्नी ने अपने पिता का बहुत विरोध किया और अपनी बहन को हमारे पास बुला कर रख लिया।  यहाँ तक बोली कि मैं इसे जिन्दगी भर अपने साथ रखूंगी।  कुछ दिन बाद मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी और मेरे घर वालों के दबाब के कारण अपने मायके चली गयी। एक दिन मेरी साली का फोन आया कि उसकी शादी तय हो गयी है और वो जान दे देगी पर ये शादी नहीं करेगी।  मेरे समझ में नही आ रहा था कि मैं उसकी मदद कैसे करुँ।  तब मैं ने उसे बोला कि तुम घर छोड़ कर आ जाओ, मैं तुम्हारा रहने और पढने की व्यवस्था राँची के होस्टल में करवा देता हूँ। वह आ गयी, पर वह कहाँ है? इसका पता मेरे ससुर को चल गया वह डर कर होस्टल छोड़ कर मेरे पास आ गई।  अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि रात को उसे कहाँ रखूँ और मैं कहाँ रहूँ।  होटल जाते तो वहाँ उसका परिचय पत्र मांगा जाता।  पर वह सारा समान होस्टल में छोड़ कर आई थी।  दो दिन हमे अपनी गाड़ी में बिताना पडा।  तब मैं ने अपनी साली को शादी का सारा समान खरीद कर दिया और उसे अपनी पत्नी बता कर होटल में उस के साथ कुछ दिन रहा।  उसी समय हमारे बीच सम्बन्ध भी बन गये। (मेरी पत्नी को इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं थी) उसके बाद मैं ने उसे अपनी पत्नी के रूप में साली का दूसरे होस्टल में दाखिला करवा दिया। तब  मेरे ससुर ने लड़की के पिता पर दबाब बना कर मुझ पर अपहरण का मुकदमा करवा दिया और मुझे साली को उस के घर पहुँचाना पड़ा।

मेरी पत्नी अभी अपने मायके में है और अपने माँ बाप के दबाब में पिछली सारी बातों से इन्कार करती है।  वो अब कहती है कि हम को पता है कि आप हमको नहीं रखेंगे। मेरे बच्चा नहीं था तो आप को बोला था कि मैं उसको (साली) को साथ रखूंगी पर अब तो मेरा खुद का बच्चा है, अब मैं उसको नहीं रखूंगी।  अगर आप उसकी मदद करेंगे तो आप पर दहेज और मार पीट का एफ़आइआर कर दूंगी।  फोन पर वो सारी पुरानी बातें स्वीकार करती है। लेकिन मैं जानता हूँ कि वह अदालत में  मुकर जायेगी।  मैं ने फोन पर होने वाली सारी बातें रिकोर्ड कर ली हैं। मेरी साली घर में है और उसके माँ बाप तक उसका साथ नहीं दे रहे हैं।  मैं उससे कहता हूँ कि मदद के लिये पुलिस के पास जाओ, तो कहती है कि माँ पिताजी ने बोला है कि अगर उस ने कुछ किया तो अब मैं जिन्दगी भर के लिये रिश्ता खतम कर लूंगा।  मैं ने उसे यहाँ तक कहा है कि तुम्हारा सारा खर्च मैं दूंगा, जिस ने तुम्हारी जिन्दगी बरबाद की है, उसे सजा दिलाओ।  मैं तुम्हारे साथ हूँ तो कहती है अब दीदी भी साथ नहीं दे रही है।  आप मेरा फ़िक्र छोड़ दीजिये जब तक ठीक-ठाक चलता है देखते हैं।  नहीं तो फिर आत्मह्त्या कर लूंगी।  मेरे कारण आप क्यों मुसीबत ले रहे हैं? अगर आप के कहने पर मैं सब से लड़ भी लूंगी तो दीदी आप पर एफ़आइआर कर देगी तो आप को जेल हो जायेगी तब मैं अपना खर्च कहाँ से लाउँगी? फिर भी मुझे आत्महत्या करनी पड़ेगी।  आप की भी जिन्दगी ख्रराब हो जायेगी।  आप कानून में रह कर मुझ से शादी कर के ले जाइयेगा तभी आप के साथ जा सकती हूँ ताकि फिर हमें कोई परेशान न करे।

मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता हूँ। अगर मैं तलाक दे दूँगा तो उसकी जिन्दगी खराब हो जायेगी और हमारे यहाँ तलाक के बाद लड़की की शादी बहुत मुश्किल से होती है और मेरी पत्नी तो दिमागी रुप से कमजोर है।  मुझे पता है कि मेरी पत्नी मेरे साथ रहने लगेगी तो वो फिर से मेरे पक्ष में हो जायेगी।  उसे लगता है कि मैं उसे अब नहीं रखना चाहता।  क्योंकि जब से वो मायके गयी है। बहुत बार उस ने मुझे बुलाया है पर मैं अपने ससुर से खराब रिश्ते की वजह से कभी नहीं गया।  मेरे ससुर कहते हैं कि जब तक वे मेरी साली की शादी नहीं करा देंगे मेरी पत्नी को मेरे यहाँ आने नहीं देंगे।  मेरी साली समाज में इतना बदनाम हो गयी है कि उसकी शादी अगर होगी भी तो कोई मजबूरी में ही करेगा जिस से उसकी जिन्दगी बर्बाद हो जायेगी। वह कहती है कि मैं आपको अपना पति मान चुकी हूँ।  मैं जिन्दगी भर आपके नाम के सहारे अकेले जी लूंगी और अगर जबर्दस्ती मेरी शादी करवाई जायेगी तो आत्महत्या कर लूंगी।  मैं चाहता हूँ कि मेरी साली को पढ़ने का अवसर मिले, जिस से वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी जिन्दगी का सही फ़ैसला ले सके और मेरे साले को सजा दिला सके। उसके बाद भी उसे यह लगे कि वो मेरे साथ खुश रहेगी मैं उसे भी रखने को तैयार हूँ।  पर कानून मुझे दूसरी शादी का इजाजत नहीं देता। मेरा साला जिस ने न जाने कितनी जिन्दगियाँ बर्बाद की हैं विजयी मुस्कान के साथ घूम रहा है।  उसे इस बात का तनिक भी अफसोस नहीं है।  मुझे समझ में नही आता कि मैं क्या करुँ,? क्या करना उचित रहेगा? हमेशा मैं परेशान रहता हूँ।

समाधान-

हुत जटिल समस्या है आप की। यह केवल आप की समस्या न हो कर पूरी तरह एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। एक तरफ आप के ससुर का परिवार है जो सम्पन्न है और अपनी संपन्नता के बल पर कुछ भी कर सकता है। फर्जी मुकदमे खड़े कर के लोगों को परेशान कर सकता है और अपने विरुद्ध लगाए गए मुकदमों में अपना बचाव कर सकता है, यहाँ तक कि गवाहों को भी अन्यान्य तरीकों से प्रभावित कर सकता है। दूसरी तरफ आप की रिश्ते की साली का परिवार है जो विपन्न है, जिसे जीवन जीने के लिए कुछ भी करना पड़ता है। अपने और अपने परिवार के सदस्यों के साथ हुए हर अन्याय को सहना पड़ता है। विपन्न लोग अपने जीवन यापन का मामूली स्थाई समाधान प्राप्त करने के चक्कर में गैरकानूनी रूप से नौकरी हासिल करने का काम भी कर सकते हैं, इस काम को करने के समय उन्हें यह भय भी नहीं होता कि नौकरी चली जाएगी या फिर फर्जीवाड़े के कारण उन्हें सजा भी हो सकती है। लेकिन एक बार नौकरी मिल जाए तो उसे बचाने को कुछ भी कर सकते हैं। उन के लिए अपना, पत्नी और बच्चों का सम्मान वगैरा सब थोथी चीजें हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ही संघर्ष करते रहते हैं।

न दो परिवारों में से एक परिवार के पुरुष ने दूसरे परिवार की लड़की और अन्य भी अनेक लड़कियों के साथ बलात्कार किए और अपनी संपन्नता के बल पर उन्हें छिपाए रख कर समाज में सम्मान बनाए हुए हैं। वे अपनी संपन्नता के साधनों और अपने मिथ्या सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ये दोनों तरह के परिवार अपने तरीके से जी रहे हैं। एक अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बनाए हुए और दूसरा अपने जीवन के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए। कानून और नैतिकता का दोनों के लिए बस इतना अर्थ है कि जब भी उन में से किसी का अपने साध्य के लिए उपयोग किया जा सके कर लो, वर्ना ये दोनों व्यर्थ हैं।

न दो तरह के परिवारों में से जो संपन्न परिवार था उस की बेटी के साथ विवाह कर के आप उस के दामाद हो गए। इस विवाह का स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए था कि आप अपने ससुराल के सदस्यों के सभी नैतिक अनैतिक, कानूनी और गैर कानूनी कामों में उन के साथ खड़े हों। यदि आप उन के विरुद्ध खड़े होंगे तो वे अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बचाए रखने के लिए आप के विरुद्ध भी खड़े होंगे। क्यों कि उन की यह सामाजिक स्थिति ही उन के लिए सब से प्रमुख है, शेष सभी बातें बिलकुल गौण हैं।

मारे समाज में कुछ आत्मनिर्भर स्वतंत्र स्त्रियों को छोड़ कर सभी स्त्रियाँ परतंत्रता का जीवन व्यतीत करती हैं। आप की पत्नी भी उन में से एक है। समाज के मूल्य ऐसे हैं कि किसी स्त्री को जबरन बलात्कार का शिकार बनाया जाए तो वही बरबाद होती है, बलात्कारियों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे बने रहते हैं। अधिकांश स्त्रियाँ अपने बचपन या किशोरावस्था में ही अपने ही परिजनों के इस बलात्कर्म का शिकार होती हैं और अत्याचारों को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में लाए गए स्त्री के कौमार्य और सतीत्व के बेढ़ब सामाजिक मूल्यों की कंदराओं में कैद स्त्रियों के पास यह सब अत्याचार सहने के अलावा कोई मार्ग नहीं होता। वे इसे ही अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लेती हैं, और इसी तरह जीती रहती हैं। वे इस स्थिति से जरा भी विचलित होती हैं तो समाज उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता। आप की पत्नी के साथ उस के ही भाई ने यह अत्याचार किया और फिर रिश्ते की बहिन के साथ भी और अन्य कुछ और स्त्रियों के साथ भी।

ह सारी स्थिति चलती रहती, यदि आप को आप के रिश्ते की साली ने अपनी व्यथा न बताई होती। आप के ससुराल का परिवार, विशेष रूप से आप का साला और ससुर इस मामले में आप का दखल पसंद नहीं था। किसी भी विवाद की स्थिति में उन की सामान्य अपेक्षा यही है कि आप अपने साले और ससुर के साथ खड़े हों चाहे वे कितने ही गलत हों। (हमारे सामाजिक मूल्य यही कहते हैं) इस आप के ससुराल के पुरुषों ने जो भी संतुलन बनाया हुआ था उस में आप की बात से खलल पड़ गया। आप ने रिश्ते की साली के पिता की मदद की उन्हें रोजगार दिला दिया और रिश्ते की साली की पढ़ाई की व्यवस्था कर दी। वहीं से आप के साले और ससुर आप के विरुद्ध हो गए। उन्हें यह खतरा लगने लगा कि लड़की और उस के पिता का जीवन जैसे ही कुछ स्थिर होगा। वे उन के काले कारनामों के लिए उन्हें कानून के सामने खड़ा कर सकते हैं जिस से उन का ताश का महल गिर सकता है। उन्हों ने उस लड़की और उस के पिता को डराना धमकाना आरंभ कर दिया और लड़की और उस के पिता ने जो इन धमकियों का सामना नहीं कर सकते थे हथियार डाल दिए। आप की पत्नी जो स्वयं पीड़ित थी उस ने आप का साथ देना पसंद किया लेकिन किसी बहाने से आप के ससुर उसे अपने कब्जे में ले गए। जहाँ पहुँच कर वही हुआ जो होना था। एक बंदी स्त्री तो केवल उसी का साथ दे सकती है जिस के वह कब्जे में हो।

जो लड़की अनेक बार बलात्कार का शिकार हो चुकी हो। उस के लिए देह की पवित्रता का क्या अर्थ रह जाता है। यह बात आप की पत्नी और रिश्ते की साली के लिए पूरी तरह सच है। आप ने उस का साथ दिया। उस उपकार का आभार प्रकट करने के लिए आप की साली के पास उस की देह आप को समर्पित करने के अलावा कुछ भी नहीं था। परिस्थितियों ने आप को साथ कर दिया और आप के संबंध बन गए। आप की पत्नी को भी इस में क्या आपत्ति हो सकती थी? वह भी तब जब कि वह स्वीकार कर चुकी हो कि वह विवाह के पहले अपने ही भाई के अत्याचार से अपना कौमार्य खो बैठी है। लेकिन जैसे ही वह अपने पिता और भाई के संरक्षण (कब्जे) में गई उस के स्वर बदल गए। आप समझ सकते हैं कि हमारे समाज में स्त्री का अपना कोई स्वर नहीं होता। उस का स्वर उसी पुरुष का स्वर होता है जिस के वह कब्जे में होती है।

न सारी परिस्थितियों में आप अपने ही साले को उस के अपराधों के लिए दंडित कराना चाहते हैं। एक तो उस के अपराध इतने पुराने हो चुके हैं कि उन के सबूत तक नहीं मिलेंगे। दूसरे आप यदि इस कामं को हाथ में लेते हैं तो आप का साला और ससुर हाथ धो कर आप के पीछे पड़ जाएंगे। वे इस काम के लिए कानून का भी इस्तेमाल करेंगे। पलड़ा उन के पक्ष में इसलिए है कि आप की पत्नी आप के पास न हो कर अपने मायके में भाई और पिता के कब्जे में है। आप के रिश्ते की साली इन परिस्थितियों को अच्छी तरह समझती है। इसी लिए उस ने यह शर्त रखी है कि वह आप के साथ केवल वैध विवाह में ही साथ रहने को तैयार है अन्यथा नहीं। क्यों कि उस का सर्वस्व आप के अस्तित्व पर निर्भर करता है और वह नहीं चाहती कि इस लड़ाई में आप को कोई नुकसान पहुँचे। क्योंकि आप का नुकसान उस का बहुत बड़ा नुकसान है। आप को तो सिर्फ नुकसान होगा, जब कि उस का तो सब से बड़ा सहारा छिन जाएगा।

सारी समस्या की कुंजी इस बात में है कि किसी तरह आप की पत्नी आप के ससुर और साले के कब्जे से निकल कर आप के पास आए।  लेकिन आप के ससुर व साले ने इस के लिए यह शर्त रखी है कि पहले आप के रिश्ते की साली का विवाह हो जाए। यदि ऐसा विवाह हो जाता है तो वह केवल फर्जी विवाह होगा और आप के व आप की रिश्ते की साली के मार्ग में एक स्थाई बाधा और खड़ी हो जाएगी।

किसी भी तरह यदि आप आप की रिश्ते की साली का विवाह कराए बिना अपनी पत्नी और बच्चे को अपने ससुराल से निकाल कर अपने पास ला सकते हैं तो फिर पत्नी आप के साथ होगी और संतुलन आप के पक्ष में हो जाएगा। तब आप इस लड़ाई को आगे लड़ सकते हैं। इस के बिना आप के ऊपर कभी खत्न न होने वाली कानूनी कार्यवाहियों, गिरफ्तारी जमानत आदि की तलवार लटकी रहेगी। फिर आप सारी लड़ाई को भूल कर अपने बचाव में लग जाएंगे। आप अपनी पत्नी को इस तरह उस के मायके से निकाल कर अपने पास कैसे लाएंगे यह आप ही तय कर सकते हैं। यदि आप ऐसा कर सकें तो आगे का मार्ग खुल सकता है।

क मार्ग और है। यदि आप की पत्नी आप के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाती है तो गिरफ्तारी केवल 498 ए तथा 406 आईपीसी के मामलों में हो सकती है। आप इस गिरफ्तारी से बचने की या गिरफ्तारी के बाद एक दो सप्ताह में जमानत पर छूटने की व्यवस्था स्थानीय रूप से बना लें तथा अपनी पत्नी और बच्चे के लिए साल दो साल बाद न्यायालय द्वारा दिलाए जाने वाले निर्वाह भत्ते की राशि देने का साहस कर लें तो एक बार गिरफ्तार हो कर जमानत पर छूटने के बाद इस लड़ाई को आगे ले जा सकते हैं।

क तीसरा मार्ग यह है कि किसी तरह अपनी रिश्ते की साली का विवाह करा दें और पत्नी व बच्चे को ला कर अपने साथ रखें और साली व उस के परिवार को उन के हाल पर छोड़ दें। पर यह भी न होने वाला है क्यों कि साली इस के लिए तैयार नहीं है।

प के तीनों में से एक मार्ग चुनना है। यह आप के ऊपर है कि आप क्या चुनते हैं। लेकिन इतना समझ लें कि कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं। उन का उपयोग आप अत्याचारियों को सजा दिलाने के लिए कर सकते हैं तो आप का साला और ससुर भी उन का उपयोग आप के और आप की रिश्ते की साली व उस के परिवार के दमन के लिए कर सकते हैं। परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन इन औजारों का उपयोग करने में बाजी मार ले जाएगा।  इस तरह की समस्याओं का अंत तो समाज में मूल्यों में परिवर्तन से ही संभव है जो अभी बहुत दूर दिखाई पड़ता है।

न्यायालय द्वारा दोषमुक्त घोषित होने तक अभियुक्त कदापि यह न सोचे कि वह दोषमुक्त हो जाएगा

तीसरा खंबा के पाठकों और मित्रों¡

मैं ने कभी सोचा भी न था कि मुझे कानूनी सलाह के लिए ऐसा भी पत्र मिलेगा।  लेकिन मुझे मिला।  हर किसी को, संगीन से संगीन अपराध के अभियुक्त को भी जनतंत्र में बचाव का हक है।  इस के लिए उसे कानूनी सलाह और सहायता प्राप्त करने का अधिकार भी।  एक विधिज्ञ को भी ऐसी सहायता के लिए कभी इन्कार नहीं करना चाहिए।  मैं भी नहीं कर रहा हूँ।  तो पत्र और पत्र लेखक को दी गई सलाह यहाँ प्रस्तुत है-

समस्या-

मेरा नाम आशीष राज है! दिनांक: 15.02.2012 को समस्तीपुर नगर थाना में मेरे विरुद्ध केस दर्ज हुआ था!  इस मामले में प्राथमिकी इस प्रकार है …

मैं नेहा कुमारी पुत्री रमेश कुमार बेर्गिनिया सीतामढ़ी की रहने वाली हूँ।  मैं एक एनजीओ में काम करती हूँ।  उसी एनजीओ में विनय कुमार शर्मा भी काम करते थे।  हम दोनों ने अंतरजातीय विवाह किया था।  जो कि समस्तीपुर के थानेश्वर मंदिर में संपन्न हुआ था।  शादी के २ महीने बाद मैं अपने माँ बाप के साथ अपने मायके आगयी।  जहाँ 18.08.2010 को आशीष राज का फ़ोन आया कि तुम्हारे पति की मृत्यु हो गयी है जल्द से जल्द समस्तीपुर आ जाओ।  सूचना मिलते ही मैं अपने भाई गौरव के साथ समस्तीपुर आ गई।  जहाँ आशीष मेरा इंतजार करते हुए समस्तीपुर स्टेशन पर पहले से मौजूद थे।  उन्हों ने मुझे एकान्त मैं ले जा कर कहा कि तुम ससुराल मत जाओ।  तुमने अंतरजातीय विवाह किया है वे लोग तुम्हारे पति के मौत का कारण तुमको मानते हैं।  अगर तुम गयी तो तुम्हें मार देंगे।  आशीष मुझे अपने घर ले गया और मेरे भाई को वापस भेज दिया।   आशीष ने मुझे अपने घर पर रखा व् रा धमका कर और मुझ से शादी का प्रलोभन देकर मेरे साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लिया और मुझे अपने माँ बाप के पास छोड़ आये।  मेरे द्वारा शादी करने की कहे जाने पर कहते कि अपनी बहिन की शादी के बाद शादी करूँगा।  इसी बीच मेरे गर्भ में उनका बच्चा ठहर गया।  29 जनवरी को उनकी बहन की शादी भी हो गयी।  जिसमे उन्होंने दो भर सोने का चैन, एक भर की दो सोने की अंगूठी, एक भर की कान की बाली। तीनों की कीमत लगभग 1,50,000/- रुपए तथा 20,000/- रुपए नकद यह कह कर लिए की अभी शादी में तंगी है बाद में हम सब कुछ तुम्हें दे देंगे।  अपनी बहन की शादी के बाद भी उन्होंने मेरा सामान बापस नहीं किया और मुझ से शादी भी नहीं की। मुझ पर अपना गर्भ गिराने के लिए दबाब बनाते रहे।  मेरे इनकार करने पर उन्हों ने मुझे 05.02.2012 को विटामिन का दवा कह कर 2 टेबलेट खिलाकर मुजफ्फरपुर पहुँचा दिया।  वहाँ पर मेरी तबियत धीरे धीरे खराब होने लगी।  दिनांक 14.02.2012 को जब मेरी तबियत काफी खराब हो गई तो मैं समस्तीपुर आकर उनसे मिली तो। उन्हों ने मुझे पहचाने से इंकार करते हुये मुझे अपने डेरा से भगा दिया।  मैं डॉ. आर. के. मिश्रा काशीपुर के यहाँ भरती हुई।  जहाँ मेरा इलाज चला।  इसी दौरान मैं ने अपनी माँ को फ़ोन कर के अपने पास बुलाया।  मेरी माँ मेरे पास आई तो मुझे पता चला कि मेरे दो महीने के बच्चे का गर्भपात इलाज के दौरान हो चुका है। अपनी हालत में सुधार होने के बाद आज दिनांक 16.05.2012 को उक्त घटना की जानकारी महिला थाना को देने गयी मगर उन्हों ने मेरी बात को अनसुनी कर दिया।  तब मैं उपरोक्त घटना की सूचना श्रीमान को अपने माँ के साथ दे रही हूँ!”

आपने ऊपर लिखी सारी बातों को पढ़ा इस मामले में मैंने 19.04.2012 को कोर्ट में समर्पण किया।  13.07.2012 को हाईकोर्ट द्वारा जमानत पर रिहा हुआ।  इस केस की डायरी जमा हो चुकी है और धारा 176, 313 आईपीसी का केस भी खुल चुका है।  साथ में अल्ट्रासाउंड डाक्टर का पुर्जा व स्टेट बैंक में जमा किए गये पैसे की रसीद संलग्न है।  जिस में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की तारीख 14.05.2012 है जब कि डाक्टर के यहाँ 15.02.2012 भर्ती हुई है।  पुलिस द्वारा मोबाइल की कॉल रेकॉर्ड्स निकलवाया जिस से पता चला कि 29 जनवरी से लगातार 18 अप्रेल तक बातचीत हुई है।  सर कृपा कर यह बताएँ कि क्या इस मामले में मुझे सजा हो सकती है?  इस से पूर्व उस ने जिस से शादी की थी।  उस पर भी रेप केस कर के शादी की थी।  इस लड़की का चाल चलन ठीक नहीं है।  मेरे जेल जाने के बाद 20.04.2012 को मुझ से मिलने जेल आई थी।  उस के बाद भी कई दिन आई।  मुझ पर बार बार शादी करने का दवाब बना रही है।  घटना 18.08.2010 की है केस 16.02.2012 को हो रहा है।  क्या रेप केस 2 साल बाद भी हो सकता है।  विटामिन की दवा 05.02.2012 को खिलाई गई जब कि प्राथमिकी में लिखा है की इलाज के दौरान गर्भपात हो गया है।  इस मुसीबत से कैसे निकला जाए?  बताने की कृपा करें!

-आशीष राज, समस्तीपुर, बिहार

समाधान-

प ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली महिला के बारे में दो बातें कही हैं।  एक तो यह कि उस का चाल चलन ठीक नहीं है।  दूसरा यह कि उस ने अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगा कर उस से शादी की थी।  हो सकता है कि आप की दोनों बातें सही हों।  हो सकता है उस के पति ने भी उस के साथ विवाह पूर्व संबंध विवाह का विश्वास दिला कर यौन संबंध कायम किया हो बाद में मना कर देने पर उस को बलात्कार का आरोप लगाना पड़ा हो।  ऐसी स्थिति में तो उस के चाल-चलन के खराब होने का आरोप उस पर नहीं लगाया जा सकता।

प ने जो कुछ प्राथमिकी में लिखा है उस के बारे में एक भी शब्द नहीं कहा है।  आप का मौन यह बताता है कि प्राथमिकी का एक एक शब्द सही है। यदि ऐसा है तो फिर आप ने निश्चय ही वे दोनों अपराध किए हैं जिन का आरोप आप पर लगाए गए हैं।  आज केवल यह कह देने से कि लड़की का चाल-चलन अच्छा नहीं है और उस ने पहले पति से भी बलात्कार का आरोप लगा कर विवाह किया था आप का अपराध क्षमा नहीं किया जा सकता।  फिर किसी लड़की के चाल चलन को खराब कब कहा जाएगा यह निश्चित नहीं है। हो सकता है कि उस लड़की ने जब वह अविवाहित थी तो उस ने विनय के साथ यौन संबंध रखे हों। पर यह अपराध कहाँ है।  विनय के साथ विवाह करने के बाद तो उस ने किसी के साथ यौन संबंध नहीं रखे।  उस की मृत्यु के उपरान्त आप ने उस के साथ विवाह का विश्वास पैदा कर यौन संबंध बनाया तो यह भी अपराध नहीं है।  यदि उस ने विनय के साथ और आप के साथ विवाह पूर्व यौन संबंध बनाए भी हैं तो भी यह गैरकानूनी तो नहीं था।  फिर विनय और आपने भी तो बिना विवाह किए उस के साथ यौन संबंध बनाए।  तो इस तरह आप दोनों का भी चाल-चलन खराब हुआ।  इस तरह आप उस के चाल-चलन को खराब बता कर अपराध के परिणाम से नहीं बच सकते।

प का बचाव यही हो सकता है कि जिन अपराधों का आरोप आप के विरुद्ध लगाए गए हैं वे न्यायालय में साबित नहीं हो सकें।  वैसे तो बलात्संग और किसी महिला का गर्भपात उस की सहमति के बिना करा देना ऐसे अपराध हैं जिन में कोई समझौता भी न्यायालय द्वारा मान्य नहीं हो सकता।  अपराध साबित हो जाने पर दंड मिलना स्वाभाविक है।  यह भारत की दांडिक न्याय प्रणाली है जो पीड़ित महिला से अपराधी द्वारा विवाह कर लिए जाने पर महिला के अच्छे जीवन की आशा में उस के निवेदन पर ऐसे अपराधों में क्षमा कर देती है और मामूली दंड पर छोड़ देती हैं।  यदि यही अपराध किसी पश्चिमी देश में हुआ होता तो आप को दंड होना पूरी तरह निश्चित हो गया होता।

प इस मामले में मुगालते में न रहें कि आप इस मुसीबत से आसानी से बच जाएंगे अपितु यह मान कर चलें कि सजा से आप को कोई नहीं बचा सकता, केवल सजा कम हो सकती है।  यदि कोई वकील आप को यह कहे कि आप को इस मामले में दंड नहीं मिलेगा तो वह मिथ्या भाषण करेगा। इस मुकदमे में सब कुछ न्यायालय के समक्ष आई साक्ष्य पर निर्भर करेगा कि आप पर लगाए गए आरोप साबित होते हैं या नहीं।  इस कारण से आप ऐसे सक्षम वकील की सहायता प्राप्त करें जो ईमानदारी से आप की मदद करे,  न कि ऐसा वकील करें जो यह कहे कि मैं तुम्हें बरी करवा दूंगा या कि तुम्हें इस मामले में सजा नहीं हो सकती।

नाबालिग लड़की को भगाकर शादी करना सजा को न्यौता देना है।

कृष्ण कुमार जी ने बहुत ही विचित्र प्रश्न तीसरा खंबा के सामने रखा है। प्रश्न काल्पनिक या भविष्य में होने वाली संभावना को ले कर किया गया है। लेकिन समाज में इस तरह के बहुत मामले सामने आ रहे हैं। प्रश्न इस प्रकार है …

अगर कोई युवक किसी नाबालिग लड़की से प्यार करता हो और वह लड़की भी उसे प्यार करती हो,  दोनों घर छोड़ कर भाग जाएँ और विवाह कर लें। उस के बाद परिवार वाले उन्हें पकड़ लें और लड़के पर बलात्कार और अपहरण का मुकदमा कर दें। लड़की भी युवक के खिलाफ बयान दे दे। ऐसी स्थिति में यह बताएँ कि लड़के के पास बचाव का क्या उपाय है?

 उत्तर-

कृष्ण कुमार जी,
संयोग कहें या दुःसंयोग कि ठीक ऐसे ही मुकदमे में कुछ बरस पहले  मैं एक युवक की पैरवी कर चुका हूँ।  लड़के व उस के मौसा व मौसी को जिन्हों ने विवाह कराने में मदद की थी अभियुक्त बनाया गया था। मौसी और मौसा की जमानत हो गई थी लेकिन युवक को मुकदमे की सुनवाई के दौरान जेल में ही रहना पड़ा था। मुकदमा करीब दस महिने चला। आखिर तीनों निर्दोष साबित हुए। युवक छूट गया।

लेकिन मेरा यह मुकदमा आप के प्रश्न से इस मायने में भिन्न था कि यह मुकदमा लड़की को नाबालिग मान कर दर्ज किया गया था और मुकदमे के दौरान यह साबित हो गया था कि लड़की बालिग थी और वह अपनी स्वेच्छा से युवक के साथ गई थी। हालांकि यह प्रमाणित नहीं हो पाया कि उन दोनों की शादी हो गई थी। 
आप के प्रश्न में लड़की नाबालिग है। नाबालिग लड़की को यह तय करने का अधिकार नहीं कि वह किस के साथ रहेगी या न रहेगी। ऐसी अवस्था में उस की सहमति हो तो भी वह वैध नहीं है। ऐसी अवस्था में किया गया विवाह भी जबरन किया गया बाल विवाह होगा। जब कि लड़की खुद युवक के विरुद्ध बयान दे रही है। लड़के के विरुद्ध अपहरण (धारा-366) और (धारा-376) दोनों ही अपराध तो साबित होंगे ही  बाल-विवाह का अपराध  साथ में और साबित होगा। युवक की न केवल जमानत नहीं होगी अपितु वह दस वर्ष तक की कैद के दंड से दंडित किया जा सकता है। यदि लड़की की आयु 16 वर्ष से कम हुई तो उस के साथ सहवास होना ही बलात्कार को साबित करना पर्याप्त होगा।  आप के प्रश्न में उपस्थित मामले में सजा से बचाव का कोई उपाय नहीं है।

कानून में 15 वर्ष से कम की पत्नी क्यों?

ल के आलेख बलात्कार के अपराध में महिला आरोपी क्यों नहीं हो सकती ? पर आई दो टिप्पणियों में एक ही प्रश्न सामने आया कि जब विवाह की न्यूनतम आयु स्त्रियों के लिए 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष है तो फिर बलात्संग के मामले में 15 वर्ष की पत्नी का उल्लेख होना क्या विरोधाभास नहीं है? टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं-
 अभिषेक ओझा said…
‘पुरुष का अपनी पत्नी के साथ मैथुन बलात्संग नहीं है जब कि पत्नी पन्द्रह वर्ष से कम आयु की नहीं है।’ पन्द्रह वर्ष की पत्नी ? शादी की न्यूनतम उम्र से ये विरोधाभास नहीं है ? 
 Shastri said…
कई नई बातें पता चली. यह भी लगा कि हमारे कई कानून अभी भी एक या दो शताब्दी पीछे चल रहे हैं, जैसे जो 15 साल की उमर से कम की पत्नी की बात करते हैं.

भारत में  बालक विवाह पर प्रतिबंध बहुत पुराना है।  बालक विवाह प्रतिषेध अधिनियम 1929 में ही लागू हो गया था।  किन्तु उस के अंतर्गत विवाह के लिए न्यूनतम आयु पुरुष हेतु 18 वर्ष और स्त्री के लिए 16 वर्ष निर्धारित की गई थी।  यह कानून बहुत सख्त नहीं था और इस कानून की सख्ती से पालना भी नहीं हुई।  इस कानून का उपयोग आम तौर पर शिकायत दर्ज होने पर ही किया जाता था।  जिस के कारण बाल-विवाह की कुरीति पर कोई बड़ा विपरीत प्रभाव नहीं हो सका और वह बनी रही।  बाल-विवाह का जितना उन्मूलन हो सका है वह देश की बदलती हुई सामाजिक अवस्था और शिक्षा के प्रसार के कारण हो सका है।  कानून ने उस में केवल मदद दी है।  इस कानून में और अन्य किसी कानून में भी कोई ऐसा प्रावधान नहीं था जिस से बाल-विवाह हो जाने पर उसे अवैध घोषित कर दिया जाता।  हकीकत यह रही कि देश में बालक विवाह होते रहे।  जिस के कारण  यह बहुत संभव था कि 15 वर्ष से कम आयु की पत्नियाँ भी देश में मौजूद रहीं और आज भी मौजूद हैं।

अब बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006 बनाया गया है जो 10 जनवरी, 2007 से प्रभावी हुआ है और 1929 के कानून को इस कानून द्वारा निरस्त कर दिया गया है।  इस कानून में विवाह के लिए आवश्यक न्यूनतम आयु पुरुष के लिए 21 वर्ष तथा स्त्री के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है, इस से कम आयु के स्त्री पुरुषों को बालिका व बालक माना गया है।  इस कानून में पहली बार किसी बालक विवाह को शून्य घोषित किए जाने का प्रावधान किया गया है।  जिस के अनुसार विवाह का वह पक्षकार जो कि विवाह के समय बालक था अब अपने विवाह को शून्य घोषित कराने के लिए अदालत में अर्जी प्रस्तुत कर सकता है।  यदि वह ऐसी अर्जी प्रस्तुत करने के समंय भी बालक है तो अपने संरक्षक के माध्यम  से यह अर्जी प्रस्तुत कर सकता है।  लेकिन ऐसी अर्जी विवाह के समय बालक या बालिका रहे पक्षकार द्वारा वयस्क होने की तिथि के दो वर्ष के भीतर ही प्रस्तुत की जा सकती है।

इस तरह आप देखेंगे कि 15 वर्ष की आयु की पत्नी होना अब भी संभव है।  आप सोच रहे होंगे कि जब यह कानून पूरी तरह लागू हो चुका होगा तब संभवतः 15 वर्ष आयु की पत्नी का अस्तित्व इस देश में समाप्त हो जाएगा।  लेकिन ऐसी सोच गलत है।  आप सोचिए क्या हम दुनिया के किसी भी भाग से ऐसे समाचार नहीं सुनते हैं कि दो या पाँच या सात वर्ष की बालिका के साथ बलात्कार किया गया।  किसी भी अवस्था में इस तरह के अपराध के होने की सं

बलात्कार के अपराध में महिला आरोपी क्यों नहीं हो सकती ?

कल के आलेख लिव-इन संबंधों को एक बार और सुप्रीमकोर्ट की मान्यता पर दीप्ति, ने एक प्रश्न किया कि -आज ही एक वेब साइट पर पढ़ा कि महिला ही महिला का बलात्कार नहीं कर सकती है, कम से कम क़ानूनन। आप क्या इस मुद्दे पर रौशनी डाल सकते हैं?

इस संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय राजस्थान राज्य बनाम हेमराज एवं अन्य के मुकदमे में 27 अप्रेल 2009 को दिया है।  जिसे यहाँ पूरा पढ़ा जा सकता है।

भारतीय दंड संहिता में बलात्संग के अपराध को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है-

धारा-375 बलात्संग-
जो पुरुष एतस्मिन पश्चात अपवादित दशा के सिवाय किसी स्त्री के साथ निम्न लिखित छह भांति की परिस्थितियों में से किसी परिस्थिति में मैथुन करता है वह पुरुष “बलात्संग” करता है, यह कहा जाता है-
पहला- उस स्त्री की इच्छा के विरुद्ध।
दूसरा- उस स्त्री की सम्मति के बिना।
तीसरा-उस स्त्री की सम्मति से, जब कि उस की सम्मति, उसे या ऐसे किसी व्यक्ति को, जिस से वह हितबद्ध है, मृत्यु या उपहति के भय में डाल कर अभिप्राप्त की गई है।
चौथा- उस स्त्री की सम्मति से, जब कि वह पुरुष यह जानता है कि वह उस स्त्री का पति नहीं है और उस स्त्री ने सम्मति इसलिए दी है कि वह विश्वास करती है कि वह ऐसा पुरुष है जिस से वह विधि पूर्वक विवाहित है या होने का विश्वास करती है।
पाँचवाँ- उस स्त्री की सम्मति से जब कि  ऐसी सम्मति देने के समय वह विकृतचित्त या मत्तता के कारण या उस पुरुष द्वारा व्यक्तिगत रुप में या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से कोई संज्ञा शून्यकारी या अस्वास्थ्यकर पदार्थ दिए जाने के कारण, उस बात की, जिस के बारे में वह सम्मति देती है, प्रकृति और परिणामों को समझने मे असमर्थ है।
छठा- उस स्त्री की सम्मति से या बिना सम्मति के जब कि वह सोलह वर्ष से कम आयु की है।

स्पष्टीकरण- बलात्संग के अपराध के लिए आवश्यक मैथुन गठित करने के लिए प्रवेशन पर्याप्त है।

अपवाद- पुरुष का अपनी पत्नी के साथ मैथुन बलात्संग नहीं है जब कि पत्नी पन्द्रह वर्ष से कम आयु की नहीं है।
इस तरह हम पाते हैं कि भारतीय दंड संहिता में बलात्संग ऐसा अपराध नहीं है जो कि स्त्री के द्वारा किया जा सके।  बलात्संग ऐसा अपराध है जो केवल पुरुष द्वारा स्त्री के साथ किया जा सकता है।  इस कारण से स्त्री द्वारा बलात्संग किया जाना संभव नहीं है।

यहाँ दीप्ति द्वारा जिस निर्णय की चर्चा की गई है उस में एक किशोर पर यह आरोप था कि उस ने किसी किशोरी के साथ बलात्कार किया है।  उस में हेमराज नामक व्यक्ति और उस की पत्नी का भी सामान्य आशय था।  जब कि सामान्य आशय का अर्थ यह है कि उस कृत्य को करने का समान रुप से इरादा होना और उस के लिए एक साथ हो जाना।  किसी भी स्त्री के द्वारा भारतीय दंड संहिता में वर्णित बलात्कार का अपराध करना संभव नहीं होने के कारण यह भी संभव नहीं है कि उस तरह का सामान्य आशय किसी स्त्री का हो।   यही मान  कर उक्त प्रकरण में हेमराज की पत्नी को दोषमुक्त कर दिया गया था।  जिस के विरुद्ध राजस्थान सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की
गई थी।   इस मामले में राजस्थान उच्चन्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यथावत रखा गया।

क्या अवयस्क बालिका के साथ बलात्कार और हत्या के अपराधी को मृत्युदंड मिलना चाहिए?

क्या अवयस्क बालिका के साथ बलात्कार करने और बाद में इस भय से कि यह सब को बता देगी, उस की हत्या करने के अपराधी को मृत्युदंड मिलना चाहिए? 
इस प्रश्न को अब सुप्रीम कोर्ट की विस्तृत पीठ सुलझाएगी।  सूरत के एक मामले में सेशन्स जज ने ऐसे ही एक अभियुक्त को मृत्युदंड की सजा सुनाई और उच्च न्यायालय ने उस की पुष्टि कर दी।  अभियुक्त रमेश भाई चन्दू भाई राठौड़ ने इस की अपील सुप्रीमं कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की।  जहाँ सुनवाई के बाद दो न्यायाधीशों ने अपना निर्णय सुनाया।  इस मामले में दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत थे कि अपराध  अभियुक्त रमेश भाई ने ही किया है।  न्यायमूर्ति अरिजित पसायत का मानना था कि अभियुक्त को मृत्युदंड मिलना चाहिए, जब कि न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली का मत था कि यह मामला ऐसा नहीं है जिस में अभियुक्त को मृत्युदंड दिया जाए।  क्यों कि दोनों न्यायाधीश दंड के विषय में भिन्न राय रखते थे, इस कारण से मामले को इस निर्देश के साथ सुप्रीम कोर्ट के पंजीयन विभाग को प्रेषित कर दिया गया है कि मामले को विस्तृत पीठ (तीन न्यायाधीशों की) के समक्ष सुनवाई के आदेश हेतु मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।  अब मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा जाना है जिस से मत भिन्नता होने पर भी कम से कम दो न्यायाधीशों का मत तो समान रहे।

 मामला इस प्रकार है कि बलिकृत बालिका के माता-पिता एक धार्मिक आयोजन में गए थे, जहाँ से लौटने पर बालिका घर पर नहीं मिली।  उसे तलाशा गया और न मिलने पर पुलिस को गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई।  सुबह यह सूचना मिली कि बालिका को अभियुक्त जो कि उस बहुमंजिला इमारत का चौकीदार था जिस में बालिका का निवास था, द्वारा साइकिल पर बिठा कर कहीं ले जाते देखा गया था।  दूसरे दिन जब अभियुक्त चौकीदार जब किसी को मिला तो उस से पूछा गया कि वह बालिका को कहाँ ले गया और बालिका कहाँ गई? तब दबाव देने पर उस ने बताया कि उस ने बालिका के साथ बलात्कार किया है और इस भय से कि वह लोगों को यह बात बता देगी उस की हत्या कर दी है।  पुलिस ने बलात्कार और हत्या का मुकदमा दर्ज किया और अन्वेषण के उपरांत आरोप पत्र पेश किया।  इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं था, लेकिन परिस्थिति जन्य साक्ष्य मजबूत होने के कारण अपराध प्रमाणित पाया गया।

अब मामला सुप्रीम कोर्ट की विस्तृत पीठ तय करेगी, बहुत से सिद्धान्तों और पूर्व निर्णयों को परखा जाएगा।  लेकिन यह विषय ऐसा है कि जनता को भी इस विषय पर अपनी राय अभिव्यक्त करनी चाहिए कि इस प्रकार के अभियुक्त को क्या दंड दिया जाना चाहिए?  और क्यों? आप चाहें तो अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से इस ब्लॉग पर प्रकट कर सकते हैं या फिर वोट के माध्यम से भी अभिव्यक्त कर सकते हैं।

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