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हिस्सा छोड़ने व पाने के लिए रिलीज डीड निष्पादित कराएँ।

basement constructionसमस्या-

संजीव अग्रवाल ने जौनपुर उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी दो भाई हैं। मेरे ताउजी का देहांत हो चूका है। हमारे परिवार की कईअचल संपत्तियां हैं। जिन का बटवारा नहीं हुआ है। एक भूमि जिसका एरिया 4059वर्ग मीटर है, जिसका आधा हिस्सा मेरे ताऊजी के चार बेटों के नाम है एवंआधा हिस्सा मेरे पिताजी के नाम है। हम तीन भाई हैं। इस तरह कुल भूमि का एकबटा छह भाग मेरे हिस्से का है। मैं उक्त भूमि पर एक व्यावसायिक निर्माणकरना चाहता हूँ। मेरे चचेरे भाई उक्त भूमि के अपने हिस्से को मुझे बेचने कोराजी हैं एवं मेरे पिताजी एवं मेरे भाई अपने हिस्से का हक़ मुझे देना चाहतेहैं जिस के बदले दूसरी प्रॉपर्टी में मैं अपना हक़ उन दोनों भाइयों के हक़में करना चाहता हूँ। कृपया उक्त सम्पत्तियों के दस्तावेज किस तरह से तैयारकरें जिस से जिससे कम से कम स्टाम्प शुल्क देना पड़े।

समाधान-

जिस संपत्ति पर आप व्यवसायिक निर्माण करना चाहते हैं उस में आप का खुद का कोई हक आप नहीं बता रहे हैं। यदि यह सही है तो फिर उक्त संपत्ति आप के नाम दानपत्र या विक्रय पत्र द्वारा ही हस्तान्तरित की जा सकती है जिस में आप को पूरी स्टाम्प ड्यूटी अदा करनी होगी। यह सब से सुरक्षित है।

लेकिन यह संपत्ति आप ताऊजी के पुत्रों और पिताजी के नाम बता रहे हैं जिस से प्रतीत होता है कि यह संपत्ति पूर्व में आप के दादा जी के नाम थी और हो सकता है उस के पहले परदादा जी के नाम रही हो। इस से लगता है कि यह संपत्ति पुश्तैनी है। यदि ऐसा है तो उस में आप का अपना भी हिस्सा है। आप का यह हिस्सा कितना हो सकता है और कितना नहीं इस का पूरा आकलन केवल आप के परिवार के वंशवृक्ष (शजरा) तथा भूमि के स्वामित्व के दस्तावेजों को देख कर ही बताया जा सकता है।

प को चाहिए कि आप किसी स्थानीय वकील से इन दस्तावेजों के साथ मिल कर उस से सलाह लें। यदि वह इस भूमि में आप का हिस्सा निर्धारित करने में सफल रहा तो फिर शेष हिस्सेदार अपने हिस्से को आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर रिलीज कर सकते हैं। उसी तरह आप अपने हिस्से की जिस संपत्ति को भाइयों को देना चाहते हैं उस में अपना हिस्सा भाइयों के नाम रिलीज कर सकते हैं।

अन्य हिस्सेदारों के हिस्से रिलीज कराएँ या खरीद कर अपने नाम कराएँ।

lawसमस्या-

रंजन कुमार ने बरौनी, बिहार से पूछा है-

मेरे दादा जी के 6 लड़के एवं 2 लड़कियाँ हैं। 2 लड़कों (मेरे पिताजी और 1 चाचाजी) की मौत हो चुकी है। दादीजी अभी जिंदा हैं। संपत्ति का बँटवारा अभी तक नहीं हुआ है। मेरे नौकरी करने और विवाह होने पर दादाजी ने अपने नाम की ज़मीन पर, जो उन्हे उनके चाचाजी से गिफ्ट मिला था, मेरे लिए घर बनवा दिया। जिस के लिए पैसा मैं ने दिया था। दादाजी मेरे नाम से कोई कागज तैयार नहीं करवाया। घर के बने हुए 7 साल और दादाजी के मरे हुए 5 साल से अधिक हो गये हैं। घर मेरे कब्ज़े में है। यद्यपि मैं नौकरी के कारण घर से बाहर बंगाल में रहता हूँ। मैं उस ज़मीन का मालिकाना हक़ पाना चाहता हूँ तथा सरकार के करों का उचित भुगतान करना चाहता हूँ। इस के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

संपत्ति दादाजी को गिफ्ट में प्राप्त हुई थी और उस पर उन का व्यक्तिगत स्वामित्व था। उस पर उन्हों ने आप से मकान बनवाने के लिए कहा और आप ने बना लिया। हो सकता है कि आप के पास इस बात के सबूत हों कि मकान आप ने बनवाया है। लेकिन उन के देहान्त के उपरान्त उस गिफ्ट में मिली जमीन के उत्तराधिकारी तो सभी छह लड़के और दो लड़कियाँ हैं। छह लड़कों में से जिन दो का देहान्त हो चुका है उन के हिस्से पर उन की पत्नियों और संन्तानों का उत्तराधिकार है। इस तरह उक्त भूखंड अविभाजित हिन्दू परिवार की संपत्ति है।

स संपत्ति के आप के नाम होने का एक ही तरीका है कि अविभाजित परिवार के शेष सदस्य आप के नाम उक्त मकान में अपने हकत्याग की डीड निष्पादित कर पंजीकृत करवा दें। आप को इस के लिए सभी को मना कर यह काम करवाना होगा। जब तक यह काम न हो तब तक आप कब्जा बनाए रखें। आप सभी अन्य हिस्सेदारों को उस जमीन में उन के हिस्से की कीमत आँक कर उस का भुगतान कर उन का हिस्सा खरीद भी सकते हैं। यदि ऐसा करते हैं तो आप को हिस्सा खरीद के विलेख का पंजीयन करवाना चाहिए।

शेष उत्तराधिकारी माँ के नाम अपने हिस्से की रिलीज डीड निष्पादित कर दें।

real5समस्या-
राघवेन्द्र दीक्षित ने लुधियाना पंजाब से पूछा है-

मेरे पिता जी ने 18-19 साल पहले 200 गज़ ज़मीन खरीदी थी जिस में से बाद में 50 गज़ ज़मीन मेरी माता जी के नाम पर कर दी। लेकिन 7 साल पहले 2006 दिसम्बर में पिता जी की दिमागी हालत खराब होने की वजह से वे घर से चले गये और अभी तक वापिस नहीं आए। हम ने पोलीस स्टेशन मे उन के गायब होने की रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी थी। पुलिस ने एक सादे कागज पर गायब होने की रिपोर्ट लिख कर हमें प्राप्ति रसीद दे दी थी और हमने अपनी तरफ से भी बहुत ढूंढने की कोशिश की पर उन का कहीं पता नहीं चला। उन की जो 150 गज़ ज़मीन लुधियाना में है वह मैं माता जी के नाम करना चाहता हूँ। इस क़ानूनी प्रक्रिया में मुझे कौन से दस्तावेज़ो की ज़रूरत पड़ेगी और हम इसे किस तरह से करवा सकते हैं। जब पिता जी ने ज़मीन ली थी तो किसी को भी नॉमिनी नहीं बनाया था और बाद में भी नही बनाया था।

समाधान-

प के पिता जी के नाम जो जमीन है वह केवल आप के पिता ही आप की माता जी के नाम करवा सकते थे। अब आप के पिता जी को लापता हुए 7 वर्ष हो चुके हैं। इस कारण से यह अनुमान किया जा सकता है कि वे अब जीवित नहीं हैं। आप पुलिस को जो सूचना दी थी उस की प्राप्ति रसीद की प्रति के साथ तथा आप के व माता जी के शपथ पत्र के साथ उन के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर दीजिए। आम तौर पर इस तरह मृत्यु प्रमाण पत्र बना दिया जाता है। यदि मृत्यु प्रमाण पत्र बन जाता है तो उस के आधार पर पिता जी की संपत्ति उत्तराधिकार में आप को, आप की माता जी को तथा आप के भाई-बहनों को स्वतः ही प्राप्त हो जाएगी। यदि जन्म मृत्यु पंजीयक मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए दीवानी अदालत की डिक्री चाहेगा तो फिर आप को पिता जी को मृत घोषित करवाने के लिए दीवानी न्यायालय में घोषणा का वाद संस्थित कर के डिक्री प्राप्त करनी होगी।

 एक बार मृत्यु प्रमाण पत्र बन जाने के बाद आप और यदि आप के भाई बहिन भी हों तो वे सब मिल कर अपनी माता जी के नाम उक्त जमीन के अपने हिस्से को रिलीज करते हुए रिलीज डीड निष्पादित कर उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा लें। इस तरह वह भूखंड आप की माता जी के नाम हो जाएगा।

उत्तराधिकारी अन्य हिस्सेदार के पक्ष में अपने हिस्से के त्याग के लिए हक-त्याग विलेख निष्पादित करे।

Release Deedसमस्या-
चौमहला, राजस्थान से दिनेश जैन ने पूछा है-

मेरी माताजी का निधन 15 अगस्त 2012 को अचानक हो गया उनकी कोई वसीयत नहीं है। हम 2 भाई हैं व 3 बहनें हैं तथा पिताजी भी हैं| माताजी की 2 दुकानें हैं |  हम दोनों भाई साथ रहते हैं। हम दोनों चाहते हैं कि माताजी की सम्पति हमारे नाम हो जाए। इस में बहनों, पिताजी या किसी अन्य को कोई एतराज नहीं है| ये सम्पति हमारे नाम कैसे हो सकती है?

समाधान-

दोनों दुकानें माता जी की संपत्ति थीं। माता जी ने उक्त दुकानों के सम्बन्ध में कोई वसीयत नहीं की थी। इस तरह माता जी के देहान्त के साथ ही उक्त संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 (1) (क) के अनुसार उन के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों अर्थात आप दोनों भाइयों, तीनों बहिनों व पिताजी की संयुक्त संपत्ति हो चुकी है तथा आप में से प्रत्येक 1/6 हिस्से का अधिकारी है।

ब जिस संपत्ति में जो व्यक्ति अपना हिस्सा छोड़ना चाहे तथा जिस के हक में छोड़ना चाहे एक हक-त्याग विलेख (Release Deed) उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा कर छोड़ सकता है।

दि दोनों दुकानें दोनों भाइयों के नाम करवानी हैं और किसी को कोई आपत्ति नहीं है तो आप की तीनों बहिनों व पिता जी को आप दोनों भाइयों के नाम से हक-त्याग विलेख (Release Deed) निष्पादित करवानी होगी। इस से दोनों दुकानों पर दोनों भाइयों का सम्मिलित स्वामित्व स्थापित हो जाएगा।

लेकिन यदि आप चाहते हैं कि एक दुकान आप के व दूसरी आप के भाई के नाम हो जाए तो जिस दुकान को आप रखना चाहते हैं उस में आप की तीनों बहिनें, पिताजी और आप के भाई को हक-त्याग विलेख (Release Deed) निष्पादित कर आप के हक में अपना अपना हिस्सा का हक-त्याग करना होगा। इस से आप को उस दुकान पर एकल स्वामित्व का हक प्राप्त हो जाएगा।  इसी तरह जिस दुकान को आप का भाई रखना चाहता है उस दुकान में  तीनों बहिनें, पिताजी और आप को अपना-अपना हिस्सा भाई के हक में त्याग करने के लिए हक-त्याग विलेख (Release Deed) निष्पादित कराने से आप के भाई का एकल स्वामित्व उस दुकान पर प्राप्त हो जाएगा।

हक-त्याग केवल पंजीकृत हक-त्याग विलेख से ही मान्य . . .

Release Deed
समस्या-
शाजापुर, मध्य प्रदेश से नवीन चंद्र कुम्भकार ने पूछा है –

क्या पैतृक संपत्ति में महिलाएँ अपना हक अन्य उत्तराधिकारियों के पक्ष में तहसीलदार के न्यायालय में केवल बयान के आधार पर त्याग सकती हैं? जब कि मृत्यु  के उपरान्त नामांतरण के लिए वाद वैध उत्तराधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

समाधान-

किसी भी संपत्ति में यदि किसी स्त्री या पुरुष को स्वामित्व का या खातेदारी का अधिकार प्राप्त है तो यह अधिकार त्यागना एक तरह से संपत्ति का हस्तान्तरण है जो केवल हकत्याग विलेख (रिलीज डीड) को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा कर ही त्यागा जा सकता है। इस के अतिरिक्त किसी भी प्रकार से नहीं। संविधान और कानून के समक्ष स्त्रियाँ और पुरुष दोनों समान हैं। अक्सर तहसीलदार ही उस इलाके का उप पंजीयक भी होता है। लेकिन वह किसी के बयान के आधार पर हकत्याग को स्वीकार नहीं कर सकता। उस के लिए अलग से हकत्याग विलेख लिखा जाएगा, निर्धारित स्टाम्प ड्यूटी भी देनी होगी और पंजीकरण शुल्क भी देना होगा और उसे पंजीकृत भी किया जाएगा।

कत्याग विलेख आवश्यक रूप से पंजीकरणीय प्रलेख है। यदि किसी भी कार्यवाही में यह कहा जाता है कि किसी ने किसी के हक में या शेष स्वामियों के हक में हक त्याग कर दिया है तो हकत्याग का पंजीकृत विलेख ही उस का प्रमाण होगा। अपंजीकृत प्रमाण को कोई भी न्यायालय साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। यदि नामांतरण के लिए आवेदन किया गया है तो यह भी एक न्यायिक कार्यवाही है तथा हक त्याग का आधार केवल हकत्याग विलेख ही हो सकता है।

संपत्ति में अपना हिस्सा अलग करने के लिए बँटवारानामा या हकत्याग विलेख पंजीकृत कराएँ …

partition of propertyसमस्या-

फतेहनगर, राजस्थान से मुस्तफा बोहरा पूछते हैं –

मेरे पिताजी के 3 भाई और 1 बहन है। मेरी दादाजी की एक दुकान है जो मेरे दादाजी के पास उनके भाइयों के बटवारे मैं आई थी। उस दुकान पर विगत 35 साल से हमारा कब्जा है और अभी भी वो हमारे कब्ज़े मैं है। यह दुकान मेरे दादाजी की है और अब मेरे पिताजी के भाइयों के बटवारे में मेरे पिताजी के पास आई है, अब हम ये चाहते हैं कि ये दुकान का नाम मेरे पिताजी के नाम पर हो जाए इसके लिए मुझे क्या करना होगा?

मेरे दादाजी के द्वारा खरीदा गया एक मकान है जो अभी हमारा निवास है उस में मेरे पिताजी को आधा भाग हिस्से में मिला है और बाकी का भाग 1/4 एक भाई के और बाकी का 1/4 भाग दो भाइयों के बीच मैं आया है। सो अभी फिलहाल ये सारी प्रॉपर्टी मेरे दादाजी के नाम पर है। इस प्रॉपर्टी का भी जो आधा हिस्सा हमें मिला है वो मेरे पिताजी के नाम पर हो जाए और उनके नाम का पट्टा मिल जाए ताकि फ्यूचर में कोई प्राब्लम नहीं हो इस के लिए हमें क्या करना होगा।

समाधान-

दुकान और मकान आपके दादा जी के नाम पर थी। उन के बाद आप के व्यक्तिगत कानून के अनुसार आप के पिता और उन के बहन भाइयों आदि के हिस्से में आ चुकी हैं और उन्हों ने इस संपत्ति का आपस में बैठ कर बँटवारा कर लिया है। यह बँटवारा मौखिक भी हो सकता है और लिखित भी इस की जानकारी आप को होगी। बँटवारानामा का पंजीयन जरूरी है। लेकिन भूतकाल में हुए मौखिक बँटवारे का ज्ञापन लिखा जाए और गवाहों के सामने उस में सभी भागीदारों के हस्ताक्षर करा लिए जाएँ तो उस का पंजीयन कराया जाना आवश्यक नहीं है। आप का बँटवारा हो चुका है। इस कारण से अब बँटवारे का ज्ञापन लिख कर उस पर सभी भागीदारों के हस्ताक्षर गवाहों के सामने करवाए जा सकते हैं और उसे नोटेरी पब्लिक के यहाँ प्रमाणित कराया जा सकता है। इस ज्ञापन की न्यूनतम मूल्य के स्टाम्प पेपर पर भागीदारों की संख्या के बराबर प्रतिलिपियाँ बना कर उन्हें भी नोटेरी पब्लिक से अटेस्ट कराया जा सकता है, जिस से सब के पास एक एक प्रति उपलब्ध रहे। बंटवारे का यह ज्ञापन इस बात का प्रमाण होगा कि जो संपत्ति आप के पिता के हिस्से में आई है वह उन की है।

दूसरा तरीका ये है कि एक हक त्याग विलेख (Release Deed) निष्पादित किया जाए जिस में दुकान व मकान के उस हिस्से पर जो आप के पिता के हिस्से में आया है दादा जी के अन्य उत्तराधिकारी अपना अधिकार त्याग दें। इस हक त्याग पत्र को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा लिया जाए। इसी तरह अन्य भागीदारों के हिस्से में आई संपत्ति पर आप के पिता व अन्य भागीदार अपना हक त्यागते हुए हक त्याग विलेख निष्पादित कर दें। ये सारे हक त्याग विलेख एक साथ एक ही दिन पंजीकृत कराए जाएँ। इस तरह हर एक के पास उस के हिस्से की संपत्ति का अपना विलेख होगा।

मारी राय में दूसरा मार्ग अधिक उत्तम है।

हकत्याग भी एक तरह का संपत्ति हस्तान्तरण है।

समस्या-

बिदासर, राजस्थान से अजयकुमार ने पूछा है-

मैंने एक राजस्व वाद सन् 2005 में श्रीमान् उपखण्ड अधिकारी महोदय, सुजानगढ़ के न्यायालय में घोषणात्मक, चिर निषेधाज्ञा व रिकार्ड दुरूस्ती का अनुतोष प्राप्त करने हेतु संस्थित किया था।  उक्त वाद में मैंने यह घोषणा चाही थी कि प्रतिवादी संख्या एक कहीं अन्यत्र गोद चला गया है  इसलिए उसका अपने नैसर्गिक पिता की वादगत सम्पत्ति में कोई हक-हिस्सा नहीं रहा है।  उक्त वाद में प्रतिवादी संख्या एक मेरा भाई है लेकिन वह बाल्यकाल में ही मेरे नाना के गोद चला गया था।  मेरे पिता के नाम 100 बीघा भूमि राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी जो उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके उतराधिकारियों मुझ वादी व प्रतिवादी संख्या दो ता तीन के नाम दर्ज होनी चाहिए थी।  लेकिन मेरे बडे़ भाई प्रतिवादी संख्या एक ने अपना नाम भी वादग्रस्त खेत के राजस्व अभिलेखों में मेरे पिता के उतराधिकारी के रूप में दर्ज करवा लिया। जिस समय मेरे द्वारा उक्त वाद संस्थित किया गया था, उस समय मेरे संयुक्त खातेदारी के वादग्रस्त खेत के राजस्व अभिलेखों में मेरा व मेरे दो भाईयों (प्रतिवादी संख्या एक व दो) तथा मेरी दो बहिनों (प्रतिवादिनी संख्या तीन व चार) का नाम अंकित था इसलिए मेरे द्वारा उन्हें प्रतिवादीगण संख्या एक व चार के रूप में पक्षकार बनाया गया था।  उक्त वाद के लम्बित रहने के दौरान ही मेरी बहिन प्रतिवादीनी संख्या तीन ने अपने हिस्से की भूमि के खातेदारी अधिकारों का त्याग मेरे भाई प्रतिवादी संख्या एक के पक्ष में ‘‘हक त्याग विलेख’’ के जरिये कर दिया तथा मेरी दूसरी बहिन प्रतिवादिनी संख्या चार ने अपने हिस्से की भूमि के खातेदारी अधिकारों का त्याग मेरे भाई प्रतिवादी संख्या दो के पक्ष में ‘‘हक त्याग विलेख’’ के जरिये कर दिया।  उक्त हक त्याग विलेखों के आधार पर मेरी उक्त दोनों बहिनों के नाम वादग्रस्त खेत के राजस्व अभिलेखों से हटाकर उनके हिस्से की भूमि मेरे उक्त दोनों भाइयों प्रतिवादी संख्या एक व दो के नाम दर्ज कर दी गई।  वर्तमान में वादगत खेत के राजस्व अभिलेख में 20 बीघा भूमि मेरे नाम तथा 40-40 बीघा भूमि प्रतिवादी संख्या दो व तीन के नाम दर्ज है।  जिस समय उक्त हक परित्याग पत्र निष्पादित किये गये थे उस समय तक उक्त वाद के साथ प्रस्तुत अस्थाई निषेधाज्ञा प्रार्थना पत्र में ‘‘यथास्थिति बनाये रखने का आदेश’’ न्यायालय द्वारा नहीं पारित किया गया था लेकिन उस समय मेरे द्वारा संस्थित उक्त वाद लम्बित था। उक्त हक परित्याग पत्र निष्पादित किये जाने के कुछ समय बाद उक्त वाद के साथ प्रस्तुत अस्थाई निषेधाज्ञा प्रार्थना पत्र मुझ वादी के पक्ष में निर्णित किया गया जिसके विरूद्ध प्रतिवादी संख्या एक ने राजस्व अपील प्राधिकारी, बीकानेर के समक्ष अपील दायर की जिसे आंशिक रूप से मंजूर करते हुए मुझ वादी व प्रतिवादी संख्या एक दोनों को उक्त वाद के अन्तिम निर्णय तक यथास्थिति बनाये रखने हेतु पाबन्द कर दिया गया है।  उक्त विचाराधीन वाद में प्रतिवादीगण संख्या एक व चार के विरूद्ध दो वर्ष पूर्व एकपक्षीय कार्यवाही उनके अनुपस्थित रहने के कारण अमल में लाई जा चुकी है।  उक्त एकपक्षीय कार्यवाही का आदेश होने के बाद मेरे द्वारा एकतरफा साक्ष्य वादी में दो गवाहों के बयान लेखबद्ध करवाये जाकर वादपत्र के समर्थन में प्रस्तुत सभी दस्तावेजों को प्रदर्शित करवाया जा चुका है तथा अब उक्त वाद बहस अन्तिम के प्रक्रम पर चल रहा है।  उक्त प्रकरण के सम्बन्ध में मैं आपसे निम्नलिखित प्रश्नों के सम्बन्ध में सलाह लेना चाहता हूं:-

(1) क्या उक्त प्रकार से दो बहिनें अपने संयुक्त हिस्से का हक परित्याग मुझ एक भाई (वादी) को वंचित रखकर दो भाईयों के पक्ष में कर सकती है?  इस सम्बन्ध में हक परित्याग सम्बन्धित विधि व नियमों का वर्णन करते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की कृपा करें।

(2) क्या वाद के लम्बित रहने के दौरान उक्त दो बहिनों द्वारा अपने दो भाईयों के पक्ष में किया गया हक परित्याग वैध है? अगर यह वैध नहीं है तो क्या मुझ वादी को उक्त हक परित्याग सम्बन्धी तथ्यों को रिकार्ड पर लाने हेतू वादपत्र में संशोधन करवाना आवश्यक है? और क्या बिना संशोधन के उक्त तथ्यों को अन्तिम बहस के दौरान उठाया जाना कानूनी रूप से सही है? और क्या उक्त प्रकार से वाद के लम्बित रहने के दौरान किये गये अन्तरण के परिप्रेक्ष्य में वाद संस्थित करने के समय जो स्थिति वादग्रस्त खेत की थी उसी स्थिति में वादगत खेत को लाने हेतु मुझ वादी द्वारा बहस अन्तिम के प्रक्रम पर धारा 144 सी.पी.सी. के तहत आवेदन किया जा सकता है।  कृपया इस सम्बन्ध में उचित सलाह देने की कृपा करें।

(3) क्या उक्त प्रकार से एकतरफा चल रही वाद की कार्यवाही के दौरान हक परित्याग सम्बन्धी तथ्यों को रिकार्ड पर लाने हेतु वादपत्र में संशोधन करवाना पड़े तो क्या प्रतिवादीगण को उक्त संशोधन प्रार्थना पत्र की सूचना देने हेतु न्यायालय द्वारा तलब किया जायेगा या उसकी सुनवाई एकतरफा रूप से कर ली जावेगी?  कृपया इस सम्बन्ध में उचित सलाह देने की कृपा करें।

(4) क्या वाद संस्थित करने के दौरान यदि कोई आवश्यक पक्षकार, पक्षकार के रूप में संयोजित करने से वंचित रह जावे तो क्या उक्त प्रकार से एकतरफा चल रही वाद की कार्यवाही के दौरान उस आवश्यक पक्षकार को बहस अन्तिम के प्रक्रम पर पक्षकार के रूप में जोड़ा जा सकता है और यदि जोड़ा जा सकता है तो उस वंचित पक्षकार की ओर से आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. का प्रार्थना पत्र पेश करवाना आवश्यक है या मुझ वादी द्वारा उस आवश्यक पक्षकार को पक्षकार के रूप में संयोजित करने के लिए आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. का प्रार्थना पत्र पेश किया जा सकता है या उस वंचित पक्षकार को पक्षकार के रूप में जोड़ने के लिए मुझ वादी द्वारा आदेश 6 नियम 17 सी. पी. सी. के तहत वादपत्र में संसोधन करवाया जा सकता है और क्या उक्त संसोधन प्रार्थना पत्र की सूचना देने हेतू न्यायालय द्वारा उस वंचित पक्षकार को एवं सभी प्रतिवादीगण को तलब किया जायेगा या उसकी सुनवाई एकतरफा रूप से कर ली जावेगी। कृपया इस सम्बन्ध में उचित सलाह देने की कृपा करें।

समाधान-

justiceदि उक्त कृषि भूमि आप के पिता को उत्तराधिकार में 16 जून 1956 के बाद प्राप्त हुई है तो आप का वाद सही है। लेकिन यदि वह आप के पिता को इस के पूर्व उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है तो उस में 16 जून 1956 तक जन्म लिए हुए आप के पिता के सभी पुरुष उत्तराधिकारियों को भी जन्म से सहदायिक अधिकार प्राप्त हुआ है। तब आप के मुकदमे में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती है।  चूंकि आप ने इस संबंध में कोई तथ्य नहीं रखे हैं और कोई प्रश्न नहीं पूछा है इस कारण अधिक कुछ कहना उचित नहीं है।

आप का पहला प्रश्न है कि क्या दो बहिनें अपने संयुक्त हिस्से का हक परित्याग मुझ एक भाई (वादी) को वंचित रखकर दो भाईयों के पक्ष में कर सकती है?  

संयुक्त संपत्ति का बँटवारा न होने पर भी उस में सभी संयुक्त स्वामियों का अपने अपने हिस्से पर अधिकार है।  कृषि भूमि में कोई भी हिस्सेदार उस भूमि में अपना हिस्सा विक्रय या अन्यथा हस्तांतरित कर सकता है।  इस का परिणाम यह होता है कि संयुक्त स्वामित्व में हिस्सेदार का स्थान वह व्यक्ति ले लेता है जिसे हिस्सा हस्तांतरित किया गया है। किसी एक हिस्सेदार द्वारा अपना हिस्सा किसी दूसरे हिस्सेदार को हस्तांतरित कर देना भी एक तरह का हस्तांतरण ही है।  इस तरह कोई भी व्यक्ति संयुक्त संपत्ति का बँटवारा कराए बिना अपना हिस्सा किसी दूसरे हिस्सेदार के पक्ष में हकत्याग विलेख द्वारा हस्तांतरित कर सकता है।

ह हक त्याग वाद के लंबित रहने के दौरान भी किया जा सकता है और वैध है। क्यों कि इस पर किसी तरह की कोई रोक नहीं है।  इस हक त्याग को हकत्याग विलेख निष्पादित होने तथा उस के अनुसार नामांतरण हो जाने की जानकारी मिलते ही संशोधन के माध्यम से न्यायालय के रिकार्ड पर लाया जाना चाहिए था। संशोधन का आवेदन अन्तिम बहस होने के पूर्व न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन ऐसा आवेदन देरी के आधार पर निरस्त भी किया जा सकता है। वैसे आप को संशोधन के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन धारा 144 इस मामले के तथ्यों के आधार पर प्रभावी होना प्रतीत नहीं हो रहा है। क्यों कि यह धारा तभी लागू होगी जब कि किसी डिक्री या आदेश द्वारा कार्यवाही में फेरफार किया गया हो।

कोई भी संशोधन का आवेदन प्रस्तुत होने पर उस की सूचना उस प्रकरण के सभी पक्षकारों को दिया जाना आवश्यक है, उन पक्षकारों को भी जिनके विरुद्ध एकतरफा कार्यवाही किए जाने के आदेश प्रदान किए जा चुके हैं और जो अब प्रकरण में उपस्थित नहीं हो रहे हैं।  इस के लिए आवेदन की प्रति उन्हें नोटिस के साथ प्रेषित की जाएगी और यदि वे उपस्थित होते हैं तो उन्हें सुना जाएगा। वैसे भी जिन प्रतिवादियों के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही का आदेश है वे प्रकरण में किसी भी स्तर पर उपस्थित हो कर आगे होने वाली कार्यवाही में भाग लेने के अधिकारी हैं।

वाद संस्थित करने के दौरान यदि कोई आवश्यक पक्षकार, पक्षकार के रूप में संयोजित करने से वंचित रह जाता है तो उक्त प्रकार से एकतरफा चल रही वाद की कार्यवाही के दौरान उस आवश्यक पक्षकार को बहस अन्तिम के प्रक्रम पर पक्षकार के रूप में जोड़ा जा सकता है।  इस के लिए उस वंचित पक्षकार की ओर से आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. का प्रार्थना पत्र पेश किया जा सकता है। वाद का कोई भी पक्षकार उसे पक्षकार के रूप में संयोजित करने के लिए आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. के अंतर्गत प्रार्थना पत्र पेश कर सकता है।  आप भी उस वंचित पक्षकार को पक्षकार के रूप में जोड़ने के लिए आदेश 6 नियम 17 सी. पी. सी. के तहत वादपत्र में संशोधन हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।  लेकिन संशोधन प्रार्थना पत्र की सूचना सभी प्रतिवादीगण को देना आवश्यक है। हाँ आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. के अंतर्गत प्रार्थना पत्र की सूचना विपक्षी पक्षकारों को देने की आवश्यकता नहीं है उन की अनुपस्थिति में आवेदन की सुनवाई की जा सकती है।

पिताजी के नाम का मकान माँ के नाम कैसे हो? उत्तराधिकार प्रमाण पत्र कैसे बनेगा?

समस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से मनोज स्वरूप शुक्ला ने पूछा है-

मेरे पिता जी का देहांत दिनांक 25.03.2008 को हो गया है।  लखनऊ में पिताजी के नाम पर एक मकान स्थित है,  उसे मैं अपनी माता जी के नाम हस्तान्तरित कराना चाहता हूँ।  इसके लिए मुझे क्‍या करना होगा?   मेरे पिताजी ने कोई वसीयत नहीं लिखी है तथा हम दो भाई तथा दो बहने हैं और सब विवाहित हैं।

त्‍तराधिकार प्रमाण पत्र कैसे बनेगा? उसके लिए मुझे क्‍या करना होगा?

समाधान –

प के पिता जी ने कोई वसीयत नहीं की थी। इस तरह उन की संपत्ति निर्वसीयती है।   इस संपत्ति पर उन के उत्तराधिकारियों का समान अधिकार है।  अब इस संपत्ति के आप, आप की माता जी, आप का भाई और आप की दो बहनें, कुल पाँच हिस्सेदार हैं। यदि शेष चारों हिस्सेदार यह चाहते हैं कि उक्त मकान केवल माता जी की संपत्ति हो जाए तो आप सभी भाई-बहनों को अपना हिस्से पर स्वत्वाधिकार उन के नाम छोड़ना पड़ेगा।  यदि उत्तराधिकार में प्राप्त किसी सम्पत्ति का कोई एक या अधिक हिस्सेदार उसी संपत्ति के किसी अन्य हिस्सेदार के नाम अपना हिस्सा स्थानान्तरित करवा सकते हैं।  इस के लिए वे जो दस्तावेज निष्पादित करते हैं उसे रिलीज डीड या हक त्याग विलेख कहते हैं।

क त्याग विलेख पर स्टाम्प ड्यूटी अत्यन्त कम है और पंजीयन शुल्क भी।  लखनऊ के जिस क्षेत्र में आप के पिताजी के नाम का मकान स्थित है उस क्षेत्र पर क्षेत्राधिकार रखने वाले उप पंजीयक के कार्यालय में इस दस्तावेज का पंजीयन होगा।  उस कार्यालय में जो भी डीड रायटर यह काम कराता होगा,  वह इस दस्तावेज का प्रारूप बना देगा और वही स्टाम्प ड्यूटी और पंजीयन शुल्क की जानकारी भी आप को दे देगा।  यदि कोई वकील आप का परिचित है या जिसे आप जानते हैं वह भी इस काम को करवा सकता है।  इस तरह आप चारों भाई बहन उक्त रीलीज डीड अथवा हक त्याग विलेख निष्पादित कर उस का पंजीयन करवा कर उक्त मकान को अपनी माँ के नाम करवा सकते हैं।  इस से आप की माता जी उक्त मकान की एकल स्वत्वाधिकारी (स्वामिनी) हो जाएंगी।

किसी अचल संपत्ति के लिए उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती।  लेकिन बैंक में जमा राशि, या अन्य कहीं भी पिताजी की कोई सीक्योरिटीज और ऋण होंगे तो उन्हें प्राप्त करने या चुकाने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा।  इस के लिए आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय में आवेदन करना होगा।  उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया दीवानी मुकदमों की तरह है।   इस के लिए आप को किसी वकील की मदद लेनी होगी।  जिन राशियों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करना है उन के मूल्य के आधार पर न्यायालय शुल्क अदा करना होगा जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश हो जाने पर स्टाम्प पेपर के रूप में न्यायालय में जमा कराना होगा।  इन्ही स्टाम्प पेपर पर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र टाइप किया जा कर जारी किया जाएगा।  उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी यहाँ क्लिक कर के जानी जा सकती है।

बहू से मकान का कब्जा लेने के लिए कब्जे का दीवानी वाद संस्थित करें

समस्या-

मेरी उम्र 75 साल है। मेरे पति की मौत 30.11.2008 में हो गई है। मेरा एक लड़का और एक लड़की है। दोनों की शादी हो चुकी है। लड़के की शादी 17 साल पहले हुई थी, उसके दो बेटे हैं। मेरे पति ने कुछ पैसे अर्जित कर यहाँ रोहतक में एक मकान बनाया था।  हम लोगो का गाँव उ० प्र० में है।  मेरे पति रोहतक में मंदिर में पुजारी थे।  हम सब लोग अभी तक उसी मकान में रह रहे हैं। मेरे पति ने कोई वसीयत नहीं की थी।  मेरे पति की मौत के बाद मैं ने अदालत से रजिस्टर्ड डिग्री का केस फाइल कर के मकान की रजिस्टर्ड डिक्री मेरे नाम करवा ली है।  जिसमें मेरे लड़का और लड़की ने अदालत में जाकर मकान मेरे नाम करने के बयान भी दिए हैं। लेकिन अब मेरी बहू और बेटे के बीच कई सालों से झगडा चल रहा है और दोनों ने एक दूसरे पर कोर्ट केस कर रखे हैं। मेरा लड़का करीब चार सालों से मेरे घर में नहीं रह रहा है। लेकिन बहू और बच्चे अभी भी मकान में ही रह रहे हैं। मुझे मेरी बहू शुरु से ही नहीं चाहती है। अब तो उसने मेरा जीना ही दुश्वार कर दिया है। बात बात पर मुझे गाली देती है, मारती पीटती है और मुझे कहती है कि मेरे घर से निकल जा।  इस सभी से तंग आकर मैंने अपने बेटा और बहू को अपनी चल अचल सम्पत्ति से बेदखल कर दिया है।  लेकिन वो लोग मेरे ही घर में रहकर मुझे ही मारते पीटते हैं और बहू कहती है कि मकान पर मेरा हक़ है। तू यहाँ से निकल जा। इसलिए मैं आपसे जानना चाहती हूँ कि इस पर कानून क्या है? क्यों कि मेरी जिन्दगी अब नरक बन चुकी है। क्या कानून में उन लोगों का कोई हिस्सा बनता है या नहीं? जबकि ये मेरी पूर्वजों की जायदाद नहीं है। पूर्वजों की जायदाद गाँव में है।

-श्रीमती राधा, रोहतक, हरियाणा

समाधान-

क्त मकान जो आप के पति ने बनवाया था और आप के पति की संपत्ति था। आप के पति ने कोई वसीयत नहीं की थी, इस कारण से आप के पति के देहान्त के साथ ही उक्त मकान पर आप का, आप के पुत्र और पुत्री का संयुक्त स्वामित्व स्थापित हो गया था। लेकिन आप के कथनानुसार आप के पुत्र-पुत्री ने अदालत जा कर मकान आप के नाम करवाया है। आप उसे स्पष्ट नहीं कर पा रही हैं। किसी भी पारिवारिक संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदार व्यक्ति अपना हिस्सा किसी अन्य हिस्सेदार के पक्ष में त्याग सकता है। इस के लिए उप रजिस्ट्रार के कार्यालय में हक-त्याग विलेख पंजीकृत कराना होता है। आप के कथनों से लगता है कि आप के पुत्र-पुत्री ने वही विलेख आप के पक्ष में निष्पादित कर उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवाया है।

दि आप के पुत्र-पुत्री ने उक्त विलेख पंजीकृत करवाया है तो फिर रोहतक का मकान आप  की निजि संपत्ति है। इस पर किसी भी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। आप चाहें तो इस मकान से अपने बहू को उस के बच्चों सहित बेदखल कर सकती हैं। क्यों कि आप की बहू और उस के बच्चे इस मकान में आप के पति के समय से निवास कर रहे हैं, इस कारण से वे एक प्रकार से एक लायसेंस के माध्यम से उस में निवास कर रहे हैं। उन्हें आप के मकान से बेदखल करने के लिए आप को लायसेंस समाप्त करने की घोषणा कर के उन के विरुद्ध कब्जा प्राप्त करने का दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। आप एक विधिक नोटिस प्रेषित कर के उन्हें लायसेंस समाप्त करने की सूचना दे सकती हैं और उस के बाद बहू के विरुद्ध बेदखली का वाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस वाद को प्रस्तुत करने के लिेए आप को न्यायालय शुल्क देनी पडे़गी जो कि मकान के उस भाग की कीमत के आधार पर तय होगी जिस भाग में आप की बहू निवास करती है। यह कुछ अधिक हो सकती है। इस कार्य को करने के लिए आप को रोहतक में किसी विश्वसनीय वकील से संपर्क करना होगा।

र्तमान में आप की बहू और उस की संताने आप के साथ ठीक व्यवहार नहीं कर रहे हैं और मार-पीट करते हैं, झगड़ा करते हैं। आप को इस के लिए महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आवेदन करना होगा। इस आवेदन पर मजिस्ट्रेट आप की बहू और उस की संतानों को बुला कर आदेश देगा कि वे आप को तंग न करें, वह यह भी आदेश दे सकता है कि वे मकान के आप के वाले भाग में व दोनों के उपयोग वाले भाग में प्रवेश न करें। मजिस्ट्रेट द्वारा यह आदेश पारित कर देने के बाद यदि आप की बहू और उस की संतानें यदि आदेश का उल्लंघन करते हैं तो आप पुनः न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर न्यायालय के आदेश के उल्लंघन की सूचना दे सकती हैं। इस पर न्यायालय आप की बहू को तथा उक्त आदेश का उल्लंघन करने वाले को कारावास और जुर्माने के दंड से दंडित कर सकती है।

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