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एक वर्ष की लगातार सेवा पूर्ण किए बिना कानून की कोई सुरक्षा मजदूर को नहीं।

समस्या-

सुनील पवार ने वापी, वलसाड़ से गुजरात राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं वैलसपन कम्पनी में 6 माह से काम कर रहा हूं । फाईनल चैकर का काम कर्ता था । अचानक ही मुझे HR बालो ने आफिस में बुलाकर कहा कि हमारे पास कोई काम नहीं है । आप अपना राजिनामा लिख दो। और कल से कम्पनी मत आना । मैने कारण पुछा तो गाली देने लगे । पिछले कुछ दिनों से ये लोग हमसे जबरदस्ती ओवर टाइम्स काम करने के लिए रोक रहे थे और मना कर दिया तो कम्पनी से निकाल देने की बात कहते थे । अगर काम नहीं है तो ओवर टाईम्स कैसे करा रहे हैं । और पुरा दिन जमकर काम कराया जाता है । थोड़ी सी भी गलती हुई तो बहुत गाली दी जाती है । बताईये अब क्या करें ।

समाधान-

प किसी कंपनी में काम कर रहे हों। अब आप को समझ लेना चाहिए कि जब तक आप किसी कंपनी में एक वर्ष की लगातार सेवा पूरी नहीं कर लेते हैं तब तक कानून आप को किसी तरह की कोई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता। एक वर्ष की लगातार सेवा का अर्थ है कि आप ने नौकरी लगने से एक साल पूरा करने की अवधि में 240 दिन काम कर लिया हो। उस काम करने का सबूत भी आप के पास होना चाहिए। आप का नियुक्ति पत्र हो, वह न हो तो उपस्थिति कार्ड हो, वेतन भुगतान का कोई सबूत हो, परिचय पत्र आदि हों।

इतना होने पर भी यदि आप किसी राज्य के श्रम विभाग में जाएंगे तो आप को हतोत्साहित किया जाएगा। भ्रष्टाचार भले ही जनता के लिए समाप्त कर दिया गया हो पर कंपनी के मालिकों के लिए वह ईश्वर की पूजा की तरह है। इस विभाग के अधिकांश अफसर मालिकों की भाषा ही बोलते दिखाई देंगे। विभाग की मर्जी के बिना आप अदालत में अपनी अर्जी नहीं दे सकते। आप को क्या परेशानी है, प्रधानमंत्री जी ने कल घोषणा कर ही दी है कि भारत में बेरोजगारी समाप्त हो गयी है। कुछ लोग दलाल थे उन की दलाली खत्म की है तो वे ही बेरोजगारी का हल्ला मचा रहे हैं। वैसी स्थिति में आप को तुरंत ही कहीं न कहीं अच्छा काम मिल ही जाएगा।

वैसे यदि आप के पास छ माह काम करने का सबूत हो और आप से जूनियर अर्थात आप को नौकरी पर रखने के बाद किसी अन्य मजदूर को नौकरी पर रखा गया कर्मचारी आप को नौकरी से हटाने के समय काम कर रहा हो और आप ये अदालत में साबित कर सकते हों तो आप तुरन्त श्रम विभाग में शिकायत करें। शिकायत की एक प्रति पर प्राप्ति के हस्ताक्षर विभाग के प्राप्ति लिपिक से करवा कर मुहर लगा कर रखें। 45 दिन में विभाग द्वारा कोई समझौता नहीं करवाने पर आप विभाग से 45 दिनों में समझौता न होने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर श्रम न्यायालय में सीधे अपना विवाद प्रस्तुत करें। इस मामले में आप अपने उद्योग की श्रमिकों की किसी यूनियन या किसी स्थानीय वकील जो श्रम न्यायालय के मामले देखता है उस की मदद ले सकते हैं।

बीमारी से लौटने पर ड्यूटी न लेना अवैधानिक छँटनी है, तुरन्त श्रम विभाग को शिकायत प्रस्तुत करें।

समस्या-

राहुल ने ट्रांजिट कैंप रुद्रपुर (उत्तराखंड) से समस्या भेजी है कि-

मैं रूद्रपुर में दिनांक 01-06-2015 से एक निजी आटो पार्ट्स कंपनी में पे रोल पर डिप्लोमा मैकेनिकल इंजिनियर की हैसियत से कार्यरत था। लेकिन तबीयत खराब होने की वजह से मैं पूरा महीने (जनवरी 2017) अनुपस्थित रहा। मैंने अपने सुपरवाइजरों को फोन द्वारा सूचित किया तो उन्होंने कोई दिक्कत न होने की बात कही। परन्तु मेरे मेडिकल लेकर वापस आने के बाद एचआर विभाग द्वारा यह कह कर कि तुम्हारा नाम कट गया है। एक महीने बाद रीजोइनिंग करानी पड़ेगी। धोखे से कैजुअल ट्रेनिंग में डाल दिया है और सैलरी के नाम पर छह महीने से स्टाईपेंड दे रही है। अब कम्पनी बार बार कहने पर भी रीजोइनिंग नही करा रही है। अब एक्जिट क्लियरिंग फार्म में रिजाइन दिखा कर साइन करने के लिये दबाव बना रही है, ऐसा न करने पर कम्पनी नो एंट्री लगाने की धमकी दे रही है। कृपा करके मुझे बतायें कि क्या मैं स्थानीय श्रम न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकता हूं? कम्पनी ने एक साल पूरे होने पर मुझे इंक्रीमेंट दे रखा है।

समाधान-

आप 01.06.2015 से पे-रोल पर डिप्लोमा मैकेनिकल इंजिनियर की हैसियत से नियोजित थे। आप का काम जिस तरह का है आप एक श्रमिक हैं। दिसम्बर 2016 तक आप ने काम किया, इस तरह आप एक वर्ष सात माह काम कर चुके थे। आप इन्क्रीमेंट भी प्राप्त कर चुके थे। इस तरह आप स्थाई कर्मचारी हो चुके थे। इस के बाद आप बीमारी के कारण उपस्थित नहीं हो सके और फोन पर सुपरवाइजरों को सूचित किया। फिर आप फरवरी में ड्यूटी पर उपस्थित हुए। लेकिन आप को ड्यूटी पर नहीं लिया गया, बल्कि कहा गया कि आप का नाम पे-रोल से कट गया है। इस तरह आप की सेवा समाप्त हो गयी। पे रोल से नाम काट देने को सुप्रीम कोर्ट ने कई मुकदमों में छंटनी माना है। इस तरह आप की यह सेवा समाप्ति आप की छंटनी है। इस सेवा समाप्ति के पहले आप को एक माह का नोटिस दिया जाना चाहिए था या उस की एवज में एक माह का वेतन सेवा समाप्ति के दिन दिया जाना चाहिए था। इस के साथ ही छंटनी का मुआवजा भी दिया जाना चाहिए था। इस छँटनी के पहले नियोजक को एक वरिष्ठता सूची भी प्रकाशित करनी चाहिए थी। यह भी कि छंटनी केवल सब से नए कर्मचारी की की जा सकती है। किसी सीनियर की नहीं।

अब छंटनी के इन मानदंडों पर आप की छंटनी को परखेंगे तो वह अवैधानिक है। आप इस के विरुद्ध श्रम विभाग में शिकायत कर सकते हैं। शिकायत प्रस्तुत करने की रसीद शिकायत की दूसरी प्रति पर प्राप्त कर अपने पास अवश्य रखें जिस पर प्राप्त करने की तिथि और प्राप्त करने वाले कर्मचारी के हस्ताक्षर व विभाग की सील जरूर लगी हो। विभाग उस में समझौते के लिए प्रयास करेगा या फिर नहीं करेगा। दोनों ही स्थितियों में यदि 45 दिन में कोई परिणाम नहीं मिलता है तो आप श्रम विभाग से शिकायत प्रस्तुत होने के 45 दिन पूरे हो जाने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर प्राप्त कर लें। तब आप सीधे श्रम न्यायालय के समक्ष अपना अवैधानिक छंटनी का मुकदमा पेश कर सकते हैं। इस मुकदमे में आपकी जीत होगी। अदालत से आप को नौकरी पर वापस लेने, सेवा की निरन्तरता बनाए रखने और पिछला पूरा वेतन या उस का कोई अंश दिए जाने का अधिनिर्णय पारित किया जाएगा।

कंपनी भी जानती है कि आप मुकदमा कर सकते हैं और कंपनी को उस में नुकसान उठाना पड़ेगा। पर वे आप की अनभिज्ञता और मजबूरी का लाभ उठा रहे हैं। आप को किसी रिजाइन या त्याग पत्र पर अपने हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए। वैसे भी कंपनियों की नौकरियों का कोई भरोसा तो है नहीं। इस कारण आप को तुरन्त श्रम विभाग में शिकायत करें। किसी स्थानीय वकील से मदद लें। आप नौजवान हैं, डिप्लोमा इंजिनियर हैं, आप को कहीं भी काम मिल जाएगा। घबराएँ नहीं और अपने अधिकारों के लिए लड़ें।

सेवा प्रदाता के विरुद्ध सेवा समाप्ति का विवाद श्रम विभाग में उठाएँ।

THE_INDUSTRIAL_DISPUTES_ACTसमस्या-

पंकज कुमार ने पूसा, समस्तीपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार के एक विभाग में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर संविदा के रूप में जनवरी 2014 से काम करना शुरू किया था। विश्वविद्यालय मुझे सर्विस प्रदाता द्वारा वेतन देता था जिसका नाम VANISYSTEM P. Ltd, 16 Vidhan Sabha Marg above Andhra Bank, Lucknow (U.P.) है। जनवरी से अक्टूबर 2014 तक मेरा वेतन मिला था. उसके बाद नवंबर का वेतन विभाग द्वारा 13 दिसंबर को VANI SYSTEM के खाता पर RTGS के द्वारा भेज दिया गया। (विभाग मेरा सैलरी कंपनी को RTGS के द्वारा भेजता उसके बाद कंपनी मेरे बैंक खाता पर भेजता था) 16 दिसंबर को मैंने फ़ोन से वेतन भेजने की बात कंपनी से की तो कम्पनी का अकाउंटेंट मीनू यादव मुझे फ़ोन पर कहा की ये तुम्हारे बाप का कंपनी नहीं जो तुम कहो और मैं भेज दूँ। मैंने उनसे कहा की मैं विश्वविद्यालय के कुलपति से शिकायत करूँगा तो उन्हें इस बात का बुरा लगा। उन्होंने मुझे मेल किया कि तुम्हारा टर्मिनेशन लेटर भेज रही हूँ तुम्हारे ऑफिसर को। मैंने उनको मेल के द्वारा कहा कि अगर आप की मर्जी यही है तो मैं काम छोड़ दूंगा लेकिन आप मेरा वेतन तो दे दीजिये। लेकिन उन्होंने मेरा वेतन नहीं दिया और काम से भी हटा दिया। अब किसी लड़की को उस जगह पर रखा जा रहा है। मेरे साथ गेम खेला गया है। कंपनी बहाना बना रही है कि इस ने मुझे गाली दिया इसलिए इसको हटाया। जब कि मैंने कोई गाली नहीं दी। मुझे जो अनुबंध पत्र दिया गया था जिस में लिखा हुआ है की विभाग से शिकायत मिलने पर बिना सूचना के हटा दिया जाएग़I परन्तु विभाग से कोई शिकायत नहीं गया है। मैं बहुत गरीब और बाल बच्चेदार हूँ मेरी पारिवारिक स्थिति काफी ख़राब है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ जिस से मुझे वही काम भी मिल जाये और वेतन भी मिल जाये। मैं बहुत तनाव में हूँ और लगता है कि गरीबी से तंग आकर मैं कोई गलत काम ना कर बैठूँ। कृपया मेरी मदद करें।

समाधान-

प को यह साफ समझ लेना चाहिए कि आप किसी भी तरह से विश्वविद्यालय के कर्मचारी नहीं थे। विश्वविद्यालय तो सेवा प्रदाता से सेवाएँ प्राप्त करता है जिस के लिए वह सेवा प्रदाता को उन की आपसी संविदा के आधार पर भुगतान करता है। आप का नियोजक सेवा प्रदाता था, वह आप को वेतन का भुगतान करता था तथा आप के नियोजक की ओर से प्रदान की गई सेवाओँ के अन्तर्गत आप विश्वविद्यालय में काम करते थे। आप का विश्वविद्यालय से और कोई लेना देना नहीं था।

प गरीब हैं इस से किसी को कोई लेना देना नहीं है। विश्वविद्यालय यदि खुद कर्मचारी रखता है तो उन्हें वेतनमान में वेतन देना होता है, ऐसे कर्मचारियों को संविधान के अन्तर्गत सुरक्षा प्राप्त होती है तथा अनेक सुविधाएँ देनी होती हैं जो विश्वविद्यालय को बहुत महंगी पड़ती हैं। इतना बजट सरकार उन्हें उपलब्ध नहीं कराती, न ही स्थाई पद उपलब्ध कराती है। वैसी स्थिति में किसी सेवा प्रदाता से इस तरह सेवाएँ प्राप्त करना उन्हें बहुत सस्ता पड़ता है।

प सेवा प्रदाता के कर्मचारी थे। विश्वविद्यालय और आप के सेवा प्रदाता दोनों के कार्य उद्योग के रूप में परिभाषित हैं। इस कारण आप के सेवा प्रदाता को आप को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ की पालना में सेवा से पृथक करने के पूर्व नोटिस या नोटिस वेतन देना चाहिए था तथा मुआवजा भी देना चाहिए था। आप से कनिष्ट कर्मचारी भी आप के सेवा प्रदाता के यहाँ काम कर रहे होंगे। उन्हें सेवा में रखते हुए आप को सेवा से पृथक किया गया है इस तरह धारा 25 जी की भी पालना नहीं हुई है। आप को हटा कर एक नए कर्मचारी को नियोजन दे दिया गया है इस तरह धारा 25 एच की पालना भी नहीं हुई है।

स तरह आप की सेवा समाप्ति आप की छंटनी है जो धारा 25 एफ व जी की अनुपालना के अभाव में अवैध है। साधारणतया आप पिछले पूरे वेतन सहित पुनः सेवा प्रदाता की सेवा में लिए जाने के अधिकारी हैं। 25 एच की पालना न करने के कारण भी आप सेवा में लिए जाने के अधिकारी हैं। इस के लिए आप को स्थानीय श्रम विभाग में अपना विवाद उठाना चाहिए। श्रम विभाग के समझौता अधिकारी आप और आप के सेवा प्रदाता के बीच तुरन्त समझौता वार्ता आरंभ कराएंगे और आप को पुनः सेवा में रखवाने का प्रयास करेंगे। समझौता वार्ता का 45 दिन में कोई परिणाम न निकलने अथवा असफल रहने पर आप सीधे श्रम न्यायालय में अपना विवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के साथ ही बकाया वेतन के लिए भी आप को वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत अपना दावा प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

स तरह के विवादों का निर्णय होने में कई वर्ष लग जाते हैं क्यों कि हमारे यहाँ श्रम न्यायालय जरूरत से बहुत कम हैं। श्रम न्यायालय के निर्णय के बाद भी पुनः नौकरी प्राप्त करना इतना आसान नहीं होता। इस कारण आप को अपना जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। आप अपना विवाद उठाइए और अवश्य लड़िये। एक नौकरी चले जाने से जीवन हार जाना ठीक बात नहीं है। जीवन सदैव अनमोल है, चाहे कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो। कभी कभी ऐसा भी होता है कि ऐसी टटपूंजिया नौकरी छूटने पर प्रयास करने पर व्यक्ति अच्छे अवसर प्राप्त कर लेता है या किसी अच्छे धंधे या प्रोफेशन में चला जाता है और कुछ ही वर्षों में यह टटपूंजिया नौकरी बेकार लगने लगती है।

संविदा के अवसान से कर्मकार की सेवा समाप्ति, जो छँटनी नहीं है

छँटनी की परिभाषा में हम ने पाया था कि नियोजक द्वारा किसी भी कर्मकार की सेवा समाप्ति चाहे वह किसी भी कारण से क्यों न की गई हो छँटनी है।  किसी भी कर्मकार को छँटनी किए जाने के लिए नियोजक को क्या क्या करना आज्ञात्मक है यह औद्योगिक विवाद अधिनियम के  अध्याय 5-क तथा अध्याय 5-ख में निर्देशित किया गया है।  लेकिन धारा 2 (ओओ) में छँटनी के अपवाद प्रदर्शित किये गये हैं। इन में से तीन की हम पहले चर्चा कर चुके हैं। चौथा अपवाद उपधारा 2 (ओओ) (बीबी)  निम्न प्रकार है —

    [(bb) Termination of the service of the workman as a result of the non-renewal of the contract of employment between the employer and the workman concerned on its expiry or of such contract being terminated under a stipulation in that behalf contained therein;

अर्थात् –

(खख) किसी कर्मकार की सेवा संविदा का अवसान हो जाने पर नियोजक और कर्मकार के मध्य सेवा संविदा का नवीनीकरण न होने के फलस्वरुप या संविदा में अंकित किसी शर्त के अतर्गत सेवा संविदा की समाप्ति से हुई  सेवा समाप्ति;

    इस अपवाद के दो भाग हैं,

1. जब सेवा संविदा में संविदा की अवधि निश्चित कर दी गई हो तो उस अवधि के समाप्त हो जाने से सेवा संविदा का अवसान हो जाने पर सेवा संविदा का नवीनीकरण न किया गया हो तब होने वाली कर्मकार की सेवा समाप्ति; तथा

2. सेवा संविदा में अंकित किसी शर्त के कारण सेवा संविदा का अवसान हो जाने से हुई सेवा समाप्ति, को भी छँटनी की परिभाषा के बाहर रखा गया है।

मूल अधिनियम में यह अपवाद नहीं था। इसे 1984 में औद्योगिक विवाद अधिनियम में हुए 49वे संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया। इस संशोधन ने संपूर्ण औद्योगिक नियोजन के स्वरूप को ही बदल डाला। अब नया नियोजन देने के समय नियोजक अक्सर यह शर्त रखने लगे कि उस की नियुक्ति एक निश्चित अवधि के लिए की जा रही है।  यदि उस अवधि के उपरान्त नियोजक कर्मकार की सेवा संविदा का नवीनीकरण नहीं करता है तो कर्मकार की सेवा समाप्त हो जाती है जिसे छँटनी नहीं माना और नियोजक को किसी तरह की आज्ञापक प्रक्रिया को अपनाने की आवश्यकता समाप्त हो गई। इस प्रावधान का सर्वाधिक लाभ स्वयं सरकारों ने उठाया।  वे निश्चित अवधि के लिए ही सेवा संविदा करने लगे और एक नए प्रकार का कर्मकार अस्तित्व आ गया जिसे आज कल संविदाकर्मी कहा जाता है।

सी तरह नियुक्ति पत्र, प्रमाणित या संस्थान पर प्रभावी मॉडल स्थाई आदेशों या सेवा नियमों में किसी शर्त के होने पर उस शर्त के अनुसार संविदा का अवसान हो जाने से होने वाली सेवा समाप्ति को भी छँटनी की परिभाषा के बाहर कर दिया गया और इस तरह की सेवा समाप्ति के लिेए भी छँटनी के लिए निर्धारित आज्ञापक प्रक्रिया के अपनाने की आवश्यकता नहीं रही।

सेवा संविदा में निश्चित की गई उम्र पर सेवा समाप्ति सेवा निवृत्ति है, छँटनी नहीं

द्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) में परिभाषित “छँटनी” को किसी भी कारण से नियोजक द्वारा की गई कर्मकार की सेवा समाप्ति कहा गया है, लेकिन साथ ही उस के कुछ अपवाद भी बताए गए हैं। स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति उस का पहला अपवाद था।  छँटनी का दूसरा अपवाद निम्न प्रकार है-

 (b) Retirement of the workman on reaching the age of Superannuation if the contract of employment between the employer and the workman concerned contains a stipulation in that behalf.

(ख) यदि कर्मकार और नियोजक के मध्य हुई सेवा संविदा में उपबंध हो तो एक निश्चित उम्र पूर्ण कर लेने के कारण हुई सेवा निवृत्ति।

क्त अपवाद से स्पष्ट है कि यदि कर्मकार और नियोजक के बीच जो भी सेवा संविदा है उस में कर्मकार के एक निश्चित आयु का हो जाने पर उस की सेवा निवृत्ति की शर्त का होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि इस शर्त में उम्र निश्चित की गई हो।

र्मकार और नियोजक के बीच की सेवा संविदा वह संविदा है जिसे कर्मकार द्वारा स्वीकार किया गया हो।  बम्बई उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एक मामले में यह निर्णय दिया कि एक तो कथित सेवा संविदा एक तो सेवा संविदा ही नहीं है। दूसरे उस कथित संविदा में सेवा निवृत्ति की कोई उम्र निश्चित ही नहीं की गई है।

दि किसी सेवा संविदा में सेवा निवृत्ति की कोई उम्र निश्चित नहीं की गई हो तो उस संस्थान पर प्रभावी प्रमाणित स्थाई आदेशों में निश्चित की गई सेवा निवृत्ति की उम्र को सेवा निवृत्ति माना जाएगा, क्योंकि स्थाई आदेशों को वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है। यदि किसी संस्थान में स्थाई आदेश प्रमाणित न हों तो उस संस्थान में प्रभावी मॉडल स्थाई आदेशों में निश्चित की गई सेवानिवृत्ति की उम्र को उस संस्थान कर्मकारों की सेवा निवृत्ति की उम्र माना जाएगा।

 लेकिन यदि कोई सेवा संविदा न हो और कोई स्थाई आदेश भी प्रभावी न हों तो किसी निश्चित उम्र पर कर्मकार की सेवा समाप्ति को सेवा निवृत्ति नहीं माना जा सकता। उसे छँटनी ही माना जाएगा और उस के लिए छँटनी के लिए आवश्यक प्रक्रिया का अनुसरण नियोजक को करना ही होगा।

कर्मकार की स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति क्या है?

तीसरा खंबा की पोस्ट औद्योगिक कर्मकार को नौकरी से हटाये जाने के तरीके में हमने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) में परिभाषित “छँटनी” शब्द का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया था कि किस किस तरह की सेवा समाप्ति को छँटनी नहीं माना जा सकता है।  छँटनी की परिभाषा में स्पष्ट कहा गया है कि नियोजक द्वारा कर्मकार की किसी भी कारण से की गई सेवा समाप्ति छँटनी है यदि वह धारा 2 -(ओओ)  में वर्णित अपवादों में नहीं आती है।  कर्मकार की स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति उस का पहला अपवाद है।

हाँ स्वैच्छिक शब्द का प्रयोग किया गया है, जिस से स्पष्ट है कि यहाँ स्वयं कर्मकार की इच्छा से हुई सेवा समाप्ति का उल्लेख किया जा रहा है। कोई व्यक्ति किसी नियोजक के यहाँ नियोजन प्राप्त कर लेता है उस का यह अर्थ नहीं है कि वह सदैव उस के यहाँ नियोजन में रहेगा। वह जब चाहे स्वैच्छा से अपनी सेवा त्याग सकता है। लेकिन इस संबंध में स्थाई आदेशों तथा नियुक्ति पत्र में एक शर्त सदैव रहती है कि यदि कर्मकार स्वैच्छा से सेवा त्याग करना चाहता है तो उसे एक माह या अधिक समय पूर्व इस की सूचना नियोजक को देनी होगी। अनेक नियुक्ति पत्रों में यह भी शर्त होती है कि यदि कर्मकार इस तरह का नोटिस नहीं देता है तो उसे नोटिस की निश्चित अवधि के वेतन के बराबर राशि नियोजक को अदा करनी होगी। जिसे नियोजक कर्मकार को देय परिलाभों में से भी काट सकता है।

दि कोई कर्मकार त्याग पत्र देता है और उस में यह शर्त अंकित करता है कि वह निश्चित अवधि के उपरान्त सेवा त्याग देगा यदि उसे उस तिथि को उस के बकाया परिलाभ और ग्रेच्युटी दे दी जाए। यदि नियोजक उक्त त्याग पत्र का कोई उत्तर नहीं देता है या जिन परिलाभों को देने का उल्लेख उस ने अपने त्याग पत्र में किया है उन्हें या उन में से किसी को देने से मना कर देता है जिस के कारण कर्मकार निश्चित तिथि को नौकरी छोड़ने से मना करता है। बाद में नियोजक यह कहता है कि उस का त्याग पत्र स्वीकार कर लिया गया है तो इसे स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं कहा जा सकता। इस तरह की सेवा समाप्ति नियोजक द्वारा की गई छँटनी ही कही जाएगी।  इसे कामगार चुनौती दे सकता है।

दि कोई कर्मकार एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है  तो नियोजक यह मान कर कि कर्मकार स्वैच्छा से नौकरी छोड़ गया है उस का नाम मस्टर रोल से हटा सकता है। यदि कोई कर्मकार उस की इच्छा के विपरीत किसी कारण से अपने कर्तव्य पर अनुपस्थित रहता है और उस का नाम मस्टर रोल से नियोजक द्वारा हटा दिया जाने के बाद वह कर्तव्य पर उपस्थित होता है तो नियोजक को उसे सेवा पर लेना चाहिए। क्यों कि वह कभी भी नौकरी छोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन यदि नियोजक उसे कर्तव्य पर वापस नहीं लेता है तो यह नियोजक द्वारा की गई छँटनी मानी जाएगी जो कि अवैध होगी।

स्तुतः स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पूर्णतः कर्मकार द्वारा किया गया कृत्य है। यदि इस तरह की सेवा समाप्ति में किसी भी तरह से कर्मकार की इच्छा का लोप होता है तो वह स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं होगी। दबाव दे कर लिया गए त्याग पत्र से सेवा समाप्ति स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं है।

औद्योगिक कर्मकार को नौकरी से हटाये जाने के तरीके

समस्या-

किसी स्थाई या स्थाई श्रमिक को उस का नियोजक (कंपनी) किस क़ानून का उपयोग करके नौकरी से निकाल सकता है,  या किस अपराध में उसे सेवाच्युति का दंड दे सकता है? मुझे इस से सम्बन्धितप्रमुख श्रमिक कानूनों की जानकारी दें जिस से मैं यह जान सकूँ कि श्रमिकों के हित में क्या क़ानूनी प्रावधान हैं?

-हीरा लाल यादव, इंदौर, मध्य प्रदेश

समाधान-

हाँ भी किसी उद्योग में श्रमिक नियोजित किए जाते हैं वहाँ औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 प्रभावी होता है जो श्रमिक और नियोजक के संबंधों को शासित करता है। कोई भी व्यक्ति जो श्रम विवादों में रुचि रखता है और श्रमिकों के हित में काम करना चाहता है उसे सब से पहले इस अधिनियम का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। इस अधिनियम में बारह अध्याय और पाँच अनुसूचियाँ हैं।  इन में से अध्याय 5-ए तथा 5-बी श्रमिकों का नियोजन समाप्त करने के विषय में हैं। इस के अतिरिक्त अध्याय 1 की धारा 2 (ओओ) का अध्ययन करना आवश्यक है जिस में छँटनी शब्द को परिभाषित किया गया है। हम सब से पहले इसी छँटनी शब्द की परिभाषा पर विचार करते हैं।

छँटनी की परिभाषा अधिनियम में निम्न प्रकार दी गई है-

[(oo) “Retrenchment” means the termination by the employer of the service of a workman for any reason whatsoever, otherwise than as a punishment inflicted by way of disciplinary action but does not include-

 (a) Voluntary retirement of the workman; or

 (b) Retirement of the workman on reaching the age of Superannuation if the contract of employment between the employer and the workman concerned contains a stipulation in that behalf; or

 [(bb) Termination of the service of the workman as a result of the non-renewal of the contract of employment between the employer and the workman concerned on its expiry or of such contract being terminated under a stipulation in that behalf contained therein; or]

 (c) Termination of the service of a workman on the ground of continued ill-health;

इस परिभाषा में कहा गया है कि-

(ओओ) ‘छँटनी’ का अर्थ नियोजक द्वारा एक कर्मकार की किसी भी कारण से की गई सेवा समाप्ति है, लेकिन उस में अनुशासनिक कार्यवाही के माध्यम से दंड स्वरूप दी गई सेवा समाप्ति सम्मिलित नहीं है और उस के सिवा निम्न चीजें भी सम्मिलित नहीं हैं-

(क)  कर्मकार द्वारा स्वेच्छा से प्राप्त की गई सेवा निवृत्ति; .या

(ख) यदि कर्मकार और नियोजक के मध्य हुई सेवा संविदा में उपबंध हो तो एक निश्चित उम्र पूर्ण कर लेने के कारण हुई सेवा निवृत्ति; या

(खख) किसी सेवा संविदा की अवधि समाप्त होने पर संविदा के नवीनीकरण न होने या संविदा में अंकित किसी कारण से हुई कर्मचारी की सेवा समाप्ति; या

(ग) लगातार बीमार रहने के कारण की गयी कर्मकार की सेवा समाप्ति। 

स तरह एक अकेले यह परिभाषा बताती है कि किसी उद्योग में नियोजित श्रमिक की सेवाएँ समाप्त करने या नौकरी से निकाले जाने के कितने तरीके हो सकते हैं? ये निम्न प्रकार हैं-

1. यदि कोई कर्मकार स्वयं ही स्वेच्छा से नौकरी छोड़ सकता है अर्थात त्याग-पत्र दे कर अपनी सेवाएँ समाप्त कर सकता है। यह भी हो सकता है कि कोई कर्मकार बिना सूचना दिए नौकरी पर न आए, या फिर अवकाश पर जाए और एक लंबे समय तक नौकरी पर न लौटे, तब भी कुछ परिस्थितियों में यह समझा जा सकता है कि कर्मकार स्वैच्छा से नौकरी छोड़ कर चला गया है। ऐसी सेवा समाप्ति छँटनी नहीं होगी।

2. अक्सर सेवा संविदा में या औद्योगिक संस्थान के स्थाई आदेशों या प्रारूप स्थाईआदेशों में सेवा निवृत्ति की आयु के बारे में उपबंध होता है। इस उपबंध के द्वारा निश्चित की गई आयु प्राप्त कर लेने पर उसे सेवा निवृत्त कर दिया जाता है। ऐसी सेवानिवृत्ति भी छँटनी के बाहर है।

3. प्रत्येक कर्मकार को सेवा आरंभ किए जाने के समय, उसे पद पर स्थाई किए जाने के समय या पदोन्नति होने पर नियुक्ति पत्र दिए जाते हैं। अनेक उद्योगों में ऐसे नियुक्तिपत्र कर्मकार को दिए ही नहीं जाते लेकिन उन पर हस्ताक्षर करवा कर नियोजक अपने पास रख लेते हैं। ये नियुक्ति पत्र अक्सर अंग्रेजी में होते हैं। कर्मकार को पता ही नहीं होता है कि उस से किसी नियुक्तिपत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए हैं। कर्मकार द्वारा हस्ताक्षर युक्त यह नियुक्ति पत्र जो नियोजक के पास होता है वास्तव में सेवा संविदा है। यदि इस संविदा में लिखा हैा कि यह नियुक्ति किसी निश्चित तिथि तक के लिए है या निश्चित अवधि के लिए है या फिर उस में लिखा है कि किसी घटना के घटित होने पर सेवा समाप्त हो जाएगी। वैसी स्थिति में उस निश्चित तिथि या अवधि या घटना के घटित हो जाने पर की गई सेवा समाप्ति भी कर्मकार की सेवा समाप्ति का एक तरीका है। आज कल नियोजक इसी का सर्वाधिक उपयोग कर रहे हैं। वे नियोजन देने के समय ही नियुक्ति पत्र में इस तरह की शर्तों पर कर्मकार के हस्ताक्षर ले लेते हैं और कर्मकार को पता भी नहीं होता कि उस की नियुक्ति किसी निश्चित तिथि या अवधि तक के लिए है या फिर किसी खास घटना के घटित होने पर समाप्त हो जाएगी। उसे तो पता भी तभी लगता है जब उस की सेवा समाप्त कर दी जाती है। इस तरह की सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं है।

4. यदि कोई कर्मकार नियोजन में रहते हुए, सेवा संविदा का उलंघन करने का, स्थाई आदेशों या प्रारूप स्थाई आदेशों या सेवा नियमों में उल्लखित कोई दुराचरण करता है तो उसे आरोप पत्र दे कर, नैसर्गिक न्याय सिद्धान्तों के अनुरूप घरेलू जाँच कर के, जाँच में आरोप सिद्ध हो जाने पर उसे दंडित कर सकता है। यदि यह दंड सेवा च्युति या सेवा समाप्ति का दंड है तो ऐसी सेवाच्युति या सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं होगी।

5. यदि कोई कर्मकार लगातार  लंबें समय तक बीमार रहे और उस कारण से वह लंबे समय के लिए कर्तव्य पर उपस्थित नहीं हो सके। यदि उपस्थित हो जाए तो भी कर्तव्य करने में असमर्थ रहे तो उसे इस लंबी बीमारी के आधार पर सेवा से पृथक किया जा सकता है। ऐसी सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं होगी।

6. यदि उक्त पाँचों तरह से कर्मकार की सेवा समाप्त न कर के किसी अन्य कारण से उस की सेवा समाप्ति की गई है तो वह छंटनी होगी।

स तरह किसी भी औद्योगिक संस्थान में किसी कर्मकार की सेवा समाप्ति के यही छह तरीके हैं। इन में से प्रत्येक रीति के बारे में विस्तार से व्याख्या की जा सकती है। लेकिन वह फिर कभी।

संविदा पर नियुक्त कर्मकारों के कुछ सवाल

तीसरा खंबा की कानूनी सलाह सेवा से अनेक सवाल संविदा नियोजन के बारे में और ऐसे नियोजन में दो वर्ष काम कर लेने पर स्थाई किए जाने के बारे में पूछे गए हैं।  एक पाठक मुकेश मेहरा ने पूछा है कि उन का नरेगा योजना में चयन समिति द्वारा विधि पूर्वक चयन किया जा कर एक वर्ष के लिए अनुबंध करते हुए अनुबंध पर पर नियुक्ति दी गई थी अब उन्हें काम करते हुए दो वर्ष से अधिक समय हो चुका है और क्या वे नियमित होने के हकदार हैं और इस के लिए उन्हें क्या करना होगा।

सी तरह एक अन्य पाठक महेन्द्र सिंह ने पूछा है कि जब उन की दि‍नांक 06/07/2008 को डाटा आपरेटर पद पर संविदा पर नि‍युक्‍ति‍ हुई तब पद योग्‍यता ग्रेजुएट तथा 8000 डि‍प्रेशन कम्‍प्‍युटर गति‍ नि‍र्धारि‍त थी दि‍नांक 08/10/2009 के शासन सचि‍व के आदेशानुसार अब योग्‍यता ग्रेजुएट मय ओ लेवल कम्‍प्‍युटर कोर्स या पीजीडीसीए कर दी गई है उन की  योग्‍यता ग्रेजुएट व एक वर्ष का डाटा आपरेटर अनुभव है क्‍या वे इस पद पर बने रह सकते हैं?
ये सभी लोग ऐसे नियोजनों में हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम में परिभाषित उद्योग की श्रेणी में आते हैं, फलतः ये नियोजन औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 से शासित होते हैं। 1984 में औद्योगिक विवाद अधिनियम में किए गए संशोधनों में छंटनी शब्द की परिभाषा को भी संशोधित कर दिया गया था। उस में कुछ सेवा समाप्तियों को छंटनी शब्द की परिभाषा से बाहर कर दिया था। धारा- 2 (ओओ) (बीबी) में अंकित किया गया था कि कर्मकार की सेवा समाप्ति यदि नियोजक और कर्मकार के मध्य हुई नियोजन  संविदा की समाप्ति पर हो जाए अथवा उस संविदा में अंकित किसी  शर्ते के कारण हो जाए तो ऐसी सेवा समाप्ति को छंटनी नहीं माना जाएगा।
इस संशोधन के पूर्व स्थिति यह थी कि संविदा की अवधि की समाप्ति पर या संविदा में अंकित किसी शर्त के अनुरूप सेवा समाप्त होने पर भी यदि किसी कर्मकार ने एक वर्ष की लगातार सेवा अथवा सेवा समाप्ति के पूर्व के एक वर्ष में 240 दिन वास्तविक काम कर लिया हो तो ऐसी सेवा समाप्ति को छंटनी माना जाता था। चूंकि छंटनी के लिए आवश्यक प्रक्रिया अपनाया जाना आवश्यक था। उस प्रक्रिया में चूक होने पर छंटनी अवैध हो जाती थी और कर्मकार को न्यायालय पुनः सेवा में लेने और बीच की अवधि का पूरा या आंशिक वेतन अदा करने का आदेश देता था। इस संशोधन के होने के उपरांत स्थिति बदल गई और सरकारी और गैर सरकारी नियोजनों में संविदा नियुक्तियों की बाढ़ आ गई। 
ब संविदा पर नियोजन दिए जाने लगे। संविदाएँ एक-एक माह से ले कर एक-दो वर्ष तक की होने लगीं। यहाँ तक कि यह होने लगा कि एक बार संविदा पर नियोजन देने के उपरांत उस संविदा को बार बार संशोधित कर अवधि बढ़ाई जाने लगी। अच्छे कर्मकार इस आशा में कि कभी तो उन की सेवाओं को नियमित किया जाएगा। संविदा नियोजनों पर लगातार कई वर्षों तक काम करने लगे। यहाँ तक कि वे अपने अफसरों की व्यक्तिगत सेवाएँ भी इस कारण से करने लगे कि उस की सिफारिश से ही वे स्थाई हो जाएंगे। जब कि कानूनी स्थिति यह है कि संविदा पर नियोजित किसी भी व्यक्ति की सेवाएं संविदा की अवधि समाप्त होने स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं अथवा सेवा संविदा में स्थित किसी शर्त के कारण समाप्त हो जाती हैं। ऐसी सेवा समाप्तियाँ वैध हैं और उन्हें न्यायालय के समक्ष चुनौती दे कर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। 
हाँ तक इन कर्मकारों को स्थाई किए जाने का प्रश्न है। ऐसा कोई भी कानून या नियम नहीं है कि इन्हें स्थाई किया ही जाए।  यह पूरी तरह से सरकार या नियोजक पर निर्भऱ करता है कि ऐसे कर्मकारों को नियमित किया जाए अथवा नहीं। वे अपने कानूनी अधिकार के रूप में स्थाईकरण की मांग नहीं कर सकते। इसी तरह यदि पिछले वर्षो में कर्मकारों के चयन के लिए कम योग्यता थी और अब योग्यता का आधार अधिक योग्यता कर दिया गया है तो पूर्व में नियोजित कर्मकार की संविदा समाप्त होने पर आवश्यक नहीं कि उस संविदा का नवीनीकरण किया ही जाए। बल्कि यदि नवीनीकरण कर भी दिया गया तो वह तब तक नियम विरुद्ध होगा जब तक कि योग्यता का स्तर बढ़ाने के नियम में यह नहीं लिखा हो कि जो कर्मकार पूर्व में निर्धारित योग्यता के आधार पर चयन कर नियुक्त कर लिए गए हैं उन की संविदा के नवीनीकरण पर यह नियम लागू नहीं होगा। इस तरह कम योग्यता के स्तर के आधार पर नियुक्त संविदा कर्मकार को अपना नियोजन खोना ही पड़ेगा।

नरेगा के फंड पर प्रखंड कार्यालय में दो वर्ष काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर को बिना सूचना अकारण सेवा से हटाना अवैध है

जयन्त कुमार सिन्हा ने पूछा है –

नरेगा के अन्तर्गत नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर ने लगातार 2 वर्षों (अगस्त 2006 से अगस्त 2008) तक प्रखण्ड कार्यालय में काम किया है तथा उसकी उपस्थिति अन्य सरकारी कर्मियों के साथ ही उपस्थिति पंजी में दर्ज हुई है क्या उसे  बिना कोई कारण बताये व पूर्व सूचना दिये कार्य से विमुक्त किया जा सकता है?

 उत्तर –

जयन्त जी,

कम्प्यूटर ऑपरेटर औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (एस) में परिभाषित कार्मिक है।  किसी दुराचरण के आरोप के कारण, सेवा निवृत्ति की आयु होने पर, लगातार बीमारी के कारण,  सेवा संविदा  (नियुक्ति पत्र) की किसी शर्त के कारण या स्वयं कार्मिक द्वारा सेवा त्याग को छोड़ कर नियोजक द्वारा  किसी भी अन्य कारण से किसी भी कार्मिक को सेवा से हटाना  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) के अनुसार उस कार्मिक की छंटनी होती है। 

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-एफ के अनुसार किसी भी ऐसे कार्मिक को जिस ने एक वर्ष की लगातार सेवा पूर्ण कर ली है, अथवा जिस तिथि को उस की छंटनी की जाती है उस तिथि से पूर्व के एक वर्ष में  उस ने 240 दिन काम कर लिया है, और उसे छंटनी किया जाता है तो  छंटनी किए जाने के लिए उस का कारण बताना आवश्यक है।  छंटनी  के लिए कार्मिक को नियोजक द्वारा पूर्व नोटिस दिया जाना आवश्यक है, जो कार्मिक को छंटनी किए जाने की तारीख के एक माह पूर्व मिल जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई  नोटिस नहीं दिया गया हो तो छंटनी के समय कार्मिक को एक माह का वेतन वास्तविक रुप में दिया जाना चाहिए। साथ ही कार्मिक ने जितनी अवधि तक सेवा की है, प्रत्येक वर्ष पर 15 दिन के वेतन के बराबर छंटनी का मुआवजा भी दिया जाना आवश्यक है।  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-जी के अनुसार छंटनी केवल कनिष्ठतम कार्मिकों की ही की जा सकती है।

यदि उक्त प्रक्रिया अपनाए बिना किसी भी कार्मिक को सेवा से पृथक किया जाता है तो वह अवैधानिक होगी।  ऐसी सेवा समाप्ति को कार्मिक स्वयं श्रम विभाग के समझौता (संराधन) अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर चुनौती दे सकता है। 

आप के मामले में आप की उपस्थिति सब कार्मिकों के साथ उपस्थिति पंजी में दर्ज की गई है इस कारण से चाहे आप को नरेगा या किसी और फंड से वेतन चुकाया गया हो आप उस कार्यालय के कार्मिक हैं जहाँ आप ने काम किया है। आप को बिना कोई कारण बताए और औद्योगिक विवाद अधिनियम  की धारा 25-एफ व धारा 25-जी में वर्णित प्रक्रिया जो संक्षेप में ऊपर वर्णित की गई है की पालना किए बिना सेवा से नहीं हटाया जा सकता है। यदि हटा दिया गया है तो वह उचित और वैध नहीं है। ऐसी सेवा समाप्ति पर समझौता अधिकारी के यहाँ शिकायत प्रस्तुत कर औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

न बाला सा'ब, न राज, न सरकार, और न अंतःकरण, कानून के कारण लौटे जेटकर्मी काम पर

जेट कर्मियों को छंटनी के दूसरे दिन ही वापस काम पर बुला लिया गया। एमएनएस के राज की धमकी, या बाला साहेब का हुकुम, न सरकार की मिन्नत और न ही प्रबंधकों का अंतःकरण कोई भी इस का कारण नहीं था। ये सब श्रेय ले कर भुनाने वाले लोग हैं। असली कारण है कानून।

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-एन जो कि 1975 में इस अधिनियम का भाग बनी थी तथा जिसे 1984 में संशोधित किया गया था, यह प्रावधान है कि जिस औद्योगिक प्रतिष्ठान में विगत वर्ष में औसतन सौ कर्मचारी प्रतिदिन सेवा में रहे हैं वहाँ कोई भी कर्मकार सरकार की पूर्व अनुमति के बिना छंटनी नहीं किया जाएगा। इस के लिए छंटनी करने वाले संस्थान को पहले सरकार को छंटनी के लिए आवेदन करना होगा। सरकार छंटनी से प्रभावित होने वाले पक्षकारों को नोटिस दे कर उन की सुनवाई करेगी और छंटनी के कारणों का वास्तविकता और उपयुक्तता को देखेगी और छंटनी करने की अनुमति के आवेदन को स्वीकृत या अस्वीकृत  करेगी। सरकार को यह निर्णय 60 दिनों में करना होगा। 60 दिनों में निर्णय नहीं किए जाने पर छंटनी करने की अनुमति का आवेदन स्वीकृत माना जाएगा।

कोई भी पक्ष जो सरकार के निर्णय से अप्रसन्न हो वह सरकार को आवेदन कर सकता कि मामले को पुनर्विलोकन के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण प्रेषित किया जाए, ऐसे किसी भी आवेदन पर या सरकार स्वयं अपनी इच्छा से भी मामले को पुनर्विलोकन के लिए औद्योगिक न्यायालय को प्रेषित कर सकती है।

बिना अनुमति लिए छंटनी करने पर सभी कर्मचारी वैसे ही सब लाभ प्राप्त करेंगे जैसे उन्हें छंटनी का नोटिस ही नहीं दिया गया था। इस कानून में यह भी प्रावधान है कि कर्मचारी को तीन माह का नोटिस व छटनी के दिन छंटनी का मुआवजा दिया जाएगा, या फिर तीन माह का वेतन व छंटनी का मुआवजा छंटनी के नोटिस के साथ ही दिया जाएगा।

अब प्रश्न उठता है कि क्या जेट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को कानून की इतनी मोटी बात भी पता नहीं थी क्या?

यह कानून केवल कारखानों, बागानों और खदानों पर लागू होता है। इस कारण से यह मान कर कि यह जेट एयरवेज पर लागू नहीं होगा, छंटनी कर दी गई। बाद में कानूनी सलाहकारों ने बताया कि रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन्स पर यह लागू है और जेट एयरवेज भी उस की जद में आता है। यह कानूनी सलाह मिलने पर एक बारगी छंटनी को वापस लेने के सिवाय जेट एयरवेज के पास कोई चारा नहीं था। नहीं लेने पर जिस खर्चे को घटाने की बात थी वह और बढ़ जाता। कर्मचारियों को तो बिना उन से काम लिए वेतन देने ही पड़ते, कानूनी खर्च और बढ़ जाता।

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