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विक्रय पत्र, पावर ऑफ अटॉर्नी (मुख्तारनामा) और रजिस्ट्री क्या हैं?

समस्या-

सुनीता ने निजामुद्दीन, दिल्ली से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-


पावर ऑफ़ अटोर्नी क्या होता है? क्या यह रजिस्ट्री जैसा ही होता है? मैंने जिससे जमीन खऱीदी है, वो यही बोल रहा है। मैं ने प्लाट बल्लबगढ़ हरयाणा में लिया है और वो जेवर, यूपी में बोल रहा है पावर ऑफ़ अटोर्नी करने के लिए। क्या यह सही है? क्या इससे हम बाद में बिना बिल्डर के ही  रजिस्ट्री करा सकते हैं?


समाधान-

आप को और लगभग सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि रजिस्ट्री, विक्रय पत्र यानी सेल डीड और पावर ऑव अटॉर्नी अर्थात मुख्तारनामा क्या होते हैं। हम यहाँ बताने का प्रयत्न कर रहे हैं-

रजिस्ट्री या रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण-

जब आप कोई पत्र किसी को भेजना चाहते हैं तो साधारण डाक से लिफाफे पर टिकट लगा कर डाक के डब्बे में डाल देते हैं। यह साधारण पत्र होता है। लेकिन जब आप उस पर अधिक (25 रुपए) का डाक टिकट लगा कर तथा एक अभिस्वीकृति पत्र जिस पर आपका व पाने वाले का पता लिख कर डाक घर में देते हैं तो डाक घर आप को रसीद देता है। आप उस के लिए कहते हैं की हमने रजिस्ट्री से चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी को भेजने के सबूत के तौर पर आपके पास डाकघर की रसीद होती है। डाकघर यह जिम्मेदारी लेता है कि जो अभिस्वीकृति पत्र आप ने लिफाफे के साथ लगाया है उस पर पाने वाले के हस्ताक्षर करवा कर आप के पास लौटाएगा। यदि 30 दिनों में अभिस्वीकृति पत्र आप को वापस नहीं मिलता है तो आप डाकघर को पत्र दे कर पूछ सकते हैं कि उस ने उस पत्र का क्या किया। इस पर डाकघर आप को एक प्रमाण पत्र देता है कि आप का पत्र फलाँ दिन अमुक व्यक्ति को अमुक पते पर डिलीवर कर दिया गया है। अब आप रजिस्टर्ड पत्र या रजिस्ट्री शब्द का अर्थ समझ गए होंगे कि आप का पत्र आप के द्वारा डाक में देने से ले कर पाने वाले तक पहुँचने  तक हर स्थान पर रिकार्ड़ में दर्ज किया जाता है।

इसी तरह जब  कोई भी दस्तावेज जैसे विक्रय पत्र, दान पत्र, मुख्तार नामा, गोदनामा, एग्रीमेंट, राजीनामा, बंटवारानामा आदि लिखा जाता है तो उस में किसी संपत्ति के हस्तांतरण या हस्तान्तरण किए जाने का उल्लेख होता है। अधिकारों का आदान प्रदान होता है। तब उस दस्तावेज को हम डीड या विलेख पत्र, या प्रलेख कहते हैं। हमारे यहाँ पंजीकरण अधिनियम (रजिस्ट्रेशन एक्ट) नाम का एक केन्द्रीय कानून है जिस के अंतर्गत यह तय किया हुआ है कि कौन कौन से दस्तावेज हैं जिन का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा, कौन से दस्तावेज हैं जिन का ऐच्छिक रूप से आप पंजीयन करा सकते हैं। इस के लिए हर तहसील स्तर पर और नगरों में एक या एक से अधिक उप पंजीयकों के दफ्तर खोले हुए हैं जिन में इन दस्तावेजों का पंजीयन होता है। यदि पंजीयन अधिनियम में किसी दस्तावेज की रजिस्ट्री कराना अनिवार्य घोषित किया गया है तो उस दस्तावेज की रजिस्ट्री अनिवार्य है अन्यथा उस दस्तावेज को बाद में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर किसी भी 100 रुपए से अधिक मूल्य की स्थाई संपत्ति (प्लाट या मकान, दुकान) के किसी भी प्रकार से हस्तांतरण विक्रय, दान आदि का पंजीकृत होना अनिवार्य है अन्यथा वह संपत्ति का हस्तांतरण नहीं माना जाएगा।  अब आप समझ गए होंगे कि रजिस्ट्री का क्या मतलब होता है। रजिस्ट्री से कोई भी दस्तावेज केवल उप पंजीयक कार्यालय में दर्ज होता है उस का निष्पादन किया जाना प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाता है।

विक्रय पत्र सेल डीड –

कोई भी स्थाई अस्थाई संपत्ति जो प्लाट, दुकान, मकान,वाहन, जानवर आदि कुछ भी हो सकता है उसे कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर सकता है। यह हस्तांतरण दान हो सकता है अदला बदली हो सकती है, या धन के बदले हो सकता है। जब यह धन के बदले होता है तो इसे विक्रय कहते हैं। इस विक्रय का दस्तावेज लिखना होता है। इसी दस्तावेज को विक्रय पत्र कहते हैं। यदि यह संपत्ति स्थाई हो और उस का मूल्य 100 रुपए हो तो उस का विक्रय पत्र उप पंजीयक के यहाँ पंजीकरण कराना जरूरी है। यदि पंजीकरण नहीं है तो ऐसा विक्रय वैध हस्तान्तरण नहीं माना जाएगा। यह विक्रय पत्र वस्तु को विक्रय करने वाला वस्तु का वर्तमान स्वामी निष्पादित करता है और उस पर गवाहों के ह्स्ताक्षर होते हैं। यदि वस्तु का वर्तमान स्वामी किसी कारण से उप पंजीयक के कार्यालय तक पहुँचने में असमर्थ हो तो उस स्वामी का मुख्तार (अटोर्नी) यह विक्रय पत्र स्वामी की ओर से निष्पादित कर सकता है। इस के लिए उस के पास वैध अधिकार होना चाहिए।

मुख्तारनामा या पावर ऑफ अटॉर्नी-

जब कोई संपत्ति का स्वामी स्वयं पंजीयन के लिए उप पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो वह एक मुख्तार नामा या पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर किसी अन्य व्यक्ति को मुख्तार या अटॉर्नी नियुक्त कर देता है जो कि उस की ओर से उप पंजीयक कार्यालय में उपस्थित हो कर दस्तावेज अर्थात विक्रय पत्र आदि का विक्रय पत्र हस्ताक्षर कर सकता है और उस का पंजीयन करा सकता है विक्रय का मूल्य प्राप्त कर सकता है। इस के लिए यह आवश्यक है कि मुख्तार नामा के द्वारा मुख्तार को ये सब अधिकार देना लिखा हो। मुख्तार नामा किसी भी काम के लिए दिया जा सकता है। लेकिन वह उन्हीं कामों के लिए दिया हुआ माना जाएगा जो मुख्तार नामा में अंकित किए गए हैं इस कारण मुख्तार द्वारा कोई दस्तावेज निष्पादित कराए जाने पर मुख्तारनामे को ठीक से पढ़ना जरूरी है जिस से यह पता लगे कि वह किन किन कामों के लिए दिया जा रहा है। मुख्तार नामा का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है वह किसी नोटेरी से तस्दीक कराया गया हो सकता है लेकिन यदि वह किसी स्थाई संपत्ति मकान, दुकान, प्लाट आदि के विक्रय के हो तो उस का पंजीकृत होना जरूरी है। कई बार जब किसी संपत्ति के हस्तांतरण पर किसी तरह की रोक होती है या कोई और अड़चन होती तब भी वस्तु को विक्रय करने के लिए एग्रीमेंट कर लिया  जाता है और क्रेता के किसी विश्वसनीय व्यक्ति के नाम मुख्तार नामा बना कर दे दिया जाता है ताकि मुख्तार जब वह अड़चन हट जाए तो क्रेता के नाम विक्रय पत्र पंजीकृत करवा ले। लेकिन इस तरह से क्रेता के साथ एक धोखा हो सकता है। मुख्तार नामा कभी भी निरस्त किया जा सकता है। यदि संपत्ति का मालिक ऐसी अड़चन समाप्त होने पर या उस के पहले ही मुख्तार नामा को निरस्त करवा दे तो फिर मुख्तार को विक्रय पत्र निष्पादित करने का अधिकार नहीं रह जाता है। इस तरह मुख्तार नामा के माध्यम से किसी संपत्ति का क्रय करना कभी भी आशंका या खतरा रहित नहीं होता है।

पंजीकृत बैनामा को रद्द कराना आसान नहीं होगा।

समस्या-

विजयलक्ष्मी ने झिंझक, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विजय लक्ष्मी है। हम तीन बहिनें हैं, मेरी माँ के पास ६ बीघा जमीन थी। मेरी माँ ने मुझे सबसे पहिले 2 बीघा खेत का बैनामा किया, उसके बाद अन्य दो को। मुझे जो जमीन मिली वह माँ के नाम थी और अन्य दो को मिली वह मेरे पिता की मरने के बाद माँ के नाम हो गयी थी।  मेरी माँ ने मेरी ऊपर दीवनी वाद कर दिया कि बैनामा फर्जी तरीके से किया गया है। मेरी माँ को दिखाई नहीं देता है। मेरी दोनों बहिने माँ को गुमराह करके बैनामा निरस्त करवाना चाहती हैं। क्या बैनामा निरस्त हो सकता है? मेरे बैनामा में मेरी बहिन गवाह भी है, दूसरा गवाह भी माँ की तरफ है।  क्या मैं भी पिता की जमीन में हिस्सा मांग सकती हूँ बैनामा को ३ साल हो चुके हैं।  मैंने लव मैरिज की है, क्या लव मैरिज करने के कारण क्या किसी अपने हक़ से बहिष्कृत क्या जा सकता है मेरे दो बच्चै हैं।

समाधान-

दि बैनामा पंजीकृत है तो उसे निरस्त किया जाना आसान नहीं है वह भी तब जब कि बैनामे को पंजीकृत हुए तीन वर्ष हो चुके हों।

यदि माँ को दिखाई नहीं देता है तो रजिस्ट्री कराते समय रजिस्ट्रार कार्यालय ने सारी पूछताछ के बाद ही उसे रजिस्टर किया होगा तो उस का निरस्त होना और भी दुष्कर है। पर कोई दीवानी वाद हुआ है तो अच्छा वकील करें। कभी कभी वकीलों की गलती से भी जीता हुआ मुकदमा मुवक्किल हार बैठता है।

पिता की जमीन कृषि भूमि होगी तो उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का कानून भिन्न है। इस संबंध में अपने दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह करें तो बेहतर होगा।

लव मैरिज या परिवार को छोड़ कर अपनी मर्जी से विवाह करने से परिवार बहिष्कार कर सकता है लेकिन उसे उस के हकों से बेदखल नहीं कर सकता।

बालिग होने के 29 साल बाद नाबालिग अवस्था में हुए पंजीकृत विलेख को निरस्त करने का वाद चलने योग्य नहीं।

ऊसरसमस्या-

आस्तिक शुक्ला ने लक्षमनपुर , प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

न् 1979 में विधवा,नाम जसना देवी द्वारा 5 विस्वा जमीन का स्वेच्छा से बैनामा किया गया था। उस समय विधवा जसना देवी का एक मात्र पुत्र नाबालिग था,जिसकी उम्र लगभग 10 वर्ष थी। बैनामे के बाद (सन् 1979) से ही बैनामेदार उक्त जमीन पर काबिज है। उस जमीन पर वृक्ष आदि लगे हैं। जमीन की खारिज दाखिल एवं खतौनी आदि दुरुस्त है। खतौनी में बैनामेदार का नाम भी है। अब विधवा जसना देवी का एक मात्र पुत्र जो बालिग हो गया है, जिसकी उम्र लगभग 47 वर्ष है। क्या वह अपनी सगी विधवा माँ के द्वारा किये गए इस बैनामे पर कोई दावा पेश कर सकता है, जो 36 वर्ष पूर्व की गयी थी? क्या यह बैनामा अब निरस्त हो सकता है? इस विषय पर हाइकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट का कोई फैसला हो तो कृपया शीघ्र स्पष्ट करें।

समाधान

नाबालिग को बालिग हुए 29 वर्ष हो चुके हैं। यदि उसे उस बैनामे पर आपत्ति थी तो उसे बालिग होने के तीन वर्ष के भीतर बैनामा निरस्त कराने का दावा करना चाहिए था। अब उस का दावा नहीं चल सकता। 10-11 वर्ष के बच्चे को यह पता होता है कि उन के पास जमीन थी जो माँ ने बेच दी है। यदि कब्जा नहीं दिया होता तो भी वह व्यक्ति गफलत में रहने की बात कर सकता था। लेकिन जब जमीन पर कब्जा है और खरीदने वाला जमीन पर खेती कर रहा है वैसी स्थिति में यह हो ही नहीं सकता कि 29 वर्ष तक उसे इस बैनामे का पता ही न चले।

किसी को दावा करने से रोका नहीं जा सकता। लेकिन यह दावा मात्र मियाद के आधार पर चलने योग्य नहीं है। आप अभी से सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग रख कर क्या करेंगे? यदि वह व्यक्ति दावा करे, उस का समन दावे की प्रति के साथ मिले तो दावे की प्रति दे कर सक्षम वकील किया जा सकता है। तीसरा खंबा को भी तभी आप फिर से दावे की प्रति के साथ अपनी समस्या प्रेषित कर सकते हैं।

जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें, दावेदार को अदालत जाने दें।

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नगेन्द्र पाण्डेय ने फैजाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

म ने एक ज़मीन का बैनामा १९८१ में करवाया था, उस ज़मीन पर तबसे हमारा कब्ज़ा भी है, ज़मीन का ख़ारिज दाखिल भी हो गया है, और २००७ में हमारे यहाँ चकबंदी भी हुई तब तक सब कुछ ठीक था। पिछले वर्ष एक व्यक्ति आया और उसी ज़मीन के बैनामे का कागज़ दिखाया जिस में उसने १९७७ में उसी ज़मीन का बैनामा कराया था परन्तु उसका खारिज दाखिल नहीं हुआ है उसके नाम। अब बताइए उसमे क्या हो सकता है।

समाधान –

ह व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता, सिवा इस के कि बाहुबल के बूते पर आप की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करे। बस इस का ध्यान रखें। अपनी जमीन पर कब्जा बनाए रखें और उस व्यक्ति को मजबूर करें कि वह यदि उस का कोई अधिकार है तो उस के लिए कानून का सहारा ले।

जिस जमीन को उस ने 1977 में बैनामा कराया था तब से अब तक वह कहाँ बैठा रहा? इतनी देर से न्यायालय के पास जा कर कोई भी व्यक्ति कोई राहत प्राप्त नहीं कर सकता। कोई अदालत उसे कोई राहत प्रदान नहीं करेगी। उस का इरादा सिर्फ इतना है कि किसी तरह जमीन पर कब्जा कर ले और फिर कहे कि वह तो 1977 से जमीन पर कब्जे में है बस उस ने दाखिल खारिज नहीं कराया था। आप के द्वारा जो बैनामा, दाखिल खारिज कराया गया है वह सब चोर दरवाजे से कराया गया है। यदि आप उस के कब्जा करने से बचने के लिए किसी निषेधाज्ञा के लिए अदालत जाएंगे तब भी वह अपने जवाब में यही कहेगा कि जमीन पर कब्जा उस का है। इस कारण उसे ही अदालत जाने दें और कब्जा बनाए रखें।

भूखंड के विक्रय पत्र में जिस का नाम है कानून के समक्ष वही उस का स्वामी है।

Farm & houseसमस्या-
पवन भटनागर ने दिल्ली से पूछा है-

मेरे पिताजी ने 15/10/1981में मध्यप्रदेश के एक छोटे शहर छतरपुर मे मकान बनाने हेतु 40 X 60 वर्ग फुट की एक जमीन खरीदी। जिस की रजिस्ट्री के समय मेरे पिताजी ने अपने भाई का नाम अपने साथ विक्रय पत्र में दर्ज करवा दिया था। रजिस्ट्री विक्रय पत्र में जो लिखा है वे इस प्रकार हैं। विक्रय पत्र मूल्य-1000-00 रूपये – मुद्रांक शुल्क 60-00 रूपये वर्तमान समय वाजार भाव – ब्लॉक ड्यूटी 10-00 रूपये सही मूल्य – 1000-00 रूपये – स्टाम्प ड्यूटी————–यॊग 80-20 रूपये ब्लॉक छतरपुर यदि कम हो तो क्रेता जिम्मेदार हैं।  विक्रेता – महेश कुमार वर्मा उमर 25 साल पुत्र श्री नरेश कुमार वर्मा निवासी छतरपुर तहसील ब जिला मध्यप्रदेश क्रेता — 1 – विनय कुमार उमर 25 साल पुत्र श्री विक्रम भटनागर,  2 – रमेश कुमार उमर 10 साल नावालिग पुत्र श्री विक्रम भटनागर जरिये भाव वासते संरक्षक विनय कुमार पुत्र श्री विक्रम भटनागर निवासी छतरपुर तहसील ब जिला मध्यप्रदेश। प्रति फल प्राप्त करने का विवरण – मु . 1000  रू एक हजार रुपये केवल जो पूर्व रजिस्ट्री क्रेता से नगद प्राप्त कर लिये थे। तब से अभी तक मेरे पिताजी उसी मकान में रहते हैं तथा पिताजी के भाई अलग दूसरी जगह पर रहते हैं। ओरिजनल रजिस्टर्ड विक्रय पत्र पिताजी के पास है। मकान टैक्स पिताजी जमा करते हैं। बिजली का बिल ,पानी का बिल, राशन कार्ड ,वोटर आईडी ,आधार कार्ड , सभी पिताजी के नाम हैं। अब पिताजी के भाई मकान खाली करवाने की धमकी दे रहे हैं। मकान पिताजी ने बनवाया है। क्या इस स्थिति में मकान पिताजी के नाम हो सकता है?

समाधान-

मीन आप के पिताजी और आप के चाचा जी दोनों के नाम से खरीदी गई थी। रजिस्टर्ड विक्रय पत्र में दोनों के नाम हैं इस कारण से कानून के समक्ष उक्त भूमि पर आप के पिता और चाचा दोनों का स्वामित्व है। तदनुसार उस पर निर्मित मकान भी दोनों की ही सम्पत्ति है।

चूँकि मकान पर आप के पिता जी का कब्जा है इस कारण आप के चाचा को मकान खाली कराने के लिए मकान का विभाजन कराने तथा अपने हिस्से का पृथक कब्जा करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। इस के अतिरिक्त अन्य सभी तरीके गैर कानूनी माने जाएंगे। यदि आप के चाचा ऐसा कोई दावा करते हैं और आप के पिता उस के उत्तर में ये कथन प्रस्तुत करें और साबित करें कि उस भूमि पर जो मकान बनाया गया था तथा जो टैक्स आदि दिया गया था वह सभी आप के पिता ने अपनी निजी आय से खर्च किया है तो वे उस पर निर्मित मकान पर अपना दावा कर सकते हैं। लेकिन भूखंड तो दोनों भाइयों की ही संपत्ति माना जाएगा। वैसी स्थिति में न्यायालय आप के पिता के दावे को उचित मानते हुए दो तरह के निर्णय कर सकता है। पहला तो ये कि आप के पिता उक्त भूखंड की वर्तमान कीमत की आधी राशि आप के भाई को भुगतान करें और मकान की रजिस्ट्री अपने नाम करवा लें। दूसरा ये कि आप के चाचा आप के पिता को भूखंड पर निर्मित मकान की वर्तमान कीमत का आधी राशि आप के पिता को भुगतान करें और मकान व भूखंड दोनों आधे आधे दोनों भाइयों में बाँट दिए जाएँ।

ह उपाय एक सुझाव मात्र है। बहुत कुछ आप के पिता जी के द्वारा मुकदमे में ली गई प्रतिरक्षा और उसे साबित करने पर निर्भर करेगा।

कानूनी समस्या के समाधान में दस्तावेज की तिथि अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

Sale Deedसमस्या-
संतोष कुमार  ने मध्य प्रदेश के किसी नगर से पूछा है-

मेरे पिताजी ने 25-30 साल पहले मध्यप्रदेश के एक छोटे शहर मे मकान बनाने हेतु 40 X 60  वर्ग फुट की एक जमीन खरीदी। जिस की रजिस्ट्री के समय मेरे पिताजी ने अपने भाई का नाम अपने साथ विक्रय पत्र में दर्ज करवा दिया था। उस समय पिताजी के भाई की उम्र 10 साल की थी जो कि रजिस्टर्ड विक्रय पत्र में दर्ज हैl  तब से अभी तक मेरे पिताजी उसी मकान में रहते हैं तथा पिताजी के भाई अलग दूसरी जगह पर रहते हैं।  ओरिजनल रजिस्टर्ड विक्रय पत्र पिताजी के पास है। मकान टैक्स पिताजी जमा करते हैं। बिजली का बिल ,पानी का बिल, राशन कार्ड ,वोटर आईडी ,आधार कार्ड , सभी पिताजी के नाम हैं। अब पिताजी के भाई मकान खाली करवाने की धमकी दे रहे हैं। मकान पिताजी ने बनवाया है। क्या इस स्थिति में मकान पिताजी के नाम हो सकता है? अगर हो सकता है तो किस कानून व किस धारा के तहत हो सकता है?

समाधान-

प ने अपने नगर का नाम नहीं लिखा है। साथ ही यह भी नहीं बताया है कि जमीन के खरीदने वाले विक्रय पत्र का पंजीकरण किस तारीख को किस वर्ष में हुआ था। किसी भी कानूनी मामले में किसी दस्तावेज की तिथि बहुत महत्वपूर्ण होती है। क्यों कि कोई भी कानून कानून बनने की तिथि से लागू होता है। कई कानून समय समय पर बनते और प्रभावी होते रहते हैं। वे जिस दिन प्रभावी होते हैं उसी दिन से लागू होते हैं। उस दिन के पहले के मामलों में पहले वाला कानून लागू होता है।

हले यह कानून था कि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम से भी संपत्ति का निर्माण कर लेता था तो भी संपत्ति उसी व्यक्ति की मानी जाती थी जिस व्यक्ति ने खरीदी थी। ऐसी संपत्ति बेनामी संपत्ति कही जाती थी। लेकिन दिनांक 5 सितम्बर 1988 को बेनामी ट्राजेक्शन्स (प्रोहिबिशन्स) एक्ट 1988 लागू हो गया। जिस में यह कानून आया कि जो संपत्ति जिस के नाम होगी उसी की मानी जाएगी। यदि कोई संपत्ति बेनामी पायी गई तो उसे सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाएगा तथा बेनामी संपत्ति खरीदने वालों को दंडित किया जाएगा।

दि आप के पिता ने उक्त संपत्ति दिनांक 5 सितम्बर 1988 के पहले खरीदी थी तो वे कह सकते हैं कि उन का भाई तो तब 10 वर्ष का था और संपत्ति बेनामी हो कर उन्हीं की थी। वैसी स्थिति में आप के पिताजी को कुछ करने की जरूरत नहीं है। बल्कि वे भाई को कह सकते हैं कि उस का उस संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है, उसे जो भी करना है अदालत में जा कर करे। जब भाई कोई कानूनी कार्यवाही करे तो उस समय संपत्ति को बेनामी बता कर प्रतिरक्षा की जा सकती है।

लेकिन यदि आप के पिता के नाम विक्रय पत्र की रजिस्ट्री 5 सितम्बर 1988 या उस के बाद हुई है तो फिर आप के भाई का उक्त भूखंड पर आधा हक है। यदि आप के पिता जी इस तरह के सबूत प्रस्तुत करें कि उस पर मकान उन का खुद का बनाया हुआ है तो आप का भाई अधिक से अधिक भूखंड की वर्तमान कीमत का आधा पैसा मात्र लेने का अधिकारी होगा।

भूमि की किस्म गलत लिखने पर पंजीकृत विक्रय पत्र निरस्त कराया जा सकता है

agricultural-landसमस्या-

रीवा, मध्यप्रदेश से प्रिया ने पूछा है-

पिता जी ने कृषि भूमि उद्योग को बेची। उस भूमि में पेड़ पौधे थे।  लेकिन उद्योग ने कृषि भूमि को रजिस्ट्री में बंजर भूमि बिना पेड़ पौधे की भूमि लिखाया, पैसे भी बंजर भूमि हिसाब से दिया। पेड़ पौधे का पैसा नहीं दिया। विक्रय पत्र की रजिस्ट्री में जबरन हस्ताक्षर करवा लिये। क्या रजिस्ट्री वैध है?

समाधान-

किसी भी विक्रय पत्र का पंजीयन रजिस्ट्रार कार्यालय में होता है। यदि विक्रय पत्र में पेड़ पौधे वाली भूमि को बंजर लिखाया गया था तो वहीं आपत्ति की जानी चाहिए थी। जब तक विक्रय पत्र को दीवानी न्यायालय से निरस्त नहीं कराया जाता है तब तक उसे वैध ही माना जाएगा। यह सब इस लिए किया जाता है ताकि उद्योग को अधिक स्टाम्प ड्यूटी तथा पंजीयन शुल्क न देनी पड़े।

प के पिता जी के पास एक मार्ग यह है कि वे उप पंजीयक तथा कलेक्टर स्टाम्प को शिकायत करें कि स्टाम्प ड्यूटी व पंजीयन शुल्क बचाने के लिए उद्योग ने विक्रय पत्र में भूमि का मूल्य कम लिखाया है और आप के पिता जी को भी कम दिया गया है। इस से स्टाम्प शुल्क की कमी के कारण रजिस्ट्री में आपत्ति लग जाएगी तथा उस में कलेक्टर स्टाम्प के यहाँ सुनवाई होगी।

प के पिताजी को तुरन्त उद्योग को नोटिस देना चाहिए कि जमीन पेड़ पौधे वाली है और आप को जमीन का मूल्य कम दिया गया है और विक्रय पत्र में भी कम लिखाया गया है। इस कारण से वे आप के पिताजी को शेष मूल्य का भुगतान करें अन्यथा आप के पिताजी विक्रय पत्र निरस्त कराने के लिए वाद दायर करेंगे। साथ ही जो धोखाधड़ी की है उस के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखाएंगे और पुलिस ने कार्यवाही न की तो सीधे न्यायालय में शिकायत करेंगे।

ह सब करने के पहले आप के पिताजी को इस बात के दस्तावेजी सबूत इकट्ठा करने होंगे जिस से वह जमीन पेड़ पौधे वाली साबित हो न कि बंजर साबित हो। अन्यथा किसी भी स्तर पर आप के पिता जी जमीन को पेड़ पौधे वाली साबित नहीं कर सकेंगे और सारे प्रयास असफल हो जाएंगे।

क्या 16 वर्ष पूर्व हुए अवैध विक्रय को अवैध घोषित कराने को दावा किया जा सकता है?

समस्या-

नसीराबाद, राजस्थान से मोहम्मद अली ने पूछा है-

दादा की प्रॉपर्टी ताऊजी के लड़कों ने 16 वर्ष पूर्व बिना बँटवारे के बेच दी है। क्या मैं दावा कर सकता हूँ?

समाधान-

प मुस्लिम विधि से शासित होते हैं। मुस्लिम विधि में कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। सभी संपत्तियाँ व्यक्तिगत होती हैं। दादा जी की संपत्ति उन Havel handcuffके देहान्त के उपरान्त उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई होगी। जिस में आप के पिता यदि जीवित थे तो उस में उन का हिस्सा हो सकता था। लेकिन आप का नहीं। इस कारण से यदि आप के पिता अभी भी जीवित हैं तो आप को दावा करने का अधिकार उत्पन्न ही नहीं हुआ है। हाँ यदि दादा जी के देहान्त के उपरान्त उन की संपत्ति का बँटवारा नहीं हुआ था और ताऊजी के लड़कों ने संपत्ति का विक्रय कर दिया तो ऐसा विक्रय अवैध है और आप के पिता अवश्य ही दावा कर सकते थे।

लेकिन यह विक्रय 16 वर्ष पूर्व हो चुका है। यदि उसी समय इस विक्रय का पंजीयन भी हो चुका है तो अब दावा  करने की अवधि समाप्त हो चुकी है। किसी भी अवैध विक्रय पत्र के पंजीयन के लिए ऐसा पंजीयन दावा करने वाले व्यक्ति के ज्ञान में आने से 3 वर्ष की अवधि में ही उसे अवैध घोषित कराने कि लिए वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। आप के द्वारा दावा करने में यह बाधा है।

दि आप के पिता का देहान्त उक्त पंजीयन के पूर्व हो चुका था और आप को उस पंजीयन का ज्ञान हुए अभी तीन वर्ष की अवधि नहीं हुई है तो आप दावा कर सकते हैं। यदि आप के पिता का देहान्त पंजीयन के बाद हुआ था और आप के पिता को उक्त पंजीयन का ज्ञान था और आप के पिता को उस पंजीयन का ज्ञान हुए अभी तीन वर्ष का समय नहीं हुए हैं तो भी आप दावा कर सकते हैं। इस तरह दोनों तरह की संभावनाएँ मौजूद हैं। आप किसी अच्छे वकील से सलाह कीजिए। यदि वह बताता है कि दावा करने की संभावनाएँ हैं तो आप दावा कर सकते हैं।

विक्रय-पत्र के पंजीयन हेतु मृत विक्रेता के उत्तराधिकारियों पर संविदा के विशिष्ट अनुपालन का वाद किया जा सकता है

समस्या-

मेरठ, उत्तर प्रदेश से युवराज ने पूछा है-

म एक घर में पिछले 30 साल से रह रहे हैं और जिसका मुख़्तार नामा और विक्रय पत्र हमारे पिता जी के नाम है।  विक्रेता ने संपत्ति को विक्रय कर दिया था और पिताजी ने उस संपत्ति का संपूर्ण विक्रय मूल्य अदा कर के संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लिया था। एग्रीमेंट में सम्पूर्ण संपत्ति का अधिकार हर प्रकार से पिता जी को दिए जाने की बात अंकित है लेकिन पिता जी ने उसकी रजिस्ट्री नहीं कराई थी। तीन महीने पहले पिता जी की मृत्यु हो गई है, मूल विक्रेता की भी मृत्यु हो चुकी है। ऐसी स्थिति में हम किस प्रकार रजिस्ट्री अपने नाम कर सकते हैं या इस के लिए मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

hotelकोई भी अपंजीकृत विक्रय पत्र जिस में विक्रय की गई अचल संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक का है मान्य नहीं है। इस कारण विक्रयपत्र का पंजीकृत होना आवश्यक है।  आप ने जिसे विक्रय पत्र कहा है वह विक्रय का इकरारनामा है जिस में विक्रय का संपूर्ण मूल्य प्राप्त कर के विक्रेता ने संपत्ति का कब्जा क्रेता को दे दिया है। क्यों कि संपत्ति का मूल्य दिया जा चुका है और कब्जा भी हस्तांतरित हो चुका है वैसी अवस्था में यदि कोई उस संपत्ति पर से आप का कब्जा हटाने का प्रयत्न करता है या कब्जे के लिए दावा करता है तो आप के पास संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अंतर्गत यह प्रतिरक्षा ले सकते हैं कि आप विक्रय मूल्य अदा कर चुके हैं। आप के विरुद्ध उक्त संम्पत्ति का कब्जे का कोई भी दावा निरस्त हो जाएगा। लेकिन बिना विक्रय पत्र के पंजीकरण के आप उक्त संपत्ति के स्वामी नहीं कहलाएंगे और किसी भी सरकारी रिकार्ड में संपत्ति पर आप का स्वामित्व स्थापित नहीं माना जाएगा।

प ने यह नहीं बताया कि उक्त विक्रय संविदा के अंतर्गत विक्रय पत्र का पंजीकरण कराने के लिए क्या शर्त अंकित की गई थी। यदि उस में यह अंकित था कि जब भी क्रेता तैयार होगा तभी विक्रेता विक्रय पत्र का पंजीयन करवा देगा तो आप के पास अब भी उपाय मौजूद है। जो विक्रेता की जिम्मेदारी थी वही उस के उत्तराधिकारियों की जिम्मेदारी है और जो क्रेता का अधिकार है वही क्रेता के उत्तराधिकारियों का अधिकार है। इस कारण आप अपने पिता के सभी उत्तराधिकारियों की ओर से किसी वकील के माध्यम से एक विधिक नोटिस विक्रेता के उत्तराधिकारियों को भिजवाएँ कि वे उक्त संपत्ति का विक्रय पत्र आप के पिता के उत्तराधिकारियों के पक्ष में निष्पादित कर के उस का पंजीयन कराएँ। नोटिस में इस के लिए एक माह तक का समय दिया जा सकता है। यदि इस नोटिस के उपरान्त भी विक्रेता के उत्तराधिकारी विक्रय पत्र निष्पादित कर उस का पंजीयन नहीं कराते हैं तो आप विक्रेता के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में विक्य पत्र का निष्पादन कर उस का पंजीयन कराने के लिए संविदा के विशिष्ट पालन के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

दीवानी न्यायालय से विक्रय पत्र निरस्त होने तक कोई अन्य विक्रय पत्र निष्पादित न करें।

समस्या-

नोएडा  से सुरेन्द्र सिंह तोमर ने पूछा है –

मेरी एक भूमि जिला इंदौर म.प्र. में है।  मैं स्‍वयं नौकरी के चलते सपरिवार नोएडा में रहता हूँ।  मेरे भाई ने मेरी भूमि को स्‍वयं भू-स्‍वामी दर्शा कर अन्‍य व्‍यक्ति को बेच दिया और उसका नामांतरण भी करा दिया। इसका पता जब मुझे चला तो इसके विरुद् मैं ने एसडीएम के यहाँ आवेदन किया जिस पर नामांतरण निरस्‍त हो गया और भूमि पुनः मेरे नाम कर हो गई है।   इस में आदेश दिया गया कि रजिस्‍ट्री निरस्‍त कराने हेतु मैं अलग से मुकदमा करुँ। मैं ने रजिस्‍ट्री निरस्‍त कराने बावत अपने भाई व खरीददार के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया है जो अभी इंदौर न्‍यायालय मे चल रहा है।  मैं अब इस भूमि को अपने एक  मित्र को बेचना चाहता हूँ।  क्‍या बिना रजिंस्ट्री शून्‍य कराए मैं यह भूमि उसे बेच सकता हूँ।  क्‍योंकि इसकी संभावना हमेशा बनी रहती है कि कही मेरी अनुपस्थिति में फिर से फर्जीवाडा कर जमीन को बेच न दिया जाये। इस में मुझे व मेरे मित्र को कोई परेशानी तो नही आयेगी?

समाधान-

किसी भी संपत्ति का स्वामित्व उस के स्वामित्व के दस्तावेजों से निर्धारित होता है। नामान्तरण स्वामित्व का सबूत नहीं है। वस्तुतः कृषि भूमि की स्वामी agricultural-landतो राज्य सरकार है। कृषक उस में केवल एक किराएदार की हैसियत से कब्जे में रहता है। अब आप की हैसियत अपनी भूमि पर किराएदार जैसी है। आप खातेदार कृषक हैं। आप अपना किराएदारी का यह अधिकार भी हस्तांतरित कर सकते हैं। लेकिन उस का हस्तान्तरण केवल रजिस्टर्ड विक्रयपत्र से ही किया जा सकता है। उक्त भूमि के संबंध में एक विक्रय पत्र उस व्यक्ति के नाम पंजीकृत है जिसे आप के भाई ने जमीन बेची है। उस रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए आप ने मुकदमा किया हुआ है। जब मुकदमा लंबित है आप के भाई द्वारा पुनः कोई गलत काम करने का अंदेशा अत्यन्त कम है। जब तक वह पंजीकृत विक्रय पत्र न्यायालय द्वारा निरस्त नहीं कर दिया जाता है रिकार्ड में आप के भाई से जमीन खरीदने वाला व्यक्ति स्वामी है। इस कारण से इस समय आप के द्वारा विक्रय पत्र निष्पादित करना न तो उचित है और न ही संभव है।

नामान्तरण केवल इस बात का सबूत है कि आप उस भूमि पर एक खातेदार कृषक हैं। एसडीओ ने आप के तर्क को मान कर आप के भाई द्वारा निष्पादित रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को गलत मानते हुए आप के खातेदारी अधिकार को माना और नामांतरण पुनः आप के नाम कर दिया। लेकिन एक रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को केवल दीवानी न्यायालय ही निरस्त कर सकता है। उस का निर्णय होने दें।

मारी सलाह है कि आप अभी कोई भी विक्रय पत्र निष्पादित न कराएँ। यदि आप जमीन बेचना ही चाहते हैं तो केवल उस का एग्रीमेंट करें और विक्रय मूल्य प्राप्त कर के जमीन का कब्जा खरीददार को दे दें। जब भी आपके भाई द्वारा कराई गई रजिस्ट्री निरस्त हो जाए तब आप खरीददार के नाम विक्रय पत्र निष्पादित करा दें।

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