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प्रत्येक पक्षकार को दावे की सूचना होना जरूरी है।

समस्या-

मनोज ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपने स्वर्गीय पिता की कृषि भूमि पर अपना उतराधिकार का दावा कर रखा है। कोर्ट ने मेरी माँ की अन्य बहनों को नोटिस भेजा है, उनको भी दावा करने हेतु हिदायत दी है ताकि एक एक करके न आये और केस में लम्बी प्रक्रिया ना हो। दो बार नोटिस भेजे गये हैं लेकिन उन्होंने कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दी। दो नोटिस भेजने में 2 साल हो गए हैं। वैसे में ये जानना चाहता हूँ कि कानूनन रूप से कितनी बार नोटिस भेजा जाता है? और अन्य क्या प्रक्रिया करने के बाद, कोर्ट स्वतंत्र रूप से उनकी गैर हाजरी में अपना फैसला सुना सकता है?

समाधान-

किसी भी मुकदमे में सभी संबंधित लोगों को पक्षकार बनाना जरूरी होता है जिन का हित प्रभावित होने वाला हो। आप की माताजी के इस मुकदमे में उन के पिता के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना जरूरी था क्यों कि माताजी के पिताजी की संपत्ति का बंटवारा सभी उत्तराधिकारियों के मध्य होना है। इस के लिए सभी को दावे का समन भी भेजा जाना जरूरी है और इस समन का सभी पक्षकारों को मिलना भी जरूरी है।

आम तौर पर समन एक ही बार भेजा जाता है। यदि समन के संबंध में कोर्ट को यह रिपोर्ट प्राप्त हो कि समन संबंधित व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया है या उसे सम्यक प्रकार से समन और दावे की सूचना मिल गयी है तो दुबारा समन नहीं भेजा जाता है। इस तरह यह आवश्यक है कि समन जिस व्यक्ति को भेजा गया है उसे मिल जाए और उस की सूचना भी पर्याप्त रूप से न्यायालय को मिल जाए। जब तक समन संबधित व्यक्ति को नहीं मिलता है तब तक यह प्रक्रिया चालू रहती है। एक बार प्रतिवादी को समन मिल जाने पर यदि वह अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो अदालत उस के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही कर सकती है। एक तरफा कार्यवाही हो जाने पर उपस्थित पक्षकारों की साक्ष्य प्राप्त कर निर्णय किया जाता है।

प्रतिवादी को उस के नियोजक के माध्यम से समन की तामील कराई जा सकती है।

समस्या-law

अंकित गुप्ता ने बनीपार्क, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैंने अपने परिचित के जानकार वाले को १००,०००/- रूपये दिए थे, जिसका नाम पुष्पेन्द्र था। वह समय आने मुझे पैसे देने में आनाकानी कर रहा था। विवश होकर मुझे उस पर न्यायालय में वाद करना पड़ा। वह एक स्कूल में सरकारी कर्मचारी था, पर अब वह अपने निवास स्थल पर नहीं रहता है। वह वहाँ से मुझे बिना बताये कहीँ दूसरी जगह निकल गया है। समस्या यह है कि वह अपनी स्कूल में भी नहीं जाता, जिस से मैं उसे पकड़ सकूँ और समन की तामील करा सकूँ। वह सरकारी कर्मचारी है फिर भी कोर्ट मुझे ही तामील करवाने के लिए कह रहा है। बिना पते के मैं सम्मन तामील कैसे करवाऊँ। मुझे कुछ उपाय बताइये कि मैं उस सरकारी कर्मचारी का पता प्राप्त कर सकूँ।

समाधान-

प ने जिस के विरुद्ध दावा किया है उसे आप ही जानते हैं। आप को ही बताना होगा कि वह कौन व्यक्ति है जिस से आप को रुपए वापस लेने हैं। जब वह आप को ही नहीं मिल रहा है तो अदालत का तामील कराने वाला कर्मचारी भी उसे कहाँ से तलाश करेगा? इस कारण उस व्यक्ति का पता तो आप को ही मालूम करना पड़ेगा।

ह व्यक्ति जिस स्कूल में नौकरी करता था उस स्कूल में जा कर पता करिए कि वह अब भी नौकरी में है या नहीं। यदि नौकरी में है तो उस का पदस्थापन कहाँ है। यदि आप को उस के पदस्थापन का पता लग गया तो वहाँ जा कर आप उसे तलाश कर के तामील करवा सकते हैं।

दि आप को पूरा पता है कि वह किसी स्कूल में नौकरी करता है तो उस स्कूल के प्रधानाध्यापक के माध्यम से भी उसे समन की तामील कराई जा सकती है। इस के लिए आप न्यायालय को आवेदन कर सकते हैं कि प्रतिवादी जिस स्कूल में नौकरी करता है उस के प्रधानाध्यापक के माध्यम से उसे समन की तामील कराई जाए।

नोटिस लेने से इन्कार करना उसे प्राप्त करने के समान है।

noticeसमस्या-
पूनम सिंह ने भोपाल मध्य प्रदेश से पूछा है-

रेलू हिंसा और भरण पोषण के मामले में विपक्षी नोटिस लेने से बार बार इन्कार करे तो क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप किस तरह के नोटिस की बात कर रही हैं? क्या आप ने मामले में न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर दिए हैं? या फिर आवेदन प्रस्तुत करने के पूर्व आप विपक्षी को नोटिस दे रही हैं जिन्हें वह न ले कर वापस लौटा देता है?

दि आप ने कोई विधिक नोटिस स्वयं दिया है या किसी वकील से दिलाया है जिसे  पंजीकृत डाक से भेजा गया है तो ऐसे नोटिस को लेने से इन्कार कर देना भी उसे लेने के समान ही है। आप नोटिस पर लिखे गए नोट के आधार पर कि प्राप्तकर्ता ने लेने से इन्कार किया नोटिस को प्राप्त किया हुआ मान कर न्यायालय में अपना आवेदन संस्थित कर सकती हैं।

लेकिन आप ने घरेलू हिंसा अधिनियम अथवा भरण पोषण के लिए कोई आवेदन संस्थित कर दिया है और न्यायालय द्वारा प्रेषित नोटिस या सम्मन लेने से इन्कार कर दिया गया है तो न्यायालय भी उस नोटिस या सम्मन को तामील किया हुआ मान कर आप के आवेदन पर आगे कार्यवाही आरंभ कर सकता है।

चैक बाउंस के मुकदमे में समन और वारंट की तामील पुलिस ही कराएगी, लेकिन परिवादी को शुल्क के साथ आवेदन देना होता है।

समस्या-

दिल्ली से शारदा ने पूछा है –

मैं ने एक परिवाद धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत किया है। अब अभियुक्त को समन कोर्ट भेजेगी या मुझे भेजना होगा?

Code of Criminal Procedure
समाधान-

प ने जो परिवाद प्रस्तुत किया है उस पर जो कार्यवाही आरंभ हुई है वह अपराधिक प्रकृति की है और दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार ही समस्त कार्यवाही होगी। पहले आप को शपथ पत्र प्रस्तुत कर के अपने परिवाद के तथ्यों को साबित करना होगा। तब न्यायालय आप के परिवाद पर प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त को समन से बुलाने का आदेश करेगा। तब आप को समन जारी करने के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। जिस पर मामूली न्यायशुल्क लगेगा। तब न्यायालय अभियुक्त व्यक्ति के लिए समन जारी करेगा। इस समन को पुलिस द्वारा अभियुक्त को पहुँचाया जाएगा। यह हो सकता है कि अभियुक्त किसी दूरस्थ स्थान पर रहता हो तो न्यायालय आप को समन दस्ती देने का आदेश दे दे। तब भी समन आप को एक बंद लिफाफे में सिर्फ इतना करने के लिए दिया जाएगा कि आप उसे उस पुलिस थाने तक पहुँचा दें जिस के अंतर्गत अभियुक्त रहता है।

ब तक अभियुक्त को समन प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक आप को समन जारी करने के लिए हर पेशी पर समन जारी करने का आवेदन शुल्क सहित देना पड़ सकता है। यदि समन मिलने पर भी अभियुक्त उपस्थित नहीं हो तो उसे जमानती या गिरफ्तारी वारंट से बुलाए जाने का आदेश न्यायालय दे सकता है। तब भी वारंट जारी करने के लिए सशुल्क आवेदन आप को ही देना होगा। लेकिन वारंट की तामील पुलिस ही कराएगी। वही अभियुक्त को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी।

दावे के समन अखबार में प्रकाशन के माध्यम से कैसे तामील कराएँ?

समस्या-

कृषि भूमि के विभाजन के मुकदमें में प्रतिवादियों को समन अखबार में प्रकाशन के माध्यम से तामील कराने के लिए क्या करना पड़ेगा और इस में कितना खर्च आएगा?

-विनोद कुमाँवत, गुढ़ा गौरजी, जिला झुंझुनू, राजस्थान

समाधान-

किसी भी दीवानी वाद में या राजस्व भूमि के वाद में प्रक्रिया दीवानी प्रक्रिया संहिता से शासित होती है।  कृषि भूमि के विभाजन के वाद में भी दीवानी प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार प्रतिवादियों पर समन की तामील कराई जाएगी।  इस के लिए दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 5 में उपबंध किए गए हैं।  आम तौर पर न्यायालय समन की तामील पहले अपने अधीनस्थ कर्मचारी से अथवा किसी अन्य न्यायालय के अधीनस्थ कर्मचारी से करवाती है।  यदि यह संभव नहीं हो पाता है तो रजिस्टर्ड ए.डी डाक के माध्यम से करवाती है। यदि डाक द्वारा भी यह संभव नहीं होता है तो फिर प्रतिस्थापित तामील करवाती है जिस के लिए आदेश 5 नियम 20 में उपबंध किया गया है।

स के लिए वादी को एक आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होता है कि प्रतिवादीगण जानबूझ कर तामील से बच रहे हैं और सामान्य रीति से व डाक द्वारा तामील कराया जाना संभव नहीं हो रहा है इस लिए समन को अखबार में प्रकाशित करवा कर प्रतिस्थापित तामील कराए जाने की अनुमति प्रदान की जाए।  न्यायालय द्वारा इस आवेदन पर आदेश दिया जाता है कि वादी किसी खास अखबार में प्रकाशन के माध्यम से समन की तामील प्रतिवादियों पर करवा सकता है। इस आदेश के उपरान्त समन के फार्म  न्यायालय के समक्ष निश्चित न्यायशुल्क जो कि राजस्थान में मात्र दो रुपया है के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।  न्यायालय समन को हस्ताक्षर कर मुहर लगा कर वापस वादी या उस के वकील को लौटा देता है।  इस समन को जिस अखबार में प्रकाशन के लिए न्यायालय ने आदेश दिया है उसे देना पड़ता है।  सभी अखबारों की इस तरह के न्यालायय के समन और नोटिस प्रकाशित करने की दरें निश्चित हैं जो उस अखबार के दफ्तर या फिर उस के एजेंट से पता की जा सकती हैं।  इस दर के अनुसार निश्चित राशि का भुगतान कर के समन का अखबार में प्रकाशन करवाया जा सकता है। इस प्रकाशन के उपरान्त भी प्रतिवादी न्यायालय में उपस्थित नहीं हों तो उन के विरुद्ध न्यायालय की कार्यवाही एक-तरफा आगे बढ़ाई जा सकती है।

सेवा से लंबी अनुपस्थिति को स्वेच्छा से सेवा का परित्याग माना जा सकता है

समस्या-

मैं एक अर्धशासकीय निगम में लगातार 12 वर्ष तक अस्थाई रूपसे निर्धारित वेतन पर कार्यरत रहा था। इस दौरान मेरे वेतन से कर्मचारी भविष्य निधि की कटौती भी होती थी। पिछले 10 वर्षो से मैं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अपने कार्यालय से लापता रहा हूँ। इस दौरान मेरे साथ कार्यरत सभी साथियों को नियमित कर दिया गया है। पिछले 10 वर्षों में मेरे कार्यालय ने मेरी सेवाएँ समाप्त करने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की है। अभी मैं ने जब अपने कार्यालय से अपने भविष्य निधि खाते से धन निकालने हेतु संपर्क किया तो वहाँ से जवाब मिला कि पहले त्यागपत्र दो। लेकिन इस स्थिति को जानने के उपरान्त मैं त्यागपत्र नहीं देना चाहता और सेवा में वापस आना चाहता हूँ। इस सम्बन्ध में कानूनी स्थिति क्या होगी? मुझे क्या करना चाहिए।

-मुरारी संजय गोयल, बीना, मध्यप्रदेश

 समाधान-

किसी भी सेवा में निरन्तर बना रहना सेवा की एक स्थाई शर्त है। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सूचना के अनुपस्थित हो जाए तो सेवा में उसे तब तक लगातार अनुपस्थित माना जाएगा जब तक कि वह सेवा में स्वयं उपस्थित नहीं हो जाता है। यह भी हो सकता है कि कोई नियोजक एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण अनुपस्थित रहने वाले व्यक्ति की सेवाएँ समाप्त कर दे। आप के मामले में जो तथ्य सामने आए हैं उस से पता लगता है कि आप की सेवाएँ आप के निगम द्वारा समाप्त नहीं की गई हैं। लेकिन आप पिछले दस वर्ष से अनुपस्थित चल रहे हैं। आप ने वहाँ जा कर अपने भविष्य निधि खाते को बंद करने और उस में जमा धन वापस प्राप्त करने का प्रयास किया तो उन के सामने समस्या यह आ गई कि वे आप के भविष्य निधि खाते में आप की प्रास्थिति नौकरी से अनुपस्थित बताएँ अथवा आप को सेवामुक्त बताएँ। रिकार्ड के अनुसार आप आज तक सेवा मुक्त नहीं हैं। अनुपस्थित बताने से आप के भविष्य निधि खाते का समापन संभव नहीं है। इस कारण से आप को निगम द्वारा यह सलाह दी गई कि आप त्याग पत्र दे दें जिस से आप की प्रास्थिति ऐसी बन जाए कि आप के भविष्य निधि खाते का समापन हो सके और आप की भविष्य निधि की राशि आप को प्राप्त हो सके।

दि कोई व्यक्ति बिना बताए सेवा से अनुपस्थित हो जाता है और एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है तो नियोजक के पास यह आधार उपलब्ध रहता है कि कर्मचारी ने स्वयं ही सेवा त्याग दी है। इस तरह उस की सेवाएँ समाप्त समझी जा सकती हैं। दूसरा विकल्प यह है कि नियोजक एक लंबी अवधि तक अनुपस्थित रहने पर आप को आरोप पत्र दे कि आप बिना कोई सूचना दिए और बिना कोई कारण बताए अनुपस्थित हैं जो कि एक दुराचरण है, और आप इस आरोप का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें।  कर्मचारी का कोई भी उत्तर प्राप्त न होने पर नियोजक कर्मचारी के विरुद्ध औपचारिक जाँच कार्यवाही कर उसे सेवा समाप्ति के दंड से दंडित कर सकता है। आप के मामले में आप के नियोजक के पास उक्त दोनों ही विकल्प खुले हैं। एक तीसरा विकल्प यह भी है कि जब भी कर्मचारी सेवा पर उपस्थित हो उसे सेवा में ले ले और अनुपस्थिति के काल को उस के सेवा काल से हटा कर उस के कुल सेवाकाल की गणना कर ले। यह तीसरा विकल्प तभी संभव हो पाता है जब कि नियोजक को आप की सेवाओँ की आवश्यकता हो और नियोजक कर्मचारी के प्रति अत्यधिक सहिष्णुता का रवैया अपनाए।

ब आप के साथियों के नियमित हो जाने से उन्हें अच्छे वेतन प्राप्त हो रहे हैं और सेवा शर्तें भी अच्छी हैं इस कारण से आप नौकरी करना चाहते हैं। इस लिए मेरी राय में आप को सेवा में उपस्थिति दे देनी चाहिए। एक आवेदन प्रस्तुत कर यह बताना चाहिए कि आप किन कारणों से सेवा में उपस्थित नहीं हो सके थे और अब सेवा में उपस्थित हैं आप को सेवा में लिया जाए। यदि आप द्वारा बताए गए कारणों से आप का नियोजक संतुष्ट हो जाता है तो वह आप को तुरन्त सेवा में ले लेगा। यदि वह संतुष्ट नहीं होता है तो आप को पत्र दे कर यह बताएगा कि आप ने इतने दिन  अनुपस्थित रह कर स्वयं ही सेवा का त्याग कर दिया है और अब आप को सेवा में लिया जाना संभव नहीं है। आप की अनुपस्थिति को आप के नियोजक द्वारा स्वेच्छा से सेवा का परित्याग मान लिए जाने पर आप उस के विरुद्ध औद्योगिक विवाद उठा सकते हैं और इस विवाद में यदि श्रम न्यायालय यह मानता है कि आप के पास दस वर्ष की अनुपस्थिति का उचित कारण था और नियोजक को यह मानने का कोई अधिकार नहीं था कि आप ने सेवा का परित्याग कर दिया है तो आप को सेवा दुबारा प्राप्त हो सकती है। श्रम न्यायालय यदि यह मानता है कि आप का दस वर्ष से सेवा में अनुपस्थित रहना सेवा परित्याग के समान है तो आप को कोई भी राहत प्राप्त नहीं होगी। निर्णय बहुत कुछ आप और आप के नियोजक द्वारा श्रम न्यायालय के समक्षअपने अपने पक्ष में प्रस्तुत साक्ष्य पर निर्भर करेगा।

ह आप पर निर्भर करता है कि आप सेवा से त्याग पत्र दे कर अपना हिसाब लेना चाहते हैं या फिर सेवा प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहते हैं।

रिक्त पद पर अनुकम्पा नियुक्ति

बड़वानी मध्यप्रदेश से नीलेश सैनियार ने पूछा है-

महोदय,

मेरी अनुकम्पा नियुक्ति आदिवासी विकास विभाग के अन्तर्गत भृत्य के पद की गई। मेरे द्वारा मेरी योग्यता अनुसार लिपिक के पद हेतु आवेदन दिया गया था। मेरे आवेदन के उपरान्त विभाग द्वारा आदिवासी विकास विभाग में लिपिक का कोई भी पद खाली नही है ऐसा लिखित में दिया जाकर मुझसे भृत्य के पद पर नियुक्ति हेतु सहमति ली गई।  जिसके पश्चात मेरी नियुक्ति भृत्य के पद पर हो गई।  परंतु मुझे ज्ञात हुआ है कि ठीक एक माह बाद ही दूसरे अन्य आवेदक को जो कि निर्धारित योग्यताएं भी पूर्ण नही करता था और न ही आरक्षण रोस्टर के अनुसार एस.सी. का पद रिक्त था, फिर भी उसे लिपिक के पद पर नियुक्ति दी गई है।  मुझे प्रतीत होता है कि यहाँ रूपयो का लेनदेन कर गलत नियुक्ति प्रदान की गई है।  उक्त संदर्भ में उचित कानूनी सलाह प्रदान करें।

उत्तर-

 नीलेश जी,

प का साक्षात्कार लिपिक पद के लिए हुआ, लेकिन आप की अनुमति से आप को भृत्य के पद पर नियुक्ति दे दी गई। बाद में एक अन्य व्यक्ति को लिपिक पद पर नियमों का उल्लंघन कर के नियुक्ति दे दी गई और अब आप चाहते हैं कि आप को लिपिक के पद पर नियुक्त किया जाए। आप को यदि यह भय हो कि कहीं पूछताछ और आपत्ति किए जाने के कारण आप की वर्तमान नौकरी भी समाप्त न कर दी जाए। तो आप को अपने इस भय को निकाल देना चाहिए। क्योंकि आप को अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त हुई है। यह सही है कि अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं है लेकिन एक बार नियुक्ति हो जाने पर वह अधिकार के समान ही है। यदिlegal advice आप लिपिक पद की योग्यता रखते हैं और आप को भृत्य पद पर नियुक्ति दी गई है और कुछ समय बाद ही लिपिक पद रिक्त हो जाता है तो आप लिपिक पद पर नियुक्त किए जाने के लिए आवेदन दे सकते हैं। यदि यह पद जिस समय आप को नियुक्त किया गया उस समय भी रिक्त था तो आप का यह अधिकार हो जाता है कि आप उस पद पर नियुक्ति प्राप्त करें।

प सब से पहले तो आप की नियुक्ति से संबंधित समस्त तथ्यों को और बाद में लिपिक पद पर की गई अनियमित नियुक्ति के संबंध में सभी तथ्य और दस्तावेज एकत्र करें। यह काम आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचना मांग कर कर सकते हैं। एक बार आप के पास सभी आवश्यक सूचनाएँ एकत्र हो जाएँ फिर इन सूचनाओं को ले कर आप अपने उच्च न्यायालय में सेवा संबंधी मामलों की प्रेक्टिस करने वाले किसी वकील से मिल लें और राय लें कि क्या किया जा सकता है? यदि आप को वकील सलाह देता है कि आप बाद में हुई लिपिक पद की नियुक्ति को निरस्त करवा कर उस के स्थान पर लिपिक का पद प्राप्त कर सकते हैं तो आप को उच्च न्यायालय में इस के लिए रिट याचिका दाखिल कर देनी चाहिए।

बैंक द्वारा ग्राहक सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करें

 मुजफ्फरनगर, उ.प्र. से मनु त्यागी ने पूछते हैं –

मेरा एक चैक जिस की वैधता की छह माह की अवधि 13 फरवरी को समाप्त होनी थी, मैं ने बैंक में 9 फरवरी को प्रस्तुत किया था। बैंक ने चैक जमा कर के मुझे रसीद प्रदान की थी।   बाद में बैंक ने मुझे चैक इस टिप्पणी के साथ वापस किया कि यह अवधिपार हो चुका है। आठ सौ रुपए के इस चैक पर बैंक ने 250 रुपए भी काट लिए। मुझे क्या करना चाहिए?

 उत्तर –

मनु जी,

दि आप के चैक की अवधि 13 फरवरी को समाप्त होने वाली थी और आप ने उसे 9 फरवरी को प्रस्तुत कर दिया था तो आप सही हैं। आपने अवधि के अंतर्गत ही वह चैक बैंक में प्रस्तुत कर दिया था। आप के द्वारा बैंक को चैक प्रस्तुत कर दिए जाने पर आप के बैंक को वह चैक समाशोधन गृह को भेजा जाना था जहाँ संबंधित बैंक को उस का धन आप के बैंक को हस्तांतरित करना था। यह भी हो सकता है कि यह चैक आप के नगर के बाहर का हो औऱ डाक द्वारा चैक के जारी करने वाले बैंक की शाखा को भेजा गया हो। दूसरी स्थिति में आप के बैंक द्वारा भेजा गया चैक चैक जारीकर्ता बैंक की शाखा में देरी से पहुँचा हो और उन्हों ने अवधिपार होने के कारण चैक की राशि देने से इन्कार कर दिया हो। दोनों ही स्थितियों में त्रुटि आप के बैंक की है। आप के बैंक ने चार दिन की अवधि होने के बाद भी चैक जारीकर्ता बैंक को देरी से प्रस्तुत किया है। इस तरह बैंक ने आप को ग्राहक सेवाएँ प्रदान करने में सेवा में कमी की है और इस के साथ ही आप के खाते से 250 रुपए की भी कटौती कर ली है।

प अपने बैंक को लिख कर दें कि बैंक ने सेवाएँ प्रदान करने में त्रुटि की है और आप सेवा में की गई इस त्रुटि के लिए जो भी हानियाँ आप को हुई हैं वे और जो मानसिक संताप हुआ है उस की क्षतिपूर्ति बैंक से प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप इस पत्र में जो भी हानियाँ इस सेवा में कमी के कारण आप को हुई हैं और जो मानसिक संताप आप को हुआ है उस का मूल्यांकन कर बैंक से मांग करें कि वह इस क्षतिपूर्ति राशि का वह आप को निश्चित समय में ( इस के लिए एक-माह का समय बैंक को दिया जा सकता है) भुगतान करे। यदि आप का बैंक इस मामले में आप के साथ वार्ता करता है और आप की क्षतियों की समुचित पूर्ति करने को तैयार हो जाता है तो आप बैंक के साथ इस मामले को आपसी सहमति से निपटा सकते हैं। यदि आप का बैंक आप की क्षतियों की पूर्ति के लिए तैयार नहीं होता है तो आप को चाहिए कि आप अपने जिले के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत करें। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच आप को बैंक से उचित क्षतिपूर्ति दिलाएगा।

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