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सहकारी समितियाँ कब सूचना अधिकार कानून में आती हैं?

RTIसमस्या-

विजय लूनिया ने कवर्धा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

क्या ऐसी सहकारी समिति जो की राज्य शासन के नियंत्रण मे हो और शासन द्वारा करोडों रूपए पूंजी  निवेश किया गया हो एवं जिसका नियंत्रण भी शासन के हाथ में हो क्या ऐसी सहकारी समिती  सूचना के अधिकार कानून में आती है?

समाधान-

सामान्य रूप से सहकारी समितियाँ सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत नहीं आती हैं। लेकिन यदि किसी सहकारी समिति का स्वामित्व, नियन्त्रण किसी सरकार के हाथ में हो या वह सबस्टेंशियली सरकार द्वारा वित्तपोषित हो तो ऐसी सहकारी समिति सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत आएगी तथा उस से सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत सूचना प्राप्त की जा सकती है।

इस संबंध में 7 अक्टूबर 2013 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Thalappalam Ser.Coop.Bank Ltd.& … vs State Of Kerala & Ors के प्रकरण में पारित निर्णय में स्पष्ट किया गया है कि सहकारी समितियाँ सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत नहीं आती हैं, लेकिन यदि किसी सहकारी समिति का स्वामित्व, नियन्त्रण किसी सरकार के हाथ में हो या वह सबस्टेंशियली सरकार द्वारा वित्तपोषित हो तो ऐसी सहकारी समिति सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत आएगी तथा उस से सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत सूचना प्राप्त की जा सकती है।

एनजीओ क्या हैं, कैसे बनाए जा सकते हैं और इन के माध्यम से क्या काम किए जा सकते हैं?

Rural development NGOसमस्या-
शरणजोत सिंह और नवदीप ने अनूपगढ़, राजस्थान पूछा है-

मैं शरणजोत सिंह एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ मेरा गाँव चाक 27/ए तहसील अनूपगढ़ जिला श्रीगंगानगर है। हमारे गाँव की गलियों का बहुत बुरा हाल है, हम ने कोशिश की लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा है। मुझे सलाह दें कि मैं क्या कर सकता हूँ?

हीं नवदीप ने पूछा है कि मैं एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) खोलना चाहता हूँ, मैं इसे कैसे आरंभ कर सकता हूँ? इस का पंजीयन कहाँ से हो सकता है?

समाधान-

नजीओ का शाब्दिक अर्थ गैर सरकारी संगठन है। इस का विकास अमरीका से हुआ है। अमरीका में सरकार बहुत से सामाजिक कार्य स्वयं करने के स्थान पर इन संगठनों के माध्यम से अनुदान दे कर कराती है। इस कारण से वे लाभ या व्यवसाय के कामों के अतिरिक्त अन्य कार्यों को करने के उद्देश्य से निर्मित गैर सरकारी संगठन जो कि सरकार से या किसी धनी संस्था से अनुदान प्राप्त कर के सामाजिक कार्य करते हैं एनजीओ कहे जाते हैं।

कोई एक व्यक्ति एनजीओ नहीं होता अपितु एक संस्था के रूप में पंजीकृत होने के बाद विधिक व्यक्ति बन जाता है। भारत में लगभग सभी एनजीओ सोसायटीज एक्ट के अन्तर्गत बनाए जाते हैं। इस के लिए केन्द्रीय कानून सोसायटीज एक्ट है तथा राजस्थान में राजस्थान सोसायटीज एक्ट बना हुआ है। कोई भी 7 या अधिक व्यक्ति आपस में मिल कर कोई सोसायटी बना सकते हैं और सोसायटीज एक्ट के अन्तर्गत उसे पंजीकृत करवा सकते हैं। सोसायटी बनाने के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी होता है कि उस संगठन की कार्यकारी समिति कैसे बनेगी और कैसे कार्यकरेगी, उस के लिए धन कैसे एकत्र किया जाएगा और कैसे खर्च किया जाएगा आदि आदि। इस को लिए नियम बनाने होते हैं और उन्हें पंजीकृत करवाना होता है। राजस्थान में सहकारी समिति के पंजीयक, अतिरिक्त पंजीयकों और डिप्टी पंजीयकों को ही सोसायटीज एक्ट के अंतर्गत पंजीयक बना रखा है। आप उन के कार्यालय से नमूने के नियम की प्रतिलिपि, आवेदन पत्र की प्रति प्राप्त कर सकते हैं और उस में अपने अनुरूप संशोधन कर के अपने नियम बना कर सोसायटी का पंजीयन करवा सकते हैं। यहाँ नवदीप जी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे किस उद्देश्य के लिए एनजीओ बनाना चाहते हैं। लेकिन यदि उन का इरादा कोई व्यक्तिगत लाभ का काम करने का है तो एनजीओ उस के लिए उचित माध्यम नहीं है।

धर शरणजोत सिंह की समस्या यह है कि गाँव में अव्यवस्था है और उस बारे में उन की कोई सुनता नहीं है। वैसे यह काम गाँव की पंचायत का है। उसे ये सब कार्य करना चाहिए। लेकिन जब तक जनता का दबाव नहीं होता और ग्राम पंचायत में संसाधन और काम करने की इच्छा शक्ति नहीं होती ऐसे कार्य नहीं होते। इस के लिए गाँव में जन दबाव निर्मित करना आवश्यक है। यह काम कोई गैर सरकारी संगठन ही कर सकता है।

रणजोत सिंह जी गाँव के अन्य कम से कम छह और लोगों को एकत्र कर के सोसायटीज एक्ट में एक सोसायटी का निर्माण कर सकते हैं और उसे पंजीकृत करवा सकते हैं। वे इस सोसायटी की सदस्यता बढ़ा सकते हैं। इस के माध्यम से वे ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद पर जन दबाव पैदा कर सकते हैं। वे इस सोसायटी के माध्यम से गाँव के विकास के लिए काम कर सकते हैं, रोजगार के साधन जुटाने के काम कर सकते हैं। गाँव और ग्रामीणों के विकास के लिए बनने वाली सरकारी योजनाओं से सोसायटी के लिए धन प्राप्त कर गाँव और ग्रामीणों के सर्वांगीण विकास के लिए काम कर सकते हैं।

व्यवस्थागत दोषों के विरुद्ध सामूहिक या संस्थागत कार्यवाही करने पर ही सुधार की गुंजाइश हो सकती है

समस्या-

ग्राम/पोस्ट-परेऊ, तहसील-बायतु, जिला-बाड़मेर (राज.) से मिश्रे खान ने पूछा है- 

मैं बीएससी अंतिम वर्ष का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जोधपुर का नियमित छात्र हूँ।  मैं एक साल पहले मेरे गाँव परेऊ {तहसील-बायतु, जिला-बाङमेर (राज.)} के एक निजी विद्यालय में अध्यापन करने लगा।  मुझे एक महीने में ही बिना कोई कारण बताए ही निकाल दिया।  मैं पहली बार किसी विद्यालय में लगा था, इसलिए मुझे पता नहीं था कि कर्मचारी उपस्थिति रजिस्टर भी होता है। इसलिए उसमें मैंने हस्ताक्षर नहीं किए, न ही उस में मेरा नाम लिखा गया। निजी विद्यालय के व्यवस्थापक तथा प्रधानाध्यापक बहुसंख्यक धनाढ्य परिवार से हैं तथा उनकी अधिकारियों तक पहुँच है। वे अपनी मनमर्जी से फीस वसूलते हैं, तथा अपना रोब चलाते हैं। इस विद्यालय में 600 विद्यार्थी पढते हैं। विद्यालय शुभारम्भ से विद्यालय परिसर मे बीएसएनएल टॉवर लगा हुआ है। विद्यालय में शौचालय, पुस्तकालय तथा खेल मैदान की व्यवस्था नहीं है।  कक्षा कक्ष बहुत छोटे हैं, छात्र अक्सर बीमार रहते हैं। विद्यालय में मँहगी पुस्तकें बेची जाती हैं जिन्हें खरीदना अनिवार्य है।

सूचना

मित्रों व पाठको!

तीसरा खंबा के पास कानूनी सलाह/समाधान चाहने के लिए इन दिनों बहुत प्रश्न लंबित हैं। एक दिन में अधिक से अधिक दो प्रश्नों का उत्तर दिया जाना संभव होता है। इस कारण से ऐसे प्रश्न जिन का समाधान पूर्व में दिेए गए प्रश्न से हो सकता है, हम नहीं दे पा रहे हैं। जिस प्रश्न के बारे में लगता है कि उस का उत्तर तुरंत दिया जाना चाहिए उस का समाधान हम जल्दी देने का प्रयत्न करते हैं। आज कल अनेक प्रश्नों का उत्तर देने में एक सप्ताह से अधिक समय लग रहा है। कुछ प्रश्न बिलकुल अधूरे होते हैं। उन का उत्तर हम नही दे सकते।  आशा है जिन पाठकों को इस से असुविधा हो रही है वे हमारी सीमाएं जान कर हमें क्षमा करेंगे।

अप्रशिक्षित अध्यापकों द्वारा छात्रों की पिटाई की जाती है।  इसी विद्यालय में मेरा छोटा भाई गत सत्र कक्षा 5 में पढता था।    मैं ने उपरोक्त असुविधाओं को देखते हुए मेरे भाई की टी.सी. मांगी तो व्यवस्थापक ने टी.सी. देने से इनकार कर दिया, तथा मुझसे और फीस मांगने लगे जो मैंने भर दी।  रसीदें देखने पर पता चला कि मुझे अलग-अलग प्रकार की रसीदें दी गई है। कभी पीले रंग की तो कभी गुलाबी रंग की, एक में विद्यालय का नाम सरस्वती विद्या मन्दिर तो दूसरी में सरस्वती शिक्षण संस्थान।  रसीद में फीस का पूरा ब्यौरा नहीं दिया गया है। रसीद में लिखे गये रुपयों से शुरू होकर रसीद पर एक किनारे लिखे गए प्राप्तकर्ता व दूसरे किनारे पर लिखे गए प्रधानाध्यापक तक एक टेड़ी-मेड़ी अनवरत लाईन खींची गई है जिसे हस्ताक्षर बताया है। मुझे संदेह है कि कहीं ये फर्जी रसीद तो नहीं। साथ ही किसी रसीद में शौकीन खॉन पुत्र अकबर खॉन तो किसी रसीद में अकबर खॉन पुत्र शौकीन खॉन लिख दिया जिससे मेरे भाई की पूरे विद्यालय में मानहानि हुई।  मैं ने उपरोक्त समस्याओं तथा विद्यालय की अव्यवस्थाओं के बारे में शिक्षा विभाग के अधिकारियों (नॉडल अधिकारी- परेऊ, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी- बायतु, प्रारम्भिक जिला शिक्षा अधिकारी-बाड़मेर), जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी-बाड़मेर तथा राज्य उपभोक्ता मंच-जयपुर को लिखित में शिकायत भेजी।  इसके उपरान्त मुझे पांच दिन पश्चात टी.सी. जारी की गई तथा फीस का ब्यौरा नहीं दिया तथा फीस तय की हुई है या नहीं के बारे में नहीं बताया। उपरोक्त अधिकारियों को लिखित में शिकायत भेजने के साढे तीन माह पश्चात भी मुझे कोई कार्यवाही होती नजर नहीं आई, बल्कि उस विद्यालय को एक माह पूर्व नियमों के विरुध्द अधिकारियों ने उच्च प्राथमिक से माध्यमिक में क्रमोन्नत कर दिया। जब कि सारी अव्यवस्थाएँ जस की तस हैं।  मैं ने एक माह पूर्व बी.ई.ओ. बायतु से आरटीआई के तहत मेरे द्वारा भेजे गए पत्र पर की गई कार्यवाही का विवरण मांगा वो भी 30 दिन पूरे होने के बावजूद मुझे सूचना नहीं मिली। स्कूल में लगे टॉवर, अन्य अव्यवस्थाओं तथा रसीद सम्बन्धी समस्याओं के बारे में मैं ने पंजीकृत डाक द्वारा शिक्षा अधिकारियों{नॉडल अधिकारी-परेऊ, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी-बायतु तथा जिला शिक्षा अधिकारी-बाङमेर} तक शिकायत भेजी फिर भी कार्यवाही नहीं हुई। तब मैं ने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से सूचना के अधिकार के तहत कार्यवाही का ब्यौरा मांगा। 30 दिन के बाद सूचना नहीं मिलने पर प्रथम अपील जिला शिक्षा अधिकारी बाङमेर को भेजी है।  मैं जानना चाहता हूँ कि –

1. क्या मैं किसी निजी विद्यालय मे अध्यापक के पद पर रह सकता हूँ?
2. क्या मैं विद्यालय से पूछ सकता हूँ कि मुझे क्यों हटाया गया? जबकि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन विद्यालय के छात्र गवाह जरूर हैं।
3. क्या विद्यालय अपने मर्जी से विद्या मन्दिर या संस्थान लिख सकता है?  रसीद अलग-अलग रंग की रख सकता है? रसीद में कभी पुत्र की जगह पिता का नाम लिख कर मान-हानि करे तो क्या कार्यवाही हो सकती है? तथा क्या हस्ताक्षर किसी भी प्रकार का हो सकता है?
4. विद्यालय में बीएसएनएल का टावर लगा हुआ है तथा अन्य सरकारी नियमानुसार सुविधाएँ नही हैं। जिला शिक्षा अधिकारी को ये सब पता है। इस मामले में कैसे कार्यवाही हो?

समाधान-

मिश्रे खॉन जी, सब से पहले तो आप को इस बात के लिए धन्यवाद दूँ कि आप ने अपने मामले को पूरे विस्तार के साथ लिखा है। इस से मामले को समझने में हमें आसानी हुई। आप जिस तरह के विद्यालय की बात कर रहे हैं उसी तरह के विद्यालय गली-गली और गाँव-गाँव में खुले हुए हैं। सब को पता है कि ये विद्यालय नियम विरुद्ध चल रहे हैं। इन में शिक्षार्थी और उन के अभिभावकों का शोषण होता है। लेकिन उन की न तो कोई शिकायत होती है और होती है तो उन्हें रफा दफा कर दिया जाता है। कानूनी लड़ाई इतनी लंबी और खर्चीली होती है और कोई भी व्यक्तिगत रूप से इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहता। उसी का नतीजा है कि ये विद्यालय अधिकारियों और विद्यालय प्रबंधकों की मिलीभगत से चल रहे हैं। राज्य के दोनों प्रमुख दलों से इन की सांठ गांठ होती है। उन के नेताओं और संगठनों को ये लोग सुविधाएँ और चंदा देते हैं। इसी से यह सब चल रहा है। यह सब मौजूदा व्यवस्था का अंग है। व्यवस्थागत दोषों के विरुद्ध सामूहिक या संस्थागत रूप से इन मामलों को उठाया जाए तो इन में कुछ सुधार की गुंजाइश हो सकती है। विद्यालय संचालक धनाड्य परिवार से होने से तो यह पता लगता है कि वे राजनीति और प्रशासन पर प्रभाव रखते हैं। लेकिन बहुसंख्यक होने से कोई अंतर नहीं पड़ता है। हमारे नगर में अनेक अल्पसंख्यक धनाड्य इसी तरह के विद्यालय संचालित कर रहे हैं। खैर, आप के द्वारा बताए गए तथ्यों के आधार पर आप के प्रश्नों के उत्तर दिए जाएँ।

प के पहले प्रश्न का उत्तर कि आप निजी विद्यालय में अध्यापक के पद पर रह सकते हैं। आप के विश्वविद्यालय के नियमित विद्यार्थी होना इस काम में बाधा नहीं है।  लेकिन आप के अध्यापन का समय और आप के विश्व विद्यालय में अध्ययन का समय एक नहीं हो सकता। क्यों कि विश्वविद्यालय में भी एक निश्चित संख्या में अपनी उपस्थिति बनाए रखना आप के लिए आवश्यक है। निश्चित रूप से आप बाड़मेर रह कर अध्यापक की यह नौकरी करना आप के लिए उचित नहीं था। क्यों कि उस नौकरी को करते हुए आप विश्वविद्यालय में उपस्थित नहीं हो सकते थे। हाँ आप किसी ऐसे निजी विद्यालय में नौकरी कर सकते हैं जो कि विश्वविद्यालय से नजदीक हो और आप दोनों स्थानों पर भिन्न भिन्न समयों पर उपस्थित रह सकते हों।

प का दूसरा प्रश्न का उत्तर है कि आप विद्यालय से पूछ सकते हैं कि आप को क्यों हटाया गया। लेकिन उस का उत्तर आप को यह मिलेगा कि आप को नौकरी पर रखा ही नहीं गया था।  वे यह भी कह सकते हैं कि आप तो स्वैच्छिक सेवाएँ दे रहे थे, आप विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हैं और पढ़ते हुए आप के लिए यह संभव नहीं था कि आप यह नौकरी कर सकें। आप के पास कोई दस्तावेजी साक्ष्य़ भी नहीं है जिस से आप यह साबित कर सकें कि आप ने किसी वेतनभोगी शिक्षक के रूप में उन के यहाँ काम किया था। छात्रों की गवाही से आप यह तो साबित कर सकते हैं कि आप ने वहाँ अध्यापन किया था लेकिन यह नहीं कि आप वहाँ नियोजित थे।

प के तीसरे प्रश्न का उत्तर है कि वास्तव में प्रत्येक मान्यता प्राप्त विद्यालय का संचालन एक पंजीकृत सोसायटी ही कर सकती है। इस कारण एक तो उस विद्यालय का संचालन करने वाली संस्था है जिसे आप के मामले में संस्थान कहा गया है दूसरी संस्था विद्यालय स्वयं है। दोनों संस्थाओं की अलग अलग रंग की रसीदें हो सकती हैं। उन्हों ने आप को जो रसीद विद्यालय के नाम से दी है वह शुल्क की रसीद है और जो संस्थान के नाम से दी गई है वस्तुतः वह संस्था को दिए गए अनुदान की रसीद है। लेकिन यदि स्थानान्तरण प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए संस्था के लिए अनुदान लिया गया है तो यह गंभीर बात है। इस की शिकायत आप शिक्षा अधिकारी और शिक्षा निदेशक तक को कर सकते हैं। इस के अतिरिक्त विद्यार्थी एक उपभोक्ता भी है उस के संरक्षक उपभोक्ता न्यायालय में शुल्क की कह कर संस्थान के लिए अनुदान प्राप्त करने के लिए शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। उपभोक्ता न्यायालय को शिकायत एक दावे के रूप में प्रस्तुत की जाती है। आप के द्वारा डाक से प्रेषित की गई शिकायत पर निश्चित रूप से की कार्यवाही नहीं होगी। यदि आप कार्यवाही चाहते हैं तो आप को एक दावे के रूप में शिकायत प्रस्तुत करनी होगी तथा अपनी शिकायत के तथ्य न्यायालय के समक्ष साबित करने के लिए दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य (शपथ पत्र के रूप में) भी प्रस्तुत करनी होगी।  उपभोक्ता न्यायालय आप की शिकायत की सुनवाई कर उचित निर्णय प्रदान करेगा। आप का मामला इतनी बड़ी मानहानि का नहीं है कि वर्तमान व्यवस्था में उस के लिए कानूनी कार्यवाही की जाए। फिर भी आप मानहानि की क्षतिपूर्ति के लिए मानहानि का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

बीएसएनएल के टावर से संबंधित शिकायत आप ने की है। आप पुनः इस की शिकायत कलेक्टर और संभागीय आयुक्त से कर सकते हैं। वैसे राज्य सरकार ने सभी स्कूलों मोबाइल टावर हटाने के निर्देश दे दिए हैं। हो सकता है इस स्कूल का मोबाइल टावर हट चुका हो।

शिक्षा अधिकारी को निजी विद्यालय से संबंधित जानकारी आप को देनी चाहिए थी। लेकिन नहीं दी है। आप ने पहली अपील की है। निश्चित रूप से उस के अच्छे परिणाम आप को प्राप्त होंगे।

सोसायटी और ट्रेड यूनियनों में आरक्षण के लिए कोई स्थान नहीं

मैंने बी.एस.एन.एल.से जानकारी मांगी थी कि क्या अधिकृत कामगार या अधिकारी संघठण या यूनियन के पदाधिकारियों में अल्पसंख्यक, महिला तथा ओबीसी के लिए आरक्षण की सुविधा उपलब्ध है? मुझे जवाब मिला कि सभी संघठण या युनियन सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत काम कर रहे है इसलिए उनके पदाधिकारियों में किसी प्रकार का आरक्षण रखने के लिए सरकारी कंपनी बाध्य नहीं कर सकती। क्या यह सही है ? किसी सरकारी क्षेत्र में कार्यरत किसी संघठण या युनियन के पदाधिकारियों में महिला, अल्पसंख्यक , ओबीसी, बीसी के लिए आरक्षण नहीं होना चाहिए

-विजय प्रभाकर नगरकर, कामगार संघठण, अहमदनगर, महाराष्ट्र

धिकांश कामगार, मजदूर या कर्मचारियों के संगठन ट्रेडयूनियन एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत होते हैं। ट्रेड यूनियन एक्ट के अंतर्गत पंजीकरण के लिए कुछ अर्हताएँ आवश्यक हैं, उन को पूरा न करने पर लोग ऐसे संगठनों को सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत भी पंजीकृत करवा लेते हैं।

प को बी.एस.एन.एल. ने सही जानकारी दी है। चाहे वह ट्रेड यूनियन एक्ट में पंजीकृत ट्रेड यूनियन हो अथवा सोसायटी एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत सोसायटी, दोनों ही प्रकार के संगठन स्वैच्छिक संगठन हैं। इन का गठन कर्मचारी और अन्य व्यक्ति करते हैं। इन पर आरक्षण लागू नहीं है और न ही किया जा सकता है। कोई सोसायटी केवल किसी ब्राह्मण समुदाय की हो सकती है। इसी तरह किसी उद्योग के किसी विशिष्ठ श्रेणी के कर्मचारी अपना अलग ट्रेड यूनियन संगठन बना सकते हैं। मेरे स्वयं के ज्ञान में है कि कुछ विभागों के अनुसूचित जाति के कर्माचारियों ने अपना अलग संगठन बना रखा है और अनुसूचित जनजाति के लोगों ने अपना अलग संगठन पंजीकृत करवा रखा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण संभव भी नहीं है। फिर कामगारों के संगठन केवल कामगारों के संगठन होते हैं। उन में आरक्षण कामगारों की एकता के लिए शत्रु का कार्य करेगा। ऐसे संगठनों में तो हर व्यक्ति एक कामगार मात्र होता है उस की कोई जाति नहीं होती और न ही कोई धर्म होता है। एक ओर कामगार संगठन सारी दुनिया के मजदूरों एक हो! नारा लगाते हैं वहीं उन में आरक्षण क्या उन के इस लक्ष्य में बाधा नहीं बनेगा?

स्कूटर मिस्त्री दरवाजों के सामने स्कूटर लगा कर रास्ता बंद कर देता है और गंदगी फैलाता है, क्या किया जाए?

 जयपुर से रईस खान पूछते हैं-
मारे घर के सामने एक स्कूटर सुधारने की दुकान है, उस का मालिक पूरे रोड़ पर गाड़ियाँ खड़ी कर देता है। वह पड़ौसियों और हमारे मकान के दरवाजों/गेटों के सामने गाड़ियाँ लगा कर उन्हें ठीक करता रहता है, इस से पूरे रोड़ पर जाम हो जाता है। हमारे घर भी काफी काला और गंदगी से भरा हो गया है। उस से कई बार झगड़ा हुआ। उस को मुहल्ले में कोई भी कुछ नहीं बोलता है वह बहुत बदतमीज किस्म का आदमी है। उस की दुकान मस्जिद की है, वह उस पर भी कब्जा कर के बैठा है। मस्जिद की कमेटी के कुछ आदमी उस के साथ मिले हुए हैं। उसे कैसे सबक सिखाया जाए कि वह लोगों को परेशान करना बंद कर दे। नगर निगम में उस ने सेटिंग कर रखी है। उस के खिलाफ मैं उच्च स्तरीय कार्यवाही करना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें। 
 उत्तर –
रईस भाई,
प ने जो समस्या बताई है वह केवल आप की नहीं है अपितु आप की गली के अधिकांश लोगों की है। इतना ही नहीं ऐसी समस्या केवल आप के मुहल्ले या शहर की हो। यह हर मुहल्ले और शहर में हो रहा है। यदि किसी स्थान पर कोई लड़ने-झगड़ने वाला व्यक्ति है और नगर निगम तथा पुलिस वालों से सांठ-गांठ कर के रखता है तो उस के विरुद्ध कोई भी नहीं बोलना चाहता। उस का कारण है कि यदि कोई व्यक्ति अकेला बोलता है तो वह व्यक्ति पहले तो उसी पर हावी होने की चेष्ठा करता है। कोई यदि नगर निगम या पुलिस को शिकायत करता है तो वहाँ उसे किसी तरह की सहायता नहीं मिलती। नतीजा यह होता है कि शिकायत करने वाले व्यक्ति को हानि होती है और वह थक हार कर बैठ जाता है। अदालतों की भी स्थिति ऐसी ही है वहाँ आप शिकायत करते  हैं तो शिकायत की सुनवाई में बरसों लग जाते हैं। मस्जिद कमेटी तक कुछ नहीं कर पाती है। कुछ लोग यह कह कर  ऐसे व्यक्तियों की तरफदारी करते हैं कि एक गरीब आदमी की रोजी को क्यों लात मारी जाए?
सी समस्याएँ व्यक्तिगत न हो कर सामाजिक हैं। इन समस्याओं सामाजिक रूप से ही निपटना चाहिए। वस्तुतः मुख्य बाजार या रिहायशी इलाके में इस तरह की दुकानें होनी ही नहीं चाहिए। अनेक शहरों में ऐसी दुकानों को नगर निगमो द्वारा हटा दिया गया है। आप भी ऐसी दुकान को हटवा सकते हैं लेकिन उस के लिए आप को कमर कसनी होगी। सब से पहले तो आप को इस समस्या के हल के लिए अपने ही मुहल्ले में समर्थन जुटाना होगा। इस के लिए आप यह कर सकते हैं कि आप कलेक्टर के नाम एक ज्ञापन बनाएँ और उस पर मुहल्ले में इस मिस्त्री से परेशान लोगों से हस्ताक्षर करवाएँ। इस काम में आरंभ में आप को परेशानी आ सकती है लेकिन आप प्रयत्न करेंगे और लोगों को समझाएँगे तो लोग हस्ताक्षर करने को तैयार हो जाएंगे। इस के उपरांत आप उस ज्ञापन को ले कर एक-दो लोगों को साथ ले जा कर कलेक्टर से मिल सकते हैं। यदि आप इस तरह का कई लोगों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन ले कर कलेक्टर से मिलें तो कलेक्टर उस पर कुछ न कुछ कार्यवाही अवश्य करेगा। उस की कार्यवाही से कोई हल न निकले तो सप्ताह भर बाद फिर से कलेक्टर से मिलें। जब तक कार्यवाही नहीं हो उस से मिलते रहें। मुझे लगता है इस विधि से आप की समस्या का कुछ तो हल निकल ही आएगा। 
हाँ तक कानून का प्रश्न है। मिस्त्री द्वारा इस तरह से मार्ग को अवरुद्

आर्य समाज में विवाह के उपरांत पत्नी और उस के परिजन विवाह से इंन्कार कर रहे हैं, क्या किया जाए?

पी. साहू ने पूछा है ….

मेरे दोस्त की शादी हए दो वर्ष हो चुके हैं, आर्य समाज में लव मैरिज हुई थी। लेकिन वे दोनों साथ-साथ नहीं रहते हैं। अभी लड़की शादी से इन्कार कर रही है और उस के घर वाले भी उस शादी को फर्जी बताते हुए उस को नहीं मान रहे हैं। लड़की भी अपने परिवार की भाषा बोल रही है। शादी के समय लड़की और लड़का दोनों वयस्क थे। ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए? और लड़का उस लड़की को कदापि नहीं छोड़ना चाहता है। कृपया सलाह दें।  
उत्तर –

साहू जी!

आर्य समाज में जो विवाह होते हैं वे सभी हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत होते हैं।  आर्य समाज वाले आम तौर पर विवाहों की पंजिका रखते हैं और प्रमाणपत्र जारी करते हैं। विवाह के पूर्व यह भी जानकारी कर लेते हैं कि दोनों पक्ष विवाह के योग्य हैं या नहीं और विवाह दोनों की पूर्ण सहमति से हो रहा है अथवा नहीं। इस कारण से आर्यसमाज में संपन्न विवाह पूरी तरह से वैध है। यदि पत्नी विवाह के उपरांत विवाह से इन्कार करती है और पति के साथ रहने से इन्कार करती है तो पति के पास उस का उपाय यही है कि वह परिवार न्यायालय अथवा जिला न्यायालय जिसे भी क्षेत्राधिकार प्राप्त हो उस के समक्ष हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-9 के अंतर्गत दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए आवेदन प्रस्तुत करे। वहाँ यह बात तय हो जाएगी कि उन का विवाह वैध है अथवा नहीं। यह बात तय हो जाने पर दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित हो जाएगी। 
यदि यह डिक्री पारित हो जाने के उपरांत भी पत्नी अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती है तो फिर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करना ही एक मात्र साधन शेष रह जाएगा। क्यों कि किसी भी पत्नी या व्यक्ति को अपने साथ रखने के लिए जबरन तो बाध्य नहीं किया जा सकता है। दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना की डिक्री पारित होने के उपरांत विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करना आसान होगा। और यदि आप को लगता है कि पत्नी उस के माता-पिता और अन्य परिजनों के दबाव में मना कर रही है तो यह भी परिवार न्यायालय में समझौते की कार्यवाही के दौरान पता लग जाएगा।
यदि आप समझते हैं कि पत्नी पर से दबाव हटते ही वह पत्नी के साथ रहने को तैयार हो जाएगी तो फिर आप उच्चन्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर के पत्नी को वहाँ पेश करने का आदेश प्राप्त कर सकते हैं अथवा जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या प्रथम खंड मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 98 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन कर के भी विधिविरुद्ध रोकी गई पत्नी को वापस करने के लिए वारंट जारी करवा कर उसे वहाँ बुलवा सकते हैं। लेकिन दोनों ही स्थानों पर पत्नी के बयान होंगे और पत्नी को उस की इच्छानुसार रहने को स्वतंत्र कर दिया जाएगा। उस के उपरांत यदि वह आप के मित्र के साथ रहना चाहती है तो उस के साथ रह लेगी और यदि वह अपने माता-पिता के साथ ही रहना चाहती है या अन्यत्र रहना चाहती है तो वहाँ जाने के लिए स्वतंत्र होगी।
यदि यह स्त्री चाहती है कि वह दूसरा विवाह कर ले या उस के माता-पिता उस का दू

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