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पिता की संपत्ति पर उस के जीते जी संतान का कोई अधिकार नहीं।

समस्या-

सहज प्रीत सिंह ने लुधियाना, की समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम सहज प्रीत सिंह है।  2006 में मेरा डाइवोर्स हो गया था। मेरा एक बेटा है जो अपनी माँ के पास है। मेरे पिता जी स. जसवीर सिंह सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम करवाना चाहते हैं लेकिन उन्हे डर है कि कहीं मेरा बेटा जो मेरी पत्नी क पास है. प्रॉपर्टी पर अधिकार मांगने ना आ जाए. मेरे पिता जी ने डाइवोर्स सेटल्मेंट के समय लिखवाया था कि मेरे पोते का किसी चीज़ पर कोई हक नहीं और उस टाइम मेरी पत्नी ने 2 लाख रुपए मांगे थे जो दे दिए थे. लेकिन क्या मेरा बेटा मुझ से या मेरे पिता जी पर प्रॉपर्टी हक के लिए कोई क़ानूनी कार्रवाई कर सकता है? जो भी प्रॉपर्टी है मेरे पिता जी ने खुद बनवाई है. जो मेरे डाइवोर्स के बाद खरीदी थी. अभी 2/3 साल में. यह प्रॉपर्टी मेरे माता जी के नाम पर है लेकिन ये मेरे खुद के पैसे से खरीदी है लेकिन रजिस्टर्ड मेरे माता जी क नाम पर है.

समाधान-

सल में जिस संपत्ति के बारे में आप चिन्तित हैं वह आपकी माताजी के नाम है और वही उस की स्वामिनी हैं। मेरा एक सवाल ये है कि क्या आप कानूनी रूप से इस समय अपने पिताजी या माताजी की संपत्ति में हिस्सा मांग सकते हैं? नहीं न, तो फिर आप का बेटा आप के जीतेजी आप की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मांग सकता। उस का कोई भी हक पैदा होगा तो तब होगा जब आप नहीं रहेंगे और आप की संपत्ति के उत्तराधिकार का प्रश्न उठेगा। आप के जीवन काल में आप के पुत्र का आप की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

माताजी के नाम जो संपत्ति है उसे वे आप के नाम वसीयत कर सकती हैं। इस से उन के जीवनकाल के बाद आप उस के स्वामी हो जाएंगे। आप अपनी संपत्ति जिसे देना चाहेँ उसे वसीयत कर सकते हैं। आप दूसरा विवाह करें तो अपनी पत्नी और होने वाली संतानों के नाम या उन में से किसी एक के नाम वसीयत कर सकते हैं। इस से आप के शेष उत्तराधिकारी उन के उत्तराधिकार के हक से वंचित हो जाएंगे। आप के जीवन काल में आप की तलाकशुदा पत्नी से उत्पन्न पुत्र का कोई हक आप की संपत्ति पर नहीं है लेकिन यदि आप अपनी संपत्ति की कोई वसीयत नहीं करते तो जो भी निर्वसीयती संपत्ति आप के जीवनकाल के उपरान्त शेष रहेगी उस में आप की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र का भी अधिकार रहेगा।

धारा 9 का आवेदन लंबित होने पर संतान की कस्टडी के लिए धारा 26 में आवेदन प्रस्तुत करें

समस्या-

रणधीर सिंह ने गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रणधीर है और मैं एक प्राइवेट जॉब करता हूँ। मेरी पत्नी सरकारी टीचर है हमारी शादी 20/05/2013 को हुई थी। हमारा एक ११ माह का बेटा भी है जिसे वो अपना साथ लेकर ८ माह से अपने मायके में रह रही है। शादी के बाद से ही उसका व्यवहार मेरे और मेरे घर वालो के प्रति ठीक नहीं था। शादी के १५ दिन बाद जब वो अपने घर गई और बाद में जब मैंने उसे आने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया । उस ने कहा कि जब आना होगा तो बता देंगे। फिर कुछ दिन बाद जब मैं उसके घर जा के बात किया तो वो आयी। कुछ दिन तक ऐसे ही चलता रहा वो हमेशा अपने घर चली जाती है और बार बार कहने पर ही आती है। जब वो मेरे घर पे रहते तो उसके घर से किसी न किसी बहाने लोग लेने चले आते थे जिस वजह से हम में कई बार झगड़ा भी हो जाता था। उसने बिना हमें बताये बच्चे का मुंडन करा दिया है। जब इस बात को ले कर हमारा झगड़ा हो गया जिसके बाद से वो और उसके भाई मुझे बच्चे से नहीं मिलने दे रहे हैं। जब मैं बच्चे से मिलने के लिए जाता हूँ तो वो गाली गलौज करते हैं और बच्चे को कमरे में बंद कर देते हैं। वे धमकी देते हैं कि वो मुझ पे पुलिस केस कर देंगे। अभी मैंने 20/11/2016 को हिन्दू विवाह अधिनियम से विदाई का दावा किया है जिसकी तारीख  03/02/2017 को है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं अपने बच्चे से मिलने के लिए क्या कर सकता हूँ? जिससे मैं अपने बच्चे से कुछ समय के लिए मिल सकूँ? और यदि वो हम पे 498 और घरेलू हिंसा का केस करती है और हम उस से बरी हो जाते है तो मैं उस पे आपराधिक मानहानि का केस कर सकता हूँ या नहीं?

समाधान-

आप के मामले में सारा झगड़ा बराबरी के व्यवहार का प्रतीत होता है। आप की पत्नी स्वावलंबी है और आप से ही नहीं आप के परिवार के लोगों से भी समानता का व्यवहार चाहती है। लेकिन आप के पारिवारिक सेटअप में वह संभव प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि आप और आप का परिवार समान व्यवहार की बात को स्वीकार कर ले तो आप दोनों के बीच की समस्या हल हो सकती है अन्यथा आप के पास विवाह विच्छेद का ही मार्ग रह जाएगा।

आप ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रकरण प्रस्तुत कर दिया है। इस कारण से आप को अधिकार है कि आप बच्चे की कस्टडी और उस से मिलने के लिए समय और तरीका निर्धारित करने हेतु न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

यदि आप के विरुद्ध आप की पत्नी घरेलू हिंसा में कोई आवेदन प्रस्तुत करती है और वह मिथ्या सिद्ध होता है तो आप उस के विरुद्ध अपराधिक मानहानि का मुकदमा कर सकते हैं साथ ही आप दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए वाद प्रस्तुत कर हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं।

स्वअर्जित संपत्ति पर संपत्ति के स्वामी के जीवित रहते किसी का कोई अधिकार नहीं।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

रोहित ने पटना, बिहारसे पूछा है-

मैं एक निजी संस्थान में बतौर शिक्षक कार्यरत हूँ। मेरी उम्र 31 वर्ष है, इसी वर्ष फ़रवरी में विवाह हुआ है। मेरी माँ की मृत्यु 1994 में हो गयी थी। उस माँ से मेरी एक छोटी बहन (अब विवाहित) तथा एक छोटा भाई है। मेरे पिताजी ने 1995 में पुनर्विवाह किया जिस से उन्हें एक पुत्र है। हम भाई बहन ने हमेशा उनमें माँ ढूंढा मगर उन्हें हमारे लिए कोई वात्सल्य न था, ना आब तक है। मुझे पढ़ाई और कैरियर के नाम पर हमेशा घर से दूर रखा गया। किसी तरह 2016 में मेरी और मेरी बहन की शादी (उनकी मर्ज़ी से ही) हुई। उनकी मर्ज़ी से और पूरी तरह सामाजिक रीति रिवाजों के साथ विवाह करने के बावजूद आज की तारीख में मेरे पिताजी का रवैया मेरा और मेरी पत्नी के प्रति पूरी तरह बदला हुआ है। वे (साथ ही उनकी पत्नी भी) हमे अपने घर से निकल जाने को अक्सर धमकाते रहते हैं। मेरा प्रश्न है कि क्या मेरा कोई क़ानूनी हक़ नहीं है इस घर में रहने का ? मेरे पिता की सम्पत्ति में क्या मेरा कोई हक़ नहीं ? यह घर 2003 में पिताजी ने अपनी दूसरी पत्नी के नाम से बनवाया है।

समाधान-

पुत्र, पुत्री का अपने पिता की संपत्ति में पिता के जीवित रहते कोई अधिकार नहीं होता।  किसी भी व्यक्ति के पुत्र, पुत्री, पत्नी, माता और पिता को स्वयं का भरण पोषण करने में सक्षम न होने पर उस से भरण पोषण का अधिकार है। इस में भी पुत्र को वयस्क होने तक, पुत्री को स्वावलम्बी होने या विवाह होने तक ही यह अधिकार प्राप्त है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति है जिस में पिता का हिस्सा है तो पिता के उस हिस्से में पुत्र और अब पुत्रियों को पिता के जीवित रहते बंटवारे का अधिकार प्राप्त है। यह न पूछें कि सहदायिक संपत्ति क्या है इस के लिए आप इस साइट को सर्च कर सकते हैं जवाब मिल जाएगा।

कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति को जीते जी किसी को भी हस्तान्तरित कर सकता है, वसीयत कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय अपनी संपत्ति को निर्वसीयती छोड़ दे तो उस में उत्तराधिकार के कानून के हिसाब से उत्तराधिकारियों को हिस्सा प्राप्त होता है।

आप के मामले में जो संपत्ति आप के पिता ने आप की सौतेली माता के नाम से खरीदी है उस पर उन का खुद का कोई अधिकार नहीं है उस की स्वामिनी केवल आप की सौतेली माता ही हैं।

 

पति के देहान्त के उपरान्त उस की संपत्ति में पत्नी का अधिकार।

Hindu succession actसमस्या-

विकी पन्त ने खटीमा, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

ति की मृत्यु क़े बाद उसकी जायदाद पर मालिकाना हक किसका होगा?

सुनीता ने कुरुक्षेत्र हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरी उम्र 22 वर्ष है, मेरा सवा साल का एक पुत्र है। मेरी शादी लगभग दो साल पहले हुई थी। लेकिन कुछ समय पहले दुर्घटना में मेरे पति का देहान्‍त हो चुका है। मेरे पति के छोटे भाई से भी मेरी शादी की बात नहीं बन पाई। अब मैं यह पूछना चाहती हूं कि अगर मैं पुनर्विवाह करूँ तो मेरा व मेरे पुत्र का मेरे पहले पति व मेरे पति के पिता पर क्‍या क्‍या अधिकार हो सकता है? ताकि मैं अपना हक व अपने बेटे के भविष्‍य को दुरुस्‍त कर सकूँ।

समाधान-

ति की मृत्यु के उपरान्त उस का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार निर्धारित होता है। इस अधिनियम की धारा 8 में प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के उपलब्ध होने पर पत्नी, संतानें और माँ को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। इस तरह पति की जो भी संपत्ति है इन तीन प्रकार के उत्तराधिकारियों का उस में समान हिस्सा होता है। उदाहरण के रूप में यदि पत्नी, माँ और दो संतानें हैं तो कुल संख्या 4 होने से प्रत्येक को हिस्से में एक चौथाई संपत्ति का अधिकार प्राप्त होता है। इस संपत्ति का बंटवारा होने तक पति की संपत्ति इन चारों उत्तराधिकारियों की संयुक्त संपत्ति होती है।

दि कोई पुश्तैनी संपत्ति परिवार में मौजूद है जिस में पति का हिस्सा भी था तो उस पति के हिस्से की स्थिति भी वही होगी जो पति की अन्य संपत्ति की होगी।

सुनीता जी को और उन के पुत्र के अतिरिक्त यदि उन के पति की माँ जीवित है तो उन के पति की जो भी संपत्ति है या परिवार में किसी पुश्तैनी संपत्ति में उन के पति का पुश्तैनी हिस्सा था तो उस सब के तीन हिस्से होंगे जिस में से एक हिस्से पर सुनीता जी का तथा एक हिस्से पर उन के पुत्र का अधिकार है। वे अपने व अपने पुत्र के लिए उस संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने के लिए बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं। पुनर्विवाह करने पर कोई बाधा नहीं है क्यों कि उन्हें पति की संपत्ति में अधिकार उसी दिन प्राप्त हो गया है जिस दिन उन के पति का देहान्त हुआ है। उन से यह अधिकार पुनर्विवाह होने के कारण छीना नहीं जा सकता।

जब आप का मन खुद आप को सताए तो क्या करें?

समस्या-1

श्री चन्द्र ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ब पत्नी और बच्चे सताएं तो पति कहाँ जाये? मेरी पत्नी सरकारी नौकरी करती है तथा दोनों बच्चे वयस्क व अविवाहित हैं, तीनों मुझे लगभग 6 महीने पहले छोड़ कर चले गए, ये मेरी पत्नी द्वारा शादी के पहले दिन से ही रचा हुआ षड़यंत्र था क्योंकि 24 साल हुए परन्तु वो अपने पिता के दबाव में इस रिश्ते को निभाती रही। अब तक बच्चों को मानसिक रूप से इतना तैयार कर लिया था कि वो मुझ पर हाथ भी उठाने लगे थे। ( प्रश्न कर सकते हैं कि वो ऐसा क्यों करते थे तो मेरा जवाब यही है कि मै उनकी मन-मानी जिद व जवान लड़की का घर से रात को बाहर रहना पसंद नहीं करता था) जिस की मैंने पुलिस-कमिश्नर को मेल द्वारा शिकायत भी की, स्थानीय पुलिस -स्टेशन में शिकायत भी दर्ज करायी, परन्तु पुलिस हर बार समझौता कराती रही। कई बार घर छोड़ कर गयी या किसी ना किसी रूप से मानसिक परेशान करती रही। ,मै लोक-लिहाज की शर्म करता हुआ तथा घर की पूरी जिमेवारी संभालता हुआ, हर बार समझौता करता रहा। मैं भी एक सरकारी बैंक में कार्यरत हूँ, और अकेला रह कर इतना डिप्रेशन में आ गया हूँ कि नौकरी पर भी नहीं जा पा रहा हूँ। जाते-जाते घर, जो की किराये का है ,वहां से मेरे कच्छा-बनियान तक उठा ले गयी, जिस की पुलिस ने रोजनामचा रिपोर्ट दर्ज की किन्तु कोई कारवाही नहीं की। मैं किसी भी हालत में ‘तलाक’ लेना चाहता हूँ। मेरी उम्र ५२ साल व पत्नी की उम्र ४७ साल है। समझौते की कोई गुंजाईश नहीं है, तलाक ना देने की धमकी के साथ वो और उसके सगे मुझे धमकी देते हैं कि ना तो तुम्हें तलाक देंगे ना ही कोई पैसा। कोर्ट के धक्के लगवाएंगे और सड़ा-सड़ा कर मारेंगे, मेरे साथ कोई सहयोगी नहीं है। कई बार आत्म-हत्या का ख्याल आया। परन्तु अपने खानदान की इज्जत का ख्याल आ गया, पुलिस और वकील मेरी आर्थिक -दशा को देखते हुए उन्हीं के साथ हैं। वकीलों और कानूनी प्रकिया को तो आप जानते हैं कि कितने लंबे खींच जाते हैं ऐसे केस, और फिर वकीलों के चक्कर, उनकी फीस?  मैं एक कमरे में बंद हो कर रह रहा हूँ, लोक -लाज की शर्म में ,बहुत ज्यादा डेप्रेसिन में हूँ। आप कोई व्यायाम आदि की सलाह देंगे तो मैं बता दूँ कि मेरा बिस्तर तक से उठने का मन नहीं करता। बेटी  M.S.C कर चुकी है, बेटा B.S.C कर रहा है, जिसका EDUCATION -लोन भी सह-ऋणी होते हुए मुझे ही चुकाना है, क्यों की उस की अभी नौकरी नहीं लगी। मेरा सारा पैसा वो किसी ना किसी रूप में खर्च करवाते रहे, तथा बैंक-लोन भी काफी हो गया है। नौकरी पर ना जाने की वजह से सैलरी भी नहीं मिल रही है। २६ साल की नौकरी होने के बावजूद बैंक मुझे नौकरी से निकाल सकता है क्यों कि हम अपनी पूरी सर्विस के दौरान ३६० दिन से अधिक अवैनिक अवकाश नहीं रह सकते, पत्नी ब्रह्मकुमारी धर्म अपना चुकी है जिसे मैं कोर्ट में प्रूव नहीं कर सकता। परन्तु शारीरिक संबंध लगभग एक साल से नहीं बने। कृपया इस अँधेरी-जिंदगी में आप ही एक उम्मीद की किरण नजर आये हैं, मार्गदर्शन करें वर्ना आत्महत्या के अलावा मुझे कुछ नहीं सूझ रहा।

समाधान-

प की इस बात से हम मुतमइन नहीं कि शादी के पहले दिन से ही पत्नी आप के विरुद्ध षड़यंत्र कर रही थी और अब 24 वर्ष बाद उस षड़यंत्र का परिणाम सामने आया। हाँ यह हो सकता है कि आप की पत्नी आप के साथ रिश्ते को किसी दबाव में निभा रही हो। लेकिन यह दबाव पिता का नहीं अपितु एक स्त्री की सामाजिक स्थिति का माना जा सकता है। हो सकता है यह रिश्ता आप की पत्नी की इच्छा के विरुद्ध हुआ हो। वह विवाह ही न करना चाहती हो या उस के लिए तैयार न हो। वैसी स्थिति में विवाह हो जाने से तथा विवाह के उपरान्त जबरन होने वाले यौन व्यवहार ने उसे पति द्वेषी बना दिया हो। जिस का अनिवार्य परिणाम यह हुआ हो कि आप की पत्नी ब्रह्मकुमारी हो गयी हों। इस तरह की संस्थाएँ स्त्रियों की इन्हीं विपरीत परिस्थितियों का तो लाभ उठाती रही हैं।

प को इन परिस्थितियों के लिए सारा दोष अपनी पत्नी और बच्चों को देना बिलकुल बन्द करें और अपनी समस्या पर विचार करें। इन सारी परिस्थितियों का निर्माण करने में आप का, आप के परिवार का और सामाजिक स्थितियों का योगदान सब से अधिक रहा है। वास्तव में अधिकांश वैवाहिक समस्याएँ किसी एक व्यक्ति के दोष के कारण नहीं अपितु अपनी सामाजिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती हैं।

ब तक जो कुछ हुआ भूल जाएँ। पुलिस ने कुछ नहीं किया या अदालत कुछ नहीं करती, बहुत समय तक परिणाम नहीं देती। यह सब सोचना बन्द कीजिए। पुलिस का चरित्र और अदालतों की गति न आप बदल सकते हैं और न कोई और ये सब एक बड़े परिवर्तन के मोहताज हैं। ये तब बदलेंगे जब देश की राजनीति बदलेगी और समाजोन्मुखी होगी। वर्तमान राजनीति में तो सब कुछ बाजारोन्मुखी है। आप को अपना भविष्य का जीवन खुद तय करना होगा।

जो जा चुका, जा चुका उसे भूल जाइए। पत्नी और बच्चे आप को छोड़ कर जा चुके हैं। बच्चे वयस्क हैं उन की कोई जिम्मेदारी आप की नहीं है। पत्नी खुद कमाती हैं। वे आप से कुछ भी मांग सकने में समर्थ नहीं हैं। समझ लीजिए कि वे कभी आप के जीवन में नहीं थे। यदि आप की कोई संपत्ति है तो उस के आप स्वयं स्वामी हैं और उस का प्रबंधन खुद कर सकते हैं, किसी को हस्तान्तरित कर सकते हैं या उस की वसीयत कर सकते हैं। आप की समस्या अकेले रहने की है तो पत्नी और बच्चे तो आप के लिए षड़यंत्रकारी हैं, उन के साथ रहने के बजाए अकेले रहने की स्थिति अधिक बेहतर है। इसे आप को स्वीकार करना होगा। डिप्रेशन से निकलिए, उस के लिए जरूरी हो तो किसी मनोविज्ञानी से काउंसिलिंग लीजिए और बैंक की नौकरी पर जाना आरंभ कीजिए। आप का सब से बड़ा शत्रु तो आप का मन है जो आप को नौकरी जाने से रोकता है। उस की चिकित्सा कीजिए। यदि आपने बैंक की नौकरी पर जाना आरंभ कर दिया तो बहुत समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। शेष भी समाप्त होने का मार्ग तय होगा। बहुत लोग अकेले रहेते हैं जिन के पास अपने घर नहीं होते। दुनिया में स्त्री और बच्चों के अलावा भी बहुत कुछ है। संगीत, लेखन आदि कलाएँ हैं, सामाजिक कार्य हैं, आप नौकरी से बचे समय में उन में अपना मन लगा सकते हैं। आप ने लिखा है “जब पत्नी और बच्चे सताएं तो पति कहाँ जाये?” मैं इस के उत्तर में अब आप को कहना चाहता हूँ कि जब आप का मन खुद आप को सताए तो क्या करें?

प की पत्नी और बच्चे जाते जाते रोजनामचा में रपट दर्ज करा गये हैं या आप ने कराई है वह रपट दर्ज है। थाने से उस की प्रतिलिपि प्राप्त कीजिए। छह माह हो चुके हैं छह और निकल जाने दीजिए। उस के बाद आप डेजर्शन और पत्नी के ब्रह्मकुमारी पंथ में संन्यास ले लेने के आधार पर विवाह विच्छेद हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

बच्चे की अभिरक्षा के लिए न्यायालय बच्चे का हित देखेगा।

father daughterसमस्या-

युवराज ने बर्दमान, पश्चिम बंगाल से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 8 साल पहले हुई थी। मेरा एक 7 वर्ष का पुत्र भी है। पिछले तीन सालों से मेरी पत्नी मेरे बेटे को ले कर अपने मायके में निवास कर रही है क्यों कि उस के मायके में सिर्फ माँ अकेली है, पिता का देहान्त हो चुका है। और भाई शहर के बाहर नौकरी करता है। उस की माँ अपने गृहनगर में ही राज्य सरकार की नौकरी करती है। अब पत्नी मेरे साथ नहीं आना चाहती और आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है। उस के लिए मैं भी तैयार हूँ। लेकिन मैं अपने पुत्र की कस्टड़ी लेना चाहता हूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

वास्तव में आप की कोई समस्या ही नहीं है। यदि आप की पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है तो आप उस के सामने शर्त रख सकते हैं कि आप तभी तलाक देंगे जब वह स्वेच्छा से आप के पुत्र की कस्टड़ी आप को दे देगी। इस के लिए यदि वह तैयार हो जाती है तो आप सहमति से तलाक लेंगे तब तलाक की अर्जी में लिख सकते हैं कि पुत्र आप के साथ रहेगा। वैसे भी सहमति से तलाक की अर्जी में आप दोनों को बताना पड़ेगा कि पुत्र किस के पास रहेगा।

पुत्र किस की कस्टड़ी में रहेगा या तो आप दोनों सहमति से तय कर सकते हैं, या फिर न्यायालय तय कर सकता है। यदि न्यायालय कस्टड़ी की बात तय करता है तो वह आप दोनों की इच्छा से तय नहीं करेगा बल्कि  देखेगा कि उस का हित किस के साथ रहने में है। यह तथ्यों के आधार पर ही निश्चित किया जा सकता है कि बच्चे की कस्टड़ी किसे प्राप्त होगी। वैसे पुत्र 7 वर्ष का हो चुका है और आप आवेदन करेंगे तो उस की कस्टड़ी आप को मिल सकती है। क्यों कि आप की पत्नी के पास आय का अपना साधन है यह आप ने स्पष्ट नहीं किया। जहाँ तक देख रेख का प्रश्न है तो निश्चित रूप से चाहे लड़का हो या लड़की माँ अपने बच्चों का पालन पोषण पिता से अधिक अच्छे से कर सकती है।

मारी राय है कि आप को बच्चे की कस्टड़ी के सवाल को अभी त्याग देना चाहिए और आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। उस से आप एक नए जीवनसाथी के साथ अपना नया दाम्पत्य आरम्भ कर सकते हैं। बाद में आप को लगता है कि बच्चे का भविष्य माँ से बेहतर आप के साथ हो सकता है तो आप बाद में भी इस के लिए आवेदन कर सकते हैं।

पिता का अपनी संतान से मिलने का अधिकार

Blind father with childrenसमस्या-

अनुराग साहु ने कोरबा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मै और मेरी पत्नी पिछले 2 वर्षो से अलग रह रहे हैं। पत्नी ने मेरे व मेरे परिवार वालों के उपर 498 क आईपीसी, भरण पोषण के लिए 125 दं.प्र.सं. एवं घरेलू हिंसा अधिनियम के मुकदमे लगा रखे हैं जो न्यायालय में विचाराधीन हैं। भरण पोषण धारा 125 दं.प्र.सं. के तहत अंतरिम राशि 4000+1000 रूपये पत्नी एवं पुत्र के लिए न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया है। मैं उक्त राशि दे रहा हूँ। मेरा पुत्र 4 वर्ष 6 माह का हो गया है। मेरी पत्नी जब से मायके गयी है तब से मेरे पुत्र से मुझे मिलने नहीं देती है। पुत्र से मिलने उनके घर जाने पर उसके तथा उसके परिवार वालो के द्वारा मेरे उपर बहुत ज्यादा दुर्वव्यहार करती है एवं पुत्र से मिलने के लिए मना करती है। मेरे द्वारा कोर्ट में पुत्र से मिलने के लिए अर्जी दी गयी थी जिसे न्यायाधीश महोदय ने अवयस्क पुत्र से मिलने का कोई प्रावधान नहीं होने का आधार कह कर खारिज कर दिया गया। जिस के बाद मेरी पत्नी एवं उसके घर वालों का मनोबल और बढ़ गया है। मैं अपने पुत्र से मिलना चाहता हूँ पर वकीलों का कहना है कि पुत्र के सात वर्ष होने के बाद ही ऐसा हो सकता है। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ? क्या वास्तव में मै अपने पुत्र से कानूनन नहीं मिल सकता हूँ या कोई उपाय है जिस से मैं कानूनन उससे मिल सकूँ। कृपया मुझे मार्ग दर्शन देंवे।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप ने केवल अपने पुत्र से मिलने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था अथवा उस की कस्टडी प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। आप ने यह भी नहीं बताया कि आप ने यह आवेदन किस न्यायालय में लगाया था और स्वतंत्र रूप से लगाया था या फिर आपके द्वारा बताई गई कार्यवाहियों में किसी में लगाया गया था? इस तरह आप ने अपने मामले की पूरी जानाकारी नहीं दी है जिस के कारण कोई स्पष्ट राय देना संभव नहीं है। आपने यह भी नहीं बताया कि उस ने तो इतने मुकदमे किए हुए हैं आप ने उस पर क्या मुकदमा किया हुआ है? इतना विवाद होने पर आप को कम से कम हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा -13 के अन्तर्गत विवाह विच्छेद का मुकदमा करना चाहिए था। यदि आप के पास विवाह विच्छेद के लिए कोई आधार नहीं था तो आप को दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना का मुकदमा तो करना चाहिए था। खैर¡ पिता अपनी संतान का नैसर्गिक संरक्षक है और अपनी संतान से मिलने का उसे नैसर्गिक अधिकार है इस का किसी कानून में उल्लेख होना आवश्यक नहीं। इस अधिकार से उसे तभी वंचित किया जा सकता है जब कि उस का संतान से मिलना संतान की भलाई के लिए उचित न हो।

दि आप ने उक्त दोनों में से कोई मुकदमा नहीं किया है और आप की पत्नी ने भी हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत कोई मुकदमा नहीं किया है तो आप धारा-13 या धारा-9 में आवेदन प्रस्तुत कीजिए और उस के बाद उसी न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 में बच्चे की कस्टड़ी के लिए आवेदन प्रस्तुत कीजिए। इस आवेदन के साथ ही दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 के अन्तर्गत अस्थाई व्यादेश का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कीजिए कि जब तक कस्टड़ी का मामला तय नहीं हो जाता बच्चे से सप्ताह में दो बार मिलने और पूरे दिन साथ रहने की अनुमति प्रदान की जाए। आप को न्यायालय बच्चे से मिलने की अनुमति प्रदान करेगा। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 में कस्टड़ी के साथ ही ये सब बिन्दु तय करने का अधिकार न्यायालय को है।

दि आप ये सब कर चुके हैं और हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 में आप को बच्चे से मिलने की अनुमति नहीं दी गई है तो आप उस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय के समक्ष रिविजन या रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। उच्च न्यायालय आप को बच्चे के मिलने हेतु आदेश पारित करेगा।

पिता जो दे रहे हैं उसे ले लें, शेष के लिए प्रयत्न करना व्यर्थ है।

चरागाहसमस्या-
राजेश सिंह ने मुंबई से पूछा है-
मेरे पापा बिहार पुलिस में थे तब दो जगह पटना और कटिहार में ज़मीन लिए थे जो सोतेली माँ के नाम पर है। मेरी माँ नही है। मुझे दादी ने पाला है, पर सौतेली माँ के तंग करने पर मैं 16 साल पहले घर से भाग गया था। अब लौटा हूँ। मेरी शादी हो गई है, दो बच्चे हैं। हालत ठीक नहीं है। मुझे पापा के रिटायरमेंट के पैसे में भी माँ कुछ नहीं दे रही है। पापा 2012 में रिटायर हुए हैं। दो सौतेले 2 भाई इंजीनियर हैं। पापा भी कुछ नहीं बोलते, कहते हैं दादा की ज़मीन का 16 कट्टा में से 8 कट्टा ले कर चले जाओ। बच्चे को पढ़ा भी नहीं पा रहा हूँ, हालत खराब है। मुझे कुछ हुआ तो मेरे बच्चे का क्या होगा? समझ में नहीं आ रहा। मैं बीमार रहता हूँ। माँ पापा शहर में बनाए घर में रहते हैं। पापा के भाईयों में बटवारा नहीं हुआ इस लिए मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी गाँव में पहचान भी नहीं है। कुछ रास्ता बताएँ। सौतेली माँ के कारण मेरा बचपन और जवानी खत्म हो गई। बच्चों का भी लगता है जिन्दगी बरबाद हो जाएगी। मैं क्या करूँ?

 

समाधान-
किसी का भी जीवन बनाना उस के खुद के और परिस्थितियों के हाथ होता है। इस दुनिया में सभी पैतृक संपत्ति ले कर पैदा नहीं होते। जिन्हें पैतृक संपत्ति नहीं मिलती या जिन के माँ बाप बचपन में ही विदा ले लेते हैं वे भी अपना जीवन चला रहे हैं।
रिटायरमेंट पर जो भी राशियाँ किसी व्यक्ति को मिलती हैं वह खुद उस के भविष्य के लिए होती है, न कि उस के बच्चों के भविष्य के लिए उस राशि पर उस का खुद का अधिकार होता है। यदि आप के पिता इच्छा से या माँ के दबाव के कारण उस में से आप को कुछ नहीं देना चाहते तो आप को कुछ नहीं मिलने वाला है। उस पर निगाह बिलकुल न रखें।
प के पिता ने जो भी जमीन खरीदी है वह आप की सौतेली माँ के नाम से खरीदी है उस पर आप की सौतेली माँ का पूरा अधिकार है उस में से आप के पिता चाहते हुए भी आप को कुछ नहीं दे सकते।
प के पिता आप को पुश्तैनी जमीन 16 कट्टा में से आठ कट्टा दे रहे हैं उसे फौरन किसी भी तरह अपने नाम कराएँ, देरी न करें। देरी करने पर वह भी इधर उधर की जा सकती है। आप को अपने पिता से इस से अधिक कुछ भी कानून के माध्यम से नहीं मिल सकता इस कारण व्यर्थ कोशिश में समय और पैसा भी खराब न करें। बाकी जो कुछ करना है वह आप को और आप के बच्चों को करना है दूसरे की आस न रखें।

व्यक्ति के जीवनकाल में उस की स्वअर्जित संपत्ति पर किसी अन्य का कोई अधिकार नहीं।

Adoptionपसमस्या-
अशोक कुमार ने अलीगढ़ उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। वे अपना कमाया हुआ सारा धन मेरे भाई के बेटे पर खर्च कर रहे हैं। इस बात से मुझे कोई एतराज नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि जितना पैसा उसके ऊपर खर्च हो उतना ही मुझे भी मिले। मगर पापा ने साफ मना कर दिया है। अब मुझे क्या करना चाहिए कोई कानून है जिस से मुझे मेरा हक़ मिल सके।

समाधान-

प की तरह बहुत लोगों को यह भ्रम है कि पिता के जीते जी उन की स्वअर्जित संपत्ति पर उन का अधिकार है। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति की संपत्ति पर उस के सिवा किसी भी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। पुत्र वयस्क होने तक, पुत्री वयस्क होने तक और उस के बाद विवाह तक पिता से भरण पोषण के अधिकारी हैं। पत्नी और निराश्रित माता पिता भी भरण पोषण के अधिकारी हैं। लेकिन इन में से किसी का भी उस व्यक्ति की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

प के पिता अपनी संपत्ति को किसी भी प्रकार से खर्च कर सकते हैं। यदि वे आप को नहीं देना चाहते तो आप को उन से पाने का कोई अधिकार नहीं है। फिर वे आप के भाई के बच्चे की पढ़ाई पर खर्च कर रहे हैं, वे चाहते हैं कि वह पढ़ लिख कर कुछ बन जाए। जब कि आप को ईर्ष्या हो रही है कि आप को भी उतना ही मिलना चाहिए। ईर्ष्या से कोई अधिकार सृजित नहीं होता।

प अपने पिता से कोई धनराशि पाने के अधिकारी नहीं हैं। आप के भाई और उस के बेटे को भी ऐसा कोई अधिकार नहीं है। बस आप के पिता उन की इच्छा से यह सब कर रहे हैं, और वे कर सकते हैं।

प के पिता के जीवनकाल के बाद यदि आप के पिता ने अपनी संपत्ति की वसीयत नहीं की हो तो आप हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन की संपत्ति के हिस्से के अधिकारी हो सकते हैं।

माता-पिता के जीवित रहते उन की संपत्ति पर संतानों को कोई अधिकार नहीं।

DCF 1.0समस्या-
सचिन शर्मा ने दिल्ली  से पूछा है-

मेरी एक मित्र लड़की की एक समस्या है, जिस में आप की मदद चाहिए। उस के पास इंटरनेट न होने के कारण मैं आपको लिख रहा हूँ।  उस का भाई लगातार माता-पिता पर सम्पत्ति अपने नाम करने का दबाव बनाता है। अभी तक माता -पिता की सारी सम्पत्ति उन्हीं के नाम पर है। घर में बस माता-पिता और वो दो बहन -भाई , कुल चार सदस्य हैं।  वह जानना चाहती है कि माता पिता की सम्पति पर एक अविवाहित लड़की का क्या हक़ है? शादी से पहले औऱ बाद में क्या फर्क पड़ता है? क्या सम्पत्ति उसके भाई के नाम हो जाने से कोई फर्क पड़ेगा? कृपया उचित सलाह दे जिससे वो अपना हक़ आसानी से ले पाये।

समाधान-

ब से पहले तो यह जान लें कि संपत्ति दो प्रकार की होती है। स्थावर संपत्ति तथा चल संपत्ति। मकान जमीन आदि स्थावर संपत्तियाँ हैं, जब कि रुपया, जेवर, गाड़ी, बैक बैलेंस आदि चल संपत्तियाँ हैं। चल संबत्तियाँ जिस के कब्जे में हैं उसी के स्वामित्व की हैं। जब कि घर जमीन आदि जिस के नाम पंजीकृत हैं उस के स्वामित्व की हैं। पिता की संपत्ति पिता की है और माता की संपत्ति माता की है।

ब तक माता पिता जीवित हैं, उन की संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं है। पुत्र को वयस्क अर्थात 18 वर्ष का होने तक तथा पुत्री का उस के विवाहित होने तक मात्र भरण पोषण का अधिकार है।

माता या पिता के देहान्त के उपरान्त यदि वे परिवार के या परिवार के बाहर के किसी सदस्य के नाम  वसीयत कर देते हैं तो जो संपत्ति जिस के नाम वसीयत की गई है उस के स्वामित्व की हो जाती है।

यदि माता पिता किसी को भी वसीयत नहीं करते हैं अपनी चल संपत्ति अपने नाम ही छोड़ देते हैं तो उस संपत्ति पर उस के सभी उत्तराधिकारियों का समान अधिकार होता है। उदाहरणार्थ माता के देहान्त पर उन के नाम की संपत्ति पर पति, पुत्र व पुत्री का समान अधिकार होने से प्रत्येक का संपत्ति के तीसरे हिस्से पर अधिकार होगा। यदि पिता की मृत्यु हो जाती है तो उन की संपत्ति पर माता, पुत्र व पुत्री का समान अधिकार होगा इस तरह तीनो एक तिहाई संपत्ति के अधिकारी होंगे।

प के मामले में माता पिता पर पुत्र यह दबाव डाल रहा है कि संपत्ति उस के नाम कर दी जाए। इस का अर्थ यही है कि वह संपत्ति की वसीयत अपने नाम करवाना चाहता है। जिस का असर यह होगा कि उन के देहान्त के उपरान्त संपत्ति पुत्र की हो जाएगी। शेष दोनों उत्तराधिकारियों को कुछ नहीं मिलेगा। वसीयत इस तरह भी की जा सकती है कि माता-पिता में से किसी एक के देहान्त के उपरान्त संपत्ति दोनों में से जो भी जीवित रहेगा उस की रहेगी तथा उस की भी मृत्यु हो जाने के उपरान्त पुत्र या पुत्री की होगी या फिर दोनों को क्या क्या संपत्ति प्राप्त होगी।

स तरह वास्तव में माता-पिता की संपत्ति पर उन की संतानों को माता-पिता के जीवित रहते कोई अधिकार नहीं होता। पुत्री को विवाह तक भरण पोषण का अधिकार होता है। विवाह के बाद वह भी समाप्त हो जाता है। लेकिन माता पिता कोई निर्वसीयती संपत्ति छोड़ जाएँ तो पुत्री का उत्तराधिकार का अधिकार विवाह के बाद भी जीवन पर्यन्त बना रहता है।

जकल पुश्तैनी संपत्तियाँ नाम मात्र की रह गई हैं। यदि कोई पुश्तैनी संपत्ति हो तो 2005 से उस में पुत्री को पुत्र के समान ही प्रदान किया गया है। उस अधिकार को कैसे भी नहीं समाप्त किया जा सकता। क्यों कि वह जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाता है।

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