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तलाक के मुकदमे में ही स्त्री-धन वापस दिलाए जाने की राहत भी मांगें।

समस्या-

नताशा ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी के 4 महीने बाद से मेरी सास और पति मुझ से मारपीट करते थे क्यूं की मेरे पति को कोई और लडकी पसन्द थी। उन्होने मुझ से दहेज के लिए शादी की थी।  अखिर मे मुझे उन लोगों ने इतना सताया कि मूझे उन का घर छोड कर अना पडा। मैं ने आपने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस भी कर दिया है। जिस से मेरे पति एक दिन के लिऐ जेल भी जा चुके हैं ओर दूसरी पेशी पर अदालत सबूत मांग रही है। पर मेरे पास सबूत नहीं हैं कयूं कि मेरे पास ना फोन था ना कोई पड़ौसी मेरी मदद कर रहे है। एसे मे मैं कया करूं? मे खुद ही गवाह हूं कया अदालत मुझ पर यकीन करेगा? मे एक बार पेशी पर भी नहीं गई हूं। पेशी पर नहीं जाने से कया होता है? मूझे उन जालिमों से छूटकारा चाहिए मैं कया करूं? मेरा दहेज केसे मिलेगा? मेरा आगे पीछे कोइ सहारा नहीं है जिस कारन मुझे मेरे पति से रवानगी चाहिये मैं कया करूं?

समाधान-

प के प्रश्न से यह स्पष्ट नहीं है कि आप ने दहेज प्रताड़ना का मुकदमा कैसे किया है। यदि यह मुकदमा 498ए, व धारा 406 आईपीसी में है तो इसे देखने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इस में तो जब आप को गवाही के लिए बुलाया जाए आप अपना बयान करवा दें। बाकी सब कुछ पुलिस और सरकारी अभियोजन पक्ष देखेगा। बयान देने के सिवाय अन्य किसी भी दिन इस मुकदमे पर आप के जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

406 आईपीसी के केस में ही पुलिस को आपका दहेज का सामान बरामद कर के आप के सुपुर्द कर देना चाहिए था। वह क्यों नहीं हुआ यह बात आप उस पुलिस स्टेशन से पता करें जिस में आप ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी और जिस ने आप के मामले में आप के पति को गिरफ्तार किया था।

आप को विवाह से छुटकारा प्राप्त करने के लिए अपने पति से तलाक के लिए मुकदमा करना पड़ेगा। इसी मुकदमे में आप अपना स्त्रीधन (जिसे आप दहेज का सामान कहती हैं) मांग सकती हैं और न्यायालय आप को दिला सकता है।) इस मामले में बेहतर होगा कि आप किसी स्थानीय विश्वसनीय वकील से संपर्क कर के सलाह करें।

स्त्री को उपहार में मिली हर वस्तु उस का स्त्री-धन है।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

मुकेश सिंह ने मथुरा उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी भी और उस के मायके वाले मेरे परिवार को धमकाते हैं, कहते हैं कि दहेज का केस कर देंगे। हम ने उस से आज तक एक बात नहीं बोली है। वह हमारे ऊपर भी रेप के केस की धमकी देती है। वह सारा जेवर चुरा कर ले गयी है और अपने पापा के यहाँ रह रही है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने अपनी समस्या में नहीं बताया कि आप की भाभी जेवर किस का चुरा कर ले गयी है। यदि वह वही जेवर साथ ले गयी है जो उसे आप के परिवार से, अपने मायके से तथा अन्य मित्रों व लोगों से उपहार में मिला था तो यह चोरी नहीं है। यह सारा जेवर और अन्य सामान जो उसे कहीं से भी उपहार में मिला है वह सब उस का स्त्रीधन है और उसे जहाँ चाहे ले जा सकती है।

कोई तो कारण रहा होगा जिस के कारण आप की भाभी ने आप के भाई का साथ छोड़ा है। आप उस कारण को नहीं बताना चाहते। फिर भी हमारी राय यह है कि मूल कारण तलाश करें और उस का उपाय तलाशें। यदि आप की भाभी और उस के मायके वाले आप को धमकी देते हैं और भाभी रेप का मुकदमा लगाने की धमकी देती है तो आप इन धमकियों के ठोस प्रमाण एकत्र करें और साबित करने लायक प्रमाण एकत्र हो जाने पर किसी स्थानीय वकील की मदद से भाभी और उस के परिजनों के विरुद्ध मिथ्या अपराध में फँसाने की धमकी देने के अपराध में मुकदमा दर्ज करवाएँ। मुकदमा दर्ज करवाने के पहले कोई ऐसा कार्य न करें जिस से व्यर्थ की उत्तेजना फैले और आप की भाभी अनेक मुकदमे आप के और आप के परिजनों के विरुद्ध दर्ज करवा दे।

बिना पुलिस या न्यायालय के इस समस्या का कोई समाधान नहीं।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

सलोनी ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 3 साल पहले हुई। मेरे ससुर ने मेरे घर पर आ कर शादी से पहले मेरी माँ से 1 लाख रुपया नकद मांगा, शादी मैं टीका/ दहेज के लिए। जिस पर मेरी माँ ने उन से मौखिक वाद किया कि हम यह 1 लाख नकद तो देंगे, पर आप को इन्हें हमारी बेटी को शादी के बाद देना। इसे पर वो सहमत हो गये। पर शादी में अपने रिश्तेदारो को दिखाने के लिए, जैसा टीके की रस्म में होता है 1 लाख नकद मेरे फूफा से अपने बेटे के हाथ में रखवाया और अब शादी के बाद मुझे देने से इनकार करते हैं। उन 1 लाख रुपए को उन्होंने कहीं खर्च कर दिया और अब कहते हैं कि मैने तो ऐसा कोई वादा ही नहीं किया था। आप ने मेरे बेटे की गोद में रखे तो, उस से माँगो। मेरे ससुराल के भारी जेवर जो उन्हों ने मुझे सब के सामने गिफ्ट में दिए थे, और जिसे मैंने मेरी शादी और उसके 2 महीने बाद 1 और शादी में पहना था। वो भी हड़प लिए। (3) मेरे माता-पिता ने मुझे गिफ्ट में घर का सामान लाने के लिए मेरे पति के खाते अकाउंट में डेढ़ लाख रुपए डाले थे, जिस में से सिर्फ़ 1 लाख का सामान लाया। उस में से भी आधे से ज़्यादा सामान खुद मेरे ससुर ने रख लिया। हम पति-पत्नी अलग किराए के मकान में रहते हैं। मेरे घर पर सारा सामान भी नहीं है। शादी की वीडियो शूटिंग मेरे पति के हाथ 1 लाख नकद रखते हुए और मेरे ससुराल के जेवर गिफ्ट थाल में सजाए हुए और फेरो में मेरे द्वारा पहने हुए रिकार्डेड है। मेरी माँ बीपी और फिट्स की पेशेंट है, साथ ही सामाजिक दबाव के कारण मैं पुलिस केस नहीं करना चाहती। पर क्या महिला आयोग इस में मेरी कुछ मदद कर सकता है? मेरे घर और संबंधियों में मैं ये बात फैलने नहीं देना चाहती। वरना मेरी माँ को गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। पर मैं चुप भी नहीं बैठना चाहती। मेरे पति मुझे सपोर्ट नहीं कर रहे हैं। इस में सारी भूमिका मेरे ससुर की है।

समाधान-

क स्त्री को सामाजिक रूप से पुरुष की बंदिनी बना कर रखने के लिए सैंकडों वर्षों से परंपराओं का जो जाल बुना हुआ है आप उस से खुद ही नहीं निकल पा रही हैं। लोगों को पता लगेगा, बदनामी होगी, माँ घबड़ाएंगी, उन के स्वास्थ्य को हानि होगी, उन्हें पता नहीं क्या हो जाएगा। यही वे सवाल हैं जो एक स्त्री को उस बंदीगृह में बांधे रखते हैं जो विशेष रूप से समाज ने उन के लिए बुन दिया है। आप को इस से तो बाहर निकलना होगा।  बिना न्यायालय या पुलिस के पास जाए आप की समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। एक बार पुलिस में या न्यायालय में जाने के बाद संबंधियों को तो पता लगेगा और आप की माता जी को भी।

माज और रिश्तेदार तो अपने अपने स्थान पर हैं। वे तो समस्याओं में आप का कितना साथ देंगे या विरोध करेंगे यह तो बाद में पता लगेगा। लेकिन उन में से हर कोई आप की इस विपदा-गाथा का रस लेने को तैयार बैठा है। आप अपने अधिकार चाहती हैं और सम्मान से जीना चाहती हैं तो इन सब की परवाह न कीजिए। आप के पास समस्या आप की माता जी की है तो उन्हें तीन चार बार में धीरे धीरे कर के सारी बात बता दीजिए और यह भी कि आप क्या करने जा रही हैं। वे पीछे हटने की सलाह दें तो भी उन्हें दृढ़ता से इनकार कर दीजिए कि अब पीछे जाना आप के लिए कठिन है। तभी आप इन सब का प्रतिकार कर सकती हैं। महिला आयोग इस मामले में आप की कोई मदद नहीं करेगा।

ब से पहले आप को चाहिए कि आप अपने पति, सास और ससुर को स्पष्ट रूप से कह दीजिए कि कोई सपोर्ट करे या न करे। कानून और पुलिस आप के साथ हैं और यदि उन्हों ने एक तय समय सीमा में आप के स्री-धन को वे आप के बैंक खाते और आप के आधिपत्य में नहीं सौंपते हैं तो आप पुलिस में रपट लिखाएंगी। उस के बाद जो होना हो हो जाए आप को उस की परवाह नहीं है। तब फिर कौन कौन जेल में जाता है यह देखा जाएगा। हो सकता है आप की इस चेतावनी मात्र से आप का काम हो जाए। यदि व सब यह नहीं करते हैं तो आप को पुलिस को रिपोर्ट लिखानी चाहिए। पुलिस कोई कार्यवाही करने से इन्कार करे, या टाल मटोल करे तो आप किसी वकील की मदद से सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

जब कोई पुलिस अदालत तक पहुँचता है तभी लोगों को कानून याद आता है।

rp_Hindu-marrige1.jpgसमस्या-

मनोज कुमार चौरसिया ने सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 28 मई 2013 को हुई। शादी के एक माह बाद मेरी पत्नी मानसिक रूप से बीमार हो गयी जिसका हमने मनोचिकित्सक इलाहाबाद से इलाज कराना शुरू किया और अभी भी इलाज चल रहा है। मेरे ससुराल वाले जबरन मेरी पत्नी को विदा कराकर ले जाते है और वापस विदा नहीं करते। चूँ कि मेरे ससुर वकील सुलतानपुर दीवानी में एवं ममिया ससुर भदोही में जज हैं। इसलिए मुझे झूठे मुकदमें में फँसाने की धमकी देते हैं। 07 फरवरी को मेरी पत्नी को जुड़वाँ बच्चे एक बेटा और एक बेटी आपरेशन से हुए। दवा का सारा पैसा हम ने दिया और हास्पिटल से पत्नी मायके चली गयी। जाते समय ससुराल वालों ने कहा कि तुम को तरसा लेगें। देखो अब हम क्या–क्या करते हैं? तुम्हे बच्चा पैदा करने की क्या जरूरत थी? अब 8 माह का समय बीत चुका है, ससुराल वाले से बात किया परन्तु भेजने को तैयार नहीं थे। मेरी माँ को अपने घर बुलाकर कहा कि अब मेरी लडकी नहीं जायेगी लड़ कर हिस्सा लेगी। इसपर हमने वकील से बात किया तो वकील ने धारा 13 के अन्तर्गत मानसिक बीमारी और जबरन ले जाने व धमकी देने को आधार बनाकर तलाक का मुकदमा कर दिया है। मानसिक बीमारी का लगभग एक वर्ष का पर्चा व कुछ डिलीवरी हास्पिटल का पर्चा मेरे पास है। क्या मुझे तलाक मिल जायेगा? और क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406‚ 125‚ 24 व अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड सकता है?

समाधान-

तीसरा खंबा को इस तरह की समस्याएँ रोज ही मिलती हैं। जिन में बहुत से पति यह पूछते हैं कि मुझे तलाक तो मिल जाएगा? क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406 या अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड़ सकता है? आदि आदि।

र कोई विवाह करने के पहले और विवाह करने के समय यह कभी नहीं सोचता कि कानून क्या है? और उन्हें देश के कानून के हिसाब से बर्ताव करना चाहिए। वह सब कुछ करता है। वह दहेज को बड़ी मासूमियत से स्वीकार करता है, वह मिले हुए दहेज की तुलना औरों को मिले हुए दहेज से करता है, वह उस दहेज में हजार नुक्स निकालने का प्रयत्न करता है।

ब विवाह के लिए लड़की देखी जाती है तो उस की शक्ल-सूरत, उस की पढ़ाई लिखाई, उस की नौकरी वगैरा वगैरा और उस के पिता का धन देखा जाता है। यह कभी नहीं जानने का प्रयत्न किया जाता कि लड़की या लड़के का सामान्य स्वास्थ्य कैसा है? वह किस तरह व्यवहार करता या करती है, विवाह के उपरान्त दोनों पति-पत्नी में तालमेल रहेगा या नहीं? क्यों कि यह सब जानने के लिए लड़के लड़की को कई बार एक साथ कुछ समय बिताने की जरूरत होती है। इसे पश्चिम में डेटिंग कहते हैं। भारतीय समाज डेटिंग की इजाजत कैसे दे सकता है? क्या पता लड़के-लड़की शादी के पहले ही कुछ गड़बड़ कर दें तो? या लड़का या लड़की रिश्ता के लिए ही मना कर दे तो दूसरे की इज्जत क्या रह जाएगी?

विवाह के बाद दहेज को दहेज ही समझा जाता है। पति और उस के रिश्तेदार उसे अपना माल समझते हैं। वे जानते हैं कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। पर कौन देखता है? की तर्ज पर यह अपराध किए जाते हैं। दहेज के कानून में माता-पिता, रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य लोगों यहाँ तक कि ससुराल से प्राप्त उपहारों को दहेज मानने से छूट दी गयी है। इस कारण जब कोई मुकदमा दर्ज होता है तो लोग उसे दहेज के बजाय उपहार कहना आरंभ कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि किसी स्त्री को मिले उपहार उस का स्त्री-धन है। उस के ससुराल में रखा हुआ यह सब सामान उस की अमानत है। उसे न लौटाएंगे तो अमानत में खयानत होगी। फिर जब आईपीसी की धारा 406 अमानत में खयानत का मुकदमा ही बनाना होता है तो बहुत सी काल्पनिक चीजें लिखा दी जाती हैं।

त्नी को मानसिक या शारीरिक क्रूरता पहुँचाना हमारे यहाँ पति और ससुराल वालों का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन कानून उसे 498-ए में अपराध मानता है, तो यह अपराध भी धड़ल्ले से देश भर में खूब चलता है। लोग ये दोनों अपराध खूब धड़ल्ले से करते हैं। समझते हैं कि इन्हें करने का उन्हें समाज ने लायसेंस दिया हुआ है। पर जब इन धाराओं में मुकदमा होने की आशंका होती है या धमकी मिलती है तो वही लोग बिलबिला उठते हैं। उन्हें कानून का यह पालन अत्याचार दिखाई देने लगता है।

म मानते हैं कि जब मुकदमा होता है तो बहुत से फर्जी बातें उस में जोड़ी जाती हैं। यह भी इस देश की प्राचीन परंपरा है। गाँवों में जब लड़ाई होती है तो इज्जत की रखवाली में हथियार ले कर बैठे परिवारों की स्त्रियों से पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट करा दी जाती है। लेकिन विवाह के रिश्ते में ऐसा फर्जीवाड़ा करना दूसरे पक्ष को नागवार गुजरता है।

ब अदालत में कोई भी पीड़ित हो या न हो। एक बार शिकायत कराए, या पुलिस को एफआईआर लिखाए तो उन का फर्ज है जाँच करना और जाँच करने का मतलब पुलिस के लिए यही होता है कि पीड़ित पक्ष और उस के गवाहों के बयान लिए जाएँ और उन से जो निकले उस के आधार पर अपराध को सिद्ध मानते हुए अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया जाए। एक बार आरोप पत्र पेश हो जाए तो जब तक उस मुकदमे का विचारण नहीं हो जाए तब तक अदालत के चक्कर तो काटने ही होंगे। सचाई पता लगाने की जरूरत पुलिस और अदालत को कभी नहीं होती। वैसे भी जो चीज पहले से ही पता हो उसे जानने की जरूरत नहीं होती। आखिर वह जान लिया जाता है जो पहले से पता नहीं होता।

प के सामने समस्या है। आप ने तलाक का मुकदमा कर दिया है। वकील की सहायता ली है। वकील को सारे तथ्य पता हैं। हमे तो आप ने पत्नी को मानसिक रोगी मात्र बताया है। उस का पागलपन या मानसिक रोग क्या है? वह रोग के कारण क्या करती या नहीं करती है? या चिकित्सक ने उसे क्या रोग बताया है? आपने हमें कुछ नहीं बताया है। जो मुकदमा किया है उस में क्या आधार किन तथ्यों पर लिए हैं? यह भी नहीं बताया है फिर आप हम से अपेक्षा रखते हैं कि तीसरा खंबा आप को बता देगा कि आप को तलाक मिलेगा या नहीं और आप को फर्जी मुकदमों में फँसा तो नहीं दिया जाएगा।

लाक का मिलना मुकदमे में लिए गए आधारों और उन्हें साक्ष्य से साबित करने के आधार पर निर्भर करता है। आप की पत्नी मुकदमा दर्ज कराएगी तो हो सकता है आप को गिरफ्तार भी कर लिया जाए। लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में जमानत हो जाती है और जल्दी ही पति और उसके परिवार वाले रिहा हो जाते हैं। ऐसे मामलों में चूंकि झूठ जरूर मिलाया जाता है इस कारण ज्यादातर पति इस मिलावट के कारण बरी हो जाते हैं। पर कभी कभी सजा भी हो जाती है। अगर आप ने कोई अपराध नहीं किया है। कभी पत्नी को गाली नहीं दी है, उस पर हाथ नहीं उठाया है, उस के उपहारों और स्त्री-धन को उस का माल न समझ कर अपना माल समझने की गलती नहीं की है तो आप को सजा हो ही नहीं सकती। पर यह सब किया है तो सजा भुगतने के लिए तैयार तो रहना ही चाहिए। अपराध की सजा हर मामले में नहीं तो कुछ मामलों में तो मिल ही सकती है।

भी तक कानून ने पत्नी को पति की संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं दिया है। पति की मृत्यु के बाद यदि पति ने कोई बिना वसीयत की संपत्ति छोड़ी हो तो उस का उत्तराधिकार बनता है जिसे वह ले सकती है। लेकिन जीते जी अधिक से अधिक अपने लिए भरण पोषण मांग सकती है। इस कारण जो यह धमकी दे रहे हैं कि पत्नी हिस्सा लड़कर लेगी वे मिथ्या भाषण कर रहे हैं। अभी तक कानून ने ही पति की संपत्ति में हिस्सा पत्नी को नहीं दिया है अदालत कैसे दे सकती है। इस मामले में आप निश्चिंत रहें। आज तीसरा खंबा की भाषा आप को विचित्र लगी होगी। पर इस का इस्तेमाल इस लिए करना पड़ा कि लोग ऐसे ही समझते हैं। आप इस बात को समझेंगे और दूसरे पाठक भी इस तरह के प्रश्न करना बन्द करेंगे। हम तो ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना बन्द कर ही रहे हैं।

स्त्री-धन जो पिता, माता, भाई, भाभी और बहन के पास है, अमानत है और उसे लौटाने से मना करना गंभीर अपराध है।

POSTMANसमस्या-

कप्तान सिंह ने राजौरी, जम्मू कश्मीर से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी के साथ धोखा हुआ है। उस की बहन बड़े भाई, भाभी और पिता ने साथ मिल कर अपने गहने सोने का हार झुमके, अंगूठी, इयर टॉप्स और सोने की चूड़ियाँ सारे सामान देने से मना कर दिया है। मेरी शादी को 10-11 साल हो गए हैं अब मेरी पत्नी बहुत दुखी है कृपया उपाय बताएँ।

समाधान

प की पत्नी के गहने जो भी उस के हैं वे पत्नी का स्त्री-धन हैं। यदि वे उस की बहन आदि के पास थे तो वे अमानत के तौर पर रखे थे। अमानत के तौर पर किसी पास रखी कोई भी संपत्ति अमानत ही होती है। यदि वह उसे देने से इन्कार करता है तो यह अमानत में खयानत है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 406 आईपीसी में दंडनीय अपराध है। आप की पत्नी को उक्त लोगों ने यह स्त्री-धन देने से मना किया है इस का अर्थ यह है कि उन्हों ने यह अपराध किया है।

प की पत्नी चाहें तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है, यदि पुलिस कार्यवाही करने से इन्कार करती है तो इलाके के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सीधे परिवाद प्रस्तुत करें। बेहतर होगा कि पुलिस को रिपोर्ट करने या न्यायालय में परिवाद दर्ज कराने के पहले आप की पत्नी स्वयं या किसी वकील के माध्यम से उक्त गहनों को लौटाने के लिए एक नोटिस रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेजें। नोटिस की एक एक प्रतियाँ उक्त सभी व्यक्तियों को अलग अलग डाक से भेजे जाएँ। सब की डाक की रसीदें और प्राप्ति स्वीकृतियाँ अपने पास रखी जाएँ।

आत्मनिर्भरता ही स्त्री की मूल और असली ताकत है।

Muslim-Girlसमस्या-

आभा गुप्ता ने कानपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं एक प्राइवेट नौकरी करती थी मेरा वेतन 5000 रु. था। मेरी शादी दिनांक 17.11.13 को हुई। मेरे पति भी प्राइवेट नौकरी करते हैं उन का वेतन रु. 10000 है। मेरे सास ससुर के पास रु. 4500 ब्याज आता है। और 30 तोला पुस्तैनी जेवर है। फिर मेरी सास मेरे पति का पूरा वेतन ले लेती थी और मेरा भी पूरा वेतन मांगने लगी और पति भी उनके साथ थे। मैं ने अपना वेतन देने से साफ मना कर दिया तो उन लोगों ने मुझे फिज़िकल और मेंटल टार्चर करना शुरु कर दिया। ये इस हद तक रहा कि मैं बीमार रहने लगी और दिनांक 13.04.14 को तो मुझे इतना परेशान किया कि मैने 100 नं पर फोन कर पुलिस बुलाई और फिर उनके साथ अपने मायके गई। फिर मैं बहुत परेशान हो गई इस कारण अपनी जॉब भी ना कर सकी। फिर दोनो पक्षों ने बैठ कर फ़ैसला कराया की पुश्तैनी मकान में मेरा ऊपर वाला कमरा और नीचे वाला कमरा सास ससुर का होगा और अलग अलग रहेंगे। फिर मेरी सास नहीं मानी और मेरे पति कहते हैं जो उनकी मम्मी कहेंगी वो करेंगे। सास कहती है कि अब जेल चले जाएँगे पर आने नही देंगे। (क्यूंकी दहेज प्रथा में अब अरेस्ट नहीं होता है) मेरा स्त्री-धन लगभग 10 तोला गोल्ड उनके पास है। अब फिर एक घरेलू हिंसा का केस लगाया जिस मे उपर वाला कमरा अलग माँगा तो उन्होने जवाब लगाया कि उन की सॅलरी 900 रु है और घर में कमाई का कोई अन्य साधन नहीं है और मैं जॉब करती हूँ और उनका जेवर 5 तोला ले गई हूँ। घर में एक छोटा कमरा है जब कि सास ससुर के हिस्से में 02 कमरे हैं। मैं तब से अपने मायके में रह रह रही हूँ और मेरे पास कोई भरण पोषण का साधन भी नहीं है।

समाधान-

दुनिया में ऐसे मूर्खों की कमी नहीं जो लालच में आ कर रोज अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट फाड़ डालते हैं। आप के सास ससुर और पति इसी किस्म के प्राणी दिखाई पड़ते हैं। आप की सास वास्तव में आप की ससुराल की सल्तनत की वजीर हैं और सारे कमाने वालों की कमाई अपने कब्जे में कर के राज चलाना चाहती हैं। आप एक मेहनतकश स्त्री हैं, खुद की कमाई पर स्वाभिमान से जीना चाहती हैं। आप के साथ विवाह ने बहुत बुरा किया है।

क स्त्री की सब से बड़ी ताकत उस की वह संपत्ति जिस का वक्त जरूरत वह इस्तेमाल कर सके और उस की नियमित आय है। यदि ये दोनों या उन में से एक उस के पास नहीं है तो वह शक्तिहीन है। इसी ताकत को आप की सास ने आप से छीनना चाहा है आप ने प्रतिवाद किया और बात बिगड़ गयी। सब से बुरी बात है कि आप इस सारे प्रकरण में अपनी नौकरी को ठीक से नहीं कर पायीं। किसी भी स्त्री के लिए मुख्य चीज उस का वैवाहिक जीवन, पति या ससुराल नहीं है, अपितु उस की नियमित कमाई और उस का स्त्री-धन है। जब तक ये दोनों उस के पास हैं वह चैन से जी सकती है।

प ने पूरा वेतन देने से प्रतिरोध कर के कुछ गलत नहीं किया। लेकिन जब हम किसी परिवार के सदस्य बनते हैं और एक कमाऊ व्यक्ति हैं तो हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि हम अपनी कमाई से उस परिवार को अपना योगदान करें। आप को चाहिए था कि आप अपने 5000 रु. प्रतिमाह वेतन से 2000 रुपए परिवार में योगदान करने का प्रस्ताव रखतीं। हो सकता है आप ने रखा हो और माना नहीं गया हो।

खैर, जो हुआ सो हुआ। यदि सास कहती है कि वह आप को आने नहीं देगी तो आप भी साफ कह सकती हैं कि मैं कौन आने के लिए मरी जा रही हूँ। आप को चाहिए कि आप सब से पहले तो आप की नौकरी जो जा चुकी है उसे फिर से हासिल करें। वह नहीं तो कोई दूसरी नौकरी हासिल करें और अपनी कमाई का साधन बनाएँ और प्रण करें कि इसे हमेशा बनाए रखेंगी यही आप की ताकत और जीने का सहारा बनेगी। दूसरा जो आप का स्त्री-धन जिस में आप को अपने मायके से मिले उपहार तो हैं ही, ससुराल से व अन्य लोगों से मिले जेवर व अन्य उपहार भी सम्मिलित हैं। आप की ससुराल के कब्जे में है उसे हासिल करें। उसे हासिल करने के लिए आप को 498ए और 406 आईपीसी की रिपोर्ट पुलिस थाना में कराएँ या अदालत में परिवाद प्रस्तुत करें। यदि मामले में तथ्य होंगे और प्रमाणित होगा तो गिरफ्तारी भी जरूर होगी। उत्तर प्रदेश में तो अग्रिम जमानत का कानून भी नहीं है। फिलहाल आप घरेलू हिंसा अधिनियम तथा धारा 125 दं.प्र.सं. दोनों में भरण पोषण की मांग कर सकती हैं। आप के पति अदालत में अपने जवाब में क्या कहते हैं इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप कार्यवाही अवश्य करें। पर इतना ध्यान रखें कि अदालती कार्यवाहियाँ लम्बी चलती हैं, वहाँ से राहत देर से मिलेगी और जिसे सांकेतिक ही कहा जा सकता है। अदालत की दिलाई भरण पोषण राशि से अभी तक किसी का जीवन बना या चला नहीं है। आप की असली ताकत तो यह होगी कि आप अच्छी नौकरी हासिल करें, पहले से अधिक वेतन मिले और इसे लगातार बढ़ाते रहें। आत्मनिर्भरता ही स्त्री की मूल और असली ताकत है।

वधु को दिए गए सभी उपहार दहेज नहीं, स्त्री-धन हैं।

hindu-marriage-actसमस्या-

 

प्रिया ने पटना, बिहार से पूछा है-
मैंने पिछले साल नवंबर में अपनी समस्या रखी थी जिसका समाधान भी आप ने दिया था। मैंनेअभी तक अपना स्त्रीधन वापस पाने के लिए धारा ४०६ के तहत अथवा अन्य कोई भीमुकदमा दायर नहीं किया है। कृपया मुझे बताएँ कि क्या ४०६ की कोई परिसीमनअवधि है? मेरे पास इस संबंध में फोन कॉल की आखिरी रिकॉर्डिंग २३ जून २०१३की है।इस कॉल में स्त्रीधन को वापस न करने की बात की गई है परंतुस्त्रीधन में कौन-कौन से गहने हैं तथा अन्य सामानों का विवरण नहीं है। क्याइससे मुझे दिक्कत हो सकती है?
मेरे पति ने अब मेरे विरुद्ध वैवाहिकसंबंधों की पुनर्स्थापना के लिए धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत मुकदमादायर कर दिया है जिसमें मुझ पर तथा मेरे माता-पिता पर उल्टे-सीधे आरोप लगाएगए हैं और यह कहा गया है कि समस्त स्त्रीधन मेरे पास है। सुनवाई की तिथि15 मई दी गई थी। लेकिन मेरा जाना संभव न हो पाने के कारण मैं नहीं जा सकी और मैं ने न्यायालय को एक प्रार्थना पत्र डाक से प्रेषित कर दिया है। यह मुकदमा उस नगर के पारिवारिक न्यायालय में दायर किया गयाहै जहाँ मेरी ससुराल है तथा जहाँ से हमारे विवाह को विशेष विवाह अधिनियम केअंतर्गत पंजीकृत किया गया था। इस नगर में फिलवक्त केवल मेरे सास ससुर रहतेहैं। जबकि मेरे पति म.प्र. के एक शहर में चले गए हैं। अलग होने के पूर्वमैं पति के साथ उ.प्र. में रह रही थी और हमारा विवाह हिंदू रीति रिवाजों सेपटना में हुआ था। तो क्या मैं यह मुकदमा अपने शहर पटना में स्थानांतरितकरवा सकती हूँ? मैं अभी यहीं पर कार्यरत हूँ।
मेरे पिताजी अवकाशप्राप्त सरकारी कर्मचारी हैं। यदि इस वाद के प्रत्युत्तर में हम विवाह केसंबंध में दिए गए दहेज का जिक्र करते हैं तो क्या इससे उन्हें परेशानी होसकती है?

 

समाधान-

 

धारा 406 आईपीसी में कोई लिमिटेशन नहीं है आप कभी भी इस की शिकायत पुलिस को दर्ज करवा सकती हैं या फिर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। यह वास्तव में स्त्री-धन जो कि पति या उस के परिजनो के पास है उसे मांगे जाने पर देने से इन्कार कर देने पर उत्पन्न होता है। आप के पति ने उसके पास जो आप का स्त्री-धन है उस के बारे में यह मिथ्या तथ्य अपने आवेदन में अंकित किया है कि वह आप के पास है। इस तरह वह आप के स्त्री-धन को जो पति के पास अमानत है उसे देने से इन्कार कर रहा है। इसी से धारा-406 आईपीसी के लिए वाद कारण उत्पन्न हो गया है। आप जितनी जल्दी हो सके यह परिवाद पुलिस को या फिर न्यायालय में प्रस्तुत कर दें। यह सारा स्त्री-धन आपके पति के कब्जे में आप के विवाह के समय पटना में सुपूर्द किया गया था इस कारण से उस का वाद कारण भी पटना में ही उत्पन्न हुआ है और आप यह परिवाद पटना में प्रस्तुत कर सकती हैं।

हेज के लेन देन पर पूरी तरह निषेध है तथा यह लेने वाले और देने वाले दोनों के लिए अपराध भी है। किन्तु पुत्री को या पुत्रवधु को उपहार दिए जा सकते हैं जो कि उस का स्त्री-धन हैं। आप के मामले में जो भी नकद या वस्तुएँ आप के पिता ने, आप के संबंधियों और मित्रों ने या फिर आप के ससुराल वालों ने आप को दी हैं। वे सभी स्त्री-धन है और वह आप के पति या ससुराल वालों के पास अमानत है। आप के मांगे जाने पर न देने पर धारा 406 आईपीसी का अपराध होता है।

प धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रकरण में आप के उपस्थित न होने से आप के विरुद्ध एक तरफा डिक्री पारित हो सकती है। यह डिक्री वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए होगी। जिस का मात्र इतना असर है कि यदि आप डिक्री होने के एक वर्ष तक भी आप के पति के साथ जा कर नहीं रहती हैं तो इसी आधार पर आप के पति को आप से विवाह विच्छेद करने के लिए आवेदन प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। इस कारण यदि आप इस मुकदमे में जा कर अपना प्रतिवाद प्रस्तुत नहीं करती हैं तब भी उस में आप को किसी तरह की कोई हानि नहीं होगी।

प यदि विवाह विच्छेद चाहती हैं तो आप उस के लिए तुरन्त पटना में विवाह विच्छेद की अर्जी प्रस्तुत कर दीजिए। इस अर्जी के संस्थित होने के उपरान्त आप धारा-9 के प्रकरण को पटना के न्यायालय में स्थानान्तरित करने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं।

न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए आवेदन करें . . .

two wives one husbandसमस्या-
मुम्बई, महाराष्ट्र से शालिनी सिंह ने पूछा है –

मेरी एक मित्र की शादी 25-4-2012 को हुई है, उसकी शादी के कुछ दिन का बाद ही उस की वाइफ हर बात पर झगड़ा करने लगी।  वो ये कहती है कि मेरी शादी तुम्हें देख कर नहीं हुई है तेरी प्रॉपर्टी देख कर हुई है तो मुझे प्रॉपर्टी में आधा हक चाहिए। शादी में मेरे दोस्त की माँ  ने अपनी बहू को काफ़ी गोल्ड ज्वेलरी चढ़ाई थी वो ये भी बार बार मांगती है कि मैं अपनी माँ के पास रखूंगी। वह इन बातों को ले कर सभी को तंग करती है। बात बात पर घर छोड़ कर चली जाती है। एक बार पुलिस स्टेशन चली गई थी। जिसकी वजह से वो लोग डर कर  बहू-बेटे को अलग कर दिया। ताकि वो समझने लगे।  अलग होने के बाद भी वह वही बात बार बार कहती है। कई बार तो पुलिस में शिकायत भी कर चुकी है कि मेरा पति मुझे मारता है।  अभी उसका  एक बच्चा है जो कि 7 माह का है। सब को लगा कि वो बच्चा होने के बाद बदल जाएगी पर इस का उलटा हुआ। अब तो ये कहती है की मुझे गहने दो नहीं तो बच्चे को जान से मार डालूंगी और ये कहूँगी कि मेरे पति ने दहेज के लिये अपने बच्चे को मार दिया है।  इतना सब हो जाने के बाद अब वो पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता है पर वो फिर से वापस आना चाहती है पर पति तैयार नहीं है। कहता है कि उसके साथ रहने में उस की जान को भी खतरा है। अब वो उस लड़की से तलाक लेना चाहता है और बच्चा भी लेकिन पत्नी तलाक़ नहीं देना चाहती है। साथ में रहने के लिए भी पुलिस में शिकायत कर के आई है। लड़की पाँच बार पुलिस में शिकायत कर चुकी है। पर लड़के वालों ने कुछ भी नहीं किया है सिर्फ़ अपनी साफ़्टी का लिया 2 बार न.सी. किया है। अब क्या लड़की से तलाक़ लिया जा सकता है?

समाधान-

दि आप के मित्र की पत्नी उस की सास द्वारा चढ़ाए गए गहने मांगती है तो उस में कुछ गलत बात नहीं है। वे गहने यदि उसे उपहार में मिले हैं तो स्त्री-धन हैं तथा उस की संपत्ति हैं। वह उन्हें मांग सकती है। नहीं देने पर यह अमानत में खयानत होगी जो कि धारा 406 आईपीसी के अंतर्गत एक अपराध है। हाँ, यदि इस में कोई शंका हो कि पत्नी यह सब किसी झगड़े के उद्देश्य से या अन्य किसी कारण से ऐसा कर रही है तो उसे कहा जा सकता है कि पति-पत्नी के नाम से बैंक में एक लॉकर ले कर रख दिए जाएँ जिसे दोनों के साथ जाए बिना नहीं खोला जा सकता हो। वैसी स्थिति में गहनों पर दोनों का संयुक्त नियंत्रण स्थापित हो सकता है।

लेकिन उस का यह कहना की मेरी शादी तुम्हें देख कर नहीं बल्कि तुम्हारी प्रोपर्टी देख कर हुई है तो यह पति के साथ हद दर्जे की क्रूरता है। बार बार बिना किसी कारण के पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना भी क्रूरतापूर्ण व्यवहार है। बच्चे को मार डालने की धमकी देना तो निहायत दर्जे का क्रूरतापूर्ण व्यवहार है। इन कारणों से पति अपनी पत्नी से अलग रह सकता है।

न परिस्थितियों में पति को चाहिए कि वह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 10 के अन्तर्गत न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए अदालत में आवेदन करे कि मैं अपनी पत्नी के साथ नहीं रह सकता तथा बच्चे की अभिरक्षा के लिए भी आवेदन प्रस्तत करे। इन आवेदनों में उसे यह भी कहना होगा कि वह पत्नी को उसी मकान में जिस में अभी वह रहता है रहने का पूरा खर्चा उठाएगा। इस तरह न्यायालय से सारी परिस्थितियाँ होते हुए भी वह न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित करवा सकता है। डिक्री पारित होने पर पृथक रह सकता है। बच्चे की अभिरक्षा मिल जाए तो उसे भी अपने साथ रख सकता है। लेकिन इस के लिए उसे सारी परिस्थितियों को प्रमाणित करना होगा। यदि बाद में भी परिस्थितियाँ ऐसी ही रहें तो लंबे न्यायिक पृथक्करण के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री के लिए भी आवेदन किया जा सकता है। इस कार्यवाही के लिए किसी अच्छे स्थानीय वकील की सहायता लेनी होगी।

ह सब करने के पहले पति को अपनी पत्नी या पुलिस कार्यवाही से डरना छोड़ना पड़ेगा। अधिकांश मामलों में पतियों को असफलता इसी लिए प्राप्त होती है कि वे पुलिस कार्यवाही से तथा पत्नी द्वारा किए जाने वाले फर्जी मुकदमों से भयभीत रहते हैं। यह फिजूल का भय त्यागना होगा और पत्नी यदि ऐसा करती है तो निर्भय हो कर उस का मुकाबला करना होगा।

दहेज में प्राप्त वस्तुएँ व नकदी स्त्री-धन है स्त्री उन्हें कभी भी ससुराल वालों से मांग सकती है।

समस्या-

उन्नाव, उत्तर प्रदेश से सपना रावत ने पूछा है -.

मेरे पति घर से अलग रहते हैं, लेकिन मुझ को नहीं ले जाते हैं। मेरे पति सारा पैसा भी घर पर देते हैं और मुझे अपना घर खर्च नौकरी कर के निकालने को कहते हैं। अब उन्हों ने तलाक का नोटिस भेजा है। अपने माँ बाप के सिखाने पर मुझ से तलाक लेना चाहते हैं। क्या हम दोनों अलग रह सकते हैं? क्या मुझे दहेज में दिया गया सारा सामान और नकदी वापस मिल सकती है?

समाधान-

Desertedदि आप के पति आप को घर खर्च आप से नौकरी कर के निकालने को कहते हैं तो समझिए कि वे आप को खुद पर बोझा समझते हैं।  आप के पति के परिवार वाले भी चाहते हैं कि आप दोनों का विवाह टूट जाए। लगता है आप का विवाह हुए अधिक समय नहीं हुआ है। ऐसे में यदि आप इस विवाह को बनाए रखती हैं तो जीवन मुश्किलों से ही निकलने वाला है।

प के पति के पास तलाक का कोई मजबूत आधार नहीं है। जिस के कारण वे तलाक ले सकते हों।  इस कारण तलाक का नोटिस कोई मायने नहीं रखता है।  विवाह में रहते हुए पति पत्नी के अलग अलग रहने में कोई बाधा नहीं है लेकिन पति या पत्नी में से कोई भी जान बूझ कर अलग रह रहा हो और दाम्पत्य के दायित्वों का निर्वाह नहीं कर रहा हो तो दूसरा उस के विरुद्ध धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। इस आवेदन पर न्यायालय दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित कर देगी। लेकिन इस डिक्री का विशिष्ट अनुपालन कराया जाना संभव नहीं है। किसी को जबरन किसी के साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता है। अधिक से अधिक भरण पोषण की राशि अदा करने का आदेश दिया जा सकता है। इस डिक्री का यही असर होता है कि दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित होने पर भी यदि कोई उस की पालना न करे तो इस पालना न करने के आधार पर तलाक प्राप्त किया जा सकता है।

किसी स्त्री को  अपने मायके से दहेज में प्रदान की गई वस्तुएँ, नकद राशि तथा अन्य उपहार उस का स्त्री-धन है।  स्त्री को अपने ससुराल से, अपने पति से तथा मायके व ससुराल वालों से मिले सभी उपहार भी स्त्री-धन हैं जिस का स्वामित्व स्त्री का है। स्त्री कभी इन की मांग अपने ससुराल वालों से कर सकती है। यदि कोई उस स्त्री के मांगने पर इन वस्तुओं को नहीं देता है तो वह अमानत में खयानत का धारा 406 आईपीसी के अंतर्गत अपराध करता है। इस के लिए वह पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवा सकती हैं या फिर न्यायालय के समक्ष स्वयं परिवाद प्रस्तुत कर सकती है। पुलिस स्त्री का सारा स्त्री-धन बरामद कर सकती है जिसे आप न्यायालय में आवेदन कर के प्राप्त कर सकती है। आप भी ऐसा कर सकती हैं।

दि आप के पति आप को अपने साथ नहीं रखते हैं, आप का खर्चा नहीं देते हैं या आप को मायके में रहने के लिए बाध्य करते हैं तो आप भरण पोषण के लिए धारा 125 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत भरण पोषण की राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। आप के भरण पोषण के लिए राशि प्रदान करना आप के पति का दायित्व है, आप के पति को तलाक के बाद भी जब तक आप फिर से विवाह नहीं कर लेती हैं या पर्याप्त रूप से कमाने नहीं लगती हैं तब तक यह भरण पोषण की राशि आप को अदा करनी पड़ेगी।

पत्नी के प्रस्ताव के अनुसार स्त्री-धन लौटा कर सहमति से तलाक के लिए आवेदन करें, लेकिन पहले दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन अवश्य प्रस्तुत कर दें

समस्या-

मेरी शादी जून 2009 में हुई।  शादी के बाद से ही पत्नी के मायके वालों के हस्तक्षेप के चलते हमारे वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आने लगी।  मेरी पत्नी अपने मायके वालों के अनुसार ही चलती है और मेरे घर वालो को पसंद नहीं करती है।  मेरे घर वालों द्वारा कही गई छोटी से छोटी बात जो उसके हित के लिए कही जाती उस को भी वह बढ़ा चढ़ाकर अपनी मम्मी से कह देती।  फलस्वरूप हमारे दोनों परिवारों में टकराव कि स्थति आ गई।   पत्नी भी आये दिन झगड़ा करती है जिस वजह से कलह रहने लगी।  शादी के बाद पत्नी मुझे शहर से बाहर जैसे दिल्ली जाकर वहा जॉब तलाशने के लिए दबाव बनाने लगी।  मैंने उसकी बात मान कर घर छोड़ दिया और नॉएडा में जॉब करने लगा।  पत्नी भी साथ रहने लगी।  एक वर्ष तक नौकरी करता रहा।  लेकिन माँ कि बीमारी के चलते मुझे फिर से वापस आना पड़ा और हमेशा के लिए घर में रहने का निश्चय किया।  लेकिन पत्नी को यह बिलकुल मंजूर नहीं हुआ और झगड़कर अपने मायके चली गयी।  आज उसे मायके गए 4 महीने हो गए हैं।  तब से उसने न ही मेरी कोई खबर ली और न मेरे घर वालों की।  मेरी उससे कोई बात नहीं हुई तो मैं उससे मिलने ससुराल गया लेकिन वो मेरे पास नहीं आई और मिलने से इंकार कर दिया।  फिर दो दिन बाद मैं पिताजी और ताउजी के साथ गया।  उसे लेने के वास्ते तो उसने और उसके घर वालो ने भेजने से मना कर दिया और गलत आरोप लगाकर दहेज़ का मुकदमा लगाने कि धमकी देने लगे।  तलाक के लिए भी कहा रहे हैं।  हम लोग घर वापस आ गए लेकिन मेरी माँ और दीदी ने फ़ोन कर बात की तो उनका वही जवाब है कि मुझे मेरा सामान वापस कर दो और अब फैसला होगा।  घर आने के लिए बिलकुल भी राजी नहीं है।   मुकदमा कर के मेरे घर वालों को जेल भेजने कि धमकी दे रहे हैं।  मैं आपको बता दूँ कि शादी से लेकर अभी तक मेरी तरफ से या मेरे घर वालों की तरफ से दहेज़ के नाम पर एक रुपये की भी मांग नहीं कि गयी है।   आपसी कलह और झगड़े के चलते मैंने अपनी पत्नी को एक बार डाँटा जरूर था, वो भी तब जब उसने जिद में आकर अपने शरीर को नुक्सान पहुँचाने कि कोशिश की, जैसे दरवाजा बंद करके फांसी लगाने कि कोशिश,  ब्लेड से हाथ कि नस काटने कि कोशिश या फिर मेरे सामने अपना सर दीवार पर पटकने के कारण।  मेरे घर वाले और मैं अपनी पत्नी को बहुत चाहते थे।  लेकिन मेरी पत्नी ने उस चाहत को नहीं समझा।  वह सिर्फ अपने मायके वालों से मतलब रखती रही।  मैंने बहुत कोशिश की कि उसे मना लूँ, लेकिन वो नहीं मान रही है।  कृपया मार्गदर्शन करें कि कैसे मैं उस के द्वारा लगाये गए मुक़दमे से अपना और अपने परिवार वालों का बचाव कर सकता हूँ? जिस से हमें परेशानी और बदनामी का सामना न करना पड़े।

-विमल, कानपुर, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प की परिस्थितियाँ स्पष्ट और विकट हैं।  आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती और आप से वैवाहिक सम्बन्धों का विच्छेद अर्थात तलाक चाहती है।  उस के मायके वाले उस के साथ हैं।  हो सकता है अपने मायके वालों को उस ने मनगढ़न्त कहानियाँ सुना रखी हों।  आप के कथनों से लग भी रहा है कि उस ने पहले फाँसी लगाने, दीवार से सिर फोड़ने और हाथ की नस काटने की कोशिश की है।  ऐसी परिस्थिति में वह 498-ए भा.दं.संहिता के अन्तर्गत क्रूरता का व्यवहार करने का आरोप लगा सकती है।  उसे विवाह के समय मिला स्त्री-धन भी कुछ तो आप के पास होगा ही।  इस तरह वह आप के विरुद्ध धारा 406 भा.दं.संहिता का आरोप भी आप पर लगा सकती है।  इन दोनों आरोपों में आप की और आप के परिवार वालों की गिरफ्तारी भी हो सकती है।  बाद में भले ही जमानत पर आप लोग छूट जाएँ।  आप गिरफ्तारी पूर्व जमानत के प्रावधान का उपयोग भी नहीं कर सकते क्यों कि यह प्रावधान उत्तर प्रदेश में प्रभावी नहीं है।

सी स्थिति में आप के पास केवल यही मार्ग शेष रह जाता है कि आप उस की और उस के परिवार वालों की बात मान लें।  उस का जो भी स्त्री-धन है उसे लौटा दें तथा सहमति से विवाह विच्छेद का आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दें।  इस के लिए आप दोनों परिवार बैठ कर निर्णय कर सकते हैं कि क्या किया जाए और कैसे किया जाए? प्रारंभ में इस संबंध में एक समझौते पर आप दोनों पहुँच जाएँ और उस समझौते को स्टाम्प पेपर पर लिख कर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नोटेरी पब्लिक के यहाँ तस्दीक करवा लिया जाए।

मझौते के लिए बातचीत करने के पहले एक काम अवश्य करें कि आप अपनी ओर से पारिवारिक न्यायालय के समक्ष एक आवेदन धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए अवश्य प्रस्तुत कर दें।  जिस से विकट परिस्थिति उत्पन्न होने पर आप यह कह सकें कि आप के मन में आज भी दुर्भावना नहीं है और आप पत्नी के साथ दाम्पत्य निर्वाह करने को तैयार हैं।

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