Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Registration Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

न्यायालयाधीन मामलों की मीडिया रिपोर्टिग के नियमन के लिए कोई मुकम्मल दिशानिर्देश नहीं हो सकते

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि न्यायालय के अधीन मामलों की मीडिया रिपोर्टिग के नियमन के लिए कोई मुकम्मल दिशानिर्देश नहीं हो सकता, लेकिन खास मामलों में पाबंदी लगाए जाने की मांग की जा सकती है। प्रधान न्यायाधीश एस.एच. कपाड़िया की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, “न्यायालयाधीन मामलों की रिपोर्टिग के लिए कोई दिशानिर्देश तय नहीं किए जा सकते।”

न्यायमूर्ति कपाड़िया ने कहा, “हालांकि कोई भी संतप्त व्यक्ति अपने मामले की सुनवाई की रिपोर्टिग करने से मीडिया को रोकने के लिए किसी उपयुक्त अदालत में जा सकता है।”

न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत मीडिया रिपोर्टिग सहित अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार कोई पूर्ण अधिकार नहीं है और यह वर्गीकरण व औचित्य की जांच पर निर्भर करता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस तरह का कोई भी दिशानिर्देश अल्पकालिक होगा और यह अनिवार्यता व अनुरूपता के सिद्धांत पर निर्भर करेगा।

न्यायालय ने कहा कि संतप्त वादी अलग-अलग मामलों में सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय जाकर आदेश या स्थगन की मांग कर सकता है, जिसमें किसी खास मामले में एक सीमित अवधि के लिए मीडिया को रिपोर्टिग करने से रोका जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि यह आदेश निवारक होगा, दंडात्मक नहीं।

न्यायालय ने आगे कहा कि यह केवल न्यायालय की अवमानना के मामलों से मीडिया कर्मियों को बचाने के लिए है। न्यायालय ने कहा कि मीडिया के रिपोर्टिग के अधिकार और वादी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को संतुलित करने के लिए ये निर्देश जारी किए जा रहे हैं।

सुलझे या उलझे? नरेन्द्र मोदी

किसी भी अपराधिक मामले में पुलिस अथवा अन्य कोई अन्वेषणकर्ता एजेंसी शिकायतकर्ता द्वारा इंगित व्यक्ति को अभियुक्त बनाने और अभियोग चलाने से इन्कार करते हुए अपनी रिपोर्ट संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करती है तो उस रिपोर्ट पर विचार करने का अधिकार उसी मजिस्ट्रेट का है। उस के इस अधिकार का प्रयोग अन्य कोई भी न्यायालय चाहे वह सर्वोच्च न्यायालय ही क्यों न हो नहीं कर सकता। 
ब भी कभी इंगित व्यक्ति को अभियुक्त बनाने से इन्कार किया जाता है तो यह अन्वेषणकर्ता ऐजेंसी का कर्तव्य है कि वह शिकायतकर्ता को सूचित करे कि उन्हों ने रिपोर्ट को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है और यदि उन की रिपोर्ट पर शिकायतकर्ता को आपत्ति है तो वह मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं। शिकायतकर्ता मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हो कर निवेदन कर सकता है कि अन्वेषणकर्ता ऐजेंसी ने पर्याप्त दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य मजिस्ट्रेट के सामने नहीं रखी हैं जिस से इंगित व्यक्ति पर अभियोजन चलाया जा सके और वह स्वयं दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता है तो मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता को इस का अवसर प्रदान करता है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य और अन्वेषण ऐजेंसी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर विचार करते हुए मजिस्ट्रेट यह निर्णय कर सकता है कि किसी इंगित व्यक्ति के विरुद्ध अभियोजन चलाने हेतु पर्याप्त साक्ष्य है या नहीं। यदि वह पाता है कि अभियोजन के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद है तो उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रसंज्ञान ले कर उस के विरुद्ध अभियोजन का आरंभ करता है। 
र्वोच्च न्यायालय ने नरेंन्द्र मोदी के मामले में जो निर्णय दिया है उस में मजिस्ट्रेट के प्रसंज्ञान लेने के अधिकार की रक्षा की गई है और सारे मामले को मजिस्ट्रेट के सामने खोल कर रख दिया है। अब शिकायतकर्ता मजिस्ट्रेट के सामने अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध प्रसंज्ञान लेने का निवेदन कर सकता है। यदि मजिस्ट्रेट पर्याप्त साक्ष्य होते हुए भी मोदी के विरुद्ध प्रसंज्ञान नहीं लेता है तो सेशन न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय हैं जो मजिस्ट्रेट के प्रसंज्ञान लेने या न लेने के आदेश की समीक्षा कर सकते हैं। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से मोदी की मुसीबतें कम होने के स्थान पर बढ़ गई हैं। 
दि मोदी यह कह रहे हैं कि ‘गॉड इज ग्रेट’, तो उस का अर्थ केवल एक उँसास भर है कि कम से कम अभी तो बचे। लेकिन आगे बचाव के लिए उन्हें बहुत पापड़ बेलने होंगे। मजिस्ट्रेट या फिर उस से ऊंचे किसी भी न्यायालय ने उन के विरुद्ध प्रसंज्ञान लेने का आदेश दिया तो शायद उन्हें भगवान को कोसना पड़े कि वह ये दिन क्यों दिखा रहा है?

वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती : सर्वोच्च न्यायालय

ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन अधिनियम 1970 के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इस कानून का निर्माण उद्योगों में ठेकेदार श्रमिकों को नियोजित करने की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए हुआ है। यह सही है कि इस का उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। लेकिन उस के लिए प्रक्रिया इतनी दुष्कर बना दी गई है और निर्णय करने का अधिकार केन्द्र/राज्य सरकारों को प्रदान किया गया है कि इस प्रथा का उन्मूलन किया जाना असंभव जैसा हो चुका है। सब से पहले तो कोई इस के लिए तथ्य एकत्र करे, फिर राज्य सरकार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। फिर राज्य सरकार इस प्रश्न पर आवेदनकर्ता और उद्योग के स्वामियों/प्रबंधकों की सुनवाई करे। आवेदक का उद्योग के श्रमिकों का उचित प्रतिनिधि होना भी आवश्यक है। कानून बना कर ठेकेदार श्रमिक प्रथा का उन्मूलन करने की शक्तियाँ सरकार को प्रदान कर देने के कारण न्यायालय भी इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते क्यों कि उन्हें इस का क्षेत्राधिकार ही नहीं है।
स कानून का उपयोग नियोजकों द्वारा श्रमिकों के विरुद्ध किया जा रहा है। नियोजक अपनी प्रत्येक स्थाई और नियमित प्रकृति की आवश्यकताओं के लिए श्रमिकों को नियोजित करते हैं, उन का चयन स्वयं करते हैं, उन्हें वेतन भी नियोजक का कार्यालय ही देता है और उन के कार्यों पर नियंत्रण भी नियोजक का ही होता है। लेकिन कागजों में उन्हें ठेकेदार का कर्मचारी बताया जाता है। ऐसे श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक प्राप्त नहीं होती, यदि वे कानूनी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं तो नियोजक तुरंत कहते हैं कि श्रमिक उन के कर्मचारी न हो कर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। विवाद बढ़ता दिखाई देता है तो ठेकेदार का ठेका समाप्त कर दिया जाता है और उस के साथ ही इन श्रमिकों का नियोजन समाप्त हो जाता है।
क सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति बनाम विनोद कुमार शर्मा के मामले में निर्णय पारित करते हुए कहा है कि न्यायालय कानून के इस तरह के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती। इस मामले में नियोजक द्वारा ठेकेदार के कर्मचारी घोषित किए गए श्रमिकों को मूल उद्योग के कर्मचारी घोषित करते हुए उन्हें मूल उद्योग में मिलने वाली सुविधाएँ दिलाने के श्रम न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया गया है।

राजद्रोह पर बहस, लेकिन बिनायक सेन के जमानत आदेश में कुछ नहीं

र्वोच्च न्यायालय ने बिनायक सेन को जमानत देना उचित समझा। जमानत की बहस के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार के वकीलों के तर्कों को खारिज करते हुए न्यायालय ने उन पर राजद्रोह (Sedition) के आरोप को सिद्ध नहीं माना और यह भी कहा कि कानून की व्याख्या समकालीन परिस्थितियों में की जानी चाहिए। इस से देश भर में इस औपनिवेशिक कानून को बदलने के पक्ष में चर्चा आरंभ हो गई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा को निभाते हुए जमानत के आदेश में किसी भी तरह के विचार अभिव्यक्त नहीं किए हैं जिस से अपील की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय प्रभावित हो। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इस तरह है … 

S U P R E M E   C O U R T  O F  I N D I A

RECORD OF PROCEEDINGS

Petition(s) for Special Leave to Appeal (Crl) No(s).2053/2011

(From the judgement and order dated 10/02/2011 in IA No. 1/2011 in
CRLA No. 20/2011 of The HIGH COURT OF CHATTISGARH AT BILASPUR)

BINAYAKSEN Petitioner(s)

VERSUS

STATE OF CHHATISGARH Respondent(s)

(With appln(s) for exemption from filing O.T.,bail,BRINGING ON
RECORD ADDL. FACTS and office report )

Date: 15/04/2011 This Petition was called on for hearing today.

CORAM :
HON’BLE MR. JUSTICE HARJIT SINGH BEDI
HON’BLE MR. JUSTICE CHANDRAMAULI KR. PRASAD

For Petitioner(s) Mr. Ram Jethmalani,Sr.Adv.
M/s. lata Krishnamurthy,R.N.Karanjawala,
Manik Karanjawala, Sandeep Kapur,
Shivek Trehan, Udit Mendiratta,
Nitya Ramakrishnan and Rahul Kripalani
and Akhil Sachar,Advs.for
M/S. Karanjawala & Co.

For Respondent(s) Mr. Mukul Rohtagi,Sr.Adv.
Mr. U.U.Lalit,Sr.Adv.
Mr. Atul Jha,Adv.
Mr. Sandeep Jha,adv.
Mr. D.K.Sinha,Adv.

Mr. R.S.Suri,Sr.Adv.
Mr. Rana Mukherjee,Adv.
Mr. Merusagar Samantaray,Adv.
Mr. Vikramjit Banerjee,Adv.
Mr. Rajiv Singh,adv.
Mr. S.Shamshery,Adv.

UPON hearing counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsel for the parties at very great length. Lest we should prejudice any party. We are not giving any reasons for our order. We however direct that the sentence on the petitioner be suspended, and he be released on bail to the satisfaction of the Trial Court.

The SLP is disposed of.

[SUMAN WADHWA]             [VINOD KULVI]
COURT MASTER               COURT MASTER

न्यायपालिका की आलोचना के लिए माफी मांगने के बजाय जेल जाना पसंद करेंगे

पिछले दो दिनों से सुरेश चिपलूनकर ने सुप्रीमकोर्ट के जजों के संदिग्ध आचरण के बारे में अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया है। यह सब बहुत पहले से तहलका ई-मैगज़ीन पर पिछली सात अक्टूबर को प्रकाशित हो चुका था।  यह सारा मामला वास्तव में न्यायिक जवाबदेही आंदोलन के प्रमुख और सुप्रीमकोर्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण के तहलका में प्रकाशित एक साक्षात्कार में यह कहने पर उत्पन्न हुआ था कि देश के पिछले सोलह न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे। उस समय तक न्यायमूर्ति एच.एस. कपाड़िया मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे, उन्हों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन् के साथ एक पीठ में वेदान्ता स्टरलाइट ग्रुप से जुड़े एक मामले की सुनवाई की थी इसी साक्षात्कार में उन्हों ने यह भी कहा था कि न्यायमूर्ति कापड़िया को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह कंपनी के शेयर धारक हैं।  
स साक्षात्कार के आधार पर सुप्रीमकोर्ट के एक अधिवक्ता  हरीश साल्वे ने सुप्रीमकोर्ट के समक्ष एक अवमानना याचिका दाखिल की गई और उस पर प्रशांत भूषण और तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट ने अवमानना नोटिस जारी किया। इस नोटिस के उत्तर में प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्हों ने जो कुछ कहा वह उन की निजि राय थी जो तथ्यों पर आधारित थी, और यदि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में निजि राय अभिव्यक्त करना उन का अभिव्यक्ति का मूल अधिकार है। इस के समर्थन में प्रशांत भूषण के पिता और वरिष्ठ अधिवक्ता शान्ति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दाखिल कर के कहा कि वे खुद जानते हैं कि सोलह में से आठ मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। इस शपथ पत्र के अंश तहलका ने प्रकाशित किए। शान्ति भूषण ने यह भी कहा कि उन्हें इस कार्यवाही में पक्षकार बनाना चाहिए क्यों कि जो कुछ प्रशांत ने कहा है वह सही है और वे उस की ताईद करते हैं।
बुधवार को इसी प्रकरण की प्रारंभिक पूछताछ सुनवाई के दौरान पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की ओर इशारा करने के लिए माफी मांगने के  स्थान पर को जेल जाना पसंद करेंगे। उन्हों ने न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर, न्यायमूर्ति सायरिक यूसुफ और न्यायमूर्ति एच एल दत्तू की सुप्रीम कोर्ट बैंच के समक्ष यह जवाब तब दिया जब उन्हें उन से माफी मांगने की पेशकश की गई थी।
स अवमानना के इस मामले में यह प्रश्न निहित हो चुका है कि भूषण पिता-पुत्र द्वारा जो कुछ सुप्रीमकोर्ट और उस के न्यायाधीशों के लिए कहा और तरुण तेजपाल द्वारा तहलका में प्रकाशित किय

अब लगा कि उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च है

ल लगा कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय वास्तव में सर्वोच्च है। कानून के राज में कानून सब से बड़ा होना चाहिए। लेकिन जो कानून संसद और विधानसभाओं में रचे जाते हैं तथा जिन की व्याख्या न्यायालय करते हैं वे कभी पूर्ण नहीं होते। समय समय पर उन की कमियाँ उजागर होती है और उन्हें दुरुस्त करने के लिए कानूनों में संशोधन करने और पुराने कानूनों को निरस्त कर के उन के स्थान पर नए कानून बनाने की आवश्यकता होती है। इस का अर्थ यह है कि न्याय की गुंजाइश तब तक बनी रहती है जब तक कि न्याय वास्तव में हो नहीं जाता है। इस का अर्थ हम यह भी कर सकते हैं कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए। बहुमत जनता को लगना लगना चाहिए कि न्याय हुआ है। यदि देश की जनता को लगता है कि न्याय नहीं हुआ है तो सारे कानून और उन की व्याख्याएँ भले ही उसे न्याय कहती हों वह अन्याय ही रहेगा। 
भोपाल मामले में यही हुआ। जब अदालत से दोषियों को सजा दी गई तो उसे जान कर जनता की आँखें खुली रह गईँ। इतने बड़े अपराध की सजा मात्र इतनी? इस का अर्थ यह जा रहा था कि सक्षम और समर्थ लोगों के लिए भारत एक ऐसा स्थान है जहाँ वे कोई भी अपराध मजे में कर सकते हैं। आखिर कानून और वकील उन्हें बचा ही लेंगे। भोपाल के अपराधियों को जो सजा दी गई थी वह लोगों को लगा ही नहीं कि सजा है। मीडिया ने यहाँ जो भूमिका अदा की वह महत्वपूर्ण थी। उस ने जनता की आवाज को ऊँचा किया जिस से सरकार और अदालतों तक वह पहुँचे। आखिर जनता की उस आवाज ने सरकार को कहीँ अंदर तक दहला दिया। सीबीआई एक उपचारात्मक (curative petition) याचिका ले कर सुप्रीम कोर्ट गई। सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया कि वास्तव में न्याय होने में कोई कोताही हुई है। उस ने उस मामले में अभियुक्तों को नोटिस जारी किए और मामले को फिर से खुली अदालत में सुनने का निर्णय किया। जब भी लगे कि न्याय नहीं हुआ है तो अदालत अपने निर्णय और कानून से बंधी नहीं हो और न्याय करने को तत्पर हो तभी कहा जा सकता है कि वह न्यायालय सर्वोच्च है। 
रकार और संसद ने इस तरह का कोई कानून बना कर अदालत को नहीं दिया। लेकिन देश के सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं परिस्थितियों पर विचार कर यह नियम निर्मित किया कि विशेष स्थिति में उपचारात्मक याचिका प्रस्तुत की जा सकती है और उस पर सुनवाई की जा सकती है। आज उसी सरकार को जनदबाव में आ कर उचारात्मक याचिका प्रस्तुत करनी पड़ी। यही सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता है।

क्या एक ही वकील सभी न्यायालयों में मुकदमे में पैरवी नहीं कर सकता?

  रमेश कुमार जैन ने पूछा है – – –
क्या किसी भी प्रकार के विवाद के मामले में अपील दायर करने के लिए उच्च न्यायालय उच्चतम न्यायालय के अलगअलग वकील करने की आवश्कता होती है और क्या जिला न्यायालय में केस लड़ने वाला वकील ही आगे अपील दायर नहीं कर सकता है? क्या सभी वकीलों को सभी न्यायालय की कोई मेम्बरशिप लेनी होती है तब ही उस कोर्ट में अपील दायर कर सकते हैं
  उत्तर – – – 
 रमेश जी, 
यूँ तो कोई भी वकील जो किसी भी राज्य की बार कौंसिल का सद्स्य है, उन न्यायालयों के अतिरिक्त जहाँ कानून के द्वारा वकीलों को पैरवी करने से प्रतिबंधित किया गया है,* भारत के किसी भी न्यायालय में मुकदमे की पैरवी कर सकता है। लेकिन हर वकील का अभ्यास कुछ ही न्यायालयों तक सीमित होता है। अक्सर जहाँ वह रहता है उसी स्थान के न्यायालयों में काम करता है। आवश्यकता होने पर नजदीक के न्यायालयों में पैरवी करने जाता है। लेकिन यदि आप किसी स्थानीय वकील को उच्चन्यायालय में पैरवी करने को कहें तो वह इस लिए इन्कार करता है कि वहाँ के बहुत से व्यवहार के नियमों की उसे जानकारी और अभ्यास नहीं होता। फिर वहाँ जा कर वह सहज अनुभव नहीं करत

थैंक्यू सुप्रीमकोर्ट – थैंक्यू पीयूसीएल, सरकार के पास जमा 604.28 में से 426.28 गेहूँ को रखने के लिए स्थान नहीं है

सामंती युग में राजा की उत्पत्ति हुई थी। तब शासन के सभी दायित्व और अधिकार राजा में निहित हुआ करते थे। जैसे जैसे राज्य विशाल और जटिल होते गए। शासन के विभिन्न अंगों के दायित्वों के लिए विभिन्न संस्थाएँ अस्तित्व में आयीं। जनतंत्र के आगमन पर राजा का न्याय करने वाला अंग कार्यपालिका और विधायिका से पृथक हो कर न्यायपालिका कहलाने लगा और उस का स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित होने लगा। भारत में वह अधिकांश मामलों में स्वतंत्र तो है लेकिन स्वायत्त नहीं। यह न्यायपालिका के स्वतंत्र होने का ही प्रमाण है कि जब मानसून के इस मौसम में देश भर से अनाज के खराब होने, भीगने और सड़ने की खबरें आ रही है और सरकारें किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में है तब सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को निर्देश दिया है कि अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देने के स्थान पर उसे गरीब जनता में बांट दिया जाए। निश्चित ही यह एक ऐतिहासिक निर्णय है और दुनिया भर के न्यायिक इतिहास में इस तरह का अन्य उदाहरण मिलना कठिन है। थैंक्यू सुप्रीम कोर्ट! देश की जनता तुम्हारा धन्यवाद करती है।
में पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) को भी धन्यवाद करना  चाहिए जिस ने इस मामले को तुंरत सुप्रीमकोर्ट के सामने ले जाकर मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार की। थैंक्यू पीयूसीएल हम तुम्हारा भी धन्यवाद करते हैं। 
ह एक विडम्बना ही है कि पिछले तीन वर्षों में सरकारी एजेंसियों ने गेहूँ की जो खरीद की उस से हमारे पास 604.28 लाख टन गेहूँ का भंडारण है। लेकिन हमारी इन एजेंसियों के पास  केवल 178 लाख टन गेहूँ सहेज कर रखने के लिए पर्याप्त स्थान है। निश्चित ही 426 लाख टन से अधिक गेहूँ जो खुले में पड़ा है उसे मानसून के इस मौसम में खराब होने के लिए छोड़ा नहीं जाना चाहिए था। पीयूसीएल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया यह निर्णय जो लाखों टन गेहूँ को आपदा के लिए बचाएगा। सदा-सर्वदा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया है।
इस निर्णय के लिए फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट और पीयूसीएल को धन्यवाद!

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की कुछ विशेष शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-101

भारत के संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को कुछ विशेष शक्तियाँ भी दी हैं। वह अनुच्छेद 71 के अंतर्गत  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के संबंध में उत्पन्न विवाद का निपटारा कर सकता है और ऐसे मामले में उस का निर्णय अंतिम माना जाएगा। अनुच्छेद 317 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या उस के किसी सदस्य के दुराचरण का मामला  सर्वोच्च न्यायालय को निर्दिष्ट किया जाता है और सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुँचता है कि संबंधित सदस्य या अध्यक्ष को उस के पद से हटा दिया जाना चाहिए तो उसे पद से हटा दिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के पास मामला लंबित रहने के दौरान राष्ट्रपति ऐसे सदस्य को निलंबित रख सकते हैं।
र्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि को संविधान के अनुच्छेद 141 के द्वारा भारत के सभी न्यायालयों के लिए आबद्धकर घोषित किया गया है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय को विधि के एक स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को अपने स्वयं के निर्णय को उलटने की शक्ति प्रदान की गई है। लेकिन किसी निर्णय को उलट दिए जाने तक वह निर्णय अन्य न्यायालयों पर आबद्धकर रहेगा। 
र्वोच्च न्यायालय संसद या राज्य की विधानसभाओं द्वारा निर्मित की गई विधियों को यदि वे उन की सूची के नहीं हैं तो असंवैधानिक घोषित कर सकता है। दांडिक विधि प्रशासन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपराधिक मामलों की अपीलों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है। न्याय प्रशासन की संपूर्णता के लिए सर्वोच्च न्यायालय वह कोई डिक्री या आदेश जारी कर सकता है। वह ऐसी डिक्री और आदेशों के संबन्ध में नियम भी बना सकता है। वह किसी भी व्यक्ति को स्वयं के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-100

संविधान के अनुच्छेद 145 ने सर्वोच्च न्यायालय को न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के सामान्य विनियमन के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्रदान की है जिस के अंतर्गत वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति के अनुमोदन से नियम बना सकता है। इस शक्ति के अंतर्गत (1) सर्वोच्च न्यायालय अपने यहाँ विधि-व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के संबंध में, (2) अपीलें सुनने की प्रक्रिया और उन्हें ग्रहण किए जाने की अवधि के संबंध में, (3) संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों में से किसी का प्रवर्तन कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में, (4) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या आदेश के पुनार्विलोकन की शर्तों, उस की प्रक्रिया और अवधि जिसके भीतर ऐसे पुनार्विलोकन के लिए आवेदन उस न्यायालय में ग्रहण किए जाने हैं के संबंध में, (5) उस न्यायालय में अन्य कार्यवाहियों और उनके आनुषंगिक खर्चों के बारे में, तथा उस की कार्यवाहियों के संबंध में प्रभारित की जाने वाली फीसों के बारे में (6) जमानत मंजूर करने के बारे में (7) कार्यवाहियों को रोकने के बारे में (8) तुच्छ या तंग करने वाली प्रतीत होने वाली या विलंब करने के प्रयोजन से की गई अपीलों के संक्षिप्त अवधारण के लिए उपबंध करने वाले नियम बना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए नियमों के द्वारा किसी प्रयोजन के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या तथा एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शाक्तियों के सम्बंध में नियम बना सकता है।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada