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गलतियों की माफी से ही आगे का रास्ता बनेगा।

rp_two-vives.jpgसमस्या-

रशीद वारसी ने आगरा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी शादी 2012 में हुई थी। 3 साल बाद मैं ने अपनी बीवी को कुछ गलतफहमियों की वजह से छोड़ दिया और मैं किसी और के साथ लिव इन में रहने लगा। मुझे पता लगा कि मेरी बीवी मुझ पर केस करने जा रही है तो मैं ने बिना पूछे 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर उसे तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। क्या मेरी तलाक हो गयी? मेरी उस से एक बेटी भी है। वो मुझे उस से भी नहीं मिलने देती। मैं क्या करूँ? मैं अपनी बीवी को वापस लाना चाहता हूँ। कोई कानूनी तरीका हो तो बताएँ।

समाधान-

प बड़े अजीब आदमी हैं। आप ने गलतफहमी के चलते अपनी बीवी को छोड़ दिया। किसी अन्य महिला के साथ लिव इन में रहने लगे। गलतफहमी आप को थी बीवी को नहीं। बीवी ने बिना किसी कसूर के दंड भुगता। जब आप को पता लगा कि वह मुकदमा करेगी तो डर के मारे आप ने 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। अब आप को बेटी याद आ रही है। आप औरतों और लड़कियों को समझते क्या है? तीन औरतों को आप ने परेशान कर दिया है। बीवी को छोड़ा, बेटी को पिता के स्नेह से वंचित किया और जिस के साथ लिव इन में रहे हैं उस का क्या उस की तो कोई चिन्ता तक आप ने इस सवाल में व्यक्त नहीं की है। यदि आप धार्मिक व्यक्ति हैं तो खुद सोचिए इन तीन इंसानों के साथ जो गुनाह आपने किए हैं क्या आप का खुदा उन्हें माफ कर देगा? क्या वे माफ कर दिए जाने के काबिल हैं? और यदि नहीं हैं तो उस की सजा आप को क्या मिलनी चाहिए?

आप को सब से पहले तीनों से अपने रिश्ते तय करने होंगे। आप अब अपनी लिव इन वाली स्त्री के साथ किस तरह के संबंध रखने चाहेंगे। यदि आप उस से संबंध न ऱखेंगे तो क्या वह बखेड़ा नही ख़ड़ा करती रहेगी। आप को उस से माफी मांग कर उस से अपने संबंध समाप्त करने होंगे। अपनी पत्नी से भी आप को माफी मांगनी चाहिए। उस के बाद यदि वह वाकई आप को माफ कर दे तो ठीक वर्ना आप अपनी बीवी को कभी साथ नहीं रख पाएंगे और जीवन भर बीवी और बेटी के लिए भरण पोषण का खर्च देते रहने पड़ेगा।

आप ने पूछा है कि क्या आप का तलाक हो गया है? यदि आप ने एक ही स्टाम्प पेपर पर तीन जगह तलाक लिख कर भेजा है तो इसे शरीयत के मुताबिक तलाक नहीं माना जा सकता। भारतीय न्यायालयों की व्याख्या यह है कि तीनों के तलाकों के बीच में पर्याप्त अंतर होना चाहिए जिस से खाविंद और बीवी दोनों को सोचने का अवसर मिले और दोनों के बीच समझौते की बात चल सके। इस तरह यदि आप अदालत जाएंगे तो आप का तलाक अवैध माना जाएगा। इस तरह आप की बीवी अब भी आप की बीवी है। उसे वापस लाने के लिए आप को हलाला की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर आप की समस्या का हल यही है कि आप अपनी लिव इन को छोड़ें, बीवी और बेटी के साथ न्याय पूर्वक अपना जीवन बिताएँ। इस के लिए आप को प्रयास करने होंगे। आप फिलहाल आप के दाम्पत्य जीवन की पुनर्स्थापना के लिए वाद संस्थित कर सकती हैं। जब एक बार दावा अदालत में जाएगा तो बातचीत और समझौते का मार्ग भी निकलेगा।

तलाक़ और दूसरा निक़ाह भी शरीयत के कायदे से ही करें।

समस्या-

यूसुफ ने जयपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरा निकाह 2012 में अहमदाबाद में हुआ था। शादी के छह माह बाद ही वह बच्चेदानी का इलाज करवाने के बहाने अपने पिता के साथ अहमदाबाद चली गयी। अब आने से इन्कार कर दिया है और दस लाख की मांग की। फिर मैं ने उसे आने के लिए तीन नोटिस भी दिए मगर उस ने लेने से इनकार कर दिया। बाद में मैं ने 4 फरवरी 2015 को तलाक भिजवा दिया। मगर उस ने तलाक भी नहीं लिया और इद्दत के पैसे भी नहीं लिए। तीन माह बाद मैं ने उसे अपना सामान ले जाने के लिए नोटिस दिया वह भी नहीं लिया। अब मैं दूसरा निकाह करना चाहता हूँ। क्या मैं दूसरा निकाह कर सकता हूँ। मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

प ने कायदे से निकाह किया है तो तलाक भी कायदे से ही होना चाहिए। कायदा ये है कि पहला तलाक हो जाने के बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधि आपस में बात करें और समझाइश कराएँ, समझाइश से बात न बने तो तीसरा तलाक भी हो जाए। जिन काजी साहब ने आप का निकाह पढ़ाया था और तब जो वकील आप की बीवी के थे उन से बात की जा सकती है।

खैर, यह तो बात हुई तलाक की। दूसरा निकाह तो आप तलाक के बिना भी पढ़ सकते हैं। उस के लिए यह जरूरी है कि आप की दो बीवियाँ हों तो दोनों के प्रति प्रत्येक व्यवहार में समानता बरतें। जब आप की पहली बीवी साथ रह ही नहीं रही है तो यह तो हो नहीं सकता। दूसरी बात कि पहली बीवी की अनुमति या सहमति हो। वह भी नहीं ली जा सकती। बेहतर है कि आप अपनी बीवी को नोटिस दें कि वह साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है और दस लाख रुपए मांगती है जो नाजायज है। इस कारण आप दूसरा निकाह पढ़ने को तैयार हैं, यदि एक हफ्ते में उस का कोई जवाब न मिला तो आप निकाह पढ़ लेंगे। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जा सकता है, बीवी के रहने की जगह अखबार में शाया कराया जा सकता है और दो गवाहों के सामने बीवी के रहने के मकान और पड़ौस के मकानों पर चस्पा किया जा सकता है। ऐसा करने के बाद आप बेशक दूसरा निकाह पढ़ सकते हैं।

बीवी के साथ रहने से इन्कार कर देने पर तलाक दिया जा सकता है।

पति पत्नी और वोसमस्या-

युसुफ ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा निकाह 17 जून 2012 को अहमदाबाद, गुजरात में हुआ था। मैं एक पैर से विकलांग हूँ (40%) और मेरी बीवी की एक आँख खराब है। निकाह से पहले उसके घरवालों ने उसे स्वस्थ बताया था। मगर निकाह होने के बाद जब वो 6-7 माह बाद भी गर्भवती नहीं हुई तो उसने मुझे बताया कि उसे कभी महावारी नहीं हुई है और सिर्फ़ दवा लेने के बाद ही महावारी आती है। उसके घर से एक मैसेज भी आया कि इसे यह दवा लाकर देना, इसे बिना दवा माहवारी नहीं आती क्योंकि इसकी बच्चेदानी छोटी है और यह कभी माँ नहीं बन सकती। यह सुन कर मुझे दुख हुआ। मैं उससे नाराज़ भी रहने लगा। इस बीच उसके पिता जी घर पर आकर उसे ले गए और कहा कि मैं इसका इलाज करवाकर भेज दूँगा। मगर जब 2 साल गुजर गये। हमने कहा कि मैं लेने आ रहा हूँ तो उन्होने कहा की हमें लड़की भेजनी नहीं है। हमें तो 10 लाख रुपए चाहिए। मैं ने उसे वकील के ज़रिए नोटिस भिजवाया। मैं तुझे रखना चाहता हूँ मगर उन्होंने जवाब नहीं दिया। दूसरा नोटिस भेजा तो लेने से इनकार कर दिया। मैं क्या करूँ मैं दोनो तरह से राज़ी हूँ। अगर जवाब नहीं आता है तो क्या मैं उसे तलाक़ भेज सकता हूँ।

समाधान-

प दो नोटिस भेज चुके हैं। उस के बाद भी आप की बीवी आप के साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है। आप ने उसे लेने आने के लिए कहा तो उस ने आप के पास आने से इन्कार कर दिया। वैसी स्थिति में आप का अपनी पत्नी को तलाक देना वाजिब है। लेकिन अब भारत में कानूनी स्थिति यह है कि तलाक तीन बार में होना चाहिए। इन तीन तलाकों के बीच दोनों पक्षों के बीच सुलह का मौका होना चाहिए। दोनों पक्षों के एक एक प्रतिनिधि इस का प्रयत्न करें और प्रयत्न असफल होने पर तीसरा तलाक दिया जाए।

स के लिए आप स्थानीय काजी साहब या फिर अहमदाबाद के काजी साहब की मदद भी ले सकते हैं। तीनों तलाक के गवाह होने चाहिए। जिन काजी साहब ने आप का निकाह पढ़ाया हो पहला तलाक देने के साथ ही पहले तलाक के दस्तावेज की कापी उन्हें भेजते हुए आप अलग से पत्र में लिख कर कह सकते हैं कि वे समझौता कराने की कोशिश करें। दूसरे और तीसरे तलाक की कापियाँ भी उन्हें भेज सकते हैं। तीनों तलाकों पर गवाहों के दस्तखत होने चाहिए।

मिथ्या मुकदमों से डरे बिना सचाई के साथ वाजिब कार्यवाही करें।

rp_judicial-sep.jpgसमस्या-

अहमद ने इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी केवल 15 दिन मेरे साथ रही और उस ने मेरे साथ कोई संबंध नहीं बनाने दिया। उस के बाद मायके चली गयी। मैं ने रिश्तेदारो को भेज कर मामले को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। क्या मैं मुस्लिम रीति से तलाक दूँ। वह दहेज का मुकदमा लगा कर मेरा वेतन बाँटने की धमकी दे रही है। मुझे क्या करना चाहिए। मैं बिना 498ए व धारा 125 के मुकदमों से बच कर कैसे अलग हो सकता हूँ?

समाधान-

म अनेक बार कह चुके हैं कि 498ए भारतीय दंड संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के डर से लोग उन्हें जो वाजिब कार्यवाही करना चाहिए वह भी नहीं करते हैं। नतीजा यह है कि मामला उलझता जाता है। कोई भी कानूनी कार्यवाही किसी के करने से होती है और किसी को कोई भी कार्यवाही करने से रोका नहीं जा सकता। वह आज होगी तो होगी भविष्य में होगी तो होगी। लोग इस कारण से वाजिब कार्यवाही करने से रुके रहते हैं। फिर वही तथ्य जब वे बचाव में प्रस्तुत करते हैं तो वे देरी के कारण उतने कामयाब नहीं होते।

मारी राय में आप को इस्लामी रीति से तलाक की कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन यह अच्छी तरह समझ लें कि शरिया के हिसाब से तलाक कैसे होना चाहिए। भारत में एक साथ तीन बार तलाक कह देने से अब तलाक संभव नहीं है। शरिया कहता है कि पहले तलाक और तीसरे तलाक के बीच पर्याप्त समय होना चाहिए और दोनों पक्षों के चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से दोनों के बीच सुलह कराने का अवसर मिलना चाहिए।

स विधि को अपनाने के लिए आप अपनी पत्नी को पत्नी द्वारा आप के साथ संबंध बनाने से इन्कार करने के कारण तलाक कह रहे हैं लेकिन सुलह चाहते हैं इसी नोटिस में आप अपनी ओर से प्रतिनिधि नियुक्त कर पत्नी से कहें कि वह अपनी ओर से प्रतिनिधि नियुक्त करे जो दोनों के मध्य सुलह कराने का प्रयत्न करें। आप यह काम उस काजी के माध्यम से भी कर सकते हैं जिस ने आप का निकाह पढ़ाया है।

दि कोई सुलह हो जाती है तो ठीक है और नहीं होती है तो आप दूसरा और तीसरा तलाक कहते हुए अपनी पत्नी को तलाक दे दें। आप यह सब कर रहे हैं उस का सारा दस्तावेजी सबूत होना चाहिए तथा हर तलाक के वाजिब गवाह होने चाहिए।

स बीच या तलाक के बाद यदि आप की पत्नी की ओर से 498ए भारतीय दंड संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता की कोई कार्यवाही होती है तो आप अपनी स्पष्टता से उन कार्यवाहियों में अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं। आप को यह सब बिना किसी डर के करना चाहिए और इस बात का विश्वास करना चाहिए कि जब आप सच्चे हैं और आप के पास सब सबूत हैं तो आप का बाल भी बांका नहीं हो सकता।

भारत में मुस्लिम पुरुष द्वारा पत्नी को तलाक़ देने की विधि …

rp_women.jpgसमस्या-

सलीम ने शहडोल, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं अपनी पत्नी को तलाक़ देना चाहता हूँ, हमारा रिश्ता नहीं चल पा रहा है। अगर मैं कॉल कर के उस को तलाक़ ३ बार बोल दूँ तो क्या हमारा तलाक़ हो जाएगा या मैसेज करूँ? उस के बाद उस के क्या हक़ हैं? और मेरे क्या हक़ हैं?

समाधान-

मुस्लिम विधि में तिहरे तलाक़ की व्यवस्था है। इस का आधार कुऱआन है। लेकिन इस तलाक़ की व्याख्या अनेक बार हुई है। आम धारणा यह है कि यदि पति तीन बार पत्नी को तलाक कह दे या लिख कर दे दे तो तलाक़ सम्पन्न हो जाता है। पर यह धारणा गलत है।

भारत में तलाक़ को यदि पत्नी द्वारा या अन्य किसी व्यक्ति द्वारा न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जाए तो हमेशा पति को न्यायालय में यह साबित करना पड़ता है कि उस ने अपनी पत्नी को जो तलाक़ दिया है वह विधि के अनुरूप है।

पाकिस्तान में 1961 में तलाक़ के सम्बन्ध में एक अध्यादेश Muslim Family Laws Ordinance, 1961 पारित किया गया जो पाकिस्तान व वर्तमान बंगलादेश में प्रभावी हैं। उस की धारा-7 के प्रावधान निम्न प्रकार हैं-

  1. कोई भी पुरुष जो अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता है, जैसे ही किसी भी रूप में तलाक़ की घोषणा करता है, (बेसिक डेमोक्रेटिक ऑर्डर, 1959 के अनुसार गठित यूनियन कौंसिल के) चेयरमेन को लिखित में नोटिस देगा और उस की एक प्रति अपनी पत्नी को भेजेगा।
  2. जो उपधारा 1 का उल्लंघन करेगा वह एक वर्ष के साधारण कारावास से या पाँच हजार रुपए के अर्थदण्ड से या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा।
  3. उपधारा 5 के अतिरिक्त यदि तलाक़ किसी भी प्रकार से पहले वापस नहीं लिया गया हो तो चेयरमेन को नोटिस प्राप्त होने के 90 दिनों की समाप्ति के पूर्व प्रभावी नहीं होगा।
  4. चेयरमेन तलाक़ का नोटिस प्राप्त होने के 30 दिनों की अवधि में दोनों पक्षों के मध्य पुनर्विचार हेतु एक समझौता समिति गठित करेगा जो दोनों पक्षों के मध्य पुनर्विचार की कार्यवाही करगी।
  5. यदि पत्नी तलाक की घोषणा होने के समय गर्भधारण काल में हो तो उपधारा 3 में वर्णित अवधि या गर्भकाल तक जो भी बाद में समाप्त हो तलाक प्रभावी नहीं होगा।

स अध्यादेश से यह स्पष्ट है कि कुऱआन की व्यवस्था यही है कि एक ही समय में किसी भी विधि से तीन बार तलाक़ दे देने मात्र से तलाक़ नहीं हो सकता। तलाक़ के पहले कथन व अन्तिम कथन के मध्य दोनों पक्षों में विवाह को बचाए जाने के लिए समझाइश होनी चाहिए।

र्तमान में भारतीय न्यायालय भी इसी सिद्धान्त की पालना करते हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय ने शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मुकदमे में गौहाटी उच्च न्यायालय द्वारा रुकैया ख़ातून [Rukia Khatun Vs. Abdul Khalique Laskar, (1981) 1 GLR 375] के मामले में दिए गए निर्णय और व्याख्या को सर्वाधिक उचित बताया है। जिस में कहा गया है कि तलाक़ में दो बातें होना जरूरी हैं। (1) तलाक़ किसी उचित कारण से दिया गया हो, (2) तलाक़ के पहले एक समझौता परिषद द्वारा जिस में एक प्रतिनिधि पति पक्ष से तथा दूसरा प्रतिनिधि पत्नी पक्ष से हो समझैता संपन्न कराने की वास्तविक कोशिश होनी चाहिए और इस कोशिश के असफल होने पर ही तलाक प्रभावी होना चाहिए।

स तरह आप समझ सकते हैं कि मुहँ से सामने या फोन पर तीन बार तलाक़ बोल देने या तीन बार एसएमएस कर देने मात्र से यह तिहरा तलाक संपन्न नहीं होगा। कोई भी भारतीय न्यायालय ऐसे तलाक़ को वैध नहीं मानेगी और उस स्त्री को पत्नी ही माना जाएगा।

दि आप को तलाक देना है तो उस के लिए कोई उचित कारण होना चाहिए जो प्रदर्शित किया गया हो और एक समझौता परिषद द्वारा जिस में आप का और आप की पत्नी का प्रतिनिधि हो जिन्हें लिखित रूप में दोनों द्वारा नियुक्त किया गया हो और गवाहों के हस्ताक्षर हों, और इस समझौता परिषद के दोनों व्यक्तियों ने समझौते के वास्तविक प्रयास करने के उपरान्त लिखित में दे दिया हो कि उन के प्रयास असफल रहे हैं। तभी आप तीसरा तलाक कह सकते हैं और उसे विधि पूर्वक तलाक माना जाएगा।

विधिपूर्वक तलाक हो जाने के उपरान्त पति के पास पत्नी के प्रति कोई अधिकार नहीं रह जाता है। पत्नी इद्दत की अवधि में पति से अपने भरण पोषण प्राप्त कर सकती है। भारत में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 पत्नी, बच्चों व माता पिता के भरण पोषण के दायित्व के सम्बन्ध में है। उच्चतम न्यायालय का निर्णय है कि तलाक़शुदा पत्नी जब तक दूसरा विवाह नहीं कर लेती है तब तक उस की अपनी और अपने पूर्व पति की हैसियत के मुताबिक भरण पोषण की राशि प्रति माह प्राप्त कर सकती है।

मुस्लिम विधि में तलाक पुरुष का अधिकार है।

domestic-violenceसमस्या-

नीलोफर ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी मुसलमान शिया लड़की का पति उसकी मर्ज़ी के बिना या यह बहाना बना कर कि उस की पत्नी अपने मायके में रहना चाहती है, तलाक़ दे सकता है? मेरी पति सरकारी एम्प्लायी हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती क्या? मेरी 2 साल की बेटी भी है, उन्हों ने मुझ से पुलिस स्टेशन में प्लैन पेपर पर लिख कर दिया कि मैं अपनी मर्जी से तलाक़ चाहती हूँ। पर उन्हों ने अभी तक तलाक़ के पेपर ना दे कर मौलाना से मेसेज करवा दिया था कि तलाक़ के लिए आप के पापा तैयार हैं क्या? मैं ने मौलाना से पहले मौखिक व मैसेज से कहा था कि मुझे तलाक नहीं चाहिए। वह मुझे दहेज के लिए तंग करता था इसलिए मैं गर्भावस्था में अपने घर आ गई थी।

समाधान-

प के पति बिना किसी आधार के भी तलाक दे सकते हैं। मुस्लिम विधि में तलाक देना पति का अधिकार है। लेकिन उन्हें तलाक के पहले एक बार दोनों के बीच समझाइश की कार्यवाही की जानी चाहिए। अन्यथा तलाक न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा सकता है। यदि वे दहेज के लिए तंग करते हैं और आप के साथ उन का व्यवहार ठीक नहीं है तो आप इस के लिए कार्यवाही कर सकती हैं।

दि उन्हों ने आप को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया है तो आप धारा 498ए के अन्तर्गत कार्यवाही कर सकती हैं। इस के अलावा आप धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता व महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण के कानून के अन्तर्गत अपने व अपनी बेटी के भरण पोषण की राशि प्राप्त करने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं.

दि आप के पति तलाक देते भी हैं तो उन्हें तत्काल आप की न चुकाई गई मेहर तो चुकानी ही होगी। तलाक के उपरान्त जब तक आप दूसरा विवाह नहीं कर लेती हैं तब तक भरण पोषण का खर्च देना होगा। बेटी के भरण पोषण का खर्च भी उन्हें तब तक देना होगा जब तक कि उस का विवाह नहीं हो जाता है।

पहला तलाक दे कर बीवी को आप के घर आने के लिए कहें …

समस्या-alimony

परवेज आलम ने बहन्दर झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे निकाह को तीन वर्ष हो गए। मेरी बीवी कभी मेरे घर नहीं रहना चाहती। वह मायके में ही रह रही है। वह यह कहती है कि आप भी यहीं आ जाइए और मेरे साथ रहिए। हम वहाँ जाना नहीं चाहते।

समाधान-

ज कल स्त्री पुरुष की समानता का युग है। हर कोई परंपरा से यह चाहता है कि उस की पत्नी उस के साथ उस के या उस के माता पिता के घर में आ कर रहे। अब इस समानता के युग में कोई पत्नी यह मांग करती है कि पति उस के साथ आ कर रहे तो यह आज के युग में गलत नहीं कहा जा सकता।

फिर भी बीवी को जबरन अपने साथ नहीं रखा जा सकता। आप खुद उस के साथ उस के मायके में जाना नहीं चाहते। अब साथ रहे बिना तो आप का यह निकाह चल नहीं सकता। मुस्लिम विवाह में यह कायदा है कि पत्नी को पति के घर आ कर रहना चाहिए। इस कारण यदि वह नहीं आ रही है तो आप उसे कह दें कि आप उसे आप के साथ आ कर नहीं रहने के कारण पहला तलाक दे रहे हैं। यदि वह चाहती है कि वह आप के साथ रहे और निकाह को बरकरार रखे तो वह दो माह की अवधि में आप के साथ आ कर रहने लगे। यदि वह इन दो माह में आने से इन्कार करती है तो आप उसे अपनी ओर से एक मध्यस्थ का नाम सुझा रहे हैं और दूसरा तलाक दे रहे हैं। वह भी 15 दिनों में अपना मध्यस्थ नियुक्त कर दे। यदि उस ने अपनी ओर से मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया या मध्यस्थ नियुक्त करने पर दोनों मध्यस्थों के प्रयासों से भी मामला अगले दो माह में न सुलझा तो आप उसे तीसरा तलाक दे सकते हैं।

मारी राय में इस तरह कोई न कोई हल निकल आएगा, वर्ना इस समस्या का अन्तिम हल तो यही है कि आप अपनी बीवी को तीसरा तलाक दे कर बरी करें और अपने लिए नए लाइफ पार्टनर की तलाश करें। अब मेहर तो आप को देनी ही होगी क्यों कि वह तो उसी दिन चुकानी होती है जिस दिन  निकाह होता है। मेहर के असावा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत आप को बीवी के दूसरे निकाह तक का भरण पोषण का खर्च भी देना पड़ सकता है। भरण पोषण की राशि अदालत सारी परिस्थितियों को देख कर ही निश्चित करेगी।

मुस्लिम तलाक की डिक्री के लिए दीवानी/परिवार न्यायालय में घोषणा का वाद प्रस्तुत करें।

तलाकसमस्या-
विजयेन्द्र मेघवाल, पाली, राजस्थान ने पूछा है-

मेरे एक सेवार्थी मुस्लिम हैं। उन का समाज के सामने 100 रुपए के स्टाम्प पेपर पर तलाक नामा लिखा गया है। अब उन्हें न्यायालय से डिक्री चाहिए। इस के लिए क्या करना होगा?

समाधान-

मुस्लिम तलाक के मामले में भारतीय न्यायालय केवल तीन बार तलाक होने पर ही तलाक को वैध मानते हैं। शमीम आरा के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि तलाक किसी उचित कारण से होना चाहिए तथा पहले तलाक और तीसरे व अंतिम तलाक के बीच में दोनों पक्षों के बीच दो मध्यस्थों के माध्यम से समझौते की वाजिब और ईमानदार कोशिश होना चाहिए जिस में एक एक मध्यस्थ दोनों पक्षों द्वारा चुना गया हो। यदि ऐसा कुछ आप के द्वारा बताए इस मामले में हुआ है तो आप दीवानी न्यायालय में तलाक की घोषणा का वाद प्रस्तुत कर के न्यायालय से तलाक की घोषणा की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।  राजस्थान में जिन जिलों में परिवार न्यायालय स्थापित है वहाँ यह वाद परिवार न्यायालय को ही इस तरह के वाद सुनने और डिक्री पारित करने का क्षेत्राधिकार है।

लेकिन केवल समाज के सामने निष्पादित किए गए तलाकनामे के आधार पर तलाक की डिक्री पारित नहीं की जा सकती है। उस में आप को निश्चित रूप से यह अभिकथन करने होंगे कि वादी ने पहला तलाक किस दिन, किस समय दिया, उस के बाद किस तरह मध्यस्थता के प्रयत्न किए गए और कब दूसरा और तीसरा तलाक हुआ। इन कथनों को दस्तावेजों और मौखिक साक्ष्य से साबित भी करना होगा। इस दावे में तलाकशुदा बीवी आवश्यक पक्षकार होगी। यदि वह इस तलाक से सहमत नहीं है तो उस वाद में अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकती है।

पत्नी से तलाक नहीं हुआ तो उस का दूसरा विवाह अवैध है।

alimonyसमस्या-

दिल्ली से मोहम्मद नसीम ने पूछा है –

मेरी शादी 15.05.1990 को हुई थी,  हमारे एक बेटा भी हुआ। उसके बाद हम दोनों में झगड़े होने लगे मेरी पत्नी 1993 में अपनी माँ के पास चली गई। वहीं से महिला समिति में केस कर दिया महिला समिती में एक साल तक केस चला।  हमने 1994 में दहेज का सारा सामान महिला समिति में पत्नी को दे दिया और केस वही खतम हो गया।  लेकिन तलाक नहीं हुआ था। सामान लेकर मेरी पत्नी अपनी माँ के साथ ही वापस चली गई।  फिर 1995 में मेरी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।  वह तभी से दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है। मेरा बेटा भी मेरी पत्नी के पास है। पत्नी से मेरा तलाक नहीं हुआ है तो क्या वो आज भी कानूनन मेरी पत्नी है?  मेरी पत्नी ने जो दूसरी शादी की है क्या उस शादी की कानूनी मान्यता है? और क्या मैं अदालत से अपने बेटे को अपनी अभिरक्षा में ले सकता हूँ?

समाधान-

प की शादी अपनी पत्नी से हुई थी और तलाक नहीं हुआ है तो आप की पत्नी अभी भी आप की पत्नी है। उस ने जो दूसरी शादी की वह अवैध है जो कि धारा 494 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है। जिस व्यक्ति ने आप की पत्नी के साथ शादी की है वह जार-कर्म का दोषी है। जो कि धारा 497 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत अपराध है।  यदि आप साबित कर सकते हों कि आप की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है तो आप अपनी पत्नी के विरुद्ध धारा 494 भा.दं.संहिता तथा उस के साथ विवाह करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध धारा 497 भा.दं.संहिता के अंतर्गत पुलिस थाना में रिपोर्ट लिखा सकते हैं या फिर सीधे न्यायालय में शिकायत कर के मुकदमा कर सकते हैं।

दि आप पत्नी का दूसरा विवाह साबित कर सकते हैं तो आप उसे इस आधार पर तलाक भी दे सकते हैं और अपने बेटे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर उस की अभिरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

पंचायत व तहसीलदार के समक्ष हुआ विवाह विच्छेद वैध नहीं है, परिवार या जिला न्यायालय से डिक्री प्राप्त करें

समस्या-

शिमला, हिमाचल प्रदेश से कृष्ण ने पूछा है –

मेरा मित्र 100 प्रतिशत दृष्टिहीन है, उसका विवाह 2006 में एक दृष्टिवान लड़की से हुआ।  वो प्रारंभ से ही उसके साथ मानसिक उतपीड़न करती थी, आज उनके 2 बच्चे हैं।  मेरा मित्र हिमाचल सरकारी कर्मचारी है। उसकी पत्नी के कई लोगों के साथ अवैध शारीरिक संबंध है। जिसका प्रमाण कई बार मिल चुका है। अपनी गलती उसने सादे कागज पर भी स्वीकार की है। 30 जून 2012 को वो तहसीलदार के सामने उसे तलाक देकर चली गई थी। पर 3-4 महिने बाद वो पुनः आ गई।  मजबूरन उसे वो फिर रखनी पड़ी। उनके दो बच्चे 1 बेटा 1 बेटी जिन्हें वह जो  मेरे मित्र के पास छोड़कर चली जाती है। उसके कुछ दिनों बाद वह पुनः पंचायत के समक्ष उसे तलाक देकर चलई गई। यह तलाक जनवरी 2013 को हुआ था। पर मैंने उसे सलाह दी थी कि वो सेशन कोर्ट में तलाक के लिए आवेदन करे। दोनों बच्चे उसके पास हैं। वो उसे धमकी देती है कि अगर तू अदालत में गया तो वो उस से खर्चे के रूप में आधा वेतन लेगी। जिससे मेरा मित्र बहुत परेशान है।  दृष्टिहीनता तथा दो बच्चों के कारण वो खुद ही खर्चे से तंग है। मेरा मित्र काफी मानसिक तनाव में है। मैं कुछ जानकारियाँ आप से चाहता हूँ।
1  क्या मेरा मित्र तहसीलदार व पंचायत के तलाक के बाद विवाह कर सकता है? तलाक में उसकी पत्नी ने उसे इसकी स्वतंत्रता दी है।
2 जैसा कि मैं कह चुका हूं कि उसने पंचायत के समक्ष व तहसिलदार ने तलाक में उसके हस्ताक्षरों को सत्यापित किया है, क्या वो फिर भी अदालत में मेरे मित्र के विरुद्ध मुकदमा कर सकती है?
3 अगर मेरा मित्र विवाह करता है तो क्या उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही हो सकती है? पंचायत के तलाक के बाद उसका नाम मेरे मित्र के परिवार रजिस्टर से काट दिया गया है।
4. अगर वो खर्चे का दावा करती है तो उसे कितना खर्चा देना होगा, वो आज कल प्राईवेट कंपनी में कार्य कर रही है। दोनों बच्चे मेरे मित्र के पास है।

समाधान-
Blind father with children

प के मित्र की पत्नी ने उसे पंचायत और तहसीलदार के समक्ष तलाक दिया है। हिन्दू विधि में तलाक नहीं होता, यह शब्द केवल पुरुष द्वारा मुस्लिम विवाह विच्छेद के लिए है। हिन्दू विधि में पूर्व में तलाक जैसा कोई प्रावधान नहीं होने से बाद में जब हिन्दू विवाह अधिनियम के द्वारा विवाह विच्छेद अस्तित्व में आया तो लोग उसे भी तलाक कहने लगे हैं। हिन्दू विधि में विवाह विच्छेद केवल सक्षम न्यायालय की डिक्री से ही मान्य है।  इस के लिए सक्षम न्यायालय परिवार न्यायालय और उस के न होने पर जिला न्यायालय है। चूंकि जिला न्यायाधीश ही सेशन कोर्ट का भी पीठासीन अधिकारी होता है इस कारण से कई लोग उसे भी सेशन न्यायाधीश कह देते हैं। आप के मित्र को तुरन्त जिला न्यायालय या परिवार न्यायालय यदि वहाँ हो तो विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। मित्र की पत्नी के लिखे हुए पत्र और तहसीलदार या पंचायत के सरपंच और उन व्यक्तियों की गवाही से जिन के उन तलाकनामों पर हस्ताक्षर हैं प्रमाणित किया जा सकता है कि मित्र की पत्नी का दूसरे पुरुष से संबंध है और विवाह विच्छेद हासिल किया जा सकता है। क्रूरता का आधार भी लिया जा सकता है।

क्षम न्यायालय से डिक्री प्राप्त होने से पहले आप के मित्र को विवाह नहीं करना चाहिए। क्यों कि तहसीलदार और पंचायत के समक्ष दिया गया तलाक विवाह विच्छेद नहीं है और कानूनन मित्र की पत्नी अभी भी उस की पत्नी है। यदि ऐसा किया तो उसे एक हथियार मित्र के विरुद्ध मिल जाएगा। मित्र की पत्नी नौकरी करती है इस कारण वह भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है। लेकिन आप के मित्र को उस के विरुद्ध यह साबित करना होगा कि वह नौकरी करती है और उस का वेतन उस के जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त है। यदि किसी तरह निर्वाह भत्ते का आदेश वह प्राप्त कर भी ले तो भी उसे एक तिहाई वेतन से अधिक नहीं मिलेगा क्यों कि उन के दोनों बच्चे आप के मित्र के साथ रहते हैं।

प के मित्र की कानूनी और तथ्यात्मक स्थिति अच्छी है। पत्नी मुकदमे तो कर सकती है लेकिन उस से उसे कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए आप के मित्र को घबराने की जरूरत नहीं है। बस कानूनन विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करनी होगी तथा उस के विरुद्ध कोई मुकदमा या मुकदमे होते हैं तो उन का मुकाबला करना होगा।

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