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पिता की स्वअर्जित संपत्ति में पुत्रियों का हिस्सा भी पुत्रों के बराबर।

समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

नामान्तरण से स्थावर संपत्ति पर स्वामित्व प्राप्त नहीं होता।

समस्या-

अशोक ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारी पुस्तैनी अचल सम्पत्ति गाँव में है, मेरे पिताजी 3 भाई और एक बहन हैं एक ताउजी की 5 साल पहले मृत्यु हो गई, आज से 25 साल पहले 1989 में दादा जी की मृत्यु हो गई थी। दादाजी की मृत्यु के बाद 1991 में गाव की ग्राम सभा में चारो भाई बहन ने मौखिक रूप से सभी की सहमति से हमारा मकान मेरे पिताजी और ताउजी के नाम नामांतरण कर दिया। 20 सालों से उस मकान पर हमारा कब्जा है तथा हमारे द्वारा भवन कर जमा किया जा रहा है। बिजली बिल नल कनेक्सन पिताजी और ताउजी के नाम है। आज 20 साल बाद बुआ मकान में हिस्सा मांग रही है। उसके लिए दीवानी वाद दायर किया है। बुआ भी हमारे साथ ही मकान में रहती है। कृपया उचित सलाह दें।


समाधान-

म यहाँ तीसरा खंबा में कानूनी समाधान प्रदान करते हैं, आप ने उचित सलाह मांगी है।

Deokoo Bai W/O Anna Rao And Ors. vs Keshari Chand S/O Ganeshlal Jain व अन्य अनेक मामलों में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय है कि नामान्तरण से किसी भी हिस्सेदार के अधिकार प्रभावित नहीं होते। आप उक्त मामले में उक्त निर्णय का पैरा 10 देखें। यदि कोई किसी अचल संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ना चाहता है तो उसे अपने हिस्से का हकत्याग विलेख उस व्यक्ति या व्यक्तियों के पक्ष में निष्पादित कर उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराना चाहिए। तभी हकत्याग को सही माना जा सकता है।

बुआ यदि अपने हिस्से की  मांग कर रही है तो उचित ही कर रही है। आप लोगों को बुआ का हिस्सा सहर्ष दे देना चाहिए था, उसे न्यायालय में जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी। अब भी कोई देरी नहीं हुई है। आप लोग एक ही मकान में निवास करते हैं अब भी इस मामले को परिवार में ही आपस में बैठ कर निर्णय कर लेना उचित कदम होगा।

भूमि पर स्वामित्व का रिकार्ड कहाँ तलाश करें?

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

पंकज तिवारी ने झरिया, धनबाद झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे पूर्वजों ने बहुत सारी जमीन अर्जित की थी, मेरे सारे पूर्वजों का देहान्त हो चुका है, पिताजी भी नहीं रहे। मुझे अपनी किसी जमीन के बारे में कुछ जानकारी नहीं है, कोई बताने वाला भी नहीं है। कृपया ऐसा कोई कानूनी जानकारी दें जिस से मैं अपनी सारी जमीन का पता कर सकूँ।

समाधान

मीन और उस से जुड़ी सभी स्थिर संपत्तियाँ स्थावर संपत्ति हैं। यदि किसी संपत्ति के कोई कागजात नहीं हैं तो उस जमीन पर आप का कब्जा ही उस जमीन पर आप के स्वामित्व का प्राथमिक सबूत है। इस तरह जितनी जमीन आज आप के कब्जे में है उस सारी जमीन के स्वामी आप हैं जब तक कि कोई अन्य उस जमीन पर अपना स्वामित्व दस्तावेजों से न्यायालय के समक्ष साबित न कर दे। कोई भी व्यक्ति किसी का कब्जा जबरन नहीं छीन सकता यह गैर कानूनी है। यदि कब्जा छीना जाता है तो कब्जा छीने जाने के 60 दिनों की अवधि में उप जिला दंडनायक को उस की शिकायत की जा सकती है और वह धारा 145 की प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए संपत्ति पर आप को कब्जा वापस दिला सकता है। 60 दिनों में शिकायत न करने पर फिर एसडीएम का क्षेत्राधिकार नहीं रहता। उस के बाद आप को कब्जे के लिए दीवानी वाद करना होगा।

दि आप की भूमि कृषि भूमि है तो उस का सारा रिकार्ड राजस्व विभाग में रहता है। आज कल तो यह इंटरनेट पर उपलब्ध है। आप उस रिकार्ड में इंटरनेट पर खोज सकते हैं कि कौन कौन सी जमीन आप की है और आप के पुरखों के नाम दर्ज है। यदि रिकार्ड में हेराफेरी दिखे तो पुराने राजस्व रिकार्ड देखे जा सकते हैं। आबादी भूमि का रिकार्ड आप को ग्राम पंचायत और नगरपालिका, नगरपरिषद या नगर निगमों में प्राप्त हो सकता है। जहाँ भी कोई जमीन आप को खुद या आप के पुरखों के नाम दर्ज मिले उसी रिकार्ड की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर संग्रह करते जाएँ। इस के साथ जो जमीन आप के कब्जे में है उसे कब्जे में बनाए रखें। हो सकता है जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज की यह तलाश लम्बे समय तक चलती रहे। पर इसे जारी रखना होगा। इसी तरह आप के पास आप की जमीन का रिकार्ड तैयार हो जाएगा।

स्वामित्व के दस्तावेज खो जाएँ तो उपपंजीयक कार्यालय के रिकार्ड से प्रमाणित प्रति प्राप्त की जा सकती है।

Farm & house
समस्या-
वसुन्धरा ने दिल्ली से पूछा है –

मेरे दादा जी ने एक प्लॉट पंजाबी बाग में 20 साल पहले लिया था। जिस की निगरानी के लिए एक वॉचमेन रखा था। मेरे दादा जी अब नहीं रहे। जिस वॉचमेन को मेरे दादा जी ने प्लॉट की रखवाली के लिए रखा था उस ने उस प्लॉट पर क़ब्ज़ा कर लिया है और हमारे पास उस प्लॉट के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं, क्योंकि मेरे दादा जी ने उन्हें कहाँ रखा है इस की को कोई जानकारी हमें नही है। क्या वह प्लॉट हमें किसी तरह वापिस मिल सकता है। वह वॉचमेन वहाँ 20 साल से रह रहा है। हम क्या कर सकते हैं?

समाधान-

किसी भी चल संपत्ति पर स्वामित्व का प्राथमिक सबूत उस पर किसी व्यक्ति का कब्जा है। उस के उपरान्त यदि संपत्ति के स्वामित्व के दस्तावेज हैं तो उन से यह साबित किया जा सकता है कि जिस व्यक्ति के नाम वे दस्तावेज हैं, संपत्ति उस के स्वामित्व की है। आप की समस्या यह है कि आप के पास उस संपत्ति के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं, हैं तो वे मिल नहीं रहे हैं। दूसरी समस्या ये है कि उस पर ऐसे व्यक्ति का कब्जा है जिसे आप के दादा जी ने रखवाली के लिए वहाँ रखा था। अब यदि आप उस से कब्जा लेना चाहें तो आप को न्यायालय में कब्जे का दावा करना पड़ेगा। जहाँ आप को यह साबित करना होगा कि वह संपत्ति आप के स्वामित्व की है और वह व्यक्ति एक चौकीदार की हैसियत से काम करता था। इसे साबित करने के लिए आप के पास इस बात का कोई दस्तावेजी साक्ष्य होना चाहिए कि वह व्यक्ति सिर्फ आप के दादा जी का कर्मचारी था। तब आप ये साबित कर सकते हैं कि एक कर्मचारी होते हुए भी उस ने आप की संपत्ति पर कब्जा कर के अमानत में खयानत की है। यदि आप ये करने में समर्थ हो जाएँ तो आप उस व्यक्ति के विरुद्ध अमानत में खयानत का अपराधिक मुकदमा भी चला सकते हैं।

लेकिन सब से पहले आप को चाहिए कि आप ऐसे दस्तावेज हासिल करने का प्रयत्न करें जिस से आप स्वयं को उस संपत्ति का स्वामी प्रमाणित कर सकें। यदि आपके दादा जी ने उक्त संपत्ति को खरीदा है तो निश्चित रूप से उस संपत्ति का विक्रय पत्र आप के दादा जी के नाम से निष्पादित किया गया होगा और उपपंजीयक के कार्यालय में उस का पंजीयन भी हुआ होगा। आप को खरीदने का वर्ष, माह और तिथि पता हो तो उपपंजीयक के उन दिनों के रिकार्ड को तलाश कर विक्रय पत्र की प्रमाणित प्रति प्राप्त की जा सकती है। यदि आप इस में सफल हो सकें तो आगे कार्यवाही करना संभव हो सकता है। अन्यथा यह संपत्ति तो आप खो ही बैठे हैं।

किराए पर देने के पहले संपत्ति पर स्वत्व प्राप्त करने का प्रयत्न करें।

समस्या-

कोरबा, छत्तीसगढ़ से प्रवीण कुमार ने पूछा है-

गाँव के आबादी क्षेत्र में मेरा एक कब्ज़ा किया हुआ मकान है।  जिस पर मेरा कब्जा १० साल से है जिसका बिजली का कनेक्शन मेरे नाम से है व बिल मेरे नाम से आता है।   मेरा एक परिचित उस पर एक संस्था (स्कूल) खोलने के लिए मकान किराये पर मांग रहा है।  पर मुझे संशय बना हुआ है की संस्था खुलने के बाद उक्त मकान पर कब्जा न हो जाये। क्या ऐसा हो सकता है?  इसके लिए मुझे किस तरह का अनुबंध करना होगा।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएँ, जिस से मुझे कुछ आय प्राप्त हो और मकान का कब्जा भी मेरा हो?

समाधान-

Farm & houseकान आप के कब्जे में 10 वर्ष से है। जो कोई भी व्यक्ति उस का स्वामी है वह आगे दो वर्ष तक और आप से कब्जा प्राप्त करने का दावा न्यायालय में स्वत्व के आधार पर संस्थित कर सकता है। लेकिन कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो जाने के बाद वह दावा नहीं कर सकता। आप यदि संपत्ति को किराए पर देते हैं तो उस में एक परेशानी यह है कि यदि किराएदार कब्जा संपत्ति के असली मालिक को दे देने का कोई लिखित दस्तावेज लिख दे और कुछ दिन बाद पुनः उसी से किरायानामा लिखवा ले। भले ही वह वास्तविक रूप से किसी को कब्जा दे या न दे तो एक बार कब्जा स्वत्वाधिकारी के पास चले जाने पर आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे। आप के मामले में वास्तविक स्वत्वाधिकारी की क्या स्थिति है यह जानकारी आप ने नहीं दी है।

प के गाँव में यदि नगरपालिका नहीं है तो वहाँ संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत आप भवन को लीज पर दे सकते हैं। लेकिन यह लीज 11 माह से अधिक की होने पर उसे पंजीकृत कराना जरूरी होगा। अन्यथा प्रत्येक 11 माह बाद एक लीज एग्रीमेंट समाप्त होने पर नया लीज एग्रीमेंट लिखाना होगा। यह मान कर चलें कि किरायानामा/ लीज डीड लिखवा लेने पर किराएदार हमेशा किराएदार ही रहेगा। वह मकान मालिक नहीं हो सकता।

फिर भी हमारी राय है कि आप कब्जा 12 वर्ष का हो जाने तक भवन किराए पर न दें तो अच्छा है। 12 वर्ष से अधिक का कब्जा हो जाने पर प्रयत्न करें कि ग्राम पंचायत से आप को पट्टा मिल जाए जिसे आप अपने नाम पंजीकृत करवा लें। इस तरह स्वत्व प्राप्त हो जाने के बाद ही किसी व्यक्ति को भवन किराए पर दें। वैसे पंचायत 12 वर्ष के पहले भी मकान की जमीन पर कब्जे के आधार पर पट्टा दे सकती है।

अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार के धन से परिवार के किसी सदस्य के नाम से खरीदी संपत्ति संयुक्त परिवार की हो सकती है।

समस्या-

जोधपुर, राजस्थान से जितेन्द्र खिमानी पूछते हैं-

क्या किसी संपत्ति विशेष की रजिस्ट्री किसी व्यक्ति विशेष के नाम होना ही इस बात का सबूत है कि वह संपत्ति उस व्यक्ति की निजि संपत्ति है, संयुक्त परिवार की नहीं? जब कि उसे खऱीदने के लिए संयुक्त परिवार के धन का उपयोग हुआ है।

समाधान-

benami5 सितम्बर 1988 से बेनामी ट्रांजेक्शन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट प्रभावी किया गया है। इस अधिनियम की धारा-3 में यह उपबंध किया गया है कि कोई भी व्यक्ति बेनामी ट्रांजेक्शन नहीं करेगा, अर्थात अपना पैसे से किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से संपत्ति की खरीद नहीं करेगा। बेनामी संव्यवहार को दंडनीय अपराध बना दिया गया है।  लेकिन कोई व्यक्ति अपनी पत्नी या अविवाहित पुत्री के नाम से संपत्ति खऱीद सकता है, पर इस तरह के मामलों में जब तक अन्यथा प्रमाणित न कर दिया जाए यह माना जाएगा कि वह संपत्ति जिस पत्नी या पुत्री के नाम से खरीदी गयी थी वह उसी के लाभार्थ खरीदी गई थी।

सी अधिनियम की धारा-4 में यह उपबंधित है कि जिस व्यक्ति के नाम संपत्ति खरीदी गई है उस व्यक्ति के विरुद्ध उस में बेनामी अधिकार रखने वाला व्यक्ति अपने अधिकार का दावा नहीं कर सकेगा और न ही किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किसी वाद में कोई व्यक्ति बेनामी अधिकार के अंतर्गत कोई प्रतिरक्षा ले सकेगा। किन्तु इस उपबंध के अपवाद भी हैं।

प्रथम अपवाद है कि यदि कोई अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार है और उस परिवार ने अपनी संयुक्त संपत्ति से परिवार के किसी सदस्य के नाम से संपत्ति खरीदी है जो समस्त परिवार के लाभार्थ खरीदी है तो वह संपत्ति संयुक्त परिवार की संपत्ति मानी जाएगी।

दूसरा अपवाद है कि जिस व्यक्ति के नाम संपत्ति खरीदी गई है वह व्यक्ति कोई ट्रस्टी है या फिर किसी वैश्वासिक हैसियत में है और संपत्ति अन्य किसी व्यक्ति के लाभार्थ खरीदी गई है तो वह उस व्यक्ति की संपत्ति मानी जा सकती है जिस के लाभार्थ वह खरीदी गई थी।

ब आप को स्पष्ट हो गया होगा कि प्रथम दृष्टया संपत्ति के हस्तान्तरण का पंजीकृत विलेख उस संपत्ति के स्वामी होने का प्राथमिक साक्ष्य है। लेकिन ऊपर जो अपवाद बताए गए हैं उन अपवादों के चलते कोई अन्य व्यक्ति उस का स्वामी भी हो सकता है। यदि आप की संदर्भित संपत्ति अविभाजित हिन्दू संयुक्त परिवार के धन से संयुक्त परिवार के लाभार्थ खरीदी गई है तो फिर उस संपत्ति पर इस हेतु दावा किया जा सकता है। इस दावे में साक्ष्य से साबित करना पड़ेगा कि संपत्ति संयुक्त परिवार के धन से संयुक्त परिवार के लाभार्थ खरीदी गई थी।

नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं है।

समस्या-

कुशलगढ, जिला बांसवाडा, राजस्‍थान से संजय सेठ ने पूछा है –

मेरे स्‍वर्गीय दादाजी हमारे समाज के अध्‍यक्ष थे।  22 अप्रेल 1998 को लगभग 6 माह की बीमारी के उपरान्‍त उन का निधन हुआ।  मेरे दादाजी की मृत्‍यु के समय मेरे चाचाजी ने उनसे सादे कागज पर हस्‍ताक्षर करवा लिये थे एवं बाद में उस पर हमारी पैतृक सम्‍पति, समाज का अध्‍यक्ष पद तथा चल अचल सम्‍पति को वंशानुगत आधार पर मेरे चाचाजी के नाम लिख कर वसीयत तैयार कर ली।  जबकि मेरे दादाजी की पैतृक सम्‍पति वर्तमान में नगरपालिका रिकार्ड में मेरे परदादा के नाम पर अंकित है।  मेरे परदादा द्वारा मेरे दादाजी को वसीयत की हो ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।  मेरे परदादा के भी दो पुञ थे जिन में से एक पुञ की काफी  समय पहले ही म़त्‍यु हो चुकी थी, उनकी एकमाञ संतान पुञी जीवित है। इसके अतिरिक्‍त हम जिस समाज के सदस्‍य हैं उस समाज ने भी मेरे दादाजी को वंशानुगत आधार पर अध्‍यक्ष पद एवं चल अचल सम्‍पति वसीयत में देने संब‍ंधी कोई अधिकार नहीं दिया था।  वर्तमान में मेरे चाचाजी द्वारा नगरपालिका, कुशलगढ में उक्‍त फर्जी वसीयत के आधार पर हमारी समस्‍त पैत़क  सम्‍पति अपने नाम कराने हेतु प्रार्थना पञ प्रस्‍तुत किया है।  जिस पर मेरे द्वारा आपत्ति दर्ज करवा दी गई है।  आपत्ति प्रस्तुत कर मेरे द्वारा मेरे दादाजी को वसीयत करने हेतु अधिकृत करने वाले दस्‍तावेजों की छायाप्रति चाही है।  जो आज दिनांक तक मुझे नही मिली है।  क्‍या ऐसी स्थिति में नगरपालिका मेरे चाचाजी के नाम पैतृक एवं सामाजिक चल अचल सम्‍पति, वंशानुगत आधार पर अध्‍यक्ष पद की इबारत लिखी हुई वसीयत को मान सकती है।  मैं एक सामान्‍य परिवार से हूँ, जबकि मेरे चाचाजी काफी धनी व्‍यक्ति हैं,  क्‍यों कि उन्‍होने सामाजिक राशि को अपने व्‍यापार में उपयोग लेकर कई गुना राशि अर्जित की है।  इस के साथ साथ वे राजनैतिक रूप से भी प्रभावी हैं, जो अपने प्रभाव का दुरूपयोग कर मुझे पैतृक सम्‍पति से वंचित कर सकते हैं।  मेरे चाचाजी ने जब हम 5 भाई बहन छोटे छोटे, नाबालिग थे तब वर्ष 1972 में मेरे पिताजी से एक सादे कागज पर भाईयों का भागबंटन करने के नाम से लिखा पढ़ी कर रखी है, जिस पर मेरे दादाजी के कहीं भी हस्‍ताक्षर नहीं हैं।  मेरे दादाजी की वसीयत 3 अप्रेल 1998 को लिखी गई बताई गई है, जब वह अस्‍वस्‍थ थे। ऐसी स्थिति में मुझे सुझाव देने का कष्‍ट करें।

समाधान-

Joint propertyप नगरपालिका द्वारा किए जाने वाले नामान्तरण से भयभीत हैं। वास्तविकता यह है कि नगरपालिका द्वारा किया गया नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं है।  इस संबन्ध में आप सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 24 सितम्बर 2004 को सुमन वर्मा बनाम भारत संघ के मामले में पारित निर्णय से मदद प्राप्त कर सकते हैं। आप ने कहा है कि उक्त संपत्ति नगरपालिका के रिकार्ड में आप के दादा जी के नाम लिखी है। इस से स्पष्ट है कि यह आप के दादा जी की संपत्ति है।  लेकिन संपत्ति किस के द्वारा अर्जित की गई थी यह उस का साक्ष्य नहीं है।  संपत्ति के स्वामित्व का साक्ष्य केवल उस संपत्ति को खरीदने का पंजीकृत विक्रय पत्र हो सकता है। इस कारण संपत्ति के स्वामित्व के सबूत के बतौर आप को संपत्ति के आप के परिवार के जिस पूर्वज के नाम वह हस्तांतरित हुई थी उस के नाम का हस्तांतरण विलेख तलाश करना चाहिए। यदि आप तलाश करेंगे तो उप रजिस्ट्रार के कार्यालय के रिकार्ड में वे मिल सकते हैं और उन की प्रतिलिपियाँ आप को प्राप्त करनी चाहिए। यदि ये दस्तावेज नहीं मिलते हैं तो लंबे समय से किस व्यक्ति का उस संपत्ति पर कब्जा रहा है उसी की साक्ष्य से उस संपत्ति का स्वामित्व तय होगा।  यदि आप एक बार यह तय कर लें कि साक्ष्य के आधार पर यह संपत्ति दादा जी की है तो फिर आप उसी आधार पर उक्त संपत्ति के बँटवारे का वाद सिविल न्यायालय में दाखिल करें। उसी वाद में सिविल न्यायालय से नगर पालिका के विरुद्ध यह अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं कि बँटवारा होने तक नगर पालिका उक्त संपत्ति का नामान्तरकरण दर्ज न करे। यदि उक्त संपत्ति आप के दादाजी द्वारा अर्जित संपत्ति प्रमाणित होती है और उन का देहान्त 17 जून 1956 या उस के बाद हुआ है तो संपत्ति का विभाजन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों में होगा।

वैसे भी नगरपालिका द्वारा आप की आपत्ति के बाद नामान्तरकरण को रोक देना चाहिए। यदि वे नहीं रोकते हैं या फिर आप के द्वारा विभाजन का वाद प्रस्तुत कर स्थगन प्राप्त करने के पूर्व नामान्तरकरण कर दिया जाता है तो उसे दीवानी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। 1972 में सादा कागज पर किए गए भागाबंटन (बँटवारे) का कोई महत्व नहीं है। बँटवारा यदि आपस में किया गया हो तो वह पंजीकृत होना आवश्यक है। जहाँ तक सामाजिक संपत्ति का प्रश्न है वह संपत्ति समाज की है। समाज का नेतृत्व उस संपत्ति के बारे में वाद प्रस्तुत कर सकता है अथवा समाज के एक – दो व्यक्ति मिल कर  लोग संपूर्ण समाज के हित में आदेश 1 नियम 10 दीवानी व्यवहार संहिता के अंतर्गत वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। ये वाद प्रस्तुत हो जाने के बाद आप के चाचा जी के धन और राजनैतिक प्रभाव के आधार पर संपत्ति का स्वामित्व तय नहीं हो सकेगा और केवल साक्ष्य के आधार पर संपत्तियों का बँटवारा और स्वामित्व तय होगा।

भूतकाल में कब्जे के आधार पर कोई अधिकार स्थापित नहीं किया जा सकता।

समस्या-

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश से अशोक कुमार यादव पूछते हैं –

मारा जमीन का एक विवाद है। हमने यह दावा किया है कि इस जमीन पर हमारा 1970 से कब्जा है। यह जमीन बंजर है इस पर हमारे दादा जी 1970 से दुकान करते थे अब ये जमीन मैदान है। दावा सिविल जज जूनियर डिवीजन के न्यायालय में चल रहा है जिस में तीन प्रतिवादी हैं।  कुल मिला कर जमीन 2 बिस्वा है। एक प्रतिवादी ने 1 बिस्वा जमीन का बैनामा था उस की मृत्यु हो गई है जिस ने जमीन खरीदी है वह मकान बनवाना चाहता है।  पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है।  हमारा वकील कहता है कि मामले में कोई दम नहीं है।  क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने अपने प्रश्न में यह नहीं बताया कि जमीन का स्वामित्व किस का है। यदि जमीन का स्वामित्व एक बिस्वा जमीन बेचने वाले व्यक्ति का था तो उस ने जमीन सही बेची है और खऱीदने वाले ने सही खऱीदी है।  स्वयं आप के मुताबिक अभी जमीन मैदान है। अर्थात आप का कब्जा उस पर नहीं है तथा किसी का भी भौतिक कब्जा नहीं है इस कारण कब्जा भी जमीन के वास्तविक मालिक का ही माना जाएगा।

दि आप का उक्त जमीन पर भौतिक कब्जा होता तो आप का मामला मजबूत होता क्यों कि किसी भी व्यक्ति के किसी कब्जे को कानूनी प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है। तब आप उस जमीन पर अपना कब्जा 1970 से साबित कर के प्रतिकूल कब्जे के सिद्धान्त का लाभ ले सकते थे। अभी भी आप न्यायालय में उक्त जमीन पर अपना भौतिक और वास्तविक कब्जा साबित कर दें तो आप अपने पक्ष में निषेधाज्ञा का आदेश प्राप्त कर उस पर जमीन के खरीददार का मकान निर्माण रुकवा सकते हैं।  भूतकाल में रहे आप के कब्जे के आधार पर आप कोई अधिकार स्थापित नहीं कर सकते।  क्यों कि आप का उक्त जमीन पर कोई कब्जा नहीं है इस कारण आप के वकील साहब सही ही कह रहे हैं कि मामले में कोई दम नहीं है।

संविदा के आंशिक पालन में दिया गया अचल संपत्ति का कब्जा वापस नहीं लिया जा सकता।

समस्या-

साजा, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ से बबलू ने पूछा है-

मेरे पिताजी ने अपनी जमीन 12 वर्ष पूर्व बेच दी है लेकिन अभी तक रजिस्ट्री नहीं कराई है। क्या मैं अपनी जमीन को फिर से पा सकता हूँ? इस के लिए मुझे क्या करना होगा।

समाधान-

क्सर ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति अपनी अचल संपत्ति को किसी संविदा के अंतर्गत विक्रय कर देता है।  क्रेता उस संपत्ति का संपूर्ण विक्रय मूल्य अदा कर के संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लेता है।  इस तरह से किसी भी अचल संपत्ति के स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं होता।  अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल विक्रय पत्र का पंजीयन कराने पर ही संभव है। इस तरह रेकॉर्ड में विक्रेता ही संपत्ति का स्वामी चला आता है। इस से विक्रेता के उत्तराधिकारियों में यह धारणा बनती है कि वे अपनी संपत्ति को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।

लेकिन संपत्ति का मूल्य विक्रेता को अदा कर दिए जाने और उस से कब्जा प्राप्त कर लेने से संविदा का आंशिक पालन हो चुका होता है। इस तरह के आंशिक पालन हो जाने पर संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 53-ए के अंतर्गत कब्जा लिए हुए क्रेता के पक्ष में यह उपबंध है कि संपत्ति को हस्तांतरित करने वाला व्यक्ति (विक्रेता) और उस के स्वत्व के अंतर्गत दावा करने वाले व्यक्ति क्रेता से उस संपत्ति का कब्जा प्राप्त नहीं कर सकते।

प के पिता ने जमीन क्रेता को हस्तांतरित कर दी है, कब्जा दे दिया है तो अब आप के पिता या उन के स्वत्व के अंतर्गत दावा करने वाले आप क्रेता को उस जमीन के कब्जे से बेदखल नहीं कर सकते। वैसे भी क्रेता का कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो चुका है तथा अवधि अधिनियम के अनुसार अब आप का कब्जा वापस प्राप्त करने का दावा अवधि बाधित हो चुका है। आप अपनी जमीन वापस प्राप्त नहीं कर सकते।

भूमि को पूर्व में खरीदने का दावा करने वाले व्यक्ति के कार्यवाही करने तक प्रतीक्षा करें

समस्या-

फतेहपुर, उत्तर प्रदेश से अफ़सर सिद्दीकी ने पूछा है –

मेरे पास राजू नाम का व्यक्ति आया और कहने लगा मेरे पास 4 बीघे खेत है।  1982 से 1986 तक 16 बीघे ज़मीन मैं रामू वकील की पत्नी को बेच चुका हूँ, अब मेरे पास 4 बीघे और है। यह बात 2012 की है।  मैं ने खतौनी देखी सब कुछ उसके और मेरे सलाहकारों के हिसाब से ठीक था।  मैं ने जून में फतेहपुर मे बैनामा करवा लिया। बैनामे के 40 दिन के बाद दाखिल खारिज हो कर मेरा नाम ख़तौनी में आ गया।  फिर 5 दिन बाद मैं ने नाप के लिए वकील से हदबंदी के लिए दायरा किया।  मेरे 4 बीघा की नाप हुई।  नाप के वक्त कुछ लोग आए और कहने लगे कि मेरे पास इसी नम्बर के खेत का 4 बीघे का जनवरी 2006 का बैनामा है।  यह कहकर फोटो कॉपी दिया और नाप रोकने के लिए क़ानूनगो को कहा।  पर क़ानूनगो ने कहा कि मैं क़ानून के हिसाब से अफ़सर की खतौनी के हिसाब से हदबंदी कर रहा हूँ।  वहा पर मैं परेशान हुआ कि अब क्या होगा?  मेरे साथ एक बगल के खेत वाले ने उस आदमी से सवाल किया कि आपने अभी तक दाखिल खारिज (नामान्तरण) क्यूँ नहीं कराया?  इस बेचारे को क्या मालूम कि यह खेत पहले बिक चुका है?  मैं ने उसी जगह पर उसके बैनामे की फोटो-कॉपी पढ़ी।  मैं ने पूछा अपने किससे लिया है तो मैं ने पढ़ा कि बेचने वाला पप्पू है।  उसके पास मुख्तारनामा जैसा कि बैनामे में लिखा है कि उसके पास 25-01-1997 में राजू ने पप्पू को मुख़्तार-आम बनाया है।  उस ने कहा कि उस ने पप्पू से 2006 में बैनामा करवाया है और वह आपत्ति लगवा कर मेरा बैनामा खारिज करवा देगा। मैं ने राजू को फोन किया कि यह कैसा धोका है?  इस वक्त राजू की आयु 75 साल की होगी और मेरी 40 साल। राजू कहने लगे मैं ने मुख्तार नियुक्त नहीं किया। मेरे 3 लड़के हैं मुझे पप्पू को मुख्तार नियुक्त करने की क्या जरूरत थी? फिर मैं उसी दिन पप्पू से मिला तो उस ने कहा कि मुझे याद नही है। हाँ मैं ने अभी तक बहुत ज़मीन बेची है।   इस खेत की पॉवर ऑफ अटॉर्नी मुझे रामू वकील के ज़रीए मिली है और काग़ज़ उन्हीं के पास हैं।  फिर उसी वक्त मैं रामू वकील के पास गया तो वकील साहब कहते हैं कि हाँ मैने राजू से अपनी पत्नी के नाम 16 बीघे खेत लिए हैं और राजू ने पॉवर ऑफ अटॉर्नी मेरे सामने पप्पू को दी थी। फिर मैं रात में राजू के घर गया और पूछा तो राजू ने कहा कि मैं ने किसी को भी अपने हिसाब से कोई मुख़्तार नामा नहीं लिखा है।  अगर लिखा होता तो मैं तुमको ज़मीन (खेत) क्यों बेचता? मैं तुम्हारे साथ हूँ जहाँ कहोगे मैं हर अदालत में कहूंगा।  पर इतना ज़रूर है कि मैं उर्दू में साइन बना लेता हूँ, हिन्दी मुझको लिखना पढ़ना नहीं मालूम है।  रामू मेरा वकील है 1972 से 2002 तक 16 बीघे जमीन कई बार में उसकी पत्नी के हाथ बेचे हैं। मेरे उपर एक लोन का मुक़दमा और घर का मुक़दमा के चक्कर में वकील के पास बराबर तारीखों में जाता था।  कई बार वकील साहब किस में साइन के लिए कहते थे तो मैं करता था।  मेरी माली हालत खराब होती थी तो ज़मीन बेच देता था।  मुक़दमा हार ना जाऊँ इसलिए जिस काग़ज़ में साइन को कहते थे करता था।  कभी अदालत के बाहर काग़ज़ दिए या कभी तहसील में तो मैं साइन करता था।  अब रामू वकील ने मुझसे मुख़्तार नामा लिखवा लिया हो तो मैं नहीं बता सकता।  लेकिन अभी भी मैं बहलफ कहता हूँ.  मुझको चाहे जिसके सामने पेश कर दो, मैं ने हूँस हवस में कोई मुख़्तार आम नही किया है।  यह धोका किया गया है।  फिर मैं ने दूसरे दिन राजू को अपने पास बुलाया और कहा चलो मेरे साथ क्यों कि वकिल रामू ने कहा है की मुख़्तार नामा रजिस्टर्ड है मैं आज 25-10-2012 को गया तो रजिस्ट्री ऑफीस में मोआयना में लोगों ने बताया की यह रजिस्टर्ड राजू तुम्ही ने किया होगा। साइन पहचानो राजू ने कहा साइन मेरी ही लग रही है लेकिन मैने मुख़्तार नामा नही लिखा है।  यह सब धोका किया गया है। मैं पप्पू को जानता भी नहीं हूँ।  हाँ, एक बार रामू को बस्ती में देखा है अब मैं क्या करूँ? मेरे खरीदे हुए खेत 4 बीघे जिसका दाखिल खारिज हो चुका है, हदबंदी भी हो गई है, पप्पू ने जिसको 2006 में बैनामा किया है, जिसका दाखिल खारिज नहीं है यह खेत उसको मिलेंगे या मुझको? मेरे साथ अभी भी राजू बयान देने को तैयार है।  मैं अपनी पत्थर-गड़ी करवा सकता हूँ और क़ब्ज़ा ले सकता हूँ और मैं ही असली मालिक हूँ।  मुझको सही रास्ता दिखाएँ।

समाधान-

प के पास भूमि का स्वामी खुद आया और जमीन बेचने का प्रस्ताव किया। आप ने रिकार्ड में देखा कि जमीन उसी के नाम है। यहाँ आप ने केवल एक गलती की कि आप ने केवल राजस्व रिकार्ड ही देखा। यदि आप ने विगत 12 वर्षों का रजिस्ट्रेशन विभाग का रिकार्ड भी देखा होता तो संभवतः आप को यह पता लग जाता कि उस जमीन के विक्रय पत्र का पंजीयन पहले ही हो चुका है।

प ने पूरी एहतियात बरतने के उपरान्त उक्त भूमि को खरीदा है। विक्रय पत्र का निष्पादन आप के पक्ष में हो चुका है।  राजस्व रिकार्ड में उक्त भूमि का नामान्तरण (दाखिल खारिज) आप के नाम से हो चुका है। राजस्व अधिकारियों से आप भूमि का नाप करवा चुके हैं और मौके पर विक्रेता से कब्जा प्राप्त कर चुके हैं। इस तरह आप उक्त भूमि के सद्भाविक क्रेता हैं और भूमि का कब्जा आप के पास है। आप को सभी प्रकार के भय मन से निकाल कर उक्त भूमि को अपने काम में लेना चाहिए।

जो व्यक्ति यह दावा कर रहा है कि भूमि को वह पूर्व में खरीद चुका है तो अब उसे इस भूमि पर दावा करना चाहिए। यही वह कह रहा है। लेकिन उस के दावे में दम नजर नहीं आ रहा है।  यदि उस ने भूमि पहले खरीदी है तो कब्जा क्यों नहीं लिया?  चाहे भूमि मुख्तार के माध्यम से बेची हो पर यदि कब्जा मूल स्वामी का है तो फिर कब्जा भी मूल स्वामी से प्राप्त करेगा।  इतने वर्ष पहले विक्रय पत्र का पंजीयन होने पर भी उस ने राजस्व रिकार्ड में नामान्तरण अपने नाम क्यों नहीं कराया? ये वे प्रश्न हैं जिन से उस व्यक्ति को जूझना पड़ेगा।

भूमि का पूर्व मालिक स्पष्ट रूप से कहता है कि उस ने उक्त जमीन का मुख्तार नियुक्त करने और जमीन बेचने का अधिकार किसी को नहीं दिया तो वह सही है।  उसे यह कहने की भी आवश्यकता नहीं है कि उस पर हस्ताक्षर उस के हस्ताक्षर जैसे लगते हैं।  जब उस ने खुद कोई मुख्तारनामा निष्पादित नहीं किया तो उसे स्पष्ट कहना चाहिए कि वे हस्ताक्षर उस के नहीं हैं, वह मुख्तारनामा फर्जी है।  यदि उस पर दस्तखत उस के हों भी तो भी वे धोखे से कराए गए हैं और उस वक्त तक कथित मुख्तार को वह जानता तक नहीं था।  उस के खुद के तीन बेटे हैं यदि मुख्तार ही नियुक्त करना होता तो उन में से किसी को करता। एक अजनबी को क्यों करता?  आप इसी आशय का एक शपथ पत्र मूल स्वामी से निष्पादित करवा कर उसे दो साक्षियों के समक्ष नोटेरी से सत्यापित करवा कर रखें। यह आप के काम आएगा।

चूंकि भूमि पर स्वामित्व और कब्जा आप का है, इसलिए आप को उक्त भूमि का उपयोग जो भी करना चाहते हैं करना चाहिए।  आप निश्चिंत हो कर पत्थरगड़ी करवाएँ। यदि कोई व्यक्ति उस भूमि पर अपने स्वामित्व का दावा करता है तो उसे न्यायालय जाना चाहिए, तब आप अपने बचाव के अधिकार का उपयोग कर सकते हैं।  जब तक कोई व्यक्ति आप के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही नहीं करता तब तक आप को अपनी ओर से कानूनी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए। यदि वह व्यक्ति आप के कब्जे में दखल देता है या भूमि का आप की इच्छानुसार वैध उपयोग में बाधा डालता है तो भूमि के खातेदार होने के नाते आप न्यायालय में निषेधाज्ञा हेतु दावा प्रस्तुत कर उस के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। यदि वह व्यक्ति आप के विरुद्ध उस के पास के दस्तावेजों के आधार पर कार्यवाही करता है तो उसे कार्यवाही करने दें।  उस के द्वारा ये दस्तावेज या उन की प्रतियाँ न्यायालय मे प्रस्तुत करने पर उन के फर्जी होने के आधार पर आप पुलिस थाने के माध्यम से या सीधे अपराधिक न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें जो आप मूल स्वामी के शपथ पत्र के आधार पर कर सकते हैं।

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