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अविश्वसनीय नियोजक के यहाँ एक दिन भी नौकरी करना ठीक नहीं।

No employmentसमस्या-
आगरा, उत्तर प्रदेश से अजय गुप्ता ने पूछा है –

मैं 8  महिने पहले आगरा की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था, जिस में मेरी सेलरी 11,500/- थी। वहाँ पर काम करते हुए मेरे पास एक दूसरी कंपनी से ऑफर आया, जहाँ मेरी सेलरी 12000/- तय की गयी और कंपनी के चार्टर्ड अकाउंटेंट के द्वारा मुझसे यह बोला गया कि 3 महीने के बाद हम आपकी सेलरी बढ़ा देंगे। मैं ने वह कंपनी जोइन कर ली। लेकिन मेरा वहाँ किसी भी प्रकार का रेजिस्ट्रेशन नही हुआ और न ही मुझे अपायंटमेंट लेटर दिया गया। मुझे दूसरी वाली कंपनी में काम करते 8 महीने हो चुके हैं, मेरा किसी भी प्रकार का इन्क्रिमेंट नहीं हुआ। मैं वहाँ पर बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा हूँ। मैं ने कंपनी के सी.ए. से सेलरी मे इनक्रिमेंट की बात की तो उन्हों ने बोला कि नये नये लड़के 8000 से 10000 रुपये में आ रहे हैं। इसलिए आपका इन्क्रीमेंट नहीं होगा। अब मुझे कंपनी के अकाउंटेंट और चार्टर्ड अकाउंटेंट के द्वारा काम नहीं दिया जा रहा है और डेली कोई ना कोई बहाना बताकर कंपनी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कंपनी के मालिक कंपनी में नहीं बैठते कंपनी को सिर्फ़ कंपनी का चार्टर्ड अकाउंटेंट ही ऑपरेट करता है। मुझे क्या करना चाहिए जिससे मुझे काम भी मिले ओर सेलरी भी बढ़े।  कृपया जल्द ही रास्ता बताएँ।

समाधान –

प ने केवल पाँच सौ रुपए की बढ़ौतरी के लिए पुरानी कंपनी छोड़ कर गलती की है। पाँच सौ रुपए प्रतिमाह की बढ़ोतरी ऐसी नहीं कि जिस के लिए कोई पुरानी नौकरी छोड़ी जाए। तीन माह बाद आप का वेतन बढ़ाने की बात भी मौखिक झाँसा मात्र ही था। आप को कोई नियुक्ति पत्र भी नहीं दिया और न ही इस बात का सबूत आप के लिए छोड़ा है जिस के आधार पर आप यह कह सकें कि आप कब से उस कंपनी में काम कर रहे हैं।

वास्तव में हुआ यह है कि कंपनी को उस समय काम करने वाले नहीं मिल रहे थे। उन्हों ने आप को झाँसा दे कर आप की नौकरी छुड़वा दी और काम निकाल लिया। अब उन्हें नए लड़के कम वेतन पर मिल रहे हैं तो वे आप को अधिक वेतन दे कर क्यों काम पर रखेंगे? आप का सेवा काल भी अभी इस कंपनी में इतना नहीं हुआ है कि उन्हें आप को सेवा से अलग करने के लिए कोई नोटिस और मुआवजा आदि देना पड़े। आप के काम की शर्तें भी तय नहीं हैं।

वे आप को काम पर नहीं ले रहे हैं इस का सीधा अर्थ यही है कि उन्हों ने आप को काम से अलग कर दिया है। ऐसे अविश्वसनीय नियोजक के यहाँ एक दिन भी नौकरी करना बेकार है। बेहतर यही है कि जितने दिन आप ने वहाँ काम किया है उस का वेतन ले कर उस कम्पनी को आप खुद छोड़ दें और कोई बेहतर नौकरी तलाश करें। इस बार नियुक्ति पत्र भी प्राप्त करें और शर्तें भी लिखित में तय कर लें। इस संस्थान से लड़ कर भी आप को कुछ नहीं मिलेगा।

शासकीय कर्मचारी वेतन अदा न करने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत कारण पूछें।

समस्या-

बलरामपुर, छत्तीसगढ़ से उत्तम साहू ने पूछा है-

मैं शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हूँ। पति-पत्नी स्थानांतरण के तहत मेरा स्थानांतरण जिला कोरिया से जिला बलरामपुर के शासकीय प्राथमिक शाला केरा में हुआ है। स्थानांतरण पश्चात मैंने विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्यालय में वेतन प्राप्त करने हेतु पासबुक की छायाप्रति जमा किये 6 माह से ज्यादा समय हो चुके है हर महीने कार्यालय के बाबुओं द्वारा शासकीय प्रक्रिया का हवाला देकर मेरा वेतन अब तक नही बनाया है। इसके लिए मुख्यकार्यपालन अधिकारी को प्रार्थना पत्र भी दिया था।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं।या किस तरह की लड़ाई लड़नी होगी बिना वेतन के मेरी स्थिति बहुत ख़राब है कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं?

समाधान-

सूचना का अधिकारशासकीय प्रक्रिया का केवल बहाना किया जाता है।  किसी स्थानान्तरित व्यक्ति का वेतन प्रदान करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पूर्व पदस्थापना कार्यालय से पद छोड़ने के साथ ही प्रदान कर दिए जाते हैं। आम तौर पर अवकाशों का विवरण तथा अंतिम वेतन प्रमाण पत्र पूर्व कार्यालय से नए कार्यालय को पहुँचना आवश्यक है। यदि वेतन बकाया होने पर नहीं दिया जाता है तो कार्यालय को कारण बताना चाहिए।

मेरी राय में आप को विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी से व्यक्तिगत रूप से मिल कर उन्हें अपनी शिकायत बताएँ। इस के अलावा आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर यह पूछें कि कर्तव्य पर उपस्थित होने व सभी दस्तावेज उपलब्ध करवा देने के बाद भी आप का वेतन समय पर क्यों अदा नहीं किया गया है और अब क्या कारण है कि आप का वेतन अदा नहीं किया जा रहा है। सूचना प्राप्त हो जाने पर यदि कोई आवश्यक दस्तावेज के अभाव में ऐसा हो रहा है तो उसे उपलब्ध करवाएँ।  सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन देने के पश्चात संभवतः आप के वेतन का भुगतान शीघ्र आरंभ हो जाएगा। यदि फिर भी न हो तो धारा-80 सीपीसी के अंतर्गत एक नोटिस वेतन अदा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी को दिलवाएँ। सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन का प्रारूप इसी वेबसाइट पर तलाशने से मिंल जाएगा।

मनरेगा श्रमिक को वेतन न मिलने पर वह वेतन भुगतान अधिनियम में आवेदन प्रस्तुत कर सकता है

समस्या-

राजस्थान से दिनेश पूछते हैः

मैं ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगारा गारन्टी योजना) में 30.06.2012 को नौकरी छोड़ दी है।  लेकिन दिनांक 01.01.2012 से ले कर 30.06.2012 तक का कुल छह माह का वेतन मुझे ग्राम सचिव द्वारा अदा नहीं किया गया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

हात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगारा गारन्टी योजना में काम करने वाले श्रमिकों को जिन्हें समय पर वेतन नहीं मिला है या जिन के वेतन में अवैधानिक रूप से वेतन में कटौती कर ली गई है वेतन भुगतान अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम को वेतन दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह आवेदन वेतन बकाया होने की तिथि से एक वर्ष की अवधि में प्रस्तुत कर देना चाहिए। आप को यह आवेदन 31 जनवरी 2013 के पूर्व प्रस्तुत कर देना चाहिेए क्यों कि आप का जनवरी 2012 का वेतन 1 फरवरी 2012 को बकाया हो चुका था। हालाँकि उचित कारण बताने के बाद ऐसा आवेदन एक वर्ष के उपरान्त भी स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन जब समय है तो इस झंझट को क्यों पाला जाए?

स के लिए राजस्थान के प्रत्येक जिला मुख्यालय पर श्रम विभाग द्वारा वेतन भुगतान प्राधिकारियों के न्यायालय स्थापित किए गए हैं।  तीसरा खंबा के आलेख नियोजक ने वेतन नहीं दिया, मुझे क्या करना चाहिए …?  में वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत आवेदन पत्र का प्रपत्र उक्त पोस्ट में दिया गया है।
प चाहें तो इस पोस्ट से आप आवेदन प्रपत्र प्रिंट कर सकते हैं या डाउनलोड सकते हैं।

भिन्न दिनों वाले महिनों में मासिक वेतन क्या होगा?

समस्या-

गंगानगर, राजस्थान से बलविन्दर ने पूछा है-

मैं एक एनजीओ में कंप्यूटर ऑपरेटर हूँ। कृपया बताएँ कि 30 दिन और 31 दिन के माह में वेतन किस प्रकार प्राप्त होगा?

समाधान-

किसी भी कर्मचारी का वेतन उस के नियुक्ति संविदा (नियुक्ति पत्र) से या फिर संस्थान में प्रभावी सेवा नियमों से निर्धारित होता है।  यदि नियुक्ति पत्र में किसी कर्मचारी को मासिक दर से वेतन देना निर्धारित किया गया है तो उसे मासिक वेतन प्रतिमाह प्राप्त होगा, चाहे वह माह 28, 29, 30 या 31 दिनों का क्यों न हो। यदि माह में किसी दिन की अनुपस्थिति हो तो एक दिन का वेतन काटे जाने की स्थिति में उस माह में जितने दिन होंगे उतने दिनों से मासिक वेतन को विभाजित कर के एक दिन का वेतन काटा जाएगा।

लेकिन यदि नियुक्ति पत्र में वेतन दैनिक वेतन दर से निर्धारित किया गया है तो फिर महिने में जितने दिन काम किया होगा उतने दिन का वेतन कर्मचारी को दिया जाएगा। उदाहरणार्थ यदि किसी कर्मचारी का वेतन 150 रुपए प्रतिदिन है और वह नवम्बर 2012 माह में चार रविवार के दिन अवकाश पर रहा है तो उसे 26 दिनों का वेतन 3900 रुपए प्राप्त होंगे।  यदि कोई कर्मचारी इस माह में दो दिन अनुपस्थित रहा है तो उसे 24 दिनों का वेतन 3600 रुपए प्राप्त होगा।

वेतन की दर मासिक 6000 होने पर चार रविवार साप्ताहिक अवकाश होने पर कर्मचारी को वेतन 6000 रुपए ही प्राप्त होगा।  यदि कर्मचारी दो दिन अनुपस्थित रहता है तो उस का दो दिन का वेतन 6000 रुपए को 30 दिनों से विभाजित कर के एक दिन का वेतन 200 रुपए आएगा और उस के वेतन से 400 रुपए काट लिए जाएंगे, कर्मचारी को केवल 5600 रुपए प्राप्त होंगे।  लेकिन यदि यही कर्मचारी अक्टूबर 2012 के माह में दो दिन अनुपस्थित रहता तो उस के वेतन को 31 से विभाजित कर के एक दिन का वेतन निकाला जाता जो कि 193.55 रुपए आता और उस के वेतन से दो दिनों की अनुपस्थिति के लिए 387.10 रुपए ही काटे जाते।  लेकिन यदि माह 28 दिन का ही होता तो दो दिन की अनुपस्थिति के लिए उस के वेतन से 428.60 रुपए काट लिए जाते।

लिखित आदेश, नियुक्ति पत्र या अनुबंध के बिना कहीं कोई मजदूरी न करें

समस्या-

ताजपुर, जिला-समस्तीपुर, राज्य-बिहार से पंकज कुमार ने पूछा है-

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा मालपुर (कोड 08396) जिला वैशाली, बिहार के शाखा प्रबंधक श्री बैजू पासवान ने मुझे अपनी शाखा में डाटा एंट्री कार्य के लिए प्राइवेट से आठ हजार रुपया मासिक पर नौकरी रखा था। मैं ने 23 अप्रैल 2012 से काम शुरू किया। मुझे एलसीपीसी रजिस्टर दिया गया जिस पर. खाता सं., सीआईएफ नंबर, खातेदार का नाम और तिथि एंट्री  करना पड़ता था।  23 अप्रैल 2012 से कार्य करता रहा।  इसके अलावा मुझसे और भी काम कराया गया।  जैसे पानी पिलाना, गेट खोलना या बंद करना, छायाप्रति करवाकर लाना, फाइल बढ़ाना इत्यादी।  यानि शाखा प्रबंधक महोदय के आदेसनुसार जो भी कार्य दिया जाता मैं वो सभी कार्य करता था।  मैं उनसे जब भी अपना पारिश्रमिक माँगा तो उन्होंने मुझे केवल आश्वासन देते रहे कि तुम काम करते रहो, एजीएम बदल गए हैं इसलिए तुम्हारा भुगतान होने में देरी हो रही है।  तुम्हारा काम अच्छा है इसी तरह काम करते रहो। बहुत जल्द ही तुम मेरे साथ एजीएम के यहाँ चलना वहीं से आदेश लेकर तुम्हारा भुगतान कर दूंगा।  इसी बीच बहुत कहने पर जून में 1,000=00 रुपया तथा अगस्त में 2,000=00 रुपया एडवांस दिए थे। मैं  इनके आश्वासन पर चुपचाप काम करता रहा।  जब अक्टूबर 2012 ख़त्म होने वाला था तो मुझे डाक्टर के यहाँ जाने के लिए पैसे की जरुरत हुई तो मैंने उनसे पैसा माँगा तो उन्होंने मुझे कहा की किसी से क़र्ज़ लेकर काम चलाओ और 09 या 10 नवम्बर 2012 को आना तुम्हारा पूर्ण भुगतान कर दिया जायेगा।  जब मै 09 तारीख को बैंक पर गया तो उन्होंने मुझे कहा की तुम्हारा तो तीन हजार रुपया ही बनता है। मैं स्तब्ध! रह गया। जब मैं उनसे हाथ जोड़कर विनती करने लगा तब उन्होंने गार्ड को बुलाकर मुझे गेट से बाहर करवा दिया।  23 अप्रैल 2012 से अक्टूबर 2012 तक कार्य किया जिसका पारिश्रमिक 48,000=00 (अड़तालीस हजार रुपया) बनता है 3,000 काटकर 45,000=00 (पैतालीस हजार) बकाया निकलता है। लेकिन वो नहीं दे रहे हैं।  मैं बहुत परेशान हूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा है।  साथ ही कोई लिखित उन्होंने मुझे नहीं दिया है। हां काम का रिकॉर्ड जरुर है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने उक्त काम मौखिक आश्वासन पर किया था। आप को प्रतिमाह आठ हजार रुपया देने को ब्रांच मैनेजर ने कहा था आप के पास इस का कोई लिखित सबूत नहीं है। लेकिन यदि किन्हीं व्यक्तियों के सामने यह बात हुई हो तो आप उन व्यक्तियों की साक्ष्य (गवाही) के माध्यम से यह साबित कर सकते हैं कि आप को आठ हजार रुपया प्रतिमाह पर नौकरी पर रखा गया था। इसी तरह आप आप के द्वारा किए गए काम के रिकॉर्ड तथा मौखिक गवाही से यह साबित कर सकते हैं कि आप से अप्रेल से अगस्त तक काम लिया गया है।

म तौर पर शाखा प्रबंधक को किसी व्यक्ति को नौकरी पर रखने का कोई अधिकार नहीं होता है। इस का अधिकार एजीएम या किसी उच्चाधिकारी को ही होता है। हाँ यदि उच्चाधिकारी यह अवश्य कर सकते हैं कि शाखा में कार्याधिक्य होने पर कुछ काम आकस्मिक कर्मचारी लगा कर करवा सकते हैं। जिस के लिए कुछ धनराशि खर्च करने का अधिकार शाखा प्रबंधक को मिल जाता है। ऐसी स्थिति में वे आकस्मिक कर्मचारी नियुक्त कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि आप के शाखा प्रबंधक ने एजीएम के इस आश्वासन पर कि उन्हें आकस्मिक कर्मचारी रखने की अनुमति दे दी जाएगी आप को नियोजित कर काम करवा लिया और बाद में एजीएम ने अनुमति देने से इन्कार कर दिया। ऐसे मामलों में यह साबित करना कि आप को किसी निश्चित वेतन पर नियोजित किया गया था, आप ने किस अवधि में काम किया और आप का कितना वेतन बकाया है यह साबित करना अत्यन्त कठिन होता है।

लेकिन आप ने काम किया है तो उस की मजदूरी आप को मिलनी चाहिए। आप को अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए मजदूरी भुगतान अधिनियम के अंतर्गत तुरंत एक आवेदन प्राधिकारी मजूदूरी (वेतन) भुगतान अधिनियम के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। इस आवेदन में आप को उक्त शाखा के ब्रांच मैनेजर, तत्कालीन ब्रांच मैनेजर बैजू पासवान तथा एजीएम को पक्षकार बनाना चाहिए। मौखिक साक्ष्य से तथा दस्तावेजी साक्ष्य से साबित किया जा सकता है कि आप को आठ हजार रुपए प्रतिमाह पर नियोजित किया गया था। और आपने अप्रेल से अक्टूबर तक काम किया है। यदि दस्तावेजी साक्ष्य़ आप के पास नहीं है तो बैंक द्वारा जवाब प्रस्तुत करने के उपरान्त तथा आप की साक्ष्य प्रस्तुत होने के पहले दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 12 व 14 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर आप अपने पक्ष के प्रासंगिक दस्तावेज बैंक से प्रस्तुतु कराने के लिए न्यायालय से प्रार्थना कर सकते हैं। इस आवेदन को प्रस्तुत करने के लिए आप को किसी स्थानीय वकील या फिर किसी ट्रेड यूनियन अधिकारी की सेवाएँ प्राप्त करनी चाहिए।  भविष्य में आप को ध्यान रखना चाहिए कि बिना किसी लिखित आदेश, नियुक्ति पत्र या अनुबंध के कहीं पर भी कोई मजदूरी न करें। यह भी ध्यान रखें कि किसी प्रपत्र या पंजी में आप की प्रतिदिन की उपस्थिति अंकित की जाती है या नहीं। जहाँ तक हो सके उपस्थिति का सबूत अपने पास रखें।

अधिकतम कितनी राशि का भुगतान नकद किया जा सकता है?

समस्या-

मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है-

धिकतम कितनी राशि का भुगतान नकद किया जा सकता है? यदि कंपनी 20,000 रुपए से अधिक का वेतन नकद भुगतान कर रही हो तो क्या यह आयकर अधिनियम के अन्तर्गत अपराध है?

समाधान –

यकर अधिनियम की धारा 40 ए (3) के द्वारा यह उपबंधित किया गया है कि कोई भी आयकर देने वाला व्यक्ति रेखांकित चैक, डिमांड ड्राफ्ट या अन्य किसी बैंकिंग रीति के अतिरिक्त किसी एक पक्षकार को 20000 रुपए से अधिक की धनराशि का भुगतान करता है या प्राप्त करता है तो उस भुगतान को उसे व्यक्तिगत खर्च या व्यक्तिगत आय माना जाएगा। इस से स्पष्ट है कि 20 हजार रुपए से अधिक के नकद भुगतान या प्राप्ति को कोई अपराध घोषित नहीं किया गया है।  अपितु उसे व्यक्तिगत खर्च या व्यक्तिगत आय मात्र माना गया है।

क्त उपबंध में भी आयकर नियम 6 डीडी में अनेक भुगतानों और प्राप्तियों को छूट प्रदान की गई है। जिन में किसी कर्मचारी को आयकर अधिनियम की धारा 192 के अंतर्गत आयकर की कटौती के उपरान्त किया गया वेतन का नकद भुगतान भी सम्मिलित है। किस किस तरह के भुगतानों और प्राप्तियों को नियम 6 डीडी में छूट प्रदान की गई है उन की जानकारी आप यहाँ क्लिक कर के प्राप्त कर सकते हैं

कानून नहीं है, शंकर और उस के आदिवासी साथी क्या करें?

शंकर राजस्थान के बाराँ जिले के शाहबाद उपखंड का आदिवासी है। जंगलों की उपज पर सरकार का कब्जा हो जाने के बाद से शहरों में मजदूरी के लिए आने वाले आदिवासियों में वह भी शामिल है। उस का थोडा बहुत पढ़-लिख लेना उस की अतिरिक्त योग्यता है जिसने उसे साथी मजदूरों का लीडर बना दिया है। साथ मजदूरी करने वाले आदिवासियों की मजदूरी वही तय करता है। यह काम देने वालों के लिए भी सुविधाजनक है, वे सारे मजदूरों की मजदूरी शंकर को ही दे देते हैं, वह सब मजदूरों को मजदूरी बांट देता है। उसे मजदूरों के काम की देखभाल करने और मजदूरी बांटने के लिए मजदूरी मिलती है। इस तरह वह मुन्शी का काम करता है। मगर मुन्शी तो स्थाई मजदूर होता है जब कि वह पूरी तरह से कैजुअल है इसलिए उसे मुन्शी के स्थान पर जमादार कहा जाता है।

आम तौर पर मजदूरी दिन के हिसाब से तय होनी चाहिए, लेकिन इसमें बहुत अड़चनें हैं। एक तो सरकार ने न्यूनतम मजदूरी निश्चित कर रखी है, दूसरे दिन भर के आठ घण्टों में मजदूर कितना काम करेगा कुछ ठीक नहीं। इसलिए ठेकेदार जहां सम्भव होता है काम की ही रेट तय कर लेते हैं। इतनी मिट्टी खोदने पर इतनी मजदूरी, ऐसे। इस में सब मजदूरों के सामने जमादार मजदूरी बांट देता है।

पिछले दिनों शहर की हर साल टूट जाने वाली सड़क को आठ फुट गहराई तक खोद कर अच्छे से बनाया जा रहा है। शंकर और उसके साथी मजदूरों ने वहां खुदाई का काम किया, जितनी खुदाई उतनी मजदूरी, के हिसाब से। बीच-बीच में जरूरत पड़ी तो दिन मजदूरी के हिसाब से भी मजदूर दिए। पहले तो ठेकेदार मजदूरी देता रहा। जब काम खत्म होने को हुआ तो आखिरी महीने की मजदूरी डकार गया। शंकर और उसके साथी मजदूरों ने बहुत मिन्नतें की, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

शंकर को किसी समझदार ने सुझाया कि उसे किसी वकील की मदद लेना चाहिए। वह वकील तक पंहुच चुका है। वकील ने उसकी सारी बात सुनी। अब वकील पशोपेश में है, शंकर को कैसे न्याय दिलाया जाए?

शंकर के पास दस्तावेजों के नाम पर केवल मजदूरों की हाजरी का रिकार्ड है, जो खुद उसका ही बनाया हुआ है। इस के अलावा एक मुड़ी-तुड़ी डायरी है, इसमें भी उस ने ही हिसाब लिखा हुआ है। अब इन के सहारे तो कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

नई परिस्थितियों ने मजदूरी के इस नए रूप ने जन्म लिया है। जहाँ मजदूरों का एक समूह अपने लीडर के नेतृत्व में काम करने का कॉन्ट्रेक्ट करता है और सबकी मजदूरी उनका मुखिया प्राप्त कर के सब के बीच बांट देता है। मजदूरी वितरण का यह काम ठेकेदार के सामने ही हो जाता है। मजदूरी के इस नए रूप के लिए कोई कानून नहीं है। मौजूदा कानून में तो जमादार को पेटी कॉन्ट्रेक्टर माना जाएगा। यदि वह मुकदमा करे तो उसके पास कॉन्ट्रेक्ट होना चाहिए, जो शंकर के पास नहीं है। यदि कुछ होता भी तो एक लाख की वसूली का दीवानी मुकदमा करने के लिए कम से कम दस हजार रुपए कोर्ट फीस और खर्चे के लिए चाहिए, जो शंकर कहाँ से लाए?

शंकर और उसके साथी मजदूरों के रूप में मुकदमा करना चाहे तो श्रम अदालत सब मजदूरों की मजदूरी के धनराशि जिम्मेदारी शंकर पर ही डाल देगी, अधिक से अधिक यह कहेगी कि वह ठेके की राशि के लिए ठेकेदार पर दीवानी मुकदमा करे।

वकील साहब के पास कोई कानूनी उपाय नहीं है। वे शंकर को लेबर इन्सपेक्टर के पास ले गए। लेबर इन्सपेक्टर ने शंकर के साथ बहुत सहानुभूति दिखाई। उन्हों ने ठेकेदार को टेलीफोन पर खूब लताड़ भी पिलाई। पर साथ ही यह मजबूरी भी कि कानून नहीं है। ठेकेदार पहले तो कहता रहा कि वह सारी मजदूरी का भुगतान कर चुका है, फिर घाटा हो जाने का रोना रोता रहा। अन्त में उस ने शंकर को उस के पास भेजने को कहा, और कहा कि वह मदद करेगा।

 ठेकेदार लाख रुपए की मजदूरी खा कर दस-बीस हजार की मदद करने की कह रहा है। शंकर के पास कानून नहीं है, वह मदद नहीं मजदूरी चाहता है।

 आप पाठकों के पास कोई जवाब हो तो बताऐं। शंकर और उस के आदिवासी साथी क्या करें?

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