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पृथक आवास, हिंसा पर रोक व गुजारे भत्ते के लिए महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में परिवाद दाखिल करें।

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

समानता, स्वतंत्रता और एकान्तता – महिला सशक्तिकरण

गतांक से आगे …

समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता (privacy)

किसी भी सफल न्याय प्रणाली के लिये समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता, (privacy) का अधिकार महत्वपूर्ण है।  यह लैंगिक न्याय के परिपेक्ष में भी सच है।  यह बात न्यायालयों ने कई निर्णयों में कहा है।  आइये इसमें से कुछ को देखें।

समान काम, समान वेतन Equal pay for equal work

उन्मुक्त जी का यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। प्रस्तुत है इस की  आठवीं और अंतिम कड़ी …

समानता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद १४ से १८ में है पर यह लैंगिक न्याय के दायरे में ‘समान काम, समान वेतन’ के दायरे में महत्वपूर्ण है।  ‘समान काम, समान वेतन’ की बात संविधान के अनुच्छेद ३९ (घ) में कही गयी है पर यह हमारे संविधान के भाग चार ‘राज्य की नीति के निदेशक तत्व’ (Directive Principles of the State policy) के अन्दर है।  यह न्यायालय द्वारा क्रियान्वित (Enforce) नहीं किया जा सकते है पर देश को चलाने में इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

महिलायें किसी भी तरह से पुरूषों से कम नहीं है।  यदि वे वही काम करती है जो कि पुरूष करते हैं तो उन्हें पुरूषों के समान वेतन मिलना चाहिये।  यह बात समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act) में भी कही गयी है और इसे (M/s Mackinnon Mackenzie and Co. Ltd. Vs. Audrey D’costa and other) (मैकेन्निन केस) में लागू किया।

इसमें महिला आशुलिपिक को पुरूषों से कम वेतन मिलता था।  कम्पनी के अनुसार केवल महिलायें ही व्यक्तिगत आशुलिपिक (Confidential Stenographer) नियुक्त की जा सकती है और उनका वर्ग पुरूष आशुलिपिक से अलग है। इसलिये उन्हें कम वेतन दिया जाता है।  उच्चतम न्यायालय ने इसे नहीं माना। न्यायालय का कहना था कि,

‘If only women are working as Confidential Stenographers it is because the management wants them there. Women are neither specially qualified to be Confidential Stenographer nor disqualified on account of sex to do the work assigned to the male Stenographers. Even if there is a practice in the establishment to appoint women as Confidential Stenographer such practice can not be relied on to deny them equal remuneration due to them under the Act.’

महिलायें व्यक्तिगत आशुलिपिक बनने के लिये न तो खास तौर से शिक्षित है न ही वे लिंग के कारणों से किसी अन्य कार्य करने के लिये अक्षम हैं। यह प्रबंधतंत्र की नीति है कि वे महिलाओं को व्यक्तिगत आशुलिपिक बनाते हैं।  यदि वे इस तरह की नीति अपनाते हैं तो इस कारण वे महिलाओं को पुरूषों के बराबर वेतन देने को मना नहीं कर सकते हैं।

स्वतंत्रता (liberty)

मौलिक अधिकार, संविधान के भाग तीन में हैं।  यह सारे, कुछ न कुछ, स्वतंत्रता के अलग अलग पहलुवों से संबन्ध रखते हैं पर इस बारे में संविधान के अनुच्छेद १९ तथा २१ महत्वपूर्ण हैं।  अनुच्छेद १९ के द्वारा कुछ स्पष्ट अधिकार दिये गये हैं और जो अनुच्छेद १९ या किसी और मौलिक अधिकार में नहीं हैं वे सब अनुच्छेद २१ में समाहित हैं।  आइये इस सम्बन्ध में C.B.Muthamma IFS Vs. Union of India (मुथन्ना केस) को समझें।

विदेश सेवा के नियमों के अन्दर ,

  • विवाहित महिलाओं का विदेश सेवा में चयन नहीं किया जा सकता था;
  • विदेश सेवा में काम करने वाली अविवाहित महिला को, शादी करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी; और
  • यदि सरकार इस बारे में संतुष्ट है कि उसका परिवार उसके रास्ते में आयेगा तो वह उसकी सेवायें समाप्त कर सकती थी।

यह नियम केवल महिलाओं के लिए था पुरूषों के लिए नहीं। यह नियम, १९७९ में, मुथन्ना केस में अवैध घोषित कर दिया गया। न्यायालय ने कहा कि,

‘Discrimination against women, in traumatic transparency, is found in this rule……if the family and domestic commitments of a woman member of the service are likely to come in the way of efficient discharge of duties, a similar situation may well arise in the case of a male member. In these days…one fails to understand the naked bias against the gentler of the species…

And if the executive….makes [ such] rules….[then] the inference of die..hard allergy to gender parity is inevitable.’

इन नियमों में महिलाओं के खिलाफ भेद-भाव स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है। यदि पारिवारिक एवं घरेलू जिम्मेदारियां महिला कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं तो यह बात पुरूषों पर भी लागू होती है। महिलाओं के प्रति इस समय भी इस तरह का पूर्वाग्रह हमारी समझ के बाहर है।

यदि कार्यपालिका इस तरह के नियम बनाती है उससे महिलाओं के प्रति भेदभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।

एकान्तता (privacy)

हमारे संविधान का कोई भी अनुच्छेद, स्पष्ट रूप से एकान्तता की बात नहीं करता है। अनुच्छेद २१ स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार की बात करता है पर एकान्तता की नहीं। १९९२ में मुकदमे Neera Mathur Vs. Life Insurance Corporation में उच्चत्तम न्यायालय ने एकान्तता के अधिकार को, अनुच्छेद २१ के अन्दर, स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार का हिस्सा माना।

नीरा माथुर, जीवन बीमा निगम में प्रशिक्षु थीं। अपने प्रशिक्षण के दौरान उसने अवकाश लिया पर जब वह वापस आयीं तो उनकी सेवायें समाप्त कर दी गयी। उन्होने दिल्ली उच्च न्यायालय में गुहार लगायी।  निगम ने न्यायालय को बताया कि, उसे नौकरी से इसलिये हटा दिया गया क्योंकि उसने नौकरी पाने के समय झूठा घोषणा पत्र दिया था।

निगम में सेवा प्राप्त करने से पहले एक घोषणा पत्र देना होता है। महिलाओं को इसमें कुछ खास सूचनायें बतानी पड़ती थीं, जैसे कि,

  • रजोधर्म की आखिरी तिथि क्या है?
  • क्या वे गर्भवती हैं?
  • उनका कभी गर्भपात हुआ है कि नहीं, इत्यादि।

अवकाश के दौरान नीरा को बिटिया हुयी थी और जीवन बीमा निगम के अनुसार उसने घोषणा पत्र में जो रजोधर्म की आखिरी तारीख लिखी थी यदि वह सही है तो उसे यह बिटिया नहीं पैदा हो सकती थी।  इसलिये वे इस घोषणा पत्र को झूठा बता रहे थे।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने नीरा माथुर की याचिका खारिज कर दी पर उच्चतम न्यायालय ने उसकी अपील स्वीकार कर, उसे सेवा में वापस कर दिया।  उनके मुताबिक यह सूचना किसी महिला की एकान्तता से सम्बन्धित है।  न्यायालय ने कहा कि,

‘The particulars to be furnished under columns (iii) to (viii) in the declaration are indeed embarrassing if not humiliating.’

इस तरह की सूचना मांगना यदि अपमानजनक नहीं है तो कम से कम शर्मिन्दा करने वाली है।

निष्कर्ष (Conclusion)

हम लोग इस समय २१वीं सदी में पहुंच रहे हैं।  लैंगिक न्याय की दिशा में बहुत कुछ किया जा चुका है पर बहुत कुछ करना बाकी भी है।  क्या भविष्य में महिलाओ को लैंगिक न्याय मिल सकेगा।  इसका जवाब तो भविष्य ही दे सकेगा पर लगभग ३० साल पहले रॉबर्ट केनेडी ने कहा था,

‘Some men see the things as they are and say why, I dream things that never were and say why not?’

केवल कानून के बारे में बात कर लेने से महिला सशक्तिकरण नहीं हो सकता है।  इसके लिये समाजिक सोच में परिवर्तन होना पड़ेगा।  फिर भी, यदि हम लैंगिक न्याय के बारे में सोचते हैं, इसके बारे में सपने देखते हैं – तब, इंशा अल्लाह, आज नहीं तो कल, हम उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे।

-उन्मुक्त

(समाप्त)

बलात्कार परीक्षण: साक्ष्य, प्रक्रिया – महिला सशक्तिकरण

गतांक से आगे …

बलात्कार परीक्षण: साक्ष्य, प्रक्रिया Rape Trials: Evidence, Procedure

विधि आयोग ने अपनी ८४वीं रिपोर्ट पर साक्ष्य अधिनियम को भी बदलने के लिए संस्तुति की थी। इस रिपोर्ट के द्वारा साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६ की उपधारा ४ और नयी धारा 53-A जोड़ने की बात है।  लेकिन सरकार ने रिपोर्ट की इन संस्तुतियों को स्वीकार नहीं किया।  यह संशोधन साक्ष्य अधिनियम में नहीं किया गया है।  इसके बावजूद न्यायालयों ने इसके सिद्धान्त को अपने निर्णयों के द्वारा स्वीकार कर लिया है।  मुख्यत:, यह कार्य उन्होंने, १९९१ और १९९६ में दो अलग-अलग निर्णयों State of Maharashtra Vs. Madhukar Narain Mardikar (मधुकर केस) और १९९६ में State of Punjab Vs. Gurmeet Singh (गुरमीत केस), में किया।

मधुकर केस, सेवा से सम्बन्धित केस था।  एक पुलिस इंस्पेक्टर पर, बलात्कार करने में और उसके सम्बन्ध में गलत कागजात तैयार करने का आरोप था। विभागीय कार्यवाही में, यह आरोप सिद्ध हो जाने के बाद, पुलिस इन्स्पेक्टर को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।  पुलिस इन्स्पेक्टर ने, बम्बई उच्च न्यायालय में गुहार लायी।  उसकी याचिका स्वीकार कर ली गयी और उसे नौकरी पर वापस कर दिया गया।  उच्चतम न्यायालय इस फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया,

‘The High Court observes that since Banubi is an unchaste women it would be extremely unsafe to allow the fortune and career of a government official to be put in jeopardy upon the uncorroborated version of such a woman who makes no secret of her illicit intimacy with another person. She was honest enough to admit the dark side of her life. Even a woman of easy virtue is entitled to privacy and no one can invade her privacy as and when he likes. … Therefore, merely because she is a woman of easy virtue, her evidence cannot be thrown overboard.’

आसान सतीत्व

उन्मुक्त जी का यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। प्रस्तुत है इस की छठी कड़ी …

उच्च न्यायालय ने कहा कि, बनुबी गिरे चरित्र की महिला थी और किसी भी सरकारी अफसर का भविष्य ऎसी महिला के असमर्थित बयान पर तय करना ठीक नहीं होगा जो कि अपने और दूसरे व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धों को स्वीकार करती है।  इस महिला ने अपने जीवन के गिरे हिस्से को स्वीकार कर सच्चाई बरती है।  आसान सतीत्व चरित्र की महिलाओं को भी एकान्तता का अधिकार है।  उनकी एकान्तता के साथ कोई व्यक्ति मनमानी नहीं कर सकता है।  किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है।

गुरमीत सिंह का केस बलात्कार से सम्बन्धित दाण्डिक केस था।  विचारण न्यायालय ने गुरमीत सिंह को छोड़ दिया था लेकिन पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर गुरमीत सिंह को सजा दे दी थी।  उच्चतम न्यायालय ने गुरमीत सिंह की सजा बहाल करते हुये कहा,

‘The courts must deal with such [rape] cases with utmost sensitivity. The courts should examine the broader probabilities of a case and not get swayed by minor contradictions of insignificant discrepancies in the statement of the prosecutrix. … If evidence of the prosecutrix inspires confidence, it must be relied upon without seeking corroboration of her statement in material particulars.’…

Some defence counsels adopt the strategy of continual questioning of the prosecutrix as to the details of the rape. Then victim is required to repeat again and again the details of rape incident not so much a to bring out the facts on record or to test her credibility but to test her story for inconsistencies with a view to attempt to twist the interpretation of events given by her so as to make them appear inconsistent with her allegations. … The court must also ensure that cross-examination is not made a means of harassment or causing humiliation to the victim of crime. The Court, therefore, should not sit as a silent spectator while the victim of crime is being cross-examined by the defence. It must effectively control the recording of evidence in the court.

Wherever possible it may also be worth considering whether it would not be more desirable that the cases of sexual assaults on the females are tried by lady Judges, wherever available, so that the prosecutrix can make her statement with greater ease. …
The courts should, as far as possible, avoid disclosing the name of the prosecutrix in their orders to save further embarrassment to the victim of sex crime.

We … hope that the trial courts would take recourse to the provisions of Sections 327(2) and (3) CrPC liberally. Trial of rape cases in camera should be the rule and an open trial in such cases an exception.’

न्यायालयों को बलात्कार के मामलों पर संवेदनशीलता से विचार करना चाहिए। न्यायालयों को मुकदमे की व्यापक संभावनाओं को देखना चाहिए और अभियोक्त्री के कथन में मामूली विसंगतियों या अमहत्वपूर्ण अंतर के कारण डांवाडोल नहीं होना चाहिए।  यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए।
कई अधिवक्ता, अभियोक्त्री से बलात्कार के संबंध में निरंतर प्रश्न करते रहने की नीति अपनाते हैं।  उससे बलात्कार संबंधित घटना के ब्यौरे को बार-बार दोहराने की अपेक्षा इसलिये नहीं की जाती है, ताकि अभिलेख पर तथ्यों को लाया जा सके अथवा उसकी विश्वसनीयता का परीक्षण किया जा सके बल्कि इसलिये कि घटनाक्रम के निर्वचन को मोड़कर उसमें विसंगति लायी जा सके।  न्यायालय को यह देखना चाहिए कि प्रतिपरीक्षा, आहत व्यक्ति को परेशान करने या जलील करने का तरीका तो नहीं है।  प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये।
यह भी विचारणीय है कि क्या यह अधिक वांछनीय नहीं कि, जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए।  इस तरह आहत महिला आसानी से अपना बयान दे सकती है।
जहां तक संभव हो, न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें जिससे उसे आगे जलील न होना पड़े।
हम यह आशा करते हैं कि विचारण न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३२७ (२) और (३) के अन्दर निहित अधिकारों का उपयोग उदारतापूर्वक करेंगे। सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।

इन दो निर्णयों के द्वारा न्यायालयों ने इन छः सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया हैः

  1. किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है;
  2. यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए;
  3. प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये;
  4. जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए;
  5. न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें;
  6. सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।

-उन्मुक्त

(क्रमशः)

गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा अधिनियम – महिला सशक्तिकरण

गतांक से आगे …

एलिमनी-पेट्रीमनी (Alimony – Patrimony)

शादी शुदा व्यक्तियों के सम्बन्ध विच्छेद होने पर जो पैसा दिया जाता है, उसे Alimony कहते हैं।  अक्सर महिला-पुरूष बिना शादी किये साथ रहते है।  ऎसे लोगों के लिए इंगलैण्ड में एक नया शब्द निकाला गया Common Law Wife, और Common Law Husband। लार्ड डैनिंग, २०वीं शताब्दी के एक जाने माने इंगलैण्ड के न्यायाधीश थे।  उन्होंने १९७९ में डेवीस़ बनाम जॉनसन के मुकदमे में इस प्रकार से समझाया है,

‘No such woman was known to the common law, but means a woman who is living with a man in the same house hold as if she were his wife. She is to be distinguished from a mistress, where relationship may be casual, impermanent and secret.’
अर्थात, कॉमन लॉ के अंतर्गत इस तरह की कोई भी महिला नहीं जानी जाती थी पर इस का अर्थ उस महिला से है जो कि किसी पुरुष के साथ, एक ही घर में, पत्नी की तरह रहती है।  यह रिश्ता रखैल के रिश्ते से अलग है जो कि अक्सर सामयिक, अस्थायी और गुप्त होता है।

अमेरिका के कई राज्यों में इस तरह के रहने को कानूनन नहीं माना गया फिर भी वहां लोग बिना शादी किये रहते हैं।  अक्सर वे लोग भी साथ रहते हैं जो कि आपस में शादी नहीं कर सकते। उदाहरणार्थ,

  • एक पति या पत्नी रहते दूसरे के साथ शादी करना ; या
  • वह महिला और पुरूष जो करीबी रिश्तेदार होने के कारण कानूनन शादी नहीं कर सकते; या
  • दो एक ही लिंग के लोग।  एक ही लिंग के लोगों के बीच की शादी या साथ रहने की मान्यता, केवल कुछ ही देशों में है।  हमारे देश में नहीं है।

ऐसे व्यक्तियों के लिए Partners शब्द का प्रयोग किया जाने लगा।  यह लोग भी कभी-कभी अलग हो जाते हैं तब सवाल उठता है कि इसमें से किसी एक को भरण-पोषण भत्ता मिलना चाहिए या नहीं।  इन Partners के बीच में दिया गया पैसा या भरण-पोषण भत्ते को patrimony कहा जाता है।

अपने देश में Patrimony – घरेलू हिंसा अधिनियम

उन्मुक्त जी का यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। प्रस्तुत है इस की चौथी कड़ी …

हमारे देश में दो एक ही लिंग के व्यक्ति साथ नहीं रह सकते हैं और न उन्हें कोई कानूनन मान्यता या भरण-पोषण भत्ता दिया जा सकता है।

यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या किसी महिला को, उस पुरुष से, भरण-पोषण भत्ता मिल सकता है जिसके साथ वह पत्नी की तरह रह रही हो जब,

  • उन्होने शादी न की हो; या
  • वे शादी नहीं कर सकते हों।

पत्नी का अर्थ केवल कानूनी पत्नी ही होता है। इसलिए न्यायालयों ने इस तरह की महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता दिलवाने से मना कर दिया।  अब यह सब बदल गया है।

संसद ने, सीडॉ के प्रति हमारी बाध्यता को मद्देनजर रखते हुए, Protection of Women from Domestic violence Act 2005 (Domestic Violence Act) महिलाओं की घरेलू हिंसा सुरक्षा अधिनियम २००५ (घरेलू हिंसा अधिनियम) पारित किया है।  यह १७-१०-२००६ से लागू किया गया।  यह अधिनियम आमूल-चूल परिवर्तन करता है। बहुत से लोग इस अधिनियम को अच्छा नहीं ठहराते है, उनका कथन है कि यह अधिनियम परिवार में और कलह पैदा करेगा।  सामान्यतः कानून अपने आप में खराब नहीं होता है पर खराबी, उसके पालन करने वालों के, गलत प्रयोग से होती है।  यही बात इस अधिनियम के साथ भी है।  यदि इसका प्रयोग ठीक प्रकार से किया जाय तो मैं नहीं समझता कि यह कोई कलह का कारण हो सकता है।

इसका सबसे पहला महत्वपूर्ण कदम यह है कि यह हर धर्म के लोगों में एक तरह से लागू होता है, यानि कि यह समान सिविल संहिता स्थापित करने में पहला बड़ा कदम है।

इस अधिनियम में घरेलू हिंसा को परिभाषित किया गया है।  यह परिभाषा बहुत व्यापक है।  इसमें हर तरह की हिंसा आती हैः मानसिक, या शारीरिक, या दहेज सम्बन्धित प्रताड़ना, या कामुकता सम्बन्धी आरोप।  यदि कोई महिला जो कि घरेलू सम्बन्ध में किसी पुरूष के साथ रह रही हो और घरेलू हिंसा से प्रताड़ित की जा रही है तो वह इस अधिनियम के अन्दर उपचार पा सकती है पर घरेलू संबन्ध का क्या अर्थ है।

इस अधिनियम में घरेलू सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया है।  इसके मुताबिक कोई महिला किसी पुरूष के साथ घरेलू सम्बन्ध में तब रह रही होती जब वे एक ही घर में साथ रह रहे हों या रह चुके हों और उनके बीच का रिश्ता:

  • खून का हो; या
  • शादी का हो; या
  • गोद लेने के कारण हो; या
  • वह पति-पत्नी की तरह हो; या
  • संयुक्त परिवार की तरह का हो।

इस अधिनियम में जिस तरह से घरेलू सम्बन्धों को परिभाषित किया गया है, उसके कारण यह उन महिलाओं को भी सुरक्षा प्रदान करता है जो,

  • किसी पुरूष के साथ बिना शादी किये पत्नी की तरह रह रही हैं अथवा थीं; या
  • ऐसे पुरुष के साथ पत्नी के तरह रह रही हैं अथवा थीं जिसके साथ उनकी शादी नहीं हो सकती है।

इस अधिनियम के अंतर्गत महिलायें, मजिस्ट्रेट के समक्ष, मकान में रहने के लिए, अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए, गुजारे के लिए आवेदन पत्र दे सकती हैं और यदि इस अधिनियम के अंतर्गत यदि किसी भी न्यायालय में कोई भी पारिवारिक विवाद चल रहा है तो वह न्यायालय भी इस बारे में आज्ञा दे सकता है।

-उन्मुक्त

(क्रमशः)

स्वीय विधि और महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता – महिला सशक्तिकरण

गतांक से आगे …

विधी (Personal Law)

लिंग के आधार पर सबसे ज्यादा भेद-भाव Personal Law में दिखाई देता है और इस भेदभाव को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है कि समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code) बनाया जाय।

उन्मुक्त जी का यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। प्रस्तुत है इस की तीसरी कड़ी …

हमारे संविधान का भाग चार का शीर्षक है – ‘राज्य की नीति के निदेशक तत्व’ (Directive Principles of the State policy)। इसके अंतर्गत रखे गये सिद्धान्त, न्यायालय द्वारा क्रियान्वित (Enforce) नहीं किये जा सकते हैं पर देश को चलाने में उन पर ध्यान रखना आवश्यक है।  अनुच्छेद ४४ इसी भाग में है।  यह अनुच्छेद कहता है कि हमारे देश में समान सिविल संहिता बनायी जाय पर इस पर पूरी तरह से अमल नहीं हो रहा है।

हमारे संविधान के भाग तीन का शीर्षक है – मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)। इनका क्रियान्वन (enforcement) न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। इस समय न्यायपालिका के द्वारा मौलिक अधिकारों और राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में संयोजन हो रहा है।  न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की व्याख्या करते हुये राज्य की नीति के निदेशक तत्वों की सहायता ले रहे हैं।  बहुत सारे लोग न्यायालयों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह देश में समान सिविल संहिता के लिये बड़ा कदम उठाए।  उनके मुताबिक:

  • संविधान के अनुच्छेद १३ के अंतर्गत स्वीय विधि (Personal Law) और किसी दूसरे कानून में कोई अन्तर नहीं है।  यदि स्वीय विधि (Personal Law) में भेदभाव है तो न्यायालय उसे अनुच्छेद १३ शून्य घोषित कर सकता है।
  • स्वीय विधि, संविधान के अनुच्छेद १४ तथा १५ का उल्लंघन करते हैं और उन्हें निष्प्रभावी घोषित किया जाना चाहिये।
  • संसद, राजनैतिक कारणों से इस बारे में कोई कानून नहीं बना पा रही है इसलिये न्यायालय को आगे आना चाहिये।

न्यायपालिका ने इस दिशा में एक और कदम Sarla Mudgal Vs. Union of India वा Madhu Kishwar Vs. State of Bihar में उठाया था पर इस कदम को Ahmedabad Women Action Group (AWAG) Vs. Union of India में यह कहते हुये वापस ले लिया कि,

‘ यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है जिससे सामान्यत: न्यायालय का कोई संबंध नही रहता है।  इसका हल कहीं और है न कि न्यायालय के दरवाजे खटखटाने पर।’

न्यायपालिका आगे क्या करेगी?  यह तो भविष्य ही बतायेगा पर शायद पहल उन महिलाओं को करनी पड़ेगी जो इस तरह के भेदभाव वाले स्वीय विधि से प्रभावित होती हैं।

यदि न्यायालयों के निर्णयों को आप देंखे तो पायेंगे कि न्यायपालिका किसी भी स्वीय विधि (Personal Law) को निष्प्रभावी घोषित करने में हिचकिचाती है लेकिन उस कानून की व्याख्या करते समय वह महिलाओं के पक्ष में रहता है।  यही कारण है कि अपवाद को छोड़कर न्यायालयों ने कानून की व्याख्या करते समय, उसे महिलाओं के पक्ष में परिभाषित किया।  इसके लिये चाहे उन्हें कानून के स्वाभाविक अर्थ से हटना पड़े।  यह बात सबसे स्पष्ट रूप से Danial Latif Vs Union of India के फैसले से पता चलती है।  इस मुकदमे में मुस्लिम स्त्री (विवाह-विच्छेद पर अधिकारों का समक्षण) अधिनियम १९८६ {Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act 1986} की वैधता को चुनौती दी गयी थी।

महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता (maintenance)

अधिकतर धर्मों के लिये स्वीय कानून (Personal Law) अलग-अलग है।  अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के भरण-पोषण भत्ता की अधिकारों की सीमा भी अलग-अलग है पर यह अलगाव अब टूट रहा है।

शाहबानो

Indian Divorce Act ईसाइयों पर लागू होता है।  इसकी धारा ३६ में यह कहा गया है कि मुकदमे के दौरान पत्नी को, पति की आय का १/५ भाग भरण-पोषण भत्ता दिया जाय।  पहले, अक्सर न्यायालय न केवल मुकदमा चलने के दौरान, बल्कि समाप्त होने के बाद भी १/५ भाग भरण-पोषण के लिए पत्नी को दिया करते हैं।  यह सीमा न केवल ईसाईयों पर बल्कि सब धर्मों पर लगती थी।  इस समय यह समीकरण बदल गया है और कम से कम पति की आय का १/३ भाग पत्नी को भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है।  यदि पत्नी के साथ बच्चे भी रह रहे हों तो उसे और अधिक भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है।

पत्नी को भरण-पोषण भत्ता प्राप्त करने के दफा फौजदारी की धारा १२५ में भी प्रावधान है।  इस धारा की सबसे अच्छी बात यह थी कि यह हर धर्म पर बराबर तरह से लागू होती थी।  वर्ष १९८५ में शाहबानो का केस आया।  इसमें उसके वकील पति ने शाहबानो को तलाक दे दिया।  उसे मेहर देकर, केवल इद्दत के दौरान ही भरण-पोषण भत्ता दिया पर आगे नहीं दिया।  शाहबानो ने फौजदारी की धारा १२५ के अंतर्गत एक आवेदन पत्र दिया।  १९८५ में उच्चतम न्यायालय द्वारा Mohammad Ahmad Kher Vs. Shahbano Begum में यह फैसला दिया कि यदि मुसलमान पत्नी, अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पा रही है तो मुसलमान पति को इद्दत के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना होगा।

शाहबानो के फैसले का मुसलमानों के विरोध किया।  इस पर संसद ने एक नया अधिनियम मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद संरक्षण अधिनियम Muslim Women (Protection of Rights on Divorce Divorce Act) 1986 बनाया।  इसको पढ़ने से लगता है कि यदि मुसलमान पति, अपनी पत्नी को मेहर दे देता है तो इद्दत की अवधि के बाद भरण-पोषण भत्ता देने का दायित्व नहीं होगा।  यह कानून मुसलमान महिलाओं के अधिकार को पीछे ले जाता था।  इस अधिनियम की वैधता को एक लोकहित जन याचिका के द्वारा चुनौती दी गयी।  वर्ष २००१ में Dannial Latif Vs. Union of India के मुकदमें में उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम को अवैध घोषित करने से तो मना करा दिया पर इस अधिनियम के स्वाभाविक अर्थ को नहीं माना।  सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अधिनियम के आने के बावजूद भी यदि पत्नी अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पाती है तो मुसलमान पति को इद्दत की अवधि के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना पड़ेगा। अर्थात इस अधिनियम को शून्य तो नहीं कहा पर इसे निष्प्रभावी कर दिया। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के सम्बन्ध में अच्छे फैसलों में से एक है।

-उन्मुक्त

(क्रमशः)

व्यक्ति शब्द में महिला कब सम्मिलित हुई – महिला सशक्तिकरण

गतांक से आगे …

संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज

हमारे संविधान का अनुच्छेद १५(१), लिंग के आधार पर भेदभाव करना प्रतिबन्धित करता है पर अनुच्छेद १५(२) महिलाओं और बच्चों के लिये अलग नियम बनाने की अनुमति देता है। यही कारण है कि महिलाओं और बच्चों को हमेशा वरीयता दी जा सकती है।

उन्मुक्त जी का यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है। प्रस्तुत है इस की दूसरी कड़ी …

संविधान में ७३वें और ७४वें संशोधन के द्वारा स्थानीय निकायों को स्वायत्तशासी मान्यता दी गयी । इसमें यह भी बताया गया कि इन निकायों का किस किस प्रकार से गठन किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद २४३-डी और २४३-टी के अंतर्गत, इन निकायों के सदस्यों एवं उनके प्रमुखों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित की गयीं हैं। यह सच है कि इस समय इसमें चुनी महिलाओं का काम, अक्सर उनके पति ही करते हैं पर शायद एक दशक बाद यह दृश्य बदल जाय।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। हमारे देश में इसका प्रयोग उस तरह से नही किया जा रहा है जिस तरह से किया जाना चाहिये। अभी उपभोक्ताओं में और जागरूकता चाहिये। इसके अन्दर हर जिले में उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच (District Consumer Disputes Redressal Forum) का गठन किया गया है।  इसमें कम से कम एक महिला सदस्य होना अनिवार्य है {(धारा १०(१)(सी), १६(१)(बी) और २०(१)(बी)}।

परिवार न्यायालय अधिनियम के अन्दर परिवार न्यायालय का गठन किया गया है।  पारिवारिक विवाद के मुकदमें इसी न्यायालय के अन्दर चलते हैं।  इस अधिनियम की धारा ४(४)(बी) के अंतर्गत, न्यायालय में न्यायगण की नियुक्ति करते समय, महिलाओं को वरीयता दी गयी है।

अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Convention of Elimination of Discrimination Against Women (CEDAW) (सीडॉ) है। सन १९७९ में, संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पुष्टि की। हमने भी इसके अनुच्छेद ५(क), १६(१), १६(२), और २९ को छोड़, बाकी सारे अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया है।  संविधान के अनुच्छेद ५१ के अंतर्गत न्यायालय अपना फैसला देते समय या  विधायिका कानून बनाते समय, अंतर्राष्ट्रीय संधि (Treaty) का सहारा ले सकते हैं।  इस लेख में आगे कुछ उन फैसलों और कानूनों की चर्चा रहेगी जिसमें सीडॉ का सहारा लिया गया है।

व्यक्ति शब्द पर ६० साल का विवाद

भूमिका
हमारा समाज पुरुष प्रधान है। इसके मानक पुरुषों के अनुरूप रहते हैं। तटस्थ मानकों की भी व्याख्या, पुरुषों के अनुकूल हो जाती है। कानून में हमेशा माना जाता है कि जब तक कोई खास बात न हो तब तक पुलिंग में, स्त्री लिंग सम्मिलित माना जायेगा। कानून में कभी कभी पुलिंग, पर अधिकतर तटस्थ शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जैसे कि ‘व्यक्ति’। अक्सर कानून कहता है कि, यदि किसी ‘व्यक्ति’ (person),

  • की उम्र ….. साल है तो वह वोट दे सकता है,
  • ने —- साल ट्रेनिंग ले रखी है तो वह वकील बन सकता है,
  • ने विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की है तो वह उसके विद्या परिषद (Academic council) का सदस्य बन सकता है,
  • को गवर्नर जनरल, सेनेट का सदस्य नामांकित कर सकता है।

ऐसे कानून पर अमल करते समय, अक्सर यह सवाल उठा करता था कि इसमें ‘व्यक्ति’ शब्द की क्या व्याख्या है।  इसके अन्दर हमेशा पुरूषों को ही व्यक्ति माना गया, महिलाओं को नहीं। यह भी अजीब बात है। भाषा, प्रकृति तो महिलाओं को व्यक्ति मानती है पर कानून नहीं।  महिलाओं को, अपने आपको, कानून में व्यक्ति मनवाने के लिए ६० साल की लड़ाई लड़नी पड़ी और यह लड़ाई शुरू हुई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से।

व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय

इस बारे में सबसे पहला प्रकाशित निर्णय Chorlton Vs. Lings (१८६९) का है । इस केस में कानून में पुरूष शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय और इस समय भी, इंगलैंड में यह नियम था कि पुलिंग में, स्त्री लिंग भी शामिल है। इसके बावजूद यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियां को वोट देने का अधिकार नहीं है। इंगलैण्ड के न्यायालयों में इसी तरह के फैसले होते रहे जिसमें न केवल पुरूष बल्कि व्यक्ति शब्द की व्याख्या करते समय, महिलाओं को इसमें सम्मिलित नहीं माना गया। जहां व्यक्ति शब्द का भी प्रयोग किया गया था वहां भी महिलाओं को व्यक्ति में शामिल नहीं माना गया। इन मुकदमों में Bressford Hope Vs. Lady Sandhurst (1889), Ball Vs. Incorp, society of Law Agents (1901) उल्लेखनीय है।  1906 में इंगलैण्ड की सबसे बड़ी अदालत हाउस आफ लॉर्डस ने Nairn Vs. Scottish University में यही मत दिया।  यही विचार वहीं की अपीली न्यायालय ने Benn Vs. Law Society (१९१४) में व्यक्त किये।

इंगलैंड में यही क्रम जारी रहा।  इन न्यायालयों में लड़ाई के अतिरिक्त वहां समाज में भी यह मांग उठी कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिले।  भारत के पूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन भी महिलाओं को वोट का अधिकार देने के विरोधी खेमी में थे।  उनका तो यहां तक कहना था कि यदि भारत के लोगों को पता चलेगा कि इंगलैण्ड की सरकार महिलाओं के वोट पर बनी है तो भारतवासी उस सरकार पर वह विश्वास करना छोड़ देगें।  इंगलैंण्ड में महिलायें वोट देने के अधिकार से १९१८ तक वंचित रहीं।  उन्हें इसी साल कानून के द्वारा वोट देने का अधिकार मिला।  इंगलैण्ड में स्त्रियों के साथ बाकी भेदभाव लैंगिक अयोग्यता को हटाने के लिए १९१९ में बने अधिनियम से हटा।

व्यक्ति शब्द पर अमेरिका में कुछ निर्णय

अमेरिका तथा अन्य देशों में व्यक्ति शब्द की व्याख्या का इतिहास कुछ अलग नहीं था।  अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने Bradwell Vs. Illinois (१८७३) में व्यवस्था दी है कि विवाहित महिलायें व्यक्ति की श्रेणी में नहीं हैं और वकालत नहीं कर सकतीं।  इसके दो वर्ष बाद ही Minor Vs. Happier Sett के केस में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने यह तो माना कि महिलाएं नागरिक हैं पर यह भी कहा कि वे विशेष श्रेणी की नागरिक हैं और उन्हें मत डालने का अधिकार नहीं हैं। अमेरिका में २१ वर्ष से ऊपर की महिलाओं को मत देने की अनुमति अमेरिकी संविधान के १९वें संशोधन (१९२०) के द्वारा ही मिल पायी।

व्यक्ति शब्द पर दक्षिण अफ्रीका में कुछ निर्णय

इस विवाद के परिपेक्ष में, दक्षिण अफ्रीका का जिक्र करना जरूरी है। यहां पर इस तरह के पहले मुकदमे Schle Vs. Incoroporated Law Society (1909), में महिलाओं को व्यक्ति शब्द में नहीं शामिल किया गया और उन्हें वकील बनने का हकदार नहीं माना गया।  पर केपटाउन की न्यायालय ने १९१२ में माना कि महिलाएं ‘व्यक्ति’ शब्द में शामिल हैं और वकील बनने की हकदार हैं।  कहा जाता है कि इस तरह का यह एक पहला फैसला था।  लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चला। यह निर्णय अपीलीय न्यायालय द्वारा Incorporated Law Society Vs. Wookey (1912) में रद्द कर दिया गया।  इस अपीलीय न्यायालय के फैसले का आधार यही था कि महिलाएं व्यक्ति शब्द की व्याख्या में नहीं आती हैं।

व्यक्ति शब्द पर विवाद का अन्त

इस विवाद का अन्त कनाडा के एक मुकदमे Edwards Vs. Attorney General में हुआ।  कनाडा के गर्वनर जनरल को सेनेट में किसी व्यक्ति को नामांकित करने का अधिकार था।  सवाल उठा कि क्या वे किसी महिला को नामांकित कर सकते हैं।  कैनाडा के उच्चतम न्यायालय ने सर्व सम्मति से निर्णय लिया कि महिलायें व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं।  इसलिये वे नामित नहीं हो सकती हैं।  इस फैसले के खिलाफ अपील में, प्रिवी कांऊसिल ने स्पष्ट किया है कि, ‘व्यक्ति शब्द में स्त्री-पुरूष दोनों हो सकते हैं और यदि कोई कहता है कि व्यक्ति शब्द में स्त्रियों को क्यों शामिल किया जाय तो जवाब है कि “क्यों नहीं”?’  लेकिन यह वर्ष १९२९ में हुआ।  आइये देखें कि अपने देश में क्या हुआ।

व्यक्ति शब्द पर भारत में कुछ निर्णय: कलकत्ता और पटना उच्च न्यायालय

अपने देश में भी ‘व्यक्ति’ शब्द की व्याख्या करने वाले मुकदमे हुए हैं।  पहले वकील नामांकित करने का काम उच्च न्यायालय करता था।  अब यह काम बार कौंसिल करती है। वकील नामांकित करने के लिए लीगल प्रैक्टिशनर अधिनियम हुआ करता था इसमें ‘व्यक्ति’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था।  महिलाओं ने इसी अधिनियम के अन्दर वकील बनने के लिए कलकत्ता एवं पटना उच्च न्यायालयों में आवेदन पत्र दिया।  कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्यायमूर्ति की पूर्ण पीठ ने १९१६ में {In re Reging Guha (ILR 44 Calcutta 290= 35 IC 925)} तथा पटना उच्च न्यायालय की तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ ने १९२१ में {In re Sudhansu Bala Mazra (A.I.R. 1922 Patna 269) } ने निर्णय दिया कि महिलाएं व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं और उनके आवेदन को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद यह प्रश्न नहीं उठा क्योंकि १९२३ में The Legal Practitioners (Women) Act के द्वारा महिलाओं के खिलाफ इस भेदभाव को दूर कर दिया गया।   पर क्या किसी उच्च न्यायालय ने महिलाओं के पुराने कानून में व्यक्ति होना माना। जी हां-वह है इलाहाबाद उच्च न्यायालय।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय क्रॉर्नीलिआ सोरबजी (Cornelia Sorabjee)

क्रॉर्नीलिआ सोरबजी, एक पारसी महिला थीं।  उनका भाई बैरिस्टर था और वह इलाहाबाद वकालत करने आया।  वह उसी के साथ उसके घर का रख-रखाव करने आयीं।  उन्हें वकालत का पेशा अच्छा लगा और उन्होंने वकालत करने की ठानी। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने अपना आवेदन पत्र वकील बनने के लिये दिया जो पहले खारिज कर दिया गया पर उनका १ अगस्त १९२१ को वकील की तरह नामित करने के लिये दिया गया आवेदन पत्र, ९ अगस्त १९२१ में स्वीकार हुआ।  यह नामांकन उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक में हुआ था इसलिए यह प्रकाशित नहीं है पर पटना उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये फैसले में इसका तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ कुछ इस तरह से उल्लिखित है।

‘A recent instance has been brought to our notice where a lady (Miss Sorabjee) has been enrolled as a vakil of the Allahabad High Court. This was done by a decision of the English meeting of the Court consisting of the Chief Justice and the Judged present in Allahabad, under R.15 of Chap.XV of the Allahabad High Court Rules. In matters of practice, however, we generally follow the tradition of the Calcutta High Court and we do not think that we can deviate from the decision of that Court passed on the 29th of August 1916 in Regina Guha’s case only a few months after the creation of our High Court.

No doubt, the recent admission of Miss Sorabjee in the Allahabad High Court might create some anomaly, inasmuch as ladies enrolled as vakils in the Allahabad High Court may claim to practise in occasional cases in the Courts subordinate to this Court under Sec.4 of the Legal Practitioners Act, although no lady will be permitted to be enrolled in our own High Court. This again is a very good ground for changing the present law.’

क्रॉर्नीलिआ सोरबजी ‘व्यक्ति’ शब्द के अन्दर नामांकित होने वाली भारत की ही पहली महिला नहीं, बल्कि व्यक्ति खण्ड के अधीन दुनिया में कहीं भी नामांकित होने वाली पहली महिला थीं।  दक्षिण अफ्रीका का मात्र एक पहला मुकदमा ज्यादा दिन तक नहीं चला।  वह उसी वर्ष निरस्त कर दिया गया।   क्रोनीलिआ से पहले भी कई महिलायें नामांकित हुई हैं लेकिन वे विशेष कानून की वजह से हुआ था जिसमें महिलाओं को वकील बनने का अलग से अधिकार दिया गया था।

सुश्री सुपर्णा गुप्तू (Suparna Gooptu) ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी की जीवनी Cornelia Sorabjee – India’s Pioneer Woman lawyer नाम से लिखी है इसे Oxford University Press ने प्रकाशित किया है।  इसमें वे कहती हैं कि क्रॉर्नीलिआ सोरबजी समाज सेविका तो थी पर वे अंग्रेजी हूकूमत की समर्थक भी थी।  इस पुस्तक में लिखा है कि वे ३० अगस्त को १९२१ को नामांकित की गयी थीं तथा यहां लिखा है कि वे २४ अगस्त को नामांकित की गयी थीं पर शायद दोनों बात सही नहीं हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक जिसमें उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया गया वह ९ अगस्त १९२१ को हुई थी पर उच्च न्यायालय ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी को इस बात के लिये पत्र दिनांक ३० अगस्त १९२१ को भेजा था।  यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि चाहे जो भी तारीख हो वे इस तरह की पहली महिला थीं।

-उन्मुक्त

(क्रमशः)

आज की दुर्गा – महिला सशक्तिकरण

उन्मुक्त जी का यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चा है।

दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे।  भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं।  शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई।  पुराणों में उसका वर्णन है – उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है।  ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुरमर्दनी कहलायीं।

मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है। शक्ति, संघटन की एकता में ही है।  हमारी कथाओं में देवी दुर्गा का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं।  यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं।  साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा।  देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।

दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है।  लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है?  क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है?  क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है?  शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई।  यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं।  आइये नजर डालें उन किस्से कहानियों पर, उस कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्हों ने महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और कुछ हद तक महिलाओं को दुर्गा का रूप दिया पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।

महिला दिवस (women’s day)

मेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन  मनाया जाने लगा।  १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया।  उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।

९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनों की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

हिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द लैंगिक न्याय (Gender Justice) प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। आइये समझें कि हमारे देश इस समय यह किस अर्थ में लिया जाता है।

लैंगिक न्याय (Gender Justice)

लैंगिक न्याय अर्थात किसी के साथ लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होना चाहिये। बहुत से लोग समलैंगिक अधिकारों को भी इसके अन्दर मानते हैं। समलैगिंकों के साथ भेदभाव होता है लेकिन वह इसलिये नहीं कि उनका लिंग क्या है वह इसलिये कि वे अपने लिंग के ही लोगों में रूचि रखते हैं।  मेरे विचार से, समलैंगिग अधिकारों को लैंगिक न्याय के अन्दर रखना उचित नहीं है।  उनके अधिकारों को अलग से नाम देना, या अल्पसंख्यक (Minority) या जातीय (ethnic) अधिकारों के अन्दर रखना, या Gay rights कहना ठीक होगा।

म कुछ अन्य श्रेणी के व्यक्तियों के अधिकारों पर भी विचार करें, उदाहरणार्थः

  1. Trans- Sexual:  यह वह लोग हैं जो एक लिंग के होते हैं पर बर्ताव दूसरे लिंग के व्यक्तियों की तरह से करते हैं;
  2. Trans gendered:  लिंग परिवर्तित: यह वह व्यक्ति हैं जो आपरेशन करा कर अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इसमें सबसे चर्चित व्यक्ति रहे रीनी रिचर्डस्। ये पुरुष थे और आपरेशन करा कर महिला बन गये, पर उन्हें महिलाओं की टेनिस प्रतियोगिता में कभी भी खेलने नहीं दिया गया। उन्हें कुछ सम्मान तब मिला जब वे मार्टीना नवरोतिलोवा की कोच बनीं। मैंने इस तरह के लोगों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री की चिट्ठी पर लिखा है;
  3. Inter-Sex बीच के: लिंग डिजिटल नहीं है। मानव जाति को केवल पुरूष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं। हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम (chromosome) तय करते हैं। यह जोड़े में आते हैं। हम में क्रोमोसोम के २३ जोड़े रहते हैं। हम पुरूष हैं या स्त्री, यह २३वें जोड़े पर निर्भर करता है। महिलाओं में यह दोनों बड़े अर्थात XX होते हैं पुरूषों में एक बड़ा एक छोटा यानि कि XY रहते हैं। अक्सर प्रकृति अजीब खेल खेलती है। कुछ व्यक्तियों में २३वें क्रोमोसोम जोड़े में नहीं होते: कभी यह तीन या केवल एक होते हैं अर्थात XX,Yया XYY, या X, या Y. यह लोग पूर्ण पुरूष या स्त्री तो नहीं कहे जा सकते – शायद बीच के हैं। इसलिए इन्हें Inter-Sex कहा जाता है। संथी सुन्दरराजन शायद इसी प्रकार की हैं। इसलिये दोहा एशियाई खेलो में, उनसे रजत पदक वापस ले लिया गया।

पर वर्णित तीनो तरह के व्यक्तियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव होता है। अधिकतर जगह, यह लोग हास्य के पात्र बनते हैं।  इन्हें भी न्याय पाने का अधिकार है।  पर अपने देश में लैंगिक न्याय का प्रयोग केवल महिलाओं के साथ न्याय के संदर्भ में किया जाता है और अगले अंक में हम बात करेंगे महिलाओं के साथ न्याय, उनके सशक्तिकरण की: आज की दुर्गा की।

-उन्मुक्त

(क्रमशः)

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