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मजदूरों के लिए श्रम विभाग और न्यायालयों में कोई न्याय नहीं।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने चौपासनी स्कूल तिलवारियॉ बैरा राजस्थान से पूछा है-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में पिछले 7 साल से काम करता था यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमें इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम हे और 10000 से कम वालो को अभी तक नही दिया  आज़ कल आज़ कल कर रहे हैं, जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारीख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब अगले महिने कि 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहां पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेन्टीनेंस की परवाह नहीं करते। इन सभी समस्याऔ के कारण मैं ने अपना त्याग पत्र 01/06/2016 को नोटिस देकर 30/06/2016 तक मेरा कम्पलीट हिसाब करने को लिखित में दिया जिस में वैतन,दिपावली बोनस,गे्चुटी ,व अन्य परिलाभ शामिल हैं जिस की फोटो कापी मय हस्ताक्षर मेरे पास है, मगर आज़ 18/07/2016 तक भी मुझे 1 पेसा भी नहीं मिला।  कानूनन मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं वेतन, दीपावली बोनस, ग्रेच्युटी के साथ बकाया ओवर टाईम पिछले 7 साल का (सिंगल जो बाकी है), 3 साल वेतन लेट का ब्याज क्या कानूनन ले सकता हूँ?    कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या कोई नियम नहीं है। मैं जोधपुर श्रम आयुक्त के कार्यालय भी गया। उन्होंने कारवाही करने कि बजाय कम्पनी को ही फोन कर के बता दिया कि मैं मुकदमा दर्ज़ करवाने आया हूँ और मुझे वहाँ से भगा दिया, कृपया समाधान बताएँ।

समाधान-

राजस्थान ही नहीं देश भर में श्रमिकों के मामलों में न्याय की स्थिति अत्यन्त खराब है। इस का कारण श्रम संगठनों का ह्रास है। अधिकांश श्रम संगठन श्रमिकों के संगठन नहीं है बल्कि उन्हें या तो कुछ राजनैतिक दल चलाते हैं जिन्हें राजनीति के लिए श्रमिकों के वोटों की जरूरत होती है, या फिर कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से मिल कर इसे एक व्यवासय के रूप में चलाते हैं। मजदूर वर्ग की जरूरत के कारण बने श्रमसंगठनों का लगभग अभाव है। जोधपुर की भी यही स्थिति है। आप किसी श्रम संगठन से संबद्ध प्रतीत नहीं होते जिस के कारण आप ने यहाँ यह समस्या पोस्ट की है।

आप ने उद्योग की जो स्थिति बताई है उस से लगता है कि अब यह उद्योग इस के मालिकों के लिए अधिक मुनाफे का सौदा नहीं रहा। इस कारण वे इस उद्योग की हालत जानबूझ कर खराब कर रहे हैं। उद्योग को बिना राज्य सरकार की इजाजत के बिना बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे धीरे मजदूरों का बकाया बढ़ाया जा रहा है इसी तरह बाजार के लेनदारों का भी बकाया बढ़ा रखा होगा और बैंकों से ऋण भी ले रखा होगा। कुछ दिन बाद यह उद्योग अपनी कंपनी को बीमार बता कर बीआईएफआर में आवेदन करेगी और मजदूरों को उकसा कर हड़ताल वगैरा करने पर मजबूर करेगी या अपने ही एजेंटों के माध्यम से कारखाने में कोई हिंसा करवा कर कारखाने में तालाबंदी करवा देगी। उस के बाद यह कारखाना कभी नहीं खुलेगा। मजदूर बरसों तक अपनी बकाया राशि के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहेंगे। ऐसा देश के सैंकड़ों कारखानों में हो चुका है।

मालिकों की यह योजना किसी मुकाम तक पहुंचती उस के पहले ही आप ने हालात को भांप कर स्तीफा दे दिया है। अब मालिक समझ नहीं रहा है कि आप का हिसाब दे या न दे। उस के सलाहकारों ने यह सलाह दी होगी कि हिसाब मत दो, जब मुकदमा करे और लड़ लड़ कर पक जाए तब मजदूर को आधा अधूरा हिसाब दे देना।

श्रम न्यायालयों, व  श्रम विभाग की स्थिति यह है कि श्रम न्यायालय जितने होने चाहिए उस के आधे भी राज्य में  नहीं हैं। अधिकांश न्यायालयों में उन की क्षमता से दस दस गुना मुकदमे लंबित हैं। मकदमों का निर्णय 20-30 वर्षों तक नहीं हो पा रहा है। वेतन भुगतान, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, कामगार क्षतिपूर्ति आदि के न्यायालयों में श्रम विभाग राजस्थान के अधिकारी पीठासीन होते हैं। आधे से अधिक न्यायालयों में अधिकारी नहीं हैं। एक एक अधिकारी चार चार न्यायालयों को संभालता है  जिस का नतीजा यह है कि वहाँ भी न्याय नहीं हो रहा है।

इतना सब हो जाने के बावजूद राजस्थान का मजदूर वर्ग सोया पड़ा है। मजदूरों के नाम पर जितने भी संगठन राजस्थान में काम कर रहे हैं वे सिर्फ अपने स्वार्थों के लिए काम कर रहे हैं उन में से कोई भी वास्तविक मजदूर संगठन या ट्रेडयूनियन नहीं है। ऐसा लगता है कि श्रमिकों के लिए इस राज्य में न्याय है ही नहीं।

इन विपरीत परिस्थितियों में आप को चाहिए कि आप अपने नगर में ही किसी ऐसे वकील से मिलें जो श्रम संबंधी मामलों की वकालत करता हो। सीधे उस से बात करें कि आप त्याग पत्र दे चुके हैं और आप को अपना हिसाब अपने नियोजक से लेना है। यह हिसाब लेने के लिए उन के माध्यम से कार्यवाही करें। इस के लिए आप को दो तीन मुकदमे करने पड़ सकते हैं। ग्रेच्युटी के लिए एक फार्म में आवेदन प्रेषित कर दें ग्रेच्यूटी न देने पर उस का आवेदन प्रस्तुत करें। एक आवेदन बकाया वेतन व अन्य लाभ जो वेतन की परिभाषा में आते हों उन के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में कार्यवाही करें। अन्य सभी परिलाभों के लिए भी आप की स्थिति देख कर तथा तमाम तथ्यों की जानकारी कर के आप के वकील निर्धारित करेंगे कि क्या कार्यवाही करनी चाहिए?

"उद्योग" क्या हैं ?

पिछले शनिवार हम ने औद्योगिक विवाद अधिनियम के बारे में बात आरंभ की थी। आप जानना चाह रहे होंगे कि औद्योगिक विवाद क्या हैं?  लेकिन उस से पहले यह जान लें कि औद्योगिक विवाद उत्पन्न कहाँ होते हैं? यह एक सामान्य बात है कि औद्योगिक विवाद किसी उद्योग में ही उत्पन्न हो सकते हैं। इस कारण पहले यह जानना बेहतर होगा कि उद्योग क्या है?

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में “उद्योग”  शब्द को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है।

(j) “Industry” means any business, trade, undertaking, manufacture or calling of employers and includes any calling, service, employment, handicraft, or industrial occupation or avocation of workmen;

(ञ) “उद्योग” का अर्थ है कोई भी व्यवसाय, व्यापार, उपक्रम, निर्माण या नियोक्ताओं द्वारा किया जाने वाला धंधा और कोई भी धंधा, सेवा, रोजगार, हस्तकला, ​​या   औद्योगिक धन्धा या कामगार द्वारा किया जाने वाली उपजीविका भी शामिल है;

द्योग की इस परिभाषा का विस्तार अत्यन्त वृहत् है। उक्त परिभाषा पर बैंगलौर वाटर सप्लाई एण्ड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय के सात न्यायाधीशों की विस्तृत पीठ ने गंभीरता से विचार किया और बताया कि क्या क्या काम-धंधे उद्योग हो सकते हैं। इस मुकदमे का मुख्य निर्णय न्यायाधीश वी.आर. कृष्णा अय्यर ने लिखा था।  इस निर्णय में उन्हों ने कहा कि जहाँ भी नियोजकों और नियोजितों के बीच सहयोग से व्यवस्थित कार्यकलाप हो रहे हों और जो माल उत्पादन और/या वितरण, या मानव आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए निश्चित सेवाएँ प्रदान की जा रही हों वे सब उद्योग हैं। इस में  लाभ प्राप्त करने की इच्छा या उद्देश्य का होना आवश्यक नहीं है। इसी निर्णय में कहा गया कि सरकार के प्रभुतासंपन्न कार्यो को उद्योग नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार और विधिक निकायों द्वारा की जाने वाले कल्याण कार्यों और आर्थिक गतिविधियों को उद्योग की परिभाषा से पृथक नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि सरकार के जो विभाग प्रभुतासंपन्न गतिविधियाँ करते हैं उन की वे शाखाएँ जो उक्त प्रकार के कार्य करती हैं वे उद्योग की परिभाषा में आती हैं।

भारत सरकार का टेलीकॉम विभाग, डाक विभाग, नगरपालिकाओं, पंचायतों, पंचायत समितियों का कर विभाग, जनपरिवहन विभाग, अग्निशमन विभाग, विद्युत विभाग, जलप्रदाय विभाग, नगर अभियांत्रिकी विभाग, सफाई विभाग, स्वास्थ्य विभाग, बाजार विभाग, शिक्षा  विभाग, निर्माण विभाग, उद्यान विभाग, मुद्रण विभाग अनेक विभाग,  सामान्य प्रशासन विभाग एवं कुछ अन्य विभागों को न्यायालयों ने उद्योग माना है। जिन अस्पतालों और चेरिटेबल संस्थाओं में कर्मचारी नियोजित किए जाते हैं या जो लाभ कमाते हैं वे भी उद्योग माने गए हैं। भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी, भारतीय कैंसर सोसायटी, रीयल ऐस्टेट कंपनी जो मकानों को लीज पर देती है और उन की मरम्मत व देखरेख के लिए कर्मचारी नियोजित करती है, सरकार द्वारा चलाए जाने वाले ट्य़ूबवैल तथा हैण्डपंप सुधारने वाले विभागों को उद्योग माना गया है। बड़े क्लबों को, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को भी उद्योग माना गया है। सहकारी समितियाँ, इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स, कृषि कार्य करने वाली कंपनियाँ, खादी ग्रामोद्योग संघ, सिंचाई विभाग, राज्य कर्मचारी बीमा व प्रोवीडेण्ट फण्ड विभाग, समाज कल्याण विभाग, पर्यटन विभाग, स्टेट लॉटरी विभाग, अन्य अनेक विभागों को उ्दयोग माना गया है।

स तरह हम मान सकते हैं कि प्रत्येक वह गतिविधि जिस में कर्मचारी नियोजित किए जाते हैं वह उद्योग हो सकती है। इस कारण से कर्मचारी नियोजित करने वाले नियोजकों को जाँच लेना चाहिए कि वे जो गतिविधि कर रहे हैं वह उद्योग तो नहीं है। यदि वह उद्योग है तो उन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना होगा। हमारे यहाँ छोटे नियोजक इन कानूनों पर ध्यान नहीं देते हैं और अक्सर इस के उपबंधों की पालना न करने के कारण मुसीबत में फँस जाते हैं। इस तरह प्रत्येक कर्मचारी को यह जाँच लेना चाहिए कि वह जहाँ काम कर रहा है वह उद्योग है या नहीं। कर्मचारी भी अज्ञान के कारण अक्सर नुकसान उठाते हैं और अपने अधिकारों से वंचित रहते हैं।

औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 क्या है ?

ज जब किसी उद्योग के कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया जाए, उसे उस की नौकरी का लाभ न दिया जाए, या कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों को गैरवाजिब मान कर हड़ताल कर दें या फिर स्वयं उद्योग के प्रबंधक ही उद्योग में तालाबंदी, छंटनी या ले-ऑफ कर दें तो हमें तुरंत औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की याद आती है। मौजूदा औद्योगिक विवाद अधिनियम आजादी के तुरंत पहले 1 अप्रेल 1947 को अस्तित्व में आया था। इस के लिए केन्द्रीय असेम्बली में विधेयक 8 अक्टूबर 1946 को प्रस्तुत हुआ था तथा दिनांक 31 मार्च 1947 को पारित कर दिया गया था। तब से अब तक 1956, 1964, 1965, 1971, 1972, 1976, 1982, 1984,1996 तथा 2010 में इस अधिनियम में संशोधन किए गये हैं। इस के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के द्वारा भी इस में 28 बार संशोधित किया गया है। इस तरह इस अधिनियम को कुल 38 बार संशोधित किया गया है।

ब्रिटिश भारत में सर्वप्रथम 1929 में ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल लाया गया था। इस बिल के द्वारा जनउपयोगिता के उद्य़ोगों में हड़ताल और तालाबंदी को प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन उन औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए कोई विकल्प प्रदान नहीं किया गया था और इसे दमनकारी माना गया था। युद्ध के दौरान इस अधिनियम के इस अभाव को दूर करने के लिए डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के नियम 81-ए में प्रावधान किया गया था कि केन्द्र सरकार किसी भी ओद्योगिक विवाद को न्यायाधिकरण को सौंप सकती है और उस के द्वारा प्रदान किए गए अधिनिर्णय को लागू करवा सकती है। ये नियम युद्ध की समाप्ति के साथ ही दिनाक 1 अक्टूबर 1946 को समाप्त हो गये लेकिन नियम 81-ए को इमर्जेंसी पावर्स (कंटीन्यूएंस) ऑर्डीनेंस 1946 से इसे जारी रखा गया। इसी ऑरडीनेंस के स्थान पर बाद में औद्योगिक विवाद अधिनियम अस्तित्व में आया।

द्योगिक विवादों का अन्वेषण तथा उन का समाधान करना औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 का प्रमुख उद्देश्य है। इस अधिनियम के अंतर्गत दो तरह की संस्थाएँ बनाई गईं। बड़े उद्योगों में जहाँ 100 या उस से अधिक श्रमिक नियोजित हों श्रमिकों और नियोजकों के प्रतिनिधियों की संयुक्त वर्क्स कमेटी बनाने का उपबंध किया गया। वहीं औद्योगिक विवादों के समाधान केलिए समझौता अधिकारियों की नियुक्ति और बोर्डों का गठन करने के उपबंध किये गए। समझौता संपन्न न होने पर औद्योगिक विवादों के न्याय निर्णयन के लिए श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण की व्यवस्था की गई तथा हड़तालों व तालाबंदियों को रोकने के लिए भी उपबंध किए गए हैं।

ब तक आप यह सोचने लगे होंगे कि ये औद्योगिक विवाद क्या हैं? इस का समाधान कैसे संभव होता है? क्या किसी एक श्रमिक के साथ उस के नियोजक द्वारा की गई हर नाइंसाफी का कोई इलाज इस अधिनियम में है? यदि नहीं तो फिर उन के लिए क्या मार्ग हैं? ऐसे ही अनेक और भी प्रश्न आपके जेहन में उभर रहे होंगे। हम तीसरा खंबा पर सप्ताह में एक बार इन्ही प्रश्नों से रूबरू होने का प्रयत्न करेंगे। संभवतः प्रत्येक शनिवार को। औद्योगिक विवादों की जानकारी में लेने वाले पाठक हर शनिवार को इस की प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि इस कानून से संबंधित कोई भी जिज्ञासा किसी पाठक को हो तो वह अपने प्रश्न हमें टिप्पणियों के माध्यम से रख सकता है। हर जिज्ञासा का उत्तर देने का प्रयत्न किया जाएगा।

कोई इस आग को लगने से रोक पाएगा?

कोई व्यक्ति जब किसी कंपनी में ऐसा नियोजन प्राप्त कर लेता है, जिस में सेवा की अवधि उल्लखित नहीं होती तो सामान्यतः  उस का नियोजन सुरक्षित है, वह नियोजन की चिंता से मुक्त हो कर काम में जुट जाता है। लेकिन बहुत कर्मचारियों के साथ यह होता है कि अचानक किसी दिन उस का बॉस कहता है कि तुम त्यागपत्र दे दो। इस तरह कर्मचारी अचानक साँसत में आ जाता है। वह जानता है कि यदि उस ने त्यागपत्र नहीं दिया तो किसी भी तरीके से उसे नियोजन से अलग कर दिया जाएगा। उस की बकाया राशियाँ ग्रेच्युटी, भविष्य निधि आदि को प्राप्त करने में उसे रुला लेगी। उसे अनुभव प्रमाण पत्र भी प्राप्त नहीं होगा। यह भी हो सकता है कि उस की सेवाएँ समाप्त करते समय ऐसा आदेश पारित कर दिया जाए कि उस के भविष्य के कैरियर पर प्रश्नचिन्ह लग जाए। ऐसे में वह सोचता है कि त्याग-पत्र देने में ही उस की भलाई है। कम से कम उसे बकाया राशियाँ एक-मुश्त मिल जाएंगी। अनुभव प्रमाण पत्र मिलेगा जिस के माध्यम से वह नया नियोजन प्राप्त कर सकेगा। किसी भी कर्मचारी को त्याग-पत्र देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह गैरकानूनी है। 
से में यदि त्याग-पत्र मांगा जाए, और कर्मचारी न दे तो क्या करे? कर्मचारी के पास यह विकल्प है मौजूद है कि वह अपने बॉस को कहे कि वह नया नियोजन तलाश कर रहा है। जैसे ही कोई ऑफर मिलता है, वह त्याग पत्र दे देगा। हो सकता है उस का बॉस या कंपनी इस बात के लिए तैयार हो जाए। लेकिन इस के लिए वह दो-तीन माह से अधिक का समय नहीं देगी। इस बीच दूसरा नियोजन न मिले तो बॉस/कंपनी और कर्मचारी के मध्य संबंध खराब होने लगेंगे। स्थिति खरबूजा और चाकू जैसी बन जाती है। कर्मचारी त्यागपत्र दे तो तुरंत नियोजन से हाथ धो बैठेगा और बेरोजगारों की कतार में जा खड़ा होगा। नहीं देता है तो कंपनी न केवल उस का नियोजन समाप्त कर देगी, अपितु ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर देगी कि उसे नियोजन मिलने में कठिनाइयाँ आने लगें। 
से में यदि कोई कर्मचारी त्याग पत्र नहीं देता है और कंपनी उसे नौकरी से निकाल देती है, तो कर्मचारी की सेवा समाप्ति गैर-कानूनी होगी। कर्मचारी उसे कानून के समक्ष चुनौती दे सकता है। यदि वह औद्योगिक विवाद अधिनियम में वर्णित श्रमिक (workman) है तो उसे इसी अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही करनी चाहिए। यदि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्ति अवैध है तो वह न्यायालय से यह अधिनिर्णय प्राप्त  कर सकता है कि उसे पुनः नौकरी पर लिया जाए, बीच की अवधि का पूरा या आंशिक वेतन व अन्य लाभ भी अदा किए जाएँ। लेकिन भारत के सभी नियोजक जानते हैं कि देश में पर्याप्त अदालतें नहीं हैं। यदि कर्मचारी ने अदालत का रुख किया तो सामान्य रूप से ही मुकदमे में निर्णय में पाँच-दस वर्ष और कहीं कहीं बीस या उस से भी अधिक समय लग जाएगा। नियोजक अपने धन-बल का उपयोग कर इस पाँच-दस वर्ष की अवधि को दुगना भी कर सकते हैं। इस बीच कर्मचारी थक जाएगा। वह कहीं तो नियोजन प्राप्त कर ही लेगा। धीरे-धीरे मुकदमे से उस का मोह टूट जाएगा और  तब अपनी शर्तों पर मुकदमा समाप्त करने के लिए उसे तैयार किया जा सकता है। कुल मिला कर नियोजक को कुछ भी हानि नहीं होगी।  
स तरह भारत में त्वरित न्याय उपलब्ध न होने के कारण सभी नियोजक अपने कर्मचारियों के साथ मनमानी करने लगे हैं। कर्मचारियों के लिए न्याय की उपलब्धि असंभव की सीमा छू चुकी है

नियमित कर्मचारी और दैनिक वेतन भोगी का वेतन समान नहीं हो सकता

धर्मेन्द्र कुमार प्रजापति पूछते हैं–
क्या यह उचित है कि किसी विश्वविद्यालय में संविदा-कर्मी और एजेंसी-कर्मी के मानदेय (वेतन) में अंतर हो सकता है। या यदि ऐजेंसी का मालिक कम भुगतान देता हो तो उस के लिए हम क्या करें? दोनो प्रश्नों के लिए उचित सलाह देने का कष्ट करें। 
उत्तर–
धर्मेंन्द्र भाई!
चित तो यह है कि विश्वविद्यालय अथवा किसी भी संस्थान में समान काम के लिए समान ही वेतन मिलना चाहिए। हाँ यदि सेवा की अवधि में या शिक्षा के स्तर में या कुशलता में किसी तरह का अंतर हो तो वेतन उस के अनुसार कुछ कम या अधिक हो सकता है। लेकिन कानूनी स्थिति इस के विपरीत है। 
रियाणा राज्य बनाम चरणजीत सिंह एवं अन्य के प्रकरण में  न्यायमूर्ति एस.एन. वरियावा, डॉ. ए.आर. लक्षमणन और एस.एच कापड़िया की सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने दिनांक  05.10.2005 को यह निर्णय  (2006 ए.आई.आर. सुप्रीम कोर्ट 106) दिया है कि नियमित रूप से चयन प्रक्रिया द्वारा चुने गए कर्मचारी और एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी जो कि ठेकेदार के माध्यम से नियोजित किया जाता है का वेतन समान नहीं हो सकता है। क्यों कि शिक्षा, अनुभव और कुशलता आदि अनेक कारक ऐसे हैं जिस के कारण उन के वेतनों में अंतर हो सकता है।
र्मचारियों की ओर से सुप्रीमकोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया गया था कि ठेकेदार के माध्यम से कर्मचारी इसीलिए नियोजित किए जाते हैं कि उन्हें कम वेतन दिया जा सके और वे स्थायीकरण के अधिकारी न हो जाएँ. अन्यथा उन का चयन भी मुख्य नियोजक उसी तरह करता है जैसे चयन समिति करती है। इस पर सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि यह बात आप की याचिका में नहीं है। याचिका को अच्छी तरह लिखी हुई न मानते हुए सु्प्रीम कोर्ट ने मामले को वापस उच्चन्यायालय को प्रेषित कर दिया कि वह याचिका कर्ता कर्मचारियों को अपनी याचिका को संशोधित करने का अवसर दे और मेरिट पर निर्णय दे। 
स तरह यदि समान वेतन के लिए उक्त तीनों कारकों पर कर्मचारी एक जैसे हों तो समान वेतन के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की जा सकती है। 
प के लिए मेरी राय यह है कि आप अपने तथ्यों को ले कर आप के उच्चन्यायालय के किसी ऐसे वकील से परामर्श करें जिस का सेवा संबंधी मामले करने का अनुभव रहा हो। उस के परामर्श के उपरांत यदि वह आप को राय दे कि आप को याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए तो आप पहले अपने नियोजक और विश्वविद्यालय को नोटिस दें और अवधि समाप्त होने के उपरांत रिट याचिका दाखिल करें।

नरेगा के फंड पर प्रखंड कार्यालय में दो वर्ष काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर को बिना सूचना अकारण सेवा से हटाना अवैध है

जयन्त कुमार सिन्हा ने पूछा है –

नरेगा के अन्तर्गत नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर ने लगातार 2 वर्षों (अगस्त 2006 से अगस्त 2008) तक प्रखण्ड कार्यालय में काम किया है तथा उसकी उपस्थिति अन्य सरकारी कर्मियों के साथ ही उपस्थिति पंजी में दर्ज हुई है क्या उसे  बिना कोई कारण बताये व पूर्व सूचना दिये कार्य से विमुक्त किया जा सकता है?

 उत्तर –

जयन्त जी,

कम्प्यूटर ऑपरेटर औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (एस) में परिभाषित कार्मिक है।  किसी दुराचरण के आरोप के कारण, सेवा निवृत्ति की आयु होने पर, लगातार बीमारी के कारण,  सेवा संविदा  (नियुक्ति पत्र) की किसी शर्त के कारण या स्वयं कार्मिक द्वारा सेवा त्याग को छोड़ कर नियोजक द्वारा  किसी भी अन्य कारण से किसी भी कार्मिक को सेवा से हटाना  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) के अनुसार उस कार्मिक की छंटनी होती है। 

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-एफ के अनुसार किसी भी ऐसे कार्मिक को जिस ने एक वर्ष की लगातार सेवा पूर्ण कर ली है, अथवा जिस तिथि को उस की छंटनी की जाती है उस तिथि से पूर्व के एक वर्ष में  उस ने 240 दिन काम कर लिया है, और उसे छंटनी किया जाता है तो  छंटनी किए जाने के लिए उस का कारण बताना आवश्यक है।  छंटनी  के लिए कार्मिक को नियोजक द्वारा पूर्व नोटिस दिया जाना आवश्यक है, जो कार्मिक को छंटनी किए जाने की तारीख के एक माह पूर्व मिल जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई  नोटिस नहीं दिया गया हो तो छंटनी के समय कार्मिक को एक माह का वेतन वास्तविक रुप में दिया जाना चाहिए। साथ ही कार्मिक ने जितनी अवधि तक सेवा की है, प्रत्येक वर्ष पर 15 दिन के वेतन के बराबर छंटनी का मुआवजा भी दिया जाना आवश्यक है।  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-जी के अनुसार छंटनी केवल कनिष्ठतम कार्मिकों की ही की जा सकती है।

यदि उक्त प्रक्रिया अपनाए बिना किसी भी कार्मिक को सेवा से पृथक किया जाता है तो वह अवैधानिक होगी।  ऐसी सेवा समाप्ति को कार्मिक स्वयं श्रम विभाग के समझौता (संराधन) अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर चुनौती दे सकता है। 

आप के मामले में आप की उपस्थिति सब कार्मिकों के साथ उपस्थिति पंजी में दर्ज की गई है इस कारण से चाहे आप को नरेगा या किसी और फंड से वेतन चुकाया गया हो आप उस कार्यालय के कार्मिक हैं जहाँ आप ने काम किया है। आप को बिना कोई कारण बताए और औद्योगिक विवाद अधिनियम  की धारा 25-एफ व धारा 25-जी में वर्णित प्रक्रिया जो संक्षेप में ऊपर वर्णित की गई है की पालना किए बिना सेवा से नहीं हटाया जा सकता है। यदि हटा दिया गया है तो वह उचित और वैध नहीं है। ऐसी सेवा समाप्ति पर समझौता अधिकारी के यहाँ शिकायत प्रस्तुत कर औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

न्यूनतम मजदूरी बढने से ठेकेदार को घाटा नहीं, लेकिन मजदूरी मजदूरों को मिलती नहीं

भारत संघ बनाम सारस्वत ट्रेडिंग कम्पनी के मुकदमे में सु्प्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि यदि किसी निर्माण कार्य को करने के लिए कोई ठेकेदार नियुक्त किया जाता है और ठेके की अवधि में सरकार न्यूनतम वेतन में वृद्धि कर देती है तो ठेकेदार से उस के लाभों को कम करने के लिए नहीं कहा जा सकता है, चाहे ठेकेदार ने अपने कंट्रेक्ट में उस काम को निश्चित दरों पर करने का वादा क्यों न किया हो। न्यूनतम वेतन में वृद्धि से जितना भार ठेकेदार पर बढ़ता है उस का भुगतान मूल नियोजक द्वारा ठेकेदार को करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूल्यों में वृद्धि के इस युग में मूल्य में वृद्धि सामान्य बात है।

इस तरह अब न्यूनतम वेतन के बढ़ने पर ठेकेदार को किसी प्रकार की हानि होने की संभावना उस के ठेके में नहीं है। लेकिन फिर भी जब तक कंट्रेक्ट पुनरीक्षण नहीं हो जाता है तब तक काम चलता रहता है और ठेकेदार पुरानी दरों से ही मजदूरों और कर्मचारियों को वेतन देता रहता है। कंट्रेक्ट का पुनरीक्षण आम तौर पर ठेके का काम पूरा हो जाने के उपरांत बहुत समय बाद होता है। जिस का नतीजा यह होता है कि जो राशि मजदूरो और कर्मचारियों को वेतन के रूप में मिलनी चाहिए थी वह भी ठेकेदार ही प्राप्त कर लेता है।  इस तरह मजदूरों और कर्मचारियों को उन के हक की राशि नहीं मिल पाती है।


इस का मुख्य कारण है कि ठेके के कामों में जहाँ मजदूर और कर्मचारी अस्थाई रूप से काम करते हैं। मजदूरी देनगी अधिनियम और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अंतर्गत मजदूरों और कर्मचारियों को समय पर कानून के अनुसार मजदूरी भुगतान कराने के लिए श्रम विभाग की मशीनरी पर्याप्त नहीं है।  अनेक मामलों में तो स्थिति यह है कि मजदूरों को पुरानी दर से भी मजदूरी पूरी नहीं दी जाती है और वे उसे प्राप्त करने के लिए भटकते रहते हैं।  कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि वे उस का खर्च उठा कर भी अपनी बकाया  मजदूरी प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं।  न्यायालय में कार्यवाही हो सके इस से पहले ही मंजदूर नए स्थान पर पलायन कर जाते हैं।  न्यायालय निर्णय दे भी देता है तो उस की वसूली असंभव हो जाती है क्यों कि ठेकेदार वह क्षेत्र छोड़ कर अन्यत्र चला जाता है।

उद्योग पर मुसीबत के वक्त कामगारों और नियोजकों दोनों के लिए सहायक ले-ऑफ का कानून

मैं ने कल के आलेख में कहा था कि ले-ऑफ के कानूनी प्रावधान मालिकों और उन के कामगारों दोनों के लिए लाभदायक हैं।  औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 की धारा 25-डी में प्रावधान किया गया है कि कामगारों को नियोजित करने वाले प्रत्येक मालिक के लिए यह जरूरी होगा कि वह इस कानून के अध्याय 5-ए के प्रयोजनों के लिए एक मस्टररोल रखेगा और उस में प्रत्येक कामगार द्वारा इस बात का इन्द्राज करने की व्यवस्था करेगा कि उस ने स्वयँ को संस्थान द्वारा सामान्य काम के घंटों में निर्धारित समय पर स्वयँ को काम के लिए उपलब्ध कराया है।

इस धारा का अंग्रेजी पाठ इस प्रकार है ….
Duty of an employer to maintain muster rolls of workmen.
25D. Duty of an employer to maintain muster rolls of workmen.
Notwithstanding that workmen in any industrial establishment have been laid-off, it shall be the duty of every employer to maintain for the purposes of this Chapter a muster roll and to provide for the making of entries therein by workmen who may present themselves for work at the establishment at the appointed time during normal working hours.

इसी तरह एक कर्मकार जिस का नाम संस्थान की मस्टर रोल पर चढ़ जाता है और जिस ने एक वर्ष का कार्यकाल उस संस्थान में पूरा कर लिया है, (जो पिछले 365 दिन की अवधि में 240 दिन काम कर चुका है) उसे  ले-ऑफ किया जाता है तो नियोजक को उसे ले-ऑफ किए जाने वाले दिनों के मूल वेतन और महंगाई भत्ते की की राशि की आधी राशि का भुगतान करेगा।
लेकिन ऐसा कोई समझौता मौजूद होने पर यदि बारह माह कि अवधि में कामगार को 45 दिनों से अधिक के लिए ले-ऑफ किया जाता है तो कामगार पहले 45 दिनों के अलावा ले-ऑफ के दिनों की कोई भी राशि प्राप्त करने के अधिकारी नहीं होंगे।
और यदि पहले 45 दिनों तक ले-ऑफ देने के उपरांत कोई नियोजक अपने श्रमिकों की धारा 25-एफ के प्रावधानों के अनुसार छंटनी करता है तो यह कानूनन वाजिब होगा कि वह ले-ऑफ के लिए दिए गए मुआवजे की राशि छंटनी किए जाने वाले कामगारों को दिए जाने वाले छंटनी के मुआवजे में से कम कर ले।

उपरोक्त प्रावधान धारा 25-सी के हैं जिस का अंग्रेजी पाठ निम्न प्रकार है…

25C. Right of workmen laid-off for compensation.

25C. Right of workmen laid-off for compensation.- Whenever a workman (other than a badli workman or a casual workman) whose name is borne on the muster rolls of an industrial establishment and who has completed not less than one year of continuous service under an employer is laid-off, whether continuously or intermittently, he shall be paid by the employer for all days during which he is so laid-off, except for such weekly holidays as may intervene, compensation which shall be equal to fifty per cent. of the total of the basic wages and dearness allowance that would have been payable to him had he not been so laid-off:

Provided that if during any period of twelve months, a workman is so laid-off for more than forty-five days, no such compensation shall be payable in respect of any period of the lay-off after the expiry of the first forty-five days, if there is an agreement to that effect between the workman and the employer:

Provided further that it shall be lawful for the employer in any case falling within the foregoing proviso to retrench the workman in accordance with the provisions contained in section 25F at any time after the expiry of the first forty-five days of the lay-off and when he does so, any compensation paid to the workman for having been laid-
off during the preceding twelve months may be set off against the compensation payable for retrenchment.

 इस तरह आप देख सकते हैं कि उद्योग पर किसी तरह की मुसीबत के समय ले-ऑफ के प्रावधान न केवल काम करने वाले कामगारों के हितों की रक्षा करते हैं, अपितु नियोजकों के भी दीर्घकालीन हितों की रक्षा करते हैं।  अच्छे और कानून की पालना करने वाले नियोजक सदैव इनकी पालना करते हैं।  लेकिन इन दिनों ऐसे नियोजकों की कमी नहीं है जो ले-ऑफ देने के स्थान पर श्रमिकों को विश्वास में रख कर उन के साथ धोखा करते हैं और कामगारों को उ

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