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केंटोनमेंट बोर्ड एक स्थानीय निकाय और उद्योग है।

समस्या-

प्रशान्त चौहान, ने महू, जिला इन्दौर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मैं केन्टोंमेंट बोर्ड, महू केंट में विगत १९९९ से कनिष्ठ लिपिक पद पर कार्यरत हूँ।  विगत वर्ष नवम्बर २०११ में मेरी हर्निया सर्जरी केंद्रीय चिकित्सा परिचर्या नियम अंतर्गत पालन करते हुए सम्पादित की गई थी।   जिसका वास्तविक चिकित्सा व्यय लगभग १९५००/- के भुगतान हेतु मैं ने  निर्धारित चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा प्रपत्र में योग्य संलग्नको के साथ विगत फरवरी २०१२ को कार्यालय में जमा कराया।  महीनों तक कोई कार्यवाही न होने पर मैं ने इस दौरान स्मरण पत्र भी कार्यालय को दिए।  एक दिन अचानक विगत सितम्बर २०१२ में कार्यालय द्वारा मेरा दावा तकनीकी कारण दर्शाते हुए निरस्त कर दिया गया।  मैं ने उक्त निरस्त दावे की अपील हमारे वरिष्ठ कार्यालय मध्य कमान, लखनऊ को विगत माह अक्तूबर २०१२ में प्रेषित कर दी। वहां से तत्काल मेरे प्रकरण में अपील का बिन्दुवार प्रतिउत्तर प्रेषित किये जाने हेतु महू कार्यालय को पत्र माय अपील भेजा गया। किन्तु कार्यालय द्वारा आज दिनांक तक उसका प्रतिउत्तर वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को प्रेषित नहीं किया गया है।  इस सम्बन्ध में मेरे प्रकरण हेतु मैने माह दिसंबर में वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को स्मरण पत्र भी प्रेषित किया है।

ब मैं यह विधिक सलाह चाहता हूँ कि आगामी पंद्रह दिन और मैं वरिष्ठ कार्यालय की कार्यवाही या मुझे सम्बंधित सुचना प्राप्ति का इंतज़ार कर लेता हूँ, तत्पश्चात सक्षम न्यायलय में परिवाद दायर करता हूँ। कृपया सलाह देवें की क्या मैं उपभोक्ता फोरम, इंदौर में अपने चिकित्सा दावा व्यय क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में वाद दायर कर सकता हूँ?  या यह प्रकरण कर्मचारी-नियोक्ता से सम्बंधित होने के कारण वहां दायर नहीं किया जा सकता है?  अतः इस हेतु किस सक्षम न्यायलय में वाद दायर किया जाना उचित होगा जहाँ न्यूनतम व्यय में त्वरित न्याय प्राप्ति हो सके।  चूँकि मैं एक नौकरीपेशा कर्मचारी हूँ अतः यह बात ध्यान में रखते हुए कृपया उक्त विधिक सलाह प्रदान करें।

समाधान-

malicious prosecutionकेंटोनमेंट बोर्ड, एक तरह का स्थानीय निकाय है जो नगर निगम, ग्राम पंचायत आदि की तरह है। इस बोर्ड का भी उसी तरह एक प्रशानिक क्षेत्र होता है, जिस पर सेना का नियंत्रण रहता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 की उपधारा (ए) में इस के लिए केन्द्र सरकार को समुचित सरकार बताया गया है। इस से यह स्पष्ट है कि यह औद्योगिक विवाद अधिनियम में परिभाषित उद्योग की श्रेणी में भी है। यदि इस अधिनियम में आप कर्मकार के रूप में परिभाषित हैं तो आप के संबंध में औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

द्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (के) में ओद्योगिक विवाद को परिभाषित किया गया है। इस के अनुसार नियोजको और कर्मचारियों के मध्य नियोजन, अनियोजन, कर्मचारियों की नियोजन की स्थितियों व शर्तों के संबंध में कोई भी विवाद या मतभेद औद्योगिक विवाद है। लेकिन एक कर्मचारी द्वारा उस के किसी मामले में उठाया गया विवाद औद्योगिक विवाद नहीं हो सकता। वह ओद्योगिक विवाद का रूप उसी स्थिति में धारण करता है जब कि उसे कर्मचारियों के किसी समूह या उन की ट्रेड यूनियन द्वारा समर्थित हो। लेकिन धारा 2-ए में किसी कर्मकार और उस के नियोजक के मध्य, सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को किसी कर्मचारी अथवा ट्रेड युनियन के समर्थन के बिना भी औद्योगिक विवाद माना गया है।  जिस का अर्थ यही है कि अकेला कर्मचारी केवल उस की सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को तो समाधान के लिए औद्योगिक विवाद के रूप में प्रस्तुत कर सकता है किन्तु उस के अन्य विवाद इस अधिनियम में औद्योगिक विवाद के रूप में बिना कर्मचारियो के समूह या यूनियन के समर्थन के बिना औद्योगिक विवाद नहीं होंगे जिस से उन्हें व्यक्तिगत रूप से उठाने का कर्मचारी को कोई अधिकार नहीं है।

प का विवाद आप के चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के निरस्त होने से संबंधित है। यदि इसे किसी कर्मकार समूह या यूनियन का समर्थन प्राप्त नहीं है तो यह भी एक औद्योगिक विवाद नहीं है और आप इसे अधिकार के रूप में समाधान हेतु औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित समझौता कार्यवाही के लिए प्रस्तुत नहीं कर सकते और इस का समाधान औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित प्रक्रिया से नहीं हो सकता। यदि आप के मामले को किसी यूनियन या कर्मकारों के समूह का समर्थन प्राप्त नहीं है तो आप इस मामले में औद्योगिक विवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।

किन्तु केंटोनमेंट बोर्ड के कर्मचारियों की सेवाएँ और सेवा शर्तें वैधानिक नियमों से शासित होती हैं। जिस के कारण उन के अंतर्गत उत्पन्न अधिकारों या उन नियमों के उल्लंघन से अधिकारों में कमी होने के मामले दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। आप के मामले में आप दीवानी वाद प्रस्तुत कर उक्त चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के नियम विरुद्ध निरस्त किए जाने की घोषणा और चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के अनुरूप राशि दिलाने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। दीवानी न्यायालय आप को राहत प्रदान कर सकता है। इस के साथ ही आप इस मामले में केंटोनमेंट बोर्ड के राज्य के रूप में परिभाषित होने के कारण रिट याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

न दोनों ही उपायों के लिए आप को किसी वकील की मदद लेनी पड़ेगी जिस में कुछ तो खर्च होगा ही क्यों कि जो वकील मुकदमा लड़ेगा अपनी फीस तो लेगा ही। जहाँ तक शीघ्र न्याय का प्रश्न है तो भारत में ऐसे न्यायालय उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिन के पास उस की क्षमता से पाँच से दस गुना मुकदमे न हों।  उच्च न्यायालयों में तो मुकदमों का अंबार है। दीवानी न्यायालयों के पास भी काम की कमी नहीं है। इस कारण आप के मुकदमें के निर्णय में कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

वैकल्पिक उपाय होने पर रिट याचिका पोषणीय नहीं है।

समस्या-

राजगढ़, मध्यप्रदेश से ममता नामदेव पूछती हैं-

दालत के आदेशानुसार मेरे पति द्वारा मुझे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की राशि 1500/- रुपए प्रतिमाह पिछले 36 माह से प्रदान की जा रही है। धारा 24 में अन्य अदालत द्वारा 30 माह पूर्व स्वीकृत अंतरिम भरण पोषण की राशि 1200/- रुपए प्रतिमाह बार बार मांगे जाने और अदालत के निर्देशों के बावजूद अभी तक नहीं दी गई है।  पेशी पर मेरे पति के हाजिर ना होने और उन के गवाहों के हाजिर ना होने के कारण मेरे पति का धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम विवाह विच्छेद का मुकदमा परिवार अदालत ने 3 माह पहले खारिज कर दिया है। खारिजी आदेश तथा मुकदमा चलने के दौरान दिए गए खर्चे व भरण पोषण व स्थाई पुनर्भरण के आवेदनों को को मेरे पति द्वारा अनुच्छेद 227 सपठित धारा 24/25/28 हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। मुझे उच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखना है। मैं कोई नौकरी नहीं करती मेरी कोई आय नहीं है।  क्या धारा 24 अंतरिम भरण-पोषण की राशि को धारा 13 के खारिजी आदेश के साथ 32 माह बाद चुनौती दी जा सकती है? कृपया मार्गदर्शन दें।

समाधान-

प के पति ने सभी आदेशों के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत की है। रिट याचिका के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। इस कारण उसे प्रस्तुत किया जा सकता है। हालांकि अत्यधिक देरी कर के प्रस्तुत की गई रिट याचिका को उच्च न्यायालय स्वीकार नहीं करते हैं। इस मामले में 32 माह की देरी अत्यधिक देरी है और रिट याचिका को विचारार्थ भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

कोई भी रिट याचिका तब भी स्वीकार नहीं की जा सकती है जब कि उस मामले में याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो।  परिवार न्यायालय के किसी भी आदेश व निर्णय के विरुद्ध परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत अपील का प्रावधान है। इस तरह आप के मामले में अधिनियम के अंतर्गत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।  किसी भी वैकल्पिक उपाय के उपलब्ध रहते हुए किसी मामले में रिट याचिका स्वीकार्य नहीं हो सकती।  इस के लिए सर्वोच्च न्यायालय का United Bank Of India vs Satyawati Tondon & Ors. के मामले में on 26 July, 2010 को दिया गया निर्णय आप की सहायता कर सकता है। इसे आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकती हैं। 

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