Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

पुलिस अपराध का संज्ञान न ले तो मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करें।

rp_MANREGA-KE-EMPOLYS-PER-LATHI-CHARGE5-300x204.jpgसमस्या-

लेखराज ने जमवारामगढ़ जयपुर, राजस्‍थान से समस्या भेजी है कि-

दिनांक 09/04/2015 को सांय 6 बजे के लगभग पडौसियों से रंजिस के चलते हमारे घर की महिलाओं (एक विकलांग है) व लडकियों पर पडौसियों व उनके साथ के अन्य लोगों द्वारा गंदे गंदे गाली गलौच किए गए तथा मारने पीटने व लज्जा भंग करने की कोशिश की गई। विपक्षी लोगों में पुरूष महिलाएं एवं उनके नाबालिग बच्चे भी शामिल थे तथा लगभग 50-60 लोग थे जबकि हमारे घर पर मेरी दो बहिने, माताजी तथा विकलांग बुआ के अलावा कोई नहीं था। इन लोगों से किसी तरह जान बचाकर वे मकान के अंदर चली गई व अंदर से ताला लगाकर बैठ गई। इसके बावजूद विरोधियों द्वारा मकान की दीवार के सहारे सीढी लगाकर छत के रास्ते से अंदर आने की कोशिश की गई लेकिन मेरी बहिन ने पहले ही छत के रास्ते मकान में अंदर आने वाला गेट बंद कर दिया था जिससे विपक्षी मकान के अंदर आने में कामयाब नहीं हो पाए तथा उन्हों ने गेट को तथा ताले को तोडने की कोशिश की। तब मेरी माताजी ने मेरे पिताजी (जो बाहर रहकर नौकरी करते हैं) को फोन कर सारी बात बताई। मेरे पिताजी ने पुलिस थाने में फोन करके शिकायत की तो पूलिस के आने के कुछ ही समय पहले वे लोग शांत हो गए तथा पुलिस के आते ही ऐसी माहौल बना दिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। रात लगभग 9 बजे जब पुलिस हमारे मकान पर आई तो हमारी माताजी ने उनसे बयान लिखने को कहा तो पुलिस वालों ने उनके बयान लेने से मना कर दिया। उसी समय विपक्षीगण का एक व्यक्ति ने जो राजस्थान पुलिस में नौकरी करता है तथा पुलिस वालों से मिला हुआ था, पुलिस वालों के सामने ही मेरी बहनों व माताजी से गाली गलौच किया तथा मेरी बहनों के अवैध संबंध होने के मिथ्या आरोप लगाए लेकिन तब भी पुलिस ने पीडित पक्ष के बयान दर्ज नहीं किए तथा वापस थाने जाकर एसएचओ व डीएसपी को मेरी माताजी व बहनों द्वारा पुलिस वालों को ही अपशब्द कहने का आरोप लगा दिया। पीड़ित पूरी रात भर मकान के अंदर बंद रहे तथा परेशान एवं घबराए हुए से रहे। सुबह होने पर मेरे पिताजी ने गांव के वरिष्ठ लोगों को फोन कर ताला खुलवाने तथा उन लोगों से बचाकर बाहर निकालने के लिए कहा। तब गांव के 5-7 वरिष्ठ लोगों ने आकर ताला खुलवाया व पीडिताओं को बाहर निकाला। तब विपक्षीलोगों ने गांव वालों के साथ भी अभद्र व्यवहार एवं गाली गलौच किया एवं उनको देख लेने की धमकी दी। पडौसियों से रंजिस के चलते इस तरह की घटना की यह चौथी बार पुनरावृति थी तथा पुलिस के आला अधिकारियों को बार बार शिकायती पत्र लिखने के बावजूद भी उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही तथा ना ही मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। पुलिस वाले इन लोगों से पहले से ही मिले हुए हैं तथा विपक्षीगण के भी कुछ लोग पुलिस सेवा में कार्यरत हैं तथा पुलिस के वरिष्ठ अफसरों व बडी राजनीतिक पार्टी के नेताओं के साथ उनकी अच्छी जान पहचान होने के कारण व राजनीतिक दखल के कारण पुलिस मुकदमा दर्ज करने से बच रही है तथा उन लोगों के खिलाफ कोई एक्श्न नहीं ले रही है और ना ही अभी तक पुलिस द्वारा पीडित पक्ष्‍ के बयान दर्ज किए गए हैं तथा ना ही किसी महिला पुलिसकर्मी को अभी तक जांच के लिए भेजा है। पुलिस से न्याय की उम्मीद न होने के कारण हमने राजस्थान महिला आयोग को इस मामले की शिकायत की। लेकिन महिला आयोग द्वारा भी अभी तक कोई बयान नहीं दर्ज किया गया है और ना ही पुलिस पर कार्यवाही करने का दबाव बनाया जा रहा है। शायद महिला आयोग ने भी राजनीतिक दखल के कारण कोई एक्शन नहीं लिया हो। 1. यदि महिला आयोग या पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज नहीं किया जा रहा हो तो इसकी शिकायत कहां की जा सकती है। 2. इस तरह की घटना की यह चौथी बार पुनरावृति हुई है, तथा इस तरह की भावी घटनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। यदि कभी कोई अनहोनी हो गयी तो वह किसकी जिम्मेदारी होगी जबकि हमारे द्वारा पुलिस के एसएचओं से लेकर डीजीपी तक पत्राचार के माध्यम से एवं व्यक्तिगत रूप से भी कार्यवाही करने और उन लोगों को पाबंद करवाने के लिए अनेक बार निवेदन किया जा चुका है। क्या हम सीधे उच्च न्यानयालय या उच्चदतम न्यायालय की शरण ले सकते हैं। यदि हां तो कृपया पूरी प्रक्रिया बतावें। 4. विपक्षी लोगों द्वारा पुलिस वालों के सामने भी अपशब्द कहे गए लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने बयान दर्ज नहीं किए। क्या इस मामले में पुलिसकर्मी भी दोषी हो सकते हैं तथा उनके खिलाफ भी मुकदमा दायर किया जा सकता है। यदि हां तो कैसे और कहां? 5. राजनीतिक दखल के कारण पुलिस एक्शन नहीं ले रही। पुलिस कार्यप्रणाली से राजनीतिक दखल या पुलिस के ही वरिष्ठ अधिकारियों के दखल को कैसे दूर किया जा सकता है तथा इसकी शिकायत कहां की जावे। 6. पूरे मामले में पीडित पक्ष में महिलाएं है लेकिन इसके बावजूद भी पुलिस थाने द्वारा महिला पुलिसकर्मी को जांच के लिए नहीं भेजा गया। क्या सूचना के अधिकार के तहत इस बात का जवाब मांगा जा सकता है। 7. विपक्षीगण द्वारा मेरी बहनों के अवैध संबंध होने के मिथ्या आरोप पुलिस के सामने लगाए गए हैं जिसका कोई प्रमाण विपक्षीगण के पास नहीं हैं, ऐसे में उनके खिलाफ महिला आयोग के अलावा कहां शिकायत दर्ज की जा सकती है तथा यह किस प्रकारका अपराध कारित होता है। 8. क्या इस तरह के महिला दुराचार से जुडे मामलों की जांच के लिए सीधे उच्चतम या उच्‍च न्यायालय में अपील की जा सकती है। 9. यदि कहीं से भी न्यारय की उम्मीद ना हो तो ऐसे मामलों में महिलाएं अपने स्वयं के स्तर पर अपनी सुरक्षा के लिए क्‍या एक्शन ले सकती हैं जो गैरकानूनी ना हो। 10. क्या मामले में गांव के उन 5-7 लोगों को गवाह बना सकते हैं जिन्होंने सुबह आकर ताला खुलवाया व विपक्षियों के चंगुल से मुक्ता करवाया तथा बाद में विपक्ष ने उनके साथ भी अभद्र व्यहवहार किया। इसके अलावा विपक्षीगण के द्वारा प्रयोग किए गए अपशब्दों तथा मिथ्या आरोपों, जिनकी आडियो रिकार्डिंग हमारे पास है, को भी सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है।

समाधान-

मूह एकत्र कर के गाली गलौच, मारपीट और लज्जा भंग करने का प्रयत्न करना तीनों ही अपराध हैं। पुलिस इस के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर रही है तो आप को चाहिए कि किसी स्थानीय वकील से संपर्क करें और ऐसा कृत्य करने वालों के विरुद्ध सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें वहाँ आप के व गवाहों के बयान कराएँ और ऑडियो रिकार्डिंग की प्रतिलिपि प्रस्तुत करें। मजिस्ट्रेट इस मामले में स्वयं प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्तों के विरुद्ध अभियोजन आरंभ कर सकता है अथवा पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण के लिए आदेश दे सकता है। यदि फिर भी पुलिस कोई आरोप पत्र अभियुक्तों के विरुद्ध प्रस्तुत न करे तो आप न्यायालय में सभी गवाहों के बयान करवा कर तथा सबूत प्रस्तुत कर अभियोजन आरंभ करवा सकते हैं। इस के लिए महिला आयोग, उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय जाने की आवश्यकता नहीं है। जो भी गवाह हैं उन के बयान कराए जा सकते हैं ऑडियो रिकार्डिंग को सबूत के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

पुलिस मिली हुई हो सकती है और उस पर राजनैतिक दबाव भी हो सकता है। यदि आप को लगता है कि इस कारण से पुलिस कार्यवाही करने से बचती है तो आप उच्च न्यायालय में पुलिस, प्रशासन और राज्य सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्च न्यायालय के किसी वकील की सहायता लेनी होगी।

महिला को उस की इच्छा के विरुद्ध बन्दी बनाए जाने पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका बेहतर उपाय है।

तलाकसमस्या-

कल्याण सिंह रावत ने भीम, राजसमँद, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

प्रेमिका को हिन्दू रीति से खून से माँग-भर कर पत्नी मानकर पिछले 15 वर्ष से लिव-इन-रिलेशन में रहा। महिला जो तलाकशुदा मुस्लिम होकर 3 बच्चों की माँ है उसे उस के सगे भाई ने घर में बँधक बना कर रखा हुआ है। पिता का साया तो 34 साल पहले ही उठ गया है अब मैं अपनी इस पत्नी-प्रेमिका को कैसे उसके भाई की कैद से मुक्त करा सकता हूँ। उस का भाई मुझे मारने का दो बार असफल प्रयास कर चुका है और मेरी पत्नी-प्रेमिका को किसी और व्यक्ति को सौंप देना चाहता है। क्योंकि वह महिला केवल मेरे पास साथ रहना चाहती है पर भाई बीच में दीवार बन कर खडा है। क्या मैं 97 के वारँट द्वारा उस की कस्टडी ले सकता हूँ यदि महिला कोर्ट में अपनी सहमति से मेरे साथ रहना चाहती है। यदि उसे वहाँ से आजाद नही कराया गया तो कहीं वह अपनी जीवन लीला ही समाप्त न कर दे। सबूत के तौर पर उस के लिखे खत मैंने सँभाल कर रखे हैं जिस में उसने अपनी चाहत प्यार का इजहार किया गया है और हमारे साथ बिताये लम्होँ की खूबसूरत फोटो भी है ।

समाधान-

धारा 97 दंड प्रक्रिया संहिता में यदि जिला मजिस्ट्रेट, उप खंड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह विश्वास हो जाए कि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में परिरुद्ध है जिन में वह परिरोध अपराध की कोटि में आता है तो वह तलाशी वारंट जारी कर सकता है। और यदि ऐसा व्यक्ति मिल जाए तो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। मजिस्ट्रेट मामले की परिस्थितियों के अनुरूप उचित आदेश पारित कर सकता है। आप के मामले के तथ्यों से ऐसा लगता है कि आप धारा 97 दंड प्रक्रिया संहिता का उपयोग कर सकते हैं।

प की प्रेमिका परिरुद्ध ही नहीं है अपितु बंदी प्रतीत होती है। ऐसी स्थिति में आप उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं और वहाँ से उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश जारी करवा सकते हैं। वह धारा 97 से अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है। बाद में जैसा वह महिला चाहेगी वैसा आदेश दिया जा सकता है।

उच्च न्यायालय में हिन्दी में रिट व अन्य याचिकाएँ …

jabalpur highcourtसमस्या-

चुरहट, मध्यप्रदेश से पूनम सिंह ने पूछा है-

क्या उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका या अन्य कोई आवेदन हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जा सकता है? क्या याचिका को पोस्ट के माध्यम से भेजने पर स्वीकृत हो सकता है।

समाधान-

देश के कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में रिट याचिका या अन्य किसी भी प्रकार की याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में कार्य होता है। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, और झारखंड राज्य भी इन्हीं राज्यों से पृथक हुए हैं इस कारण इन राज्यों के उच्च न्यायालय भी हिन्दी में कार्य होना चाहिए।  आप मध्यप्रदेश से हैं। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में हिन्दी में कार्य होता है वहाँ रिट याचिका या अन्य कोई भी कार्यवाही हिन्दी में संस्थित की जा सकती है।

न्यायालय में संस्थित प्रत्येक मामले में कम से कम दो पक्ष होते हैं और न्यायालय दोनों ही पक्षों को सुन कर अपना निर्णय प्रदान करता है। सुनवाई में दोनों पक्षों का उपस्थित होना अनिवार्य है। इस कारण कोई भी प्रकरण व्यक्तिगत रूप से ही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस से पक्षकार को यह भी ज्ञान रहता है कि उस के द्वारा प्रस्तुत या उस के विरुद्ध प्रस्तुत प्रकरण में क्या कार्यवाही हो रही है। इस कारण डाक से याचिका प्रस्तुत करने का अभी तक कोई प्रावधान नहीं है। हालाँ कि सर्वोच्च न्यायालय में ई-फाइलिंग सुविधा अवश्य प्रदान की गई है।

डाक से भेजी गई याचिका या पत्र के किसी महत्वपूर्ण जनहित से संबद्ध होने पर को याचिका के रूप में स्वीकार करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को है लेकिन यह न्यायालय की इच्छा है कि वे उसे याचिका के रूप में स्वीकार करें या न करें। इस कारण यदि आप किसी मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष ले ही जाना चाहते हैं तो आप को स्वयं ही उपस्थित हो कर, यहाँ तक कि किसी सक्षम वकील के माध्यम से ही उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

प्रथम सूचना रिपोर्ट निरस्त कराने के लिए निगरानी तथा पत्नी को मुक्त कराने हेतु बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत करें

समस्या-

कोटा, राजस्थान से शिवराज सिंह ने पूछा है –

alimonyमेरा विवाह 2009 में रावतभाटा के पास एक गाँव में हुआ। मेरी पत्नी महज पाँचवीं पास है। मैं ऑटो चालक हूँ।  मैं अपने माता-पिता व भाई बहनों से अलग रहता हूँ।  एक ही छत के नीचे अलग कमरे में।  मेरे नाम अलग से गैस कनेक्शन, राशनकार्ड आदि भी हैं। मेरे अभी दो साल की एक बेटी दिव्यांशी है। मेरी पत्नी अजब के गर्भाशय में शिकायत होने पर मैंने 12 जनवरी 2013 को जेके लोन अस्पताल कोटा राजस्थान में अस्पताल अधीक्षक व गायनोलोजिस्ट डॉक्टर आरपी रावत की यूनिट में भर्ती कराया। यहां माइनर ऑपरेशन के बाद जांच प्रयोगशाला में भेजी। 24 जनवरी 2013 को छुट्टी दी। जांच रिपोर्ट में 30 जनवरी 2013 को गर्भाशय केंसर की पुष्टि हुई। लेकिन 24 जनवरी 2013 को ही मेरा साला कोटा स्थित मेरे घर से मुझे भरोसे में लेकर मेरी पत्नी व बेटी को अपने साथ रावतभाटा लेकर चला गया। 4 फरवरी 2013 को अचानक मेरी पत्नी की तबीयत खराब हुई और उसे रावतभाटा में ही एक निजी डॉक्टर को दिखाया।  बाद में उसी रात को बेहोशी की हालत में उसे कोटा ले आए।  मैं भीलवाडा था तो मेरे परिजन पत्नी को संभालने पहुँचे। मेरा साला व अन्य परिजन साथ थे। सभी रात को ही मेरी पत्नी को डॉक्टर आरपी रावत के घर ले गए। यहां डॉक्टर ने जेके लोन रेफर कर दिया। लेकिन मेरा साला व अन्य परिजन सरकारी अस्पताल न जाकर मेरे भाई को चकमा देकर अन्यत्र अस्पताल लेकर चले गए। मेरे घर वाले काफी तलाश करते रहे। उनके मोबाइल पर कई दफा कॉल व एसएमएस किए लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। बाद में पता चला कि कोटा में ही श्रीनाथपुरम स्थित जैन सर्जिकल अस्पताल में ले गए थे और यहां 5 अप्रैल 2013 को गर्भाशय निकाल दिया। इस में डॉक्टर ने पति होने के नाते मेरी सलाह तक नहीं लीं।  18 अप्रैल 2013 को मैंने महावीर नगर थाने में मामले की रिपोर्ट दर्ज करवाई। पुलिस अभी जांच में जुटी हुई है। इस दरमियान न तो मुझे और न मेरे परिवार वालों को मेरी पत्नी से मेरे ससुराल वालों ने मिलने दिया। मेरी पत्नी का जैन सर्जिकल व एक अन्य अस्पताल में उपचार करवाया, ऐसा मुझे पता चला है। लेकिन उस की हालत बेहद नाजुक है। अभी उसे गांव में ही छोड़ रखा है। पता नहीं दवा गोली भी दे रहे हैं या नहीं। मेरी बेटी को भी मुझ से नहीं मिलने देते। मैंने प्रयास भी किया लेकिन मेरे साले ने मुझे जान से मारने की धमकी दी है। अब यानी 1 मई 2013 को मेरे ससुर तेजीसिंह ने मेरे व मेरे परिवार के खिलाफ जरिए इस्तगासा धारा 498 ए, 406, 313, 323, 314, के तहत रावतभाटा पुलिस स्टेशन में मुकदमा दर्ज करवा दिया है।  इस्तगासे में जिन सात बिंदुओं को आधार बनाया गया है वो सभी असत्य व मनगढ़न्त कहानी पर आधारित हैं। जो निष्पक्ष जांच में झूठे साबित होंगे। लेकिन फिलहाल मैं और मेरा परिवार काफी मानसिक टेंशन के दौर से गुजर रहा है। मेरे पिता गाँव में रहते हैं और किसान हैं। मेरे दो छोटी बहनें व एक भाई है जो अविवाहित है। इस मुकदमें की खबर से हमारी समाज में काफी बदनामी हो रही है। और भविष्य में मेरे भाई बहनों के रिश्ते होने में परेशानी बन सकती है। मैं चाहता हूं कि मेरी पत्नी व बेटी और मेरे ससुर व साले के चंगुल से निकले और हमेशा मेरे साथ रहे। ताकि मैं मेरी पत्नी का इलाज करवा सकूँ और बेटी की ठीक से परवरिश कर सकूँ। लेकिन मेरे ससुराल वाले मेरी जिंदगी को पता नहीं क्यों बरबाद करने में तुले हैं। समझाइश के काफी जतन किए लेकिन वो नहीं मान रहे। आप ही मुझे मेहरबानी करके कोई ऐसा कानूनी उपाय बताएं जिससे मेरे परिवार की खुशियाँ फिर से लौट आएँ। मेरा तो यहीं कहना है कि अगर मैं दोषी पाया जाता हूँ तो मुझे कठोर सजा मिले।  लेकिन अगर निर्दोश साबित होता हूँ तो मेरे व मेरे परिवार के खिलाफ शड़यंत्र रचने वालों के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो। ताकि महिलाओं के संरक्षण के लिए बने कानूनों का कोई भी व्यक्ति गलत उपयोग न करें।

समाधान –

प के मामले में या तो आप के ससुराल वालों को कुछ गलतफहमियाँ हैं या फिर उन की कोई बदनियती है। यदि आप के विरुद्ध रावतभाटा पुलिस स्टेशन ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज ली है तो आप को तुरन्त उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त करने के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष 482 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत रिवीजन याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए।

प की समस्या के तथ्यों से पता लगता है कि आप की पत्नी को उस के मायके वालों ने ही बंदी बना रखा है जो उस के स्वयं के हित में नहीं है।  आप को अपनी पत्नी को उस के मायके वालों से मुक्त कराने लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करनी चाहिए।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत करना ही श्रेयस्कर होगा।

समस्या-

मैं ने विशेष विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत अन्तर्जातीय विवाह किया है।  मेरी शादी को एक वर्ष हो चुका है।  मैं सरकारी नौकरी में हूँ और मेरी पत्नी पढ़ाई कर रही है।  शादी के दस माह बाद जब मेरी पत्नी अपने घर गई तो उस के बाद से उस के पिता और उस के घर वाले उसे मुझ से नहीं मिलने देते हैं और न ही बात करने देते हैं।  उसे कालेज भी नहीं जाने दे रहे हैं।  जिस से उस की एमबीबीएस की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है।  उन्हों ने मेरी पत्नी से न्यायालय में परिवाद दर्ज करवा दिया है कि मेरी शादी जबरन डरा धमका कर की गई थी।  इस पर मैं ने परिवार न्यायालय में दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।  लेकिन मुझे अब यह विश्वास नहीं रहा है कि वह मेरे पक्ष में बयान देगी।  मुझे यह भी लगता है कि उस ने जो परिवाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहाँ दर्ज करवाया है वह दबाव में लिखवाया गया होगा।  अब मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं उच्च न्यायालय में बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर सकता हूँ? क्या इस से मेरी नौकरीपर आँच आएगी?

-राम पाल सिंह, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प का प्रश्न गफ़लत पैदा कर रहा है।  आप ने कहा है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विशेष विवाह किया है।  यह सही नहीं है। विशेष विवाह केवल विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत जिला विवाह पंजीयक के समक्ष जो कि आम तौर पर जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर होता है, संपन्न होता है।  इस का पंजीयन होता है और विवाह का प्रमाण पत्र प्राप्त होता है।  यह हिन्दू विवाह नहीं होता। खैर आप ने कोई विवाह किया हो उस का कोई न कोई प्रमाण पत्र तो आप के पास अवश्य होगा जो कि विवाह को प्रमाणित कर सके।  आप का कहना है कि आप की पत्नी स्वैच्छा से अपने मायके गई और फिर नहीं लौटी।  उस ने यह मुकदमा किया है कि आप ने उसे डरा-धमका कर यह विवाह संपन्न कराया है।  उस के द्वारा यह कहना भी इस बात का प्रमाण है कि आप दोनों का विवाह हुआ है।  इस बात को साबित करने का दायित्व आप की पत्नी का है कि उस का विवाह डरा-धमका कर दबाव से किया गया।

प ने पहले ही धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है।  लेकिन यदि आप का विवाह विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत हुआ है तो यह आवेदन पोषणीय नहीं है और निरस्त हो जाएगा।   दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आप को विशेष अधिनियम की धारा 22 के अन्तर्गत यह आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए था।  लेकिन यदि आप का विवाह एक हिन्दू विवाह है तो आप का आवेदन सही है।  परन्तु आप ने इस आवेदन के माध्यम से यह अवश्य ही प्रकट कर दिया है कि आप की पत्नी स्वैच्छा से ही आप के पास नहीं आ रही है।

दि आप को विश्वास हो कि आप की पत्नी को जबरन रोका गया है और आप के विरुद्ध जबरन ही मुकदमा दर्ज करवाया गया है तो आप ऐसा कर सकते हैं।  आप का ऐसा सोचना गलत भी प्रतीत नहीं होता।  क्यों कि आप की पत्नी को जबरन नहीं रोका गया होता तो वह अवश्य ही अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई का नुकसान नहीं करती।  मेरे विचार में आप को बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर देनी चाहिए।  इस से आप के मामले के बहुत से तथ्य स्पष्ट हो जाएंगे।  या तो इस के माध्यम से आप को राहत प्राप्त हो जाएगी और या फिर समस्या की तस्वीर को स्पष्ट देखने के बीच जो बादल छाए हुए हैं वे छँट जाएंगे।  यह एक पारिवारिक विवाद है और इस विवाद से आप की नौकरी पर कोई आँच तब तक नहीं आएगी। जब तक कि आप की किसी अपराधिक मामले में गिरफ्तारी नहीं हो जाती है और आप 24 घंटों से अधिक हिरासत में नहीं रहते हैं।  फिर भी आप को केवल सेवा से निलंबित किया जा सकता है सेवा से हटाया नहीं जा सकता।

परिरुद्ध पत्नी को छुड़ाने के लिए धारा 97 दं.प्र.सं. में आवेदन करें या बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत करें

समस्या-

मेरी शादी अंतर्जातीय है, मेरी शादी को दस माह हो गए हैं। मेरी पत् पढ़ाई करती है और मैं नौकरी करता हूँ। मैं ने कोर्ट मैरिज की है। शादी के दस महिने बाद जब मेरी पत्नी घर गई और शादी के बारे में बताया तो वो इस शादी को मानने के ले तैयार नहीं हुए और मेरे से बात होना भी बंद हो गई। मेरी पत्नी ने कोर्ट में सन्हा दर्ज की वो शादीशुदा नहीं है और मेरे ऊपर लगाया गया कि मैंने उसे जबर्दस्ती कोर्ट मैरिज किया मैं ने सामाजिक प्रयास किया कि मेरा पत्नी से बात कराई जाए। पर वो नहीं हो पाया साथ में उसे कहीं हटा कर रख दिया गया है। अब मैं क्या करूँ।

-सत्यप्रकाश, बेगूसराय, बिहार

समाधान-

प ने यह तो बताया है कि आप ने कोर्ट मैरिज की है, लेकिन यह नहीं बताया कि कोर्ट मैरिज से आप का क्या तात्पर्य है।  अनेक बार स्त्री-पुरुष न्यायालय परिसर में उपस्थित हो कर नोटेरी पब्लिक के यहाँ एक दूसरे को पति-पत्नी मान कर साथ रहने के शपथ पत्र व अनुबंध तस्दीक करवाते हैं और यह समझ बैठते हैं कि उन की कोर्ट मैरिज हो गई है। यदि ऐसा है तो यह किसी भी प्रकार से विवाह नहीं है। इसे अधिक से अधिक लिव-इन-रिलेशन का अनुबंध माना जा सकता है। कोर्ट मैरिज जिसे वैध विवाह की संज्ञा दी जा सकती है वह जिला विवाह पंजीयक के यहां विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह करने का नोटिस दाखिल करने पर तथा ऐसा नोटिस दाखिल करने के 30 दिन के उपरान्त पंजीयक के समक्ष उपस्थित हो कर विवाह पंजीकृत कराने पर संपन्न होता है। विवाह पंजीयक इस के लिए पति-पत्नी को विवाह का प्रमाण पत्र जारी करता है। इस विवाह का अभिलेख विवाह पंजीयक के यहाँ सदैव मौजूद रहता है। इस तरह के विवाह को दबाव से किया गया विवाह नहीं माना जा सकता है। यदि आप का विवाह विवाह पंजीयक के यहाँ संपन्न हुआ है तो वह एक वैध विवाह है और उसे दबाव के द्वारा किया गया विवाह नहीं कहा जा सकता है।

प की पत्नी को उस के मायके के परिवार वाले नहीं आने दे रहे हैं और आप को विश्वास है कि उसे जबरन उस की इच्छा के विरुद्ध रोका गया है तो यह एक अपराध है। यदि किसी व्यक्ति को जबरन उस की इच्छा के विरुद्ध रोका जाता है जो कि एक अपराध है तो उस के लिए जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट अथवा प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 97 के अंतर्गत तलाशी-वारण्ट जारी कर सकता है और उस व्यक्ति को उस के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। ऐसा व्यक्ति मिल जाने पर तथा मजिस्ट्रेट के समक्ष लाए जाने पर मजिस्ट्रेट उस के बयान ले कर उसे स्वतंत्र करने का अथवा किसी के संरक्षण में देने का आदेश दे सकता है। धारा-97 दंड प्रक्रिया संहिता निम्न प्रकार है –

97. सदोष परिरुद्ध व्यक्तियों के लिए तलाशी – यदि किसी जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण हो कि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में परिरुद्ध है, जिस में वह परिरोध अपराध की कोटि में आता है, तो वह तलाशी-वारण्ट जारी कर सकता है और वह व्यक्ति जिस को ऐसा वारण्ट निर्दिष्ट किया जाता है, ऐसे परिरुद्ध व्यक्ति के लिए तलाशी ले सकता है और ऐसी तलाशी तदनुसारी ही ली जाएगी और यदि वह व्यक्ति मिल जाए तो उसे तुरन्त मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाएगा, जो ऐसा आदेश करेगा जैसा उस मामले की परिस्थितियों में उचित प्रतीत हो।

प किसी अच्छे वकील की सहायता से उक्त उपबंध के अंतर्गत आप की पत्नी को मजिस्ट्रेट के समक्ष लाए जाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और इस से आप की समस्या हल हो सकती है।

दि आप समझते हैं कि आप की पत्नी को कहीं गायब कर दिया गया है और आप को तथा आप की पत्नी की सुरक्षा को खतरा है तो आप उच्च न्यायालय के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर अपनी पत्नी को मुक्त कराने तथा आप दोनों को संरक्षण प्रदान करने की प्रार्थना कर सकते हैं। इस याचिका पर उच्च न्यायालय पुलिस को आप की पत्नी को तलाश कर के न्य़ायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की रिटें जारी करने की अधिकारिता : भारत में विधि का इतिहास-95

भारत के सर्वोच्च न्यायालय को उस की अपीलीय और आरंभिक अधिकारिता के अतिरिक्त संविधान में नागरिकों को प्रदत्त मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उचित कार्यवाहियाँ करने की अधिकारिता संविधान के अनुच्छेद 32 द्वारा प्रदत्त की गई है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि संविधान के खंड (3) में प्रदत्त अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उचित कार्यवाहियाँ संस्थित करने के अधिकार की गारंटी दी जाती है। इसी अनुच्छेद के दूसरे चरण में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के भाग-3 में उपबंधित अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए निर्देश और आदेश जारी करने का अधिकार है और वह बंदीप्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा में से जो भी उचित हो उसी प्रकृति की रिट जारी कर सकता है। 
नुच्छेद 32 के द्वारा मूल अधिकारों का प्रवर्तन कराने के अधिकार संविधान द्वारा जो गारंटी दी गई है उसे इस संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रकार से निलंबित नहीं किया जा सकता है।
नुच्छेद 139 के  में संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न किसी अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिटें जारी करने की अधिकारिता प्रदान कर सकती है।

मकान निर्माण में पुलिस के गैरकानूनी हस्तक्षेप के लिए क्या किया जाए?


राम कुमार मिश्रा पूछते हैं-
क भूखंड को ग्राम पंचायत ने पक्षकारों की सहमति से विभाजित कर दिया उस के उपरांत उस पर 1982 में बाउंड्रीवाल निर्मित कर ली गई। 1998 में पड़ौसी ने मेरे विरुद्ध एक मुकदमा किया जिस में पंचायत द्वारा स्वीकृत विभाजन का उल्लेख नहीं किया। अब 01.12.2009 को जब मैं ने अपने भूखंड़ पर मकान बनाना आरंभ किया तो वह अदालत से स्थगन आदेश ले आया और मेरे द्वारा कराया जा रहा निर्माण कार्य रुकवा दिया। मैं ने अदालत में स्टे आवेदन का उत्तर दिया और निर्माण कार्य चालू कर दिया। अब अदालत का आदेश मेरे पक्ष में हैं कि मैं निर्माण कार्य चालू रख सकता हूँ। लेकिन पुलिस मेरे पड़ौसी की शिकायत पर बार बार आ कर काम रुकवा देती है। मैं अनेक बार पुलिस को बता चुका हूँ कि लेकिन पुलिस मेरी नहीं सुनती और कहती है कि विपक्षी पक्षकार को आप के निर्माण पर आपत्ति है इस कारण से आप निर्माण नहीं कर सकते। मुझे क्या करना चाहिए?

 उत्तर-

रामं कुमार जी,

प के पड़ौसी ने जो स्थगन आदेश अदालत से प्राप्त किया था वह निरस्त हो चुका है, अर्थात अब आप वहाँ निर्माण कर सकते हैं। लेकिन पुलिस बार बार आ कर आप का निर्माण रुकवा देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत के आदेश में कुछ अस्पष्टता है। दोनों आदेशों को देखे बिना कुछ भी कह पाना उचित नहीं है। फिर भी यदि आप के विरुद्ध कोई स्थगन आदेश नहीं है और पुलिस फिर भी दखल देती है तो इस के लिए आप जिस अदालत में स्थगन की कार्यवाही चल रही है वहाँ आवेदन प्रस्तुत कर के अदालत से स्पष्ट आदेश प्राप्त कर सकते हैं। 
स के अतिरिक्त स्थानीय पुलिस के इस अवैधानिक और अनुचित हस्तक्षेप के विरुद्ध क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक को शिकायत कर सकते हैं। यदि इस से भी काम न चले और आप समझते हैं कि पुलिस का हस्तक्षेप नाजायज है तो आप अपने वकील के माध्यम से पुलिस थाना इंचार्ज,  पुलिस अधीक्षक और जिले के कलेक्टर को एक नोटिस दिलवाएँ जिस में लिखें कि पुलिस का गैर कानूनी हस्तक्षेप जारी रहा तो आप हाईकोर्ट में रिट याचिका प्रस्तुत करेंगे। यदि फिर भी काम न बने तो आप रिटयाचिका दायर कर दें। अच्छा यह होगा कि जो वकील आप के मामले देख रहा है, उस की या फिर किसी वरिष्ठ वकील को सब दस्तावेज दिखा कर उन की राय से आगे के कदम उठाएँ।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada