तीसरा खंबा

गोत्र का क्या कोई कानूनी महत्व है?

 हृषिकेश भाई ने पुनः एक प्रश्न प्रस्तुत किया है-

पकी द्वारा दी गई कानूनी सलाह से मेरी जिंदगी में एक सकून सा आया है, मेरा और मेरे परिवार का आपको हार्दिक धन्यवाद। आशा करता हूँ कि मेरी एक और जिज्ञासा का समाधान करने कि कृपा करेंगे। मै जिन मातृश्री के गोद गया था मेरी बेहद कोशिश करने के बावजूद मै उनका गोत्र (surname) आज तक नही जान सका। क्या मै अपने पूर्व परिवार का गोत्र प्रयोग में ले सकता हूँ। सरकारी दस्तावेज मै मैंने अपने गोत्र का कही भी उल्लेख नहीं किया है। कानून गोत्र (surname) के बारे मै क्या कहता है क्योंकि बहुत से सरनेम किसी ख़ास स्थान से संबंधित होते है जैसे रोहतक के रहने वाले रोहतकिया, नहर के पास रहे वाले नेहरू भिंडर के रहने वाले भिंढरावाले आदि आदि उम्मीद है आपकी बहुमूल्य सलाह पढ़ने को मिलेगी।
 उत्तर- 

हृषिकेश भाई,
प का प्रश्न बहुत सामयिक है। इन दिनों गोत्र शब्द की बहुत चर्चा है। इस ने समाज में बड़े झगड़े भी उत्पन्न किए हैं। यह कब से प्रचलन में है इसे ठीक से नहीं कहा जा सकता। संस्कृत में यह शब्द नहीं मिलता है। वहाँ गोष्ठ शब्द तो मिलता है जो कि गोत्र का समानार्थक है। शब्दों का सफर  ब्लॉग और इसी नाम से प्रकाशित हो रही पुस्तक श्रृंखला के लेखक अजित वडनेरकर गोत्र के संबंध में लिखते हैं –
“जातिवादी सामाजिक व्यवस्था की खासियत ही यही रही कि इसमें हर समूह को एक खास पहचान मिली। हिन्दुओं में गोत्र होता है जो किसी समूह के प्रवर्तक अथवा प्रमुख व्यक्ति के नाम पर चलता है। सामान्य रूप से गोत्र का मतलब कुल अथवा वंश परंपरा से है। गोत्र कोबहिर्विवाही समूह माना जाता है अर्थात ऐसा समूह जिससे दूसरे परिवार का रक्त संबंध न हो अर्थात एक गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते पर दूसरे गोत्र में विवाह कर सकते, जबकि जाति एक अन्तर्विवाही समूह है यानी एक जाति के लोग समूह से बाहर विवाह संबंध नहीं कर सकते। गोत्र मातृवंशीय भी हो सकता है और पितृवंशीय भी। ज़रूरी नहीं कि गोत्र किसी आदिपुरुष के नाम से चले। जनजातियों में विशिष्ट चिह्नों से भी गोत्र तय होते हैं जो वनस्पतियों से लेकर पशु-पक्षी तक हो सकते हैं। शेर, मगर, सूर्य, मछली, पीपल, बबूल आदि इसमें शामिल हैं। यह परम्परा आर्यों में भी रही है। हालांकि गोत्र प्रणाली काफी जटिल है पर उसे समझने के लिए ये मिसालें सहायक हो सकती हैं।देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लोकायत में लिखते हैं कि कोई ब्राह्मणकश्यप गोत्र का है और यह नाम कछुए अथवा कच्छप से बना है। इसका अर्थ यह हुआ कि कश्यप गोत्र के सभी सदस्य एक ही मूल पूर्वज के वंशज हैं जो कश्यप था। इस गोत्र के ब्राह्मण के लिए दो बातें निषिद्ध हैं। एक तो उसे कभी कछुए का मांस नहीं खाना चाहिए और दूसरे उसे कश्यप गोत्र में विवाह नहीं करना चाहिए। आज समाज में विवाह के नाम पर आनर किलिंग का प्रचलन बढ़ रहा है उसके मूल में गोत्र संबंधी यही बहिर्विवाह संबंधी धारणा है।

यह जानना दिलचस्प होगा कि आज जिस गोत्र का संबंध जाति-वंश-कुल से जुड़ रहा है, सदियों पहले यह इस रूप में प्रचलित नहीं था। गोत्र तब था गोशाला या ग