तीसरा खंबा

जॉन शोर ने न्यायशुल्क में और वृद्धि की : भारत में विधि का इतिहास-52

जॉन शोर के 1795 के उपायों से भी अदालतों में दीवानी मामलों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आई। उस ने 1797 में पुनः न्यायालय शुल्क में वृद्धि कर दी। ये दरें 1795 में लागू की गई दरों से अधिक थीं, लेकिन लॉर्ड कॉर्नवलिस द्वारा न्यायालय शुल्क को समाप्त किए जाने के समय प्रचलित दरों से कम थीं। इस के अतिरिक्त साक्षी को न्यायालय में समन करने और अपील दाखिल करने के लिए भी अतिरिक्त शुल्कों का प्रावधान किया गया।  न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने वाले आवेदनों, वादों आदि के लिए स्टाम्प युक्त विशेष कागज का प्रयोग करना आवश्यक कर दिया गया। 
जॉन शोर ने अब तक प्रचलित अपील व्यवस्था में भी परिवर्तन किए। अब तक जिला दीवानी अदालतों द्वारा निर्णीत सभी मामलों की अपीलें प्रान्तीय न्यायालय में और  प्रान्तीय न्यायालयों द्वारा निर्णीत 1000 रुपए से अधिक मूल्य के मामलों में सदर दीवानी अदालत में अपील की जा सकती थी। जॉन शोर ने 5000 रुपए मूल्य तक के धन व व्यक्तिगत संपत्ति संबंधी मामलों में प्रान्तीय न्यायालयों के निर्णयों को आबद्धकर बना दिया। अब केवल इस से अधिक मूल्य के मामलों में सदर दीवानी अदालत को अपील की जा सकती थी। सदर दीवानी अदालत के 5000 पाउंड से अधिक मूल्य के निर्णयों के विरुद्ध अपील निर्णय की तिथि से छह माह की अवधि में किंग इन कौंसिल को की जा सकती थी।
जॉन शोर को अपने पूर्ववर्ती गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवलिस के साथ काम करने का अवसर मिला था जिस से प्राप्त अनुभव के आधार पर उस ने उसी न्यायिक व्यवस्था को और आगे विकसित करने का प्रयत्न किया था। उस ने जो परिवर्तन किए वे केवल मुकदमेबाजी की प्रवृति पर अंकुश लगाने के लिए ही किए गए थे। हालांकि उस के द्वारा न्यायालय शुल्क में वृद्धि किए जाने के लिए उस की तीखी आलोचना करते हुए कहा जाता है कि उस ने लॉर्ड कार्नवलिस की प्रगतिशील नीतियों को पीछे धकेल दिया। लेकिन इस संदर्भ में यह भी देखा जाना आवश्यक है कि शुल्क समाप्ति से न्यायालयों में मुकदमों में तो वृद्धि होनी ही थी। लेकिन इस के साथ ही अदालतों की संख्या इतनी होनी चाहिए थी कि प्रस्तुत होने वाले मुकदमों को न्यूनतम समय में निर्णीत किया जा सके। भारतीय आलोचकों को तो इस मामले में यह भी देखना चाहिए कि भारत के आजाद होने के साठ वर्ष बाद भी यहाँ कि जनतांत्रिक सरकार न्यायशुल्क से न्यायार्थियों को मुक्त नहीं कर सकी है। यहाँ तक कि हाल ही में विभिन्न राज्यों ने वृद्धि ही की है।
  तीसरा खंबा के सभी पाठकों को होली पर रंगभरी  
शुभकामनाएँ!
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