Archive for February 10th, 2019

समस्या-

संतपाल वर्मा ने मखदुमपुर, गोमती नगर विस्तार, लखनऊ से पूछा है-

हमारे पिताजी से किसी व्यक्ति (क) ने धोखे से पॉवर ऑफ अटॉर्नी वर्ष 1994 में करवा ली। और उसने वर्ष 1995 में तीसरे व्यक्ति के नाम विक्रय करने का एग्रीमेंट (बिना रजिस्ट्री के) निष्पादित कर दिया। जब हमारे पिताजी को इस मामले का पता चला तो उन्होंने वर्ष 1998 में पॉवर ऑफ अटॉर्नी निरस्त करवा दी। अब उन्होंने उसी निरस्त पॉवर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर 2018 में रजिस्ट्रार विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी रजिस्ट्री करवा ली। हमने यह शिकायत पुलिस थाना में की पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है, कृपया हमें बताए हम अब क्या करें।

समाधान-

आप के पिताजी को चाहिए कि वे जिस उप पंजीयक ने यह विक्रय पत्र पंजीकृत किया है उस के उप महानिरीक्षक पंजीयन को आवेदन दें कि उक्त विक्रय पत्र निरस्त पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से कराई गयी है इस कारण उसे निरस्त किया जाए।

आप के पिताजी को यह भी करना चाहिए कि पुलिस ने जिस शिकायत पर कार्यवाही नहीं की है उस शिकायत को पूरा लिखते हुए एस पी को एक आवेदन रजि. ए.डी. डाक से भेज दें। उसी दिन या एक दो दिनों में संभव हो तो एस.पी. से मिल कर भी सारी बात उन्हें बताएँ। फिर भी एस.पी. कार्यवाही न करे तो न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वयं परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156(3) में संबंधित पुलिस थाने को अन्वेषण के लिए भिजवाएँ।

आप के पिताजी को तीसरा और अंतिम काम यह करना चाहिए कि पंजीकृत विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी अदालत में वाद प्रस्तुत करें और उसे निरस्त घोषित करने की डिक्री प्राप्त करें।

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