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बहुत आसान है झूठ से किसी का अपमान और बदनामी करना।

defamationसमस्या-

अंकित राय ने तहसील मुंगावली, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

म लोग किसान हैं। मेरे पिताजी अपने खेत पर पानी के लिए दिनांक 26/05/2015 को कुआ खुदवा रहे थे को। हमारा एक पड़ोसी है ओर वह लोकल पत्रकार है। उसने तहसील को अवैध उत्खनन करने की झूठी शिकायत कर दी। जिस के चलते एसडीएम ने कार्यवाही की तो उस पत्रकार ने वहाँ के लोकल न्यूज़ पेपर मे झूठी घटना को बड़ा चड़ा कर छापा है। जब कि जो खबर पेपर मे छपी है। वैसा कुछ भी नहीं है। और मेरे पास इस के सत्यापित दस्तावेज भी हैं और जिस दिन जो खबर पेपर मे छपी थी उस दिन का पेपर भी मेरे पास है। यदि मै उस पत्रकार के खिलाफ कोर्ट में एक आबेदन दूँ। जो खबर छपी है वह झूठी है। तो उस पत्रकार के खिलाफ कोर्ट की तरफ से एक्शन होगा?

समाधान-

खबारों में रोज ही अनेक मिथ्या खबरें छपती हैं और कोई कार्यवाही नहीं होती। अगले दिन फिर कुछ खबरें झूठी छप जाती हैं। यदि अदालतें इस के खिलाफ कार्यवाही करने लगतीं तो अखबारों के लिए इस तरह की झूठी खबरें छापना आसान नहीं होता। यदि आप समझते हैं कि इस झूठी खबर से आप का अपमान हुआ है और आप की बदनामी हुई है तो आप उस इलाके के थाने पर क्षेत्राधिकार रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपने अपमान और बदनामी के लिए परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं क्यों कि किसी व्यक्ति का अपमान करना और मिथ्या बदनामी करना अपराध है जो धारा 500 आईपीसी के अंतर्गत दंडनीय है।

लेकिन यह एक संज्ञेय अपराध नहीं है जिस पर पुलिस स्वयं कार्यवाही कर सकती हो। इस के लिए आप को स्वयं न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करना होगा। अपने और गवाहों के बयान कराने होंगे। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि प्रसंज्ञान लेने लायक मामला है तो वह प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्तों के विरुद्ध समन जारी करेगा। उस के बाद सुनवाई हो कर यदि पाया गया कि आप द्वारा लगाया गया आरोप सिद्ध होता है तो अभियुक्तों को दोष सिद्ध पाया जाने पर उन्हें दंडित किया जा सकता है।

ब तक न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान नहीं लिया जाता है तब तक अभियुक्त न्यायालय में नहीं आएंगे। लेकिन आप को तो मुकदमे का जब तक निपटारा नहीं होता न्यायालय में हर पेशी पर उपस्थित होना पड़ेगा। यदि आप किसी पेशी पर उपस्थित होने की स्थिति में नहीं हैं तो अपने वकील से उपस्थिति को माफ करवाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कराना होगा। यह प्रक्रिया परिवादी के लिए इतनी तकलीफदेह है कि अक्सर लोग इस तरह का परिवाद ही नहीं करते। यही कारण है कि इस तरह झूठ फैला कर किसी का भी अपमान करना, बदनामी करना आसान हो गया है।

प चाहते हैं कि इस मामले में कार्यवाही की जाए तो आप पहले अखबार के संपादक, प्रकाशक और मुद्रक को नोटिस दें कि उन्हों ने गलत खबर छापी है जिस से आप अपमानित हुए हैं और आपकी बदनामी हुई है। यदि वे इस खबर का स्पष्टीकरण प्रकाशित करते हैं और आप को उचित प्रकार से क्षतिपूर्ति अदा करते हैं तो ठीक अन्यथा आप फौजदारी और दीवानी कार्यवाही करेंगे। इस नोटिस का समय गुजरने तक भी यदि अखबार आप को उचित प्रकार से संतुष्ट नहीं करते हैं तो आप ऐसा परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय को प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के साथ ही आप अपने अपमान और बदनामी करने के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद भी कर सकते हैं। लेकिन दीवानी वाद में आप जितनी क्षतिपूर्ति मांगेंगे उस के हिसाब से आप को न्यायालय की फीस भी अदा करनी होगी।

राष्ट्रध्वज का अपमान करने के आरोप में अभियुक्तों की जमानत होना असामान्य नहीं।

Independence-Dayसमस्या-

भानु प्रताप सिंह डांगी ने मुंगावली, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं पेशे से एक पत्रकार हूं। 15 अगस्त के रात्रि करीब 8:45 प्राथमिक विद्यालय मुंगावली पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था। जिस की मेरे एवं मेरे एक पत्रकार साथी के द्वारा मौके पर जाकर विडियो रिकार्डिंग की गई। जिस के बाद कुछ असामाजिक लोगों के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को गलत तरीके से निकाला गया और उसे वहां से ले गये। मेरे साथ उनका झगड़ा भी हुआ जिस की मैंने विधिवत एफआईआर भी थाने में कराई। पुलिस द्वारा उक्त लोगों के खिलाफ धारा 323, 294, 341, 452, 506 एवं 34 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया और बाद में गवाहों के कथन लेकर प्रकरण में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 की धारा 2 का इजाफा किया गया। परंतु न्यायालय में जब उक्त आरोपियों का जमानत आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया। मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए कि यह उक्त व्यक्ति स्कूल के न तो शिक्षक हैं और न ही इनका स्कूल से कोई संबंध है इस से इन पर यह धारा लागू नहीं होती है,जमानत दे दी। मैं इस संबंध में जानना चाहता हूँ कि अब मुझे उक्त प्रकरण में क्या करना चाहिए?

समाधान

प ने यहाँ राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 का उल्लेख किया है। इस धारा के अन्तर्गत तीन वर्ष के कारावास या जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान है। इस धारा को जमानतीय घोषित नहीं किया गया है इस कारण से यह धारा अपराध अजमानतीय है। अजमानतीय होने के कारण इस धारा के अन्तर्गत अभियुक्त को गिरफ्तार कर के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है। पुलिस इस मामले में अन्वेषण कर के आरोप पत्र मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करती है और आरोप पर अभियुक्त का विचारण होता है। पुलिस का कर्तव्य इतना ही है, जो उस ने पूरा किया है। आप ने यह नहीं बताया कि इस मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत हुआ है अथवा नहीं।

हाँ तक जमानत का प्रश्न है तो तीन वर्ष से अनधिक कारावास का दंड होने के कारण उस की जमानत लिया जाना सामान्य प्रक्रिया है। जमानत आवेदन में मजिस्ट्रेट ने क्या लिखा है और क्या नहीं लिखा है इस से बहुत अन्तर नहीं पड़ता है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि मजिस्ट्रेट ने ऐसा आदेश दिया होगा जो आपने लिखा है। आप ने जो लिखा है उस के अनुसार मजिसट्रेट ने निश्चयात्मक रूप से यह लिखा है कि यह धारा संबंधित अभियुक्तों पर लागू नहीं होती। किसी भी जमानत के आदेश में इस तरह की निश्चयात्मक भाषा नहीं लिखी जाती है। क्यों कि यह निश्चय तो अभी न्यायालय को विचारण के दौरान आई साक्ष्य के आधार पर दिया जाना है।

प का काम पुलिस को सूचित कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराना था, वह आप करा चुके हैं। आरोप पत्र पुलिस ने प्रस्तुत कर दिया है तो उस की व सभी संलग्न दस्तावेजात की प्रतिलिपियाँ आप न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर प्राप्त कर सकते हैं। उन का अध्ययन कीजिए तथा अपने किसी मित्र वकील से कराइए। यदि आप को लगता है कि पुलिस ने बचाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य एकत्र नहीं की है तो तथ्य को आप एक आवेदन के माध्यम से न्यायालय को अवगत करवा सकते हैं। आप इस बात का ध्यान रखें कि विचारण के दौरान गवाह सच्चा बयान दें और पुलिस को दिए गए अपने बयान से न बदलें। आप अपना बयान तो सही दे ही सकते हैं। यदि न्यायालय के समक्ष साक्ष्य से यह प्रमाणित हुआ कि वास्तव में अपराध किया गया है तो अभियुक्तों को दोष सिद्ध हो जाएंगे और उन्हे दंडित किया जा सकता है। लेकिन यदि अपराध साबित नहीं हो सका तो वे दोष मुक्त भी हो सकते हैं।

दि आप को लगता है कि पुलिस और अभियोजन पक्ष अपनी ड्यूटी पूरी तरह नहीं कर रहे हैं तो आप के लिए यह एक समाचार होगा आप एक पत्रकार की हैसियत से उस समाचार को प्रकाशित करवा सकते हैं।

सामाजिक समस्या से सामाजिक रूप से ही निपटना होगा।

domestic quarrelसमस्या-

सुमित कुमार ने अम्बाला (हरियाणा) से समस्या भेजी है कि-

मैं ने अपनी मर्जी से क़ानूनी तौर पर शादी की है।  हम उँची जाति के है और मेरी पत्नी निम्न जाति की है।  जबकि मैं जाति -पाती में विश्वास नहीं करता  और मेरा परिवार भी मेरी इस शादी से खुश है।  परन्तु समस्या यह है कि हम एक गांव में रहते हैं जिसके कारण मेरी इस शादी से गांव के कुछ लोग मेरे परिवार वालों के ऊपर ताने कसते हैं और बे-वजह की बातों से मेरे परिवार वालों को तकलीफ देते रहते हैं।  यहाँ तक कि मेरे परिवार वालों का घर से बाहर निकलना मुस्किल हो गया है।  सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि मुझसे बड़ा एक मेरा भाई भी है जो कि अभी कुंवारा है, उसके रिश्ते में मेरी शादी विशेष रूप से रोड़ा साबित हो रही है, क्योंकि मेरे परिवार वाले भले ही मेरी शादी से खुश हों लेकिन समाज के हर उस व्यक्ति को समझाना मुश्किल है जो जाती-पाती में आज भी विश्वास करते हैं और ऐसी शादी को नहीं मानते।  इसी कारणवश मेरा बड़ा भाई भी मुझसे नफरत करने लगा है।  क्योंकि कानून जो भी हो लेकिन रिश्ता करने वाले कानून को नहीं बल्कि समाज को देखते हैं, मेरा भाई परिवार की सहमति से शादी करना चाहता है वो कानूनन की जाने वाली शादी को नहीं चाहता। कृपया मुझे बताएं की समाज  (गांव) के अपशब्द बोलने वाले लोगों के खिलाफ हम कैसे क़ानूनी हल निकल सकते है और मेरे भाई की शादी की समस्या कैसे हल हो।  ये भी बताएं कि क्या मेरे और मेरी पत्नी के खिलाफ मेरा भाई क्या कोई मुकदमा पेश कर सकता है तथा मेरा और मेरी पत्नी का पैतृक जायदाद में कोई अधिकार है।  जायदाद मेरे दादा जी की है और दादा जी का स्वर्गवास हो चुका है।

समाधान-

प की समस्या कानूनी नहीं अपितु सामाजिक है। हमारा कानून आगे बढ़ गया है और समाज बहुत पीछे छूट गया है। समाज में परिवर्तन का काम नहीं के बराबर है। आप की समस्या तभी समाप्त हो सकती है जब कि समाज बदले। आप की समस्या यह है कि आप उसी जाति समाज से सम्मान पाना चाहते हैं जिस के कायदों का आप ने उल्लंघन किया है। वह आप को सम्मान तभी दे सकता है जब कि वह आप के इस विवाह को स्वीकार कर ले। यह कानूनन नहीं किया जा सकता। इस के लिए तो समाज को बदलना होगा। यदि समाज में 5 प्रतिशत विवाह भी आप जैसे विजातीय संबंधों में होने लगें तो समाज का नियंत्रण समाप्त होने लगेगा। इस के लिए आप को समाज में चेतना का संचार करना पड़ेगा। जो जाति समाज रूपी कीचड़ से निकल कर खुली हवा में साँस लेना चाहते हैं उन्हें इस के लिए काम करना पड़ेगा। आप के विवाह के बाद जाति समाज ने जो व्यवहार आप के साथ किया है उस से आप का भाई व परिवार डर गया है। आप को उस का भय निकालना होगा। आप के प्रति जो व्यवहार किया जा रहा है उस का उद्देश्य यही है कि आप और आप का परिवार डरा रहे। लेकिन यदि यह भय निकल जाता है तो समय के साथ गाँव वालों का व्यवहार भी सामान्य होने लगेगा। यदि आप का भाई अच्छा खाता कमाता है तो यह समस्या कुछ समय बाद स्वतः सामान्य हो जाएगा और उसी जाति समाज से आप के भाई के लिए रिश्ते आने लगेंगे। इस समस्या का कोई कानूनी हल नहीं हो सकता।

हाँ तक आप के व आप के परिवार के अपमान का प्रश्न है। आप को लगता है कि आप का कुछ अधिक ही अपमान किया जा रहा है तो आप अपमान करने वालों के विरुद्ध मानहानि के अपराधिक और दीवानी मुकदमे दायर कर सकते हैं। ऐसे एक दो मुकदमे दायर होने से इस तरह का व्यवहार करने वालों में मुकदमे का भय होगा और वे ऐसा व्यवहार करना बंद कर देंगे। लेकिन मुकदमा करने के बाद भी आप का व्यवहार ऐसे लोगों से शत्रुतापूर्ण न हो कर सबक सिखा कर पुनः मित्रता स्थापित करने वाला होना चाहिए तभी आप इस सामाजिक समस्या का मुकाबला कर सकेंगे। वे लोग जो कर रहे हैं वे नहीं जानते कि गलत कर रहे हैं उन्हें बाद में इस का अहसास होगा। वे अभी अपनी सड़ी गली परंपराओं की रक्षा कर रहे हैं।

प की पुश्तैनी संपत्ति का प्रश्न है तो उस में आप का हिस्सा पूरी तरह बना हुआ है। यदि उस में आप का हिस्सा है तो वह अन्तर्जातीय विवाह करने के कारण आप से नहीं छीना जा सकता है। उस पर आप का अधिकार है। आप विभाजन का मुकदमा कर के अपने हिस्से का पृथक कब्जा प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन आप की पत्नी का उस में कोई हिस्सा नहीं होगा। वैसे भी आप जाति में परिवार की सहमति से विवाह करते तब भी आप की पत्नी का उस में कोई हिस्सा नहीं होता।

पुलिस ज्यादती के विरुद्ध उच्चाधिकारियों को शिकायत करें और न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें

समस्या-

ठाणे, महाराष्ट्र से गुड्डू यादव ने पूछा है –

मुझे एक वरिष्ठ पुलिस उपनिरीक्षक द्वारा फँसाया और मारा व पीटा गया है।  रात 9 बजे की घटना है,  मेरे घर के नजदीक पुलिस स्टेशन है, वहाँ पर रात्रि को रामलीला हो रही थी।  मैं अपने दोस्त के साथ घर आ रहा था, रास्ते में पुलिस स्टेशन आया तब वहाँ पर रामलीला चल रही थी और बहुत भीड़ थी।  उसी समय मेरे दोस्त ने जोर से चिल्लाकर कह दिया कि “जागते रहो” इतने में वहाँ ड्यूटी पर उपस्थित वरिष्ठ पुलिस उप निरीक्षक ने सुन लिया।  उस समय उन्होंने कुछ भी नहीं किया।  जब हम लोग वहाँ से कुछ दूर चले गए तो पुलिस साहेब ने कुछ कांस्टेबल को भेजकर मुझे और मेरे दोस्त को बुलाया और पुलिस स्टेशन में अन्दर ले जाकर मारने लगे।  वे कह रहे थे कि पुलिस वालों का मजाक उड़ाते हो और कहते हो “जागते रहो”।  हम ने कहा कि हम लोगों ने आपको देखकर नहीं कहा था, तो उन्हें और गुस्सा आ गया।   फिर तो वे डंडे और लात (पैर) से मारने लगे।  कुछ समय के बाद वे हमें पुलिस हेड ऑफिस में ले गये,  ले जाते समय पुलिस गाड़ी में 3 स्टार पुलिस अधिकारी  भैया और यू पी वाला कहकर हमें गाली देने लगा।  कह रहा था कि तुम्हारे नाम पर ऐसी शिकायत (एफ.आइ.आर.) दर्ज करेंगे कि कहीं तुम भैया लोगों को नौकरी भी नहीं मिलेगी।  तुम लोग चरित्र सर्टिफिकेट के लिए यहाँ आओगे तब देख लेंगे, कैसे मिलता है?  यह सब कहकर और माँ-बहन की अश्लील गालियाँ देकर महिला पुलिस के सामने मजाक उडाते रहे और हमें डराते रहे।  इसके बाद जब हमें पुलिस स्टेशन ले गए तो रात के 1:30 बजे तक हमारे खिलाफ कोई शिकायत नहीं लिखी और हमें लॉकअप में बंद करके रखा।  जब हमारे परिवार वाले वहाँ पहुँचे तो उनके साथ बड़े कठोर बर्ताव किया।  कह रहे थे कि सालों को कहीं नौकरी भी नहीं मिलेगी।  अंतत: रात को 2:00 बजे मुझे और मेरे दोस्त को 1250-1250 रुपये का दंड वसूल कर के छोड़ दिए और उसकी रसीद भी दी।  परन्तु मेरा कहना यह है कि हमने उस वरिष्ठ अधिकारी को देखकर ऐसा कुछ नहीं कहा।  हमने माफी भी मांगी, पर अधिकारी सुनने को तैयार नहीं थे।  उन्होंने हमारे खिलाफ धारा 112/117 के अंतर्गत शिकायत दर्ज करके छोड़ दिया है और कोर्ट में जाने के लिए कहा है।

1) मैं आप से ये जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसे वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ अपनी शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज कराऊँ?  उसका प्रारूप क्या होगा? जैसा कि वरिष्ठ अधिकारी को “जागते रहो” बात से चिढ़ आ गयी थी, जिसका मतलब है कि वो अपने ड्यूटी पर सो रहे थे और हमने उनके सोने पर मजाक उड़ाया है।  अतः मुझे ये बताइए कि क्या “जागते रहो” एक गाली है?  या पुलिस वालों के लिए अपमान जनक (सूचक) शब्द है?  यदि ऐसा नहीं है तो कल भविष्य में इन्कलाब जिंदाबाद¡  वन्दे मातरम¡ और भारत माता की जय¡ जैसे स्लोगन कहने पर भी पुलिस स्टेशन जाना पड़ेगा?

2)मुझे कोर्ट में हाजिर होना है अतः मुझे ये बताइए कि क्या मैं इस शब्द को लेकर अपना गुनाह कबूल करूँ या मैं उस अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करुँ?

3) उस अधिकारी ने मुझे पुलिस स्टेशन में लातों से मारा है मुझे अपमानित किया।  क्या मैं इसके साथ अपनी मानहानि का दावा बिना किसी वकील के कर सकता हूँ?

4) क्या मुझे अपने बचाव के लिए सरकारी वकील मिल सकता है?

5) क्या लात से मारना हमारे मानव अधिकार की अवहेलना नहीं है? यदि है तो क्या इसकी शिकायत मानवाधिकार आयोग को की जा सकती है?

6) क्या वरिष्ठ अधिकारी माँ-बहन की कठोर गाली देकर अपमानित करे तो उसे सहन कर लेना चाहिये?

7)पुलिस द्वारा झूठे मामले में फँसाने की धमकी देने के बारे में कैसे और कहाँ शिकायत दर्ज करानी चाहिये?

8) क्या मैं बचाव के लिए पुलिस स्टेशन में लगे सीसीटीवी  कैमरे की फुटेज सूचना के अधिकार के अंतर्गत ले सकता हूँ?

समाधान-

प के साथ जो व्यवहार पुलिस ने किया है वह केवल निन्दनीय तो है ही। इस मामले में लिप्त पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही भी होनी चाहिए।  किसी भी पुलिस अधिकारी को किसी नागरिक के साथ इस तरह का व्यवहार करना उचित ही नहीं अपराधिक भी है। लेकिन आप ने जो विवरण दिया है उस में कुछ बातें समझ नहीं आई हैं। आप पर धारा 112/117 बोम्बे पुलिस अधिनियम का आरोप लगाया गया है। इस मे मात्र जुर्माने का प्रावधान है जो आप से वसूल लिया गया है। इस के बाद भी आप को पुलिस ने अदालत में किस बात के लिए उपस्थित होने को कहा है? यह स्पष्ट नहीं हुआ है। हाँ आप से जुर्माना वसूल किया है उसे आप गलत मानते हैं तो आप उस के विरुद्ध न्यायालय में जा सकते हैं। आप के प्रश्नों के उत्तर निम्न प्रकार हैं-

1. आप पुलिस अधिकारी के विरुद्ध इलाके के पुलिस सुपरिण्टेंडेंट को या आई.जी. पुलिस को शिकायत कर सकते हैं। इसे आप रजिस्टर्ड डाक से भेज दें। घटना की जाँच होगी।

2. आप को अदालत में गुनाह कबूल करने की आवश्यकता नहीं है।  जब आप ने कुछ नहीं किया है तो आप को उस का प्रतिवाद करना चाहिए। न्यायालय जो भी आदेश दे यदि उसे गलत समझें तो आगे अपील करें।

3. यह मानहानि का नहीं अपमानित करने और मारपीट करने का मामला है। इस मामले में आप को न्यायालय में व्यक्तिगत परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

4.यदि आप की आमदनी कम है तो आप अपने जिला न्यायालय में स्थित विधिक सहायता केंद्र में निशुल्क वकील उपलब्ध कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

5. आप मानवाधिकार आयोग को शिकायत कर सकते हैं।

6. बिलकुल सहन नहीं करना चाहिए, प्रतिरोध करना चाहिए। किन्तु पुलिस पूरी व्यवस्था का एक अंग है। उस का प्रतिरोध अकेले नहीं किया जाना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे एक बड़े गिरोह से एक साहसी व्यक्ति अकेला टकरा जाए। आप को व्यवस्था से सदैव ही समूह बद्ध हो कर मुकाबला करना चाहिए। आप को इस मामले में अपने क्षेत्र के सिविल राइट्स के लिए काम करने वाले जन संगठनों के साथ जुड़ना चाहिेए और उन के माध्यम से प्रतिवाद करना चाहिए।

7. इस प्रश्न का उत्तर पहले प्रश्न के साथ दिया जा चुका है।

8. पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी कैमरे में कुछ नहीं मिलेगा। कैमरा उस समय बंद रहा होगा। पुलिस वाले मूर्ख नहीं हैं जो आप के साथ सीसीटीवी कैमरे के सामने मारपीट और अभद्र व्यवहार करेंगे। सीसीटीवी कैमरे में कुछ दर्ज हुआ भी होगा तो उसे हटा दिया गया होगा। फिर भी इस के लिए आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचना अधिकारी, कार्यालय एसपी, पुलिस को आवेदन कर सकते हैं।

मानहानि का दावा क्या है? और कैसे न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है?

 बंटी निहाल ने पूछा है –
मानहानि का दावा क्या है?  इसे किस प्रकार से न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है? और उस का पहला कदम क्या है?
 उत्तर –
बंटी भाई,
मानहानि के लिए दो तरह की कार्यवाहियाँ की जा सकती हैं। उस के लिए आप अपराधिक मुकदमा चला कर मानहानि करने वाले व्यक्तियों और उस में शामिल होने वाले व्यक्तियों को न्यायालय से दंडित करवाया जा  सकता है। दूसरा मार्ग यह है कि यदि मानहानि से किसी व्यक्ति की या उस के व्यवसाय की या दोनों की कोई वास्तविक हानि हुई है तो वह उस का हर्जाना प्राप्त करने के लिए दीवानी दावा न्यायालय में प्रस्तुत कर सकता है और हर्जाना प्राप्त कर सकता है। दोनों मामलों में अन्तर यह है कि अपराधिक मामले में जहाँ नाममात्र का न्यायालय शुल्क देना होता है वहीं हर्जाने के दावे में जितना हर्जाना मांगा गया है उस के पाँच से साढ़े सात प्रतिशत के लगभग न्यायालय शुल्क देना पड़ता है जिस की दर अलग अलग राज्यों में अलग अलग है। हम यहाँ पहले अपराधिक मामले पर बात करते हैं।  
किसी भी व्यक्ति को सब से पहले तो यह जानना होगा कि मानहानि क्या है? मानहानि को भारतीय दंड संहिता में एक अपराधिक कृत्य भी माना गया है और इसे धारा 499 में  इस तरह परिभाषित किया गया है –

जो कोई बोले गए, या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य निरूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि की जाएया यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी अपवादों को छोड़ कर यह कहा जाएगा कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है।  

हाँ मृत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आता है, यदि वह लांछन उस व्यक्ति के जीवित रहने पर उस की ख्याति की अपहानि होती और उस के परिवार या अन्य निकट संबंधियों की भावनाओं को चोट पहुँचाने के लिए आशयित हो। किसी कंपनी, या संगठन या व्यक्तियों के समूह के बारे में भी यही बात लागू होगी।  व्यंगोक्ति के रूप में की गई अभिव्यक्ति भी इस श्रेणी में आएगी। इसी तरह मानहानिकारक अभिव्यक्ति को मुद्रित करना,  या विक्रय करना भी अपराध है।

लेकिन किसी सत्य बात का लांछन लगाना, लोक सेवकों के आचरण या शील के विषय में सद्भावनापूर्वक राय अभिव्यक्ति करना तथा किसी लोक प्रश्न के विषय में किसी व्यक्ति के आचरण या शील के विषय में सद्भावना पूर्वक राय अभिव्यक्त करना तथा  न्यायालय की कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग भी इस अपराध के अंतर्गत नहीं आएँगी।  इसी तरह किसी लोककृति के गुणावगुण पर अभिव्यक्त की गई राय जिसे लोक निर्णय के लिए ऱखा गया हो अपराध नहीं मानी जाएगी।  

मानहानि के इन अपराधों के लिए धारा 500,501 व 502 में दो वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है।  लोक शांति को भंग करा
ने को उकसाने के आशय से किसी को साशय अपमानित करने के लिए इतनी ही सजा का प्रावधान धारा 504 में किया गया है। 

जो कोई व्यक्ति अपनी मानहानि के लिए मानहानि करने वाले के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाना चाहता है उसे सीधे यह शिकायत दस्तावेजी साक्ष्य सहित सक्षम क्षेत्राधिकार के न्यायालय के समक्ष लिखित में प्रस्तुत करनी होगी। न्यायालय शिकायत प्रस्तुतकर्ता का बयान दर्ज करेगा, यदि आवश्यकता हुई तो उस के एक दो साक्षियों के भी बयान दर्ज करेगा। इन बयानों के आधार पर यदि न्यायालय यह समझता है कि मुकदमा दर्ज करने का पर्याप्त आधार उपलब्ध है तो वह मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए समन जारी करेगा। अभियुक्त के उपस्थित होने पर उस से आरोप बता कर पूछा जाएगा कि वह आरोप स्वीकार करता है अथवा नहीं। आरोप स्वीकार कर लेने पर उस मुकदमे का निर्णय कर दिया जाएगा। यदि अभियुक्तों द्वारा आरोप स्वीकार नहीं किया जाता है तो शिकायतकर्ता और उस के साक्षियों के बयान पुनः अभियुक्तों के सामने लिए जाएंगे, जिस में अभियुक्तों या उन के वकील को साक्षियों से प्रतिपरीक्षण करने का अधिकार होगा। साक्ष्य समाप्त होने के उपरांत अभियुक्तों के बयान लिए जाएंगे। यदि अभियुक्त बचाव में अपना बयान कराना चाहते हैं तो न्यायालय से अनुमति ले कर अपने बयान दर्ज करा सकते हैं। वे अपने किन्ही साक्षियों के बयान भी दर्ज करवा सकते हैं। इस तरह आई साक्ष्य के आधार पर दोनों पक्षों के तर्क सुन कर न्यायालय द्वारा निर्णय कर दिया जाएगा। अपराधिक मामले में अभियुक्तों को दोषमुक्त किया जा सकता है या उन्हें सजा और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। शिकायतकर्ता को अभियुक्तों से न्यायालय का खर्च दिलाया जा सकता है। लेकिन इस मामले में कोई हर्जाना शिकायतकर्ता को नहीं दिलाया जा सकता।

दि कोई व्यक्ति अपनी मानहानि से हुई हानि की क्षतिपूर्ति प्राप्त करना चाहता है तो उसे, सब से पहले उन लोगों को जिन से वह क्षतिपूर्ति चाहता है एक नोटिस देना चाहिए कि वह उन से मानहानि से हुई क्षति के लिए कितनी राशि क्षतिपूर्ति के रूप में चाहता है। नोटिस की अवधि व्यततीत हो जाने पर वह मांगी गई क्षतिपूर्ति की राशि के अनुरूप न्यायालय शुल्क के साथ सक्षम क्षेत्राधिकार के न्यायालय में वाद दस्तावेजी साक्ष्य के साथ प्रस्तुत कर सकता है। वाद प्रस्तुत करने पर संक्षिप्त जाँच के बाद वाद को दर्ज कर न्यायालय समन जारी कर प्रतिवादियों को बुलाएगा और प्रतिवादियों को वाद का उत्तर प्रस्तुत करने को कहेगा। उत्तर प्रस्तुत हो जाने के उपरांत यह निर्धारण किया जाएगा कि वाद और प्रतिवाद में तथ्य और विधि के कौन से विवादित बिंदु हैं और किस बिन्दु को किस पक्षकार को साबित करना है। प्रत्येक पक्षकार को उस के द्वारा साबित किए जाने वाले बिन्दु पर साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाएगा। अंत में दोनों पक्षों के तर्क सुन कर निर्णय कर दिया जाएगा। यहाँ पर्याप्त साक्ष्य न होने पर दावा खारिज भी किया जा सकता है और पर्याप्त साक्ष्य होने पर मंजूर किया जा कर हर्जाना और उस के साथ न्यायालय का खर्च भी दिलाया जा सकता है।

क्त विवरण के बाद भी एक बात स्मरण रखें कि हमारी न्याय व्यवस्था में वकील का बहुत महत्व है। उस के बिना शायद ही कोई मुकदमा ठीक से लड़ा जा सकता हो। 

मानहानि और अपमान के अपराध : वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार (9)

इस श्रंखला की आठवीं कड़ी में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध के रूप में परिभाषित  वाक् प्रस्तुतियों और अभिव्यक्तियों पर चर्चा की थी।  ये सभी वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर निर्बंधन के रूप में प्रभावी हैं।  इस कानून के अंतर्गत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार को सर्वाधिक प्रभावित करे वाले निर्बंधन किसी की मानहानि करने तथा अपमान से संबंधित हैं। 
भारतीय दंड संहिता  की धारा 499 में मानहानि को इस तरह परिभाषित किया गया है-
 जो कोई बोले गए, या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य निरूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि की जाएया यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी अपवादों को छोड़ कर यह कहा जाएगा कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है। 
यहाँ मृत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आता है, यदि वह लांछन उस व्यक्ति के जीवित रहने पर उस की ख्याति की अपहानि होती और उस के परिवार या अन्य निकट संबंधियों की भावनाओं को चोट पहुँचाने के लिए आशयित हो। किसी कंपनी, या संगठन या व्यक्तियों के समूह के बारे में भी यही बात लागू होगी।  व्यंगोक्ति के रूप में की गई अभिव्यक्ति भी इस श्रेणी में आएगी। इसी तरह मानहानिकारक अभिव्यक्ति को मुद्रित करना,  या विक्रय करना भी अपराध है।
लेकिन किसी सत्य बात का लांछन लगाना, लोक सेवकों के आचरण या शील के विषय में सद्भावनापूर्वक राय अभिव्यक्ति करना तथा किसी लोक प्रश्न के विषय में किसी व्यक्ति के आचरण या शील के विषय में सद्भावना पूर्वक राय अभिव्यक्त करना तथा  न्यायालय की कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग भी इस अपराध के अंतर्गत नहीं आएँगी।  इसी तरह किसी लोककृति के गुणावगुण पर अभिव्यक्त की गई राय जिसे लोक निर्णय के लिए ऱखा गया हो अपराध नहीं मानी जाएगी। 
मानहानि के इन अपराधों के लिए धारा 500,501 व 502 में दो वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है।  लोक शांति को भंग कराने को उकसाने के आशय से किसी को साशय अपमानित करने के लिए इतनी ही सजा का प्रावधान धारा 504 में किया गया है। 
धारा 505 में  किसी भी ऐसे कथन, जनश्रुतिया रिपोर्ट को इस आशय से प्रकाशित करना जिस से तीनों सेनाओं का कोई अफसर या सैनिक विद्रोह करे या अपने कर्तव्य की अवहेलना करे, या जनता या उस के किसी भाग को भय या संत्रास हो और जिस से कोई व्यक्ति राज्य या लोक शांति के विरुद्ध अपराध करने को उत्प्रेरित हो या जिस से व्यक्तियों का कोई वर्ग या समुदाय किसी दूसरे वर्ग या समुदाय के विरुद्ध अपराध करने को उत्प्रेरित हो अपराध घोषित कर तीन वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है।  विभिन्न वर्गों में शत्रुता, घृणा या वैमनस्य पैदा करने की भावनाएं धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर पैदा करने और फैलाने वाली अभिव्यक्तिय
ों के प्रकाशन और वितरण करने को भी अपराध घोषित कर इतनी ही सजा का प्रावधान किया गया है।  लेकिन किसी बात के सत्य होने का युक्तियुक्त आधार होने पर उसे सद्भावनापूर्वक प्रकाशित करने या वितरित करना अपराध नहीं है। 
उक्त सभी अभिव्यक्तियों को अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है जो कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर निर्बंधन हैं।  

इस श्रंखला की अगली कड़ी में  ब्लागिंग पर इन निर्बंधनों के प्रभाव की बात करेंगे। (क्रमशः जारी)

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