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तहसील कोई निर्णय नहीं कर रही है तो आरटीआई से देरी का कारण पूछें।

समस्या-

चंद्रप्रकाश ओझा ने गांव-छत्तरगढ़, जिला-बीकानेर, राज्य-राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी को 1977 में छत्तरगढ़ जिला बीकानेर में भूदान यज्ञ बोर्ड ने 25 बीघा जमीन आवंटित की। राजस्व रिकार्ड में यह जमीन भूदान यज्ञ बोर्ड के नाम दर्ज थी तथा मेरे पिताजी आवंटी थे। राज्य सरकार ने भूदान बोर्ड के सभी आवंटियों को खातेदारी अधिकार देने का निर्णय किया तथा भूदान बोर्ड को अपने आवंटियों के नाम सपुष्ट सूची में भेजकर छत्तरगढ़ तहसीदार को खातेदारी देने के आदेश देने के लिए अधिकृत किया जिसके तहत भूदान बोर्ड ने अधिकांश को खातेदारी अधिकार देने के लिए तहसीदार छत्तरगढ़ को अलग अलग सपुष्ट सूचियाँ भेजकर सूची में शामिल आवंटियों को खातेदारी अधिकार देने को कहा। जिसमे से अधिकांश को खातेदारी अधिकार दे दिए गए। भूदान बोर्ड ने 27 जुलाई 2018 को जो सूची भेजी उसमें मेरे पिताजी का नाम भी था, लेकिन खातेदारी मिलती उससे पहले ही 17 जुलाई 2018 को 99 वर्ष की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया।

मेरे पिताजी ने अपने जीवन काल में सन 2012 में रजिस्टर्ड वसियत कर अपनी सारी सम्पति अपने पोते (मेरे पुत्र के) नाम कर दी थी। तथा वसीयत में ये भी लिख दिया था कि मेरी मृत्यु के बाद भी अगर कोई सम्पति मेरी बनती है तो उसका स्वामित्व भी मेरे इस पोते के नाम रहेगा । मेरे माता- पिता ने मेरे छोटे भाई, उसकी पत्नी व बच्चों को 2007 में ही मारपीट करने,अभद्र व अमानवीय व्यवहार करने पर अपनी सारी चल व अचल सम्पत्ति से बेदखल कर अखबार में निकाल दिया था। मेरे पिताजी ने मेरे बेटे के नाम वसीयत की थी उसने तहसील में एक प्रार्थना पत्र के साथ रजिस्टर्ड वसीयत की प्रति व बेदखली की कंटिंग लगाकर, खातेदारी अपने नाम करने का निवेदन किया।

तहसीलदार ने जो सूची भूदान बोर्ड ने भेजी थी जिसमें 26 नाम थे उनको खातेदारी अधिकार देने के लिए अखबार में आपत्तियां आमंत्रित की । मेरे छोटे भाई ने आपत्ति लगा दी जिसमें उसने सभी वारिसान के नाम खातेदारी देने का लिखा। मेरे 4 बहनें भी हैं। जबकि उसे, उसकी पत्नी व बेटों को बेदखल किए 11 वर्ष हो चुके है।

अब तहसील द्वारा कोई निर्णय नहीं किया जा रहा। उनका कहना है कि खातेदारी से पहले ही आपके पिताजी की मृत्यु हो गई इसलिए वो गैर खातेदार हुए और गैर खातेदार की वसीयत मान्य नहीं है। जबकि राजस्व रिकार्ड में सभी आवंटियों के नाम इस प्रकार दर्ज है
खातेदार-भूदान यज्ञ बोर्ड
आवंटी-बाबूलाल ओझा

तहसील वालों का यह भी कहना है कि मृतक के भी नाम खातेदारी नहीं हो सकती, जबकि इससे पूर्व जिन 40 आवंटियों को खातेदारी अधिकार दिए गए उनमें कुछ मृतकों के नाम भी खातेदारी दी जा चुकी है। तहसील ऐसे दोहरे मानदंड क्यों अपना रही है।

क्या वसीयतकर्ता के ये लिखने के बाद भी कि “मेरी मृत्यु के बाद भी अगर कोई सम्पति मेरे नाम होती है तो उसका अधिकार भी उसे होगा जिसके हक में वसीयत की गई है।” वसीयतकर्ता की ऐसी इच्छा के बाद भी क्या तहसीलदार ऐसा कर सकते है?

मेरे पिताजी को भूदान बोर्ड ने 1977 में ये भूमि आवंटित करते हुए भूदान बोर्ड का पट्टा दिया था। तब से पिछले 41सालों से खेती कर रहे है ।

कृपया मार्गदर्शन करें कि मेरे पिता की वसीयत व उनकी इच्छानुसार खातेदारी हो सकती है क्या? इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाए? हालांकि अभी तो राजस्थान में विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लगी हुई है इसलिए किसी को भी खातेदारी अधिकार नही दिए गए है लेकिन आचार संहिता हटते ही खातेदारी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी । इसलिए मार्गदर्शित करें कि इस एक माह की अवधि में क्या प्रक्रिया अपनाई जाए कि सभी के साथ हमारे प्रकरण का भी निस्तारण हो सके।

 

समाधान-

हसील आप मामले में आपके पिता के वसीयती के नाम खातेदारी न देने के जो कारण बता रही है वे सभी बहाने हैं। तहसील को बताना चाहिए कि जो नहीं किया जा रहा है वह किस कानून और नियम के अंतर्गत किया जा रहा है। लेकिन तहसील में तो यह सब क्लर्क और अधिकारी मौखिक रूप से कह रहे होंगे। उन्हों ने अभी तक कोई निर्णय नहीं किया है। वैसे भी आम धारणा यह है कि राजस्थान की तहसीलों में बिना धन खर्च किए कोई फाइल आगे नहीं सरकती है। हमें आप के मामले में ऐसा ही कोई पेच नजर आता है।  मौखिक रूप से जो कुछ तहसील कह रही है उस में से कोई भी तर्क किसी कानून या नियम के अंतर्गत नहीं है। अभी तक तहसील ने आप की खातेदारी की अर्जी को लिख कर अस्वीकार नहीं किया है।

अभी आचार संहिता है तो इस अवधि में आप आरटीआई के माध्य़म से पूछ सकते हैं कि वसीयती के नाम पर खातेदारी  दिए जाने का मामला क्यों अभी तक लंबित है? उस के कारण क्या हैं? यदि कोई नियम या कानून आड़े आ रहा है तो वह बताया जाए। यदि तहसली आरटीआई के अंतर्गत कोई कारण बताती है तो उस उत्तर के आधार पर आगे का उपाय तय किया जा सकता है। उस के आधार पर रिट याचिका भी उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है।  यदि कोई कारण बताया जाता है तो उस के आधार परआगे का उपाय तय किया जा सकता है।

बँटवारा गैर खातेदारी की भूमि का भी हो सकता है।

समस्या-

शमीम अहमद ने बीकानेर, राजस्थान से पूछा है-

र्स्ट पार्टी में मेरी माताजी मेरे बडे भाई साहब और दूसरी पार्टी में मेरे चाची और उसके दो बेटों के नाम से सँयुक्त रूप से स्थगन आदेश लगभग 200 बीघा खेती की जमीन का माननीय राजस्व न्यायालय, अजमेर में राजस्थान सरकार उपनिवेशन कार्यालय इंदिरा ग़ांधी नहर के खिलाफ़  चल रहा हैं। यह सारी ज़मीन अभी तक ग़ैरखातेदारी की हैं और इसके खातेदारी के वास्ते ऊपर दिए गए नामों का ही सँयुक्त दावा राजस्व अपील अधिकारी कार्यालय में चल रहा है। अभी तक जमीन की खातेदारी नही मिली है, इसलिए इस पर केवल स्थगन आदेश पर ही हम लोग खेती करते हैं। मेरी समस्या यह है कि इस सारी जमीन पर मेरे चाचा के दोनों लड़को में कब्जा कर रखा है और वो ही खेती कर रहे है। हमे जमीन का एक भी टुकड़ा नही दे रहे है खेती करने के लिए। चूंकि हम गरीब लोग है और अभी बरसात का मौसम चल रहा है तो खेती के लिए हमारे पास किसी भी प्रकार की इसके अलावा जमीन नहीं है।  अब जब तक हमे खातेदारी नही मिलती तब तक हमें हमारा हक ये लोग नहीं देंगे। श्रीमान जी मेरा प्रश्न यह है कि –
1. क्या स्थगन आदेश में भी बंटवारा करवाया जा सकता हैं कानूनी रूप से और क्या स्थगन आदेश में भी बंटवारे के लिए दावा कर सकते है । ऐसा करने के लिए क्या प्रक्रिया है?
2. हमे जब तक खातेदारी नही मिलती है तब तक हम अपना हक उन लोगों सर कैसे ले सकते हैं?
3. स्थगन आदेश में बंटवारा करने पर राजस्व अपील अधिकारी के कार्यालय में चल रहे सयुक्त रूप से खातेदारी के वास्ते दावे पर क्या असर पड़ेगा?

समाधान-

प की समस्या तो समझ में आ रही है पर तथ्य ठीक से समझ नहीं आ रहे हैं। स्थगन िकसी मुकदमे में होता है और यह मुकदमा किस बात का है आप के प्रश्न से स्पष्ट नहीं हो रहा है। फिर भी हम आप के प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं-

  1.  गैरखातेदारी अधिवासी (टीनेंट) भी टीनेंसी एक्ट की धारा 53 के अंतर्गत बंटवारे के लिए वाद संस्थित कर सकते हैं। आप भी अपना बंटवारे, तथा अपने हिस्से का अलग कब्जा दिलाने का दावा पेश कर सकते हैं। इसी दावे में आप पूरी जमीन पर रिसीवर कायम करने के लिए आवेदन दे सकते हैं कि रिसीवर ही उस जमीन पर खेती की देखरेख करें और उस से होने वाले मुनाफे को अपने पास रखे जो बंटवारा होने पर उस के हिसाब से पक्षकारों को दे दिया जाए। इस तरह आप के विपक्षी जो पूरी जमीन पर खेती कर रहे हैं उन की खेती रिसीवर के पास चली जाएगी। आप के पास तो कुछ है नहीं, इस कारण उन पर दवाब आएगा। इस दबाव के कारण वे जमीन का एक हिस्सा आप को खेती करने के लिए दे सकते हैं।
  2. दूसरे प्रश्न का उत्तर भी यही है।
  3. एक बार बंटवारे की डिक्री हो जाए तो आप उस की प्रमाणित प्रति राजस्व अपील न्यायालय में पेश कर सकते हैं और उस का संज्ञान लिया जा कर तदनुरूप वहाँ निर्णय किया जा सकता है।

हमें आप के दोनों चल रहे मुकदमों की प्रकृति के बारे में जानकारी स्पष्ट नहीं है। इस कारण इन उत्तरों को केवल मार्गदर्शक समझा जाए। इस संबंध में आप अपने वकीलों से परामर्श कर के उचित कार्यवाही करें तो बेहतर है।

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