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जरूरी दस्तावेज व सूचनाएँ प्रस्तुत करने को न्यायालय संबंधित व्यक्ति को आदेश दे सकते हैं।

समस्या-

अश्विनि कुमार ने एमक्यू119, दीपिका कालोनी, पोस्ट- गेवरा प्रोजेक्ट, जिला कोरबा (छत्तीसगढ़) से समस्या भेजी है कि-

मै एवं मेरी पत्नी भी कोरबा के ही हैं। मेरी पत्नी के द्वारा मेरे ऊपर धारा 498क (जून 2012), धारा 125 (अगस्त 2012), घरेलू हिंसा (अक्तूबर 2013)2013 मे केस किए हैं। धारा 125 में अन्तरिम भरण पोषण के लिए फरवरी 2014 से 5000.00 रुपये प्रति माह मेरे द्वारा दिया जा रहा है। सभी केस अभी अंतिम दौर मे चल रहा है। मेरी पत्नी जून 2017 से केन्द्रीय विद्यालय मे शिक्षिका के पद पर नियुक्त होकर 27500.00 रुपए वेतन प्राप्त कर रही है। मुझे जानकारी होने पर मेरे द्वारा केन्द्रीय विद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर तीसरे पक्ष की जानकारी देने से मना किया गया। अपील में गया तो अपील अधिकारी के द्वारा मेरी पत्नी को पूछे जाने पर मेरी पत्नी ने जानकारी देने से मना कर दिये जाने की जानकारी देते हुये मुझे जानकारी नहीं दी गयी। सूचना के अधिकार के तहत दी गयी जानकारी आपकी ओर प्रेषित कर रहा हूँ। मुझे मेरी पत्नी से संबन्धित जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है?

समाधान-

प यह जानकारी इस कारण से प्राप्त करना चाहते हैं जिस से आप न्यायालय के समक्ष इन दस्तावेजों के प्रस्तुत कर यह साबित कर सकें कि आप की पत्नी को भरण पोषण के लिए किसी राशि की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन किसी भी न्यायिक कार्यवाही में यदि कोई तथ्य साबित करना है तो उस में उस के लिए इस तरह के प्रावधान हैं कि न्यायालय स्वयं उस पक्ष को वे तथ्य प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है या फिर किसी दस्तावेज को जो न्यायालय में लंबित मुकदमे का निर्णय करने के लिए आवश्यक हो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। इस सम्बन्ध में दीवानी और अपराधिक प्रक्रिया संहिताओं में उपबंध हैं।

दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 में दस्तावेज प्रस्तुत कराने तथा विपक्षी को परिप्रश्नावली दे कर उन के उत्तर प्रस्तुत करने के उपबंध हैं इसी प्रकार धारा 91 दंड प्रक्रिया संहिता में दस्तावेज प्रस्तुत कराने संबंधित उपबंध हैं। आप अपने वकील से संपर्क कर के उन्हें इन उपबंधों में से उपयोगी उपबंध में आवेदन प्रस्तुत कर उक्त दस्तावेज संबंधित स्कूल प्रशासन को प्रस्तुत करने का आदेश न्यायालय से कराएँ। जरूरत होने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

मुकदमे के पक्षकार की मृत्यु पर वादी, प्रार्थी, अपीलार्थी का दायित्व …

समस्या-

अनिल ने पुनसावा, खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह हे कि मेरे दादाजी ने मेरे पिताजी को वसीयत मे सँपूर्ण सँपत्ति का वारिस बनाया। लेकिन 2016 मेरे पिताजी के खिलाफ उनकी बहन, भाई तथा भाँजे ने न्यायालय के फैसले के विरोध में सत्र न्यायालय मे केस चला रखा है। लेकिन मेरे पिताजी की मौत 2017 मे हो गई। अब मैं दुविधा आ गया हूं कि बिना केस जीते मेरा नामांतरण केसे होगा? क्या मुझे फिर केस लगाना पड़ेगा? क्या करूँ?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से लगता है कोई मुकदमा आप के पिताजी या उन के बहन, भाई तथा भांजे ने किया था जिस में निर्णय हो गया और आप के पिता की बहन, भाई और भांजे ने जिला न्यायालय में उस की अपील कर रखी है जिस के दौरान ही आप के पिताजी का देहान्त हो गया।

इस तरह किसी भी मुकदमे में किसी पक्षकार का देहान्त हो जाने पर प्रक्रिया का उल्लेख दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 22 में वर्णित है।  किसी दीवानी वाद में मुकदमे को दायर करने वाले वादी, अपील में अपीलार्थी और आवेदन में प्रार्थी का यह दायित्व  है कि वह मरने वले पक्षकार की सूचना न्यायालय को दे और आवेदन करे कि उस के विधिक प्रतिनिथियों को रिकार्ड पर ले जिस से मुकदमा आगे चले।

आप के मुकदमे में यदि अपील आप के पिता की थी तो आप का दायित्व था कि आप उन के देहान्त के 90 दिनों में इस तरह का आवेदन प्रस्तुत करते। अन्यथा वह अपील एबेट हो कर खारिज हो जाती। आप के विवरण के अनुसार यह अपील आप के पिता के विरुद्ध अन्य अपीलार्थियों ने की थी। इस स्थिति में अपीलार्थियों का दायित्व है कि वे 90 दिनों में विधिक प्रतिनिधियों को रिकार्ड पर लिए जाने का आवेदन करें। यदि वे आवेदन नहीं करते हैं और आप के पिता को अनुपस्थित मान कर कोई निर्णय किया जाता है तो वह आप पर प्रभावी नहीं होगा। क्यों कि वह अपील ही एबेट हो चुकी होगी। लेकिन आप को तुरन्त अपने पिता के वकील से मिल कर उसे कहना चाहिए कि वह अदालत को आप के पिता के देहान्त की सूचना दे दे। जरूरत हो तो आप की ओर से विधिक प्रतिनिधि रिकार्ड पर लेने का आवेदन प्रस्तुत करे।

न्यायालय के किसी भी प्रकरण में समन / नोटिस की तामील जरूरी …

समस्या-

रागनी औसरने रायपुर, छत्तीसगढ़से पूछा है-

मेरा विवाह 8 मई 1997 को रायपुर के पास ही के गाँव में सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह सम्पन्न हुआ।दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करते हुए हमें दोपुत्र व एक पुत्री की प्राप्ति हुई। बड़ा पुत्र 16 सालमेरे पति के पास हैएवंएक पुत्री 13 साल व पुत्र 11 साल मेरे पास हैं। हम किराये का मकानलेकर रायपुर में रहते थे। मेरे पति को शराब पीने की गन्दी आदत थी और केवलमहीने में 15 से 20 दिन काम पर जाता था। शराब पीने के लिए घर का सामान बेचदेता था। घर में रखे मेरे एवं बच्चे का जेवर भी बेच देता था, और पैसे की बारबारमांग भी करता था। धमकी देता था और मारपीट भी करता था जिनकी लिखितशिकायत स्थानीय पुलिस थाना में भी की है। मै हमेशा तनाव में रहती थी। मेरापति हमें छोड़कर अपने माता पिताजी के पास चला गया अब मैं अपने दो बच्चो कोलेकर अपने माता पिता के घर आ गई। मैंने अपने वकील केमाध्यम से अपने पति के विरुद्ध भरण पोषण के लिए वाद दायर किया है। न्यायलय द्वारा पहली पेशी दी गई। पेशी पर जाने सेपता चला कि अदालत ने जो नोटिस भिजवाया था वह वापस आ गया। कारण जानने पर पता चलाकि मेरे पति के पिताजी यानि मेरे ससुरजी घरपर थे उन्हों ने यह कह करनोटिस वापस कर दिया की ये व्यक्ति [मेरे पति] अभी नहीं है और ये पत्र जिसकेनाम पर है उसी को दिया जाये। दुबारा नोटिस भिजवाया तो वह भी वापिस आ गया है।
मैंने अपने वकील से सलाह ली तो उन्हों ने बताय कि एकरास्ता और है कि हम ‘विशेष मजकूरी’ के माध्यम से नोटिस भिजवा सकते है, इसकेलिएघर के कोई एक सदस्य को नोटिस ले जाने वाले के साथ में जाना होगा। किन्तु मैंतो नहीं जा सकती, बच्चे छोटे हैं एवं मेरे पिताजी बीमार रहते हैं वह भीनहीं जा सकते।अगर मेरे पति न्यायलय द्वारा भेजे गए नोटिस को स्वीकारनहीं करता तो मैं आगे क्या करूँ जिससे मेरे पति न्यायालय के समक्ष उपस्थित होसकें। कृपया उचित सलाह व मार्गदर्शन देंI

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप ने भरण पोषण के लिए जो मुकदमा किया है वह किस कानून के अन्तर्गत किया है। भरण पोषण के लिए मुकदमा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125, घरेलू हिंसा से महिलाओँ का संरक्षण कानून की धारा 12 या हिन्दू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम के अन्तर्गत किया जा सकता है। संभावना इस बात की है कि आप का उक्त मुकदमा धारा-125 दं.प्र.सं. के अन्तर्गत है। इस प्रकरण में न्यायालय केवल प्रतिपक्षी की उपस्थिति में अथवा उस के वकील की उपस्थिति में ही साक्ष्य ग्रहण कर सकता है। वैसी स्थिति में आप के पति को समन की तामील होना जरूरी है। समन तामील हुए बिना मामला आगे नहीं बढ़ेगा। इस मामले में समन पुलिस के माध्यम से जाता है। वैसे भी किसी भी मामले में दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर दिए बिना न्यायालय कोई निर्णय या आदेश पारित नहीं कर सकता।

र के सदस्य को मजकूरी के साथ जाने की बात तभी उत्पन्न होती जब कि समन की तामील निशादेही से कराई जाए। इस के लिए जरूरी नहीं कि घर का कोई सदस्य ही साथ जाए। आप का कोई पड़ौसी, रिश्तेदार या परिचित भी मजकूरी के साथ जा सकता है। आप खुद जाने से क्यों कतरा रही हैं, आप खुद भी मजकूरी के साथ जा सकती हैं।

स का तरीका यह है कि आप या आप के वकील न्यायालय से निवेदन करें कि आपका पति जानबूझ कर समन लेने से बच रहा है। इस कारण समन सीधे जिले के एस.पी. को इस निर्देश के साथ भिजवाएँ कि आवश्यक रूप से तामील कराई जाए। एसपी के नाम निर्देश जाने पर समन की तामील जल्दी हो सकती है। वैसे इस मामले में जैसी सलाह आप का वकील आप को दे आप को वही करना चाहिए।

नाम या पिता का नाम परिवर्तन की प्रक्रिया

समस्या-

दिल्ली से मनोज शर्मा ने पूछा है –

मेरा पहली पत्नी से तलाक होने के बाद मेरा दूसरा विवाह हुआ,  मेरी दूसरी पत्नी मुझसे विवाह पूर्व {विधवा} थी ,तथा उनके पास एक दस वर्षीय बिटिया भी थी, जो अब हमारे साथ ही है,  तथा केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ती है,  मेरा पहली पत्नी से एक [दस वर्षीय] बेटा है,  अब हमारे दोनों बच्चे हमारे साथ रहते हैं , मगर दोनों बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में माता/पिता का नाम भिन्न है जैसे बिटिया के उन [मृत] पिता के नाम के साथ [ Late.sh….] लगाया जाता है, जो मुझे और मेरी पत्नी को ठीक नहीं लगता,  मैंने कुछ अध्यापकों से बात कर , प्रिंसिपल से मिला और उनके कहने पर पहले नोटरी से ,फिर रजिस्ट्रार दफ्तर से अडॉप्ट डीड रजिस्टर करवा कर, तथा शादी के फोटो, और प्रार्थना पत्र [ पत्नी की तरफ से] पूरी फाईल बनाकर स्कूल में दे दी,  दो-तीन महीने बाद प्रिंसिपल महोदय ने कहा कि ये फाईल कमिश्नर साहब ने रोक दी है, कि ऐसे नाम नहीं बदला जाता है, इससे थक कर मैंने बेटे के स्कूल [जो DAV में पढता है] में पिता का नाम बदलवाने की अपनी कोशिश रोक दी ,कृपया मार्गदर्शन करे क्या हम ये काम कानूनन करवा सकते है …यदि हाँ …तो कैसे?

समाधान-

name changeकिसी भी बालक को दत्तक ग्रहण के बाद माता पिता का नाम कभी भी बदलवाया जा सकता है। लेकिन प्रत्येक राज्य में उस की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। आप ने उस का प्रारंभिक चरण दत्तक विलेख को पंजीकृत करवा कर पूरा कर भी लिया है। लेकिन यह सब अधूरा है। आप के नाम बदलने के आवेदन की पत्रावली कमिश्नर कार्यालय में अटकी है। आप को कमिश्नर कार्यालय में पूछना चाहिए कि नाम बदलवाने के लिए क्या प्रक्रिया और होनी शेष है और उन के द्वारा बताई गई प्रक्रिया को पूर्ण कर लेना चाहिए। तब फिर नाम बदलने में कोई बाधा नहीं रहेगी।

म तौर पर नाम परिवर्तन के लिए प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समक्ष इस आशय का एक शपथ पत्र तस्दीक करवाना पड़ेगा जिस में आप यह लिखेंगे के आप ने उक्त बालक को दत्तक ग्रहण कर लिया है। इस कारण पिता का नाम बदल गया है। अब इसे रिकार्ड में बदलवाना चाहते हैं। इस शपथ पत्र को अपने पास रखें और इस की एक सूचना स्थानीय अखबार में प्रकाशित करवाएँ कि दत्तक ग्रहण के कारण पिता का नाम परिवर्तित हो गया है। शपथ पत्र और अखबार में प्रकाशित सूचना की कटिंग के साथ आप सरकारी प्रेस से फार्म ले कर उसे भर कर वहाँ दे दें आवश्यक फीस जमा करवा दें। इस से दिल्ली/भारत सरकार के गजट में नाम परिवर्तन की सूचना प्रकाशित होगी। इस गजट सूचना को संभाल कर रखें। अब आप शपथ पत्र, अखबार की सूचना और गजट प्रकाशन की प्रतियों के साथ विभाग में आवेदन करें। रिकार्ड में नाम परिवर्तित हो जाएगा। लेकिन इस प्रक्रिया में प्रत्येक राज्य में मामूली हेर-फेर हो सकता है, इस कारण पहले कमिश्नर कार्यालय से पता कर लें कि उक्त प्रक्रिया के अतिरिक्त और क्या क्या करना होगा। यदि कमिश्नर कार्यालय तुरंत जवाब न दे तो आरटीआई के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर दत्तक ग्रहण विलेख के आधार पर नाम परिवर्तन की प्रक्रिया पूछ लें।

नाम परिवर्तित करने की प्रक्रिया

समस्या-

जयपुर, राजस्थान से कृष्ण कुमार ने पूछा है-

मेरा नाम कृष्ण कुमार है मैं अपने नाम को बदलना चाहता हूँ।  नाम बदलने की प्रक्रिया क्या है?

समाधान-

पना नाम बदलने के लिए सब से पहले आप को एक शपथ पत्र वांछित मूल्य के नॉन ज्युडीशियल स्टाम्प पेपर (राजस्थान में दस रुपए का) अपने नाम से खरीद कर उस पर एक शपथ पत्र इस आशय का टाइप करवाना होगा कि आप का पुराना नाम ‘क’ है जिसे आप बदल कर ‘ख’ करना चाहते हैं।  इस शपथ पत्र को एक आवेदन पत्र के साथ अपने क्षेत्र के कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष सत्यापित कराने के लिए प्रस्तुत करना होगा। इसे सत्यापित करवाने के उपरान्त किसी अच्छी वितरण संख्या वाले समाचार पत्र में एक विज्ञापन प्रकाशित करवाना होगा कि आप का पुराना नाम ‘क’ था जिसे आप बदल कर ‘ख’ कर लिया है।

स सत्यापित शपथ पत्र और विज्ञापन वाले समाचार पत्र की एक प्रति के साथ राज्य की राजधानी में स्थित राजकीय प्रेस पर एक आवेदन देना होगा कि आप अपना नाम बदलने की सूचना राजकीय गजट में प्रकाशित करवाना चाहते हैं। राजकीय प्रेस आप से निर्धारित शुल्क ले कर नाम परिवर्तन की सूचना गजट में प्रकाशित कर देगा। इस के बाद आप गजट की कुछ प्रतियाँ खरीद कर अपने पास रख लें।  गजट की ये प्रतियाँ ही आप के नाम परिवर्तन का सबूत होंगी। आप गजट की इन प्रतियों को प्रस्तुत कर अपने सभी दस्तावेजों और रिकार्ड में अपना परिवर्तित नाम दर्ज करवा सकते हैं।

अपील और पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) में क्या अन्तर है?

समस्या-

पील और रिवीजन पिटीशन में क्या अंतर है? लोग राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपील या रिवीजन क्यों प्रस्तुत करते हैं?

-बबीता वाधवानी, जयपुर, राजस्थान

समाधान-

प की समस्या एक उपभोक्ता विवाद से संबंधित है।  हमारे यहाँ उपभोक्ता विवादों को सुलझाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 अधिनियमन किया गया है। इस अधिनियम की धारा-12 सपठित धारा 11 (1) के अंतर्गत कोई भी उपभोक्ता 20 लाख रुपए तक के मूल्य के उपभोक्ता विवाद की शिकायत जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच को प्रस्तुत कर  सकता है।  20 लाख से अधिक और अधिनियम की धारा-17 (a) (i)  के अंतर्गत एक करोड़ रुपये तक के मूल्य के उपभोक्ता विवाद की शिकायत राज्य उपभोक्ता आयोग को तथा अधिनियम की धारा-21 (a) (i)  के अंतर्गत एक करोड़ से अधिक मूल्य के उपभोक्ता विवाद की शिकायत राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग को प्रस्तुत कर सकता है।

किसी भी उपभोक्ता विवाद में जिला मंच द्वारा दिए गए अंतिम आदेश की अपील अधिनियम की धारा-17 (a) (ii)  के अंतर्गत राज्य आयोग को प्रस्तुत की जा सकती है। जिस में वह अंतिम आदेश पारित कर सकता है।  इसी तरह राज्य आयोग द्वारा किसी उपभोक्ता विवाद में अधिनियम की धारा-17 (a) (i)  के अंतर्गत ग्रहण की गई उपभोक्ता विवाद में दिए गए आदेश की अपील राष्ट्रीय आयोग को अधिनियम की धारा-21 (a) (ii)  के अंतर्गत प्रस्तुत की जा सकती है। राष्ट्रीय आयोग द्वारा अधिनियम की धारा-21 (a) (i)  के अंतर्गत ग्रहण किए गए उपभोक्ता विवाद के अंतिम आदेश की अपील अधिनियम की धारा-23 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को प्रस्तुत की जा सकती है।

दि किसी उपभोक्ता विवाद में जिला मंच द्वारा अंतिम आदेश पारित किया जाता है और राज्य आयोग के समक्ष उस आदेश की अपील प्रस्तुत की जाती है तथा राज्य आयोग उस अपील में अपील को स्वीकार करते हुए अथवा उसे अस्वीकार करते हुए  कोई आदेश पारित करता है तो राज्य आयोग द्वारा अपील का निस्तारण करते हुए दिए गए आदेश की कोई अपील करने का कोई उपबंध उपभोक्ता संरक्षण में नहीं दिया गया है। इस का सीधा अर्थ यह है कि इस अधिनियम में दूसरी अपील करने का कोई अधिकार किसी पक्षकार को प्रदान नहीं किया गया है। ऐसी अवस्था में यदि राज्य आयोग द्वारा किसी अपील का निस्तारण करते हुए कोई आदेश दिया जाता है और उस से किसी पक्षकार को कोई नाराजगी है तो वह अपील प्रस्तुत नहीं कर सकता और उसे इस अधिनियम में दिए गए अन्य उपाय का सहारा लेना पड़ेगा।

पभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा  21 (b) द्वारा राष्ट्रीय आयोग को यह क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है कि वह किसी भी राज्य आयोग के समक्ष लंबित या उस के द्वारा निर्णीत किए गए किसी मामले में राज्य आयोग द्वारा उसे कानून से प्रदत्त नहीं किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग करने पर या उसे प्रदत्त किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में असफल रहने पर  अथवा अवैधानिक रूप से या तात्विक अनियमितता के साथ क्षेत्राधिकार का उपयोग करने पर रिकार्ड मंगा सकता है और उचित आदेश पारित कर सकता है। इसी अधिकार को पुनरीक्षण (रिविजन) कहा जाता है।

स प्रकार जब अपील का उपचार उपभोक्ता विवाद के किसी पक्षकार को उपलब्ध नहीं होता है तो वह रिविजन पिटीशन या पुनरीक्षण याचिका के उपचार का प्रयोग करता है।  अपील तथा पुनरीक्षण याचिका में न्यायालय का क्षेत्राधिकार भिन्न होता है।  जहाँ अपील में विवेच्य आदेश के विरुद्ध सभी बिन्दुओं पर विचार किया जा सकता है वहाँ पुनरीक्षण याचिका में न्यायालय केवल इसी बात पर विचार कर सकता है कि क्या राज्य आयोग ने  उसे कानून से प्रदत्त नहीं किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग किया है या वह उसे प्रदत्त किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में असफल रहा है अथवा उस ने अवैधानिक रूप से या तात्विक अनियमितता के साथ क्षेत्राधिकार का उपयोग किया है।

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र कितने दिन में बनेगा?

 एक पाठक आशीष ने पूछा है 

त्तराधिकार प्रमाण पत्र बनाने में कितना समय लगता है?

 उत्तर –
आशीष जी,

प ने बहुत मासूम सवाल पूछा है। उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनाने का कार्य जिला न्यायाधीश का है। जिला न्यायाधीश को इस के लिए पूरी प्रक्रिया का अनुपालन करना होता है। प्रक्रिया इस प्रकार है कि आप को आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। उस की जाँच के लिए तिथि निश्चित हो जाएगी। अदालत का पेशकार उस में अपनी रिपोर्ट देगा। यदि सब कुछ सही पाया गया तो अदालत आवेदन को दर्ज कर के नोटिस जारी करने का आदेश देगी। अन्यथा आवेदन की कमियों की पूर्ति के लिए तिथि निश्चित कर देगी कमी पूर्ति के बाद ही आवेदन दर्ज हो कर नोटिस जारी होगा। आप ने अपने आवेदन में जिन व्यक्तियों को पक्षकार बनाया होगा उन्हें नोटिस प्राप्त हो जाने पर अदालत एक सामान्य नोटिस समाचार पत्र में प्रकाशित कराने को कहेगी। सामान्य नोटिस अखबार में प्रकाशित हो जाने पर यदि किसी पक्ष द्वारा कोई आपत्ति नहीं की जाती है तो अदालत इस तथ्य की साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर आप को देगी कि आप संबंधित संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। यदि किसी पक्ष द्वारा आपत्ति प्रस्तुत की गई है तो उस पक्ष को भी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा। इस के बाद सभी पक्षों के तर्क सुन कर न्यायालय यह निर्णय करेगा कि आप को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया जाए अथवा नहीं।

निर्णय हो जाने पर आप को निश्चित न्याय शुल्क के न्याय शुल्क के स्टाम्प प्रमाण पत्र के लिए प्रस्तुत करने होंगे। उन स्टाम्पों पर ही उत्तराधिकार प्रमाण पत्र टंकित होगा और जिला न्यायाधीश के हस्ताक्षरों से जारी हो कर आप को प्राप्त होगा। यदि सब कुछ सामान्य रहा तो इस मामले में कम से कम दस पेशियाँ तो हो ही जाएँगी। यदि आपत्तियाँ प्रस्तुत हुई तो इस की दुगनी और तिगुनी पेशियाँ भी हो सकती हैं। दो पेशियों के बीच कितना समय लगेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत में सभी प्रकार के कितने मुकदमे लंबित हैं। यदि अदालत के पास अधिक काम होगा तो दो पेशी में तीन चार माह का अन्तराल हो सकता है और काम कम हुआ तो भी कम से कम एक माह का समय तो होगा ही। इस तरह उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त होने में एक वर्ष के लगभग समय कम से कम लगेगा। मुझे एक उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आज ही बन कर मिला है जिस में पक्षकारों के बीच गंभीर मतभेद थे। यह आवेदन 1999 में प्रस्तुत किया गया था और इस में निर्णय 4 अगस्त 2011 को हो सका है इस तरह इस मामले में तेरह वर्ष बाद उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बन सका है। उस में भी यह आशंका है कि विपक्षी उच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत करने का मन बना रहा है।

भारत में न्यायालयों की संख्या आवश्यकता की 20 प्रतिशत से भी कम है। इस कारण सभी प्रकार के मुकदमों में समय अधिक लगता है। लेकिन उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने का कोई अन्य उपाय नहीं है। इस कारण से आप को तुरंत आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए। जिन राशियों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करना है वे उस के बिना तो आप को मिलने से रही। इस लिये कितना भी समय लगे और कोई चारा भी तो नहीं है।

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