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संज्ञेय, असंज्ञेय, जमानती व ग़ैरजमानती अपराध और अग्रिम जमानत

समस्या-

शमशेर ने बीकानेर, राजस्थान से पूछा है-

हत्या का प्रयास करने वाले अपराधी को पुलिस को सौंप दिया। लेकिन पुलिस ने उसे बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये छोड़ दिया।  अब पुलिस कहती है कि उसकी जमानत हो गयी है। क्या पुलिस थाने में जमानत होती है? क्या अगर होती है, तो पुलिस उसे वापिस कब लाएगी?

समाधान-

शमशेर भाई, साधारण लोग चीजों को ठीक से समझने की कोशिश नहीं करते। असल में चीजें बिना कोशिश के समझ नहीं आतीं। आप थोड़ा कोशिश करते तो यह सब आप को भी समझ आ जाता। कोशिश से हमारा मतलब कुछ आसपास के जानकार लोगों से पूछना और जरूरत पड़ने पर किसी किताब का सहारा लेना भी है। खैर, आप का यहाँ यह सवाल पूछना भी एक कोशिश ही है, इस कोशिश के लिए आप को बधाई¡

सब से पहली बात तो ये कि आप ने “अपराधी” शब्द का गलत प्रयोग किया है। अपराधी का अर्थ होता है जिस के विरुद्ध किसी अपराध का आरोप अदालत ने सिद्ध मान लिया हो। जब तक उस पर आरोप होता है वह “अभियुक्त” या “मुलज़िम” कहलाता है। जैसे ही अपराध सिद्ध हो जाता है, उसे “अपराधी” या “मुज़रिम” कहा जा सकता है। यहाँ आप को इस के लिए अभियुक्त शब्द का प्रयोग करना चाहिए था।

दूसरी बात ये कि जमानत पुलिस थाना में भी होती है और अदालत में भी होती है। अपराध दो तरह के होते हैं, एक तो संज्ञेय और दूसरे असंज्ञेय। संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस उसे प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप  में दर्ज करती है और अनुसंधान आरंभ कर देती है, असंज्ञेय अपराधों के मामले में सूचना को पुलिस केवल रोजनामचे में दर्ज करती है और सूचना देने वाले को कहती है कि यह असंज्ञेय मामला है इस कारण वह सीधे मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद प्रस्तुत करे। असंज्ञेय मामलों पर मजिस्ट्रेट प्रसंज्ञान ले कर सुनवाई के लिए तलब कर सकता है।

अब संज्ञेय मामलों में भी दो तरह के मामले होते हैं। जमानती और ग़ैरजमानती। जमानती मामलों में अभियुक्त के गिरफ्तार होने पर पुलिस खुद जमानत ले लेती है, बल्कि ऐसे मामलों में अभियुक्त से पुलिस को पूछना जरूरी होता है कि वह जमानत पेश करे तो उसे छोड़ दिया जाएगा। अभियुक्त अक्सर जमानत पेश करते हैं और रिहा हो जाते हैं। गैर जमानती मामलों में पुलिस जमानत नहीं ले सकती। उसे गिरफ्तार करने पर 24 घंटों में अदालत में पेश करना होता है। वहाँ अभियुक्त जमानत की अर्जी पेश कर सकता है और मजिस्ट्रेट जमानत ले कर उसे रिहा कर सकता है।

जो अपराध गैरजमानती हैं उनमें भी अभियुक्त चाहे तो पहले से सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दे सकता है और सेशन न्यायालय पुलि से उस मामले की डायरी मंगा कर सुनवाई कर सकती है। उचित होने पर उसे अग्रिम जमानत का लाभ देते हुए आदेश दे सकती है कि उसे गिरफ्तार करने की जरूरत हो तो उसे जमानत ले कर छोड़ दिया जाए।

हत्या का प्रयास करने का अपराध गैरजमाती है। इस कारण यदि अभियुक्त को पुलिस को सौंप दिया गया है तो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना पुलिस के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि अभियुक्त ने पहले से ही अग्रिम जमानत का आदेश ले रखा है तो पुलिस को उसे जमानत पर छोड़ना जरूरी है। आप के मामले में यही हुआ होगा। अब जब पुलिस मजिस्ट्रेट के समक्ष उस मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत करेगी तब अभियुक्त को सूचित करेगी और उसे मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। वहाँ उसे दुबारा जमानत पेश करनी होगी।

पुलिस कार्यवाही पर उतारू पत्नी मायके में है तो सतर्कता जरूरी है

 जितेन्द्र त्रिवेदी ने पूछा है –
मेरा विवाह 24 नवम्बर 2008 को भोपाल में संपन्न हुआ। लड़की वाले राजस्थान से आए थे। विवाह के कुछ दिन बाद मेरी पत्नी घर से अलग किराए के घर में रहने की जिद करने लगी। ऐसा नहीं करने पर मेरी माँ और बहिन को दहेज के आधार पर जेल भेजने की धमकी देने लगी और उस के साथ उस के माता-पिता और जीजा, जीजी जो मेरे घर के पास ही ही रहते हैं धमकाने लगे। मेरे घर में मैं मेरी माँ और बहिन हम तीन ही व्यक्ति हैं। मेरी सरकारी नौकरी है। मेरी पत्नी हर 15 दिन में अपने मायके चली जाती। शादी के बपाद वह 1 माह 20 दिन ही हमारे घर पर रही है, बाकी अपने मायके में ही रही है। उस ने अपने गर्भवती होने की बात मुझ से छिपाई और जून 2009 में राजस्थान में अपने मायके में गर्भपात करवा लिया। अगस्त 2009 में वह तभी मेरे साथ रहने आई जब मैं ने किराए पर अलग कमरा ले लिया। अक्टूबर 2009 में वह पुनः गर्भवती हो गई और मैं उसे डाक्टर के पास जाँच के लिए ले गया तो मुझे पता लगा कि वह पहले भी गर्भपात करवा चुकी है। डाक्टर के पर्चे पर भी अंकित है कि 2009 में रोगी ने गर्भपात कराया है। फिर उस ने अपने पिताजी को फोन कर के बुलाया और 23 जनवरी 2010 को मेरे काम पर चले जाने के बाद मुझे बताए बिना अपने मायके चली गई। उस दिन से मेरा उस से कोई सम्पर्क नहीं हो सका है। जून में संतान का जन्म होना था, उस की भी आज तक कोई सूचना नहीं है। मैं ने उस के जीजा से बात की उस ने बताया कि तुम वहाँ गए तो तुम्हें मरवा देंगे।  
1 जनवरी 2011 को मैं ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के न्यायालय में धारा 9-ए हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर दिया है। मार्च 29 को उस में पेशी थी लेकिन वह नहीं आई। 26 मई 2011 उस ने वकील के माध्यम से दहेज प्रताड़ना व स्त्री-धन हड़पने का नोटिस भेजा जिस का उत्तर मेरी वकील ने दे दिया है। 18 जुलाई को फिर पेशी थी वह फिर नहीं आई। मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। तनाव के कारण मेरा दिमाग ठीक से काम नहीं करता। दो माह से नौकरी पर नहीं जा पा रहा हूँ। वह मेरे साथ नहीं रहना चाहती है और न ही उस के माता-पिता कोई फैसला करना चाहते हैं। मेरा पत्नी से संपर्क हुए दो वर्ष हो जाएंगे। न मेरी फोन पर बात हुई और उधर से कोई संदश भी नहीं है। कृपया आप सलाह दें कि क्या वे मुझे दहेज के मामले में फँसा सकते हैं क्यूँ कि मेरा विवाह भोपाल में संपन्न हुआ था। क्या वह दो वर्ष से अलग रहने के बाद भी मेरे विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है? यदि वह कोई प्र.सू.रिपोर्ट करवाती है तो क्या वह राजस्थान में दर्ज होगी अथवा भोपाल में?

 उत्तर –

जितेन्द्र जी,

प का विवाह भोपाल में संपन्न हुआ है और पत्नी ने आप के साथ भोपाल में ही निवास किया है। इस कारण से स्त्री-धन वापसी के लिए धारा 406 तथा पत्नी के प्रति क्रूरता के लिए धारा 198-ए का मामला यदि कोई बनेगा तो उस के लिए भोपाल में ही क्षेत्राधिकार होगा, न कि राजस्थान में। दो वर्ष बाद भी आप की पत्नी आप के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है क्यों कि उक्त दोनों ही मामलों में अधिकतम दण्ड तीन वर्ष तक का कारावास है तथा दोनों में प्रसंज्ञान लिए जाने की अवधि तीन वर्ष की है और दोनों

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के उपरांत पुलिस के कर्तव्य

पिछले आलेख संज्ञेय और असंज्ञेय अपराधों व मामलों की पुलिस को सूचना में हम ने जाना कि अपराधिक मामले दो प्रकार के हो सकते हैं। एक वह जिस में कोई  संज्ञेय अपराध हुआ हो और दूसरा वह जो केवल असंज्ञेय अपराध से संबद्ध हो। पुलिस के लिए दोनों ही मामलों की रिपोर्ट दर्ज करना जरूरी है। संज्ञेय मामलों में वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करेगी और अन्वेषण भी आरंभ करेगी। प्रत्येक ऐसे संज्ञेय मामले में जो उस पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में घटित हुआ है उस थाने का भारसाधक अधिकारी अन्वेषण आरंभ कर सकता है और उस के अन्वेषण आरंभ करने में यह आपत्ति नहीं की जा सकती कि उसे उस मामले के अन्वेषण का अधिकार नहीं था। दं.प्र.सं. की धारा 190 के अंतर्गत शक्ति प्राप्त मजिस्ट्रेट भी पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी को किसी मामले का अन्वेषण करने का आदेश दे सकती है।
दि किसी पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के पास यह संदेह करने का कारण है कि कोई संज्ञेय अपराध किया गया है जिस का अन्वेषण करने के लिए वह धारा 156 के अंतर्गत सक्षम है तो  धारा 157 के अंतर्गत उसकी रिपोर्ट तत्काल उस मजिस्ट्रेट को प्रेषित करेगा जो उस मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का अन्वेषण करने के लिए और यदि आवश्यक हो तो अपराधी का पता लगाने और उस की गिरफ्तारी के उपाय करने के लिए उपयुक्त स्थान पर या तो खुद जाएगा या अपने किसी अधीनस्थ अधिकारी को भेजेगा जो राज्य सरकार द्वारा इस कार्य के लिए निर्धारित कम से कम न्यूनतम रेंक का हो। लेकिन जब उस व्यक्ति का नाम ले कर रिपोर्ट की गई है जिस ने अपराध किया है तो उस का या किसी अधीनस्थ अधिकारी का वहाँ जाना आवश्यक नहीं होगा। यदि पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी को विश्वास हो जाए कि अन्वेषण के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह उस मामले का अन्वेषण नहीं करेगा। लेकिन ऐसी स्थिति में अपराध की सूचना देने वाले व्यक्ति को सूचित किया जाएगा कि मामला अन्वेषण योग्य नहीं है। 

धारा 157 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को भेजे जाने वाली रिपोर्ट किसी ऐसे वरिष्ट अधिकारी के माध्यम से भेजी जाएगी जिसे राज्य सरकार विहित करे। ऐसा वरिष्ट अधिकारी पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी को उचित अनुदेश दे सकता है और उस रिपोर्ट पर अनुदेश लिखने के उपरांत तुरंत मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करेगा। मजिस्ट्रेट ऐसी रिपोर्ट आने पर धारा 159 के अंतर्गत अन्वेषण करने के लिए आदेश दे सकता है। यदि वह दं.प्र.सं. के अंतर्गत उपबंधित रीति से मामले की प्रारंभिक जाँच करने के लिए या उसे निपटाने के लिए तुरंत कार्यवाही कर सकता है या अपने किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को कार्यवाही करने के लिए प्रतिनियुक्त कर सकता है।

संज्ञेय और असंज्ञेय अपराधों व मामलों की पुलिस को सूचना

पिछले आलेख में हमने तनु गौड़ के प्रश्न के उत्तर में अपराधों का प्रसंज्ञान लिए जाने की परिसीमा की बात की थी। वहाँ प्रसंज्ञान शब्द का बहुत प्रयोग हुआ था। आज हम इसी पर बात करेंगे।
ह तो आप पिछले आलेख में जान चुके हैं कि दंड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची के कॉलम सं. 4 में भारतीय दंड संहिता में वर्णित प्रत्येक अपराध के लिए यह अंकित किया गया है कि वह अपराध संज्ञेय है अथवा असंज्ञेय। इस से स्पष्ट है कि कोई अपराध संज्ञेय है या नहीं है इस बात को केवल विधि द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है। अब हम देखेंगे कि किसी अपराध के संज्ञेय होने और असंज्ञेय होने से दोनों के चरित्र में क्या अंतर आता है?
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 में कुछ शब्दों को परिभाषित किया गया है। इसी धारा की उपधारा (क) में “संज्ञेय अपराध” को इस तरह परिभाषित किया गया है …
(क) “संज्ञेय अपराध” से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जिस के लिए और “संज्ञेय मामला” से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिस में, पुलिस अधिकारी प्रथम अनुसूची के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अनुसार वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकता है। 
संज्ञेय मामलों में पुलिस को सूचना और अन्वेषण
स तरह यह तो स्पष्ट हो गया है कि किसी भी संज्ञेय मामले में पुलिस किसी भी व्यक्ति को वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकती है। संज्ञेय मामला ऐसा मामला है जिस में पुलिस किसी संज्ञेय अपराध का अन्वेषण करती है।
दि किसी भी अपराध की सूचना कोई भी व्यक्ति पुलिस को देता है तो संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस थाने का भार साधक अधिकारी दं.प्र.सं. की धारा 154 के अंतर्गत यदि सूचना मौखिक दी गई है तो वह उस के द्वारा अथवा उस के निर्देश के अनुसार लेखबद्ध की जाएगी और सूचना देने वाले को पढ़ कर सुनाई जाएगी, तदुपरांत उस पर सूचना देने वाले के हस्ताक्षर कराए जाएंगे और उस का सार  राज्य सरकार द्वारा विहित पुस्तक में रखा जाएगा। इस तरह पुलिस द्वारा लिखी गई सूचना की प्रतिलिपि सूचना देने वाले को तत्काल निशुल्क दी जाएगी।
दि पुलिस ऐसी रिपोर्ट लिखने से इन्कार करती है तो व्यथित व्यक्ति ऐसी सूचना का सार लिखित में और डाक द्वारा संबद्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है। यदि पुलिस अधीक्षक को समाधान हो जाता है कि ऐसी सूचना से किसी संज्ञेय अपराध का घटित होना प्रकट होता है तो वह स्वयं मामले का अन्वेषण कर सकता है या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी को उस अपराध के संबंध में अपराध का अन्वेषण करने का निर्दश देगा। अन्वेषण करने वाले अधिकारी को संबंधित पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी की सभी शक्तियाँ होंगी।    
असंज्ञेय मामलों में पुलिस को सूचना और अन्वेषण
लेकिन यदि ऐसी सूचना किसी ऐसे अपराध के मामले में है जो कि असंज्ञेय अपराध है तो वह ऐसी सूचना का सार राज्य सरकार द्वारा निर्धारित प्ररूप और पुस्तक में लिखा जाएगा, और पुलिस अधिकारी सूचना देने वाले को मज
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