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कोशिश है कि तीसरा खंबा पहले की तरह नियमित हो।

पाठकों और मित्रों!

ज वर्ष 1917 का आखिरी दिन है। इस वर्ष तीसरा खंबा को हम उतना नियमित नहीं रख सके जितना इसे होना चाहिए था। इस के पीछे मेरी स्वयं की अतिव्यस्तता रही। यह वर्ष अनेक मामलों में मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से ठीक नही ंरहा। मेरा अजीज परिजन मेरी उत्तमार्ध का छोटा भाई ब्रिजेश त्रिवेदी विगत वर्ष से ही नॉन हॉकिङ्सन लिम्फोमा नाम के कैंसर पीड़ित पाया गया। यह लिम्फेटिक सिस्टम और रक्त में मौजूद लिम्फोसाइट कोषिकाओं में होने वाला कैंसर है। हम सब ने खूब प्रयास किया कि इस कैंसर पर विजय प्राप्त कर ली जाए।लेकिन यह संभव नहीं हो सका। डेढ़ वर्ष की चिकित्सा के उपरान्त इसी माह 11 दिसम्बर को सुबह 5.20 बजे ब्रिजेश ने अपनी अन्तिम साँस ले कर हम सब को  छोड़ दिया।

यह बाद में पता लगता है कि कौन व्यक्ति कैसा है। जब हम ब्रिजेश के गृहनगर अकलेरा जिला झालावाड़ (राजस्थान) पहुँचे तो उस के व्यक्तित्व के अनछुए पहलू ुउजागर हुए। वह यूँ तो मेडीकल स्टोर चलाता था। लेकिन बी फार्मा होने के कारण बिना चिकित्सक की सलाह के भी दवा देने का अधिकारी था। उस की दुकान पर रोगी सीधे दवाएं लेने पहुँच जाते थे। हमें पता लगा कि उस की दुकान से कोई भी रोगी दवा लिए बिना कभी वापस नहीं लौटा चाहे उस के पास दवा के लिए पैसा था या नहीं। यदि कोई दस रुपए लेकर भी उस की दुकान पर पहुँच जाता था तो भी उस का इलाज होता था। कभी उसे लगता कि रोग का कारण बीमारी नहीं बल्कि पर्याप्त भोजन नहीं मिलना था तो उस व्यक्ति के लिए भोजन की व्यवस्था भी होती थी। उस के अन्तिम संस्कार और अस्थि संचयन के दिन सैंकड़ों  नगर-ग्रामवासी गरीब और मध्यम वर्गीय लोग उस के लिए आँसू बहा रहे थे। अनेक कह  रहे थे कि अब बीमार होने पर वे किस के पास जाएंगे? उन की चिन्ता कौन करेगा?

हमारा पूरा परिवार मेरी उत्तमार्ध शोभा, पुत्री पूर्वा  और पुत्र वैभव सभी ने पूरी कोशिश की कि किसी तरह हम ब्रिजेश के प्राण बचा सकें। कम से कम कुछ वर्ष और उसे जीने का समय मिल जाए। लेकिन वह संभव नहीं हो सका। इस बीच कैंसर की बीमारी और उस की चिकित्सा के संबंध में अनेक पहलू सामने आए। कुल मिला कर इस बीमारी और इस की चिकित्सा पूरी तरह से दवा कंपनियों और चिकित्सकों के व्यापारिक हितों मे ंफंसी पड़ी है। रोग की चिकित्सा के अनेक पहलू जिन पर ध्यान देना चाहिए और जिन का शोध के माध्यम  से विकास होना चाहिए वे केवल इस कारण दम तोड़ देते हैं कि इस रोग के लिए महंगी दवाएँ बनाने वाले वैश्विक दवा उद्योग को अरबों रुपयों के दवा व्यापार से हाथ धोना पड़ेगा। अन्य अनेक बातें हैं जिन पर समय समय पर मैं अपने ब्लाग अनवरत पर और फेसबुक पर लिखता रहूँगा।

तीसरा खंबा को तकनीकी सहयोग करने वाले साथी बी एस पाबला जी भी विगत वर्षों में अनेक समस्याओं से जूझते रहे। पहले पुत्र ने उन्हें अलविदा कहा, फिर पिता भी विश्राम ले गए। इस बीच उन का स्वास्थ्य भी ठीक न रहा। लेकिन इस साइट के लिए वे समय निकाल कर तत्पर रहे। इस बीच मेरे पुत्र वैभव ने तीसरा खंबा की कुछ तकनीकी जिम्मेदारियाँ उठाने का स्वैच्छिक निर्णय किया। लेकिन वह भी इस वर्ष अपने मामा की चिकित्सा में व्यस्त रहा। कुल मिला कह यह वर्ष व्यक्तिगत रूप से तीसरा खंबा से जुड़े सभी पारिवारिक सदस्यों के लिए अत्यन्त विकट था और सभी को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

इस समय भी हम तकनीकी समस्या से जूझ रहे हैं जिस के कारण हमें तीसरा खंबा के कानूनी सलाह फार्म से मिलने वाली समस्याओं के ई मेल हम तक नहीं पहुंच पा रहे हैं और हमे वह व्यवस्था स्थगित करनी पड़ी। साधारण ई मेल मे ंपाठक समस्या का विवरण पूरी तरह नहीं देते, अनेक जरूरी तथ्यों को छुपा जाते हैं जिस के कारण कानूनी सलाह का महत्व समाप्त हो जाता है। फिर भी हमारी कोशिश है कि हम अधिकांश पाठकों की समस्याओं का हल प्रस्तुत करते रहें।

हमारी कोशिश रहेगी कि नए वर्ष में तीसरा खंबा पहले की तरह नियमित हो सके और, और अधिक लोगों की विधिक समस्याओं को हल करने में मदद कर सके।

सभी को नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ!!!

आप का

दिनेशराय द्विवेदी

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