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सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं।

समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

कानून के उल्लंघन पर अदालत के चक्कर काटना लाजमी है।

समस्या-

वनराजसिंह चौहण ने धामतवाण दश्कोई, अहमदाबाद से पूछा है-


मेरे दादाजी के पास 2 ऐकर पुश्तैनी जमीन है। दादाजी को 7 संतान हैं। 4 लडके 3 लड़कियाँ है। लडकियों की शादी हो चुकी है। दादाजी का ही पूरे 2 ऐक़ड़ में नाम है। वो जमीन दादाजी ने पैसे ले कर बेचदी है। कबजा भी दे दिया है। पैसा भी सब मिल गया है। दादाजी की 3 में से 1 लडकी ने सिविल कोर्ट में 2005 के उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन एक्ट के तहत हिस्सा मांगा है। दादाजी को कोर्ट के चक्कर काटने पड़े हैं। और जमीन का पैसा चारों लडकों को दे दिया है। इसका समाधान बताइए।

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन को अस्तित्व में आए 13 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। अभी तक भी यदि उसे लागू करने की इच्छा इस अधिनियम के अंतर्गत हिन्दू शब्द की परिभाषा में आने वाले तमाम समाजों में सहदायिक/ पुश्तैनी संपत्ति में पुत्रियों को पुत्रों के समान हिस्सा देने की मानसिकता नहीं बनी है और वे अपनी इच्छा से लड़कियों को दूसरे तरीकों से संपत्ति से वंचित करने की कोशिश करेंगे तो ये दिन तो देखने को मिलेंगे।

आप के दादाजी ने काम ही ऐसा किया है कि उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़ें। कोई भी व्यक्ति यदि कानून के विरुद्ध या उस के उल्लंघन में कोई काम करेगा तो उसे कभी भी और कितने भी समय तक के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ सकते हैं। चक्कर तो उसे भी काटने पड़ेंगे जिस ने दादाजी से यह माल खरीदा है। चूंकि हिस्सा मांगा है इस कारण से चारों पुत्रों और दो दूसरी पुत्रियों को भी अदालत का मुहँ देखना पड़ रहा होगा।

आप के दादाजी ने उस पुश्तैनी संपत्ति को बेच कर जो धन प्राप्त किया है वह भी सहदायिक संपत्ति है जो अब चारों भाइयों के पास है। इस कारण आप की बहिनें चारों भाइयों और दादाजी के विरुद्ध जमीन में या विक्रय से प्राप्त धन से अपना हि्स्सा मांग सकती हैं।

अब तो इस का एक ही रास्ता है। चारों भाई मिल कर तीनों बहिनों को मनाएँ और कहें कि वे उन्हें उनके हिस्से के बदले नकद धन देने को तैयार हैं। तीनों बहिनों को बिठा कर बात करें और एक समझौते पर पहुँचें जिस में तीनों बहिनें यह लिख कर देने को तैयार हों कि उन्हें जमीन बेचने से प्राप्त धनराशि में से उन के हिस्से की धनराशि मिल गयी है और अब इस मुकदमे को वे नहीं चलाना चाहती हैं। यह समझौता अदालत में पेश हो और इस के अनुसार अदालत अपना निर्णय पारित कर यह फैसला दे कि सभी उत्तराधिकारियों को उन का हिस्सा मिल चुका है। तभी इस विवाद से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 का संशोधन केवल सहदायिक संपत्ति पर प्रभावी है।

समस्या-

अमन ने 510 धानमंडी, जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी ने खुद के पैसे से 1976 में एक मकान खरीदा था। 1976 से अभी तक मैं और मेरी माताजी साथ रह रहे हैं। मेरी चार शादीशुदा बहनें हैं। मेरे पिताजी की 2001 में निर्वसीयत मृत्यु हो चुकी है। अभी मैंने मकान को वापस बनाया है। कानून मे बेटियों को 2005 में  हक दिया गया था। अब क्या मुझे बहनों हक-तर्कनामा की जरूरत पडेगी। मैने सुना है कि अगर बेटी अपना हक माँगती है तो पिता 9 दिसंबर 2005 को जीवित होना चाहिए। जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु 2005 अधिनियम लागू होने से पहले 2001 में हो चुकी है। अतः अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

आप 2005 के जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं वह कानून केवल पुश्तैनी / सहदायिक संपत्तियों के संबंध में है। आप का मकान आप के पिता ने खुद अपने धन से 1976 में खरीदा था। इस कारण वह उन की स्वअर्जित संपत्ति है। उस का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। आप के मामले में 1905 का संशोधन अधिनियम प्रभावी नहीं है।

धारा -8 के अनुसार मृतक पुरुष की पत्नी, पुत्र व पुत्रियाँ और माता समान हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप का मकान आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस में आप की माताजी, चार बहनों तथा आप सब को 1/6 हिस्सा प्राप्त है। इन में से कोई भी विभाजने की मांग कर सकता है और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

यदि आप की बहनें चाहती हैं कि उन का हिस्सा औऱ आप की माँ का हिस्सा भी आप को ही प्राप्त हो तो आप को आप की बहनों और माताजी से हक-त्याग विलेख या रीलीज डीड अपने हक में निष्पादित करानी होगी। तभी आप उक्त मकान के एक मात्र स्वामी हो सकते हैं।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

किसी की मृत्यु के समय कोई संपत्ति या ऋण न हो तो उत्तराधिकार भी नहीं हो सकता।

समस्या-

इन्‍द्र कुमार कंचनवार ने ग्राम बरघाट, ‍जिला सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता की दो पत्नियां थी।  एक पत्नी से 1 संतान। पहली पत्नू की मृत्‍यु के बाद मेरी माता जी से विवाह हुआ जिन से 2 बेटी एवं 2 बेटे हुए। मेरी सौतेली बहन को उसका हिस्‍सा 1974 में जब मेरा जन्‍म भी नहीं हुआ था, त‍ब उसे दे ‍दिया गया था ‍किन्‍तु उसे ‍बिक्री पत्र के माध्‍यम से ‍हिस्‍सा दिया गया। चूंकि मेरे पिता जी अनपढ थे, उन्‍हे लोगों न जबरन बहका दिया कि कहीं उस सौतेली संतान से तुम्‍हारा पुत्र वापस न जमीन ले ले इसलिए उसे रजिस्‍टरी कर के दे दो, ताकि वह वापस न ले सके। इसके बाद बहुत सालों तक अच्‍छा चल रहा था। ‍किन्‍तु बाद में हमारी सौतेली बहन से न बन पाने के कारण, वह अपना ‍हिस्‍सा लेना चाह रही है। ‍किन्‍तु मेरी ‍पिता जी ने अपने जीते हुए बाकी बची हुए जमीन को सन 1987 में हम दो भाईयों को आपसी बटवारा नामा के नाम से रजिस्‍टर्ड करवा के बटवारा कर ‍दिया गया है। क्‍या वह ‍हिस्‍सा ले सकती है। उसका नाम ‍रिकार्ड में कभी भी नहीं रहा है और न ही है कृपया समस्‍या का हल बताने का कष्‍ट करें।

समाधान-

पनी संपत्ति का जो हिस्सा आप के पिता ने आप की सौतेली बहिन को स्थानांतरित किया उसे आप हिस्सा कह रहे हैं, अपनी सुविधा से क्यों कि लिखित में तो वह बिक्री-पत्र है। आप की सौतेली बहिन उसे गिफ्ट भी कह सकती है। इस तरह तो विवाद सुलझने से रहा।

प के पिता की यह संपत्ति स्वअर्जित है तो फिर जो उन्हों ने रजिस्टर्ड बंटवारा नामा किया है वह अंतिम है। इस बंटवारे के कारण पिता की मृत्यु के समय आप के पिता के नाम कोई संपत्ति शेष रही नहीं थी तो आप की बहिन किस में हिस्सा मांगेगी?  किसी की मृत्यु के समय कोई संपत्ति या ऋण न हो तो उसका उत्तराधिकार भी नहीं हो सकता।आप की बहिन केवल आप को धमका सकती है, दिखाने को शिकायत मुकदमा कर सकती है पर उसे मिलेगा कुछ भी नहीं।

लेकिन यदि आप के पिता की संपत्ति पुश्तैनी-सहदायिक है अर्थात वह 17 जून 1956 के पहले किसी पूर्वज से आप के पिता या उन के पूर्वज को उत्तराधिकार में मिली थी तो स्थिति कुछ विकट हो सकती है। वैसी स्थिति में उस संपत्ति में से आप के पिता बेटी को केवल अपने हिस्से के बराबर ही हस्तांतरित कर सकते थे उस से अधिक नहीं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह हस्तांतरण कब किया गया था। आप  की सौतेली बहिन यदि हिस्से का दावा करती है तो उसे पूर्व में हस्तांतरित संपत्ति का प्रश्न भी उठेगा क्यों कि हिस्से का दावा तो तभी किया जा सकता है जब कि वह पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो। हमें नहीं लगता कि आप की सौतेली बहिन अब कोई हिस्सा ले सकती है। हाँ दावे के बहाने आप से अदलतों में कसरत जरूर करवा सकती है। जब वह दावा करें तब किसी अच्छे वकील से सलाह लीजिएगा।

में लगता है कि आप की सौतेली बहिन आप के व्यवहार से नाराज है। हो सकता है कभी किसी शादी ब्याह में उसे पर्याप्त मान न मिला हो।  बहिनें मान मनौवल से मान जाती हैं। तो उसे मान दीजिए, पिछली गलती के लिए माफी मांग लें। उसी से आप का काम बन जाएगा।

सहदायिक संपत्ति कभी अपना चरित्र नहीं खोती।

समस्या-

दीपक शर्मा ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-  

मेरे दादा जी तीन भाई थे तीनो भाइयों का मौखिक बंटवारा हुआ था और सम्पति के अलग अलग भाग पर अपना अपना कब्जा था, परंतु कोई रजिस्टर्ड बंटवारा नहीं हुआ था।, उन में से एक भाई व उन की पत्नी का 1961 में बिना औलाद स्वर्गवास हो गया। मेरे दादा जी से पिता जी (पिता जी का जन्म 1938) को एक सम्पति मिली दादा जी का स्वर्गवास 1966 में हो गया, उस के बाद मेरा जन्म 1969 में हुआ। हम दो भाई हैं, दूसरा भाई 5 साल छोटा है, दादी का स्वर्गवास 1985 में हुआ था, माँ का भी स्वर्गवास 2005 में हो गया।  मेरे पिता जी के एक भाई व एक बहन हैं, पर मेरे पिता जी ने अपने भाई व बहन को भी कुछ भी नही दिया। अब पिताजी मुझे भी कुछ भी नही देना चाहते। छोटा भाई व पिताजी मिलकर ये सम्पति किसी को बेचकर या गिफ्ट दिखाकर रुपये लेना चाहते हैं। अभी पूरी सम्पति किराये पर दे रखी हैं, किराया पिताजी ही लेते हैं ,पिता जी का ही कब्जा है।  पिता जी के भाई व पिता जी की बहन इस मामले से दूर रहना चाहते हैं। क्या मेरे दादा जी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले होने की वजह से मेंरा इस सम्पति में कोई अधिकार नही होगा? परंतु मेरे जन्म के वक्त दादी तो थी। क्या में न्यायालय में केस कर सकता हूं और कौन से सक्शन के तहत में केस करु?

समाधान-

प के दादाजी तीन भाई थे उन में किसी संपत्ति का मौखिक बँटवारा हुआ, अर्थात वह संपत्ति संयुक्त थी और संभवतः वह उन्हें उन के पिता से प्राप्त हुई थी। यदि दादाजी के पिता जी का देहान्त 1956 के पहले हो चुका था तो इस तरह तीनों भाइयों को प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी और सहदायिक थी।  एक बार जो संपत्ति सहदायिक हो जाती है वह अपनाा सहदायिक होने का तब तक कभी अपना चरित्र नहीं खोती जब तक कि वह किसी अन्य व्यक्ति को उत्तराधिकार के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से हस्तान्तरित न हो जाए।

 

स तरह आप के दादाजी व उन के भाइयों को उस में जन्म से अधिकार प्राप्त था। तीन में से एक भाई का स्वर्गवास बिना वारिस हो गया। उन की संपत्ति भी दोनों भाइयों को मिल गयी होगी या उस का क्या हुआ आप बेहतर जानते हैं। आप के पिता को दादाजी से कुछ संपत्ति मिली यदि पिताजी को मिली हुई संपत्ति उसी संपत्ति का एक भाग है जो कि उन के दादा जी को उन के पिता से मिली थी तो पिता के पास जो भी संपत्ति है उस में आप का भी जन्म से हिस्सा है।

 

ब आप का कहना है कि वह संपत्ति  आप के पिताजी ने किराए पर दे रखी है और किराया खुद प्राप्त करते हैं, और वे उसी संपत्ति को बेच कर या गिफ्ट कर के रुपए प्राप्त करना चाहते हैं और आप को कुछ नहीं देना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो आप तुरन्त जिस जिले में संपत्ति मौजूद है उस जिले के जिला न्यायाधीश के न्यायालय में संपत्ति के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।  इस वाद के साथ ही आप एक अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र भी उसी न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप आदेश प्राप्त कर सकते हैं कि बंटवारा हो जाने तक आप के पिता इस संपत्ति को विक्रय, दान या किसी अन्य प्रकार से हस्तान्तरित नहीं करें। इसी वाद में आप रिसीवर नियुक्त करने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं जो संपत्ति से होने वाली आय को अपने पास रखे और बाद में न्यायालय के आदेश के अनुसार उस के हिस्से उस संपत्ति के सभी स्वामियों को उन के हिस्से के अनुपात में दिए जा सकें। आप को इस मामले में अपने यहाँ के किसी अनुभवी दीवानी मामलों के वकील से परामर्श करना चाहिए और उसकी सहायता से यह वाद संस्थित करना चाहिए।

पुत्री पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

समस्या-

परमजीत खन्ना ने मरीवाला टाउन, मणिमाजरा, चंडीगढ़ से पूछा है-

म दो भाई बहन हैं। मेरे पापा को मेरे दादा जी से 1974 में संपत्ति विरासत में मिली थी। मेरे दादा जी को 1911 मे मेरे परदादा जी से संपत्ति विरासत मे मिली थी। मेरे पापा ने आधी संपति बेच दी। आधी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के नाम कर दी। मेरे पापा की मृत्यु 2016 मे हो गयी मेरे भाई  ने संपत्ति अपने नाम करवा ली। क्या इस संपत्ति में मेरा हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

बिलकुल आप को पिता और दादा से आई इस पुश्तैनी संपत्ति में आप का हिस्सा प्राप्त हो सकता है.

आप को इतना करना होगा कि आप जो संपत्ति आपके दादा जी को विरासत में उन के पिता से प्राप्त हुई थी उस का तथा आप के दादा जी जो संपत्ति उन के पिता से विरासत में मिली थी उस का रिकार्ड या सबूत जुटाना होगा। क्यों कि आप के हिस्से का निर्धारण उसी के आधार पर किया जा सकता है। फिलहाल हम आप के द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर हमारी राय बता रहे हैं।

आप के पापा को जो संपत्ति 1974 में विरासत में मिली थी वह पुश्तैनी और सहदायिक संपत्ति थी। इस तरह उस संपत्ति में उन की संतानों का जन्म से ही अधिकार उत्पन्न हो गया था। 2005 में पारित कानून से पुत्रियों को भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार उत्पन्न हो गया है। इस तरह आप के पिता ने पुश्तैनी संपत्ति में जो हिस्सा बेचा वह उन का हिस्सा बेचा है। जो बचा उस में आप का व भाई का हिस्सा मौजूद था।

आपके पिता ने वसीयत से जो संपत्ति आप के भाई को दी है वह वसीयत करना उचित नहीं है। आप के पिता केवल अपने हिस्से की जमीन वसीयत कर सकते थे। न कि पुत्र व पुत्री के हिस्से की जमीन। इस तरह वसीयत का कोई मूल्य नहीं है। आप के पिता को जो कुछ विरासत में  मिला था उस की एक तिहाई संपत्ति आप का हिस्सा है और आप उसे प्राप्त करने के लिए बंटवारे का वाद अपने भाई के विरुद्ध कर सकती हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकती हैं।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति स्वअर्जित संपत्ति जैसी ही है।

समस्या

भारत सिंह, गाँव मानपुरा गुजराती, तहसील नरसिंहगढ़, जिला राजगढ़,  मध्यप्रदेश ने पूछा है-

मारे दादा जी के नाम की खेती की ज़मीन थी जो उन्हे उत्तराधिकार मे उनके पिता से प्राप्त हुई थी 1960 के दशक में जो दूसरे गाँवं में थी। कुछ समय के बाद हमारे दादा जी ने वो ज़मीन बेच दी  और दूसरे गाँव में 3 बीघा उनके नाम से तथा 4 बीघा दादी के नाम से खरीद ली।  हमारे दादा जी के दो पुत्र थे एक मेरे पापा दूसरे मेरे चाचा। मेरे पिता जी का देहांत 1993 में हो गया।  जिसके बाद मेरे चाचा ने दादा दादी को बहला फुसला के पूरी ज़मीन उनके नाम 2011 में करवा ली, हमें और हमारे भाई को बिना बताए। जिसकी जानकारी हमें अभी लगी तो मैने वकील से पूछताछ की तो उन्होंने कहा प्रॉपर्टी उनके नाम से खरीदी हुई है वो जिसे चाहे दे सकते हैं।  वकील को दूसरे गांव का ज़रूर नहीं बताया कि वहाँ से बेचकर यहाँ खरीदी है।  आप से निवेदन है कि मुझे क्या कार्यवाही करनी चाहिए जिससे हमें भी हमारे पिता का हिस्सा मिल जाए। और क्या क्या डॉक्युमेंट इकट्ठे करने पड़ेंगे? अभी तक दादा दादी के नाम से हमें कुछ भी प्राप्त नाहीं हुआ है। दादा दादी चाचा के सपोर्ट में है। जो नामानन्तरण हुआ है उसमें ये ज़िक्र है हमारी उम्र अधिक हो जाने से हम हमारी ज़मीन हमारे एकमात्र पुत्र को दे रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या गंभीर है और विवरण अपूर्ण है। आप के दादाजी को उक्त जमीन 1960 के दशक में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। तब तक हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 प्रभावी (17.06.1956) हो गया था। इस तरह यदि यह जमीन आपके दादा जी के पिता की स्वअर्जित भूमि थी तो वह उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आपके दादाजी को उत्तराधिकार में मिली और वे उस जमीन के स्वामी हो गये। यह जमीन सहदायिक नहीं हो सकती थी यदि यह उक्त अधिनियम प्रभावी होने के पहले सहदायिक नहीं हो गयी हो। क्यों कि इस अधिनियम में सहदायिक संपत्ति के अस्तित्व में आने की स्थिति को समाप्त कर दिया गया है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति स्वअर्जित संपत्ति जैसी ही है।  इस का अर्थ है कि यदि यह जमीन आपके दादाजी को भी उन के पिता, दादा या परदादा से प्राप्त हुई होती तभी वह सहदायिक हो सकती थी। आप को इस बात का दस्तावेजी सबूत तलाशना होगा कि पूर्व में जो जमीन  आप के दादा जी ने बेची वह उन के पिता को भी उत्तराधिकार में पिता से प्राप्त हुई थी। इस के बाद आपको यह सबूत लाना होगा कि वह जमीन बेची उस से जो धन प्राप्त हुआ उसी से वर्तमान जमीन खरीदी गयी। तब आप यह स्थापित कर पाएंगे कि उक्त जमीन सहदायिक है उस में आपके पिता और आप का जन्म से अधिकार है। यदि ये दोनों तथ्य स्थापित नहीं कर सके तो वर्तमान भूमि दादाजी की स्वअर्जित भूमि है और उसे वे जिसे चाहें दे सकते हैं। आप का कोई कानूनी अधिकार उस पर नहीं है।

दूसरे आप के द्वारा दिए गए विवरण से पता लगता है कि नामान्तरण के माध्यम से जमीन चाचा की हो गयी है। लेकिन नामान्तरण का आधार क्या है? यह स्पष्ट नहीं है। यदि दान करना है तो उस के लिए दान पत्र पंजीकृत होना आवश्यक है। यदि वसीयत है तो उस के आधार पर दादा दादी के जीवित रहते नामान्तरण नहीं हो सकता।  इस कारण आपको यह भी जानकारी करनी चाहिए कि नामान्तरण का आधार क्या है? क्या उस आधार पर नामांतरण हो सकता है। नामांतरण को चुनौती दी जा सकती है, यदि वह कानून के अनुसार नहीं हो। लेकिन आप को उक्त संपत्ति में से तभी कुछ प्राप्त हो सकता है जब कि आप को उस में कोई अधिकार हो। आप के विवरण से नहीं लग रहा है कि उक्त संपत्ति में आपका कोई अधिकार है। चाचा ने दादा दादी से किसी तरह जमीन अपने नाम करवा ली है तो उसे चुनौती देने का आप को कोई अधिकार नहीं है। यदि इसी तरह आप दादा दादी से उक्त जमीन अपने नाम करवा लेते तो चाचा को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं होता।

सहदायिक संपत्ति में पुत्री का विभाजन और पृथक हिस्से का अधिकार

समस्या-

मेरी पत्नी बबीता देवी (68 वर्ष) एक पैर से विकलांग है। मेरे बाबा अंबिका सिंह जिनको 1940 में 7 एकड़ 42 डिसमिल जमीन उनके हिस्से में प्राप्त हुआ था। मेरे पिता दो भाई थे मेरे पिता का नाम वेशर सिंह और मेरे चाचा का नाम वादों सिंह। मेरी चाचा वादों सिंह ने विवाह नहीं किया था। मेरे चाचा वादों सिंह ने 3 एकड़ 42 डिसमिल जमीन 1948 में खरीदा था मेरे चाचा वादों सिंह की मृत्यु 2004 में हुई। उनके मरणोपरांत वह जमीन अभी मेरे पास है। क्या मेरे चाचा के द्वारा जो जमीन मुझे मिला उस पर मेरे पुत्र या पुत्री का अधिकार है। जिस वक्त मेरे चाचा ने जमीन खरीदा था उस वक्त वो संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे किंतु उनके द्वारा खरीदे गए जमीन के केवाला पर सिर्फ उन्हीं का नाम है, मेरे पिताजी का नाम नहीं है। मुझे 3 पुत्र पैदा हुऐ परंतु तीनो जन्म के समय मृत पाए गए, तीनों की मृत्यु पेट में ही हो गई थी। फिर मुझे दो पुत्रियां हुई। क्या उन मृत पुत्रों का भी कोई हिस्सा हमारे संपत्ति में होता है? यदि हां तो फिर क्या वह हिस्सा मेरी पत्नी को स्थानांतरित होगा? मेरी पुत्री ने मुझ पर टाइटल पार्टीशन सूट किया है। उसका हिस्सा इस संपत्ति में कितना हो सकता है । जबकि 7 एकड़ 42 डिसमिल जो कि मेरे बाबा का हिस्सा था, उस में मेरे चाचा का जो हिस्सा होता है वह तो मेरा पर्सनल प्रॉपर्टी कहलायेगा।

उमेश सिंह vishnukr1506@gmail.com

समाधान-

आप के दादा अम्बिका सिंह को 2014 में जो जमीन उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह आप की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति है। इस संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता से तय होगा। 2005 से पुत्रियाँ भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखने लगी हैं। इस कारण आप की पुत्री आप की सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने की अधिकारी है। आप के पुत्र मृत पैदा हुए इस कारण उन का कोई अलग से हिस्सा नहीं है। वह हिस्सा आपकी पत्नी को प्राप्त नहीं होगा।  दादा की जमीन में आप के चाचा का हिस्सा भी आप को मिल गया है। लेकिन वह फिर भी आप की स्वअर्जित संपत्ति नहीं है क्यों कि वह आपको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है।  आप की पुत्री इस भूमि में अपना हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है। उस का हिस्सा कुल जमीन में 1/3 ही होगा। आप के चाचा ने जो हिस्सा खुद खरीदा है और जिस का केवाला उन के नाम है वह जमीन आप की स्वअर्जित मानी जाएगी और आप के जीतेजी उस में किसी को हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस जमीन में आप की पुत्री कोई भी हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

2005 से पहले भी हिन्दू पुत्री को सहदायिकी में पिता के हिस्से की संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त था।

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

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