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घरेलू हिंसा और अमानवीय क्रूरता से पीड़ित स्त्री को मदद करें और मुक्त कराएँ।

समस्या-

सत्यम ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी एक फ्रेंड है, उसका हस्बैंड उसको मारता पीटता है, मेंटली टॉर्चर करता है, बिना बात के ही लड़ता रहता है। आज तो उसने हद ही कर दी, सुबह से बिना बात के लड़ने लगा और बोलता है कि मेरे घर में सिगड़ी नहीं चलना चाहिए। वाइफ बोलती है, सिगड़ी ना जलाओ तो मर जाऊं क्या ठंड में। तो हस्बैंड बोलता है कि मर जा, अब यदि सिगड़ी जलाई तो वही सिगड़ी तेरे ऊपर डाल दूंगा जलती हुई। उस लड़की की लाइफ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। घर से निकलने नहीं देता। किसी रिलेटिव पहचान वालों के यहां जाने नहीं देता। कहता है कि मैं जिस से बोलूंगा उससे मिलेगी, उससे बात करेगी, नहीं तो किसी से नहीं करेगी। बिना बात के लड़ता रहता है। लड़की को डिवोर्स भी नहीं देता है, बोलता है कि मैं तुझे छोड़ने नहीं दूंगा। सबसे ज्यादा शक करता। उसको कहीं आना जाना नहीं देता और मारने के लिए हाथ उठाता है। एक दो बार मारा भी। लड़के की फिजिकल रिलेशन किसी और के साथ है शायद। वह दूसरी लड़के को घर में लाना चाहता है। लड़की बोलती है कि तेरे को देख के साथ रहना है, जिसको लाना है ले आ। बस मुझे शांति से रहने दे। इस पर लड़का बोलता कि मैं ना तुझे जीने दूंगा, ना मरने दूंगा। लड़की करे तो क्या करे? लड़की के पास कोई सबूत नहीं है कि उसका हस्बैंड कहीं और रिलेशन में है। लड़की का साथ देने वाला कोई नहीं है कि वह अपने हस्बैंड के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा सके। लड़की तो अपने हस्बैंड से बात करना पसंद नहीं करती, तो क्या करें? कोई रास्ता बताइए।

समाधान-

लड़की के साथ घरेलू हिंसा हो रही है। भंयकर अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार किया जा रहा है। मारपीट भी हुई है। यह सब विवाह विच्छेद के लिए पर्याप्त है। इस के अलावा धारा 498ए आपीसी में संज्ञेय अपराध भी है, जिस की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यह रिपोर्ट कोई भी परिजन या मित्र भी कर सकता है।

न्यायालय में किसी भी मामले में निर्णय होने में हमारे यहाँ समय लगता है। इस का मुख्य कारण हमारे मुल्क के पास जरूरत की चौथाई अदालतें भी नहीं होना है। अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 140 अदालतें हैं जब कि भारत में मात्र 12 इस तरह वहाँ के अनुपात में हमारी अदालतों की संख्या 8 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सभी तरह के विक्टिम पुलिस या न्यायालय के पास जाने के बजाए यातनाएँ भुगतते रहते हैं। इसी कारण अनेक प्रकार के अपराध पलते रहते हैं। हर रिपोर्ट कराने आने वाले को हतोत्साहित करती है कि रिपोर्ट कराने के बजाए भुगतते रहो, क्यों कि उसे भी अपने रिकार्ड में अपराध कम दिखाने होते हैं।

जहाँ तक स्त्रियों का मामला है वे तब तक पुलिस के पास जाने में झिझकती हैं जब तक कि उन्हें यह पक्का विश्वास न हो जाए कि उन के पास जीवन जीने और सुरक्षा के पर्याप्त विकल्प हैं। जब कभी कोई परिचित इस तरह की रिपोर्ट करा भी दे तो स्त्रियाँ पुलिस के या अपने पति व ससुराल वालों के दबाव के कारण टूट जाती हैं और कह देती हैं कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहती। वैसी स्थिति में वह परिचित बहुत बुरी स्थिति में फँस जाता है। अक्सर लड़की के मायके वाले भी उस का साथ नहीं देते, क्यों कि हमारा तो विचार ही यह है कि लड़कियाँ परायी होती हैं। इस विचार के अनुसार लड़कियाँ समाज में सब के लिए पराई होती हैं, वे कभी किसी की अपनी नहीं होतीं।

इस मामले में यदि आप मन, वचन कर्म से चाहते हैं कि लड़की उन यातनाओं से मुक्त हो अच्छा जीवन जिए तो आप को उसे विश्वास दिलाना होगा कि उस के पास सुरक्षित जीवन  जीने के न्यूनतम वैकल्पिक साधन हैं। आप को भी प्रयास करना होगा कि वह किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। तभी वह यह लड़ाई लड़ सकती है। यदि आप आश्वस्त हैं कि लड़की को न्यूनतम वैकल्पिक जीवन साधन उपलब्ध होने का विश्वास दिला सकते हैं तो आप पुलिस को रिपोर्ट करें, पुलिस कार्यवाही न करे तो एस.पी. को मिलें। यदि फिर भी काम न चले तो मजिस्ट्रेट को शिकायत दें। लड़की को उस के पति की कारा से मुक्ति दिलाएँ।

लड़की के मुक्त हो जाने पर उस की ओर से विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन, धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण के लिए परिवार न्यायलय में आवेदन प्रस्तुत कराएँ। घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण, वैकल्पिक आवास तथा लड़की के आसपास न फटकने के लिए निषेधात्मक आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं। इस से लड़की को जो मदद आप अभी उपलब्ध करा रहे हैं उस की जरूरत कम हो जाएगी।  आप लड़की को कोई नियोजन दिला कर उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें। उसे नियोजन मिल जाने पर वह स्वावलंबी हो जाएगी। जब उस का विवाह विच्छेद हो जाए तो वह निर्णय कर सकती है कि उसे एकल स्त्री की तरह जीना है अथवा एक अच्छा जीवन साथी तलाश कर उस के साथ जीवन व्यतीत करना है।

आप क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकती हैं।

समस्या-

सुशीला ने पोकरण, जैसलमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति का व्यवहार मेरे और मेरे पैतृक परिवार के प्रति अच्छा नहीं है। जिस के कारण अब मैं मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ। मेरे पति मेरे इलाज के लिए कुछ नहीं करते। मैं इस से परेशान हो कर अपने मायके आ गयी हूँ। अब मेरा पति मुझे और मेरे मायके के परिजनों को फोन कर के धमकियाँ दे रहा है वह मेरे रिश्तेदारों और जाति के लोगों को मेरे बारे में गलत बातें लिख कर मैसेज कर रहा है। जिस से मैं  वापस उस के पास जा कर रहने लगूँ। लेकिन मैं वापस नहीं जाना चाहती और तलाक लेना चाहती हूँ। मुझे बताएँ मैं तलाक कैसे ले सकती हूँ।

समाधान-

प के पति का व्यवहार आप के प्रति क्रूरता पूर्ण है, बीमार पत्नी का इलाज नहीं कराना और उसे बुरा भला कहना क्रूरता है। इस कारण आप का मायके आना पूरी तरह जायज था। उस के बाद उस का धमकियाँ देना और लोगों को आप को बदनाम करने वाले फोन मैसेज भेजना क्रूरता की इन्तेहा है। आप क्रूरता के इस आधार पर तलाक के लिए अर्जी उस जिले के परिवार न्यायालय मे प्रस्तुत कर सकती हैं जिस जिले में आप के विवाह की रस्म संपन्न हुई थी अथवा जिस जिले में आप अपने पति के साथ अन्तिम बार निवास कर रही थी।

इस के अतिरिक्त आप अपने स्त्री-धन की मांग अपने पति से कर सकती हैं नहीं देने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध होगा। क्रूरता कर के और आप का इलाज न करा के वह धारा 498ए आईपीसी का अपराध कर ही चुका है। आप इन दोनों धाराओँ के अन्तर्गत पुलिस में रिपोर्ट कराएँ, यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में इस संबंध में परिवाद प्रस्तुत करें। इस के अलावा आप अपने लिए भऱण पोषण का खर्चा प्राप्त करने के लिए धारा 125 दं.प्र.संहिता और महिलओँ के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।

दहेज प्रताड़ना की एफआईआर निरस्त होने के आदेश की प्रतियाँ अन्य सभी मामलों में प्रस्तुत करें।

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

पोस्टमार्टम से पर्याप्त और ठोस सबूत मिलते, अब अन्य कमजोर सबूतों पर निर्भर रहना होगा।

rp_murder21.jpgसमस्या-

संदीप भलावी ने पुराना दमुआ माइन्स, तहसील जुन्नारदेव, जिला छिन्दवाड़ा मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी दीदी (चैताली भलावी) की शादी 27-5-2015 में हुई थी। वह ANM नर्स थी, उनकी शादी को 9 महीने ही पूरे हो पाए कि 31-3-2016 के दिन मायके में उनकी मृत्यु हो गयी उनका अन्तिम संस्कार मायके से ही हुआ।  2-4-2016 के दिन साफ सफाई के दौरान उनकी डायरी मिली, उनके बिस्तर के नीचे। जिसमें उनके साथ सुसराल में जितना भी अत्याचार हुआ था उन्होने सब कुछ लिखा था  और हर पेज पर उनके हस्ताक्षर भी हैं,  उन्होंने कभी भी हम लोगो को नहीं बताया कि उनके साथ इतना कुछ हो रहा था।  5-4-2016 को दीदी का फोन चेक किया तो उनके फोन में कुछ phone recording मिलीं, जिसको सुनके हम लोग बहुत दुखी हो गये। हमने 7-4-2016 को दमुआ थाना, परासीया थाना, में रिपोर्ट दर्ज करादी।  साथ ही  छिन्दवाड़ा कलेक्टर  के पास व भोपाल मुख्यमँत्री के पास  डायरी की प्रति ओर आरोपी को सजा दिलवाने की मांग की।  17-4-2016, को हमने NGO वालों के साथ जाकर कलेक्टर व एसपी के आफिस में   डायरी की प्रतिया दीं। 24 तारीख को दीदी के बेग से एक लेटर मिला जिसमें दीदी ने पूरी डायरी का सार एक पेज में लिखा था। एसपी ऑफिस से कार्यवाही आदेश आ चुका है। 4-5-2016 को मम्मी पापा का बयान लिया, दमुआ थाने में,   और बयान लिखवाकर परासीया थाने भिजवा दिये।  इसके बाद भी 1 महीना हो चुका है दीदी की मृत्यु को पर आरोपी आजाद घूम रहा है।  मैं जानना चहता हूँ कि क्या उनकी लिखी डायरी जिसमें हर पेज पर हस्ताक्षर हैं और साथ ही  कानून से एक अपील भी है कि उनके पति, सास ननद ओर देवर को कड़ी सजा मिलनी चाहिये।  क्या कानून जिन्दा लोगों की ही गवाही मानता है,  दीदी के जिन्दा ना रहने से क्या उनकी डायरी ओर फोन रिकार्डिंग का कोई मूल्य नहीं?  दमुआ के TI कहते हैं कि पोस्ट मार्टम करना था, डायरी से कुछ नहीं होगा,  क्या पोस्ट मार्टम बहुत जरुरी होता है।  दीदी को उनका पति मारता पीटता था, जान से मारने की धमकी देता था, उनसे 1 लाख रु मायके से मंगाए और गाड़ी भी,  रेकार्डिंग  से तो ये बातें साबित हो रही हैं। हमें दीदी को इन्साफ दिलाना है और रास्ता समझ नहीं आ रहा है। क्या हमें अदालत का सहारा ले लेना चाहिये?

समाधान-

प पोस्ट मार्टम नहीं करा पाए क्यों कि आप को पहले पता ही नहीं था कि चैताली के साथ क्या हुआ है। हो सकता है आप ने दीदी की मृत्यु को प्राकृतिक या किसी बीमारी के कारण होना समझा हो। इस तरह पोस्ट मार्टम नहीं कराने का आप के पास उचित कारण है। यदि पोस्ट मार्टम होता तो पता लगता कि उन की मृत्यु के कारण क्या हैं तथा यह भी पता लगता कि आप की दीदी चैताली के साथ क्या क्या हत्याचार हुए हैं। वैसी स्थिति में पुलिस के पास अपराध को प्रमाणित करने के लिए मजबूत सबूत होते। पोस्टमार्टम न होने से पुलिस उन सबूतों से वंचित हो गयी है।

अब जो भी सबूत हैं उन के आधार पर जिन अपराधों को साबित करने के सबूत मिलेंगे उन्हीं के आधार पर मुकदमा तैयार होगा। डायरी और रिकार्डिंग सबूत तो हैं लेकिन केवल मात्र उन्हीं के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। पुलिस को डायरी और रिकार्डिंग से जो भी कहानी निकल कर आयी है उसे साबित करने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी जुटाने होंगे। इस काम में पुलिस को समय लगेगा। जब तक पुलिस को पर्याप्त सबूत नहीं मिल जाते जिन के आधार पर वह एक मजबूत आरोप पत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत न कर सके तब तक वह अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर सकती। अभी 4 मई को बयान लिए गये हैं उसे दस दिन ही हुए हैं। आप को थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि आप को लगे कि पुलिस लापरवाही कर रही है या फिर किसी कारण से अभियुक्तों को बचाना चाहती है तो आप उच्चाधिकारियों से मिल कर अपनी बात उन के समक्ष रख सकते हैं।

आप ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करा दी है और उस पर अन्वेषण जारी है। वैसी स्थिति में आप न्यायालय के समक्ष नहीं जा सकते। यदि आप को लगे कि एक लंबे समय तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है तो आप न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर पुलिस से अन्वेषण की प्रगति की रिपोर्ट मंगवा सकते हैं। न्यायालय पुलिस को निर्देश भी दे सकता है। यदि पुलिस इस मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत न कर यह रिपोर्ट पेश करे कि अभियुक्तगण के विरुद्ध कोई मामला नहीं बनता या अपराध घटित होना नहीं पाया जाता है तो आप उस रिपोर्ट के विरुद्ध न्यायालय में अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप किसी अच्छे स्थानीय वकील की मदद ले सकते हैं।

 

क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की अर्जी पेश करें।

rp_judicial-sep8.jpgसमस्या-

करणसिंह ने सागा, तहसील बुहाना, जिला झुन्झुनू, राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी को 10 साल हो चुके है लगभग शादी के दो साल बाद मुझे पता चला कि मैं पिता बनने में असमर्थ हूँ तो मैंने सभी परिवार वालों को ये बता दिया कि मेरी पत्नी को कोई कुछ न कहे कमी मेरे अंदर है। उस के बाद से मेरे ससुराल वाले मुझे परेशान करने लगे मेरी पत्नी जब तक मेरे साथ होती कुछ नहीं कहती। लेकिन अपने परिवार वालों के पास जाते ही वो भी मुझे टोर्चर करने लगती अब बात यहाँ तक आ पहुची है कि 2 महीने पहले मेरे ससुराल वाले मेरे घर आकर मेरे साथ मारपीट करने की कोशिश की। उसके कुछ दिन बाद मेरे पत्नी अपने घर चली गयी और अब सभी लोग मुझे डराते है मारने की धमकी देते है और सारे परिवार को जेल में डलवाने की बात कहते है। अब मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं क्या करूँ मै 5 साल पहले ये भी कह चुका  हूँ कि अगर आप लोग अपनी बेटी की कहीं और शादी करना चाहते हो तो कर सकते हो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। मैं अपने कारण उसकी लाइफ ख़राब नहीं करना चाहता था। लेकिन अब में परेशान हो चुका हूँ और उन लोगों से छुटकारा चाहता हूँ मेरी हेल्प करो और बताओ की मैं क्या करूँ?

समाधान-

पसी रिश्तों की स्थितियाँ इतनी खराब हो जाने के बाद इस संबंध का बना रहना हमें उचित प्रतीत नहीं होता। सब से महत्वपूर्ण तो यह है कि आप ने अपनी स्थिति को सब के सामने स्वीकार किया। इस का आप की पत्नी और आप के ससुराल वालों को सम्मान करना चाहिए था।

आप की पत्नी का यह व्यवहार क्रूरतापूर्ण व्यवहार की श्रेणी का है। इस के आधार पर आप तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। अर्जी में आप स्वयं कह सकते हैं कि आप संतान पैदा करने में अक्षम हैं और इस तथ्य की जानकारी होने पर पत्नी का व्यवहार बदला और धीरे धीरे क्रूरतापूर्ण हो चला है। साथ जीना संभव नहीं रहा है इस कारण आप को विवाह विच्छेद चाहिए। यह तो है कि आप को अपनी पत्नी को उस के पुनर्विवाह तक भरण पोषण राशि देनी होगी। इस के अतिरिक्त पत्नी के परिवार वाले उलटा आप पर 498ए, 406 की शिकायत भी कर सकते हैं। लेकिन यदि आप बिना किसी विलंब के विवाह विच्छेद की अर्जी प्रस्तुत कर देंगे तो इन समस्याओं का मुकाबला कर सकेंगे। अन्यथा ये आरोप तो आप पर कुछ दिन बाद वैसे भी लगाए जा सकते हैं।

यदि आप की पत्नी को समझ आए तो मामले को राजीनामे के आधार पर भी सुलझा सकती है। राजीनामे की एक कोशिश हर विवाह विच्छेद के प्रकरण में स्वयं न्यायालय द्वारा की जाती है। हो सकता है सारा मामला आपसी सहमति से निपट जाए। पर उस के लिए भी किसी को पहल करनी होगी। आप विवाह विच्छेद की अर्जी न्यायालय में प्रस्तुत कर इस की पहल कर सकते हैं।

जब कोई पुलिस अदालत तक पहुँचता है तभी लोगों को कानून याद आता है।

rp_Hindu-marrige1.jpgसमस्या-

मनोज कुमार चौरसिया ने सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 28 मई 2013 को हुई। शादी के एक माह बाद मेरी पत्नी मानसिक रूप से बीमार हो गयी जिसका हमने मनोचिकित्सक इलाहाबाद से इलाज कराना शुरू किया और अभी भी इलाज चल रहा है। मेरे ससुराल वाले जबरन मेरी पत्नी को विदा कराकर ले जाते है और वापस विदा नहीं करते। चूँ कि मेरे ससुर वकील सुलतानपुर दीवानी में एवं ममिया ससुर भदोही में जज हैं। इसलिए मुझे झूठे मुकदमें में फँसाने की धमकी देते हैं। 07 फरवरी को मेरी पत्नी को जुड़वाँ बच्चे एक बेटा और एक बेटी आपरेशन से हुए। दवा का सारा पैसा हम ने दिया और हास्पिटल से पत्नी मायके चली गयी। जाते समय ससुराल वालों ने कहा कि तुम को तरसा लेगें। देखो अब हम क्या–क्या करते हैं? तुम्हे बच्चा पैदा करने की क्या जरूरत थी? अब 8 माह का समय बीत चुका है, ससुराल वाले से बात किया परन्तु भेजने को तैयार नहीं थे। मेरी माँ को अपने घर बुलाकर कहा कि अब मेरी लडकी नहीं जायेगी लड़ कर हिस्सा लेगी। इसपर हमने वकील से बात किया तो वकील ने धारा 13 के अन्तर्गत मानसिक बीमारी और जबरन ले जाने व धमकी देने को आधार बनाकर तलाक का मुकदमा कर दिया है। मानसिक बीमारी का लगभग एक वर्ष का पर्चा व कुछ डिलीवरी हास्पिटल का पर्चा मेरे पास है। क्या मुझे तलाक मिल जायेगा? और क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406‚ 125‚ 24 व अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड सकता है?

समाधान-

तीसरा खंबा को इस तरह की समस्याएँ रोज ही मिलती हैं। जिन में बहुत से पति यह पूछते हैं कि मुझे तलाक तो मिल जाएगा? क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406 या अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड़ सकता है? आदि आदि।

र कोई विवाह करने के पहले और विवाह करने के समय यह कभी नहीं सोचता कि कानून क्या है? और उन्हें देश के कानून के हिसाब से बर्ताव करना चाहिए। वह सब कुछ करता है। वह दहेज को बड़ी मासूमियत से स्वीकार करता है, वह मिले हुए दहेज की तुलना औरों को मिले हुए दहेज से करता है, वह उस दहेज में हजार नुक्स निकालने का प्रयत्न करता है।

ब विवाह के लिए लड़की देखी जाती है तो उस की शक्ल-सूरत, उस की पढ़ाई लिखाई, उस की नौकरी वगैरा वगैरा और उस के पिता का धन देखा जाता है। यह कभी नहीं जानने का प्रयत्न किया जाता कि लड़की या लड़के का सामान्य स्वास्थ्य कैसा है? वह किस तरह व्यवहार करता या करती है, विवाह के उपरान्त दोनों पति-पत्नी में तालमेल रहेगा या नहीं? क्यों कि यह सब जानने के लिए लड़के लड़की को कई बार एक साथ कुछ समय बिताने की जरूरत होती है। इसे पश्चिम में डेटिंग कहते हैं। भारतीय समाज डेटिंग की इजाजत कैसे दे सकता है? क्या पता लड़के-लड़की शादी के पहले ही कुछ गड़बड़ कर दें तो? या लड़का या लड़की रिश्ता के लिए ही मना कर दे तो दूसरे की इज्जत क्या रह जाएगी?

विवाह के बाद दहेज को दहेज ही समझा जाता है। पति और उस के रिश्तेदार उसे अपना माल समझते हैं। वे जानते हैं कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। पर कौन देखता है? की तर्ज पर यह अपराध किए जाते हैं। दहेज के कानून में माता-पिता, रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य लोगों यहाँ तक कि ससुराल से प्राप्त उपहारों को दहेज मानने से छूट दी गयी है। इस कारण जब कोई मुकदमा दर्ज होता है तो लोग उसे दहेज के बजाय उपहार कहना आरंभ कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि किसी स्त्री को मिले उपहार उस का स्त्री-धन है। उस के ससुराल में रखा हुआ यह सब सामान उस की अमानत है। उसे न लौटाएंगे तो अमानत में खयानत होगी। फिर जब आईपीसी की धारा 406 अमानत में खयानत का मुकदमा ही बनाना होता है तो बहुत सी काल्पनिक चीजें लिखा दी जाती हैं।

त्नी को मानसिक या शारीरिक क्रूरता पहुँचाना हमारे यहाँ पति और ससुराल वालों का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन कानून उसे 498-ए में अपराध मानता है, तो यह अपराध भी धड़ल्ले से देश भर में खूब चलता है। लोग ये दोनों अपराध खूब धड़ल्ले से करते हैं। समझते हैं कि इन्हें करने का उन्हें समाज ने लायसेंस दिया हुआ है। पर जब इन धाराओं में मुकदमा होने की आशंका होती है या धमकी मिलती है तो वही लोग बिलबिला उठते हैं। उन्हें कानून का यह पालन अत्याचार दिखाई देने लगता है।

म मानते हैं कि जब मुकदमा होता है तो बहुत से फर्जी बातें उस में जोड़ी जाती हैं। यह भी इस देश की प्राचीन परंपरा है। गाँवों में जब लड़ाई होती है तो इज्जत की रखवाली में हथियार ले कर बैठे परिवारों की स्त्रियों से पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट करा दी जाती है। लेकिन विवाह के रिश्ते में ऐसा फर्जीवाड़ा करना दूसरे पक्ष को नागवार गुजरता है।

ब अदालत में कोई भी पीड़ित हो या न हो। एक बार शिकायत कराए, या पुलिस को एफआईआर लिखाए तो उन का फर्ज है जाँच करना और जाँच करने का मतलब पुलिस के लिए यही होता है कि पीड़ित पक्ष और उस के गवाहों के बयान लिए जाएँ और उन से जो निकले उस के आधार पर अपराध को सिद्ध मानते हुए अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया जाए। एक बार आरोप पत्र पेश हो जाए तो जब तक उस मुकदमे का विचारण नहीं हो जाए तब तक अदालत के चक्कर तो काटने ही होंगे। सचाई पता लगाने की जरूरत पुलिस और अदालत को कभी नहीं होती। वैसे भी जो चीज पहले से ही पता हो उसे जानने की जरूरत नहीं होती। आखिर वह जान लिया जाता है जो पहले से पता नहीं होता।

प के सामने समस्या है। आप ने तलाक का मुकदमा कर दिया है। वकील की सहायता ली है। वकील को सारे तथ्य पता हैं। हमे तो आप ने पत्नी को मानसिक रोगी मात्र बताया है। उस का पागलपन या मानसिक रोग क्या है? वह रोग के कारण क्या करती या नहीं करती है? या चिकित्सक ने उसे क्या रोग बताया है? आपने हमें कुछ नहीं बताया है। जो मुकदमा किया है उस में क्या आधार किन तथ्यों पर लिए हैं? यह भी नहीं बताया है फिर आप हम से अपेक्षा रखते हैं कि तीसरा खंबा आप को बता देगा कि आप को तलाक मिलेगा या नहीं और आप को फर्जी मुकदमों में फँसा तो नहीं दिया जाएगा।

लाक का मिलना मुकदमे में लिए गए आधारों और उन्हें साक्ष्य से साबित करने के आधार पर निर्भर करता है। आप की पत्नी मुकदमा दर्ज कराएगी तो हो सकता है आप को गिरफ्तार भी कर लिया जाए। लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में जमानत हो जाती है और जल्दी ही पति और उसके परिवार वाले रिहा हो जाते हैं। ऐसे मामलों में चूंकि झूठ जरूर मिलाया जाता है इस कारण ज्यादातर पति इस मिलावट के कारण बरी हो जाते हैं। पर कभी कभी सजा भी हो जाती है। अगर आप ने कोई अपराध नहीं किया है। कभी पत्नी को गाली नहीं दी है, उस पर हाथ नहीं उठाया है, उस के उपहारों और स्त्री-धन को उस का माल न समझ कर अपना माल समझने की गलती नहीं की है तो आप को सजा हो ही नहीं सकती। पर यह सब किया है तो सजा भुगतने के लिए तैयार तो रहना ही चाहिए। अपराध की सजा हर मामले में नहीं तो कुछ मामलों में तो मिल ही सकती है।

भी तक कानून ने पत्नी को पति की संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं दिया है। पति की मृत्यु के बाद यदि पति ने कोई बिना वसीयत की संपत्ति छोड़ी हो तो उस का उत्तराधिकार बनता है जिसे वह ले सकती है। लेकिन जीते जी अधिक से अधिक अपने लिए भरण पोषण मांग सकती है। इस कारण जो यह धमकी दे रहे हैं कि पत्नी हिस्सा लड़कर लेगी वे मिथ्या भाषण कर रहे हैं। अभी तक कानून ने ही पति की संपत्ति में हिस्सा पत्नी को नहीं दिया है अदालत कैसे दे सकती है। इस मामले में आप निश्चिंत रहें। आज तीसरा खंबा की भाषा आप को विचित्र लगी होगी। पर इस का इस्तेमाल इस लिए करना पड़ा कि लोग ऐसे ही समझते हैं। आप इस बात को समझेंगे और दूसरे पाठक भी इस तरह के प्रश्न करना बन्द करेंगे। हम तो ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना बन्द कर ही रहे हैं।

क्रूरता के आधार पर तलाक का मुकदमा करें।

 rp_judicial-sep8.jpgसमस्या-

शिरीश गौड़ ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 08/06/2014 को हुई थी। 24/02/2015 को मेरी पत्नी होली के त्यौहार के लिए अपने पिता के साथ ख़ुशी ख़ुशी अपने मायके गयी थी तब से आज तक वह अपने ससुराल वापस नहीं आई है।| मैंने बुलाने के लिए काफी प्रयास किये और 01/05/2015 को महिला थाना में उसको घर बापिस बुलाने के लिए एक आवेदन दिया।| मेरे आवेदन को महिला थाना द्वारा मेडिएशन सेंटर भेजा गया और उसमे मेरी पत्नी ने कहा कि मुझे तलाक और 40 लाख रूपये चाहिए नहीं तो मैं आपको 498A में फसा दूंगी।| तलाक की बात सुनकर मैंने अपनी पत्नी की अलमारी चैक की तो देखा की हमारे द्वारा शादी में चढ़ाया हुआ सोने का जेवर उसकी अलमारी में नहीं है। हम अपनी इज़्ज़त और 498A से बचने के लिए तलाक देने के लिए तैयार हो गए तो मेडिएशन सेंटर में समझोते के दौरान यह तय हुआ की वह हमें हमारा जेवर वापिस करेंगे और हम 25 लाख रुपया के बैंक ड्राफ्ट उनको देंगे। जैसे ही मैंने बैंक ड्राफ्ट बनवाये तो बैंक ड्राफ्ट की फोटो कॉपी लेकर वह जेवर देने से मुकर गए। इस कारण से मेडिएशन विफल हो गया। फिर मेरी पत्नी ने 06/08/2015 को मुझ पर, मेरे माता-पिता और मेरे दीदी-जीजाजी पर मारपीट, दहेज़ प्रताड़ना, दहेज़ मांगना एवं मुझपर नपुंसक जैसे झूठे एलीगेशन लेकर महिला थाना में रिपोर्ट दर्ज करा दी। अब डिस्टिक एंड सेशन कोर्ट से हम सब को अग्रिम जमानत मिल गयी है। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि 1. मुझे अब आगे क्या करना चाहिए? 2. क्या मेरी पत्नी को मारपीट, दहेज़ प्रताड़ना, दहेज़ मांगना जैसे झूठे आरोपों के एविडेंस कोर्ट में देने पड़ेंगे? क्या मैं अपनी पर नपुंसक जैसे झूठे एलीगेशन के लिए मानहानि का दावा कर सकता हूँ। यदि मेरी पत्नी झूठी रिपोर्ट को वापिस ले है तो क्या मैं मानहानि का दावा कर सकता हूँ?

समाधान

प जानते हैं कि दहेज लेना व देना दोनों ही निषिद्ध हैं। इस कारण स्त्री को मिले सभी उपहार उस का स्त्री-धन हैं। जो आभूषण आप ने व आप के परिवार ने उपहार स्वरूप आप की पत्नी को दिए हैं वे भी उस का स्त्री-धन हैं। आप उन्हें वापस लेने की मांग नहीं कर सकते। यह आभूषण वापस लेने की आप की जिद ने ही आप को कमजोर बनाया है। अब तक समझौते के प्रयास विफल होने का कारण यही है।

ब तो बात बिगड़ चुकी है। 498ए में आप की अग्रिम जमानत हो चुकी है। वैसी स्थिति में अब आप के पास डरने का कोई कारण शेष नहीं बचा है। 498ए का मुकदमा पुलिस का मुकदमा है। अब उस में आप के विरुद्ध आरोप प्रमाणित करने का भार आप की पत्नी का नहीं अपितु पुलिस का है। यदि प्रमाणों से आप के विरुदध कोई आरोप साबित नहीं होता है तो आप दोष मुक्त हो जाएंगे। आप इस मुकदमे को लड़िए। यदि यह मुकदमा मिथ्या है तो आप के पक्ष में निर्णय होने की पूरी संभावना है।

दि आप व परिवार के लोग 498ए से दोष मुक्त हो जाते हैं तो तब आप अपनी पत्नी के विरुद्ध मानहानि तथा दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का मुकदमा कर सकते हैं। आप पर नपुंसकता का जो आरोप लगाया गया है उसे साबित करना इतना आसान नहीं है। नपुंसकता का आरोप लगाना क्रूरता भी है। आप अकेले इस आधार पर तलाक के लिए मुकदमा कर सकते हैं। आप को सभी संभव आधारों पर तलाक के लिए आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए।

मारी राय है कि आप को तलाक का मुकदमा अपनी पत्नी के विरुद्ध करने के उपरान्त भी अपना ऑफर खुला रख सकते हैं। आप 25 लाख रु. पत्नी को देने वाले थे। यदि आप का ऑफर आरंभ से यही होता कि वह सारे आभूषण रख ले और एक यथोचित राशि स्थाई पुनर्भरण केलिए तय कर ले। क्यों कि तलाक की कार्यवाही के दौरान भी न्यायालय एक बार और आप दोनों में समझौते का प्रयास करेगा।

बहनों को आत्म निर्भर होने और विवाह विच्छेद व भरण पोषण प्राप्त करने में मदद करें।

rp_Two-Girls-2006.jpgसमस्या-

नेमीचन्द सोनी ने बीकानेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी दो बहनों की शादी नागौर शहर राजस्थान में 2006 में की थी। मेरे जीजाजी तब से मारपीट करने लग गये। हम लोगों ने समाज के लोगों से सामाजिक मीटिंग करवा के जीजाजी को समझाया। फिर 5 साल में बड़ी बहन के 3 बच्चे ओर छोटी के 2 बच्चे हैं। मेरे जीजाजी दोनों सगे भाई है अभी दो साल पहले बड़े जीजा ने बहुत ज्यादा मारपीट शुरू कर दी। एक बार तेजाब से जलाना चाहा तो मेरी बहन की सास ने बचा लिया। बाद में हमें पता चला तो हम लोग जाकर मेरी बहनों को लेकर आ गये। आज दो साल हो गये मेरे जीजा आज तक लेने नहीं आये हैं। और लोगों को बोलते हैं कि मेरी पत्नी को जरूरत होगी तो वो अपने आप आयेगी और मैं तो मारपीट ऐसे ही करूंगा। हम लोगों को धमकी देता है। मैं घर में अकेला कमाने वाला हूँ। 18 सदस्यों का खर्चा मेरे को चलाना पड़ता है। आप कानूनी राय दो कि हमें क्या करना चाहिए?

समाधान

प की समस्या यह है कि आप के परिवार ने आप की बहनों को इस लायक नहीं बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़ी हों। अब वह जमाना आ गया है कि केवल उन्हीं लड़कियों और स्त्रियों का जीवन सुरक्षित कहा जा सकता है जो स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हों, आत्मनिर्भर हों। शेष स्त्रियाँ जो माता पिता या पति पर आश्रित हैं उन का जीवन उन के आश्रयदाता की इच्छा पर निर्भर करता है। आप की बहनों के साथ यही हुआ है। यदि आप की बहनें स्वयं भी आत्मनिर्भर होतीं और अपना और बच्चों का पालन पोषण करने में समर्थ होतीं तो आप को बिलकुल परेशानी नहीं होती। अब आप तो अपने जीजाजी की सोच और उन के व्यवहार को बदल नहीं सकते। यदि जीजाजी बदल नहीं सकते और बहनों को उन्हीं पर निर्भर रहना है तो उन्हें वह सब भुगतना पड़ेगा। पहले भी आप की बहनों ने बहुत कुछ भुगता होगा। वे आप को अपने साथ हुए अत्याचारों के बारे में बताती भी नहीं होंगी, यही सोच कर कि वे यदि अपने मायके चली गयीं तो अकेला भाई कैसे इतने बड़े परिवार का पालन पोषण करेगा? वह तो आप लोग ही अपनी बहनों को अपने साथ ले आए। यदि न लाते तो शायद वे कभी आप को शिकायत तक न करतीं। खैर¡

पनी पत्नी के साथ मारपीट करना और तेजाब डाल कर जला देना हद दर्जे की क्रूरता है और धारा 498ए आईपीसी का अपराध है। हमारी राय में इस तरह की क्रूरता के बाद भी इन विवाहों में बने रहने का कोई कारण नहीं शेष नहीं बचता। ऊपर से यह गर्वोक्ति कि यदि पत्नी को जरूरत होगी तो वह खुद चली आएगी। यह एक दास-स्वामी की सोच है। विवाह हो गया तो पत्नी दासी हो गयी। आज के युग में कौन स्त्री इस दर्जे की दासता को स्वीकार करेगी और अपने ऊपर अमानवीय अत्याचारों को सहन करेगी।

मारी राय में आप को यह आशा त्याग देनी चाहिए कि आप के जीजा आप की बहनों को लेने आएंगे। वे आ भी जाएँ और आप की बहनों को ले भी जाएँ तो क्या वे उन के साथ उचित व्यवहार करेंगे? हमारे विचार से इस दर्जे की क्रूरता के बाद बहनों के पास पर्याप्त कारण है कि वे अपने पतियों के साथ रहने से इन्कार कर दें और उन से अपने लिए और अपने बच्चों के लिए प्रतिमाह निर्वाह भत्ते की मांग करें। विवाह से आज तक जो भी उपहार आप की बहनों को आप के परिवार से, ससुराल के परिवार से और अन्य परिजनों से प्राप्त हुए हैं वे उन का स्त्री-धन हैं। इस स्त्री-धन में से जो भी उन के पतियों और ससुराल वालों के पास है उसे भी लौटाने की मांग आप की बहनों को उन के पतियों और ससुराल वालों से करना चाहिए। यदि वे स्त्री-धन नहीं लौटाते हैं तो आप की बहनों को पुलिस थाना में धारा 498-ए और धारा 406 आईपीसी की शिकायत दर्ज करानी चाहिए। यदि पुलिस कार्यवाही करने में टालमटोल करती है या इन्कार करती है तो मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस के पास अन्वेषण के लिए भिजवाना चाहिए।

प की बहनें घरेलू हिंसा अधिनियम तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत अपने व अपने बच्चों के लिए भरण पोषण की मांग कर सकती हैं। उन्हें ये दोनों आवेदन प्रस्तुत करने चाहिए। यदि आप की बहनें हमेशा के लिए इस विवाह को समाप्त कर देने को तैयार हों तो हमारी राय में उन्हें विवाह विच्छेद का आवेदन भी प्रस्तुत करना चाहिए। विवाह विच्छेद के आवेदन की सुनवाई के दौरान परिवार न्यायालय अनिवार्य रूप से पति पत्नी के बीच समझौता कराने का प्रयत्न करते हैं। यदि उस समय तक विवाह विच्छेद के लिए या साथ रहने के बारे में कोई सहमति बने तो न्यायालय में भी समझौता हो सकता है।

विवाह विच्छेद के आवेदन के साथ ही धारा 25 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत स्थाई भरण पोषण के लिए भी आवेदन देना चाहिए जिस से आप की बहनों को एक बड़ी राशि एक मुश्त मिल सके।

प के उपनाम से पता लगता है कि आप लोग पेशे से सुनार हैं। सुनार परिवारों में तो बहुत सी महिलाएँ इस तरह के काम करती हैं जिस से वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। इस समस्या का एक मात्र उपाय यही है कि महिलाएँ अपने पैरों पर खड़ी हों। यदि विवाह विच्छेद होता है तो उस के साथ स्थाई भरण पोषण की जो राशि उन्हें मिले उन से वे अपने लिए कोई व्यवसाय खड़ा कर के अपने और अपने बच्चों की सामाजिक सुरक्षा कर सकती हैं। बच्चों का पालन पोषण कर सकती हैं और एक सम्मानपूर्ण जीवन जी सकती हैं।

न सब कामों को करने के लिए आप की बहनों को किसी स्थानीय वकील से सहायता प्राप्त करनी चाहिए। यदि मुकदमे के लिए खर्चों की परेशानी हो तो अदालत के खर्च और वकील की फीस के लिए आप की बहनें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। प्राधिकरण मुकदमों के खर्चों और वकील की फीस की व्यवस्था कर देगा।

विवाह में कुछ नहीं बचा है, स्थाई पुनर्भरण और विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करना चाहिए।

sadwomanसमस्या-

राज यादव ने जौनपुर, उत्तर प्रदेस से समस्या भेजी है कि-

मेरी बहिन की उम्र् 28 वर्ष है उस की शादी 2004 में हुई थी। एक वर्ष तक उन का आना जाना अपने ससुराल में रहा। उस के बाद कुछ अनबन हो जाने की वजह से उन लोगों ने मेरी बहिन को हमारे यहाँ छोड़ दिया। तब से ले कर अब तक उन लोगों ने अभी तक खबर नहीं ली है। मेरी बहन अब वहाँ जाना नहीं चाहती। वह उस समय के हादसे को ले कर डरी हुई है। मैं धारा 125 व धारा 498ए लगाना चाहता हूँ। कृपया मुझे सुझाव दें।

समाधान-

प की बहिन लगभग नौ वर्षों से मायके में है और उस के ससुराल वालों ने अब तक उस की खबर नहीं ली है। आप की बहन भी पुराने हादसे से बैठे हुए भय के कारण वहाँ जाना नहीं चाहती है। इस मामले में आप कुछ करना चाहते हैं लेकिन आप के करने से तो कुछ भी नहीं होगा। यदि आप की बहिन करना चाहेँ तो बहुत कुछ हो सकता है। आप केवल उन की मदद कर सकते हैं।

प की बहिन को अपने ससुराल से आए 9 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। इस बीच कोई घटना नहीं हुई है। इस कारण से 498ए आईपीसी का कोई आधार स्पष्टतः नहीं है। आप की बहिन के साथ जो भी घटना हुई थी उसे हुए भी 9 वर्ष का अर्सा हो चुका है। 498ए में प्रसंज्ञान लेने की अवधि मात्र 3 वर्ष है। वैसी स्थिति में इस मामले में को सफलता मिलना पूरी तरह संदिग्ध है और आप की बहिन को 498ए आईपीसी में नहीं उलझना चाहिए। यदि आप की बहिन का कुछ स्त्री-धन उस के ससुराल में छूट गया है और उसे उस की ससुराल वाले लौटा नहीं रहे हैं तो आप की बहिन धारा 406 आईपीसी में अमानत में खयानत के अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं या फिर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को जाँच के लिए भिजवाया जा सकता है। इस प्रथम सूचना रिपोर्ट या परिवाद में 9 वर्ष पूर्व हुई घटना और क्रूरता का उल्लेख भी किया जाना चाहिए। यदि पुलिस समझती है कि धारा 498ए आईपीसी भी बनता है तो वह 406 के साथ साथ इस धारा के अन्तर्गत भी मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।

प की बहिन धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत अपने भरण पोषण का व्यय प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकती है। इस धारा के अन्तर्गत अन्तरिम रूप से भी बहिन को भरण पोषण राशि देने कि लिए न्यायालय आदेश दे सकता है। यदि आप की बहिन को भरण पोषण की राशि मिलने लगती है तो उन्हें कुछ राहत मिलना आरंभ हो जाएगा।.

प की बहिन का विवाह हुए दस वर्ष हो चुके हैं उस में से 9 वर्ष से वह अपने मायके में है। ऐसी स्थिति में उस के विवाह में कुछ शेष नहीं बचा है। बेहतर है कि आप की बहिन उस के साथ 9 वर्ष पूर्व हुई क्रूरता और उस के बाद उस के परित्याग को आधार बना कर इस विवाह को वैधानिक रूप से समाप्त करने के लिए विवाह विच्छेद की याचिका धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत करे और एक मुश्त स्थाई पुनर्भरण प्राप्त करने के लिए भी इसी आवेदन में प्रार्थना की जाए। यदि आप की बहिन के ससुराल वाले पर्याप्त राशि भरण पोषण के रूप में देने को तैयार हों तो सहमति से विवाह विच्छेद का आवेदन भी प्रस्तुत किया जा सकता है। एक बार आप की बहिन इस विवाह से मुक्त हो जाए तो स्वतंत्र रूप से अपना जीवन नए सिरे से जीना तय कर सकती है।

नरम रह कर क्रूरता का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

divorceसमस्या-

ज्योत्सना ने तिलकनगर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 15 जनवरी 2013 को हुई थी। मेरी शादी के दसवें दिन से मेरा पति मेरे साथ मार पीट करनी शुरू कर दी। वह मुझे कहता तेरे घर वालो ने कुछ नहीं दिया इसलिए अन्न छोड़ दे। हमेशा मुझ पर शकर करता रहता है, गाली गलौज करता है और दहेज का ताना मारता रहता है। फिर भी वह मुझे हमेशा मारता रहता था। एक दिन तो मेरे पति ने मुझे चाकू से मारने की कोशिश की। अगस्त में एक रात वे घर नहीं आए। मैं पूरी रात परेशान रही। मेरी सास ने मुझे यह कह कर मेरे मायके भेज दिया कि वह अपने चाचा के यहाँ गया है दो-तीन दिन में आएगा। मैं दो तीन दिन बाद घर लौटी तो पति ने कहा कि मैं तुझे तलाक दूंगा। मैं पुलिस में शिकायत दर्ज कराने गई तो मेरी शिकायत नहीं लिखी। महिला सेल में आकर पति ने कहा कि मैं ऐसी औरत को नहीं रखूंगा। सेल वाली मेडम ने कहा कि वे सिर्फ बात करवा सकते हैं और कुछ नहीं कर सकते। किसी ने कहा है कि एफआईआर दर्ज कराना जरूरी है वर्ना यह कह देगा कि मैं अपनी मर्जी से मायके गई हूँ और मेंटीनेन्स नहीं मिलेगा। मैं क्या करूँ। मेरे पास अभी तक तलाक का कोई नोटिस नहीं मिला है। महिला सेल वालों ने मुझे अब मीडिएशन के लिए भेजा है। जिस की तारीख 10 जनवरी 2015 है। मैं तलाक नहीं लेना चाहती। मैं ने अभी तक कोई मुकदमा नहीं किया है। मैं अगस्त से अपने मायके में रह रही हूँ। मैं महिला सेल में कहती हूँ कि मुझे ससुराल जाना है तो वह कहती है मैं कुछ नहीं कर सकती।

समाधान-

प के साथ ससुराल में अत्यन्त क्रूरतापूर्ण व्यवहार हुआ है। यह धारा 498ए आईपीसी के अन्तर्गत अपराध है। पुलिस को आप की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करनी चाहिए थी। लेकिन उन्हों ने दर्ज नहीं की है।

प की कहानी से लगता है कि आप के पति और सास आप को साथ नहीं रखना चाहती है। वे आप के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते हैं और जीवन भर करते रहेंगे। वे समझते हैं कि उन के साथ रहना आप की मजबूरी है। आप को दासी से भी बदतर हालात में वहाँ रहना पड़ेगा। इस कारण फिलहाल आप यह सोचना बन्द कर दें कि आप को ससुराल जाना है। यदि आप बार बार यह कहेंगी कि आप को ससुराल जाना है तो आप की बात पर कोई ध्यान नहीं देगा और आप के पति व सास और अधिक क्रूर होते जाएंगे। आप की तरफ से कोई भी दबाव न होने से उन के हौंसले बढ़े हुए हैं। नरम रह कर क्रूरता का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

प को 10 जनवरी को मीडिएशन में जाना चाहिए और कहना चाहिए कि आप ससुराल जाने को तैयार हैं लेकिन पति और सास ले जाना चाहेंगे तो भी नहीं जाएंगी। आप तभी जाएंगी जब वे दोनों अच्छे व्यवहार के लिए पाबंद हों। रहने को अलग कमरा दें और हर माह खर्चे के लिए नकद रकम आप को दें। जब तक आप सख्त न होंगी तब तक आप को कोई कुछ न गिनेगा।

10 जनवरी के बाद आप अदालत में परिवाद प्रस्तुत कर वहाँ से एफआईआर दर्ज कराने का आदेश करवा कर उसे थाने भिजवाएँ। इस के लिए आप को वकील की मदद लेनी होगी। आप को घरेलू हिंसा अधिनियम में भी शिकायत कर के मांग करनी चाहिए कि आप को अलग कमरा चाहिए, पति को हिंसा न करने के लिए पाबंद किया जाए और पति को पाबंद किया जाए कि वह हर माह आप के खर्च की रकम आप को दे। इस के अलावा आप को भरण पोषण के लिए धारा 125 का मुकदमा भी करना चाहिए। ये तीनों कार्यवाहियाँ होने पर ही आप के पति और सास के तेवरों पर फर्क पड़ सकता है, अन्यथा नहीं।

म हमेशा कहते हैं कि स्त्री को तभी तवज्जो मिल सकती है जब कि वह खुद अपने पैरों पर खड़ी हो। आपु को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए और अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयत्न करना चाहिए। उक्त तीनों कार्यवाहियाँ करने के बाद उस का परिणाम देखें। यदि पति व सास नरम पड़ते हैं तो अदालत में समझौता होने पर ही आप पति के घर जा कर रहने की सोचें अन्यथा नहीं। मायके में रह कर भरण पोषण की राशि पति से प्राप्त करें और अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयत्न करें।


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