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Month: August 2008

तीसरा खंबा पर कानूनी सलाह….. कोर्ट मैरिज या आर्यसमाजी विवाह?

वकीलों में एक कहावत है – “किसी को मुफ्त सलाह नहीं देनी चाहिए, क्यों कि मुफ्त सलाह पर न तो मुवक्किल विश्वास ही करता है, और न ही
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कानून संबंधी और एक पक्षकार की तथ्य संबंधी भूल का कंट्रेक्ट पर प्रभाव

कानून सम्बन्धी भूल का प्रभाव कोई भी कंट्रेक्ट केवल इस कारण से शून्यकरणीय नहीं हो सकता कि वह भारत में प्रवृत्त किसी कानून से संबंधित भूल का परिणाम
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दोनों पक्षों की तथ्यात्मक भूल से शून्य कंट्रेक्ट

अब तक हम ऐसे अनुबंधों की बात कर रहे थे जिन्हें अनुबंध के किसी पक्षकार के जोर देने पर शून्य घोषित किया जा सकता था। अब बारी है,
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सेवा बंध-पत्र की सीमाएँ तय हों

युवनीत सूरी को कंपनी ने 07.12.2003 के पत्र से रेस्टोरेंट जनरल मैनेजर के पद पर नियुक्त किया था। नियुक्ति पत्र की शर्त के अनुसार उसे दिसम्बर 2003 से
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नियोजन अनुबंध को चुनौती दी जा सकती है?

तीसरा खंबा के विगत आलेख कंट्रेक्ट को निरस्त करने की न्यायालय की शक्ति पर भाई नीरज जी रोहिल्ला ने अपनी टिप्पणी में एक गंभीर प्रश्न किया था….. “इंजीनियरिंग
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कंट्रेक्ट को निरस्त करने की न्यायालय की शक्ति

पिछले आलेख में मैं ने कानून के साथ दिए तीन उदाहरण आप को बताए थे। स्वतंत्र सहमति के बिना अनुबंधों की शून्यकरणीयता के विषय पर दो और उदाहरण
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