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Month: September 2008

भ्रष्टाचार या शिष्टाचार ?

कल के आलेख भ्रष्टाचार का पूल पर अनेक प्रतिक्रियायें थीं जिन में टिप्पणीकारों ने कहा था कि उन्हों ने पेशकार को जज के सामने ही रुपए लेते देखा
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भ्रष्टाचार का पूल

इन दिनों न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बातें माध्यमों पर आने लगी हैं। लेकिन माध्यमों से इतर भ्रष्टाचार के किस्से बहुत प्रचलित हैं। लेकिन मैं यहाँ किसी किस्से की
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कस्बे की अदालत में कुछ घंटे

पिछले दिनों नगर से तीस किलोमीटर दूर एक कस्बे की अदालत जाने का अवसर मिला। इस अदालत को भारतीय न्याय व्यवस्था में अदालतों के पिरामिड के भूतल का
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नया कानून नहीं, शीघ्र सुलभ न्याय-व्यवस्था समस्या का हल है।

आतंकवादी हत्याएं जारी हैं। तमाम कोशिशों, घोषणाओं के बाद भी दिल्ली में बम विस्फोट हुए और जानें गईं। सैंकड़ों लोग घायल हुए। दिल्ली ही नहीं पूरे देश में
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उन्हें न्याय नहीं मिला, और क्या इन्हें दिया जा सकेगा ?

दिसम्बर 1978 में मेरी सनद आने के साथ ही मेरी विधिवत् वकालत शुरू हो गई थी। उसी महीने एम. एन. चतुर्वेदी और आर. पी. तिवारी को नौकरी से
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कानूनी प्रक्रिया में बाधक अनुबंध

कानूनी प्रक्रिया में बाधक अनुबंधों को शून्य माना जाना किसी भी ऐसे राज्य की पहली शर्त होनी चाहिए जिस का शासन कानून के आधार पर चलता है। भारत
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कानूनी कार्यवाहियों में बाधक अनुबंध शून्य हैं।

कानूनी कार्यवाहियों में रोड़ा बनने वाले अनुबंध शून्य हैं।प्रत्येक अनुबंध ….(क) जिस के द्वारा उस के किसी पक्षकार को किसी भी कंट्रेक्ट के अंतर्गत और उस के संबंध में प्राप्त अधिकारों को प्रवर्तित
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व्यापार अवरोधक अनुबंध शून्य हैं

व्यापार में अवरोधक अनुबंध शून्य हैं … ऐसा प्रत्येक अनुबंध जो किसी भी व्यक्ति के किसी भी वैधानिक वृत्ति (प्रोफेशन), व्यापार या कारोबार करने पर रोक लगाता है,
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