कानूनी उपाय Archive

समस्या-

प्रतापचंद्र ने ग्राम करवनियां, ब्लाक नगवां, जिला सोनभद्र (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी बहन कंचन का केस अप्रैल 2016 से ही रावर्ट्सगंज जिला न्यायालय में चल रहा है। 2013 में बस्ती जिले के करमांव निवासी किसोर चंद्र मणी से उसकी शादी हिंदू रिवाज से हुई थी, जिसके बाद तीन बार वह क्रमशः 1 सप्ताह, 1 माह, 3 माह के लिए, ससुराल गयी है। उसे बार बार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उस पर जानलेवा हमला किया गया, उसके पति का उसकी भाभी से संबंध है, इसका विरोध करने पर परिवार वालों ने इसे भी देवर से संबंध रखने की सलाह दे डाली। तीन साल तक सुलह-समझौता करवा कर दोनो पक्षों द्वारा मामले को हल करने की भरसक कोशिश की गई, पर हल न निकला। दहेज की मांग व शारिरिक प्रताड़ना और भी बढ़ती गई।  जब उसे जान से मार देने की कोशिश की गई तब से वह अपने मायके में ही है, और वह उससे तलाक लेना चाहती है। पहले मिल कर बातचीत से तलाक़ का मामला हल न होने पर, साल 2016 अप्रैल में हम लोग की तरफ से दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा तथा गुजाराभत्ता लड़के पक्ष वालों पर मुकदमा कर दिया गया। लड़के वाले पहले की ही तरह अब भी धोखाधड़ी वाली बात करते हैं कि अब सब ठीक हो जायेगा विदाई कर दो। पर लड़की का स्टैंड क्लीयर है- कि मुझे तलाक़ चाहिए। दो-ढाई सालों में कोर्ट में वे लोग पेशी पर अबतक तीन या चार बार ही आये हैं, किंतु उनका कुछ नहीं हुआ। अक्टूबर 23, 2018 को मेंटेनेंस (125) का फैसला आया पर कोर्ट द्वारा तय रू. 2500 गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है, बाकी दो केसों का क्या हुआ वकील कुछ नहीं बताता। मुझे जानकारी नहीं है। मै बाहर ही रहता हूँ गाजियाबाद. कृपया बतायें की अब कोर्ट क्या करेगी? या हमें क्या करना होगा। ताकि जल्दी से मामले का निपटारा हो?

समाधान-

2013 में शादी हुई, बहिन तीन बार में कुल मिला कर चार माह एक सप्ताह ससुराल में रह रही है। उसी में इतने झगड़े हैं। आप ने जब सुलह समझौते की बात शुरू की तभी आप को ये सारे मुकदमें और तलाक का मुकदमा कर देना चाहिए था। सुलह समझौते की बातचीत तो मुकदमों के लंबित रहते भी चल सकती थी।

दो-ढाई साल पहले 2016 आप की बहिन की और से तीन मुकदमे किए गए हैं।  अब आप को जल्दी पड़ी है। तीनों मुकदमों में सामने वाले पक्ष को जवाब देने का मौका होगा, आप की साक्ष्य होगी, उस की साक्ष्य होगी फिर बहस और फिर फैसला होगा। समय तो लगेगा। यह अमरीका नहीं है जहाँ दस लाख की आबादी पर 140 अदालतें हों, यहाँ इतनी आबादी पर 12-13 अदालतें हैं। लोग ज्यादा अदालतों के लिए तो लड़ेंगे नहीं, वोट देंगे तब हिन्दू मुसलमान हो जाएँगे। तो ऐसे ही भुगतना होगा।

आप की बहिन को तलाक चाहिए और अभी तक तलाक का मुकदमा तक नहीं किया है। तलाक कैंसे मिलेगा? जिस दिन आप को यह पता लगा कि पति के उस की भाभी के साथ संबंध है और बहिन को भी देवर के साथ संबंध रखने की सलाह दी गयी है तभी आप को तुरन्त तलाक का मुकदमा करवाना चाहिए था। अब भी बहिन के लिए तलाक चाहते हैं तो उस के लिए मुकदमा तुरन्त करें। आप ने 2013 से 5 साल बहिन के जीवन के बरबाद हो चुके हैं। थोड़ा धैर्य रखिए नतीजे भी आएँगे। न्याय ऐसी चीज नहीं है जो जाए और बाजार से खरीद लाए, बस काम खत्म। समय तो लगेगा।

आप खुद अपनी बहिन के वकील से दैनन्दिन संपर्क में नहीं हैं। एक बार जाइए, उस से मिलिए और विस्तार से बात कीजिए। उसे कहिए कि आप उस से फोन पर पूछताछ करते रहेंगे। तो वकील सब कुछ बताएगा। यदि एक दो मुलाकातों के बाद लगे कि वकील ठीक से काम नहीं कर पा रहा है तो किसी अच्छे वकील को कर लें। हालांकि वकील बदलने से मुकदमे में लगने वाला समय कम होगा ऐसा लगता नहीं है।

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समस्या-

मानिक राम सिन्हा ने ग्राम बोरीदखुर्द, पोस्ट शान्तिपुर, वाया गुरूर ब्लाक, जिला धमतरी बिहार से पूछा है-

म लोग दो भाई बहन है पूरी पैत्रृक संपत्ति को दो भाग में बाँट लिए हैं। किन्तु मेरी बहन अपने नाम की जमीन को किसी दूसरे आदमी के पास बेच रही है, जबकि उस जमीन को मै खरीदना चाहता हूँ। वो मुझे जमीन नहीं दे रही है ,कृपया रजिस्ट्री ना करा सके ऐसा कोई उपाय बतावें।

समाधान-

प की जमीन पैतृक है और आप का कहना है कि उस का बंटवारा हो चुका है। लेकिन कोई भी बंटवारा बिना पंजीकरण के मान्य नहीं हो सकता है। इस कारण से इस बंटवारे को अमान्य किया जा सकता है।

इस परिस्सथिति में सब से पहला उपाय तो यह है कि आप  तुरन्त एक नोटिस बहिन को दिलाने के लिए किसी अच्छे वकील से तैयार कराएँ। इस नोटिस में यह अंकित हो कि उस (बहिन) के हिस्से की जमीन को खरीदने का अधिकार धारा 22 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत आप का है, और आप वह हिस्सा खरीदने कौ तैयार हैं, इस कारण अन्य किसी को वे अपना हिस्सा विक्रय नहीं करें। इस के साथ ही आप अपने क्षेत्र के उप पंजीयक को एक आवेदन लिख कर दें कि आप की पैतृक संपत्ति में आप की बहन अपना हिस्सा बेचना चाहती है जब कि उसे खरीदने का अधिकार धारा 22 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत आप को है। यदि उस की बहिन पैतृक संपत्ति के हिस्से के बेचान का पंजीयन कराने आए तो उस विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं किया जाए। इस आवेदन के साथ आप उक्त नोटिस की एक प्रति लगा दें। जैसे ही आप आवेदन उप पंजीयक को दे दें। उक्त नोटिस भी आप की बहिन को रजिस्टर्ड ए.डी. से भिजवा दें।

जैसे ही बहिन को भेजा नोटिस उसे मिल जाए और प्राप्ति स्वीकृति वापस लौट कर आ जाए। आप अपने वकील से दीवानी न्यायालय में दावा कराएँ कि उस की बहिन को इस तरह का स्थायी व अस्थायी व्यादेश दिया जाए कि वह अपना हिस्सा जिसे आप खरीदना चाहते हैं, किसी अन्य को विक्रय न करे।

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समस्या-

अभिषेक शर्मा ने  भागलपुर बिहार से पूछा है-

मेरा पुश्तैनी मकान है जिस पर मेरे पिताजी ने अपनी मर्जी से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवाया कि तुम अपनी मर्जी से अपना हिस्सा दे रहे हो,पर मेरी मर्जी नहीं थी। मुझ से टॉर्चर कर के कुछ पैसे दे कर हस्ताक्षर करवाए। क्या अब मैं अपना हिस्सा ले सकता हूँ क्या? हस्ताक्षर मेरे और दो गवाहों के हैं। कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के पिता ने आप का अपना हिस्सा उन के हक में छोड़ने के लिए आप से कोई दस्तावेज लिखाया है। इस तरह उन्हों ने आप का हिस्सा अपने नाम हस्तान्तरित करने का प्रयत्न किया है। 100 रुपए से अधिक मूल्य की किसी भी अचल संपत्ति या उस के हिस्से का हस्तान्तरण बिना उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत दस्तावेजके बिना होना असंभव है।

आप के पिता को यही करना था तो या तो अपने नाम रिलीज डीड आप से निष्पादित करवा कर उस का पंजीकरण करवाना था। चूँकि आप को उन्हों ने कुछ पैसे भी दिए हैं तो यह एक प्रकार से भूमि का विक्रय भी है जिस का भी पंजीकरण होना जरूरी था। पंजीकरण के लिए यह आवश्यक था कि आप को उपपंजीयक के समक्ष ले जाया जाए और वहाँ के रजिस्टरों पर तथा दस्तावेज की दूसरी प्रति पर भी आप के हस्ताक्षर कराए जाएँ।

यदि इस तरह का कोई हस्तान्तरण दस्तावेज पंजीकृत नहीं हुआ है तो पिता द्वारा इस तरह का दस्तावेज लिखा लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप पुश्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त करना चाहते हैं तो तुरन्त बंटवारे तथा अपना हिस्सा अलग कर उस का पृथक कब्जा देने के लिए वाद सक्षम न्यायालय में संस्थित करें, तथा उक्त संपत्ति या उस के किसी भी हिस्से को बेचने या किसी भी प्रकार से खुर्द-बुर्द करने पर रोक लगवाएँ।

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समस्या-

रोशनी खातून ने ग्राम हमीरपुर जिला कटिहार, बिहार से पूछा है-

मैं मुस्लिम धर्म से हूँ। मेरी शादी 7 महीने पहले हुई थी मेरे पति मेरे साथ मारपीट और दहेज़ की मांग करते थे।  उसके खिलाफ महिला थाना में आवेदन दिया।  थाने में उस ने दरोगा को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। एक एफिडेविट दिया कि मारपीट नहीं करेंगे और पति-पत्नी की तरह रहेंगे और थाने से ही मेरी विदाई हुई। ससुराल पहुँचने के बाद फिर से वही ताने, मारपीट, दहेज़ की डिमांड होने लगी। फिर मैंने अपनी माँ को फ़ोन कर के बताया तो वो मुझे ससुराल से मायके ले आयी।

अब मैं 2 महीने से गर्भवती हूँ , इसकी सूचना अपने पति को फ़ोन करके दी तो कहता है मैंने तुमसे शादी ही नहीं की है, तो ये मेरा बच्चा कैसा हुआ। अब मैं क्या करूँ? गर्भपात कराऊँ या बच्चे को इस दुनिया में आने दूँ। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा ? मेरे पति मुझसे शादी सिर्फ दहेज़ के लिए किये थे।

अब वो दूसरी शादी करने वाले हैं। क्या वो मुझसे बिना तलाक लिए शादी कर सकता है?  इस बच्चे का क्या करूँ?  उसपर कौन सा केस करूँ।  केस कितने सालों तक चलेगा? क्या शादी में दिया हुआ सामान वो वापस करेगा? समाज में मेरे परिवार की बदनामी हो रही है, इसलिए मैं आत्महत्या करने की सोच रही हूँ क्यूंकि क़ानून से न्याय मिलने में मुझे पता नहीं कितने साल लग जाएंगे। कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प के विवाह को सात माह हुए हैं और उस में आप पर तमाम कहर टूट पड़े हैं। आप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को ले कर आत्महत्या करने की सोचना बिलकुल भी ठीक नहीं है। आपने और न ही आप के परिवार ने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिस से बदनामी हो।  बदनामी तो उस शख्स और परिवार की होनी चाहिए जिस ने आप के साथ इंसान की तरह नहीं। होता यह है कि जब भी कोई गलत काम करता है तो उस का परिणाम आने के पहले ही झूठा प्रचार आरंभ कर देता है। इस से पीड़ित पक्ष को लगता है कि उस की बदनामी हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप को चाहिए कि आप धीरज रखें और अपने विरुद्ध हुई ज्यादतियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें।

आप को जब एक बार शपथ पत्र दे कर आप का पति ले गया था और उस के विपरीत उस ने व्यवहार किया है तो आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। आप का कहना है कि पहले पुलिस ने पैसा खा कर काम नहीं किया। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। आम तौर पर पुलिस को यह निर्देश हैं कि पहली बार में पति पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। उस दफे भी आप यदि जाने से इन्कार कर देतीं तो पुलिस किसी हालत में समझौता नहीं कराती। हो सकता है यह करते हुए भी पुलिस के किसी अधिकारी ने सामने वाले पक्ष से पैसा लिया हो। लेकिन आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए कि आपके साथ फिर से मारपीट हुई है, ताने मारे गए हैं, दहेज मांगा गया है जिस के कारण आपको पति का निवास छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। पति ने आप का तमान स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया है इस तरह पति ने धारा 323, 498ए, 406 आईपीसी का अपराध किया है। । यदि थाना रिपोर्ट करने से मना करे तो वही रिपोर्ट एक पत्र के साथ रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से एस.पी. को भेजनी चाहिए। यदि फिर भी कोई कार्यवाही न हो तो  मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकील की मदद से परिवाद दाखिल करना चाहिए। इस के अलावा मजिस्ट्रेट के न्यायालय में तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आवेदन दे कर भऱण पोषण की मासिक राशि की मांग करनी चाहिए।

यह सही है कि मुस्लिम विधि में चार विवाह तक किए जा सकते हैं। लेकिन यह भी प्रावधान है कि सभी पत्नियों को एक जैसा व्यवहार मिलना चाहिए तथा दूसरी शादी के लिए पहली की सहमति होनी चाहिए। आप चाहें तो दूसरा विवाह रुकवाने के लिए दीवानी अदालत से स्थायी व अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद व प्रार्थना कर सकती हैं। यदि फिर भी पति दूसरा विवाह कर ले तो आप को हक है कि आप भी अदालत से तलाक के लिए प्रार्थना पत्र दे कर तलाक ले सकें।

जहाँ तक गर्भ रह जाने की बात है। बच्चे का भविष्य तो अभी अनिश्चित ही है। पिता गंभीर नहीं है तो उसे पिता का प्रेम और स्नेह तो मिलने से रहा। वैसी स्थिति में हमारी नजर में उस का दुनिया में आना ठीक नहीं है। फिर भी यह निर्णय तो केवल माँ ही ले सकती है कि उसे अपनी संतान को दुनिया में लाना है या नहीं। यदि अभी गर्भाधान को तीन माह नहीं हुए हैं तो स्वैच्छिक गर्भपात कराया जा सकता है।

जहाँ तक मुकदमों के चलने के समय की बात है तो यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वहाँ अदालतों में कितने मुकदमें हैं। कितने ही मुकदमे चल रहे हों पर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आपके पास यही रास्ता है और आपको मजबूती के साथ इस लड़ाई को लड़ना चाहिए। आप अवश्य जीतेंगी।

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समस्या-

रियाज़ुद्दीन ने बिलासपुर, जिला गौतम बुद्ध नगर, (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरे ससुर साहब ने 15 साल पहले एक प्लॉट खरीदा था शाइन बाग दिल्ली में उस समय किसी व्यक्ति ने मेरे ससुर साहब से कह कर कि एक ग़रीब फैमिली है अपने यहाँ रेंट पर रख लो। उन्होंने उस को रख लिया, वो भी विना रेंट के  15 साल तक उस से कोई किराया भी नहीं लिया। अब उनको उस प्लाट पर निर्माण करना है। लेकिन वह औरत उस प्लाट को खाली नहीं कर रही। बोलती है मुझ को दो फ्लोर बना कर दो या आधा मकान दो। मेरी पास इस के पेपर हैं, सब कुछ है, और एक दो बदमाशों से भी जा कर मिल ली है वो। उस औरत के आदमी की मृत्यु भी हो चुकी है। अब हम क्या कर सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें।

समाधान-

रियाजुद्दीन जी, अपनी किसी संपत्ति पर जब भी किराएदार या लायसेंसी के रूप में किसी को व्यक्ति को कब्जा दिया जाए तो उस की लिखित संविदा की जानी चाहिए, जिस पर दोनों पक्षकारों के सिवा कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों।  बेहतर हो यदि उस संविदा को उचित मूल्य के गैरन्यायिक स्टाम्प पर लिखा जाए और नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। नोटेरी के रजिस्टर में पक्षकारों के साथ-साथ गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए जाएँ। इस दस्तावेज को सुरक्षित रखा जाए। इस से भविष्य में यह साबित करने में आसानी रहे कि भूमि या परिसर किराए पर या लायसेंस पर उपयोग के लिए दिया गया था। यदि आप के ससुर साहब के पास इस तरह का कोई दस्तावेज या मामूली लिखत भी हो तो इस स्थिति में वह काम आएगा। यदि कोई भी दस्तावेज नहीं हो तो वहाँ जिस का कब्जा है उसकी किसी तरह की अभिस्वीकृति हो जिस का कोई सीधा या परिस्थिति जन्य सबूत हो।

यदि यह सब नहीं है तो यह माना जाएगा कि आप के ससुर ने उक्त संपत्ति को खुला छोड़ दिया था और फिर वर्तमान कब्जाधारी उस पर अपना काम करने लगा और आप के ससुर ने 12 वर्ष से अधिक से उस संपत्ति पर अपना कोई दावा नहीं किया। अवधि अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार 12 वर्ष से अधिक का कोई कब्जा हो जाने पर उस से कब्जा वापस लेने के लिए दावा नहीं किया जा सकता। इसी को एडवर्स पजेशन कहा जाता है। यदि उस से जबरन कब्जा लिया जाता है तो यह गैर कानूनी होगा और वर्तमान कब्जाधारी धारा  145 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कब्जा वापसी का प्रार्थना पत्र दे सकता है और उसे कब्जा वापस दिलाया जा सकता है।

आप के ससुर साहब के पास उस प्लाट के स्वामित्व का कोई सबूत जरूर होगा। उस के साथ यदि आप उस कब्जाधारी का कब्जा 12 वर्ष से कम का साबित कर सकें, या फिर यह साबित कर सकें कि वह जमीन / परिसर किराए पर दिया गया था और कम से कम एक बार किराया जरूर लिया गया था। तो आप को दीवानी का कोई अच्छा वकील उस प्लाट पर अपना कब्जा वापस प्राप्त करने का रास्ता सुझा सकता है। इसलिए हमारा सुझाव है कि आप ये सब सबूत या गवाही इकट्ठा करें और फिर किसी अच्छे दीवानी काम करने वाले वकील से मिलें और रास्ता निकालें। वैसे हमें लगता है कि इस जमीन का कब्जा वापस लिया जा सकता है। कानूनी रास्ते में अभी हमारे देश में बहुत समय लगता है। इस कारण लोग मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाने के स्थान पर बहुत कम प्रतिफल में समझौते करना पसंद करते हैं। यदि आप को लगे कि कोई सबूत नहीं हैं जिस से कानूनी तरीके से संपत्ति को वापस लिया जा सके तो बेहतर है कि आपस में ऊंच नीच कर के ही किसी तरह से संपत्ति वापस प्राप्त की जाए। पूरी नहीं तो आधी ही प्राप्त की जाए।

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समस्या-

परमजीत खन्ना ने मरीवाला टाउन, मणिमाजरा, चंडीगढ़ से पूछा है-

म दो भाई बहन हैं। मेरे पापा को मेरे दादा जी से 1974 में संपत्ति विरासत में मिली थी। मेरे दादा जी को 1911 मे मेरे परदादा जी से संपत्ति विरासत मे मिली थी। मेरे पापा ने आधी संपति बेच दी। आधी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के नाम कर दी। मेरे पापा की मृत्यु 2016 मे हो गयी मेरे भाई  ने संपत्ति अपने नाम करवा ली। क्या इस संपत्ति में मेरा हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

बिलकुल आप को पिता और दादा से आई इस पुश्तैनी संपत्ति में आप का हिस्सा प्राप्त हो सकता है.

आप को इतना करना होगा कि आप जो संपत्ति आपके दादा जी को विरासत में उन के पिता से प्राप्त हुई थी उस का तथा आप के दादा जी जो संपत्ति उन के पिता से विरासत में मिली थी उस का रिकार्ड या सबूत जुटाना होगा। क्यों कि आप के हिस्से का निर्धारण उसी के आधार पर किया जा सकता है। फिलहाल हम आप के द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर हमारी राय बता रहे हैं।

आप के पापा को जो संपत्ति 1974 में विरासत में मिली थी वह पुश्तैनी और सहदायिक संपत्ति थी। इस तरह उस संपत्ति में उन की संतानों का जन्म से ही अधिकार उत्पन्न हो गया था। 2005 में पारित कानून से पुत्रियों को भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार उत्पन्न हो गया है। इस तरह आप के पिता ने पुश्तैनी संपत्ति में जो हिस्सा बेचा वह उन का हिस्सा बेचा है। जो बचा उस में आप का व भाई का हिस्सा मौजूद था।

आपके पिता ने वसीयत से जो संपत्ति आप के भाई को दी है वह वसीयत करना उचित नहीं है। आप के पिता केवल अपने हिस्से की जमीन वसीयत कर सकते थे। न कि पुत्र व पुत्री के हिस्से की जमीन। इस तरह वसीयत का कोई मूल्य नहीं है। आप के पिता को जो कुछ विरासत में  मिला था उस की एक तिहाई संपत्ति आप का हिस्सा है और आप उसे प्राप्त करने के लिए बंटवारे का वाद अपने भाई के विरुद्ध कर सकती हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकती हैं।

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समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने मदनगंज किशनगढ़, जिला अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादा जी दो भाई थे, उनके बड़े भाई ने शादी नहीं की थी और ना ही किसी को गोद लिया था। उन के पिता की मृत्यु के समय मेरे दादा जी की उम्र कम थी तो उन के चाचा जी ने सारी ज़मीन खुद के नाम कर ली और उन्हें कुछ हिस्सा नहीं दिया। कुछ समय बाद मेरे दादा जी ने उन से कुछ ज़मीन खरीदी थी हम को इस बारे मे पता था परंतु हम कभी हमारे गाँव नहीं गये। लेकिन मेरे दादा जी के मृत्यु के बाद हम गाँव गये तो हम को बोला के आप के दादा जी ने सारी ज़मीन बेच दी है हम को। परंतु इस के बारे मे मेरे पापा को कुछ जानकारी नहीं, कब उन से ये सब करवा लिया गया, और आज भी हम को विरासत की ज़मीन नहीं मिली, अब हम क्या कर सकते हैं?

समाधान-

प ने अपनी समस्या में जो विवरण दिया है वह कहानी मात्र है। उस से यह पता नहीं लगता कि आप के दादाजी के पिता की जो जमीन थी वह कौन सी थी। उस के तत्कालीन खसरा नं. और वर्तमान खसरा नंबर कौन से हैं। राजस्थान में राजस्व विभाग के रिकार्ड में सभी भूमि का रिकार्ड होता है। जो जमीन आबादी में परिवर्तित हो जाती है वह पंचायत, नगर पालिका/ परिषद / निगम या विकास प्राधिकरण के नाम दर्ज होती हैं। शेष भूमि उस के खातेदारों के नाम दर्ज होती हैं। इस का वर्तमान रिकार्ड राजस्व विभाग की वेबसाइट अपना खाता पर देखा जा सकता है।

इस तरह आप उक्त वेब साइट देख कर पता लगाएँ कि दादाजी के पिता की जो जमीन थी वह कौन सी हो सकती है। इस तरह आप संभावित खसरा नं. पता लगा लें। वर्तमान रिकार्ड के पहले का करीब सौ वर्षों तक का रिकार्ड राजस्व विभाग में मिल सकता है। पुराना रिकार्ड अजमेर राजस्व मंडल के रिकार्ड रूम में मिल जाएगा। इस में खोज करवा कर या स्वंय निरीक्षण कर के आप पता लगाएँ कि आप के दादा जी के पिता के नाम कौन सी और कितनी जमीन थी। वह जमीन किस आधार पर आप के दादाजी के चाचा के नाम आई। आप के दादाजी ने कौन सी जमीन खरीदी थी और वह जमीन कहाँ गयी। यह सब रिकार्ड देख कर आप पता लगा सकते हैं और उस रिकार्ड की सत्यापित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

यह सारा रिकार्ड पता लग जाने के बाद आप अजमेर में किसी अच्छे राजस्व मामलों के  वकील से मिल कर पता लगा सकते हैं कि आप को अब दादाजी के पिताजी की संपत्ति में से कुछ मिल सकता है या नहीं। यदि मिल सकता है तो कैसे मिल सकता है।

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माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

November 3, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

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समस्या-

सोनू कुमार ने सलेमपुर, जिला देवरिया, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मारी एक सौतेली बहन है, पिताजी के मर जाने के बाद वो प्रॉपर्टी में हिस्सा मांग रही है। जबकि माँ अभी जिन्दा है।  वो धमका रही है।  क्या वो प्रॉपर्टी में हिस्सेदार है या नहीं? कृपया बताएँ?

समाधान-

प के पिता की मृत्यु के साथ ही आप के पिता की संपत्ति के लिए उत्तराधिकार खुल चुका है। उन की जो भी संपत्ति है उस में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत सभी उत्तराधिकारियों के अधिकार निश्चित हो चुके हैं।

आप के पिता की मृत्यु के बाद उन की जीवित पत्नी अर्थात आप की माता जी तथा सभी संतानों का बराबर का हक उन की संपत्ति में उत्पन्न हो गया है और कोई भी उत्तराधिकारी आप के पिता द्वारा छोड़ी गयी संपत्ति के बंटवारे की मांग कर सकता है।

आप की सौतेली बहिन का भी अपने पिता की संपत्ति में अधिकार उत्पन्न हो चुका है। वह आप से उस के अधिकार की मांग कर रही है तो आप आपसी सहमति से बंटवारा कर के उसे उस का हिस्सा दे सकते हैं। या उस के हिस्से के बराबर धन उसे दे कर उस का हिस्सा शेष सभी या किसी एक उत्तराधिकारी के पक्ष में रिलीज करवा कर इस विवाद का निपटारा कर सकते हैं। अन्यथा स्थिति में आप की सौतेली बहिन बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

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समस्या –

मनीषा ने विकास नगर, कोंडगाँव, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे समाज वाले व सहेली के पति ने अपनी पत्नी के सामने मुझसे 50000 रुपये 2 महीने के लिये मांगे थे। मैंने परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्टाम्प पर लिखवा कर उनको पैसे दिए।  1 महीने बाद शहर छोड़ कर भाग गया, अब जब मुझे अपने पैसे वापस चाहिये तो मुझे बोलते हैं कि  मैं तो कंगाल हूँ, सब अपनी बीवी के पास छोड़ आया हूँ, जा के उससे पैसे मांगो,  उसको टॉर्चर करो, मैं कहाँ से दूंगा। मैंने हर संभव कोशिश कर ली, पर वो किसी चीज़ से नहीं डरता। धीरे धीरे भी पैसे वापस करने का नाम नहीं ले रहा । उसकी पत्नी ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया के मैं खुद अपने भाई के दरवाजे पर हूँ, कहाँ से तुमको पैसे दूँ। वो आदमी और भी बहुत लोगों से पैसे लेकर गया है। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

सा प्रतीत होता है कि सहेली के पति ने जानबूझ कर अपनी पत्नी को परेशान करने की नीयत से आप से रुपया लिया है और अब पल्ला झाड़ रहा है। यदि आपने स्टाम्प पर लिखवाया है तो आप अपने धन की वसूली के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं। यह वाद रुपया देने और स्टाम्प लिखे जाने की तारीख से तीन साल के भीतर किया जा सकता है। इस तरह आप स्टाम्प लिखे जाने की तिथि से तीन साल पूरे होने के दो माह पहले तक धन वापसी के लिए दूसरे प्रयास कर सकती हैं। लेकिन तीन साल पूरे होने के दो महीने पहले ही किसी वकील से मिल कर दीवानी वाद संस्थित कर दें, उस में कोताही नहीं करें।

इस व्यक्ति ने आप के साथ ही छल और बेईमानी की है जो कि धारा 420 आईपीसी व अन्य धाराओं के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इस कारण आपको तुरन्त उस व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। आम तौर पर पुलिस वाले इस तरह के मुकदमों को दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। पुलिस को रिपोर्ट देने के बाद एक दो दिन में कार्यवाही न होने पर एस पी को लिखित में परिवाद पूरे विवरण के साथ रजिस्टर्ड एडी से भिजवाएँ। एक सप्ताह में भी कोई कार्यवाही न होने पर किसी वकील से संपर्क कर के न्यायालय में अपराधिक परिवाद दर्ज कराएँ। अपराधिक कार्यवाही के दबाव में आप का पैसा वसूल हो जाए तो ठीक अन्यथा स्टाम्प लिखे जाने की तिथि के तीन साल पूरे होने के पहले अपना रुपया वसूली का मुकदमा अदालत में जरूर लगा दें।

दोनों ही मामलों में आप अपनी सहली के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करें बल्कि उसे गवाह बनाएँ क्यों कि वह इस वक्त आपका साथ जरूर देगी।

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