दंड प्रक्रिया संहिता Archive

समस्या-

टीकाराम राठौर ने एलबीएस नगर, लिंक रोड-03, तहसील व जिला विदिशा – 464001, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मैं एक ऑटोमोबाइल्स की मायकार (भोपाल) प्राइवेट लिमिटेड में लेखपाल के पद पर दिनांक 25 जुलाई 2011 से कार्य कर रहा था। लेकिन 24 अप्रैल 2018 को कंपनी के एच आर ने मुझे ईमेल करके बताया कि मेरी सेवा दिनांक 30 अप्रैल 2018 को समाप्त की जाती है। बजह बताई गई कि मैंने मालिक से फोन पर गलत तरीके से बात की, जो कि बिल्कुल झूठ बताया गया। खैर, मैंने अपना सारा हिसाब मैनेजमेंट को 27 अप्रैल को सौंप दिया हस्ताक्षर के साथ प्रति भी ले ली। मैंने श्रम विभाग विदिशा में शिकायत कर दी वहां से मुझे ग्रैच्युटी की राशि कपनी ने दे दी, सहमति से परंतु मेरा मार्च, अप्रैल माह का वेतन नहीं दिया गया। श्रम विभाग से भी सिर्फ फॉर्मेलटी की जा रही थी। अब श्रम विभाग मेरा केस श्रम न्यायलय भोपाल को भेज रहा है। मैं आपसे जानना चाहता हूं कि मुझे अब क्या करना चाहिए? -मेरी दो माह मार्च,अप्रैल की सैलरी,117 दिन की बकाया छुट्टी, पीएफ भी काटा गया पर ईपीएफ खाते में जमा नहीं किया। बिना नोटिस के निकाल दिया नौकरी से। कुछ लोगों का कहना है कि केस करोगे तो वकील पैसे खीचेंगे और कुछ नहीं होगा। अब मुझे क्या करना चाहिए जिससे मेरा हक मुझे मिल सके?

समाधान-

प को जिस तरीके से नौकरी से निकाला है वह एक स्टिग्मेटिक टर्मिनेशन (दोष मंढ़ते हुए की गयी सेवा समाप्ति) है। बिना आरोप पत्र दिए और जाँच कराए की गयी ऐसी सेवा समाप्ति वैध नहीं है। इसे चुनौती दी जा सकती है और देनी चाहिए। आजकल सेवा की समाप्ति से संबंधित औद्योगिकक विवाद के लिए उपाय यह है कि श्रम विभाग में आप अपनी शिकायत प्रस्तुत करें, शिकायत प्रस्तुत करने के 45 दिनों में शिकायत का कोई परिणाम नहीं निकलने पर श्रम विभाग से शिकायत का प्रमाण पत्र प्राप्त कर सीधे श्रम न्यायालय में अपना विवाद प्रस्तुत करें। श्रम न्यायालय में सेवा की समाप्ति से संबंधित  विवाद का न्याय निर्णयन हो कर अधिनिर्णय पारित कर दिया जाएगा। अब इस के लिए आप वकील करेंगे तो उस की फीस तो देनी होगी। वकील की फीस के अतिरिक्त विभिन्न खर्चों का सवाल है वह मात्र 500-1000 रुपए से अधिक नहीं होंगे। आप अपने वकील से इस काम की पूरी फीस एक बार में तय कर लें और धीरे धीरे देते रहें। वकील अच्छा करें, घटिया वकील न करें।

प का दो माह का वेतन अदा नहीं किया गया है तो उस की वसूली के लिए श्रम विभाग में वेतन भुगतान अधिकारी के यहाँ वेतन अदायगी का प्रार्थना पत्र वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत कर दें। बकाया अवकाश की राशि भी इसी प्रार्थना पत्र में जोड़ी जा सकती है।

पीएफ अंशदान की कटौती आप के वेतन से करने के उपरान्त उसे पीएफ स्कीम में जमा न करना अमानत में खयानत का अपराध है। आप अपना पीएफ नंबर अंकित करते हुए इस बात की शिकायत पीएफ कमिश्नर को कर सकते हैं। विभाग आप के नियोजक के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट करवा सकता है। यदि विभाग कोई कार्यवाही न करे तो आप पुलिस को एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं, पुलिस के भी कोई कार्यवाही न करने पर आप स्वयं संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सीधे परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

सफसइस

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समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मारे दादा जी ने ज़मीन खरीदी उस वक़्त के उनके हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी रजिस्ट्रार ऑफिस में किए थे। लेकिन जब हम ने इस के बारे मे हमारे भाइयों से पूछा तो उन्होने कहा कि ये ज़मीन हमारे दादा जी ने उनको बेच दी थी। फिर जब हम ने बेचान की रजिस्ट्री की कॉपी निकलवाई तो पता चला कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री में उन के सिग्नेचर हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी मैच नहीं करते हैं। इस की हम ने एफएसएल जाँच भी करवायी है. एफएसएल की रिपोर्ट में भी ये मैच नहीं हुए हैं। कृपया हम को बताएँ कि हम क्या कर सकते हैं।

समाधान-

किसी भी मामले में कानूनी सलाह लेते समय यह आवश्यक है कि जिस विधि विशेषज्ञ से आप सलाह ले रहे हैं उस के समक्ष सभी तथ्य रखे जाएँ। आपने आपके इस मामले में दादाजी द्वारा जमीन खरीदे जाने के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि तथा फिर दादाजी द्वारा भाइयों के नाम किए गए विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि नहीं बताई है। एफएसएल की रिपोर्ट कब आई है इस की तिथि भी नहीं बताई है। हर उपाय प्राप्त करने के लिए न्यायालय के ममक्ष कार्यवाही करे की एक निश्चित समयावधि होती है और कोई भी उपाय केवल सही समय पर नहीं करने के कारण असफल हो सकता है।

हली बात आप को यह देखनी चाहिए कि जब आप के दादा जी ने जमीन खरीदी थी तब रजिस्ट्री पर उन के हस्ताक्षर हुए थे क्या? यदि उन के हस्ताक्षर उस रजिस्ट्री पर हुए थे तो बेचान की रजिस्ट्री पर हुए उन के हस्ताक्षर पूर्व के हस्ताक्षरों से मिलने चाहिए थे और साथ ही अंगूठा निशानी भी मेल खानी चाहिए थी। इस का एक ही अर्थ हो सकता है कि भाइयों ने किसी अन्य व्यक्ति को आपके दादाजी बना कर रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली हो। यदि इस की जरा सी भी संभावना है तो यह गंभीर अपराध है क्यों कि इस में फर्जी दस्तावेज का निर्माण कर के छल हुआ है। इस में अनेक अपराध एक साथ हुए हैं।आप इस की रिपोर्ट पुलिस को करवा सकते हैं और पुलिस के कार्यवाही न करने पर परिवाद प्रस्तुत कर सीधे न्यायालय को कह सकते हैं कि इस मामले को दर्ज कर पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाए।

दि आप को पक्का है कि जो रजिस्ट्री आपके दादा की ओर से भाइयों के नाम हुई है वह फर्जी है और उस में छल हुआ है तो आप इसी आधार पर उस कूटरचित रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं और जमीन का बंटवारा करा कर अपने हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिए जाने के लिए राजस्व न्यायालय में विभाजन का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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समस्या-

डॉक्टर मोहन कुमार वर्मा ने 31,राम घाट मार्ग कहारवाड़ी, उज्जैन म.प्र. से पूछा है-

मैं दिनांक 09.07.2018 को दिवानी प्रकरण मे वसीयती अनुप्रमाणित गवाह दिनेश सोनी के साथ ट्रेन से प्रातः 9.30 बजे शुजालपुर पहुंचा। वहाँ से आटो मे बैठ कर 9.45 बजे वकील साहब के यहाँ गया। वे निजी काम से बाहर गए थे, वहाँ से हम 10.00 बजे न्यायालय चले गए। गवाह की साक्ष्य लिए जाने का इंतजार करते रहे।  दोपहर 3.30 बजे मेरा सगा भाई भगत राम एक पुलिस जवान को लेकर आया और बताया ये मोहन कुमार एवं दिनेश हैं पुलिस हमें थाने ले गयी वहाँ हमें मालूम हुआ कि हमने सुबह 9.40 बजे दुकान में भगत राम से मारपीट की व गवाह दिनेश सोनी ने बाएं हाथ में चाकू मारा व हम दोनों के विरूद्ध भगत राम ने भा.दं. सं.की धारा 452, 294, 323, 506 एवं 34 के अंतर्गत फर्जी एफआईआर कर कायमी करवा दी। जबकि हम दोनों दुकान पर गए ही नहीं। मैं दिनांक 13.07.2018 को थाना प्रभारी को फर्जी एफआईआर के विरुद्ध आई.पी.सी.धारा 182 के तहत कार्रवाई हेतु आवेदन करने के बाद कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने चला गया।

यात्रा से आने के बाद मै ने पुलिस अधीक्षक शाजापुर, डी.आई.जी. को निष्पक्ष जांच करने आवेदन दिया साथ ही हाईकोर्ट मे सी.आर.पी.सी की धारा 482 का आवेदन दिया जो कि लंबित है। सत्य तो यह है कि दिनांक 09.07.2018 को मेरे भाई भगतराम ने रेल से उतरते हुए देख पूर्व नियोजित षडयंत्र के तहत जाँच अधिकारी जो हेड काँस्टेबल रेंक का है,से साँठगाँठ कर हाथ में ईंजूरी कर एम.एल.सी. बनवाकर, दुकान के ही नौकरों को फर्जी गवाह बना कर एफआईआर दर्ज करवादी। अभी म.प्र. में चुनाव के कारण प्रकरण पेंडिंग  है। श्री मान से निवेदन है कि मुझे मार्गदर्शन दे कि मै क्या करूँ? ऐसी स्थिति में स्थानीय न्यायालय में कोई कार्यवाही की जा सकती हो तो सुझाव दिजिएगा।

समाधान-

प के विरुद्ध एक फर्जी मुकदमा बनाने के विरुद्ध आप ने जितना कुछ तुरन्त किया जा सकता था वह सब किया है। इस से पता लगता है कि आप एक जागरूक नागरिक हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं। इस फर्जी एफआईआर को निरस्त कराने के लिए आप ने धारा 482 में उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन कर दिया है यह भी उचित ही है। इस की सुनवाई अब होना चाहिए और निर्णय पारित हो जाना चाहिए, या फिर उच्च न्यायालय से उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट पर आगे की कार्यवाही पर रोक का आदेश पारित करवाना चाहिए।

इस मामले में आप को कुछ तथ्य और सबूत एकत्र कर के रखना चाहिए। आप जिस ट्रेन से शुजालपुर गए थे उस ट्रेन के टिकट संभाल कर रखना चाहिए। ट्रेन के शुजालपुर पहुँच का समय आरटीआई से पूछ कर जवाब अपने पास रखना चाहिए। इसी तरह जिस ऑटोरिक्शा से आप शुजालपुर स्टेशन से वकील साहब के यहाँ और फिर अदालत में पहुँचे थे उस ऑटोरिक्शा के ड्राइवर या ड्राईवरों का अता पता भी आप को रखना चाहिए जिस से उस का बयान लिया जा सके।

धारा 182 दंड प्रक्रिया संहिता असंज्ञेय अपराध है। इस कारण आप की शिकायत पर थाना प्रभारी कार्यवाही करने में सक्षम नहीं है। आप को अपनी रिपोर्ट की प्रतिलिपि पुलिस से ले लेनी चाहिए। असंज्ञेय मामलों में पुलिस वाले रिपोर्ट को रोजनामचा में दर्ज करते है और उस की प्रतिलिपि रिपोर्ट दर्ज कराने वाले को दे देते हैं। इस प्रति को ले कर आप सक्षम मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद दाखिल कर सकते हैं। यह परिवाद जितनी शीघ्र आप प्रस्तुत कर सकते हों आप को कर देना चाहिए। इस मामले में आप को आप के वकील की मदद लेनी चाहिए। यह परिवाद कर देने के बाद आप को जिस न्यायालय में आप गवाही के लिए उस दिन उपस्थित हुए थे उस न्यायालय को भी आप को सूचना देनी चाहिए कि आप का भाई गवाहों को प्रभावित करने के लिए इस तरह की कार्यवाही कर रहा है।

समस्या-

रमाकांत तिवारी ने ग्राम व पोस्ट- सुरहुरपुर, मुहम्मदाबाद गोहना, जिला- मऊ उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे मित्र रोशन के दादाजी चार भाई थे। उसके दूसरे नंबर वाले दादाजी का लड़का (रोशन का चाचा), रोशन को बार- बार, जब भी झगडा होता है या किसी अन्य अवसर पर कई बार पंचायत में बोल चुका है कि तुम अपने बाप के लड़के नहीं हो, तुम मेरे लड़के हो। वह अपनी और रोशन की माताजी का फोटो दिखाता है कि देखो ये फोटो है जो कि तुम्हारी मां ने मेरे साथ खिचवाईं थी। वो फोटो बिल्कुल सामान्य है। उसे देख के ऐसा कुछ भी नहीं लगता है। वो केवल रोशन को गांव वालो के सामने अपमानित करता है।
इस बारे में कुछ कानूनी मशविरा दें जिसकी मदद से वो शर्मिंदा होने से बच सके। क्या उस पे मानहानि का मुकदमा किया जा सकतेा है? रोशन के पास सबूत के तौर पर एक वीडियो है, जिसमें रोशन का चाचा बोल रहा है कि तुम मेरे बेटे हो, अपने बाप के नहीं। अगर मानहानि का मुकदमा होता है तो उसे कितने साल तक की सजा दिलाई जा सकती है और यह मुकदमा कहाँ दायर किया जा सकता है?

समाधान-

प के मित्र रोशन का चाचा इस तरह की हरकत करते हुए न केवल रोशन को अपमानित करता है अपितु वह रोशन की माताजी को भी अपमानित करता है। जो वीडियो रोशन के पास है उसे किस प्रकार किस ने रिकार्ड किया था और उस की प्रतिलिपियाँ कितनी, कैसे और किसने बनाई इस बात को वीडियो रिकार्ड करने वाले व्यक्ति और उस की प्रतिलिपियाँ बनाने वाले व्यक्ति की मौखिक साक्ष्य से प्रमाणित करना पड़ेगा। इस के अतिरिक्त खुद रोशन का व उन व्यक्तियों के बयान कराने पड़ेंगे जिन के सामने ऐसा कहा गया है। जितनी बार के बारे में रोशन ऐसा कहना साबित करना चाहता है उतनी बार के संबंध में उपस्थित व्यक्तियों की गवाही से साबित करना पड़ेगा कि ऐसा कहा गया है और इस से रोशन की बदनामी हुई है और समाज में उस की प्रतिष्ठा कम हुई है।

मानहानि के लिए दो तरह के मुकदमे किए जा सकते हैं। एक मुकदमा तो दीवानी अदालत में मानहानि के लिए हर्जाने का किया जा सकता है जिस में हर्जाने की राशि मांगी जा सकती है। दूसरी तरह का मुकदमा अपराधिक न्यायालय में परिवाद के माध्यम से धारा 500 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत संस्थित किया जा सकता है। अपराधिक मुकदमे में अधिकतम दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का दंड दिया जा सकता है।

दूसरी तरह के धारा 500 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराधिक मुकदमे के लिए रोशन को वकील की मदद लेनी होगी। इस के लिए उसे पहले किसी अच्छे वकील से मिलना चाहिए और रोशन को एक नोटिस दिलाना चाहिए कि वह सार्वजनिक रूप से अपने किए की माफी मांगे और रोशन को हर्जाना अदा करे। नोटिस की अवधि निकल जाने पर परिवाद संस्थित किया जा सकता है। यह परिवाद जिस पुलिस थाना क्षेत्र में रोशन निवास करता है उस थाना क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में संस्थित करना होगा। परिवाद प्रस्तुत होने पर मजिस्ट्रेट रोशन और एक दो गवाहों के बयान ले कर उसे लगता है कि मामला चलने योग्य है तो उस पर संज्ञान ले कर रोशन के चाचा के नाम न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए समन जारी करेगा। इस के बाद मुकदमा वैसे ही चलेगा जैसे सभी फौजदारी मुकदमे चलते हैं। रोशन इस मुकदमे के साथ साथ चाहे तो हर्जाने के लिए दीवानी वाद भी संस्थित कर सकता है।

समस्या-

सत्यनारायण सिंह ने जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी पत्नी द्वारा किसी हाउसिंग स्कीम में मकान पाने हेतु आवेदन करने के लिए रुपए 5000 प्रतिमाह आय का शपथ-पत्र 10 रुपए के गैर न्यायिक स्टांप पर नोटरी से बनवाया गया था। मैं ने उक्त आय प्रमाण पत्र को फैमिली कोर्ट में लंबित गुजारा भत्ता केस में पत्नी की आय दिखाने हेतु प्रस्तुत किया तो पत्नी ने लिखित में कहा है कि उसने ऐसा कोई प्रमाण पत्र कभी नहीं बनवाया है। मेरी पत्नी, स्टाम्प वेंडर और नोटेरी पर कौन सी आपराधिक और सिविल कार्यवाही किस सक्षम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती हैं?

समाधान-

प के मामले में आप को यह निश्चित करना पड़ेगा कि आय का वह शपथ पत्र सही है या फिर आप की पत्नी का बयान सही है। आप के प्रश्न से लग रहा है कि पत्नी का बयान सही है और आप की पत्नी ने हाउसिंग स्कीम का लाभ उठाने के लिए एक मिथ्या शपथ पत्र हाउसिंग स्कीम में प्रस्तुत किया है। इस मामले में आप की पत्नी ने धारा 193 आईपीसी के अंतर्गत अपराध किया है।

धारा 193 आईपीसी के दो भाग हैं पहला भाग तो वह है जिस में किसी न्यायिक कार्यवाही में मिथ्या साक्ष्य देने वाले के लिए सात वर्ष तक की सजा का उपबंध है। दूसरे भाग में किसी भी अन्य मामले में साशय झूठी गवाही देने के लिए दंड का उपबंध है जिस में तीन वर्ष तक के कारावास की सजा दी जा सकती है। आप की पत्नी का अपराध इस दूसरे भाग में आता है।

धारा 193 आईपीसी का अपराध असंज्ञेय अपराध है, अर्थात इस मामले में पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। इस धारा में कार्यवाही के लिए आपको जिस थाना क्षेत्र में अपराध हुआ है उस थाना क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा। परिवाद प्रस्तुत करने और उस में आपके बयान हो जाने के उपरांत सबूत के रूप में दस्तावेज एकत्र करना आवश्यक होगा। जो कि हाउसिंग स्कीम में प्रस्तुत किया गया शपथ पत्र है और आवेदन पत्र है। उन्हें बरामद करने के लिए पुलिस को जाँच के लिए भेजने हेतु मजिस्ट्रेट आदेश दे सकता है।

यदि आप सिद्ध कर सकते हैं कि आप की पत्नी ने वह प्रमाण पत्र सही बनवाया था और वह न्याया्लय के समक्ष मिथ्या कथन कर रही है तो यह न्यायालय को झूठी सूचना देने का अपराध है जो कि धारा 177 आईपीसी के अंतर्गत दो वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है। यह भी असंज्ञेय अपराध है पर इस के अंतर्गत कार्यवाही करने के लिए आप को परिवार न्यायालय में ही धारा 340 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आप की पत्नी के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए आवेदन करना होगा।
इस मामले में स्टाम्प वेंडर और नोटेरी के विरु्दध कोई अपराध नहीं बनता है क्यों कि स्टाम्प वेंडर ने केवल स्टाम्प बेचा है और नोटेरी ने शपथ पत्र को सत्यापित किया है।

समस्या –

मनीषा ने विकास नगर, कोंडगाँव, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे समाज वाले व सहेली के पति ने अपनी पत्नी के सामने मुझसे 50000 रुपये 2 महीने के लिये मांगे थे। मैंने परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्टाम्प पर लिखवा कर उनको पैसे दिए।  1 महीने बाद शहर छोड़ कर भाग गया, अब जब मुझे अपने पैसे वापस चाहिये तो मुझे बोलते हैं कि  मैं तो कंगाल हूँ, सब अपनी बीवी के पास छोड़ आया हूँ, जा के उससे पैसे मांगो,  उसको टॉर्चर करो, मैं कहाँ से दूंगा। मैंने हर संभव कोशिश कर ली, पर वो किसी चीज़ से नहीं डरता। धीरे धीरे भी पैसे वापस करने का नाम नहीं ले रहा । उसकी पत्नी ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया के मैं खुद अपने भाई के दरवाजे पर हूँ, कहाँ से तुमको पैसे दूँ। वो आदमी और भी बहुत लोगों से पैसे लेकर गया है। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

सा प्रतीत होता है कि सहेली के पति ने जानबूझ कर अपनी पत्नी को परेशान करने की नीयत से आप से रुपया लिया है और अब पल्ला झाड़ रहा है। यदि आपने स्टाम्प पर लिखवाया है तो आप अपने धन की वसूली के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं। यह वाद रुपया देने और स्टाम्प लिखे जाने की तारीख से तीन साल के भीतर किया जा सकता है। इस तरह आप स्टाम्प लिखे जाने की तिथि से तीन साल पूरे होने के दो माह पहले तक धन वापसी के लिए दूसरे प्रयास कर सकती हैं। लेकिन तीन साल पूरे होने के दो महीने पहले ही किसी वकील से मिल कर दीवानी वाद संस्थित कर दें, उस में कोताही नहीं करें।

इस व्यक्ति ने आप के साथ ही छल और बेईमानी की है जो कि धारा 420 आईपीसी व अन्य धाराओं के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इस कारण आपको तुरन्त उस व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। आम तौर पर पुलिस वाले इस तरह के मुकदमों को दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। पुलिस को रिपोर्ट देने के बाद एक दो दिन में कार्यवाही न होने पर एस पी को लिखित में परिवाद पूरे विवरण के साथ रजिस्टर्ड एडी से भिजवाएँ। एक सप्ताह में भी कोई कार्यवाही न होने पर किसी वकील से संपर्क कर के न्यायालय में अपराधिक परिवाद दर्ज कराएँ। अपराधिक कार्यवाही के दबाव में आप का पैसा वसूल हो जाए तो ठीक अन्यथा स्टाम्प लिखे जाने की तिथि के तीन साल पूरे होने के पहले अपना रुपया वसूली का मुकदमा अदालत में जरूर लगा दें।

दोनों ही मामलों में आप अपनी सहली के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करें बल्कि उसे गवाह बनाएँ क्यों कि वह इस वक्त आपका साथ जरूर देगी।

समस्या-

मेरा एक चैक दिनांक 8-3-2016 को बैंक जाते हुए रास्ते में गिर गया था और काफी ढूढंने पर भी नहीं मिला, कुछ मिनटो बाद मेने उस चेक के गुम की होने लिखित में सूचना बैंक में देकर उस चेक का भुगतान रोक दिया। अब डेढ साल बाद वह चैक किसी लङके को मिला और भुगतान के लिये मेरे खाते मे लगाकर बाउंस करा दिया। उसने मेरे को सूचना देकर केस भी कर दिया। अब   आप ही हल बतायें मैं क्या करूं?

-रवि कामरानी, डन्डापुरा सिन्धी कालोनी, विदिशा-464001 (म.प्र.)

समाधान-

ब आप को चैक बाउंस का नोटिस मिला तो उस के जवाब में यह बात लिखनी चाहिए थी और पुलिस को सूचना देनी चाहिए थी कि आप के खोए हुए चैक का कोई गलत इस्तेमाल कर रहा है। आप अब भी इस मामले में पुलिस में मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस कोई कार्यवाही न करे तो अदालत में परिवाद के माध्यम से मामला दर्ज कराएँ।

आप के विरुद्ध यदि मुकदमा हो गया है तो आप को लड़ना पड़ेगा। प्रतिरक्षा में अच्छा वकील खड़ा करें। आप बैंक से अपनी सूचना की प्रति मांगें जिसे आप अपनी प्रतिरक्षा मे प्रस्तुत कर सकते हैं, बैंक के शाषा प्रबंधक को अपनी गवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं, क्यों की डेढ़ वर्ष पहले जो पत्र बेंक को दिया था वह बहुत बढ़िया सबूत है। जब कि चैक की तारीख अधिक से अधिक चार छह माह पहले की रही होगी। आप चिन्ता न करें आप का पक्ष मजबूत है।

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

समस्या-

गोपाल ने पूना, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे एक मित्र का एक मैसेज एक अज्ञात मोबाइल नंबर पर 2015 में गया था। जो कि मोबाइल में नंबर गलत सेव होने से हो गया था। लेकिन वह जिस का नंबर था वह एक किसी विवाहित महिला का था जिस से मेरे मित्र का कोई संबंध नहीं था। उस महिला ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जिस के कारण 354 डी आईपीसी में मुकदमा कायम हुआ और अदालत में जमानत हुई। फिर धारा 107 दंड प्रक्रिया संहिता में भी पाबंद किया गया। लेकिन मेरा मित्र जमानत के बाद अदालत में हाजिर न हुआ क्यों कि वह किसी दूसरे गाँव में रहता है। इस से मेरे मित्र को क्या नुकसान हो सकता है?

समाधान-

प के मित्र की 354 आईपीसी के प्रकरण में जमानत हुई थी इस का सीधा अर्थ है कि पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। जमानत इसी बात की थी कि आप का मित्र सुनवाई के लिए हर पेशी पर अदालत में हाजिर होता रहेगा। अब आप का मित्र अदालत में पेशियों पर हाजिर नहीं हुआ है तो उस के द्वारा पेश किए गए जमानत व मुचलके की राशि को जब्त कर के उस के नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका होगा। आप के मित्र का वर्तमान पता न्यायालय के रिकार्ड पर न होने से वारंट उस तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई पेशी पर भी वारंट तामील न होने पर आप के मित्र को फरार घोषित कर उस की संपत्ति को कुर्क करने का आदेश तथा स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है। आप के मित्र के मिल जाने पर पुलिस गिरफ्तार कर के अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है जहाँ से अदालत यदि फिर से जमानत पर न छोड़े तो जेल भेजा जा सकता है। जब तक मुकदमे का निर्णय न हो या वही अदालत या उस से ऊँची अदालत जमानत पर छोड़े जाने का आदेश पारित न करे और जमानत पेश न हो तब तक जेल में रहना पड़ सकता है।

इस का समाधान ये है कि आप के मित्र को जमानत कराने वाले वकील से मिलना चाहिए और उस अदालत में जहाँ उस की जमानत हुई थी जा कर उस मुकदमे में फिर से जमानत करानी चाहिए। पुरानी जमानत जब्ती का जुर्माना जो भी हो वह जमा करना चाहिए और पेशियों पर हाजिर हो कर मुकदमे को समाप्त कराना चाहिए। इस तरह के मुकदमे लोक अदालत में गलती स्वीकार करने पर मामूली जुर्माना जमा कर के भी समाप्त कराए जा सकते हैं।

समस्या-

अश्विनि कुमार ने एमक्यू119, दीपिका कालोनी, पोस्ट- गेवरा प्रोजेक्ट, जिला कोरबा (छत्तीसगढ़) से समस्या भेजी है कि-

मै एवं मेरी पत्नी भी कोरबा के ही हैं। मेरी पत्नी के द्वारा मेरे ऊपर धारा 498क (जून 2012), धारा 125 (अगस्त 2012), घरेलू हिंसा (अक्तूबर 2013)2013 मे केस किए हैं। धारा 125 में अन्तरिम भरण पोषण के लिए फरवरी 2014 से 5000.00 रुपये प्रति माह मेरे द्वारा दिया जा रहा है। सभी केस अभी अंतिम दौर मे चल रहा है। मेरी पत्नी जून 2017 से केन्द्रीय विद्यालय मे शिक्षिका के पद पर नियुक्त होकर 27500.00 रुपए वेतन प्राप्त कर रही है। मुझे जानकारी होने पर मेरे द्वारा केन्द्रीय विद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर तीसरे पक्ष की जानकारी देने से मना किया गया। अपील में गया तो अपील अधिकारी के द्वारा मेरी पत्नी को पूछे जाने पर मेरी पत्नी ने जानकारी देने से मना कर दिये जाने की जानकारी देते हुये मुझे जानकारी नहीं दी गयी। सूचना के अधिकार के तहत दी गयी जानकारी आपकी ओर प्रेषित कर रहा हूँ। मुझे मेरी पत्नी से संबन्धित जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है?

समाधान-

प यह जानकारी इस कारण से प्राप्त करना चाहते हैं जिस से आप न्यायालय के समक्ष इन दस्तावेजों के प्रस्तुत कर यह साबित कर सकें कि आप की पत्नी को भरण पोषण के लिए किसी राशि की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन किसी भी न्यायिक कार्यवाही में यदि कोई तथ्य साबित करना है तो उस में उस के लिए इस तरह के प्रावधान हैं कि न्यायालय स्वयं उस पक्ष को वे तथ्य प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है या फिर किसी दस्तावेज को जो न्यायालय में लंबित मुकदमे का निर्णय करने के लिए आवश्यक हो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। इस सम्बन्ध में दीवानी और अपराधिक प्रक्रिया संहिताओं में उपबंध हैं।

दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 में दस्तावेज प्रस्तुत कराने तथा विपक्षी को परिप्रश्नावली दे कर उन के उत्तर प्रस्तुत करने के उपबंध हैं इसी प्रकार धारा 91 दंड प्रक्रिया संहिता में दस्तावेज प्रस्तुत कराने संबंधित उपबंध हैं। आप अपने वकील से संपर्क कर के उन्हें इन उपबंधों में से उपयोगी उपबंध में आवेदन प्रस्तुत कर उक्त दस्तावेज संबंधित स्कूल प्रशासन को प्रस्तुत करने का आदेश न्यायालय से कराएँ। जरूरत होने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

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