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‘मिथ्या-निरूपण‘ (misrepresentation) कंट्रेक्ट का मूल कानून अंग्रेजी में है और वहाँ शब्द है ‘मिसरिप्रेजेन्टेशन’। इस शब्द का कोई हिन्दी, उर्दू या हिन्दुस्तानी पर्याय उपलब्ध नहीं है, इस कारण
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बीमा कंपनी के तो ऐसे हजारों मुकदमे अदालत में हुए हैं जिन में कंपनी ने कपट के आधार पर बीमा पॉलिसी को शून्यकरणीय घोषित कराया। लोग उपभोक्ता अदालत
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हमने पिछले आलेख में कंट्रेक्ट किए जाने के दौरान होने वाले ‘कपट’ (fraud) की परिभाषा को जाना। इस आलेख पर ज्ञानदत्त जी पाण्डे ने कहा कि- “करण घोड़े
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अपनी उपस्थिति से स्वतंत्र सहमति को दूषित करने वाले तीसरे कारक ‘कपट’ अर्थात् (fraud) को भारतीय कंट्रेक्ट कानून में परिभाषित किया गया है। उस की परिभाषा इस तरह
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किसी भी कंट्रेक्ट में अनुचित प्रभाव की जाँच करते समय न्यायालय इस के तीन महत्वपूर्ण तत्वों की जाँच अवश्य करें। भारत के उच्चतम न्यायालय ने 1963 में एक
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‘अनुचित प्रभाव’ वह दूसरा कारक है जिस की उपस्थिति में सहमति स्वतंत्र नहीं रह जाती है और एक कंट्रेक्ट शून्यकरणीय हो जाता है। इसे कानून में इस तरह
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पिछली बार सहमति (Consent) से हमारा परिचय हो चुका था, कि जब भी दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी बात पर एक जैसे अर्थों में सहमत हो
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राजस्थान उच्च न्यायालय ने 1970 में जो मुकदमा निर्णीत किया वह एक गोदनामे पर आधारित था। गोदनामा एक विशेष प्रकार का कंट्रेक्ट ही होता है, जो गोद लेने
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पिछले आलेख पर मिली टिप्पणियों में ज्ञान दत्त जी पाण्डेय ने तथ्यों को साबित करने के भार से संबधित प्रश्न करते हुए दृष्टांत प्रस्तुत करने का सुझाव दिया
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कंट्रेक्ट करने के उद्देश्य से कौन स्वस्थ चित्त है? कंट्रेक्ट करने के उद्देश्य लिए एक व्यक्ति को तब स्वस्थ चित्त कहा जाएगा, जब कि कंट्रेक्ट करने के समय
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