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फर्जी रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद और छल व फर्जी दस्तावेज बनाने के लिए अपराधिक शिकायत दर्ज कराएँ।

समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मारे दादा जी ने ज़मीन खरीदी उस वक़्त के उनके हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी रजिस्ट्रार ऑफिस में किए थे। लेकिन जब हम ने इस के बारे मे हमारे भाइयों से पूछा तो उन्होने कहा कि ये ज़मीन हमारे दादा जी ने उनको बेच दी थी। फिर जब हम ने बेचान की रजिस्ट्री की कॉपी निकलवाई तो पता चला कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री में उन के सिग्नेचर हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी मैच नहीं करते हैं। इस की हम ने एफएसएल जाँच भी करवायी है. एफएसएल की रिपोर्ट में भी ये मैच नहीं हुए हैं। कृपया हम को बताएँ कि हम क्या कर सकते हैं।

समाधान-

किसी भी मामले में कानूनी सलाह लेते समय यह आवश्यक है कि जिस विधि विशेषज्ञ से आप सलाह ले रहे हैं उस के समक्ष सभी तथ्य रखे जाएँ। आपने आपके इस मामले में दादाजी द्वारा जमीन खरीदे जाने के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि तथा फिर दादाजी द्वारा भाइयों के नाम किए गए विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि नहीं बताई है। एफएसएल की रिपोर्ट कब आई है इस की तिथि भी नहीं बताई है। हर उपाय प्राप्त करने के लिए न्यायालय के ममक्ष कार्यवाही करे की एक निश्चित समयावधि होती है और कोई भी उपाय केवल सही समय पर नहीं करने के कारण असफल हो सकता है।

हली बात आप को यह देखनी चाहिए कि जब आप के दादा जी ने जमीन खरीदी थी तब रजिस्ट्री पर उन के हस्ताक्षर हुए थे क्या? यदि उन के हस्ताक्षर उस रजिस्ट्री पर हुए थे तो बेचान की रजिस्ट्री पर हुए उन के हस्ताक्षर पूर्व के हस्ताक्षरों से मिलने चाहिए थे और साथ ही अंगूठा निशानी भी मेल खानी चाहिए थी। इस का एक ही अर्थ हो सकता है कि भाइयों ने किसी अन्य व्यक्ति को आपके दादाजी बना कर रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली हो। यदि इस की जरा सी भी संभावना है तो यह गंभीर अपराध है क्यों कि इस में फर्जी दस्तावेज का निर्माण कर के छल हुआ है। इस में अनेक अपराध एक साथ हुए हैं।आप इस की रिपोर्ट पुलिस को करवा सकते हैं और पुलिस के कार्यवाही न करने पर परिवाद प्रस्तुत कर सीधे न्यायालय को कह सकते हैं कि इस मामले को दर्ज कर पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाए।

दि आप को पक्का है कि जो रजिस्ट्री आपके दादा की ओर से भाइयों के नाम हुई है वह फर्जी है और उस में छल हुआ है तो आप इसी आधार पर उस कूटरचित रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं और जमीन का बंटवारा करा कर अपने हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिए जाने के लिए राजस्व न्यायालय में विभाजन का वाद संस्थित कर सकते हैं।

मृत पुत्र की संतानों को पुत्र के समान ही दादा की संपत्ति में उत्तराधिकार है।

समस्या-

नितिका चौहान ने ग्राम खेडली, पोस्ट भद्रबाद, जिला हरिद्वार, उत्तराखंड से पूछा है-

मेरा जन्म 1992 में हुआ था। मेरे मेरे दादाजी के दो पुत्र मेरे ताऊजी आदित्य कुमार और मेरे पिताजी रविंद्र कुमार थे। मैं रविंद्र कुमार जी की इकलौती संतान हूँ। मेरे पिताजी रविंद्र कुमार जी का देहांत 1994 में हो गया था।  उसके पश्चात मेरे दादा जी का देहांत 2011 में हो गया। मेरे दादाजी के बैंक खाते में जो धनराशि थी, मेरे दादाजी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी ने उसको निकाल लिया और उसमें मुझे कोई हिस्सा नहीं दिया। मुझे बैंक जाकर पता चला कि मेरे ताऊजी ने परिवार रजिस्टर की जो नकल वहां लगाई थी उसमें मेरे ताऊजी ने मुझे अपनी पुत्री दर्शाते हुए बैंक खाते से धनराशि प्राप्त कर ली है।  मैं जानना चाहती हूं कि क्या उस धनराशि पर मेरा भी उतना ही हक था, जितना कि मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी का था।

समाधान-

बिलकुल आप ने सही कहा। उस धनराशि पर आप का उतना ही अधिकार था जितना की आप के ताउजी को था। किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत तय होता है। धारा 8 में सब से पहले उन लोगों का बराबर का अधिकार होता है जो अधिनियम की अनुसूची की प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हों। उस में पुत्र और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र-पुत्री एक साथ रखे गए हैं। क्यों कि आप अपने पिता की इकलौती संतान हैं तो आप का अपने दादाजी की संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि आप के ताऊजी को है।

बैंक किसी भी प्रकार से आप के ताऊ जी को यह धन नहीं देता और उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की मांग करता। लेकिन आप के ताऊजी ने आप को अपनी पुत्री बता दिया। जीवित पुत्र की पुत्री तो प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी नहीं है इस कारण बैंक ने वह धन आप के ताऊजी को दे दिया।

लेकिन इस तरह गलत सूचना दे कर बैंक से धन प्राप्त करना धारा 402 भारतीय दंड संहिता व अन्य कुछ धाराओं के अंतर्गत अत्यन्त गंभीर अपराध है। यदि आप पुलिस में रिपोर्ट करें या पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद करें और आप के ताऊजी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित हो तो उन्हें हर हाल में कारावास की सजा हो जाएगी।

स के अतिरिक्त आप जितना धन आप के ताऊजी ने बैंक से प्राप्त किया है उस के आधे धन और वह धन प्राप्त करने से लेकर उस की अदायगी तक के ब्याज प्राप्त करने के लिए आप दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

फाइनेंस कम्पनी के विरुद्ध धोखाधड़ी की रिपोर्ट कराएँ और उपभोक्ता विवाद उठाएँ

Havel handcuffसमस्या-
राजीव ने पूर्णिया बिहार से पूछा है-

म ने माइक्रो फाइनेंस नाम की एक कंपनी में मासिक जमा योजना के अन्तर्गत छह हजार रुपया प्रतिमाह जमा कराया। 11 माह जमा करने के बाद कंपनी ने खाता अद्यतन करने के लिए पूरे साल की रसीदें मांगी। नहीं देने पर कंपनी ने खाता अद्यतन करने में असमर्थता जताई है। अब धन वापस करने की मांग करने पर कंपनी ने जवाब दिया है कि ये स्कीम तीन साल के लिए ब्लाक कर दी है। तीन साल बाद संपर्क करें। जब कि कंपनी के पास हमारे पूरी जमा राशियों की विगत भी नहीं है। क्या कदम उठाना चाहिए?

समाधान-

ह सीधे सीधे धोखाधड़ी का मामला है। आप को तुरन्त पुलिस स्टेशन में कम्पनी के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवानी चाहिए। यदि पुलिस कार्यवाही करने से इन्कार करे तो इलाके के एसपी को रिपोर्ट देना चाहिए। फिर भी कार्यवाही न हो तो न्यायालय में परिवाद दर्ज करवा कर उसे जाँच के लिए पुलिस को भिजवाना चाहिए।

स के अलावा आप कंपनी को नोटिस दे कर अपना रुपया वापस देने की मांग करें। रुपया न देने, नोटिस का कोई जवाब न देने या आप का रुपया देने से इन्कार कर देने पर आप को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

छल कर के जमीन दूसरे को बेच देना छल है, मामले की प्र.सू.रिपोर्ट दर्ज कराएँ व संविदा भंग का दीवानी वाद करें

Jail-inmate-looks-outसमस्या-
सीमा ने गुड़गांव, हरियाणा से पूछा है-

क आदमी से मेरी जमीन के लिए डील हुई। सौदा तय हो गया। उसने बयाने के तौर पर मुझसे 1 लाख 50 हज़ार रुपया कैश लिया। जोकि एक 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर नोटरी से बनवाया गया। उस आदमी ने भी अपने हस्ताक्षर किये और मैंने भी अपने हस्ताक्षर किये। ओरिजनल कॉपी मेरे पास है। उसने अपने पास फोटो कॉपी रख ली। लेकिन ये बयाना उसने मेरे कहने के बावजूद भी तहसीलदार के पास रजिस्टर्ड नहीं करवाया। ठीक 2 महीने बाद रजिस्ट्री का वादा बयाना एग्रीमेंट में किया गया। जब में रजिस्ट्री के लिए पहुंचा तो वो नहीं आया। काफी फोन किये लेकिन जमीन बेचने वाला आदमी फोन नहीं उठाता है। उसके घर पर संपर्क किया गया तो पता चला कि वो उस जमीन को किसी दुसरे आदमी को बेचकर कहीं नामालूम जगह चला गया है। तहसील में से पता किया गया तो वो जमीन बेचीं गयी पायी गयी। उसने मेरे से पहले तो बयाना ले लिया फिर जमीन किसी और को बेच दी। लेकिन प्रूफ के तौर पर मेरे पास सिर्फ एक 10 रुपए का स्टाम्प पेपर एग्रीमेंट है।

क्या मुझे मेरे रुपए कोर्ट से वापिस मिल सकते हैं? क्या उस जमीन को बयाने के आधार पर मुझे बेचा जा सकता है? क्या उस जमीन की रजिस्ट्री मेरे बयाने के आधार पर निरस्त हो सकती है? क्या उस जमीन पर मुझे स्टे मिल सकती है? मुझे क्या कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, कृपया मेरी समस्या का समाधान करें।

समाधान-

प ने अपनी समस्या तो रख दी है लेकिन तथ्य ठीक से नहीं बताए हैं। इस तरह के मामलों में प्रत्येक व्यवहार की तिथि और स्थान अवश्य बताया जाना चाहिए तभी कोई समाधान ठीक से बताया जा सकता है। हमारे पास रोज ही ऐसी अनेक समस्याएँ आती हैं। लेकिन उन में व्यवहारों कि तिथियाँ और स्थान ठीक से नहीं बताए गए होते हैं, इस कारण उन के समाधान नहीं सुझाए जाते हैं। आप के मामले में भी आप ने बयाना देने, उस का एग्रीमेंट लिखने व नोटेरी से प्रमाणित कराने, आप के तहसील में रजिस्ट्री के लिए जाने और जमीन दूसरे को बेची हुई देखने, तथा उसे बेचने की तारीखें आपने बताई होतीं और यह बताया होता कि बयाना देने के एग्रीमेंट पर आप दोनों के अतिरिक्त गवाहों के हस्ताक्षर हैं या नहीं तो हमें समाधान प्रस्तुत करने में आसानी होती और समाधान शुद्ध होता। समाधान चाहने वाले सभी पाठकों से हमारा आग्रह है कि वे अपनी समस्या में यदि इन आवश्यक तथ्यों को नहीं लिखेंगे तो हम उन की समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में असमर्थ रहेंगे।

प ने बयाना दे कर जो एग्रीमेंट कराया है वह जमीन के विक्रय की संविदा है। जिस में वह व्यक्ति आप से जमीन की कीमत का एक हिस्सा प्राप्त कर चुका है। बाद में वह उस का विक्रय पत्र पंजीकृत कराने के स्थान पर गायब हो गया है। आप को पता चला है कि वह जमीन को अन्य व्यक्ति को विक्रय कर चुका है। आप को दूसरे व्यक्ति को जमीन बेचने के विक्रय पत्र की प्रतिलिपि तहसील से प्राप्त करनी चाहिए। आप के साथ छल किया गया है, आप को तुरन्त धारा 420 भा.दं.संहिता में थाने में रिपोर्ट करानी चाहिए, पुलिस थाना रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से इन्कार करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

प से एग्रीमेंट कर के उस ने आप से रुपया लिया है। बाद में जमीन बेचने से इन्कार कर दिया है। इस तरह वह आप के साथ हुई संविदा का पालन नहीं कर रहा है। दूसरे व्यक्ति को जमीन बेच देने के कारण अब उस संविदा का पालन कर भी नहीं सकता। इस कारण आप को उस के विरुद्ध अपनी राशि व क्षतिपूर्ति प्राप्त करने हेतु संविदा भंग का दीवानी मुकदमा करना चाहिए।

संविदा के विशिष्ट पालन का मुकदमा कर के उस से जमीन की रजिस्ट्री कराने का मुकदमा करने से कोई लाभ नहीं है, उस में जमीन के खरीददार को भी पक्षकार बनाना पड़ेगा तथा उस के नाम हुए पंजीकृत विक्रय पत्र को भी निरस्त कराना पड़ेगा जिस में बहुत अधिक न्यायालय शुल्क देना होगा और मुकदमा भी जटिल हो जाएगा। हमारी राय में पहले आप को अपराधिक मुकदमा करना चाहिए और उस के बाद आप को संविदा भंग का दीवानी मुकदमा करना चाहिए। आप ने जमीन पर कब्जा नहीं लिया है इस कारण से आप को उस मामले में कोई स्टे नहीं मिलेगा। इस मामले में आप को सारे दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह ले कर ही कार्यवाही करना चाहिए।

आप के साथ छल हुआ है, धारा 420 आईपीसी में मुकदमा दर्ज करवाइए।

police stationसमस्या-
महेन्द्र शर्मा ने, भिलाई, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले से एक जमीन का दुकड़ा ख़रीदा, जो मेरे जन्म से पहले ही हमारे कब्जे में दीखता था अर्थात उस पर बाउंड्री है। पर नक्शा में उनके नाम से दिख रहा था तो मैंने उनसे बात कर के उपरोक्त जमीन हेतु पैसा दिया। इस हेतु मैंने उन्हें पहले चेक दिया था पर बाद में परिवार में विचार कर संयुक्त परिवार के नाम से जमीन की रजिस्ट्री करेंगे निर्णय लिया क्यों कि सारा जमीन संयुक्त नाम से है। इस बात से उन्हें अवगत कराया तो वो राजी हो गए। मेरा उन पर विश्वास है क्योकि मेरे ससुराल पक्ष के तरफ से वो करीबी होते हैं।  अत: संयुक्त रूप से हमने नगदी रकम दिया और इकरारनामा बनवाया। पर पैसा लेने के बाद वो रजिस्ट्री के लिए ना नुकुर करने और विवाद करने लगे। जिस पर मैंने उन्हें क़ानूनी नोटिस भिजवाया कि रजिस्ट्री करवाएँ। उन्होंने ने जवाब में लिखा कि रजिस्ट्री की कोई बात नहीं की गई। जमीन का जो हिस्सा लिखा गया है वो गलत है और पैसा चैक से मिला है। जब कि मैंने पैसा नगदी भी दिया था। जो चेक मैंने पहले दिया था उन्हों ने ने उसे भी कैश करवा लिया था। जो मुझे उनके नोटिस मिलने के बाद जानकारी मिला। जमीन कम ज्यादा लिखने का सवाल ही नहीं होता क्यों कि तहसीलदार के नक़्शे में जो लिखा गया है वही इकरारनामा में लिखा गया है और उस पर पहले से ही बाउंड्री है। हम लोगों को बाद में ज्ञात हुआ कि उपरोक्त जमीन पर पूर्व से ही अदालत में प्रकरण चल रहा है। हमें यह ज्ञात था की उपरोक्त जमीन दो भाइयों की है। जिस मे हमने जिससे जमीन ख़रीदा है उन्होंने इकरारनामा में लिखा है कि मैं अपने हिस्से की जमीन बेच रहा हूँ। मेरा प्रश्न यह है कि उपरोक्त विवाद पर क्या किया जा सकता है? किस अधिनियम के तहत मामला चलाया जा सकता है? क्या वह जमीन मुझे मिल सकता है? और कौन कौन सा मामला उपरोक्त विवाद में हो सकता है। मुझे उपरोक्त जमीन पर दावा करने के क्या अधिकार प्राप्त है?

समाधान-

प ने अपनी गलती से खुद धोखा खाया है। पहले जाँच लेना चाहिए था कि जमीन पर कोई विवाद तो नहीं है। जब आप को जानकारी थी कि जमीन दो व्यक्तियों के नाम से है तो दोनों से इकरारनामा करना चाहिए था। अब इकरारनामे से केवल वही पाबंद है जिस ने वह लिखा है। फिर उस में उस के हिस्से की संपत्ति बेचने की बात है। यदि दूसरे का भी उस में हिस्सा है तो वह उस इकररारनामे से बाध्य नहीं है। आप चैक से पैसा दे चुके थे तब आप को दुबारा सारा पैसा नकद देने के समय उन से चैक वापस लेना चाहिए था। आप तयशुदा राशि से अधिक दे चुके हैं और जमीन का इकरारनामा भी आप के हिस्से का ही है।

प इकरारनामे में लिखे गए जमीन के हिस्से मात्र के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री करवाने के अधिकारी हैं और उस के लिए भी आप को दीवानी अदालत में संविदा के विशिष्ट पालन का मुकदमा करना पड़ेगा। जिस पर जमीन के विक्रय की कीमत पर न्याय शुल्क भी अदा करना होगा।

प के साथ छल हुआ है, जो कि धारा 420 आईपीसी के अन्तर्गत अपराध है, आप उस के लिए पुलिस थाने में रिपोर्ट करवा सकते हैं। यदि पुलिस थाना रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार करे तो आप एसपी को उस की शिकायत दे सकते हैं। उस पर भी काम न बने तो न्यायालय के समक्ष अपना परिवाद दर्ज करवा सकते हैं। इस के लिए आप को स्थानीय वकील से सलाह लेना चाहिए और उस के अनुरूप कदम उठाना चाहिए।

अपराधिक शिकायत दर्ज कराएँ और संविदा के विशिष्ट पालन का वाद प्रस्तुत करें . . .

Havel handcuffसमस्या-
मोनिका यादव ने गुड़गाँव, हरियाणा से पूछा है-

मेरे पिता जी की पहली पत्नी का देहांत हो गया था। उस पहली पत्नी से एक लड़का था। जोकि मेरा भाई है। फिर मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली। जो दूसरी पत्नी है वह मेरी माता जी हैं और मेरे भाई की सौतेली माँ हैं। लगभग 8-10 साल पहले मेरे पिता जी ने 160 गज का एक प्लाट खरीदा। बेचने वालों ने इस प्लाट की जी०पी०ए० करवाई। उसके बाद मेरे पिता जी का देहांत हो गया। मेरे भाई ने बालिग़ होने के बाद बेचने वालों से मिलकर अपने नाम रजिस्ट्री करवा ली। इस बात का हमें पता तक नहीं लगा। जिन लोगों ने मेरे पिता जी को जमीन बेचकर जी०पी०ए० करवाई थी। उन्ही लोगों ने मेरे भाई के नाम रजिस्ट्री करवा दी। इसके कुछ साल बाद 2013 में मेरा भाई सभी कागज़ लेकर घर छोड़ कर कहीं भाग गया। अब पता चला कि उसने वह प्लाट किसी को बेच दिया है। पक्की रजिस्ट्री भी करवा दी है। हम मैं उसकी बहन और मां अपना हक़ चाहते हैं। मैं भी उसकी सौतेली बहन हूँ और मां भी उसकी सौतेली मां है।
क्या ये रजिस्ट्री केंसल हो सकती है? क्या हमें हमारा हक़ मिल सकता है? क्या इस जमीन में हमें हमारा हिस्सा मिल सकता है? क्या इस प्लाट पर स्टे हो सकती है?

समाधान-

दि उक्त प्लाट को खरीदने का सौदा आप के पिता के द्वारा किया गया था और खरीदने का इकरारनामा उन के नाम था तो उन की मृत्यु के उपरान्त प्लाट के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री भी बेचने वाले को आप के पिता जी के सभी उत्तराधिकारियों के नाम करवानी चाहिए थी। यदि आप के भाई ने बेचने वाले से मिल कर प्लाट की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली है तो यह गैर कानूनी भी है और षड़यंत्र पूर्वक किया गया अपराध भी है।

भूखंड के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री बेचने वाले व्यक्ति ने आप के भाई के नाम गलत करवाई है। आप को बेचने वाले को नोटिस देना चाहिए कि वह उस रजिस्ट्री को निरस्त करवा कर आप तीनों के नाम रजिस्ट्री करवाए। यदि वह नोटिस के उत्तर में कुछ नहीं करता है तो आप तुरन्त पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाएँ। पुलिस कार्यवाही न करे तो आप सीधे न्यायालय में अपराधिक शिकायत दर्ज करवा कर न्यायालय से उसे पुलिस को अन्वेषण के लिए भिजवाने का निवेदन करें।

स के अतिरिक्त आप बेचने वाले व्यक्ति के विरुद्ध आप के पिता जी के साथ हुए विक्रय के इकरारनामे के आधार पर आप के पिताजी के तीनों उत्तराधिकारियों के नाम विक्रय पत्र की रजिस्ट्री करवाने के लिए विशिष्ठ पालन का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस वाद में उस प्लाट को अन्यत्र बेचने पर अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त कर सकती हैं। इस दीवानी वाद में आप को प्लाट बेचने वाले व्यक्ति को, आप के भाई को और जिसे आप के भाई ने प्लाट बेचा है उसे पक्षकार बनाना होगा।

ग्राहक पूरे पैसे दिए बिना गाड़ी उठा ले गया, अब न गाड़ी लौटाता है और न कीमत देता है, क्या किया जाए?

used carसमस्या-
अलीगढ़, उत्तर प्रदेश से सोनू कुमार शर्मा ने पूछा है –

मेरी एक गाड़ी है जिस का नंबर यूपी 81 एएफ 4965 है। मैं किसी कारणवश उसे बचान चाहता था। पास के गाँव से एक खरीददार आया उस ने 1,25,000 रुपए में गाड़ी खरीदने का सौदा किया। वह 20,000 रुपए दे कर कहा कि गाड़ी के कागज आप के पास हैं, मैं अपने पापा को दिखा कर लौटता हूँ। बाकी की रकम दे कर गाड़ी के बेचान के कागज तैयार करा लेंगे। उस दिन के बाद से न तो वह गाड़ी देता है और न ही गाड़ी की बाकी की कीमत दे रहा है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

गाड़ी आप के नाम पंजीकृत है आप ही उस के स्वामी हैं। गाड़ी के स्वामित्व का दस्तावेज पंजीकरण प्रमाण पत्र आप के नाम है और आप के पास है। गाड़ी को आप को अपने पास रखने का अधिकार है। आप या तो उस गाड़ी को जहाँ भी दिखे उठा कर अपने घर ले आइए। यदि एसा भी न हो तो पुलिस थाना में रिपोर्ट करवा दीजिए कि सौदा हुआ था लेकिन खरीदने वाला व्यक्ति पिता जी गाड़ी दिखाने ले गया था वापस नहीं लौटा है। उस ने धोखे से गाड़ी छीन ली है।

पुलिस इस मामले में धारा 420 भा.दंड संहिता में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करेगी और गाड़ी को जब्त कर लेगी साथ ही गाड़ी ले जाने वाले को गिरफ्तार भी कर लेगी। आप न्यायालय में आवेदन दे कर गाड़ी को अपने कब्जे में ले लेना।

टेलीकॉम कंपनी के विरुद्ध चीटिंग और कपट की शिकायत कहाँ करें?

TELECOM COMPANYसमस्या-
मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है –

मैं रिलायंस कम्पनी का 3जी इंटरनेट का पोस्टपेड उपभोक्ता हूँ। पहले मैं 10GB का प्लान इस्तेमाल करता था और जुलाई महीने में मैंने अपना प्लान बदल कर 1GB का करने का रिक्वेस्ट दिया था जो कि मेरे अगस्त बिलिंग साइकिल से प्रभावी होना था।  इस प्लान मासिक किराया 250 रुपये है। लेकिन इसे परन्तु रिलायंस कंपनी ने मेरा रिक्वेस्ट प्रोसेस नहीं किया जिसकी वजह से मेरा 10GB वाला ही प्लान एक्टिव रह गया जिसका मासिक रेंट 950 रूपया है। अब चूँकि मैंने अपना प्लान बदला था और मैंने बहुत ही इन्टरनेट का लिमिटेड इस्तेमाल किया जो कि तकरीबन 1.5 GB था, परन्तु कंपनी के द्वारा मेरा प्लान नहीं बदले जाने के कारण मुझे 10 GB के आधार पर ही बिल भेज दिया गया। जब मैं ने कंपनी से अपने बिल का विस्तृत विवरण माँगा तो कंपनी ने मुझे ईमेल के जरिये मेरा बिल मुझे भेज जिस में एक ही दिन में एक ही डाटा यूजेज को कई बार दिखाया गया है। 1.5 GB यूजेज को 5 GB दिखाया गया है। जब कि मैंने अपने इस्तेमाल को चेक किया तो यह मात्र 1.5 GB ही है। जब मैंने इसकी शिकायत कंपनी को ईमेल के द्वारा और कस्टमर केयर पर फ़ोन करके दी तो कंपनी ने अपनी गलती मानने के बजाय उलटा मुझे ही ज्यादा इस्तेमाल करने का दोषी ठहराया और बिल प्लान को सही ठहराया। अब मैं अपने आप को ठगा हुआ और अपमानित महसूस कर रहा हूँ। मैं रिलायंस कंपनी के खिलाफ फ्रॉड और चीटिंग का केस करना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि मुझे क्या करना चाहिए और कैसे और कहाँ मैं कंपनी के खिलाफ क्या करवाई कर सकता हूँ?

समाधान-

स मामले में रिलायंस ने आप के साथ पहले तो यह उपभोक्ता सेवा में त्रुटि की कि आप के अनुरोध पर भी उन्हों ने समय पर आप के प्लान को संशोधित नहीं किया। इस कारण से उपभोक्ता की सेवा में कमी का उपभोक्ता विवाद बनता है जिस की आप उपभोक्ता समस्या निवारण फोरम के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।

स के बाद आप का कहना है कि उन्हों ने आप के यूसेज को फर्जी तरीके से बढ़ा कर दिखाया। इस तरह उन्हों ने आप को फर्जी बिल दिया और चीटिंग की। यह दोनों कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 468, 420 एवं 424 के अन्तर्गत अपराध हैं। ये तीनों अपराध संज्ञेय व अजमानतीय हैं और इन अपराधों में पुलिस कार्यवाही कर सकती है अपराधी को गिरफ्तार भी कर सकती है। यदि आप अपने दस्तावेजों तथा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड से यह साबित कर सकते हों कि कंपनी ने जो बिल और यूसेज दिखाया है वह फर्जी है तो आप अपने क्षेत्र के पुलिस थाना में रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस जाँच के बाद पाती है कि अपराध घटित हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण आरंभ कर सकती है और अपराध प्रमाणित पाए जाने पर अपराधियों को गिरफ्तार कर के उन के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती है।

दि पुलिस आप की शिकायत को लेने से इन्कार करे या उस पर एफआईआर दर्ज करने से इन्कार करे तो यह शिकायत आप उस पुलिस थाना पर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ आप अपने बयान और दस्तावेजी साक्ष्य से यह सिद्ध कर सकते हैं कि अपराध घटित हुआ है तो न्यायालय उस पर प्रसंज्ञान ले सकता है अथवा मामले को अन्वेषण के लिए संबंधित पुलिस थाना को प्रेषित कर सकता है।

ज कल कुछ ब्रांडों के विरुद्ध कुछ संस्थाएँ भी कार्यवाही करने का काम करती हैं इन में से एक कम्प्लेण्ट बॉक्स डॉट इन है। आप चाहें तो यहाँ भी ऑन लाइन शिकायत डाल सकते हैं।

कब्जा तुरंत प्राप्त करने के लिए धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में कार्यवाही करें और विक्रय पत्र फर्जी होने पर छल के लिए अपराधिक मुकदमा करें।

समस्या-

नरसिंहगढ़, जिला राजगढ़, मध्यप्रदेश से मोहित नागर ने पूछा है-

मेरे पिताजी ने धूलजी नाम के एक व्यक्ति से भूखंड खरीदा, धूलजी ने यह प्लाट एक ऊदावत नाम के वकील से खरीदा था। हम ने इस 15X 65 वर्गफुट के भूखंड पर अपना छोटा सा मकान बनाया।  झाला नाम के एक अन्य व्यक्ति के नाम भी उस भूखंड की रजिस्ट्री है, वह शक्तिशाली व्यक्ति है। उस ने आ कर हमारा मकान जेसीबी मशीन से तोड़ दिया। हमारे पास कोई सपोर्ट नहीं है हम चार भाई बहन हैं और बहनों का विवाह इस भूखंड के विक्रय पर निर्भर करता है जिसे हम बेचना चाहते हैं लेकिन भूखंड पर झाला ने बाउंड्री बना ली है। कृपया हमें सुझाएँ कि हम क्या करें? .

समाधान-

प के पिता ने भूखंड खरीद कर उस पर मकान बनाया था जिस से स्पष्ट है कि उस पर आप का कब्जा था।  झाला नाम के व्यक्ति ने भूखंड पर आप के कब्जे को जबरन छीना है जो विधि विरुद्ध है। आप का मकान तोड़ कर झाला द्वारा कब्जा किए 60 दिन से अधिक न हुए हों तो आपधारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के न्यायालय में कब्जा वापस दिलाने के लिए झाला नाम के व्यक्ति के विरुद्ध आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।  यदि शांति भंग होने की संभावना हो तो इस कार्यवाही में मजिस्ट्रेट उक्त भूखंड को रिसीवर नियुक्त कर के उस के कब्जे में दे सकता है। तथा साक्ष्य के आधार पर निर्णय कर के जिस व्यक्ति का पहले कब्जा था उसे सौंप सकता है।

क ही भूखंड के दो पंजीकृत विक्रय पत्र होने का सीधा अर्थ यह है कि उन में से एक अवश्य ही फर्जी है।  आप को यह पता करना चाहिए कि कौन सा विक्रय पत्र फर्जी है? इस के लिए आप अपने नगर की नगरपालिका या फिर तहसील के रिकार्ड में जहाँ भी उस जमीन का रिकार्ड रखा गया हो जानकारी कर सकते हैं कि वह जमीन वास्तव में आरंभ में किस के नाम थी और आप तक या झाला तक कैसे पहुँची? यदि यदि आप को पता लगे कि आप का विक्रय पत्र फर्जी है तो आप आप को विक्रय करने वाले व्यक्ति धूलजी और धूलजी को विक्रय करने वाले ऊदावत नाम के वकील के विरुद्ध फर्जी भूखंड बेच कर आप के साथ छल करने के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि पुलिस की अन्वेषण में यह सिद्ध हुआ कि आप के साथ छल किया है तो उन के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही होगी। इस के अलावा आप जो धन आपने धूल जी को भूखंड खरीदने के लिए दिया उसकी ब्याज सहित वापसी के लिए दीवानी दावा कर सकते हैं। यदि झाला के प्रभाव के कारण पुलिस कार्यवाही करने को तैयार न हो तो आप सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे अन्वेषण के लिए पुलिस थाना को भिजवा सकते हैं अथवा न्यायालय के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत कर झाला के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं।

दि आप को पता लगे कि आप की रजिस्ट्री सही है और झाला द्वारा आप का मकान तोड़ कर कब्जा किए 60 अधिक हो गए हैं तो फिर आप को उस के विरुद्ध जमीन का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। जो भी उपाय आप करना चाहें उस के पहले किसी भरोसेमंद स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के माध्यम से कार्यवाही कराएँ।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती : सर्वोच्च न्यायालय

ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन अधिनियम 1970 के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इस कानून का निर्माण उद्योगों में ठेकेदार श्रमिकों को नियोजित करने की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए हुआ है। यह सही है कि इस का उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। लेकिन उस के लिए प्रक्रिया इतनी दुष्कर बना दी गई है और निर्णय करने का अधिकार केन्द्र/राज्य सरकारों को प्रदान किया गया है कि इस प्रथा का उन्मूलन किया जाना असंभव जैसा हो चुका है। सब से पहले तो कोई इस के लिए तथ्य एकत्र करे, फिर राज्य सरकार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। फिर राज्य सरकार इस प्रश्न पर आवेदनकर्ता और उद्योग के स्वामियों/प्रबंधकों की सुनवाई करे। आवेदक का उद्योग के श्रमिकों का उचित प्रतिनिधि होना भी आवश्यक है। कानून बना कर ठेकेदार श्रमिक प्रथा का उन्मूलन करने की शक्तियाँ सरकार को प्रदान कर देने के कारण न्यायालय भी इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते क्यों कि उन्हें इस का क्षेत्राधिकार ही नहीं है।
स कानून का उपयोग नियोजकों द्वारा श्रमिकों के विरुद्ध किया जा रहा है। नियोजक अपनी प्रत्येक स्थाई और नियमित प्रकृति की आवश्यकताओं के लिए श्रमिकों को नियोजित करते हैं, उन का चयन स्वयं करते हैं, उन्हें वेतन भी नियोजक का कार्यालय ही देता है और उन के कार्यों पर नियंत्रण भी नियोजक का ही होता है। लेकिन कागजों में उन्हें ठेकेदार का कर्मचारी बताया जाता है। ऐसे श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक प्राप्त नहीं होती, यदि वे कानूनी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं तो नियोजक तुरंत कहते हैं कि श्रमिक उन के कर्मचारी न हो कर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। विवाद बढ़ता दिखाई देता है तो ठेकेदार का ठेका समाप्त कर दिया जाता है और उस के साथ ही इन श्रमिकों का नियोजन समाप्त हो जाता है।
क सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति बनाम विनोद कुमार शर्मा के मामले में निर्णय पारित करते हुए कहा है कि न्यायालय कानून के इस तरह के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती। इस मामले में नियोजक द्वारा ठेकेदार के कर्मचारी घोषित किए गए श्रमिकों को मूल उद्योग के कर्मचारी घोषित करते हुए उन्हें मूल उद्योग में मिलने वाली सुविधाएँ दिलाने के श्रम न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया गया है।
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