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पति के अत्याचारों के विरुद्ध शिकायत करें और मुकदमा करें, आत्महत्या का विचार तुरन्त त्याग दें।

समस्या-

रोशनी खातून ने ग्राम हमीरपुर जिला कटिहार, बिहार से पूछा है-

मैं मुस्लिम धर्म से हूँ। मेरी शादी 7 महीने पहले हुई थी मेरे पति मेरे साथ मारपीट और दहेज़ की मांग करते थे।  उसके खिलाफ महिला थाना में आवेदन दिया।  थाने में उस ने दरोगा को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। एक एफिडेविट दिया कि मारपीट नहीं करेंगे और पति-पत्नी की तरह रहेंगे और थाने से ही मेरी विदाई हुई। ससुराल पहुँचने के बाद फिर से वही ताने, मारपीट, दहेज़ की डिमांड होने लगी। फिर मैंने अपनी माँ को फ़ोन कर के बताया तो वो मुझे ससुराल से मायके ले आयी।

अब मैं 2 महीने से गर्भवती हूँ , इसकी सूचना अपने पति को फ़ोन करके दी तो कहता है मैंने तुमसे शादी ही नहीं की है, तो ये मेरा बच्चा कैसा हुआ। अब मैं क्या करूँ? गर्भपात कराऊँ या बच्चे को इस दुनिया में आने दूँ। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा ? मेरे पति मुझसे शादी सिर्फ दहेज़ के लिए किये थे।

अब वो दूसरी शादी करने वाले हैं। क्या वो मुझसे बिना तलाक लिए शादी कर सकता है?  इस बच्चे का क्या करूँ?  उसपर कौन सा केस करूँ।  केस कितने सालों तक चलेगा? क्या शादी में दिया हुआ सामान वो वापस करेगा? समाज में मेरे परिवार की बदनामी हो रही है, इसलिए मैं आत्महत्या करने की सोच रही हूँ क्यूंकि क़ानून से न्याय मिलने में मुझे पता नहीं कितने साल लग जाएंगे। कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प के विवाह को सात माह हुए हैं और उस में आप पर तमाम कहर टूट पड़े हैं। आप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को ले कर आत्महत्या करने की सोचना बिलकुल भी ठीक नहीं है। आपने और न ही आप के परिवार ने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिस से बदनामी हो।  बदनामी तो उस शख्स और परिवार की होनी चाहिए जिस ने आप के साथ इंसान की तरह नहीं। होता यह है कि जब भी कोई गलत काम करता है तो उस का परिणाम आने के पहले ही झूठा प्रचार आरंभ कर देता है। इस से पीड़ित पक्ष को लगता है कि उस की बदनामी हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप को चाहिए कि आप धीरज रखें और अपने विरुद्ध हुई ज्यादतियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें।

आप को जब एक बार शपथ पत्र दे कर आप का पति ले गया था और उस के विपरीत उस ने व्यवहार किया है तो आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। आप का कहना है कि पहले पुलिस ने पैसा खा कर काम नहीं किया। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। आम तौर पर पुलिस को यह निर्देश हैं कि पहली बार में पति पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। उस दफे भी आप यदि जाने से इन्कार कर देतीं तो पुलिस किसी हालत में समझौता नहीं कराती। हो सकता है यह करते हुए भी पुलिस के किसी अधिकारी ने सामने वाले पक्ष से पैसा लिया हो। लेकिन आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए कि आपके साथ फिर से मारपीट हुई है, ताने मारे गए हैं, दहेज मांगा गया है जिस के कारण आपको पति का निवास छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। पति ने आप का तमान स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया है इस तरह पति ने धारा 323, 498ए, 406 आईपीसी का अपराध किया है। । यदि थाना रिपोर्ट करने से मना करे तो वही रिपोर्ट एक पत्र के साथ रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से एस.पी. को भेजनी चाहिए। यदि फिर भी कोई कार्यवाही न हो तो  मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकील की मदद से परिवाद दाखिल करना चाहिए। इस के अलावा मजिस्ट्रेट के न्यायालय में तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आवेदन दे कर भऱण पोषण की मासिक राशि की मांग करनी चाहिए।

यह सही है कि मुस्लिम विधि में चार विवाह तक किए जा सकते हैं। लेकिन यह भी प्रावधान है कि सभी पत्नियों को एक जैसा व्यवहार मिलना चाहिए तथा दूसरी शादी के लिए पहली की सहमति होनी चाहिए। आप चाहें तो दूसरा विवाह रुकवाने के लिए दीवानी अदालत से स्थायी व अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद व प्रार्थना कर सकती हैं। यदि फिर भी पति दूसरा विवाह कर ले तो आप को हक है कि आप भी अदालत से तलाक के लिए प्रार्थना पत्र दे कर तलाक ले सकें।

जहाँ तक गर्भ रह जाने की बात है। बच्चे का भविष्य तो अभी अनिश्चित ही है। पिता गंभीर नहीं है तो उसे पिता का प्रेम और स्नेह तो मिलने से रहा। वैसी स्थिति में हमारी नजर में उस का दुनिया में आना ठीक नहीं है। फिर भी यह निर्णय तो केवल माँ ही ले सकती है कि उसे अपनी संतान को दुनिया में लाना है या नहीं। यदि अभी गर्भाधान को तीन माह नहीं हुए हैं तो स्वैच्छिक गर्भपात कराया जा सकता है।

जहाँ तक मुकदमों के चलने के समय की बात है तो यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वहाँ अदालतों में कितने मुकदमें हैं। कितने ही मुकदमे चल रहे हों पर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आपके पास यही रास्ता है और आपको मजबूती के साथ इस लड़ाई को लड़ना चाहिए। आप अवश्य जीतेंगी।

हिंसा के बाद ससुराल से निकाल देने पर स्त्री के पास विधिक उपाय।

समस्या-

अनामिका ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे सास ससुर और जेठानी दवारा मुझे बहुत टॉर्चर किया गया। दहेज के लिए “कम लाई हो” के ताने दिए गए और जेठानी और सास ने मुझे मारा भी है। मेरे पति सब देखते हुए भी कुछ नहीं बोले, उन लोगो को। मेरे पति और जेठानी के बीच नाजायज़ संबंध है। इसका विरोध करने पर उन लोगो ने मुझे घर से निकाल दिया है। अब मैं क्या करूँ? मेरे पति उस औरत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और मुझे तलाक़ दे रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ? कृपया उचित सलाह दीजिए।

समाधान –

र उस महिला की समस्या घर है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और यदि है तो उस के बाद भी वह अपनी रिश्तेदारियों से अलग किसी मित्र समूह में नहीं है। वस्तुतः  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस का जन्म समूह में हुआ है और वह समूह के बिना नहीं रह सकता। एक स्त्री विवाह तक मायके में रहती है तब उस के साथ परिवार होता है। जैसे जैसे वह बड़ी होती है परिवार को इस की चिन्ता सताने लगती है कि अब उस की विदाई का समय आ गया है और वह विवाह कर के उसे विदा कर देता है। कुछ ही परिवार हैं जो यह सोचते हैं कि स्त्री को पहले आत्मनिर्भर बनाना चाहिए और उस के पास आत्मनिर्भर मित्रो का एक समूह भी होना चाहिए। स्त्री के लिए ये दो चीजें सब से अधिक जरूरी हैं। जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता या कम से कम ध्यान दिया जाता है। अभी आप के पास ये दो चीजें होतीं तो आप को कोई परेशानी नहीं होती, आप खुद अपनी समस्या से मुकाबला कर सकती थीं। आप ने अपनी समस्या में अपनी आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर मित्र समूह और मायके के बारे में कुछ नहीं बताया है।

आप के पति के अपनी भाभी के साथ संबंध वाली समस्या का कानून के पास कोई हल नहीं है। आप के साथ जो कुछ हुआ है उस के बाद आप का उस परिवार से संबंध तोड़ना, पति से तलाक लेना और टॉर्चर के लिए ससुराल वालों को सजा दिलाना ही आप का उपाय है। इस के लिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दे कर अपनी सुरक्षा, पृथक आवास की सुविधा और भरण पोषण की राशि प्रतिमाह प्राप्त करने के लिए तुरन्त आवेदन करना चाहिए। आप अपने साथा हुई हिंसा के लिए तथा आप के स्त्रीधन को पाने के लिए जो आप के पति के पास या ससुराल में रह गया है धारा 498ए तथा 406 भारतीय दंड संहिता में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती हैं और पुलिस द्वारा यथोचित कार्यवाही न करने पर न्यायलाय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के साथ ही धारा 13  हिन्दू विवाह अधिनियम में अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन  तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण राशि प्रतिमाह पाने के लिए आवेदन करने के उपाय आप के पास उपलब्ध हैं। बेहतर है कि आप अपने निकट के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर ये सब उपाय करने का प्रयत्न करें, देरी न करें।

माँ को घरेलू हिंसा व बँटवारे के लिए कार्यवाही करनी चाहिए।

rp_wrongfullconfinment12.jpgसमस्या-
विक्रम सिंह रावत ने गली नम्बर 112,बी ब्लाक, बुराड़ी, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मैं जब तीन साल का था तब मेरे नाना-नानी ने मुझे अपने पास रख लिया था। कुछ साल बाद मेरी माँ भी वहीं रहने आ गई। अब मेरी उम्र 39 और मेरी माँ की 57 साल हैं । मेरे पिताजी अलग रहते थे सन् 1997 में उनका स्वर्गवास हो गया। नाना जी ने हमको एक कमरा और किचन दे रखा था। नानाजी 1999 में गुजर गए थे। मेरे नाना जी के तीन बच्चे हैं जिस में सबसे बड़ी मेरी माँ और उसके बाद दो भाई हैं । नानाजी मरने से पहले कोई वसीयत नहीं करके गए। मकान 100 गज का है और यह 1970 में लिया गया था जो कि अभी भी नाना जी के नाम हैं। पिछले कुछ सालो सें हम पर दोनों मामा-मामी द्वारा घर ख़ाली करने का दबाव डाला जा रहा था। मै टूरिस्ट गाड़ी चलाता हूँ और अधिकतर दिल्ली से बाहर रहता हूँ। एक दिन मैं शाम को घर आया मैं ने थोड़ी ड्रिंक भी कर रखी थी तो दोनों मामी और उनकी लडकियाँ मेरे से लड़ने लगी तो थक कर मैं ने 100 नम्बर पर कॉल करके पुलिस को बुला लिया वो लोग पुलिस के सामने भी मुझे गाली दे रहे थे। पुलिस वालो ने मेरे को कहा अगर मैने ड्रिंक नही की होती तो कुछ होता तुम थोड़ी देर घर से बाहर चले जाओ थोड़ी देर में ये अपने आप शांत हो जाएँगी मैने वैसा ही किया। मेरे घर पर वापस आने के थोड़ी देर बाद वो लोग थाने से पुलिस को लेकर आ गए और 107/151 में मुझे तिहाड़ भिजवा दिया जहाँ से अगले दिन मुझे जमानत मिली। इस केस की दो तारीख पड़ी जिस में उनकी तरफ से कोई नहीं आया तो जज ने केस ख़तम कर दिया। मैं घर पर ना जाकर अपने ससुराल में चला गया। इस वक्त मेरी माँ गाँव में थी जो की उत्तराखंड में है। उन लोगों मेरी माँ को फोन करके गाँव से बुलवाया और उन्हें धमका कर कि तेरे लड़के को जेल से बाहर नही आने देँगे किसी वकील के ऑफिस में अंग्रेजी के कुछ पेपरों पर साईन करवा लिए। हम लोगों ने अपने कमरे में अपना ताला लगा रखा है। जिसके ऊपर उन लोगों ने भी अपना ताला लगा दिया है हमने 100 नम्बर कॉल किया पुलिस वाले बोले लोकल थाने में शिकायत करो। हम ने थाने में लिखित में शिकायत दी तो वो बोले की हम ताला नहीं खुलवा सकते कोर्ट से ऑडर निकलवाओ। तब से हम किराये के कमरे में रह रहे हैं। नानी को भी उन लोगो ने अपने साथ मिला रखा हैं । अब हम चाहते हैं कि उस मकान में से मेरी माँ का हिस्सा उन्हें मिले। हमारे कमरे में लगा उन लोगों का ताला खुले और जब तक कोई फैसला नहीं हो जाता हम लोगो को उस घर में रहने का हक मिले।

समाधान-

स दिन की घटना के पहले आप और माँ उसी कमरे किचन में निवास कर रहे थे। उस पर आपका ताला लगा हुआ है ऊपर से मामा मामी का भी लगा हुआ है। यदि उसी समय आप पुलिस को या न्यायालय में शिकायत करते तो धारा 145 दं.प्र.सं. का प्रकरण दर्ज हो कर सुनवाई होती और कब्जा आप को सौंपने का आदेश हो जाता। लेकिन लगता है उस बात को अब 60 दिन से अधिक हो गए हैं। धारा 145 दं.प्र.संहिता में अब वह काम नहीं हो सकता।

प की माता जी को चाहिए कि उन के पिता (आप के नाना) की संपत्ति में अपना अलग हिस्सा प्राप्त करने के लिए बँटवारे का वाद दीवानी न्यायालय में संस्थित करें। इस वाद के संस्थित करने के बाद न्यायालय से आप के कब्जे के कमरे और रसोई का ताला खुलवाने के लिए तथा आपके कब्जे में दखल न करने के आदेश के लिए आप अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर सकते हैं।

स के अलावा आप और आप की माता जी उस परिसर में रह रहे थे। ताला लगा कर आप की माता जी को वहाँ रहने से रोक दिया गया है यह महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का मामला भी है। आप की मताजी घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन कर उक्त परिसर पर उन्हें कब्जा दिलाने की कार्यवाही कर सकती हैं। इस सम्बन्ध में आप स्थानीय वकीलों से सलाह कर कार्यवाहियाँ आरंभ कर सकते हैं।

कानूनी कार्यवाही के साथ साथ अपने पैरों पर खड़े होने के प्रयास करें।

widow daughterसमस्या –
ग्वालियर, मध्यप्रदेश से पूजा ने पूछा है –

मेरी शादी हिंदू रीति रिवाज से 2008 में हुई थी।  शादी के बाद से ही मेरे ससुराल वाले मुझे परेशान करते थे। जब मैं गर्भवती हुई तो ससुराल वाले गर्भ गिरा दो कहने लगे। उन को बच्चा नहीं चाहिए था।  मैं अपने बच्चे को नहीं मार सकती थी। कई बार मुझे और मेरे  अजन्मे बच्चे को मरने की कोशिश की गयी। एक दिन मुझे आधी रात को घर से निकाल दिया मेरे पास न पैसे थे, न ही कोई और साधन। किसी तरह में महिला थाने पहुँची और अपनी आप बीती बताई। वहाँ के टीए ने मेरे पति को बुलवाया। पति ने मुझसे माफी मांगी और दुबारा ऐसा नहीं होगा, ऐसा कहकर मुझे अपनी शिकायत वापस लेने को कहा। मैं बेसहारा और बीमार थी। सब की बातें मान कर मैं ने अपनी शिकायत वापस ले ली। फिर मेरे पति मुझे घर की बजाय मेरे माता पिता के पास जबरदस्ती छोड़ गये। मेरी हालत बहुत बिगड़ चुकी थी। 2009 मे मैं ने एक बेटी को जन्म दिया। मेरे घर वाले मुझे और मेरी बेटी को किसी तरह ससुराल छोड़ आए। मेरे पति मुझ से बहुत बुरा बरताव करते थे। मेरी सास ने मेरे साथ कई बार मारपीट की। मेरी सास हर बात पर मुझे अपमानित करती थी। मानसिक रूप से मुझे पागल कर देगी ये धमकी देती थी। अपने माता पिता से पैसे लाओ बस यही एक मुद्दा होता था। मेरे माँ बाप ने अपनी क्षमता से ज्यादा दिया। एक दिन मेरे पति मुझे और मेरी बेटी को मेरे माता पिता के घर छोड़ गये। मैं ने उनसे ऐसा ना करने की बहुत मिन्नत की। पर उन्होंने नहीं सुना। मेरे बूढ़े माँ-बाप मेरा और मेरी बेटी का खर्चा बहुत मुश्किल से उठा पा रहे थे। मेरी दो छोटी बहनों की शादी का जिम्मा भी मेरे माता पिता पर था। मेरे ससुराल वाले मेरी बहनों को और मेरे माता पिता को डराते धमकाते थे। अपने परिवार की बदनामी की वजह से माँ ये सब सहती रही। एकदिन मेरे पति ने मुझसे तलाक़ के लिए नोटिस भेज दिया। मैं बहुत डर गयी। मेरे पति ना तो मुझे पैसे देते हैं। ना ही साथ रखते हैं। वो मुझसे रिश्ता तोड़ना चाहाते हैं। मैं क्या करूँ? कैसे अपनी बेटी को पालूँ? वकील को खरीद लिया है। सब कहते हैं मर जाओ तुम। मेरी ग़लती क्या है? मुझे नहीं पता। मैं और मेरी बेटी बहुत बुरी दशा में हैं। मैं क्या करूँ मुझे जीना है। और अपनी बेटी को बचाना है मेरी मदद करें। में क्या करूँ बताएँ?

समाधान –

पूजा जी, सब से अच्छी बात तो आप के पास यह है कि आप जीना चाहती हैं और अपनी बेटी को बचाना चाहती हैं। इस हालत में भी आप के इस जज्बा सलाम करने लायक है। आप की गलती ये है कि आप, आप के माता-पिता और बहनें यह सोचती हैं कि जीवन में एक स्त्री के लिए शादी करना, पति पर निर्भर रहना और उस की हर अच्छी बुरी बात को सहन करना चाहिए। लेकिन आप अपने खुद के जीवन से यह समझ चुकी हैं कि पति पर निर्भरता स्त्री के जीवन की सब से बड़ी हार और दुखदायी चीज है। इस कारण पहला काम तो ये करें कि आप अपने माता-पिता और बहनों को इस सोच से निकालें। उन्हें समझाएँ कि विवाह से बड़ी चीज लड़कियों और महिलाओं के लिए अपने पैरों पर खड़े होना है।

कील को खरीद लिया है। आप की यह बात जमती नहीं है। यदि आप यह समझती हैं कि वकील को खरीद लिया है तो उस वकील से साफ कह दें कि वह आप की पैरवी न करे। आप अपने यहाँ के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन दे कर आप के मुकदमे लड़ने के लिए सहायता मांगें। विधिक सेवा प्राधिकरण अध्यक्ष जिला न्यायाधीश होते हैं तथा सचिव मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं। आप उन में से किसी से भी व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी व्यथा बता कर उन से मदद मांग सकती हैं।

प को तुरन्त अपने व अपने बेटी के लिए धारा स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर निर्वाह खर्च की तथा पृथक आवास के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। यदि आप के पति तलाक की अर्जी पेश करें तो वहाँ जवाब देने के पहले धारा 24 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन कर के स्वयं तथा अपनी बेटी के लिए निर्वाह खर्च तथा न्यायालय आने जाने के खर्च हेतु आवेदन करना चाहिए। जब तक आप के पति निर्वाह खर्च न देंगे तब तक वह मुकदमा आगे न चलेगा। इस के अलावा आप 498-ए भारतीय दंड संहिता में आप के साथ हुई क्रूरता और मारपीट के लिए आप अपनी सास व पति के विरुद्ध पुलिस थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराएँ। इसी रिपोर्ट में धारा 406 में अपने स्त्री-धन आप को न लौटाने की शिकायत भी करें। इस के अलावा आप धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में अपने व अपनी पुत्री के लिए निर्वाह खर्च देने के लिए भी  आवेदन कर सकती हैं।

न सब कार्यवाहियों के अलावा सब से बड़ी बात यह है कि आप को अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करना चाहिए। सब बड़े शहरों में कुछ संस्थाएँ महिलाओं की मदद करने वाली होती हैं। आप ऐसी ही किसी संस्था से संपर्क कर के मदद प्राप्त कर सकती हैं और वे आप को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद कर सकती हैं। आप सीधे अपने राज्य के मुख्यमंत्री को तथा महिला व बाल कल्याण मंत्री को भी अपनी सारी व्यथा लिख कर भेज सकती हैं वहाँ से भी आप को मदद मिल सकती है।

घरेलू हिंसा की शिकायत से बचने के स्थान पर स्वयं अंतरिम सहायता प्रस्तुत कर प्रतिवाद करने का निश्चय करें।

समस्या-

हरिद्वार, उत्तराखंड से अमित ने पूछा है –

मेरे तथा मेरे परिवार के विरुद्ध मेरी पत्नी ने घरेलू हिंसा का एक केस अदालत में किया हुआ है जिस में कोर्ट ने हमारे विरुद्ध समन जारी किये हुए हैं। परन्तु  इसके विरुद्ध हमने जिला जज के यहाँ अपील की हुई है जो की एडमिट तो हो गयी है  परन्तु न तो जिला जज महोदय ने निचली अदलत से फाइल तलब की है और न ही निचली अदालत की कार्यवाही स्टे करने का कोई आदेश पारित किया जिस से हमें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आप बताएँ हमें क्या करना चाहिए? कोई नजीर हो तो बताएँ।

समाधान-

sexual-assault1ब से पहले तो आप यह जान लें कि महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से संरक्षण के कानून के अंतर्गत न्यायालय को किसी को पहली बार में दंडित करने का कोई अधिकार नहीं है। केवल उस न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश की पालना यदि नहीं की जाती है या उस का उल्लंघन किया जाता है तो न्यायालय आदेश की पालना न करने वाले या उल्लंघन करने वाले को दंडित कर सकता है। इस कारण यदि किसी के विरुद्ध इस कानून में कोई शिकायत होती है तो उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है उसे न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

प ने अपनी समस्या में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है। न तो आप ने यह बताया कि क्या कारण है कि आप की पत्नी ने आप के व आप के परिवार के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत की है। शिकायत में आप की पत्नी ने क्या लिखा है? यह भी आप ने नहीं बताया। पत्नी द्वारा उस की शिकायत में अंकित तथ्य सही हैं या नहीं हैं, और वे तथ्य सही नहीं हैं तो आप के अनुसार क्या कारण हैं जिस से आप की पत्नी ने आप के विरुद्ध यह शिकायत की है? आप ने यह भी नहीं बताया कि आप को काफी परेशानी क्या हो रही है।

वास्तविकता तो यह है कि देश में ऐसी महिला तलाश कर निकालना दुष्कर ही नहीं लगभग असंभव है जिसे कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार न होना पड़ा हो।  अहिंसा के पुजारियों के इस देश में इस हिंसा को जारी तो नहीं रखा जा सकता है न? तो महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से संरक्षण का कानून इसीलिए बनाया है कि महिलाओं को घरेलू हिंसा से निजात मिल सके। अब एक महिला ने अपने पति के और उस के परिजनों के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत न्यायालय ने प्रस्तुत की है। न्यायालय ने उस पर आप के विरुद्ध समन जारी किया है, इस लिए कि आप उस शिकायत का उत्तर प्रस्तुत करें। दोनों और के जो भी तथ्य शपथ पत्रों और दस्तावेजों से न्यायालय के समक्ष प्रकट हों उन के आधार पर यह निर्णय किया जा सके कि आप की पत्नी वास्तव में उस शिकायत पर अंतिम निर्णय होने तक किसी प्रकार की कोई अंतरिम राहत प्राप्त करने की अधिकारी है या नहीं? इस में क्या गलत है। शिकायतकर्ता आप की पत्नी ही तो है।  वह किन्हीं कारणों से आप से नाराज है और आप की अदालत को शिकायत करती है तो इस से उस का आप से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार या किसी स्थान में निवास करने का अधिकार तो छिन नहीं गया है। अंतरिम आदेश के रूप में न्यायालय अधिक से अधिक कुछ धनराशि उस महिला के भरण पोषण हेतु अदा करने का आदेश देगा जो उस के भरण पोषण के वास्तविक खर्चे से बहुत कम होगा, साथ में इतना आदेश दे सकता है कि वह पति या उस के परिवार के जिस मकान में रह रही है उसे शांतिपूर्वक निवास करने दिया जाए। यह तो उस का अधिकार है। यदि ऐसा आदेश होता है तो उस में गलत क्या है?

प ऐसा आदेश भी नहीं होने देना चाहते और पत्नी की शिकायत को सुना ही न जाए इस के लिए ऊँची अदालत में चले गए। ऊंची अदालत ने आप की निगरानी याचिका दर्ज कर ली उस मे कोई बड़ी बात नहीं है, इस तरह की सभी याचिकाएँ दर्ज कर ली जाती हैं। लेकिन आप का सोचना है कि बिना आप की पत्नी को आप की याचिका की सूचना मिले ही निचली अदालत की पत्रावली वहाँ मंगा ली जाए जिस से वह शिकायत जो आप की पत्नी ने की है उस में सुनवाई रुक जाए, या फिर उस सुनवाई को रोकने का आदेश ही दे दिया जाए। यदि ऊंची अदालत ऐसा करती है तो निश्चित रूप से वह न्याय करने के जिस उद्देश्य से स्थापित की गई है उस उद्देश्य के विरुद्ध ही काम करने लगेगी। ऐसा कैसे संभव है?

प को करना तो यह चाहिए था कि जो समन आप के विरुद्ध जारी हुए हैं उन्हें आप प्राप्त कर के न्यायालय में उपस्थित हों और शिकायत का प्रतिवाद प्रस्तुत करें। यदि आप की पत्नी ने किसी तरह की अंतरिम राहत भरण पोषण या निवास के लिए चाही है तो बिना न्यायालय के आदेश के स्वयं रखें कि वह आप की पत्नी है और आप उसे प्रतिमाह कुछ राशि और निवास की सुविधा प्रदान करने को तैयार हैं। आप के इस प्रस्ताव से आप की सदाशयता ही प्रकट होगी। इस के उपरान्त आप अपने विरुद्ध की गई शिकायत का प्रतिवाद कर सकते हैं। इस से बेहतर मार्ग कोई नहीं है। आप की निगरानी याचिका में कोई दम नजर नहीं आता है। उसे आप को निरस्त करा लेना चाहिए। अच्छा तो यह है कि आपसी बातचीत से या ऐसा संभव नहीं हो तो न्यायालय की मध्यस्तता से पत्नी से अपने विवाद को सुलझाएँ।

बेटी को तुरन्त नर्क से निकालिए।

समस्या-

बहराइच, उत्तर प्रदेश से भुर्री ने पूछा है –

मैं ने अपनी पुत्री की शादी दो साल पूर्व की थी।  शादी में मैं ने अपने सामर्थ्य से बढ़ कर खर्च किया ताकि मेरी बेटी का जीवन खुशहाल रहे।  परन्तु शादी के तुरन्त बाद से ही मेरे बेटी के ससुराल वालों द्वारा उसे पैसों के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा।  मेरी बेटी के सास-ससुर आए दिन बेटी को प्रताड़ित करते हैं। मेरे दामाद तथा उसका भाई बेटी के साथ मारपीट भी करते हैं।  सामाजिक भय से मैं ने एक दो बार बात करने की कोशिश भी की किन्तु वे बार बार बेटी को बरबाद कर देने की धमकी देते हैं। वे अन्य परिवारी जनों से भी आए दिन बदतमीजी करते रहते हैं और कहते हैं कि तुम मेरा कुछ नहीं  कर सकते तथा पैसों की मांग करते रहते है।  कृपया कोई सुझाव दीजिए।

समाधान-

sexual-assault1दि आप ने अपनी समस्या में अपनी पुत्री के साथ ससुराल वालों के व्यवहार के बारे में जो कुछ लिखा है वह सब सच है तो फिर आप की बेटी का जीवन तो बरबाद हो ही चुका है।  आप की बेटी को उस के सास-ससुर प्रताड़ित करते हैं, पति व उस का भाई उस के साथ मारपीट करते हैं उस से पैसा मंगाने की बात करते हैं। इस से अधिक आप की बेटी का जीवन उस के ससुराल वाले क्या बिगाड़ेंगे? मुझे आश्चर्य है कि आप ने इन सब बातों को अब तक कैसे सहन किया? सारे अपराध आप की बेटी के ससुराल वालों ने किए हैं आप की बेटी और आप ने नहीं। सामाजिक भय उन्हें होना चाहिए आप को नहीं। आप को अपनी बेटी की तुरन्त मदद करनी चाहिए। यदि आप इतना होते हुए भी कुछ नहीं करते हैं तो निश्चित रूप से एक माता-पिता होने का हक भी खो देंगे। पैसों के लिए जो व्यवहार आप की बेटी के साथ उस के ससुराल वाले कर रहे हैं। यदि उन का चरित्र ऐसा ही है तो आप की बेटी जीवन में एक दिन भी प्रसन्न नहीं रह सकती।

प अपनी बेटी को ससुराल नाम के उस नर्क से निकाल कर ले आइये।  ऐसे ससुराल से तो अच्छा है कि वह जीवन भर अकेले जीवन गुजार दे। आप की बेटी के साथ जो अत्याचार हुए हैं वह सब क्रूरता है और धारा 498 ए भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध है। आप बेटी को उस की ससुराल से बाहर निकाल कर ससुराल के क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाना में रिपोर्ट दर्ज कराइए। यदि पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस को अन्वेषण के लिए भिजवाइए। यदि वे विवाह के समय दिया गया दहेज और उसे सभी लोगों से मिले हुए उपहार चाहे वह ससुराल वालों और उन के संबंधियों व मित्रों से क्यों न मिले हों स्त्री-धन हैं। बेटी उन की मांग भी करे। स्त्री-धन न लौटाने पर धारा 406 भारतीय दंड संहिता का भी अपराध आप के ससुराल वालों ने किया है।

प बेटी को अपने यहाँ ले आएँ तब उस की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में भी न्यायालय में परिवाद करवाएँ जिस में आप की बेटी  अपने लिए सुरक्षा और भरण पोषण के खर्चे की भी मांग करे। आप अभी इतना तो करें। बाद में जैसी परिस्थितियाँ बनें उस के अनुसार आगे कदम उठाएँ। उस समय पुनः आप तीसरा खंबा से सलाह कर सकते हैं।

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