Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक दूसरा विवाह नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

जालसाजी और त्रुटि के आधार पर दस्तावेज निरस्त करने का वाद दस्तावेज की जानकारी होने से 3 वर्ष की अवधि में लाया जा सकता है।

समस्या-

गौरव मिश्रा ने ग्राम-मोहान, जिला-कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मने और हमारे बड़े भाई जी ने हमारे बड़े ताऊ जी यानी हमारे पिता जी के बड़े भाई से 12.02.2004 को उनके भूमि के 1/2 भाग यानि उनकी संपूर्ण जमीन का पंजीकृत बैनामा कराया था। जिसका दाख़िल ख़ारिज भी हो चुका था। हमारे ताऊ जी का यानी विक्रेता का सन 2015 में स्वर्गवास हो चुका है, अब विक्रेता (ताऊ जी) की इकलौती विवाहित पुत्री कहती है कि हमारे पिता से बैनामा धोखे से फर्ज़ी तरीके से के करा लिया गया है।  उसने किसी के कहने पर पर हमारे खिलाफ (दीवानी न्यायलय) में बैनामा निरस्त करने के लिए 23.02.2018 को मुकदमा डाल दिया है, यानी बैनामा होने के 14 वर्ष बाद।  हम यह जानकारी चाहते हैं कि बैनामा होने के कितने वर्ष बाद तक बैनामा निरस्त कराने के लिये मुकदमा डाला जा सकता है, और जो हमारा मुकदमा चल रहा है उसे ख़ारिज कैसे करायें, जिससे हमारा समय और पैसे बर्बाद ना हो?

समाधान-

प ने और आप के भाई ने अपने ताऊजी से जमीन खरीद ली, उस के विक्रय पत्र का पंजीयन हो गया। इस पंजीयन के 14 वर्ष बाद ताऊजी की पुत्री ने उस विक्रय को धोखे से, फर्जी तरीके से कराने का आरोप लगाते हुए दीवानी वाद संस्थित किया है। आम तौर पर इस तरह का वाद दस्तावेज के निष्पादन की तिथि अर्थात पंजीयन की तिथि के तीन वर्ष की अवधि के भीतर ही किया जा सकता है, उस के उपरान्त नहीं। उस के उपरान्त ऐसा वाद दाखिल होने पर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण ग्रहण के योग्य ही नहीं रहता है और न्यायालय ऐसे वाद को पंजीकृत करने के पूर्व ही निरस्त कर सकता है। लेकिन आप के मामले में वाद को पंजीकृत भी किया गया है और आप को उस के समन भी प्राप्त हो चुके हैं। इस से स्पष्ट है कि वाद को निर्धारित अवधि में लाने के लिए कुछ न कुछ कथन वाद-पत्र में किए गए होंगे। आप को वे कथन यहाँ अपनी में हमें बताने चाहिए थे। जिस से समाधान करने में हमें सुविधा होती।

ह तो स्पष्ट है कि आप के विरुद्ध विक्रय पत्र के पंजीयन को निरस्त कराने के लिए फ्रॉड/ जालसाजी करने का आधार लिया गया है। इस के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 17 में अलग से उपबंध दिए गए हैं। इस में यह कहा गया है कि यदि जालसाजी या किसी त्रुटि से निर्मित किए गए दस्तावेज को प्रतिवादी ने ही छुपा कर रखा है तो उस मामले में लिमिटेशन तब आरंभ होगी जब कि जालसाजी से निर्मित दस्तावेज की जानकारी वादी को होगी। आप के मामले में वाद प्रस्तुत करने के लिए इसी उपबंध का सहारा लिया गया प्रतीत होता है।

दि आप ने भूमि का क्रय करने के बाद दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं किया है और अपने पास रखा है तो निश्चित रूप से आप के ताऊ की पुत्री को तभी उस की जानकारी हुई होगी जब ताऊ जी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति  को उन की पुत्री ने अपने नाम नामांतरण कराना चाहा होगा और जमीन का रिकार्ड देखा होगा। इस तरह आप के ताऊजी की मृत्यु से तीन वर्ष की अवधि में आप के विरुद्ध वाद फ्रॉड के आधार पर ही लाया जा सकता था।

ब इस वाद का समापन केवल और केवल दोनों पक्षों की साक्ष्य के उपरान्त ही किए गए निर्णय से ही हो सकता है। इस का कोई शॉर्टकट नहीं है। मुकदमा आप को लड़ना होगा। उस की अपील भी लड़नी होगी। तब तक लड़ना होगा जब तक खुद वादिनी थक हार कर घर नहीं बैठ जाती है। इस के सिवा कोई उपाय नहीं है।

अचल संपत्ति का किसी को भी कब्जा देने के पहले लिखित संविदा जरूर करें।

समस्या-

रियाज़ुद्दीन ने बिलासपुर, जिला गौतम बुद्ध नगर, (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरे ससुर साहब ने 15 साल पहले एक प्लॉट खरीदा था शाइन बाग दिल्ली में उस समय किसी व्यक्ति ने मेरे ससुर साहब से कह कर कि एक ग़रीब फैमिली है अपने यहाँ रेंट पर रख लो। उन्होंने उस को रख लिया, वो भी विना रेंट के  15 साल तक उस से कोई किराया भी नहीं लिया। अब उनको उस प्लाट पर निर्माण करना है। लेकिन वह औरत उस प्लाट को खाली नहीं कर रही। बोलती है मुझ को दो फ्लोर बना कर दो या आधा मकान दो। मेरी पास इस के पेपर हैं, सब कुछ है, और एक दो बदमाशों से भी जा कर मिल ली है वो। उस औरत के आदमी की मृत्यु भी हो चुकी है। अब हम क्या कर सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें।

समाधान-

रियाजुद्दीन जी, अपनी किसी संपत्ति पर जब भी किराएदार या लायसेंसी के रूप में किसी को व्यक्ति को कब्जा दिया जाए तो उस की लिखित संविदा की जानी चाहिए, जिस पर दोनों पक्षकारों के सिवा कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों।  बेहतर हो यदि उस संविदा को उचित मूल्य के गैरन्यायिक स्टाम्प पर लिखा जाए और नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। नोटेरी के रजिस्टर में पक्षकारों के साथ-साथ गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए जाएँ। इस दस्तावेज को सुरक्षित रखा जाए। इस से भविष्य में यह साबित करने में आसानी रहे कि भूमि या परिसर किराए पर या लायसेंस पर उपयोग के लिए दिया गया था। यदि आप के ससुर साहब के पास इस तरह का कोई दस्तावेज या मामूली लिखत भी हो तो इस स्थिति में वह काम आएगा। यदि कोई भी दस्तावेज नहीं हो तो वहाँ जिस का कब्जा है उसकी किसी तरह की अभिस्वीकृति हो जिस का कोई सीधा या परिस्थिति जन्य सबूत हो।

यदि यह सब नहीं है तो यह माना जाएगा कि आप के ससुर ने उक्त संपत्ति को खुला छोड़ दिया था और फिर वर्तमान कब्जाधारी उस पर अपना काम करने लगा और आप के ससुर ने 12 वर्ष से अधिक से उस संपत्ति पर अपना कोई दावा नहीं किया। अवधि अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार 12 वर्ष से अधिक का कोई कब्जा हो जाने पर उस से कब्जा वापस लेने के लिए दावा नहीं किया जा सकता। इसी को एडवर्स पजेशन कहा जाता है। यदि उस से जबरन कब्जा लिया जाता है तो यह गैर कानूनी होगा और वर्तमान कब्जाधारी धारा  145 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कब्जा वापसी का प्रार्थना पत्र दे सकता है और उसे कब्जा वापस दिलाया जा सकता है।

आप के ससुर साहब के पास उस प्लाट के स्वामित्व का कोई सबूत जरूर होगा। उस के साथ यदि आप उस कब्जाधारी का कब्जा 12 वर्ष से कम का साबित कर सकें, या फिर यह साबित कर सकें कि वह जमीन / परिसर किराए पर दिया गया था और कम से कम एक बार किराया जरूर लिया गया था। तो आप को दीवानी का कोई अच्छा वकील उस प्लाट पर अपना कब्जा वापस प्राप्त करने का रास्ता सुझा सकता है। इसलिए हमारा सुझाव है कि आप ये सब सबूत या गवाही इकट्ठा करें और फिर किसी अच्छे दीवानी काम करने वाले वकील से मिलें और रास्ता निकालें। वैसे हमें लगता है कि इस जमीन का कब्जा वापस लिया जा सकता है। कानूनी रास्ते में अभी हमारे देश में बहुत समय लगता है। इस कारण लोग मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाने के स्थान पर बहुत कम प्रतिफल में समझौते करना पसंद करते हैं। यदि आप को लगे कि कोई सबूत नहीं हैं जिस से कानूनी तरीके से संपत्ति को वापस लिया जा सके तो बेहतर है कि आपस में ऊंच नीच कर के ही किसी तरह से संपत्ति वापस प्राप्त की जाए। पूरी नहीं तो आधी ही प्राप्त की जाए।

विलेख को उस की जानकारी होने की तिथि से मियाद मानते हुए चुनौती दी जा सकती है।

rp_kisan-land.jpgसमस्या-

राकेश ने दिल्ली से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता और दादा जी का जन्म 17.06.1956 से पहले का है। मेरे पिता के सभी भाई (तीन) बहन (दो) का जन्म 1960 के बाद का है। पैतृक संपत्ति में 105 बिस्वा ज़मीन है जो कि चार खेतो में है। रेवेन्यू के अभिलेख में आज भी ज़मीन मेरे के दादा जी नाम है। 1982 में मेरे दादा जी ने मेरे दो चाचा को 28 बिस्वा ज़मीन गिफ्ट डीड दवारा दे दी। 2013 में मेरे दादा जी ने 42 बिस्वा मेरे पिता और तीसरे चाचा के नाम सेल डीड कर दी। मेरे पिता को उनके हक़ 52.5 बिस्वा में से मात्र 21 बिस्वा जमींन अभी तक मिली हैं। मेरा जन्म 1973 का है। मुझे 2013 में गिफ्ट डीड के बारे मे पता चला। क्या मैं गिफ्ट डीड के खिलाफ दावा कर सकता हूँ। मेरा 105 बिस्वा में क्या हक हैं, और मेरे हित में मैं क्या करूँ?

समाधान

दि यह कृषि भूमि पुश्तैनी है अर्थात आपके दादा जी को यह भूमि उन के पिता जी से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो जैसे ही आप के पिता जी का जन्म हुआ वे भी उस के हिस्सेदार हो गए। शेष भाई भी उसी प्रकार उस पुश्तैनी संपत्ति में जन्म से हिस्सेदार होते गए। 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 प्रभावी होने पर आप के पिता की बहनें भी उस में भाइयों के समान ही हिस्सेदार हो गयीं। आप के पिता और उन के सभी भाइयों की संतानें भी उसी तरह उस की हिस्सेदार होती गयीं।

1982 में आप के पिता की बहनें उक्त पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सेदार नहीं थीं। इस कारण उस समय आप के दादा जी उक्त संपत्ति में से जो उन का हिस्सा था उतनी संपत्ति की गिफ्ट डीड कर सकते थे। यदि उस के उपरान्त भी दादाजी का कोई हिस्सा उस संपत्ति में शेष रहा होगा तो वे 2013 में अपने हिस्से की सीमा तक भूमि का विक्रय पत्र निष्पादित कर सकते थे। लेकिन इन दोनों विलेखों के निष्पादन के समय वे अपने हिस्से से अधिक की भूमि हस्तान्तरित नहीं कर सकते थे। यदि उन्हों ने अपने हिस्से की संपत्ति से अधिक संपत्ति हस्तान्तरित की है तो उन विलेखों को चुनौती दी जा सकती है।

2013 के विलेख को चुनौती देने की समय सीमा अभी है। 1982 में जो विलेख निष्पादित हुआ है उसे चुनौती देने के लिए वाद आप केवल तब संस्थित कर सकते हैं जब कि उक्त विलेख की जानकारी होने के दिन से 3 वर्ष की अवधि समाप्त नहीं हुई हो।

आपको चाहिए कि आप तुरन्त किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और जितना जल्दी हो सके अपने हिस्से को प्राप्त करने के लिए उक्त दोनों विलेखों को चुनौती देते हुए संपत्ति का बंटवारा करने और आप के हिस्से पर आप को पृथक कब्जा दिलाए जा का वाद संस्थित करें।

कब्जे के दावे के लिए अवधि समाप्त हो जाने पर सफलता की संभावना नहीं के समान है।

Farm & houseसमस्या-

इन्दरकुमार, ने हैदराबाद, तैलंगाना से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

म दो भाई बहन हैं पिताजी रिटायर्ड फौजी थे। उन की हत्या 1981 में हो गई थी। माँ ने 1985 में रिमेरीज कर ली है। हमारे चाचा, ताऊ, बुआ कोई नहीं है। पिताजी की हत्या के समय मेरी ऊमर 5 वर्ष और बहिन 2 वर्ष की थी। पक्का मकान पट्टा था व आधा बीधा जमीन 1971 में खरीदी गयी थी। केवल स्टाम्प पेपर पर और 55 पेनतरा जमीन थी वो जमीन मैं ने और मेरी माँ ने मेरे बालिग होने के बाद 45 बीधा बेच दी, मकान नहीं बेचा था। उसका पट्टा हमारे पास है। मकान दादाजी ने बनवाया था। पिताजी की हत्या के 4 दिन बाद से लेकर आज तक हम उस गाव में 1 रात भी नहीं गये। अभी मैं उस गाँव में गया था 2 साल पहले। हमें मालुम हुआ कि 15 बीधा जमीन व घर-मकान हमारा है। लेकिन जिन्होनें हमारी जमीन खरीदी थी। उन के पास ही मकान और वो 15 बीघा जमीन है। वो दबंग है। मुझे अभी पापाजी की अस्थिया भी विसर्जित करनी हैं। बहिन का नाम जमीन में कहीं पर भी दर्ज नहीं है। हम ने जो जमीन बेच दी उस के लिए बहिन हमारे ऊपर वाद दायर कर सकती है क्या? उस को वो जमीन मिलेगी क्या? हमें वो मकान व आधा बीधा जमीन वापस मिल सकती है? क्या हमारी माँ की पेशंन मिल सकती है? जो 15 बीघा जमीन हमारी होगी तो कैसे होगी। सुझाव दें क्या मैं अभी पापाजी की अस्थियां विसर्जित कर सकता हूँ?

समाधान-

प के पिताजी की हत्या 1981 में हो गई। तब आप 5 वर्ष के थे तथा बहिन 2 वर्ष की थी। अर्थात आप 1994 में तथा बहिन 1997 में बालिग हो गए। आप को बालिग हुए 20 वर्ष हो चुके हैं तथा आप की बहिन को भी 17 वर्ष बालिग हुए हो चुके हैं। बालिग होने के बाद आप ने व आप की माँ ने कब जमीन बेची है यह आप ने नहीं बताया है। यदि आप ने अपनी जमीन बालिग होने के 3-4 वर्ष बाद भी बेची हो तो भी उस बात को 15 वर्ष से अधिक हो चुका है। तभी से आप का घर व 15 बीघा जमीन आप से जमीन खरीदने वाले दबंग के पास है।

ब आप को मकान व जमीन जो आप के नाम है उसे वापस लेने के लिए उसी दबंग के विरुद्ध कब्जा प्राप्त करने का वाद प्रस्तुत करना होगा। जब कि कब्जे के वाद के लिए अधिकतम समय सीमा 12 वर्ष है। यदि आप कोई वाद न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे तो वह समय सीमा में प्रस्तुत न किए जाने के कारण निरस्त हो सकता है। जिस के विरुद्ध आप वाद प्रस्तुत करें वह अपनी प्रतिरक्षा में यह कह सकता है कि वह घर व जमीन उस के पास तभी से कब्जे में है जब से आप ने उसे शेष जमीन विक्रय की थी। इस तरह उस जमीन पर उस का प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। इस तरह आप के द्वारा कोई भी कानूनी कार्यवाही सफल हो सकेगी इस में संदेह है। फिर भी चूंकि जमीन आप के नाम है और मकान का पट्टा भी है वैसी स्थिति में आप वाद दाखिल कर सकते हैं। लेकिन इस के लिए तमाम दस्तावेज किसी अच्छे वकील को दिखा कर उस से राय कर लें। जब तक सफलता की संभावना नहीं हो यह सब करना समय और धन का अपव्यय होगा।

दि जमीन व मकान आप के कब्जे में होते तो बहिन आप के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती थी। लेकिन दोनों ही तीसरे पक्षकार के पास हैं तो बहिन की भी वही स्थिति होगी जो आप की है।

प के पिताजी की अस्थियाँ कहाँ रखी हैं यह आपने नहीं बताया। यदि आप उन अस्थियों को प्राप्त कर सकते हैं तो उन्हें विसर्जित करने में कोई बाधा नहीं है।

प गाँव में रहते नहीं है। वह जमीन व मकान आप के काम का नहीं। आप उसे प्राप्त कर के भी बेचेंगे ही। अच्छा तो यह है कि जमीन व मकान जिस के कब्जे में है उस से सीधे बात करें कि जमीन व मकान आप के काम के नहीं हैं आप को उन्हें बेचना ही पड़ेगा। यदि वही खरीद ले तो ठीक है। उस व्यक्ति के पास उन दोनों का कब्जा तो है लेकिन वह उन का स्वामी तभी बन सकेगा जब कि वह उन्हें आप से खरीद ले। आप उसी से बात कर के उसी से सौदा कर लें तो आप को जमीन व मकान की आधी पौनी कीमत मिल सकती है। यह आप के लिए लाभ का सौदा होगा। यह कर के देख सकते हैं।

बही में लिखावट के आधार पर रुपया वसूली के लिए दीवानी दावा किया जा सकता है

समस्या-

मैं ने दो वर्ष पूर्व किसी व्यक्ति को कुछ रुपया 2 प्रतिशत ब्याज पर एक वर्ष के करार पर उधार दिया  था और बही में लिखवा कर उक्त व्यक्ति के हस्ताक्षर करवा लिए थे।  अब वह व्यक्ति न  तो ब्याज दे रहा है और ही रुपया लौटा रहा है। क्या उक्त रुपया न्यायालय द्वारा प्राप्त किया जा सकता है?

-विनोद कुमार कुमावत, गुढ़ा गौरजी, राजस्थान

समाधान-

दि आप आम तौर पर रुपया उधार देने का व्यवसाय करते हैं तो उस के लिए लायसेंस का होना आवश्यक है।   यदि बिना लायसेंस के आप रुपया उधार देते हैं तो इसी आधार पर आप का वाद निरस्त हो सकता है कि आप के पास रुपया उधार देने के लिए लायसेंस नहीं है।

लेकिन कोई भी व्यक्ति अपने किसी परिचित, पड़ौसी, मित्र या जानकार की मदद करने के लिए उसे उधार दे सकता है।  यदि आप आम तौर पर उधार नहीं देते हैं और बही में उधार देने के अधिक लेख नहीं हैं तो आप उस बही में लिखावट के आधार पर, जिस पर उधार लेने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर हैं, अपने रुपए की वसूली के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

मेरी राय में आप को अपने वकील के माध्यम से पहले उस व्यक्ति को रुपया चुकाने के लिए एक कानूनी नोटिस देना चाहिए।  नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर आप अपना रुपया वसूल करने के लिए वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।  लेकिन याद रहे जिस दिन आप ने रुपया उधार दिया है उस तिथि से तीन वर्ष व्यतीत होने के पहले ही यह वाद आप न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं, तीन वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने के उपरान्त नहीं।

दीवानी वाद में केवल चैक के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वे किसी दायित्व के चुकारे के लिए दिए गए थे

 फैजाबाद, उत्तरप्रदेश से गगन जायसवाल ने पूछा है –

क व्यक्ति से मेरा व्यापारिक लेनदेन चलता था। बाद में उसने मेरा 880000 रुपया नहीं दिया तो मैंने उसके ऊपर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का मुकदमा किया है। कई बार नोटिस गया, लेकिन वह लेता  ही नहीं है। अब उस के विरुद्ध वारंट निकलने वाला है तो उसने मेरे ऊपर 2133485/- रुपया का दीवानी वाद का नोटिस दिया है। ये नोटिस उसने मेरे द्वारा दिए गए चार चैकों के आधार पर दिया है, ये चैक उसने मुझसे यह कहकर लिया था कि मै इस चैक की क्लियरिंग  के आधार पर अपने बैंक से “ओवरड्राफ्ट” करवा लूँगा। अब जब उस का वारंट निकलने वाला है तो वह मुझ पर उल्टा मुकदमा करने जा रहा है। श्रीमान जी आप कृपया यह बताएँ कि मेरे द्वारा दिए गए चैक को बाउंस हुए 3 साल से ज्यादा हो गया है तो क्या वह मुकदमा कर सकता है? इस स्थिति में मुकदमा करने की अधिकतम मियाद कितनी होती है? और यदि वह मुकदमा कर देता है तो क्या जिला जज/ हाई कोर्ट/ सुप्रीमकोर्ट में रिवीजन किया जा सकता है ?
  उत्तर – 
गगन जी,

प ने उस व्यक्ति को कुछ चैक दिए हुए थे, उस ने वे चैक तीन वर्ष पूर्व अपने बैंक में प्रस्तुत किए और उस के बैंक ने समाशोधन के लिए आप के बैंक को भेजे। चैकों को अनादरित हुए भी तीन वर्ष से अधिक समय हो चुका है। ऐसी अवस्था में वह व्यक्ति आप के विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा नहीं कर सकता। चैक की अवधि छह माह से अधिक की नहीं होती, इस कारण से चैक अवधि पार हो चुके हैं। मात्र किसी चैक के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वे किसी दायित्व के चुकारे के लिए दिए गए होंगे। जब तक किसी दायित्व का कोई लिखित दस्तावेज न हो, यह नहीं माना जा सकता है कि वह किसी दायित्व के चुकारे के लिए दिया गया था। केवल धारा 138 के मामले में अनादरित चैक के लिए प्रथम दृष्टया यह माना जाता है कि वह किसी दायित्व के लिए दिया गया होगा, क्यों कि उस कानून में ऐसा प्रावधान है। लेकिन धारा 138 के मुकदमे में भी यदि चैक देने वाला यह कहता है कि उस ने चैक किसी दायित्व के चुकारे के लिए नहीं दिया था, और इस तथ्य को वह न्यायालय के समक्ष साबित कर दे तो धारा 138 का मुकदमा भी खारिज हो जाता है। 


दि उस व्यक्ति ने केवल चैकों के आधार पर आप को राशि की वसूली के लिए नोटिस दिया है जिस के लिए वह यह कहता है कि वे किसी दायित्व को चुकाने के लिए दिए गए थे, तो केवल चैकों के आधार पर यह नहीं माना जाएगा कि वे किसी दायित्व के अधीन  थे। चैक तीन वर्ष से पहले ही अनादरित हो चुके हैं। ऐसी अवस्था में यदि यह मान भी लिया जाए कि वे किसी दायित्व के चुकारे के लिए दिए गए थे, तब भी उन चैकों के आधार पर वसूली का कोई दीवानी वाद आप के विरुद्ध नहीं चलाया जा सकता। क्यों कि ऐसे मामले में दीवानी वाद प्रस्तुत करने की मियाद दायित्व पैदा होने से या दायित्व उत्पन्न होने के तीन वर्ष की अवधि में दायित्व को पुनः स्वीकार कर लेने की तिथि से तीन वर्ष की है। तीन वर्ष से अधिक हो जाने से यह वाद न्यायालय के समक्ष पोषणीय नहीं होगा। उस व्यक्ति ने यह नोटिस केवल आप को भयभीत करने और धारा 138 के मुकदमें में अपने लिए बचाव तलाशने की दृष्ट
ि से किया है। लेकिन उस की यह चालाकी कानून के सामने नहीं टिकेगी। वह व्यक्ति उन चैकों के आधार पर रुपया वसूली का दीवानी वाद न्यायालय में प्रस्तुत नहीं कर सकता।
दि किसी तरह वह वाद प्रस्तुत कर भी दे तो उसे लगभग 22 लाख रुपए का दावा प्रस्तुत करने के लिए कम से कम सवा लाख रुपया कोर्ट फीस वाद पेश करने के साथ ही अदा करनी होगी। जो एक फर्जी दावे के लिए कोई भी प्रस्तुत करेगा, ऐसा नहीं लगता। यदि वह दावा प्रस्तुत कर देता है तो ऐसा दावा मियाद के बाहर होने के कारण प्रारंभिक स्तर पर बिना दर्ज हुए खारिज हो जाएगा। यदि किसी तरह उस का दावा दर्ज हो कर समन जारी हो जाता है तो आप पहली ही पेशी पर आवेदन प्रस्तुत कर न्यायालय से निवेदन कर सकते हैं कि यह दावा मियाद बाहर है,  इस पर न्यायालय को क्षेत्राधिकार नहीं है, इस कारण इसे प्रारंभिक स्तर पर खारिज किया जाए। यदि न्यायालय आप के इस आवेदन को निरस्त भी कर दे तो आप उच्च न्यायालय के समक्ष न्यायालय के आदेश के विरुद्ध निगरानी प्रस्तुत कर सकते हैं।

मेरी राय में आप के विरुद्ध कभी ऐसा दावा पेश नहीं होगा। जब तक कथित दावे का समन आप को न मिल जाए आप को कभी भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। हाँ आप यह कर सकते हैं कि आप स्वयं अथवा किसी वकील के माध्यम से उक्त नोटिस का उत्तर नोटिसदाता को प्रेषित करवा दें कि आप ने वे चैक किसी दायित्व के चुकारे के लिए नहीं दिए थे।

क सलाह और कि कभी भी किसी भी व्यक्ति की सुविधा के लिए इस तरह चैक न दें। आप ने जिस व्यक्ति को यह चैक दिए उस ने चैकों के माध्यम से बैंक सुविधाओं का दुरुपयोग किया। आप ने उस का सहयोग किया। यह अपराध न होते हुए भी एक अनुचित और अवैधानिक कृत्य है। इस तरह चैकों का आदान प्रदान कभी भी संकट का कारण बन सकता है।



मामला मियाद का

अब आप ने किसी को रुपया उधार दिया है, उधार देने की लिखत भी आप के पास मौजूद है और रसीद भी।  उधार दिया रुपया वापस आने का समय बीत चुका है और चुकाने वाला आप से आज-कल, आज-कल कर रहा है।  आप उसे समय दिए जा रहे हैं। अंततः आप उस पर मुकदमा करने का मन बना लेते हैं और अपने पास के कागजात ले किसी वकील से मिलते हैं। वकील आप को बताता है कि आप उस व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा नहीं कर सकते? आप पूछते हैं- क्यों? जवाब मिलता है कि मुकदमा दायर करने की मियाद निकल चुकी है। आप निराश हो जाते हैं। वस्तुतः न्याय इस आधारभूत सिद्धान्त पर न्याय करता है कि न्याय प्राप्त करने वाले को न्याय प्राप्त करने के लिए अर्जी या दावा पेश करने में देरी नहीं करनी चाहिए अपितु उसे तुरंत अदालत के सामने जाना चाहिए। कम से कम निर्धारित समयावधि के भीतर ही अदालत में कार्यवाही कर देनी चाहिए। 
आप यदि न्यायालय के समक्ष जाने में जितनी देरी करते हैं उतने ही न्याय से दूर होते चले जाते हैं। कुछ समय बाद यह दूरी इतनी हो जाती है कि आप कभी न्याय प्राप्त नहीं कर सकते। भारत में विभिन्न तरह के दावे पेश करने के लिए निर्धारित समयावधि निश्चित किए जाने के लिए कानून बना है जो मियाद अधिनियम, अवधि अधिनियम या लिमिटेशन एक्ट कहलाता है। इस कानून के साथ एक अनुसूची संलग्न की गई है जिस में दिया गया है कि किस किस तरह के मामलों के लिए क्या क्या अवधि निर्धारित की गई है। इस अनुसूची में कुल 137 बिंदु हैं।  इस लिए  इस ब्लाग की सीमा में यह तो संभव नहीं है कि यह बताया जा सके कि कौन से मामले में मुकदमा करने के लिए क्या मियाद निर्धारित की गई है? और मियाद कब आरंभ होगी? हाँ आप चाहें तो इस सूची को निम्न वाक्य पर क्लिक कर के देख सकते हैं।

मियाद अधिनियम की अनुसूची

नोट-यह आलेख विशेष रूप से उड़नतश्तरी के ब्लागर समीर लाल जी को समर्पित है, कुछ माह पूर्व उन ने यह प्रश्न किया था कि क्या अलग अलग मामलों के लिए अलग अलग मियाद है? उत्तर देने में देरी हुई उस के लिए मैं उन से क्षमा प्रार्थी हूँ।

किसी भी शिकायत या दावे को निर्धारित अवधि में ही अदालत ले जाएँ

अदालतों को समय बाधित मुकदमों को स्वीकार नहीं करना चाहिए। हमारे उच्चतम न्यायालय ने ऐसा ही कहा है। किसी भी विवाद या शिकायत के लिए कानून ने एक समय सीमा निर्धारित की है। इस समय सीमा के रहते ही आप अपनी शिकायत या वाद अदालत के सामने रख सकते हैं। यदि आप ने अपनी शिकायत को दर्ज कराने में देरी कर दी तो फिर अदालत को आप की बात को सुनने का अधिकार नहीं है। उदाहरण के रूप में आप ने किसी को रुपया उधार दिया है। आप इस धन की वसूली के लिए तीन वर्ष की अवधि में अपना दावा प्रस्तुत कर सकते हैं। इस अवधि के व्यतीत हो जाने के उपरांत न्यायालय का द्वार इस धन की वसूली के लिए बंद हो जाएगा।

अवधि कानून न्याय व्यवस्था का एक मुख्य आधार है। यदि शिकायत या वाद प्रस्तुत करने की  कोई अवधि ही नहीं हो तो फिर कोई भी शिकायत कभी भी न्याय व्यवस्था के सामने लाई जा सकेगी और इस तरह के विवादों की भरमार हो जाएगी जिन का वास्तव में कोई मूल्य ही नहीं रह जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने अवधि के इस सिद्धान्त को  सी. जेकब बनाम डायरेक्टर ऑफ जियोलोजी एण्ड माइनिंग एवं अन्य के मुकदमे में निर्णय देते हुए इस पुनः रेखांकित किया है।

इस मामले में  अपीलार्थी जेकब ने 1967 में नौकरी में प्रवेश किया था तथा उस की सेवाएँ 1982 में अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण समाप्त कर दी गई थी। उस ने अठारह वर्ष बाद वर्ष 2000  में एक प्रतिवेदन अपनी सेवा समाप्ति के विरुद्ध विभाग को प्रस्तुत किया जिस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। जेकब ने ट्रिबुनल को अपील की  जिस पर प्रतिवेदन पर चार माह में निर्णय करने का आदेश विभाग को दिया गया। विभाग ने प्रतिवेदन को निरस्त कर दिया। जेकब ने मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत की जिसे एकल पीठ ने स्वीकार कर लिया, किन्तु विभाग की अपील पर खंड पीठ ने एकल पीठ के निर्णय को उलट दिया। जेकब उच्चतम न्यायालय पहुंचा जहाँ यह निर्णय दिया।

अब जब भी आप को कभी लगे कि आप की किसी समस्या का हल न्यायालय के माध्यम से हो सकता है तो तुरंत यह पता करें कि इस मामले में कानून द्वारा कोई अवधि निर्धारित  तो नहीं है। यह पता लग जाने पर कि आप न्यायालय के समक्ष कब तक अपना मामला ला सकते हैं, यदि आप को मामला न्यायालय में ले ही जाना है तो निर्धारित अवधि में ले ही जाएँ या फिर अपनी शिकायत को भूल जाएँ।  न्यायालय अवधि के बाद उसे स्वीकार नहीं करेगा।

आप की समस्या यह हो सकती है कि आप कैसे पता करें कि किसी विशेष मामले को न्यायालय में ले जाने के लिए क्या अवधि निर्धारित है? तो आप के लिए तीसरा खंबा की कानूनी सलाह उपलब्ध है उस पर अपना प्रश्न दर्ज करा दें। आप को उत्तर मिल जाएगा।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada