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स्वतंत्र स्त्री पर कानून का कोई जोर नहीं, तब किसी पुरुष का कैसे हो सकता है?

mother_son1समस्या-

हरीश शिवहरे ने ब्यावरा, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी रजनी मालवीया से मैं ने 8 -10. -2005 में नोटरी द्वारा 100 रु. के स्टाम्प पर लिखित रूप से विवाह संविदा किया गया था जिसे उस स्टाम्प पर गन्धर्व विवाह के नाम से लिखित किया गया था। 2005 के पहले मेरी पत्नी रजनी मालवीय पूर्व में कान्हा वर्मा के साथ पत्नी के रूप में निवास कर रही थी। परन्तु उन दोनों का कोई हिन्दू रीति रिवाज से विवाह संपन्न नहीं हुआ था, बस लिव इन रिलेशनशिप के तहत रह रहे थे। कान्हा वर्मा से रजनी मालवीया को कोई संतान भी नहीं थी। इसके बाद रजनी मालवीया और मुझ हरिश शिवहरे के मध्य प्रेम संबध स्थापित हुए और हम दोनों ने विवाह करने का फैसला किया। २००५ में हम तीनो पक्षों के बीच 100 के स्टाम्प पर एक समझौता हुआ जिस में कान्हा वर्मा ने रजनी मालवीय को मुझ हरीश शिवहरे के साथ विवाह करने की सहमति प्रदान की। जिस का 100 रु. के स्टाम्प पर नोटरी से प्रमाणित संविदा निष्पादित किया गया कि जिस मे हम तीनों पक्षकार हैं। कान्हा वर्मा रजनी मालवीया से विवाह विच्छेद होना स्वीकार करता है, उसी लेख पत्र में मेरे साथ रजनी मालवीया का गन्धर्व विवाह होना स्वीकार किया जाता है। कान्हा वर्मा द्वारा यहाँ भी लिखित किया जाता है कि हम दोनों के विवाह से और साथ रहने से उसे कोई आपत्ति नहीं होगी और नहीं किसी प्रकार की कोई पुलिस कार्यवाही की जायेगी, न ही किसी प्रकार का हम दोनों रजनी और हरीश के विरूद्ध न्यायालय में कोई वाद प्रस्तुत किया जाएगा। 8 -10 -2005 से ही रजनी मालवीय मुझ हरीश शिवहरे के साथ पत्नी के रूप में रह रही थी और मुझसे रजनी मालवीय को 11 -12 -2012 को एक बेटी का जन्म हुआ। अभी तक सब कुछ ठीक चल रहा था, पर बीच में कुछ बातो को लेकर हम दोनों में झगड़े होने लगे और वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई। झगड़े जब ज्यादा बढ़ गए तब रजनी द्वारा मुझे बार बार आत्महत्या करने की धमकी दी जाने लगी और तलाक की मांग करने लगी। दो से तीन महीने तक मेरे घरवालो और पड़ोसियों द्वारा समझाए जाने पर कुछ समय तक सब ठीक रहा। पर फिर से रजनी द्वारा मुझ से तलाक की मांग की जाने लगी। इस बात से परेशान होकर दिनाक 30 -11 -2013 को हम दोनों के मध्य एक 100 रु. के स्टाम्प पर एक समझौता तलाक को लेकर किया गया जिस में हम दोनों पक्षों की आपसी सहमति से तलाक होना स्वीकार किया गया। उक्त समझौते की नोटरी करायी गयी। इस के एक माह बाद तक रजनी मेरे साथ निवास करती रही। दिनांक 9 -01 -2014 को मुझ से जिद कर के मेरे बार बार मना करने पर भी रजनी भोपाल अनाथ आश्रम में केयर टेकर के रूप में काम करने चली गई। अभी वहीं निवास कर रही है और मेरी बेटी भी उसके पास है। अब मैं अपनी बेटी के भविष्य को लेकर काफी चिंतित हूँ। मैं अपनी बेटी को किसी भी तरह से अपने पास रख उसका पालन पोषण करना चाहता हूँ। लेकिन रजनी मुझे मेरी बेटी से मुझे मिलने भी नहीं देती, ना मुझे उसे देखने देती है। अनाथ आश्रम में मेरी बेटी का भविष्य क्या होगा यह सोचकर में दुखी हो जाता हूँ। इस बारे में मैं ने रजनी को कई बार समझाने का प्रयास किया कि वह सब कुछ भूलकर मेरे साथ रहे। हम दोनों मिलकर हमारी बेटी की परवरिश अच्छे से करेंगे। वह मानने को तैयार नहीं है, अब में अपनी बेटी को किस तरह से अपने पास रख सकता हूँ उस की परवरिश कर सकता हूँ ताकि उसका उज्जवल भविष्य हो। मैं अपनी बेटी को अपने पास और रजनी को भी अगर वो तयार हो जाती है तो रखना चाहता हूँ। मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं किस तरह से अपनी बेटी की कस्टडी प्राप्त कर सकता हूँ और रजनी के साथ दाम्पत्य जीवन स्थापित कर सकता हूँ।

समाधान-

प का मानना और कहना है कि रजनी का पहला विवाह विवाह नहीं था, अपितु एक लिव इन रिलेशन था। जिस से उसे कोई सन्तान नहीं हुई। फिर उसी रिलेशन के दौरान आप दोनों के बीच प्रेम विकसित हुआ और उस के साथी के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद रजनी आप के साथ आ कर रहने लगी।

ब उस का पहला विवाह नहीं था तो आप के साथ जो संबंध रजनी का है वह विवाह कैसे हो गया। आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी होती है और सप्तपदी के बिना विवाह को संपन्न नहीं माना जाता है। इस तरह आप का और रजनी का संबंध भी लिव इन रिलेशन ही हुआ।

जनी एक स्वतंत्र स्त्री है। वह अपनी इच्छा से पहले अन्य व्यक्ति के साथ रही। जिस से उसे कोई सन्तान नहीं हुई। आप ने अपनी समस्या लिखने इस बात पर जोर दिया है। इस से प्रतीत होता है कि उस का आप के साथ सम्बन्ध बनाने में उस की माँ बनने की इच्छा की भूमिका अधिक थी। उस ने और आप ने किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता करना उचित समझा। आप की संन्तान प्राप्ति की इच्छा आप की समस्या में कहीं दिखाई नहीं देती। आप के साथ रहने के बाद भी उसे संन्तान की प्राप्ति 7 वर्ष बाद हुई। निश्चित रूप से देरी से संन्तान होने के बाद रजनी का झुकाव और प्रेम अपनी बेटी की तरफ चला गया और आप ने इसे अलगाव समझा। रजनी की पुत्री के कारण आर्थिक जरूरतें बढ़ गईं और आप के साथ जो समय वह देती थी वह कम हो गया। आप ने यह नहीं बताया कि रजनी आप के साथ रहते हुए भी कोई काम कर के कुछ कमाती थी या नहीं। पर मुझे लगता है कि वह भी कुछ न कुछ अर्थोपार्जन करती रही होगी। जिस में बेटी के जन्म के समय जरूर कुछ व्यवधान आया होगा। हमारी नजर में यही कारण रहे होंगे जिन्हों ने आप के बीच विवादों को जन्म दिया।

प ने रजनी और आप के बीच विवाद का कारण नहीं बताया है और छुपाया है। इस का अर्थ है कि उन कारणों के पीछे आप का स्त्री पर संपूर्ण आधिपत्य का पुरुष स्वभाव अवश्य रहा होगा। पुत्री पर खर्चे के प्रश्न भी जरूर बीच में रहे होंगे। खैर, आप ने उन्हें बताए बिना समाधान चाहा है।

जनी लगातार आप से अलग होने का प्रयास करती रही और आप अन्यान्य प्रयासों से उसे रोकते रहे। जिस में परिवार और पड़ौसियों द्वारा उसे समझाने का काम भी सम्मिलित था। लेकिन उस केबाद भी विवाद बना रहा। अर्थात आप ने विवाद को समाप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। आप ने समझने का प्रयास ही नहीं किया कि रजनी आखिर आठ वर्षों के दाम्पत्य जीवन के बाद अपनी बेटी को ले कर अलग क्यों होना चाहती है। यदि आप उस बात को समझने का प्रयास करते और कुछ खुद को भी बदलने का प्रयास करते तो शायद रजनी आप को छोड़ कर नहीं जाती और पुत्री भी आप के पास बनी रहती।

जनी जैसे समझौते के अन्तर्गत आप के साथ रहने आई थी वैसे ही समझौता कर के अलग हो गई। आप खुद भी जानते हैं कि उस पर आप का कोई जोर नहीं है। विधिपूर्वक हुए विवाह में भी पत्नी पर पति का इतना हक नहीं होता है कि वह उसे जबरन अपने साथ रख सके। अब आप को लगता है कि यदि किसी तरह बेटी को आप अपने साथ रख सकेंगे तो रजनी भी वापस लौट आएगी और बेटी के साथ रहने की इच्छा के कारण आप की सब बातों को उसे सहन करना होगा। रजनी एक स्वतंत्र स्त्री है उस पर आप का तो क्या कानून का भी कोई जोर नहीं है।

ह सही है कि बेटी आप की है लेकिन जितनी आप की है उतनी ही रजनी की भी है। संतान यदि पुत्र हो तो 5-7 वर्ष का होने पर पिता को उस की अभिरक्षा मिल सकती है वह भी तब जब कि बच्चे का हित उस में निहित हो। लेकिन बेटी की अभिरक्षा तो अत्यन्त विकट परिस्थितियों में ही पिता को मिल पाती है। आप के मामले में ऐसी कोई विकट परिस्थिति नहीं है कि बेटी की कस्टड़ी उस की माँ से उसे अलग करते हुए आप को मिल सके। आप जो अनाथ आश्रम का तर्क गढ़ रहे हैं कि वहाँ बेटी की परवरिश ठीक से न हो सकेगी। वह बहुत थोथा तर्क है। वह अनाथ आश्रम की निवासिनी नहीं है। बल्कि अनाथ आश्रम के केयर टेकर की बेटी है। अनाथ आश्रम के बच्चों का स्नेह और आदर भी उसे प्राप्त हो रहा होगा जो किसी भी स्थिति में आप के यहां प्राप्त नहीं हो सकता। रजनी की अनाथ आश्रम की केयर टेकर के रूप में इतनी आय है कि एक बेटी को पालने में वह समर्थ है। अनाथ आश्रम का नाम अनाथ आश्रम जरूर होता है लेकिन अनाथ आश्रम बनाए ही इस कारण जाते हैं कि अनाथ बच्चों को उचित संरक्षण मिल सके। वस्तुतः अनाथ आश्रम के बच्चे अनाथ नहीं रह जाते हैं।

प यदि रजनी को वापस अपने साथ रहने को तैयार करना चाहते हैं तो कोई न्यायालय आप की कोई मदद नहीं करेगा। आप यदि चाहते हैं कि बेटी आप के साथ रहे तो केवल एक ही विधि हो सकती है कि रजनी स्वेच्छा से आप के साथ रहने को तैयार हो जाए। लेकिन यह कार्य असंभव दिखाई पड़ता है। क्यों कि अब रजनी के पास आश्रय भी है और रोजगार भी है। वह क्यों फिर से परतंत्रता में पड़ना चाहेगी। फिर जो स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ समझ गई हो वह क्यों आप के अधीन रहना चाहेगी। उसे मातृत्व चाहिए था वह उसे मिल गया है। यदि उसे किसी पुरुष साथी का चुनाव करना होगा तो जो स्त्री अपनी स्वतंत्रता और मातृत्व की इच्छा के कारण एक पुरुष साथी को छोड़ कर आप के साथ संबंध बना सकती है वह अब किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाना पसंद करेगी न कि आप के साथ।

प अपनी बेटी के पिता हैं। आप चाहें तो रजनी को यह भरोसा दे कर उस से मिलने की युक्ति कर सकते हैं कि आप न तो रजनी के जीवन में उस की इच्छा के विरुद्ध प्रवेश करेंगे और न ही बेटी पर अपना अधिकार जमाएंगे। आप केवल इतना चाहते हैं कि साल में दो चार बार उस से मिल लें और कुछ समय उस के साथ बिता सकें।

स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

कृष्णा नायडू ने कोरबा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे नाना जी ने अपने जीवन काल मे दो जमीन खरीदी जिस में से एक उन के नाम है और उस में से उनकी बेटियों को हिस्सा मिल रहा है। दूसरी जमीन पर नानी जी का नाम है। क्या उस पर भी बेटियों को हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

नाना जी का देहान्त हो चुका है और उस के साथ ही उन का उत्तराधिकार तय हो गया है जिस में उन की बेटियों का हिस्सा मिल रहा है। नानी के नाम से जो जमीन है वह नाना जी द्वारा खऱीदी गई होने पर भी नानी की है। क्यों कि पत्नी के नाम खऱीदी गई जमीन के बारे में कानून यह है कि वह पत्नी के उपयोग और लाभ के लिए खरीदी गई थी और उसी की संपत्ति है।

ह संपत्ति नानी के जीवनकाल में नानी की रहेगी। नानी यदि उस संपत्ति की वसीयत कर देती हैं तो वह उन्हें मिलेगी जिन्हें नानी ने वसीयत की है। यदि वे निर्वसीयती रह जाती हैं तो फिर उन की संपत्ति उत्तराधिकार के नियमों के मुताबिक नानी के सभी उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी। इन उत्तराधिकारियों में बेटियाँ भी होंगी और उन्हें भी उन का हिस्सा मिलेगा।

स्त्री पुरुष संबंधों पर सार्वजनिक चर्चा अपराध हो सकती है ..

तीसरा खंबा पिछले दिनों तकनीकी समस्या के कारण अनुपस्थित रहा। इस समस्या का एक कारण इस साइट पर टैग्स और कैटेगरीज का अधिक संख्या में होना चित्रों की अधिकता आदि भी है। हो सकता है हम पाठकों की समस्याओं का समाधान कुछ दिन और प्रस्तुत नहीं कर सकें। असुविधा के लिए हमें खेद है। कभी कभी अनेक समस्याएँ समाज में बहुतायत में होती हैं और उन का कानून से सीधा संबंध होता है। फिलहाल हम ऐसी कुछ समस्याओं पर कुछ सामग्री आप के सामने रखना चाहेंगे।

किसी स्त्री-पुरुष के बीच के अन्तरंग संबंधों की घटनाओं या गतिविधियों पर भारतीय समाज में अक्सर चटखारे ले कर चर्चाएँ की जाती हैं।  लेकिन लोग बिलकुल यह नहीं जानते कि ऐसी चर्चा करना या उस में सम्मिलित होना अपने आप में अपराध हो सकता है। कुछ दिनों से कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह टीवी एंकर अमृताराय के साथ अपने संबंधों को लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में आलोचना का शिकार हैं। इन दोनों को तथा अमृताराय के पति को इरादतन आलोचना का शिकार बनाया जा रहा है। जब कि यह एक सामान्य मामला है जिस की सामाजिक रूप से चर्चा करने के बजाए उपेक्षा की जानी चाहिए।

 सलन किसी परिवार की विवाहित लड़की का उस के पति के साथ संबंध खराब हो जाता है, वे एक दूसरे से अलग रहने लगते हैं। मामला यहाँ तक आगे बढ़ जाता है कि दोनों सहमति से विवाह विच्छेद का आवेदन पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं। तब यह निश्चित हो गया होता है कि यह वैवाहिक संबंध समाप्त हो गया है और वैसी स्थिति में दोनों ही व्यक्तियों को जो उस विवाह में हैं, इस बात का पूरा अधिकार है कि वे अपने लिए नए जीवन साथी की तलाश करें। इस तलाश में एक दूसरे से मिलना, जुलना, एक दूसरे को समझना आदि सभी कुछ सम्मिलित है। इस मिलने जुलने की जानकारी यदि सार्वजनिक होती है तो उसे वे खुद भी नहीं छुपाना चाहेंगे। क्यों कि इस में न तो कुछ अनैतिक है और न ही कुछ अवैध।

 स मामले में लोग यहाँ तक कयास लगा कर हमले कर रहे हैं कि दिग्विजय सिंह तथा अमृता के बीच भौतिक संबंध स्थापित हुए हैं जो एक विवाह के होते हुए नहीं होने चाहिए। एक तो इस तरह के भौतिक संबंधों का कुछ खुलासा नहीं हुआ है। यदि हों भी तो इस तरह के संबंधों पर जब तक अमृता के पति और दिग्विजय सिंह की पत्नी की ओर से कोई शिकायत नहीं आती तो उन पर किसी भी तीसरे व्यक्ति को शिकायत करने का कोई अधिकार और अवसर नहीं है। यदि कोई ऐसा करता है तो ऐसा करना उक्त तीनों व्यक्तियों में से किसी के लिए भी अपमानजनक हो सकती है जो कि स्वयं में एक अपराध है। इस तरह इस संबंध पर चर्चा करना स्वयं अपराध हो सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा निम्न प्रकार है-

 497. जारकर्म–जो कोई ऐसे व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथुन करेगा जो बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, और दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा । ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी ।

 इस से यह स्पष्ट है कि इस संबंध में यदि स्त्री के पति की मौनानुकूलता या सम्मति न हो तभी यह एक अपराध हो सकता है। इस मामले में अमृता राय के पति ने किसी तरह की कोई शिकायत नहीं की है। वैसी स्थिति में इस मामले को चर्चा का विषय बनाना अपराधिक गतिविधि हो सकती है। बहुत से लोग केवल अपने सामंती और स्त्री समानता विरोधी विचारों की भड़ास निकालने के लिए अभद्र टिप्पणियाँ मीडिया और सोशल मीडिया में कर रहै हैं, वह अपराध है और ऐसा करने वाले कभी भी इस अपराध के लिए अभियोजित किए जा सकते हैं। यह स्त्री विरोधी विमर्श तुरन्त रोका जाना चाहिए।

केवल आत्मनिर्भर होना ही स्त्री के भविष्य की गारण्टी हो सकती है …

तलाकसमस्या-

नोएडा से नदीम अहमद खान ने पूछा है-

मेरी बहन का विवाह ११ साल पहले हुआ था लड़का ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था और अपने पिता के साथ ही काम करता था उनका देवबंद में स्कूल और कॉलेज है। हमने उनसे कहा के अगर कुछ ऊँच नीच हो गयी तो कौन जिम्मेदार होगा, लड़के के पिता ने कहा में पूरी तरह से मैं लड़के की तरफ से जिम्मेदार हूँ। शादी के कुछ दिनों के बाद से ही लड़का मेरी बहन से साथ बुरी तरह से मार-पीट करता आ रहा है अगर उससे पहले खाना कटे वक्त रोटी तोड़ ली तो लड़ने लगता है कि हम पुरूष प्रधान है और तू हमसे पहले रोटी नहीं तोड़ सकती, अगर घर में कुछ चीज़ इधर उधर हो जाये तो हिंसक तरीके से बर्ताव करता है।  शादी के बाद हमें पता चला कि उसको पागलपन का मेडिकल सर्टिफिकेट मिला हुआ है कहता है कि अगर में खून भी कर दूं तो मेरा कुछ नहीं बिगड सकता अगर लड़की अपने घर फोन पर बात करती है तो छुरी ले के खड़ा हो जाता है। एक बार मारपीट में लड़की की ऊँगली तोड़ दी जिसका डॉक्टर से उनके बाप ने इलाज कराया, दो बार घर से बाहर निकाल दिया लड़की दो तीन बजे तक घर से बहार सड़क पर अकेली रही और आप सो गया। आये दिन न जाने कितनी बार बिना बात के लड़की के झापड और उसका सर दीवार से दे दे के मारता है।

धर जब से ही उसका सम्बन्ध किसी और लड़की से भी है। हमने उसके पिता से बात की तो उन्होंने बताया के लड़के ने मेरे उपर भी हाथ उठाया है मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। बहन का एक लड़का भी है १० वर्ष का। अब हम लड़की को अपने घर ले आये हैं। जब हमने लड़के से और उसके पिता से लड़की के एक्स रे रिपोर्ट और मेडिकल पेपर, और डॉक्टर की प्रेस्क्रिप्शन मांगी तो उन्होंने देने से इंकार कर दिया। लड़के का बाप तो काफी हद तक ठीक है। लेकिन उस की माँ और बहनें आये दिन लड़ती है, अब हमें बताये कि हम लड़के के खिलाफ क्या क्या कर सकते हैं। हम पूरा खर्चा बहन का, बहन के लड़के का, रहने के लिए मकान वगैरा चाहते हैं। कृपया कर के हमें दिशा दें हम देहली में रहते है और लड़का देवबंद सहारनपुर का है। रूपये पैसो की लड़के वालो के पास कोई कमी नहीं है।

समाधान-

विवाह के समय या पहले जो भी वायदे किए जाते हैं उन का कोई अर्थ नहीं होता। न ही उन को मनवाया जा सकता है। विवाह के उपरान्त किसी भी स्त्री का आत्मनिर्भर होना ही उस के अच्छे भविष्य की गारंटी हो सकता है, उस के अलावा कोई चीज नहीं। यदि स्त्री आत्मनिर्भर नहीं है तो पति के ऊपर ही सब कुछ निर्भर है, वह अच्छा हुआ तो पत्नी का जीवन जन्नत है वरना दोजख तो है ही।  स्थिति यह हो चुकी है कि आप की बहिन अपने पति के साथ नहीं रह सकती। पति उस के साथ क्रूरता का व्यवहार करता है, यह उस के साथ न रहने का सब से मजबूत आधार है। आप बहिन को अपने पास ले आए यह आप ने बहुत अच्छा किया।

प की बहिन अपने लिए और अपने पुत्र के लिए भरण पोषण का खर्च मांग सकती है। जिस में रहने का मकान की व्यवस्था और बच्चे की पढ़ाई आदि भी सम्मिलित है। इस के लिए आप की बहिन दिल्ली में या नोएडा में जहाँ वह रहती है न्यायालय में धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत और घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती है। आप यह करवाएँ। इस के अतिरिक्त यदि हो सके तो प्रयत्न करें कि आप की बहिन स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।

लगभग हर स्त्री के पास धारा 498-ए व 406 भादंसं की शिकायत का कारण उपलब्ध रहता है।

समस्या-

सिरोही, राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

मैं किसी कारणवश अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद (तलाक) ले रहा हूँ। मेरे ससुराल वाले मुझे झूठे मुकदमे में फँसाने की धमकियाँ देते हैं, जैसे घरेलू हिंसा, दहेज, मारपीट आदि।  उस के बाद मैं ने एस.पी. को लिखित में शिकायत दे दी। फिर भी उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?

समाधान-

sadwomanह एक आम समस्या के रूप में सामने आता है। सामान्यतः विवाह के उपरान्त यह मान लिया जाता है कि पति-पत्नी आपसी सहयोग के साथ सारा जीवन शांतिपूर्ण रीति से बिताएंगे। लेकिन विवाह इतनी आसान चीज नहीं है। विवाह के पूर्व स्त्री और पुरुष दोनों के ही वैवाहिक जीवन के बारे में अपने अपने सपने और महत्वाकांक्षाएँ होती हैं। निश्चित रूप से ये सपने और महत्वाकांक्षाएँ तभी पूरी हो सकती हैं जब कि पति या पत्नी उन के अनुरूप हो। यदि पति और पत्नी के सपने और महत्वाकांक्षाएँ अलग अलग हैं। वैसी स्थिति में दोनों में टकराहट स्वाभाविक है। लेकिन इस टकराहट का अन्त या तो सामंजस्य में हो सकता है या फिर विवाह विच्छेद में। दोनों परिणामों तक पहुँचने में किसी को कम और किसी को अधिक समय लगता है। ऐसा भी नहीं है कि परिणाम आ ही जाए। अधिकांश युगल जीव भर इस टकराहट और सामंजस्य स्थापित करने की स्थिति में ही संपूर्ण जीवन बिता देते हैं। अपितु यह कहना अधिक सही होगा कि पति-पत्नी के बीच सामंजस्य और टकराहटों के साथ साथ चलते रहने का नाम ही एक गृहस्थ जीवन है।  यदि सामंजस्य टकराहटों पर प्रभावी हुआ तो जीवन मतभेदों के बावजूद सहज रीति से चलता रहता है। लेकिन जहाँ सामंजस्य का प्रयास मतभेदों के मुकाबले कमजोर हुआ वहीं गृहस्थ जीवन की टकराहटें पहले पति-पत्नी के दायरे से, फिर परिवारों के दायरे से निकल कर बाहर आ जाती हैं।

ब आप ने सहज रूप से यह कह दिया है कि “मैं किसी कारणवश अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद (तलाक) ले रहा हूँ”। आप ने यह तो नहीं बताया कि आप तलाक क्यों ले रहे हैं? इस बारे में एक भी तथ्य सामने नहीं है। आप ने तो पत्नी के विरुद्ध घर, परिवार, बिरादरी से बाहर आ कर अदालत में जंग छेड़ दी है। हमारे यहाँ यह आम धारणा है कि प्यार और जंग में सब जायज है। यह धारणा केवल पुरुषों की ही नहीं है स्त्रियों की भी है। आप क इस जंग में दो  दो पक्ष हैं। एक आप का और आप के हितैषियों का जो आप के तलाक लेने के निर्णय से सहमत हैं और दूसरा पक्ष आप की पत्नी और उस के मायके वालों का। दोनों पक्षों के बीच जंग छिड़ी है तो जंग में जो भी हथियार जिस के पास हैं उन का वह उपयोग करेगा। आप की पत्नी के पक्ष ने उन के पास उपलब्ध हथियारों का प्रयोग करते हुए आप पर मुकदमे कर दिए हैं। अब जंग आप ने छेड़ी है तो लड़ना तो पड़ेगा।

प ने लिखा है कि उन्हों ने दहेज का केस कर दिया है। इस से कुछ स्पष्ट पता नहीं लगता कि क्या मुकदमा आप के विरुद्ध किया गया है। आम तौर पर पत्नियाँ जब पति के विरुद्ध इस तरह की जंग में जाती हैं तो किसी वकील से सलाह लेती हैं। वकील उन्हें धारा 498-ए और 406 आईपीसी के अंतर्गत न्यायालय के समक्ष परिवाद करने की सलाह देते हैं। इस के बहुत मजबूत कारण हैं। आम तौर पर पत्नियाँ पति के साथ निवास करती हैं। उन का सारा स्त्री-धन जो उन की कमाई से अर्जित हो, जो उन्हें अपने माता-पिता, रिश्तेदारों, पति व पति के रिश्तेदारों व अन्य किसी व्यक्ति से मिला है वह पति के घर रहता है। यह पति के पास पत्नी की अमानत है। आप उसे देने से इन्कार करते हैं तो वह अमानत में खयानत का अपराध है। जंग आ चुकी स्त्री वहाँ जितना सामान होता है उस से अधिक बताती है। पति देने से इन्कार करते हैं। धारा 406 आईपीसी का मुकदमा तैयार बैठा है। क्यों की उस का स्त्रीधन कितना था या कितना नहीं, या उस ने उस की मांग भी की थी या नहीं और पति ने उसे मांग पर देने से मना किया था या नहीं यह सब तो बाद में न्यायालय में तय होता रहेगा। उस समय तो पुलिस पत्नी और उस के गवाहों के बयानों को सही मान कर पति व उस के रिश्तेदारों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करती है और आरोप पत्र प्रस्तुत कर देती है।

धारा 498-ए का मैं अनेक बार अन्य पोस्टों में उल्लेख कर चुका हूँ। यह निम्न प्रकार है-

पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विय में

498क. किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना–जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।

स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,“ क्रूरता” निम्नलिखित अभिप्रेत हैः–

(क) जानबूझकर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकॄति का है जिससे स्त्री को आत्महत्या करने के लिए या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा कारित करने के लिए उसे प्रेरित करने की सम्भावना है ; या

(ख) किसी स्त्री को तंग करना, जहां उसे या उससे सम्बन्धित किसी व्यक्ति को किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के लिए किसी विधिविरुद्ध मांग को पूरी करने के लिए प्रपीडित करने को दृष्टि से या उसके अथवा उससे संबंधित किसी व्यक्ति के ऐसे मांग पूरी करने में असफल रहने के कारण इस प्रकार तंग किया जा रहा है ।]

ब आप स्वयं भी देखें कि इस धारा में क्या है। यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को या किसी रिश्तेदार की पत्नी के प्रति ऐसा आचरण करता है जिस से उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरणा मिलती हो या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा उत्पन्न होता है या फिर उसे संपत्ति या अन्य किसी मूल्यवान वस्तु की मांग के लिए प्रपीड़ित करने के लिए तंग करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत अपराध करता है।

स धारा को पढ़ने के बाद सभी पुरुष एक बार यह विचार करें कि इस धारा में जिस तरह स्त्री के प्रति क्रूरता को परिभाषित किया गया है, क्या पिछले तीन वर्ष में कोई ऐसा काम नहीं किया जो इस धारा के तहत नहीं आता है। कोई बिरला पुरुष ही होगा जो यह महसूस करे कि उस ने ऐसा कोई काम नहीं किया। यदि कोई यह पाता है कि उस ने अपनी पत्नी से उक्त परिभाषित व्यवहार किया है तो फिर उसे यह भी मानना चाहिए कि उस ने उक्त धारा के अंतर्गत अपराध किया है। यदि इस अपराध के लिए उस के विरुद्ध शिकायत नहीं की गई है तो यह उस की पत्नी की कमजोरी या भलमनसाहत है। इस से यह तात्पर्य निकलता है कि लगभग हर पत्नी इस तरह की क्रूरता की शिकार बनती है लेकिन शिकायत नहीं करती इस कारण उस के पति के विरुद्ध मुकदमा नहीं बनता है। लेकिन यदि स्त्री को युद्ध में लाए जाने या चले जाने के बाद ये दो हथियार तो उस के पास हैं ही, जिन का वह उपयोग कर सकती है। और भला करे भी क्यों नहीं?

ब के मूल प्रश्न का उत्तर दिया जाए कि ‘उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?’ उक्त धाराओं में पहले स्त्री न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत करती है, फिर पुलिस उस पर प्राथमिकी दर्ज कर उस का अन्वेषण करती है और न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करती है। फिर न्यायालय आरोपों पर साक्ष्य लेता है, और दोनों पक्षों के तर्क सुनता है तब निर्णय करता है कि अभियुक्त के विरुद्ध आरोप प्रमाणित है या नहीं। प्रमाणित होने पर दंड पर तर्क सुनता है और अंतिम निर्णय करता है। लेकिन आप चाहते हैं कि आप को इतना बड़े मामले का निर्णय हम से केवल इतना कहने पर मिल जाए कि ‘उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?’ क्या इस तरह उत्तर कोई दे सकता है? नजूमी (ज्योतिषी) से भी यदि कोई सवाल किया जाए तो वह भी काल्पनिक उत्तर देने के पहले ग्रह नक्षत्र देखता है, उन की गणना करता है तब जा कर कुछ बताता है।  तो भाई इतने से वाक्य से तो बिलकुल संभव नहीं है कि आप के इस प्रश्न का उत्तर दिया जा सके।

प को यही सलाह दी जा सकती है कि आप ने भले ही किसी न किसी महत्वपूर्ण और सच्चे आधार पर अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद चाहते हों और वह कितना ही सच्चा क्यों न हो, आप को अपने विरुद्ध मुकदमों को सावधानी और सतर्कता से लड़ना चाहिए। क्यों कि सजा तो हो ही सकती है।

उत्तराधिकार में प्राप्त किसी भी संपत्ति पर केवल प्राप्तकर्ता का ही अधिकार होगा, उस के पुत्र पुत्रियों का नहीं।

समस्या-

झाँसी, उत्तर प्रदेश से नीरज अग्रवाल पूछते हैं –

क्या माता से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति में बेटी का अधिकार होता है?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम दिनांक 17 जून 1956 से प्रभावी हुआ है। इस अधिनियम के प्रभावी होने के उपरान्त इस अधिनियम के अंतर्गत उत्तराधिकार में प्राप्त किसी भी संपत्ति पर केवल उत्तराधिकार में प्राप्त करने वाले व्यक्ति का ही अधिकार होता है अन्य किसी का नहीं।

स अधिनियम की धारा 14 के अनुसार किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की व्यक्तिगत संपत्ति होती है। इस कारण उस से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति भी संपत्ति को प्राप्त करने वाले की व्यक्तिगत संपत्ति होगी। धारा-15 की उपधारा (क) के अंतर्गत ही किसी को मातृपक्ष की संपत्ति प्राप्त हो सकती है। इस उपधारा में कहा गया है कि किसी स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति उस के पुत्र-पुत्रियों (और पूर्व मृत पुत्र पुत्रियों की संतानों) को प्राप्त होगी। इस में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि जीवित पुत्र पुत्रियों के पुत्र पुत्रियों को भी संपत्ति प्राप्त होगी।  इस कारण से माता या मातृ पक्ष से प्राप्त संपत्ति पर केवल संपत्ति प्राप्त करने वाले का ही अधिकार होगा। यह उस की स्वयं की संपत्ति होगी। उस में संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति के जीवित रहते उस के पुत्र पुत्रियों का कोई अधिकार नहीं होगा।

हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

समस्या-

सीवान, बिहार से पिंटू कुमार ने पूछा है –

क विधवा स्त्री बीमार है। वह अपनी संपत्ति किसी को लिखी नहीं है। साथ ह उस के कोई सन्तान नहीं है। उस के पति की मृत्यु के बाद सारे कर्मकाण्ड उस के पति के चचेरे भाई ने किए हैं। क्या संपत्ति पर उस के पति की विधवा बहिन की पुत्रवधु का हक जायज है कि विधवा स्त्री के भाई के पुत्र का दावा जायज है?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि यह विधवा स्त्री जीवित है अथवा उस का देहान्त हो चुका है।  आप के प्रश्न से प्रतीत होता है कि उक्त विधवा स्त्री का देहान्त हो चुका है और अब उस की संपत्ति पर विवाद है। खैर¡

किसी भी हिन्दू स्त्री की संपत्ति उस की अबाधित संपत्ति होती है। अपने जीवन काल में वह इस संपत्ति को किसी को भी दे सकती है, विक्रय कर सकती है या हस्तान्तरित कर सकती है।  यदि वह स्त्री जीवित है तो वह अपनी संपत्ति को किसी भी व्यक्ति को वसीयत कर सकती है।  जिस व्यक्ति को वह अपनी संपत्ति वसीयत कर देगी उसी को वह संपत्ति प्राप्त हो जाएगी। चाहे वह संबंधी हो या परिचित हो या और कोई अजनबी।

दि उस विधवा स्त्री का देहान्त हो चुका है तो हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-15 के अनुसार उस की संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी

1. किसी भी स्त्री की संपत्ति सब से पहले उस के पुत्रों, पुत्रियों (पूर्व मृत पुत्र-पुत्री के पुत्र, पुत्री) तथा पति को समान भाग में प्राप्त होगी। इस श्रेणी में किसी के भी जीवित न होने पर …

2. उस के उपरान्त स्त्री के पति के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।  पति का कोई भी उत्तराधिकारी जीवित न होने पर …

3. स्त्री के माता-पिता को प्राप्त होगी। उन में से भी किसी के जीवित न होने पर …

4. स्त्री के पिता के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी। उन में से भी किसी के जीवित न होने पर …

5. माता के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

क. किन्तु यदि कोई संपत्ति स्त्री को अपने माता-पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है तो स्त्री के पुत्र-पुत्री (पूर्व मृत पुत्र-पुत्री के पुत्र, पुत्री) न होने पर स्त्री के पिता के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

ख. यदि कोई संपत्ति स्त्री को पति से या ससुर से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है तो स्त्री के पुत्र-पुत्री (पूर्व मृत पुत्र-पुत्री के पुत्र, पुत्री) न होने पर उस के पति के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

प के मामले में केवल दो उत्तराधिकारियों पति की विधवा बहिन की पुत्रवधु एवं विधवा स्त्री के भाई के पुत्र का उल्लेख किया है। इन में से विधवा स्त्री के भाई का पुत्र तो निश्चित रूप से उस स्त्री के पिता का उत्तराधिकारी है जो कि चौथी श्रेणी का उत्तराधिकारी है। जब कि विधवा बहिन का पुत्र ही पति के चौथी श्रेणी के उत्तराधिकारियों में सम्मिलित है लेकिन विधवा बहिन की पुत्रवधु पति के किसी भी श्रेणी के उत्तराधिकारियों में सम्मिलित नहीं है। इस प्रकार उत्तराधिकार के क्रम में विधवा स्त्री के भाई का पुत्र ही उस विधवा स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकारी होगा।

*हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में पुरुष के उत्तराधिकारियों की अनुसूची यहाँ क्लिक कर के देखी जा सकती है।

जन्म से हिन्दू व मुस्लिम के मध्य विवाह कैसे साबित किया जा सकेगा?

समस्या-

मैं एक मुस्लिम लड़की के साथ विगत नौ वर्ष से रह रहा हूँ।  हम दोनों बिना विवाह किए सहमति से साथ साथ रह रहे थे।  जिस के कारण राशन कार्ड, और अन्य दस्तावेजों (पासपोर्ट, जीवन बीमा पॉलिसी, संतान के जन्म प्रमाण पत्र, उस के एम. कॉम. की अंक तालिका) में उस का नाम मेरी पत्नी के रूप में अंकित है।  अब मेरे एवं मेरे माता पिता पर उस ने धारा 498-ए, 294, 323, 34 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत मिथ्या प्रकरण दर्ज करवाया और हमें 12 दिन तक जेल में रहना पड़ा।  उस ने धारा 125 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत भरण पोषण के लिए भी मुझ पर प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया है।  सभी प्रकरण न्यायालय में लंबित हैं।  पुलिस ने दबाव दे कर मेरा बयान लिख लिया कि वह मेरी पत्नी है।  हमारे विवाह का कोई अन्य प्रमाण नहीं है।  क्या पुलिस द्वारा दबाव में दर्ज किए गए बयान को आधार मान कर न्यायालय द्वारा धारा 125 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत अन्तरिम आदेश दिया जा सकता है?

-अनुतोष, भिलाई, छत्तीसगढ़

समाधान-

स्त्री पुरुष के बीच पति-पत्नी का संबंध विवाह से उत्पन्न होता है तथा विवाह प्राकृतिक नहीं अपितु एक सामाजिक और विधिक संस्था है।  आप एक हिन्दू हैं और वह स्त्री जिस ने आप के विरुद्ध स्वयं को आप की पत्नी बताते हुए मुकदमे किए हैं एक मुस्लिम है।  आप दोनों के मध्य वैवाहिक संबंध या तो विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह के सम्पन्न होने और उस का पंजीकरण होने से स्थापित हो सकता है या फिर आप के इस्लाम ग्रहण करने पर मुस्लिम विधि के अनुसार निक़ाह के माध्य़म से हो सकता है अथवा उस महिला द्वारा मुस्लिम धर्म त्याग कर हिन्दू धर्म की दीक्षा लेने पर सप्तपदी के माध्यम से हो सकता है।  उस महिला को स्वयं को आप की पत्नी साबित करने के लिए यह प्रमाणित करना होगा कि इन तीन विधियों में से किसी एक के माध्यम से आप के साथ उस का विवाह संपन्न हुआ था।  जो तथ्य आप ने अपने प्रश्न में अंकित किए हैं उन से ऐसा प्रतीत होता है कि वह स्वयं को आप की पत्नी सिद्ध नहीं कर सकती।

धारा-125 दं.प्र.संहिता में पत्नी को भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है लेकिन उस का पुरुष के साथ वैध रूप से विवाहित होना भी आवश्यक है। इस धारा में पत्नी शब्द को आगे व्याख्यायित करते हुए उस में ऐसी पत्नी को सम्मिलित किया गया है जिस का विवाह पति के साथ विच्छेद हो गया है और जिस ने पुनः विवाह नहीं किया है।  इस से भी स्पष्ट है कि केवल विधिक रूप से विवाहित स्त्री ही धारा-125 के अन्तर्गत भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी है।  इस धारा के अन्तर्गत किसी भी ऐसी स्त्री को अपने उस पुरुष साथी से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार नहीं है जो उस के साथ स्वैच्छा से लिव-इन-संबंध में रही है और जिस संबंध से एक या एकाधिक संतानें उत्पन्न हुई हैं। इस तरह वह महिला आप से भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

लेकिन आप के प्रश्न से पता लगता है कि आप दोनों के लिव-इन-संबंध से एक या एकाधिक संतानें हैं। ऐसी किसी भी संतान के लिए आप पिता हैं और वह स्त्री माता है। ऐसी वैध या अवैध अवयस्क संतान को जो कि स्वयं का भरण पोषण करने में असमर्थ है अपने पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार धारा-125 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत है।  आप के साथ लिव-इन-संबंध से उस स्त्री द्वारा जन्म दी गई संतान को भी आप से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। अवयस्क अपने संरक्षक के माध्यम से ऐसा आवेदन कर सकता है।  यदि उस स्त्री ने जो आवेदन धारा-125 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत आप के विरुद्ध प्रस्तुत किया है उस में उस संतान के लिए भी भरण-पोषण की मांग की गई है तो न्यायालय द्वारा उस संतान के लिए भरण पोषण राशि दिलाया जाना  निश्चित है।  इस के लिए आप को तैयार रहना चाहिए।

प के प्रश्न का सार है कि पुलिस द्वारा दबाव में लिए गए बयान के आधार पर क्या वह स्त्री पत्नी सिद्ध की जा सकती है।  तो ऐसा बहुत सारे तथ्यों और उस प्रकरण में आई मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पर निर्भर करता है।   यदि आप ने उक्त मामले में यह कहा है कि आप का यह बयान दबाव में लिया गया था तो फिर आप पर यह साबित करने का दायित्व आता है कि पुलिस ने आप पर दबाव डाला था।   यदि आप यह साबित कर पाए कि पुलिस ने ऐसा बयान देने के समय दबाव डाला था या आप पुलिस हिरासत में थे तो ही आप के उस बयान को साक्ष्य के बतौर प्रयोग नहीं किया जा सकता।  लेकिन पुलिस ने पहले बयान दर्ज किया होगा और बयान दर्ज करने के बाद आप की गिरफ्तारी दिखाई होगी।  आप के इस का प्रश्न का समुचित उत्तर समस्त साक्ष्य का अध्ययन किए बिना किया जाना संभव नहीं है।  पर मेरा मानना है कि यदि प्राथमिक तौर पर यह साक्षय रिकार्ड पर हो कि वह स्त्री जन्म से मुस्लिम है और आप जन्म से हिन्दू हैं तो फिर जब तक दोनों में से किसी एक के धर्म परिवर्तन या फिर विशेष विवाह अधिनियम में विवाह का पंजीकरण साबित किए बिना आप दोनों को पति-पत्नी साबित किया जाना संभव नहीं है।

स्त्री को नारी निकेतन भेजने के आदेश को सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दें

समस्या-

मेरे मित्र ने घरवालों की मर्जी के खिलाफ निकाह किया था तो लडकी वालों ने 363 366 धाराओं में मुकदमा लिखा दिया। लडकी जब एसपी के पास अपनी बात कहने गयी तो उसे अरेस्‍ट करा दिया। हमारे पास लडकी की उम्र के प्रमाण के रूप में उसकी वोटर आईडी, उसका जन्‍म प्रमाण पत्र व सीएमओ द्वारा जारी आयु प्रमाण पत्र हैं जिसमें लडकी 19 वर्ष की है। लडकी वालों के पास उसकी आठवीं की टीसी है जिसमें वो 17 साल की है। 164 का बयान लडके के पक्ष में है। तब भी मजिस्‍ट्रेट ने उसे नाबालिग मानते हुये नारी निकेतन भेज दिया। क्‍या इस मामले में हम कुछ कर सकते हैं? मजिस्‍ट्रेट के इस आदेश को क्‍या हम चैलेन्‍ज कर सकते हैं? यदि हां तो कहां?

-पुनीत कुमार, कानपुर, उत्तर प्रदेश

समाधान-

हो सकता है कि लड़की वयस्क हो चुकी हो। लेकिन मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने और 164 दंडप्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उस के बयान लिए जाने के उपरान्त जब लड़की की अभिरक्षा का प्रश्न न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुआ तो उस के पास चार प्रमाण थे। तीन उसे वयस्क बता रहे थे और एक उसे अवयस्क बता रहा था। इन चारों प्रमाणों में समय के हिसाब से जन्म प्रमाण पत्र के अतिरिक्त सभी प्रमाण कक्षा आठ की अंकतालिका के बाद के थे। जन्म प्रमाण पत्र भी हो सकता है बाद की तिथि का बना हुआ हो। इस तरह बाद की तिथि के बने हुए प्रमाणों पर यह संदेह होना स्वाभाविक है कि वे अस्वाभाविक रीति से निर्मित किए गए हों। यहाँ चारों ही प्रमाण अप्राणित भी हैं। इस तरह मजिस्ट्रेट द्वारा लड़की को निरपेक्ष संरक्षा में भेजने का निर्णय उचित ही है। अब न्यायालय स्वयं चिकित्सा अधिकारी को बोर्ड बैठा कर लड़की की उम्र के बारे में राय देने को कह सकता है।

जिस्ट्रेट के किसी भी आदेश को सत्र न्यायालय के समक्ष धारा 399 दं.प्र.संहिता तथा उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 401 के अतर्गत चुनौती दी जा सकती है। कोई भी प्रावधान न होने पर उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 482 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। आप अपने यहाँ वकील से राय कर के उक्त उपायों में से जो भी उपाय स्थानीय परिस्थितियों में उपयुक्त प्रतीत हो उस का उपयोग कर सकते हैं।

बहिन गलत व्यक्ति से विवाह करना चाहती है तो उसे प्रेम और युक्ति से समझाएँ

समस्या-

मेरी बहिन एक लड़के के चक्कर में है और उस से शादी करना चाहती है। लेकिन मेरे पिताजी सहमत नहीं हैं, क्यों कि लड़का यह विवाह धन के लालच में करना चाहता है। वह मेरे पिताजी की इज्जत भी नहीं करता है।  वह मेरी बहिन से दो बार पैसे भी निकलवा चुका है और तो और सोने की दो अंगूठी भी उस ने मेरी बहन से मंगवा कर रख ली। लेकिन हम ने किसी तरह उस से वापस ले ली। हम अपनी बहिन को खूब समझा चुके हैं लेकिन वह नहीं समझती है और धमकी देती है कि वह आत्महत्या कर लेगी। पिताजी उस लड़के को अच्छी तरह जानते हैं और जानते हुए वे उस के साथ बहिन का विवाह उस ल़ड़के से कर अपनी बेटी का भविष्य खराब नहीं कर सकते। पिता जी ने बहिन से यह भी कहा कि वह उस से ही विवाह करना चाहती है तो वह घर छोड़ कर विवाह कर सकती है। यदि भविष्य में कोई अनहोनी होती है तो हम पर कोई कानूनी कार्यवाही तो नहीं होगी।

-दिवाकर, सोनीपत, हरियाणा

समाधान-

प की बहिन वयस्क है और उसे यह अधिकार है कि वह अपने इच्छित पुरुष के साथ विवाह कर ले।  कोई भी उस की इच्छा के विरुद्ध जबरन उसे विवाह करने को बाध्य भी नहीं कर सकता। यदि आप और आप के पिता जी यह समझते हैं कि वह लड़का उस के लिए उपयुक्त साथी नहीं हो सकता तो आप का कर्तव्य है कि आप किसी तरह अपनी बहिन को समझाएँ। आप के प्रश्न से ऐसा लगता है कि आप के पिता जी और आप ने अपनी बहिन को समझाने का जो तरीका अपनाया है वह उचित नहीं है। जब आप लोगों को पता लगा कि बहिन किसी लड़के से विवाह करना चाहती है तो उस से नाराजगी का व्यवहार किया और डाँटा डपटा। किसी लड़की को समझाने का यह तरीका बिलकुल उचित नहीं है। आप को और आप के सभी परिजनों को बहन के साथ अत्यन्त प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए था और उसे कहना चाहिए था कि आप लोगों को उस के इस विवाह से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन लड़का जीवन भर तक उस का अच्छा जीवनसाथी नहीं बन सकता। इस के लिए आप अपनी बहिन से उस लड़के की परख करने के लिए कह सकते थे। मुझे लगता है कि आप अब भी अपनी बहिन को स्नेह के साथ समझाएंगे तो वह लड़के को परखने के लिए तैयार हो जाएगी। इस के लिए आप यह भी कर सकते हैं कि बहिन को ऐसा नाटक करने के लिए राजी कर सकते हैं जिस से उस लड़के को लगे कि वह किसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त है या और कोई तरीका अपना सकते हैं जिस से लड़के की परीक्षा की जा सके। यदि लड़का उन परिक्षाओं में खरा नहीं उतरता है तो आप की बहिन उस लड़के से अपना संबंध समाप्त भी कर सकती है।

फिर भी यदि आप की बहिन उस लड़के के साथ विवाह करने के लिए जिद पर है तो कोई मार्ग नहीं रह जाता जिस से उसे रोका जा सके। आप को और आप के परिवार को उस लडके को बुला कर कहना चाहिए कि वे आप इस विवाह से सहमत नहीं हैं। लेकिन विवाह में बाधक भी नहीं बनना चाहते। ऐसी स्थिति में दोनों जैसे भी चाहें विवाह कर लें, लेकिन यह स्पष्ट कर दें कि आप का परिवार इस विवाह में दहेज या उपहार के रुप में कुछ भी नहीं देगा। यह भी स्पष्ट कर दें कि परिवार के पास जो भी संपत्ति है वह भी संयुक्त न हो कर पिता जी की  या आप की व्यक्तिगत संपत्ति है और आप की बहिन का उस संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं है और आप सभी लोग अपने उत्तराधिकार से भी उसे वंचित कर रहे हैं। यदि वह लड़का केवल धन के लिए ही आप की बहिन से विवाह करना चाहता है तो वह यह विवाह नहीं करेगा और आप की बहन का पीछा छोड़ देगा। वैसी स्थिति में आप अपनी बहिन को अन्यत्र विवाह करने के लिए रजामंद कर सकते हैं।

दि आप की बहन फिर भी उस लड़के के साथ विवाह करती है तो वे आप के और आप के पिता के विरुद्ध किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं कर सकेंगे। आप की बहन को अपने माता पिता से उत्तराधिकार में कुछ मिलना चाहिए या नहीं यह आप दोनों का भविष्य का व्यवहार देख कर तय कर सकते हैं।

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