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कृषि भूमि के बँटवारे का वाद प्रस्तुत कराएँ।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

विक्की ने नागौर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मृत्यु १९९७ में होने के बाद मेरे पिताजी एवं मेरे ताउजी जो की दो ही संतान थी बंटवारा करते समय एक असिचिंत खेत लगभग १० बीघा है का भी सहमति से बिना नाप बंटवारा किया गया बाद में सीमा ज्ञान कराने पर पता चला की ताउजी के पास कुछ हिस्सा लगभग १ बीघा ज्यादा है अब वो नाप में बराबर नहीं करवाना चाहते कहते हैं कि यही सही है। अब हमें सलाह दें कि बिना उनके राजीनामा के यह नाप अनुसार बंटवारा करा सके किस न्यायलय में आवेदन करना होगा?

समाधान-

प की कृषि भूंमि का जो बंटवारा हुआ है वह या तो मौखिक है या लिखित है तो भी पंजीकृत नहीं। हो सकता है आप के पिता जी और ताऊजी के नाम नामान्तरण हो गया हो लेकिन रिकार्ड में बँटवारा नहीं हुआ होगा। यदि ऐसा है तो आप को बँटवारे के लिए न्यायालय के समक्ष वाद संस्थित करना होगा।

प को एसडीएम या एसीएम कोर्ट में बँटवारे का वाद संस्थित करना पड़ेगा जिस में आप को यह आवेदन करना होगा कि बराबर हिस्से किए जाएँ और दोनों को भूमि का नाप कर के उन के हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाया जाए।

अतिक्रमी ने बुआई को बिखेर दिया है, स्थाई उपाय क्या है?

समस्या-

किसी ने हमारी कृषि भूमि पर अतिक्रमण कर रखा था।  तहसीलदार द्वारा म.प्र. भू-राजस्व अधिनियम की धारा 250 के अंतर्गत बेदखली का आदेश हुआ और मौके पर कब्जा हमें दिला दिया गया।  अतिक्रमी रोज गाली-गलौच करते हैं।  हम ने फसल बोई तो उन्हों ने बिखेर दी।  तहसीलदार और पुलिस को कहा तो उन्हों ने हमें ही हिम्मत दिखाने को कहा।  अतिक्रमणकारी पर पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की।  कोई स्थाई समाधान बताएँ।

-देवेन्द्र चौहान, भोपाल, मध्यप्रदेश

समाधान-

भूमि आप की थी फिर भी उस पर अतिक्रमण किसी अन्य ने कर लिया और वे खेती करते रहे।   इस का स्पष्ट अर्थ  है कि पहले आप की कमजोरी रही होगी।   फिर आप ने मुकदमा किया और जीत गए।  सरकार ने अदालत के आदेश से आप को कब्जा दिला दिया।  अब वैधानिक रूप से आप का कब्जा है और आप उस भूमि में खेती कर रहे हैं।  आप के खेती करने के लिए फसल की बुआई की।  जिसे पूर्व अतिक्रमी ने बिखेर दिया।  अतिक्रमी समझता है कि आप कमजोर हैं, आप ने अदालत और सरकारी मशीनरी के बल पर कब्जा ले तो लिया है लेकिन खेती कैसे करेंगे?  इसी कारण वह आप की खेती में बाधाएँ उत्पन्न कर रहा है और उस ने आप की बुआई को नष्ट कर दिया।

स तरह किसी दूसरे के खेत में घुस कर बुआई को नष्ट करना अपराध है लेकिन वह इतना गंभीर नहीं कि उस में पुलिस स्वयं कार्यवाही कर सके।  वास्तव में अतिक्रमी ने आप की भूमि पर अपराधिक अतिचार का अपराध किया है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 447 के अंतर्गत तीन माह तक के कारावास और पाँच सौ रुपए तक के अर्थदंड से दंडनीय है, इस के अतिरिक्त उस ने आप की बुआई नष्ट कर के रिष्टि अर्थात किसी संपत्ति का नाश किया है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 426 के अंतर्गत तीन माह के कारावास और जुर्माने से दंडनीय अपराध है। लेकिन दोनों ही अपराध संज्ञेय अपराध नहीं है और पुलिस इन दोनों अपराधों में कार्यवाही नहीं कर सकती।

न दोनों ही अपराधों में अतिक्रमी के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए आप को सीधे अपराधिक न्यायालय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत करना पड़ेगा, अपना तथा गवाहों के बयान कराने पड़ेंगे इस के बाद न्यायालय उस मामले में प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्तों के विरुद्ध मुकदमा चलाएगा।  आप को यह करना ही होगा, इसी से आप का अतिक्रमियों पर दबाव बनेगा।  जब तक आप अतिक्रमियों की हर एक हरकत के लिए उन के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करेंगे तब तक वे काबू में नहीं आएंगे।  जब वे देखेंगे कि आप उन की हर हरकत के लिए शिकायत करते हैं और कार्यवाही करते हैं और उस से बचना कठिन है तो ही वे शान्त हो कर बैठेंगे।

चूंकि आप भू-स्वामी हैं और वैधानिक रूप से कब्जा भी आप का ही है,  इस कारण आप राजस्व न्यायालय में अतिक्रमियों के विरुद्ध इस आशय का स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत करें कि अतिक्रमी आप के द्वारा खेती करने में बाधा उत्पन्न न करें।  इसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन प्रस्तुत करें और अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करें।  इस से अतिक्रमियों द्वारा कोई भी बाधा उत्पन्न करने पर आप उन के विरुद्ध निषेधाज्ञा के उल्लंघन के लिए कार्यवाही कर सकेंगे और अतिक्रमियों को बाधा उत्पन्न करने के पहले सोचना पड़ेगा।

उत्तरप्रदेश में कृषि भूमि पर उत्तराधिकार की विधि

तीसरा खंबा को अक्सर यह प्रश्न मिलता रहा है कि माता-पिता की संपत्ति के उत्तराधिकार में पुत्री की स्थिति क्या है। उत्तराधिकार का प्रश्न सदैव व्यक्ति की व्यक्तिगत विधि से शासित होता है। जो हिन्दू हैं उन का उत्तराधिकार हिन्दू विधि से तथा अन्य धर्मावलंबियों का उत्तराधिकार उन की व्यक्तिगत विधि से शासित होता है। परंपरागत हिन्दू विधि में विवाहित पुत्री माता-पिता की उत्तराधिकारी नहीं माना गया था। लेकिन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में पुत्री के इस अधिकार को स्वीकार किया गया। वर्तमान स्थिति यह है कि एक हिन्दू माता-पिता की पुत्री को अपने माता-पिता की संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए पुत्रों के समान ही अधिकार प्राप्त हैं। कृषि भूमि के संबन्ध में सभी राज्यों में वैसी स्थिति नहीं है। कृषि भूमि राज्यों का विषय है और समस्त कृषि भूमि को राज्य की संपत्ति माना गया है। कृषक को कृषि भूमि पर कृषि करने मात्र का अधिकार होता है जिसे सांपत्तिक अधिकार न मान कर ऐसा अधिकार माना गया है जैसा कि किसी अन्य स्थावर संपत्ति के मामले में किराएदार को होता है। इस कारण से कृषि भूमि पर कृषक के अधिकार का उत्तराधिकार राज्य में कृषि भूमि से संबन्धित कानून से शासित होता है। 
कानूनी सलाह के लिए अधिकांश प्रश्न उत्तर प्रदेश राज्य से प्राप्त हुए हैं। उत्तर प्रदेश राज्य में कृषि भूमि का उत्तराधिकार उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 सेशासित होता है। इस अधिनियम के प्रावधानों का आधार उत्तराधिकार की परंपरागत हिन्दू विधि जिस में स्त्रियों को अत्यन्त सीमित अधिकार प्राप्त थे तथा 1937 में पारित हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम है।  यह विधि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 द्वारा संहिताबद्ध विधि से पिछड़ी हुई विधि है। हालाँकि कृषि भूमि के उत्तराधिकार के संबंध में उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस विधि मेंलगातार संशोधन होते रहे हैं। इस विधि में पहले प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में अविवाहित पुत्री सम्मिलित नहीं थी। लेकिन अब 2008 में किए गए संशोधन से उसेप्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में सम्मिलित कर लिया गया है जो 1 सितंबर 2008 से प्रभावी हुआ है।
स अधिनियम के अनुसार किसी पुरुष भूमिधर जिस ने अपनेजीवनकाल में अपनी भूमि के सम्बन्ध में कोई वसीयत नहीं की है उस की भूमि काउत्तराधिकार उत्तरप्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 की धारा 171 से शासितहोता है। इस धारा की उपधारा (2) में कई खंडों की एक सूची दी हुई है। सब से पहले इससूची के (क) खंड में सम्मिलित किए गए नातेदारों को मृतक भूमिधर की भूमि समान भागोंउत्तराधिकार में प्राप्त होती है। यदि (क) खंड में सम्मिलित कोई भी नातेदार जीवितनहीं है तो संपत्ति (ख) खंड में सम्मिलित किए गए नातेदारों को समान रूप से प्राप्तहोती है। यदि (ख) खंड में सम्मिलित कोई भी नातेदार जीवित नहीं है तो संपत्ति (ग) खंड में सम्मिलित किए गए नातेदारों को समान रूप से प्राप्त होती है। इसी तरह की उत्तरवर्ती व्यवस्था आगे के खंडों के लिए की गई है

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 में एक पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह संभव नहीं रह गया है लेकिन उस के पहले विवाहित व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियाँ होना संभव है। उन के लिए इस धारा में यह व्यवस्था की गई है कि उन सभी विधवाओं को मिल कर एक अंश प्राप्त होगा तथा वे उस एक वंश में से समान भाग उत्तराधिकार में प्राप्त करेंगी। विधवा या विधवा माता या अन्य कोई विधवा जो इस सूची के अनुसार उत्तराधिकारी पायी जाती है तो भी उस का अधिकार तभी तक रहेगा जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है।

क्त उपबंधों के अधीन धारा 171 की उपधारा (2) में दी गई अनुसूची निम्न प्रकार है –

 

(क)      विधवा, अविवाहिता पुत्री, तथा पुंजातीय वंशज प्रतिशाखा के अनुसार :- परन्तु यह कि पूर्व मृत पुत्र की विधवा और पुत्र को, चाहे वह जितनी भी नीचे की पीढ़ी में हो प्रतिशाखा के अनुसार वह अंश उत्तराधिकार में मिलेगा जो पूर्व मृत पुत्र को, यदि वह जीवित होता, मिलता;

{खंड (क) में अविवाहिता पुत्री को 2008 में हुए संशोधन से सम्मिलित किया गया है जो दिनांक 1 सितम्बर 2008 से प्रभावी हुआ है।}

 (ख)     माता और पिता;

(ग)      (//////////); (यह भाग इस स्थान से विलुप्त कर दिया गया है)

(घ)      विवाहिता पुत्री;

(ङ)      भाई और अविवाहिता बहिन जो क्रमशः एक ही मृत पिता के पुत्र और पुत्री हों; और पूर्व मृत भाई का पुत्र, जब पूर्व मृत भाई एक ही मृत पिता का पुत्र हो;

(च)      पुत्र की पुत्री;

(छ)      पितामही और पितामह;

(ज)      पुत्री का पुत्र;

(झ)      विवाहिता बहिन;

(ञ)     सौतेली बहिन, जो एक ही मृत पिता की पुत्री हो;

(ट)      बहिन का पुत्र;

(ठ)      सौतेली बहिन का पुत्र, जब सौतेली बहिन एक ही मृत पिता की पुत्री हो;

(ड)      भाई के पुत्र का पुत्र;

(ढ)      नानी का पुत्र;

(ण)      पितामह का पौत्र 

 किसी भी पुरुष भूमिधर की मृत्यु के उपरांत मृतक की विधवा, अविवाहिता पुत्री तथा उस के पुत्र एक समान अंश के अधिकारी होंगे। यदि किसी पुत्र का पूर्व में ही देहान्त हो चुका है तो उस की विधवा और पुत्र को समान उस का अंश प्राप्त होगा। यदि इन में से कोई भी जीवित नहीं हो तो ही खंड (ख) में सम्मिलित किए गए उत्तराधिकारियों को समान अंश प्राप्त होंगे। इस तरह हम देखते हैं कि कृषिभूमि पर अविवाहिता पुत्री को पुत्र के समान ही उत्तराधिकार का अधिकार 2008 के संशोधन से प्राप्त हो गया है। लेकिन यह संशोधन दिनांक 1 सितम्बर 2008 से प्रभावी होने के कारण जिस पुत्री के पिता का देहान्त उक्त तिथि के पूर्व हो चुका हो उसे यह अधिकार प्राप्त होगा या नहीं इस संबंध में उसे किसी स्थानीय अधिवक्ता से सलाह करनी चाहिए।

राजस्थान में कृषिभूमि का नामान्तरण

 झुन्झुनू, राजस्थान से विनोद कुमाँवत ने पूछा है –

मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेने के उपरान्त कृषि भूमि के नामान्तरण के लिए किस राजस्व अधिकारी को आवेदन करना होगा और  नामान्तरण दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है। 
 उत्तर –

विनोद जी,

भारत के संविधान के अनुसार भूमि प्रबंधन राज्य का विषय है। इस कारण से इस सम्बन्ध में देश के प्रत्येक राज्य  के लिए अलग अलग कानून और नियम हैं। आप राजस्थान के निवासी हैं। इस कारण से आप को राजस्थान के कानून और नियमों के अनुसार ही प्रक्रिया अपनानी होगी। राज्य में  नगरीय भूमि, आबादी भूमि, उद्योगों के लिए आवंटित भूमि तथा वन भूमि के अतिरिक्त जितनी भी भूमि है वह सब राजस्व विभाग के नियंत्रण में है। समस्त भूमि की स्वामी राज्य सरकार है। कृषक को उस भूमि पर केवल उपयोग के अधिकार प्राप्त हैं।  कृषक की हैसियत किसी भी कृषि भूमि पर एक किराएदार जैसी है, जिस के लिए उसे सरकार को वार्षिक रूप से लगान भी अदा करना होता है। राज्य के राजस्व विभाग का सब से निचली पायदान का अधिकारी पटवारी है। एक कृषक को अपने खाते की कृषि भूमि से संबंधित किसी भी कार्य के लिए अपने क्षेत्र के पटवारी से संपर्क करना चाहिए। कृषकों की अधिकांश समस्याओं का समाधान पटवारी कर देता है। इस संबंध में ग्रामीण क्षेत्र में एक किस्सा प्रचलित है; “कोई नौजवान राजस्व अधिकारी गांव के दौरे पर गया। कृषकों से उसने मधुर व्यवहार किया। ग्रामीण ने पूछा आप कौन से अधिकारी हैं, तो उस ने बताया कि वैसे तो मैं तहसीलदार हूँ, लेकिन आप का तो बच्चा जैसा हूँ। ग्रामीण बहुत प्रसन्न हुआ और उस ने उसे अपने बेटे जैसा समझते हुए आशीष दी कि “तुम बहुत अच्छे हो, भगवान तुम्हें तरक्की दे और जल्दी ही पटवारी बनाए।” इस किस्से से जाना जा सकता है कि पटवारी ग्रामीण किसानों के लिए कितना महत्वपूर्ण अधिकारी है। 
दि किसी भी प्रकार से किसी कृषक का खातेदारी अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित हो जाए तो राजस्व अभिलेख में उस हस्तान्तरण को दर्ज किए जाने को नामान्तरण कहा जाता है। खातेदारी अधिकारों को व्यक्तिगत संपत्ति के समान समझा गया है और वे उन सब रीतियों से हस्तान्तरित हो सकते हैं जिन से संपत्ति हस्तान्तरित हो सकती है । जैसे कोई कृषि भूमि पर अपने खातेदारी अधिकारों को विक्रय कर के, दान कर के, उसे ट्रस्ट कर के या अन्य रीति से हस्तान्तरित कर सकता है। राजस्थान में कृषि भूमि पर खातेदारी अधिकार को अचल संपत्ति के समान माना गया है और किसी व्यक्ति के देहान्त पर उत्तराधिकार की विधि के अनुसार उत्तराधिकारियों को खातेदारी अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस तरह मृत खातेदार कृषक के अधिकार उस की मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों को हस्तान्तरित हो जाते हैं। केवल इस हस्तान्तरण को राजस्व अभिलेख में दर्ज करना होता है। इस के लिए जिस व्यक्ति को किसी भी प्रकार से खातेदारी अधिकार हस्तान्तरित हुए हों उसे अविलम्ब राजस्व विभाग में आवेदन आवश्यक दस्तावेजों सहित प्रस्तुत करना चाहिए।
राजस्थान में नामान्तरण दर्ज करने के लिए आवेदन समस्त आवश्यक दस्तावेजों सहित तहसीलदा

कृषक के देहान्त पर कृषि भूमि के खाते में उत्तराधिकारियों के नाम दर्ज करवाने के लिए नामान्तरण कराएँ

 अनिल चाहर ने पूछा है – 
मेरे पिताजी और चाचा जी के नाम चार-चार बीघा कृषि जमीन है। .चाचा जी का एक पुत्र है ,और हम लोग तीन भाई हैं।  हम लोगों को कृषि से कोई मतलब नहीं है। हम तीनों भाई नौकरी करते हैं।  हमारा खेत भी चाचा जी ही करते हैं।  मैं  ये जानना चाहता हूँ कि क्या पिताजी की म्रत्यु के पश्चात खेत की रजिस्टरी दोबारा करवाना हमारी जिम्मेदारी है? अगर जिम्मेदारी है तो मृत्यु के कितने दिन बाद रजिस्ट्री करवाना जरूरी है? क्या इस पर स्टाम्प ड्यूटी भी लगेगी? स्टाम्प ड्यूटी रजिस्टरी के कितने दिन बाद दी जाती है? और स्टाम्प ड्यूटी की पेनाल्टी क्या है? 
 उत्तर –

अनिल जी,
किसी भी कृषि भूमि का स्वामी सरकार होती है। कृषक सिर्फ कृषक होता है, वह एक तरह से उस भूमि पर किराएदार होता है। जो लगान दिया जाता है वह उस भूमि का वार्षिक किराया होता है। वह खातेदार कृषक या गैरखातेदार कृषक हो सकता है। खातेदार कृषक अपनी भूमि को किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय या अन्य प्रकार से हस्तांतरित कर सकता है।  आप के द्वारा दिए गए विवरण से यह तो पता लगता है कि आप के पिता और चाचा जी के खाते में चार-चार बीघा कृषि भूमि है। लेकिन यह पता नहीं लगता है कि यह भूमि एक ही खाते में है अथवा दो पृथक पृथक खातों में। यदि यह भूमि आप के दादा जी से उत्तराधिकार में मिली होगी तो 8 बीघा भूमि का सम्मिलित खाता होगा जिस में  दोनों भाई आधे-आधे के हकदार होंगे। क्यों कि पूरी भूमि पर चाचाजी ही कृषि करते रहे हैं इस कारण वह खाता अलग अलग हो कर भूमि अलग अलग चिन्हित भी नहीं हुई होगी। यदि चाचा जी और पिताजी ने उक्त भूमि एक ही विक्रय पत्र से खरीदी होगी तो भी  उस का खाता सम्मिलित ही होगा।
दो या अधिक सम्मिलित खातेदार कृषकों में से किसी एक का देहान्त होते ही खातेदार कृषक की व्यक्तिगत विधि के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को उस भूमि में हित प्राप्त हो जाते हैं। उत्तराधिकारियों को केवल खाते में  नामान्तरण दर्ज करना होता है, अर्थात खाते में कृषक की मृत्यु होने के उपरान्त उस के उत्तराधिकारियों के नाम दर्ज किए जाते हैं। इस कार्य के लिए विहित राजस्व अधिकारी को कृषक के देहान्त की सूचना देनी होती है जिस के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र के साथ एक आवेदन देना पर्याप्त होता है। इस सूचना के साथ ही यह सूचना भी देनी होती है कि मृतक खातेदार कृषक के कौन-कौन उत्तराधिकारी हैं? नामान्तरण दर्ज करने वाला अधिकारी जाँच करता है कि क्या खातेदार कृषक की मृत्यु की सूचना वास्तविक है और उस के कौन कौन उत्तराधिकारी हैं। जाँच के उपरान्त वह खातेदार कृषक के उत्तराधिकारियों के नाम मृतक खातेदार कृषक के स्थान पर खाते में दर्ज कर देता है। इस सारी प्रक्रिया को नामान्तरण कहते हैं। जैसे ही नामान्तरण दर्ज होता है राजस्व रिकार्ड में उस के उत्तराधिकारी मृत खातेदार कृषक का स्थान ले लेते हैं। 
प को भी यही करना है। आप के र

क्या कृषि भूमि की किराएदारी के लिए कलेक्टर की अनुमति जरूरी है?

 देवेन्द्र जैसवाल ने पूछा है – – –
मैं ने खादी ग्रामोद्योग के माध्यम से ऋण स्वीकृत कराया है। इस में जिस स्थान पर उद्योग संचालित होगा वह एक आदिवासी से किराए पर ली है तथा किरायानामा लिखवा कर उसे नोटेरी से तस्दीक कराया गया है। अब ऋण देने वाला स्टेट बैंक कहता है कि नोटेरी से तस्दीक शुदा किरायानामा नहीं चलेगा, कलेक्टर की अनुमति चाहिए जब कि जिस की जमीन है उसी ने किराए पर दी है, वह विक्रय नहीं कर रहा है। तो क्या किराएनामे पर कलेक्टर साहब की अनुमति लेना आवश्यक है? और क्या कलेक्टर साहब अनुमति दे देंगे?   
 
 उत्तर – – –
जैसवाल जी, 
प का प्रश्न बहुत अधूरा है। आप ने यह नहीं बताया है कि आप किस तरह का उद्योग चलाना चाहते हैं और जिस जमीन को किराए पर लिया गया है वह किस किस्म की है? लेकिन हमारा अनुमान है कि जिस भूमि को आपने किराए पर लिया है वह कृषि भूमि है और आदिवासी की कृषि भूमि के संबंध में ऐसे कानून हैं कि उसे किसी गैर आदिवासी को विक्रय नहीं किया जा सकता है। 
वास्तव में जब हम कृषि भूमि के विक्रय की बात करते हैं तो यह समझा जाता है कि हम उस के मालिक हैं और हम उसे किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय कर दिया है। कभी भी कोई कृषक किसी भूमि का मालिक नहीं होता और समस्त कृषि भूमि पर राज्य का स्वामित्व होता है, कृषक को उस पर केवल खेती करने का अधिकार होता है। इस अधिकार के बदले कृषक राज्य को लगान देता है।  अब जिस भूमि पर आप कृषि कर रहे हैं उसे कृषि कार्य के लिए तो आप बटाई आदि पर दे सकते हैं लेकिन यदि उसी भूमि को खेती के अलावा किसी अन्य कार्य के लिए किराए पर दिया जाता है तो निश्चित रूप से उस भूमि के मालिक की अनुमति की आवश्यकता होगी। क्यों कि आप मूल स्वामी की अनुमति के बिना कृषि उपयोग के लिए दी गई भूमि का अन्य उपयोग नहीं कर सकते। ऐसी स्थिति में किरायानामा तभी वैध माना जाएगा जब कि उस के साथ अन्य उपयोग के लिए मूल स्वामी की अनुमति प्राप्त हो। 
लेक्टर राज्य सरकार के प्रतिनिधि के रूप में उस भूमि का अन्य कार्य के लिए उपयोग करने की अनुमति प्रदान करने में सक्षम है और उस के लिए नियम बने हुए हैं। आप इन नियमों की जानकारी कलेक्टर कार्यालय में जा कर कर सकते हैं। आप को चाहिए कि आप उक्त भूमि पर खादी ग्रामोद्योग संबंधी कार्य करने की अनुमति प्राप्त करने का आवेदन प्रस्तुत करें और उस के साथ  किराएनामे की प्रति संलग्न करें। यदि खादी ग्रामोद्योग संबंधी कार्यो के लिए कृषि भू्मि के उपयोग की अनुमति देना क
ानून के अनुसार होगा तो कलेक्टर से आप को अनुमति प्राप्त हो जाएगी। इस संबंध में खादी ग्रामोद्योग वाले और बैंक अधिकारी आप की मदद कर सकते हैं। आप उन से परामर्श ले कर कार्य करें।

   

रिसीवर नियुक्त होने पर कृषिभूमि खाली नहीं रह सकती

विजय कुमार पूछते हैं —–

मेरे पिताजी चार भाई हैं, चारों भाइयों में जमीनी विवाद चल रहा है। विवाद के चलते मेरे पिताजी ने एसडीएम से प्रार्थना कर के धारा 145/146 दं.प्र.संहिता की कार्यवाही करवाई है जिस के अंतर्गत तहसीलदार को भूमि का रिसीवर नियुक्त कर दिया है।  उसी भूमि में हमारा घर है जो कि धारा 145/146 से मुक्त है। तहसीलदार हर छह माह बाद उस भूमि की कृषिकार्य हेतु नीलामी करता है।  मेरे चाचा तीसरे पक्ष से मिल कर सर्वाधिक नीलामी लगवा कर उस भूमि को उठवा लेते हैं फिर तीसरे पक्ष को हम से लड़वा देते हैं। एक बार 107,151 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत मेरे पिताजी और मेरे दो भाइयों के चालान भी हो चुके हैं। क्या कोई ऐसा उपाय है जिस से जमीन की नीलामी न हो और वह खाली रह जाए? 

उत्तर —

विजयकुमार जी,

प के पिता और चाचाओं में अपनी पैतृक भूमि के स्वामित्व और बंटवारे के संबंध में विवाद है। चूंकि विवाद हल नहीं हो रहा है और लगातार उस के कारण अशांति रहती है इस कारण से आप के पिता ने आवेदन दे कर रिसीवर नियुक्त करवा दिया है। रिसीवर का दायित्व है कि वह उस के कार्यकाल के दौरान उस पर खेती करवाता रहे और उस से होने वाली आय को सरकारी खाते में जमा करता रहे, जिस से निर्णय हो जाने पर भूमि के वास्तविक हकदार को उस आय को लौटाया जा सके। रिसीवर तहसीलदार के पास इस आय को अर्जित करने का काम उस भूमि को अस्थाई रूप से कृषिकार्य के लिए किराए पर देना है। वह इस काम को लगातार करता है। विवादित पक्ष स्वयं इस नीलामी में भाग नहीं ले सकते क्यों कि इस से फिर अशांति हो सकती है। 
लेकिन आप का कहना है कि आप के चाचा अपने इच्छित व्यक्ति के माध्यम से उस भूमि को किराए पर उठवा देते हैं और फिर उस के माध्यम से आप से झगड़ा करवा कर 107/151 दं.प्र.सं. की कार्यवाही करवाते हैं। यह कार्यवाही कोई दांडिक कार्यवाही नहीं है। यह केवल शांति बनाए रखने के उद्देश्य से की गई कार्यवाही है जिस में आप को इस बात के लिए बंधपत्र देना होता है कि आप शांति बनाए रखेंगे। यदि आप के विरुद्ध यह मिथ्या शिकायत की गई है तो आप संबंधित कार्यवाही में साबित कर सकते हैं कि आप के विरुद्ध की गई कार्यवाही मिथ्या है। यदि आप को लगता है कि झगड़ा आप के चाचा और उन के मित्र करते हैं तो आप भी इन्हीं धाराओं के अंतर्गत एसडीएम के न्यायालय में उन के विरुद्ध शिकायत कर सकते हैं जिस से उन्हें भी शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र देना होगा। इस के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं है।
क बार रिसीवर नियुक्त हो जाने के उपरांत वह तो भूमि को कृषिकार्य के लिए नीलामी पर उठाएगा। भूमि रिक्त नहीं रह सकती। उस का कृषिकार्य के लिए तो उपयोग होगा ही। हाँ कोई व्यक्ति उस भूमि को नीलामी में प्राप्त कर कृषि कार्य न करे तो ही भूमि खाली रह सकती है, लेकिन उस व्यक्ति को नीलामी में तय हो चुकी किराए की राशि तो राजकोष में जमा करनी होगी। जिस के लिए न आप तैयार होंगे और न कोई और। इस का उपाय तो यही है कि विवाद किसी भी तरह से जल्दी हल हो जाए। न्यायालय से तो इस में जो समय लगता है लगेगा। हाँ यदि आप के पिता और चाचा चाहें तो आपस में मिल बैठ कर समझौता कर लें तो विवाद जल्दी हल हो सकता है।