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उच्च न्यायालय के निर्णय की अनुपालना के लिए उच्च न्यायालय में ही आवेदन करें।

lawसमस्या-
डॉ. महावीर सिंह ने झुन्झुनु, राजस्थान से पूछा है-

युर्वेद विभाग राजस्थान में साक्षात्कार के माध्यम से जून 2009 में 378 आयुर्वेद चिकित्साधिकारी पद पर नियुक्ति /पदस्थापन हुआ। यह भर्तियाँ राजस्थान ग्रामीण आयुर्वेद होमोपथी यूनानी एवं प्राकृतिक सेवा अधिनियम-2008 के अंतर्गत कि गई थीं।  दो वर्ष का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से तीन माह पहले राजस्थान हाईकोर्ट के एक निर्णय द्वारा भर्ती को अवैध घोषित कर दुबारा मेरिट बनाने का आदेश दिया तथा दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरे होने तक कोर्ट ने इन चिकित्सकों को ग्रामीण चिकित्सा का हवाला देकर कार्य करते रहने का निर्देश दिया। आदेश के मुख्य बिंदु थे कि 1. सरकार द्वारा सर्विस रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकने से कोर्ट ने माना कि चयन समिति ने रिकॉर्ड बनाया ही नहीं, 2.  दुबारा चयन प्रक्रिया पूरे होने तक इनको डिस्टर्ब नहीं किया जाये! आज तक सरकार दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी है। मार्गदर्शन देने का श्रम करें। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार में दो वर्ष के प्रोबेशन पीरियड में प्रोबेशन ट्रेनी के रूप में फिक्स-रिमुनरेशन 16800/- पर रखा जाता है, हमें आज तक यही मिल रहा है।

समाधान-

प की नियुक्ति को उच्च न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा चुका है। हो सकता है राजस्थान सरकार ने उस निर्णय को आगे चुनौती दी हो, जानकारी करें। आवश्यक सेवाएँ होने के कारण नई चयन प्रक्रिया पुनः पूर्ण हो जाने तक के लिए आप को सेवा में यथावत बनाए रखने का आदेश दिया गया है। निश्चित रूप से आप को वही निश्चित वेतन तब तक मिलेगा जब तक कि आप को पुनः चयन प्रक्रिया के द्वारा चयन किया जा कर पिछली तिथि से नियुक्ति नहीं दे दी जाती है।

दि सरकार इस काम में देरी कर रही है तो यह उस का दोष है और न्यायालय के निर्णय की अवमानना भी है। इस के लिए आप न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं और एक नई रिट भी प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्च न्यायालय के वकील से संपर्क कर के उन्हें पूर्व निर्णय व संबंधित आदेश व आवश्यक दस्तावेज दिखा कर राय करना चाहिए और उन की सलाह के अनुसार कार्यवाही करना चाहिए।

कीडों का कनस्तर खुलता है तो उसे खुलने दो!

हलका में प्रकाशित प्रशांत भूषण के साक्षात्कार में भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश श्री एस.एच. कपाड़िया के संबंध में की गई टिप्पणी पर कि ‘उन्हें उस कंपनी के मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी जिस के वे शेयरधारक हैं,’  सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अवमानना कार्यवाही के दौरान प्रशांत भूषण के वकील राम जेठमलानी ने अपने मुवक्किल का लिखित बयान पेश किया। इस बयान में कहा गया था कि ‘उन के मुवक्किल के बयान का यह गलत अर्थ लगाया गया कि ‘न्यायमूर्ति कपाड़िया किसी आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं,  न्यायमूर्ति कपाड़िया आर्थिक शुचिता के लिए जाने जाते हैं और मेरा मुवक्किल भी इस धारणा को सही मानता है। उन का मुवक्किल न्यायमूर्ति कपाड़िया का बहुत सम्मान करता है।’
स बयान को देखने के उपरांत न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर ने जेठमलानी से पूछा कि उन का मुवक्किल अदालत के सामने क्षमा याचना या खेद क्यों नहीं प्रकट कर देता?
ब जेठमलानी ने कहा कि ‘आप (अदालत) मेरे मुवक्किल से क्षमायाचना या खेद प्रकट करने को नहीं कह सकते। अवमानना कार्यवाही किसी दबाव में नहीं चलनी चाहिए, केवल वे कायर ही जो कार्यवाही का सामना नहीं कर सकते क्षमा याचना या खेद प्रकट कर सकते हैं। मैं अपने मुवक्किल को क्षमायाचना या खेद प्रकट करने की सलाह नहीं दे सकता।’
स के उपरांत न्यायालय ने संक्षिप्त आदेश पारित किया कि वह प्रशांत भूषण के लिखित बयान को स्वीकार नहीं करती, मामले का निर्णय गुणावगुण पर करने के लिए कार्यवाही को आगे चलाया जाए। तब जेठमलानी ने कहा कि ‘यदि कार्यवाही आगे चलाई जाती है तो वह कीड़ों का कनस्तर खोल देगी’। तब न्यायमूर्ति कबीर का उत्तर था कि ‘वह खुलता है तो खुलने दिया जाए’। 
स पर जेठमलानी ने कहा कि ‘हर कोई जानता है कि पिछले दो वर्षों से इस न्यायालय में क्या चल रहा है, लेकिन कोई मुहँ नहीं खोलना चाहता। यदि जनता को सच बोलने के लिए भुगतना चाहिए तो लाखों लोग सींखचों के पीछे जाने को तैयार हैं’
सी अवमानना कार्यवाही में तहलका के अरुण तेजपाल के वकील राजीव धवन ने उन की ओर से कहा कि उन का मुवक्किल भी प्रशांत भूषण के रुख का समर्थन करता है। यदि सच ही अवमानना की प्रतिरक्षा बनने जा रहा है तो कुछ पूर्व मुख्यन्यायाधीश भी एक्स-रे की जद में आ सकते हैं।
न्यायमूर्ति सिरिक जोसेफ ने कहा कि जब कभी न्यायाधीश यह महसूस करते हैं कि उन का कही गई बात का अर्थ कुछ और समझ लिया गया है, तो वे भी खेद प्रकट करते हैं। अवमानना कार्यवाही का सामना करने वालों के लिए खेद प्रकट करने में कोई खराबी नहीं है।
पूर्व कानून मंत्री शान्तिभूषण जिन्होंने यह कहा था कि उच्च-न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, चाहते थे कि इस अवमानना कार्यवाही में उन्हें भी पक्षकार बनाए जाने की उन के आवेदन पर विचार किया जाए, इस पर अदालत ने उन के आवेदन पर अगली तिथि पर विचार करने को कहा। अब इस मामले की सुनवाई 13 अप्रेल को की जाएगी।

न्यायपालिका की आलोचना के लिए माफी मांगने के बजाय जेल जाना पसंद करेंगे

पिछले दो दिनों से सुरेश चिपलूनकर ने सुप्रीमकोर्ट के जजों के संदिग्ध आचरण के बारे में अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया है। यह सब बहुत पहले से तहलका ई-मैगज़ीन पर पिछली सात अक्टूबर को प्रकाशित हो चुका था।  यह सारा मामला वास्तव में न्यायिक जवाबदेही आंदोलन के प्रमुख और सुप्रीमकोर्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण के तहलका में प्रकाशित एक साक्षात्कार में यह कहने पर उत्पन्न हुआ था कि देश के पिछले सोलह न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे। उस समय तक न्यायमूर्ति एच.एस. कपाड़िया मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे, उन्हों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन् के साथ एक पीठ में वेदान्ता स्टरलाइट ग्रुप से जुड़े एक मामले की सुनवाई की थी इसी साक्षात्कार में उन्हों ने यह भी कहा था कि न्यायमूर्ति कापड़िया को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह कंपनी के शेयर धारक हैं।  
स साक्षात्कार के आधार पर सुप्रीमकोर्ट के एक अधिवक्ता  हरीश साल्वे ने सुप्रीमकोर्ट के समक्ष एक अवमानना याचिका दाखिल की गई और उस पर प्रशांत भूषण और तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट ने अवमानना नोटिस जारी किया। इस नोटिस के उत्तर में प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्हों ने जो कुछ कहा वह उन की निजि राय थी जो तथ्यों पर आधारित थी, और यदि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में निजि राय अभिव्यक्त करना उन का अभिव्यक्ति का मूल अधिकार है। इस के समर्थन में प्रशांत भूषण के पिता और वरिष्ठ अधिवक्ता शान्ति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दाखिल कर के कहा कि वे खुद जानते हैं कि सोलह में से आठ मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। इस शपथ पत्र के अंश तहलका ने प्रकाशित किए। शान्ति भूषण ने यह भी कहा कि उन्हें इस कार्यवाही में पक्षकार बनाना चाहिए क्यों कि जो कुछ प्रशांत ने कहा है वह सही है और वे उस की ताईद करते हैं।
बुधवार को इसी प्रकरण की प्रारंभिक पूछताछ सुनवाई के दौरान पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की ओर इशारा करने के लिए माफी मांगने के  स्थान पर को जेल जाना पसंद करेंगे। उन्हों ने न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर, न्यायमूर्ति सायरिक यूसुफ और न्यायमूर्ति एच एल दत्तू की सुप्रीम कोर्ट बैंच के समक्ष यह जवाब तब दिया जब उन्हें उन से माफी मांगने की पेशकश की गई थी।
स अवमानना के इस मामले में यह प्रश्न निहित हो चुका है कि भूषण पिता-पुत्र द्वारा जो कुछ सुप्रीमकोर्ट और उस के न्यायाधीशों के लिए कहा और तरुण तेजपाल द्वारा तहलका में प्रकाशित किय

सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के लिए दंडित करने व नियम बनाने की शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-98

अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति
र्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत एक अभिलेख न्यायालय है। इसी कारण से इस न्यायालय को अपनी ही अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। अवमानना के लिए दंडित करने की इस शक्ति का प्रयोग केवल न्यायालय के न्याय प्रशासन के संबंध में ही किया जा सकता है, किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत अपमान के संबंध में इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
इस शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही कर सकता है जो अवांछित उपायों से न्यायाधीशों को प्रभावित करने और न्याय की प्रक्रिया में प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 121 में यह उपबंध किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण और निर्णय के संबंध में संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। लेकिन किसी समाचार पत्र में या अन्यथा प्रकाशित किसी आलोचनात्मक आलेख या कथन से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रशासन के प्रति समुदाय के विश्वास को क्षति पहुँची हो या उस कथन या आलोचना से न्यायिक प्रशासन में अवरोध उत्पन्न हुआ हो तो उक्त कथन अथवा आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। 
सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 145 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। वह केवल वे ही नियम बना सकता है जो कि संसद द्वारा नहीं बनाए गए हों। इस तरह संसद द्वारा निर्मित विधि और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में किसी भी तरह के संघर्ष की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।

न्यायालय द्वारा जमानत न देने पर विचाराधीन बंदी को छुड़ाने के लिए सरकार के विरुद्ध आंदोलन न्यायालय की अवमानना नहीं

 महेश सिन्हा पूछते हैं …….

किसी विचाराधीन बंदी को अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी अगर जमानत देने से इंकार किया हो और एक ग्रुप उस व्यक्ति को छुड़ाने के लिए जन आन्दोलन चलाये तो क्या ये अवमाननना नहीं है?

 उत्तर

महेश भाई,
आप का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।  पिछले दिनों इस तरह का प्रश्न अनेक बार उठा है, लेकिन जवाब नदारद है।  कहीं से भी इस का उत्तर नहीं मिल सका है।  मेरे ज्ञान और अध्ययन के अनुसार इस तरह के आंदोलन से न्यायालय की किसी तरह की अवमानना नहीं होती।  जमानत एक ऐसा प्रश्न है जिस में न्यायालय केवल पुलिस की प्रारंभिक रिपोर्ट को देखती है और उस पर अपनी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं करते हुए जमानत लेने या नहीं लेने का निर्णय करती है।  जमानत के उपरांत पुलिस को न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत करना होता है।  फिर आरोपों का विचारण होता है तथा साक्ष्य के आधार पर निर्णय दिया जाता है।  इस पूरी प्रक्रिया के दौरान भी न्यायालय उचित समझे तो अभियुक्त को जमानत का लाभ दे सकता है।  लेकिन यदि अन्वेषण गलत रीति से हो रहा है, या पुलिस ने किसी व्यक्ति को द्वेष या राजनैतिक कारणों से फंसाया है, तो जो लोग ऐसा समझते हैं,  राज्य और पुलिस के विरुद्ध इस आधार पर अपनी मांग उठा सकते हैं और इस से न्यायालय की किसी प्रकार की अवमानना नहीं होती।

कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट में न्यायालय की अवमानना को दो हिस्सों में बांटा है। एक दीवानी अवमानना और दूसरी अपराधिक अवमानना
1. दीवानी अवमानना-  का अर्थ है,  इरादतन किसी निर्णय, डिक्री, निर्देश, आदेश, रिट या अन्य किसी प्रक्रिया की अवज्ञा करना या न्यायालय को दी गई अण्डरटेकिंग का इरादतन उल्लंघन करना।
इस का मूल आंग्ल पाठ निम्न प्रकार है….

‘Civil contempt’ means willful disobedience to any judgement, decree, direction, order, writ or other process of a court or willful breach of an undertaking given to a court.

2. अपराधिक अवमानना- का अर्थ है,
(लिखे गए या बोले गए शब्दों, य़ा संकेतों या दृश्य प्रस्तुतिकरण या अन्य रीति से। किसी मामले का प्रकाशन या कोई अन्य कोई  कृत्य जो-
क- किसी न्यायालय की अधिकारिता को स्केण्डलाइज करे या करने की कोशिश करे या कम करे; या
ख- न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया या कार्यवाही में किसी तरह का हस्तक्षेप करे या उसे प्रभावित करे; या
ग- किसी भी अन्य तरीके से न्याय प्रशासन को बाधित करे या बाधित करने का प्रयत्न करे या उस में हस्तक्षेप या करने का प्रयत्न करे।
इस का मूल आंग्ल पाठ निम्न प्रकार है…
‘Criminal contempt’ means the publication (whether by words, spoken or written, or by signs, or by visible representation, or otherwise) of any matter or the doing of any other act whatsoever which:

    (i) Scandalises or tends to scandalise, or lowers or tends to lower the authority of, any court, or
    (ii) Prejudices, or interferes or tends to interfere with the due course of any judicial proceeding, or
    (iii) Interferes or tends to interfere with, or obstructs or tends to obstruct, the administration of justice in any other manner.

पिछले दिनों ऐसा ही कुछ संदर्भ छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से मुझे मिला था। वहाँ डाक्टर बिनायक सेन एक वर्ष स

उच्च न्यायालय से कब्जा दिलाने के आदेश के बाद भी एक वर्ष से एसडीएम ने कुछ नहीं किया

 कुल भूषण महलवाल पूछते हैं …                                                                                                               
हमारा एक मुकदमा एसडीएम दिल्ली में मेहरोली में लम्बित है।  यह मामला किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा हमारी भूमि पर अनधिकृत कब्जा कर लेने का है जो पिछले 20 वर्ष से चल रहा है। चार बार भूमि की नपाई हो चुकी है। अंतिम रूप से उच्च न्यायालय से निर्णय हमारे पक्ष में हो चुका है और भूमि को नाप कर जिस के कब्जे की भूमि है उसे देने का आदेश मेहरोली एसडीएम को दिया गया है। अब एक साल से एसडीएम के यहाँ लंबित है  लेकिन मैं इस बात से क्षुब्ध हूँ कि अभी तक नोटिस तक जारी नहीं किया गया है। मैं कैसे माननीय एसडीएम साहब से यह निवेदन कर सकता हूँ कि वह कम से कम नोटिस तो जारी करें। जिस ने कानून का उल्लंघन किया है वह भूमि का उपयोग कर रहा है और जो कानून का अनुसरण कर रहा है वह परेशान है।  यह किस तरह का कानून चल रहा है? आप जानते हैं कि एसडीएम उन के क्षेत्राधिकार के निवासियों के लिए भगवान की  तरह हैं। हमें उन की कृपा चाहिए। हमारे पास जीवन यापन के सीमित साधन हैं। जब कि हम इस मुकदमे के जाल में 20 वर्ष से उलझे हुए हैं। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि कैसे मैं एसडीएम को अपना आवेदन प्रस्तुत करूं।

उत्तर …                                                                                                                                                        .
महलवाल जी! आप देश भर के उन लोगों में से एक हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव कर रहे हैं कि देश में शासन लाठी का है, कानून का नहीं। इस के दो कारण हैं। एक तो एसडीएम को अपनी अदालत देखने की फुरसत नहीं है। उसे कलेक्टर के आदेशों और विधायकों, संसद सदस्यों, मंत्रियों और उन के सिफारिशियों के कामों में ही संलग्न रहना पड़ता है। जब तक आप भी कोई लाठी ले कर एसडीएम के पास नहीं जाएंगे आप का काम ऐसे ही लटका रहेगा।

आप ने अपना मामला न्यायालय में कानूनी तरीके से लड़ा है। आप इसे कानूनी तरीके से ही आगे बढ़ाइए। कानून ही आप की लाठी बन सकता है। आप सब से पहले तो सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर पूछिए की उच्च न्यायालय ने जो आदेश एसडीएम को दिया है उस में आदेश की तिथि से आज तक क्या कार्यवाही की गई है? जब इस का उत्तर मिल जाए तो उसे ले कर अपने हाईकोर्ट के वकील से फिर से जा कर मिलिए, और कहिए कि वह उच्च न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर एसडीएम को उच्च न्यायालय के आदेश की पालना समय बद्ध रूप से करने का आदेश प्राप्त करे। फिर भी एसडीएम  समयबद्ध तरीके से काम नहीं करता है तो उसे उच्च न्यायालय के आदेश की पालना नहीं करने के लिए अवमानना का नोटिस भेजिए और उच्च न्यायालय  में अवमानना का आवेदन प्रस्तुत करवाइए। मेरे विचार से आप का काम इस विधि से शीघ्र हो जाएगा।

यदि आप के पास आर्थिक साधन कम हैं तो आप जिला और राज्य विधिक सहायता समिति के अध्यक्षों को आवेदन कर सकते हैं कि वे आप को विधिक सहायता प्रदान करें।
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कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट क्या है?

न्यायालय. किसी भी राज्य की अंतिम प्राचीर हैं। बिना किसी सेना के एक राज्य का अस्तित्व हो सकता है लेकिन न्यायालयों के बिना राज्य की प्राधिकारिता में जनता के विश्वास  को बनाए रखना असंभव है। आदि-काल में राजा व्यक्तिगत रूप से स्वयं न्यायालय में बैठता था और न्याय  करता था।  जैसे-जैसे शासन की कला का विकास हुआ, वैस- वैसे राजा ने अपनी शक्तियों को सरकार के तीन अंगों कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में बांट दिया। न्यायाधीश राजा के नाम से न्याय करने लगे। .यह राजा का न्याय था, इस कारण उस के प्रति पूरे सम्मान और आदर की अपेक्षा की जाने लगी। न्याय-पीठ के प्रति कोई भी असम्मान उस की गरिमा और महिमा के विरुद्ध माना जाता। यदि कानून के प्रति जनता की निष्ठा को मूलभूत रूप से हानि पहुँचाने वाला कोई भी कृत्य न्याय के लिए सब से घातक और खतरनाक माना जाता। क्यों कि यह व्यक्तिगत रुप से जजों की सुरक्षा को नहीं अपितु राजा के द्वारा जनता के लिए किए जा रहे न्याय के प्रशासन में अवरोधकारी समझा जाता।

आदिकालीन राज्यतंत्रों में न्याय की सर्वोच्च महिमा के इस सिद्धान्त का बाद में प्रजातांत्रिक राज्यों में भी अनुसरण किया गया। आजादी पसंद आधुनिक दुनिया की जन-उत्तरदायी राज्यों के युग में भी न्यायपीठ के प्रति विशेष सम्मान  का यह सिद्धान्त आज भी जीवित है और न्याय-पीठ प्रति किसी भी प्रकार का अपमानजनक व्यवहार दण्डनीय है।

न्याय की सामान्य प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने वाला और हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति वाला प्रत्येक कृत्य न्यायालय की अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट) है। न्यायालयों की अवमानना के मामलों में लोगों से जिस अनुशासन की अपेक्षा की जाती है उस का अर्थ न्यायालयों और व्यक्ति के रूप में न्यायाधीशों के प्रति सम्मान बनाए रखना नहीं है।  अपितु न्याय प्रशासन की प्रक्रिया को अनावश्यक हस्तक्षेपों से बचाए रखना है। यह जनता की आंकाक्षाओं के अनुरूप भी है, जो कि न्याय प्रशासन की स्वच्छता, निष्पक्षता और अधिकारिता की आभा और सम्मान को बनाए रखना चाहती है।

असम्मानजनक व्यवहार द्वारा जनता के बीच न्यायालयों के विश्वास को नष्ट करने की अनुमति किसी भी व्यक्ति को नहीं दी जा सकती है, भले ही वह स्वयं जज ही क्यों न हो। एक गलती करने वाला न्यायाधीश और  न्यायालय की अवमानना कर न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करने वाला व्यक्ति न्याय प्रशासन की स्वच्छता, निष्पक्षता, अधिकारिता और गरिमा के प्रति इस सीमा तक समान रूप से घातक हैं कि दोनों ही न्याय प्रशासन की गरिमा को नष्ट करने का काम करते हैं। किसी भी निर्णय की उचित, ईमानदार और निष्पक्ष आलोचना न्यायालय की अवमानना नहीं है। इतना अवश्य है कि इस आलोचना की भाषा असम्मानजनक नहीं होनी चाहिए।

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